मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

मुज़़फ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा - भाग-10

साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल
मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के कस्बों और गाँवों में जब साम्प्रदायिकता का तांडव चल रहा था और चारो ओर हाहाकार और कोहराम मच रहा था। वहीं कुछ ऐसे गाँव भी हैं जहाँ पर हिन्दूमुस्लिम-जाट ने अपने गाँवों में हिंसा न होने देने के लिए पंचायतें कीं। इन गाँवों में से घासीपुरा, हरसौली और निरमानी गाँव का हमने दौरा किया।
सबसे पहले हम निरमानी गाँव पहुँचे 6000 की आबादी वाले इस गाँव में 2000 से ज़्यादा मुसलमान हैं। जिनमें अधिकतर मुस्लिमजाट हैं। हमारी मुलाकात पूर्व सरपंच और पूर्व प्रधान एनुद्दीन से हुईं। उस समय उनकी बैठक पर दोनों समुदायों के 50 लोग बैठे थे। उन्होंने हमें बताया कि, ’’इस गाँव से न तो कोई पलायन हुआ और न ही हिंसा। हाल की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए उनका गला भर आया, उन्होंने बताया कि सच कहूँ तो 7 तारीख़ के झगड़े के बाद मुँह तक खाना नहीं गया। कई दिन रोते रहे, दुःख इस बात का है जाटमुस्लिम भाईचारा क्यों टूटा? हमें साज़िश करके लड़या गया है। शासनप्रशासन की भूमिका और भाजपा की चाल को नई पी़ी समझ नहीं रही है। महापंचायत को उनके हवाले कर दिया गया। उन्होंने कहा, कि हमें किसी से कोई शिकवा नही हमारे जाट भाइयों में क्यों बिगाड़ आया?’’
बु़ाना मार्ग पर ही थोड़ा सा आगे हरसौली गाँव में बलियान खाप के थांबेदार चौधरी तपे सिंह की चौपाल पर हिन्दूमुस्लिम एकत्र थे। क़रीब 15000 आबादी वाले इस गाँव में उनकी संख्या करीब आधीआधी है। यहाँ पर हिन्दू जाट भी हैं ओर मुस्लिम जाट भी हैं। तपे सिंह कहते हैं इस गाँव में हम लोग (जाटमुले जाट) एक दादा की औलाद हैं। दादी दो थीं एक के हम हैं और एक के वे। सन 1947 में भी हमने महापंचायत करके तय कर लिया था कि बाहरी लोगों से ख़ुद निपट लेंगे। इस बार भी पंचायत कर तय कर लिया था कि न फ़साद करेंगे न पलायन होने देंगे। नाम गिनाते हुए कहते हैं कि हमारे दूसरे गाँवों में कहीं झगड़े नहीं हुए। सिफ़र पुरबालियान में फ़साद हुआ। वह हमारा  आधा गाँव है। अब कोशिश करेंगे कि जहाँ झगड़े हुए हैं वहाँ कमेटियाँ बना कर दिलों की दूरियाँ कम की जाएँ।
साम्प्रदायिक एकता की मिसाल गाँव ॔घासीपुरा’
मेरठ की ओर क़रीब 11 किमी. चलने के बाद घासीपुरा भी मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले का ही एक गाँव है। इस गाँव ने भी साम्प्रदायिकता की आग को अपनी सरहदों तक नहीं आने दिया। वहाँ पहुँचने पर हमने देखा कि यहाँ हिन्दू मुसलमानों को ाढ़स  बँधा रहे थे। सबसे पहले हमारी बात गाँव के बुजुर्ग 62 वर्षीय नेत्रपाल से हुई, उन्होंने कहा, घासीपुरा गाँव में कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि यहाँ के बच्चे अब भी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं। नेत्रपाल की बात में दम था।
एक और युवा प्रवीण सिंह ने नेत्रपाल की बात की तस्दीक की, उसने भी बताया कि गाँव के लोगों के मिलनसार होने की वजह यह है कि सभी बुज़ुर्गों की बात मानते हैं।
पास खड़े 49 वर्षीय अफ़ज़ाल ने बताया ’’मैं बचपन से इस गाँव में रह रहा हूँ। यहाँ के लोगों में मोहब्बत है। यही वजह है कि यहाँ से मात्र चारपाँच कि.मी. दूर पुरबालियान में फ़ायरिंग हुई, लेकिन हमें फिर भी कोई डर नहीं है। हमें अपने गाँव के लोगों की मोहब्बत पर पूरा भरोसा है।’’
हिंसा का शिकार हुआ मन्सूरपुर भी घासीपुरा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ मौजूद लोगों के चेहरे देखकर यह कहना मुश्किल है कौन हिन्दू है? कौन मुसलमान? घासीपुरा, निरमानी और हरसौली मुजफ़्फ़नगर के शायद अकेले ऐसे गाँव नहीं हैं जहाँ गाँव वाले नफ़रत से आपस में नहीं लड़ रहे हैं। हो सकता है ऐसे और भी गाँव हों। देखना यह है कि अफ़वाहों और नफ़रत के इस जंग में प्रशासन इनका साथ दे पाता है या नहीं।
-डा0 मोहम्मद आरिफ




क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

देवदत्त प्रसून ने कहा…

मित्र! आज 'क्रिसमस-दिवस' पर शुभ कामनाएं,! सब को सेंटा क्लाज सी उदारता दे और ईसा मसीह सी 'प्रेम-शक्ति'!
'सम्प्रदाय-वाद' देश का बदनुमा दाग है जो छिप कर मानवता का रक्त पी रहा है चिल्लर की तरह !!!