मंगलवार, 10 सितंबर 2013

लक्षमण रेखा

एक महिला पत्रकार एक वीरान और सुनसान मिल में एक साथी के साथ शाम को साढ़े सात बजे फ़ोटोग्राफ़ लेने जाती है, वहां  उसके साथ जो घटना घटित होती है वह बड़ी ही शर्मनाक है. इस शर्मनाक काम में शरीक सभी पांचों पापी पुलिस की पकड़ में आ जाते हैं. गैंग लीडर मोहम्मद क़ासिम हफ़ीज़ शेख उर्फ़ बंगाली ने मुम्बई क्राइब्रांच को बताया कि वह पिछले साल चार औरतों के साथ इसी शक्ति मिल में मर्दान्गी दिखा चुका है.
यह घटना कोई नई नहीं है, इस तरह के बे्शर्मी की घटनायें पूरे मुल्क में हो रही हैं. इन पर काबू पाने के लिये अलग-अलग विचार सामने आये हैं. सख़्त क़ानून की ज़ुरूरत है, ऐसे लोगों को फासी मिलनी चाहिये और जब  फासी पर विचार-विम्र्य होने लगा तो मांग करने वालों को दुम दबाते देखा गया और कहने लगे कि जनता में जागरूकता लाने के लिये समाजी और मज़हबी संस्थाओं को भी आगे आना चाहिये.
एक ग़ज़ब के नेता जी ने कहा ‘लड़कियां अगर दूर-दराज़ इलाकों में जाती है तो पुलिस को बता कर जाना चाहिये’. इस भोलेपन की बात पर रफ़ीक़ शादानी का एक मिस्रा याद आगया ‘‘दूध की हंडिया धरेव न भइया बिल्ली की निगरानी मा’’. ख़ैर...
एक सुझाव बड़ा मुनासिब लगा कि सख़्त क़ानून बना कर बलात्कार की घटना पर नियन्त्रण नही किया जा सकता अन्य तरीके भी निकालने होंगे ख़ास कर लड़कियों के रहन सहन, और कपड़े किस तरह के होते हैं यह भी देखना पड़ेगा.
श्री राम के बनवास के दौरान सीता जी के लिये लक्षमण ने जो रेखा खींची थी उसकी आवश्यकता आज भी है और हमे्या रहेगी. सीता अभी तक लक्षमण रेखा के बाहर है, ज़रूरत है सीता को लक्षमण रेखा के अन्दर वापस आने की और जब सीता वापस आ जायगी, रावणों का ज़ोर खत्म हो जायगा लेकिन आज के ज़माने में लक्षमण रेखा को पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता है और यही विचारधारा ही सुनसान ्यक्ति मिल तक बच्चियों को पहुंचा रही है.
कठोर से कठोर दंड की लोग मांग कर रहे हैं और इस मांग पर इतना सख़्त क़ानून बना दिया जाये कि केवल पीडि़त की गवाही पर मुल्जि़म का सर काट दिया जाये, इससे कठोर दंड नहीं हो सकता परन्तु यह दंड घटना घटित होने के बाद ही दिया जायेगा, क़ानून तो ऐसा होना चाहिय कि लड़की पीडि़त होने के लिये ्यक्ति मिल तक जाये ही न.

