शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

देवल रानी



दिल्ली के सुलतानो की राजनेति खून , हत्या षड्यंत्र विश्वासघात से दूध पानी की तरह घुली मिमिली थी  | जिसके प्रमाण इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर अंकित है , उनके महलो के भीतर भी इसी तरह के घृणित षड्यंत्र राग द्वेष और हत्याओं का बोलबाला था | देवल रानी की दर्दभरी कहानी , महलो के भीतर चलने वाले ऐसे ही जाल फरेबो  का एक जीता जागता प्रमाण है | इसी भोली -- भाली राजकुमारी ने इन निष्ठुर हत्यारों के हाथो क्या कुछ नही सहा ? अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा एवं ससुर जलालुद्दीन की हत्या करके दिल्ली के तख्त पर कदम रखे थे | इस महत्वाकाक्षी युवा सुलतान ने शीघ्र ही एक एक करके भारत के भीतरी प्रदेशो को जीता और अपने राज्य में मिला लिया , उसकी सेनाओं ने 1927 ई में गुजरात पर आक्रमण किया | विजय के पश्चात उसके सेनापति उलगुखान व नुसरतखान ने राजमहलो और खजानों को जी भर के लुटा , इसी लूट में उनके हाथ गुजरात की रानी कमला देवी लगी | राजा कर्णदेव तो अपनी नन्ही सी बिटिया देवल के साथ मुसलमानों से बच निकले भागे | लेकिन आक्रमणकारियों के हाथ रानी पड़ गयी | राजा ने देवगिरी के शासक रामचन्द्र के यहाँ शरण ली | गुजरात पर सुलतान का अधिकार हो गया , उसने रानी कमला देवी के रूपसौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसके साथ विवाह कर लिया , इसी लूट में शाही सेना के हाथ एक हिजड़ा भी लगा जिसके हाथो स्वंय अलाउद्दीन खिलजी , उसके परिवार का नाश हुआ इतिहास में यह हिजड़ा मलिक काफूर के नाम से प्रसिद्ध है , जन्म से यह हिन्दू था , पर सुलतान से अनैतिक सम्बन्ध जुड़ जाने पर मुसलमान बन गया था | गुजरात विजय के कुछ वर्षो बाद अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरी पर भी हमला कर दिया और वहा  के राजा रामचन्द्र को परास्त करके कमला देवी की पुत्री देवल को अधिकार में ले लिया और दिल्ली मंगवा लिया | कई वर्षो  बाद माँ बेटी का मिलन हुआ | यह  क्रूर व्यग्य तो उन्होंने कलेजे पर पत्थर रखकर सह लिया , लेकिन उन्हें क्या पता था कि षड्यन्त्रो  की भूमि सीरी ( दिल्ली ) में उन्हें अभी न जाने और कितने दुःख उठाने थे | इस समय देवल दस वर्ष की परम सुन्दरी रूपवती बालिका थी | वह अलाउद्दीन के महलो के भीतर चलने वाली कुटिल और भयंकर राजनीति और सर्वनाशी हथकंडॉ से अनजान बनी हुई सुंदरी तितली की तरह खेलती रहती थी | उसका सौन्दर्य महकते गुलाब की रह था | जो बरबस दुसरो की नजर अपनी ओर खीच लेता था | सुलतान की एक अन्य बेगम से खिज्रखान नाम का एक पुत्र था , वह उम्र में दो साल बड़ा था | शुरू से ही देवल और खिज्रखान एक दूसरे से प्रेम करने लगे दोनों सारा दिन साथ साथ खेलते रहते थे खिज्रखान परम सुन्दर बालक था उसकी शक्ल देवल के भाई से बहुत मिलती जुलती थी इसीलिए कमला देवी उससे बहुत स्नेह करती थी |
सुलतान अलाउद्दीन खिलजी को इन दोनों बच्चो की बढती प्रीति को देखकर बड़ी प्रसन्नता होती थी | और उसने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वह अपने पुत्र खिज्रखान का विवाह गुजरात की राजकुमारी देवल के साथ कर देगा | ज्यो -- ज्यो दिन बीतते गये देवल और खिज्रखान का प्रेम प्र्गाद होता गया | यह प्रगाढ़ता यौवन के आगमन के साथ दृढतर होती चली गयी अब स्थिति ऐसी आ गयी थी कि वे दोनों एक दुसरे को देखने के लिए विकल रहने लगे सीरी के कुटिल राजमहलो से इन दोनों के प्रगाढ़ प्रेम की कहानी छिपी न रह सकी , सुलतान ने रजा कर्ण को संदेश भेजकर उनकी पुत्री देवल का विवाह अपने शहजादे खिज्रखान के साथ करने की सहमती भी प्राप्त कर ली |

- सुनील दत्ता

कोई टिप्पणी नहीं: