शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सांप्रदायिक हिंसा में पुलिस की भूमिका-भाग-1



हमारे देश  में साम्प्रदायिक हिंसा नियंत्रित करने में पुलिस और प्रशा सन की भूमिका पर हमेशा  से प्रष्नचिन्ह लगते रहे हैं। पुलिस और प्रशासन अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहते हैं। भारत में अधिकतर साम्प्रदायिक दंगे पूर्व नियोजित होते हैं। स्वस्फूर्त दंगों को चैबीस घंटों के भीतर नियंत्रित किया जा सकता है, बषर्ते पुलिस, जिला प्रशासन  व सरकार ऐसा करना चाहते हों । दूसरे शब्दों में, दंगे तभी चैबीस घंटे से अधिक अवधि तक चल सकते हैं जब 1. वे पूर्व नियोजित हों व 2. प्रशासन व पुलिस दंगे जारी रखना चाहते हों। विभूति नारायण राय एक जानेमाने सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं। उन्हें दंगों से निपटने का लंबा अनुभव है और उन्होंने साम्प्रदायिक दंगों और उनमें पुलिस की भूमिका का विशद और गहन अध्ययन किया है। उनका तर्क है कि भारत में न तो गृहयुद्ध चल रहा है और ना ही पष्चिम एशिया, यूरोप और दुनिया के कुछ अन्य भागों की तरह यहां हथियारबंद योद्धाओं के गिरोह सक्रिय हैं। अतः यदि भारत में पुलिस और प्रशासन किसी दंगे को चैबीस घंटे से अधिक की अवधि में नियंत्रित नहीं कर पाते हंै तो उनकी कार्यशैली व भूमिका की सूक्ष्म जांच की जाना आवष्यक है। अपने शोध के जरिए राय इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि चूंकि सरकारी तंत्र के सदस्यों के मन में साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह गहरे तक जड़ जमाए रहते हैं अतः वे दंगों को चैबीस घंटे के भीतर नियंत्रित करने में असफल रहते हैं। दंगों की जांच के दौरान, डाॅक्टर असगर अली इंजीनियर ने पाया कि मुंबई में दंगों के समय पुलिस कांस्टेबिलशिवसेना द्वारा प्रकाषित ‘सामना‘ अखबार पढ़ रहे थे। सन् 1984 के भिवंडी दंगांे को नियंत्रित करने के लिए तैनात पुलिसकर्मी गर्व से कहते थे कि वे वर्दी मंे शिवसैनिक हैं। सन् 1961 के जबलपुर दंगों की अपनी जांच में डाॅक्टर इंजीनियर ने पाया कि हथियारों से लैस पुलिस के सिपाहियों ने घरों में घुसकर मुस्लिम महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए। तथापि डाॅक्टर इंजीनियर का यह भी कहना है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त व निष्पक्ष पुलिस अधिकारियों की भी कमी नहीं है।
दंगे भड़कने के पूर्व संकेत
दंगों में पुलिस की मिलीभगत तीन चरणों या स्तर पर होती है। पहला चरण है, उन संकेतों को नजरअंदाज करना  जो तब मिलना शुरू होते हैं जब दंगों की योजना बनाई जा रही होती है। इस दौरान शहर या इलाके के रहवासियों के धर्म के संबंध में आंकड़े व जानकारियां एकत्र की जाती हैं। उदाहरणार्थ, गुजरात में दंगाईयों ने उन व्यवासायिक प्रतिष्ठानों पर भी हमले किए जिनके हिन्दू नाम, हिन्दू कर्मचारी और हिन्दू भागीदार थे। उन प्रतिष्ठानों को भी नहीं बख्षा गया जिनमें मुसलमानों का निवेश था या जिनमें मुसलमान निष्क्रिय भागीदार थे। हिन्दुओं के उन व्यापारिक प्रतिष्ठानों, जिनमें मुस्लिम भागीदार थे, के संबंध में जानकारी संभवतः विक्रय कर या पंजीयक, फम्र्स एण्ड सोसायटीज के कार्यालयों से एकत्रित की गई होगी। हिन्दू और मुस्लिम मकानों की पहचान के लिए उन पर निषान लगाए जाते हैं। सूरत और अहमदाबाद मंे हिन्दुओं से यह कहा गया था कि वे अपने घरों के दरवाजों पर ‘जय श्रीराम‘ लिख दें। सन् 1992-93 में