       नारी के दिल व दिमाग़ में मतलबी लोेगों ने केवल अपने फ़ायदे के लिये यह भर दिया है कि ‘‘तुम उनके कंधों से कंधा मिला कर चल सकती हो, तुम अबला नहीं हो, तुम सब कुछ कर सकती हो, तुम नौकरानियों की तरह मत रहो, तुम मर्दों की गुलामी मत करो, इस तरह की बातें सुन-सुन कर औरत को मां, बाप, भाई, बहन के लिये खाना बनाना, पति के बिस्तर की सिलवटें मिटाना, बच्चों के पोतड़े धोना ख़राब लगने लगा अब उसने ‘एयर होस्ट्स’ बन कर पराय मर्दाें के लिये मुस्कराहटें बिखेरने का काम संभाल लिया है. अब उसे फ़ाइवस्टार होटलों में दूसरों के बिस्तर की ्ियकने बराबर करने में कोई झिझक नहीं होती. कला के नाम पर पोस्टरों पर टंगने के लिये कपड़े तंग और ख़त्म होते जा रहे हैं.
    निजी कम्पनियों में युवतियों को वरीयता तो दी जाती है वह इस लिये कि कम दाम देकर अधिक लाभ कमाया जा सके. काम के घन्टे इनको अधिक दिये जाते हैं परन्तु काम के दाम बहुत कम. रात में नौ-दस बजे काम से छूटने वाली लड़कियों की सुरक्षा का मामला बहुत बड़ा मसला है.
लोगों ने महिलाओं को ओट और नोट के मकड़जाल में फंासा और ‘फै़मिली सिस्टम’ को बरबाद किया. बच्चे ममता की छांव के बजाये ‘क्रेज़’ में या नौकरानियों की देख-रेख में पलने लगे. नेता लोग कहते हैं आधी आबादी को (यानी महिलाओं को) ख़ाली बिठा कर नहीं खिला सकते, उन्हें काम तो करना ही पड़ेगा. तो सवाल यह उठता है कि क्या सारे पुरूड्ढ रोज़गार से जुड़ गये हैं? पहले इनकी बेरोज़गारी दूर होनी चाहिये इसके बाद महिलाओं के रोज़गार की तरफ़ देखना चाहिये. इस समय हालत यह है कि किसी घर में पति-पत्नी दोनों के पास रोज़गार है और किसी घर में दोनों के पास रोज़गार नही है. ऐसी हालत में पहले घर की पत्नी की नौकरी दूसरे घर के पुरूड्ढ के पास होती तो देानों के घरों में रोज़गार होता और दोनों परिवार खु्यहाल होते.
पश्चिमी दे्यों की नकल में हमने भी महिलाओं को घर से बाहर निकाला और निश्ति रूप से पैदावार और आय में लाभ हुआ परन्तु फैमली सिस्टम तबाह हो रहा है. महिला फ़ैमली सिस्टम को तोड़ कर बहुत आगे जा चुकी है, उसे उस जगह पर वापस आना है जो जगह मज़हब ने या धर्म दे रखा है.
        मानवी जीवन दो भागों में बटा हुआ है, एक घर के अन्दर का विभाग और दूसरे घर के बाहर का विभाग. यह दोनों विभाग ऐसे हैं जो आपसी तालमेल के बगै़र पारिवारिक खु्यगवार जि़न्दगी नहीं गुज़ारी जा सकती. घर के अन्दर की व्यवस्था बहुत ज़रूरी है और घर के बाहर यानी रोटी-रोज़ी कमाने की व्यवस्था भी ज़रूरी है. इस तरह से जब दोनों व्यवस्थायें अपनी-अपनी जगह पर ठीक-ठीक चलेंगी तभी जि़न्दगी को सफल और उद्ये्यपूर्ण कहा जा सकता है वर्ना अगर इसमें से एक भी व्यवस्था बिखर कर ख़त्म हो गया या कमज़ोर पड़गई तो मानवी जीवन अस्तव्यस्त हो कर रह जायेगा.
घर एक ऐसा कारख़ना होता है जिस की जनरल मैनेजर भी महिला होती है और मज़दूर भी वही महिला होती है जो साल में 365 दिन, महीने के 30 दिन, सप्ताह के सात दिन और दिन के चैबीस घन्टे काम करती रहती है. सोते समय भी वह ड्यूटी पर रहती है. कोई अवकाश  नहीं उसका काई बदल नहीं. यही महिला अपने घर की निरीक्षक है जो काम का निरीक्षण करती है, वही अपने घर की प्लानर जो अगले कार्यों को योजनाब़द्ध करती है. यही अपने घर की वित्तीय नियंत्रक है जो आय और व्यय पर नियन्त्रण रखती है. वह अपने घर की जनसंपर्क अधिकारी है जो सम्बन्धियों में तालमेल बनाये रखती है. बहुत से महत्वपूर्ण मामलों में न्यायधी्यों की तरह निर्णय लेती है. लिपिक की तरह बच्चों की फ़ीस, धोबी, दूध, सब्ज़ी आदि का हिसाब रखती है. वह एक अच्छी रसोइया भी है और अच्छी वेटर भी है जो सलीक़े से भोजन तैयार करने और परोसने की कला जानती है. बर्तन साफ़ करते वक़्त नैकरानी भी बन जाती है. आवश्यकता पड़ने पर नर्स भी बन जाती है. एक सुरक्षाधिकारी की तरह अपने पति की सम्पति की सुरक्षा भी करती है, एयर-होस्ट्स की तरह घर में प्रवे्य करते हुये पति की मुसकुराहटों के साथ स्वागत करती है. यही औरत अपने बच्चों की प्रथम पाठ्याला तो होती ही है साथ ही अपने बच्चों की अच्छी मित्र भी होती है जिस से बच्चे खुल कर बातें करते हैं. यही औरत अपने बच्चों को पाल-पोस कर एक अच्छा नागरिक बनाती है जिससे एक आरोग्य समाज की उत्पत्ति होती है.



                                                                                                                            - शमीम एक़बाल खां


2 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

विचारणीय आलेख,,,
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !
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RECENT POST : समझ में आया बापू .

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra