शनिवार, 9 नवंबर 2013

तोते में जान आ गयी

भारत में विधि के शासन कि अवधारणा है, न कि  परम्पराओं से संगठन निर्माण नही होता है केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना कुछ इसी तरह हुई है . माननीय उच्च न्यायालय गुवाहाटी न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की खंडपीठ  ने विधि के शासन की अवधारणा के तहत केंद्रीय जांच ब्यूरो को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इस फैसले के बाद विधि के जानने वाले लोगों में एक नया उत्साह पैदा किया था कि देश में विधि  का शासन को पुन: मान्यता दी जा रही है। देखने में यह आता है कि निचले स्तर पर बैठे न्यायाधीशगण राज्य या अभियोजन के प्रतिनिधि कि भूमिका में नजर आते हैं और कानून को राज्य के पक्ष में व्याख्या करते हैं और राज्य की मजबूरियों का हवाला देकर कानून कि अनदेखी की जाती है। कभी-कभी स्वतन्त्र न्यायपालिका कि अवधारणा का अस्तित्व ही नजर में नहीं आता है। मजिस्ट्रेट स्तर पर स्तिथि और भी बद से बदतर है।   

An illegality perpetuates in illegalities. An illegality or any action contrary to law does not become in accordance with law because it is done at the behest of the Chief Executive of the State. In a democracy what prevails is law and rule and not the height of the person exercising the power. 

- AIR 1991 SC 1902

कल से जारी न्यायलय के बाहर की बहस में एक पक्ष का कहना था की गुवाहाटी उच्च न्यायलय के फैसले पर स्थगन का कोई सवाल नहीं उठता है लेकिन वहीँ कुछ विधि विशेषज्ञों का मानना था कि केंद्र सरकार स्थगन प्राप्त कर लेगी।  

केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्थापना को असंवैधानिक करार देने वाले गुवाहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ केन्द्र सरकार को शनिवार को सुप्रीम कोर्ट से फौरी राहत मिली। न्‍यायालय ने उच्च न्यायालय के इस आदेश पर स्‍टे लगा दिया है। याचिकाकर्ता, गृह मंत्रालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब भी मांगा गया है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस पी.सदाशिवम की अध्‍यक्षता में उनके आवास पर हुई, जहां उनके साथ दो अन्‍य न्‍यायमूर्ति भी थे। मामले की अगली सुनवाई 6 दिसंबर मुकर्रर की गई है।  उच्चतम  न्यायालय में एक कैवियट याचिका दायर कर कहा गया था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो मामले में केंद्र सरकार की याचिका पर आदेश दिए जाने से पहले याचिकाकर्ता नवेंन्द्र कुमार को भी सुना जाए। इस आदेश के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो नामक तोते में जान आ गयी।

 गुवाहाटी उच्च न्यायलय की एक खंडपीठ ने उस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से केंद्रीय जांच ब्यूरो का गठन हुआ था और उसकी तमाम कार्रवाइयों को असंवैधानिक करार दिया।

न्यायमूर्ति आईए अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की खंडपीठ ने नवेन्द्र कुमार की ओर से दायर एक याचिका पर यह आदेश पारित किया, जिसमें  केंद्रीय जांच ब्यूरो का गठन का आधार बने प्रस्ताव पर हाईकोर्ट की एकल पीठ के 2007 के आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा था, इसलिए हम 1963 के प्रस्ताव को रद्द करते हैं जिसके जरिए केंद्रीय जांच ब्यूरो का गठन किया गया था..हम यह भी फैसला देते हैं कि केंद्रीय जांच ब्यूरो
न तो दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) का कोई हिस्सा है और न उसका अंग है और सीबीआई को 1946 के डीएसपीई अधिनियम के तहत गठित पुलिस बल के तौर पर नहीं लिया जा सकता। पीठ ने कहा था कि मामला दर्ज करने, किसी व्यक्ति को अपराधी के रूप में गिरफ्तार करने, जांच करने, जब्ती करने, आरोपी पर मुकदमा चलाने आदि की केंद्रीय जांच ब्यूरो की गतिविधियां संविधान के अनुच्छेद 21 को आघात पहुंचाती हैं और इसलिए इसे असंवैधानिक मानकर रद्द किया जाता है। गुवाहाटी उच्च न्यायलय ने यह भी कहा था कि गृह मंत्रालय का उपरोक्त प्रस्ताव न तो केंद्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही इन शासकीय निर्देशों को राष्ट्रपति ने अपनी मंजूरी दी थी। अदालत ने कहा कि इसलिए संबंधित प्रस्ताव को अधिक से अधिक एक विभागीय निर्देश के रूप में लिया जा सकता है जिसे कानून नहीं कहा जा सकता। बहरहाल, गुवाहाटी उच्च न्यायलय ने कहा था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो अदालत में लंबित कार्यवाही पर आगे जांच करने के लिए पुलिस पर कोई रोक नहीं है। केंद्रीय जांच ब्यूरो का गठन किए जाने पर अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी का गठन कुछ स्थितियों से निपटने के लिए तदर्थ उपाय के रूप में किया गया था। 
दिल्ली उच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश आरएस. सोढ़ी ने कहा था कि यह चौकाने वाली बात है कि बिना किसी अधिसूचना के सीबीआई जैसी एजेंसी चल रही है। अगर अधिसूचना नहीं है तो सीबीआई की वैधता ही नहीं है। इस फैसले के बाद तो मानो सीबीआई का वजूद ही खत्म हो गया है। 
उच्च न्यायलय ने अपने फ़ैसले में कहा था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो के गठन के लिए "गृह मंत्रालय का प्रस्ताव न तो केंद्रीय मंत्रिमंडल का फ़ैसला था और न इन कार्यकारी निर्देशों को राष्ट्रपति ने अपनी मंज़ूरी दी थी."
उच्च न्यायलय ने आगे कहा था, "संबंधित प्रस्ताव को अधिक से अधिक एक विभागीय निर्देश के रूप में लिया जा सकता है, जिसे क़ानून नहीं कहा जा सकता."
उच्च न्यायलय ने अपने आदेश में आगे कहा, "मामला दर्ज करने, किसी व्यक्ति को अपराधी के रूप में ग़िरफ़्तार करने, जांच करने, ज़ब्ती करने, संदिग्धे पर मुक़दमा चलाने जैसी केंद्रीय जांच ब्यूरो की गतिविधियां संविधान के अनुच्छेद-21 को आघात पहुंचाती हैं और इसलिए उसे असंवैधानिक मानकर रद्द किया जाता है। "

सुमन 


3 टिप्‍पणियां:

shalini kaushik ने कहा…

nice information .thanks

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (10-11-2013) को सत्यमेव जयते’" (चर्चामंच : चर्चा अंक : 1425) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अजय कुमार झा ने कहा…

इन दिनों न्यायपालिका अपने आदेशों से जिस तरह से मुखर होती जा रही है वो अपने आप में ही बहुत कुछ ईशारा कर रहा है ..विचारणीय प्रश्नों के साथ सामयिक पोस्ट सुमन जी