सूूरत में हुए दंगों की मैंने जांच की थी। इस दौरान मुझे बताया गया कि घरों-घर ऐसे लोग पहंुचे, जो स्वयं को जनगणना कार्यालय के कर्मचारी बता रहे थे। उन्होंने कहा कि वे राशन कार्डों की जांच करने आए हैं और राशन कार्ड पर अंकित ब्यौरे को उन्होंने लिख लिया। अगला कदम होता है दंगों के दौरान इस्तेमाल में आने वाली सामग्री इकट्ठा करना। घरों में आग लगाने के लिए पेट्रोल व गैस सिलंेडर जुटाए जाते हैं, लोगों को मारने के लिए चाकुओं व तलवारों की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा, दोनों समुदायों के बीच छोटे-छोटे मुद्दों पर तनाव उत्पन्न हो जाना और ऐसी भाषणबाजी, जिससे दो समुदायों के बीच नफरत फैले, भी दंगे भड़कने के पूर्व संकेत होते हैं। भिवंडी और अलीगढ़, साम्प्रदायिक दंगों के लिए कुख्यात हैं परंतु बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, इन दोनों शहरों में पूर्ण शान्ति बनी रही। इसका कारण था हिंसा रोकने के लिए प्रशासन द्वारा की गई प्रभावी व निष्पक्ष कार्यवाही। हर बड़े दंगे के पहले संकेत या चेतावनी मिलती है। कई बार ये संकेत दंगों के महीनों या हफ्तों पहले से मिलने लगते हैं। बाबरी मस्जिद के ढ़हने से पहले, लालकृष्ण आडवानी की रथयात्रा ऐसी ही चेतावनी थी। कंधमाल में होने वाली हिंसा के संकेत 24 दिसम्बर 2008 को ही मिलना शुरू हो गए थे जब संघ परिवार के सदस्यों ने ईसाईयों द्वारा क्रिसमस मनाने के लिए बनाए गए स्वागतद्वार गिरा दिए और ईसाईयों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए।
इस चरण में पुलिस या प्रशासन अपनी ओर से कार्यवाही कर दंगे रोक सकता है। इसमें भड़काऊ भाषण देने वालों या हथियार इकट्ठे करने वालों या दंगों की योजना बनाने वालों को गिरफ्तार करना शामिल है। दोनो समुदायों के प्रतिष्ठित लोगों की बैठक आयोजित की जा सकती है जिससे उनके बीच संवाद बढ़े। लोगों मंे विष्वास जगाने के लिए पुलिस फ्लैग मार्च इत्यादि कर सकती है। अफवाहों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है। प्रषासन अगर निष्पक्ष और दृढ़ रहे तो हिंसा षुरू ही नहीं होगी। दंगे भड़क सकते हैं या भड़कने वाले हैं, इसका अंदाजा औसत बुद्धि वाले आम आदमी को भी हो जाता है। फिर पुलिस का काम ही है गुप्त सूचनाएं इकट्ठी कर उनके आधार पर समुचित कार्यवाही करना। पुलिस एक ओर असामाजिक और साम्प्रदायिक तत्वों को हिरासत में ले सकती है, उनसे षांति बनाए रखने के बांड भरवा सकती है और षरारती तत्वों के मन में भय पैदा करने के लिए शक्तिप्रदर्षन कर सकती है। इसके साथ ही, तनाव घटाने के लिए दोनों समुदायों के बीच मेलमिलाप और सौहार्द को बढ़ावा दिया जा सकता है।
हमारे पुलिसकर्मी धार्मिक जुलूसों के दौरान लगाए जाने वाले अषोभनीय, भड़काऊ या आपत्तिजनक नारों के मूक दशर्क बनेे रहते हैं। वे इस तथ्य को कोई महत्व नहीं देते की ऐसे नारे लगाना कानून की दृष्टि में तो अपराध है ही, इससे दूसरा समुदाय आहत और अपमानित महसूस करता है और भड़कता है। परंतु पुलिसकर्मी शायद ही कभी  जुलूस में से ऐसे लोगोें को अलग कर उनके खिलाफ कार्यवाही करते हंै। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस की रपट यही रहती है कि जुलूसशान्तिपूर्ण था। सन् 1970 मंे भिवण्डी में हुए दंगों के पहले, धार्मिक जुलूसों के दौरान गुंडागर्दी व अवांछनीय व्यवहार करने वालों को पुलिस की तटस्थता से प्रोत्साहन मिला तथा उन्होंने और खुलकर आपत्तिजनक व्यवहार करना शुरू कर दिया (मादोन, 1974 खण्ड 6 अध्याय 6 पृष्ठ 22)। मोहल्ला कमेटियों में अक्सर हिन्दू साम्प्रदायिक नेताओं का बोलबाला रहता है क्योंकि उन्हें साम्प्रदायिक नहीं माना जाता। साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा दिए जाने वाले भड़काऊ भाषणों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती।
पुलिस की भूमिका का दूसरा चरण षुरू होता है साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने के बाद। इस चरण में पुलिस को पर्याप्त बल का इस्तेमाल करना चाहिए। लाठीचार्ज या गोलीचालन कर दंगाईयों को तितर-बितर किया जा सकता है, कफ्र्यू लगाया जा सकता है और हथियार आदि लेकर चलने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। हिंसा के शिकार लोगों को सुरक्षा दी जा सकती है, ऐसे इलाकों में, जहां हथियार जमा होने की सूचना हो, तलाशी लेकर हथियार जप्त किए जा सकते हैं और दंगाईयों को गिरफ्तार किया जा सकता है। तीसरा चरण है दंगों के बाद हिंसा की जांच और दोषियों को सजा दिलवाने का कार्य।
तीनों ही चरणों में पुलिस और प्रशासन निष्पक्ष व्यवहार नहीं करते। कई बार उनके स्वयं के पूर्वाग्रहों के कारण और कई बार अपने राजनैतिक आकाओं के निर्देषों के चलते, प्रषासन संकेतों और चेतावनियों को नजरअंदाज करता है और रोकथाम के उपाय नहीं करता (सेनगुप्ता, कुमार व गंडेविया, 2003)। पुलिसकर्मी यह मानकर चलते हैं कि दंगा अल्पसंख्यक ही षुरू करंेगे और अगर रोकथाम की कोई कार्यवाही की भी जाती है तो उसके शिकार अल्पसंख्यक ही होते हैं। व्ही. एन. राय अपने शोधपत्र में लिखते हैं कि जिस समय रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था उस समय अयोध्या के रामजन्मभूमि थाने में साम्प्रदायिक तत्वों की जो सूची बनाई गई थी उसमें हिन्दुओं के नाम ढूंढ़े नहीं मिलते थे। पुलिस यह मानकर चलती है कि साम्प्रदायिकता पर मुसलमानों का एकाधिकार है। यद्यपि बाबरी मस्जिद का ध्वंस पूर्वनियोजित था तथापि किसी भी गुप्तचर एजेंसी ने ऐसी आश न्का व्यक्त नहीं की और ना ही ऐसी कोई सूचना सरकार को दी। लिब्रहान आयोग की रपट से यह स्पष्ट है कि गुप्तचर एजेसिंयों ने यह पता लगाने का प्रयास ही नहीं किया कि अयोध्या में इकट्ठे हो रहे कारसेवकों के असली इरादे क्या हैं।
दंगों के दौरान शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना
सूरत में दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में हुए दंगों के दौरान पुलिस मूकदर्षक बनी रही। कई बार पुलिसकर्मी जानबूझकर अल्पसंख्यकों को मौत के मुंह मंे धकेलते हैं। बिहार के भागलपुर के पास स्थित चंदेरी गांव में सेना ने लगभग 100 मुसलमानों को बिहार सैन्य पुलिस के हवाले किया। पुलिस के जवानों ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रास्ते से निकालने के नाम पर उन्हंे ठीक उस स्थान की तरफ रवाना कर दिया, जहां हिन्दू दंगाईयांे की भीड़ तैयार थी। इन सभी मुसलमानों को दंगाईयों ने मौत के घाट उतार दिया। अपने लेख ‘साम्प्रदायिक दंगे और पुलिस की भूमिका: एक अध्ययन‘ , 1997 में डाॅक्टर असगर अली इंजीनियर कहते हैं कि पुलिस और दंगाईयों के बीच अक्सर बेहतरीन समन्वय होता है। गुजरात में 1969 के दंगों के दौरान, पुलिस थानों के पास स्थित मुस्लिम आराधना स्थलों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने दिया गया। यह जगमोहन रेड्डी जांच आयोग का निष्कर्ष है। आयोग की रपट कहती है कि पुलिसकर्मियों का साम्प्रदायिकता के वाईरस से ग्रस्त हो जाना कोई अनोखी बात नहीं है क्योंकि आखिर वे भी समाज का हिस्सा होते हैं। यद्यपि दंगों मेें सबसे ज्यादा कष्ट अल्पसंख्यक भोगते हैं (औसतन 80 प्रतिशत दंगा पीडि़त अल्पसंख्यक होते हैं) तथापि पुलिस के गोलीचालन में मरने वालों में भी उनकी संख्या ज्यादा होती है और गिरफ्तार किए जाने वाले लोगों में भी। इस तथ्य को जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग की रपट व व्ही. एन. राय के शोधपत्र में रेखांकित किया गया है। सूरत के दंगों की मेरे द्वारा की गई जांच का भी यही नतीजा है। जिन दंगों में हिन्दुओं से कई गुना अधिक मुसलमान मारे गए, वहां भी गिरफ्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी।
मुस्लिम बस्तियों में कफ्र्यू अधिक सख्ती से लागू किया जाता है और उनके मकानों की तलाशी के दौरान पुलिस का व्यवहार असंवेदनशील रहता है। सूरत में जब हिंसक भीड़ सड़क पर तांडव कर रही थी तब पुलिस ने कफ्र्यू नहीं लगाया। अगर कफ्र्यू लगा दिया गया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं। बाद में जब कफ्र्यू लगा तो उन लोगों को सबसे ज्यादा परेषान किया गया जो अपने प्रियजनों की तलाश में अस्पताल आदि पहुंचने की कोषिष कर रहे थे। व्ही. एन. राय के अनुसार, ऐसा ही कुछ अहमदाबाद में 1969 में, भिवंडी में 1970 में और भागलपुर मंे 1989 में हुआ। अक्सर मुस्लिम बस्तियों के चारों ओर घेरा डाल दिया जाता है और उसके बाद सभी घरों की तलाषी ली जाती है। जाहिर है, इससे समुदाय के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। जहां मुस्लिम बस्तियों में कफ्र्यू सख्ती से लागू किया जाता है वहीं हिन्दू बस्तियों में वह केवल मुख्य सड़कों तक सीमित रहता है। अंदर गलियों में जिंदगी आम दिनों की तरह चलती रहती है। भिवंडी (1970), फीरोजाबाद (1972), अलीगढ़ (1978) और मेरठ (1982) दंगों में पुलिस के गोलीचालन से एक भी हिन्दू नहीं मारा गया। इसके विपरीत, मरने वाले मुसलमानों की संख्या क्रमश: 9, 6, 7 व 6 थी। मुंबई में 1992 के दिसम्बर में दंगों के पहले दौर में पुलिस की गोली से मरने वालों में मुसलमानों की बहुसंख्या थी। इन दंगों में 250 लोगों की जानें गईं जिनमें से 192 पुलिस की गोली से मरे और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक को कमर के ऊपर गोली लगी थी। इससे यह स्पष्ट था कि पुलिस ने दंगाईयों को तितर-बितर करने के लिए नहीं वरन् उन्हें जान से मारने के लिए गोलियां चलाईं थीं। दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में मुंबई के गोवंडी इलाके में पुलिस ने मुसलमानों को उनके घरों से घसीटकर बाहर निकाला और उन्हें गोली मार दी। ऐसा करने वाले इंस्पेक्टर को मात्र स्थानांतरण की सजा दी गई। गोवंडी में दिसंबर 7 से 10 के बीच पुलिस ने पूरे इलाके की नाकाबंदी कर तलाशी  अभियान चलाया। यद्यपि गोवंडी में कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था फिर भी पुलिसकर्मी हर गली-कूचे में गए, जबरदस्ती घरों में घुसे, लूटपाट की, निर्दोश मुसलमानों को गिरफ्तार किया, उनके साथ मारपीट की और कुछ मामलों में उन्हें गोली मार दी। इलाके में रहने वाले हिन्दू, अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ हुए इस दुव्र्यवहार से अत्यंत आक्रोशित थे। वे अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ बरसों से शांतिपूर्वक रह रहे थे।
अगले अंक में जारी....

     
-इरफान इंजीनियर