शनिवार, 28 दिसंबर 2013

मुज़़फ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा - अन्तिम भाग


निष्कर्ष
    उ0प्र0 सरकार ने साम्प्रदायिक तत्वों की मिली भगत से योजनाबद्ध ढंग से दंगे में दंगाइयों को खुली छूट दे रखी थी।  इस पूरे दंगे में तबाही, जानी नुकसान, लूट-पाट और इज़्ज़त के साथ जो खिलवाड़ किया गया उसका पुरा परिदृष्य गुजरात दंगों से लिया गया था। इस पर गुप्त सूत्रों का कहना है कि साम्प्रदायिक तत्वों ने पूरे भारत को गुजरात बनाने का अमल शुरू कर दिया है।
    30 अगस्त को कवाल में हुई घटना को लेकर अल्पसख्ंयक समुदाय के लोगों ने जि़ला मुजफ्फरनगर में जुमा की नमाज़ के बाद प्रदर्षन किया। जिसमें कादिर राना ;M.L.A. ,B.S.P. राशिद सिद्दीकी ,S.P.  मुरसलीन M.L.A. ,B.S.P.   शाहिदुल आज़म ;Former Minister,  Congress Party और मौलाना नज़ीर ने भड़काऊ भाषण दिए।                 बहुसंख्यक समुदाय की ओर से 31 अगस्त, 5 सितम्बर और 7 सितम्बर 2013 को आर0एस0एस0 और भाजपा के गठजोड़ में तीन महापंचायतें आयोजित की र्गइं। 5 सितम्बर की महापंचायत गाँव लिसाढ़ मंे हुई, जिसका नेतृत्व विनोद प्रमुख, बाबा हरिकिशन, बाबा सीताराम ;V.HP.  और संघ के कार्यकर्ता विजेन्द्र (सचिन और गौरव का सम्बन्धी) ने किया। इस महापंचायत में 7 सितम्बर को होने वाली महापंचायत की घोषणा की गई और बहुसंख्यक समुदाय के लोगों से महापंचायत में हथियार लेकर आने के लिए कहा गया। 
                                   सभी लोग महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान के द्वारा भड़काए गए। महाराज सिंह और बिल्लू प्रधान भाजपा के स्थानीय नेता हुकम सिंह के सहयोगी हैं। दंगा भड़काने में हुकम सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं के एक अन्य सहयोगी ब्रह्मपाल के घर में बहुत अधिक मात्रा में हथियार छुपाए गए। बिल्लू प्रधान और महाराज सिंह द्वारा दंगाइयों को हथियार बाँटे गए।
                                      बाबा हरिकिशन ने गाँव लिसाढ़ के बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को मुसलमानों के खिलाफ़ साम्प्रदायिक ंिहंसा भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने महापंचायत आयोजित की और मुसलमानों को मारने के लिए बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को उकसाया।
                                       सभी जानते हैं कि अगले साल 2014 मे देश में संसदीय चुनाव है। इन्हीं चुनावों की तैयारी के सिलसिले में पिछले दो साल में देश की 1150 से भी ज़्यादा जगहों पर दंगे कराए जा चुके हैं। जिसमें 100 से अधिक जगहों पर दंगे उ0प्र0 में हुए। हम पिछले कई चुनाव से देख रहे हैं कि हर चुनाव से पहले कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर जनता के बीच फूट के बीज बो दिए जाते हैं। इस माहौल में सबसे बड़ा नुकसान एतबार और विष्वास का हुआ है। एक ही छत के नीचे एक ही हुक्का गुड़गुड़ाने वाले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो जाएँगे तो समाज कैसे बचेगा। राजनैतिक लोग वोट बैंक के लिए ऐसा करवा रहे हैं। इस साम्प्रदायिक आग को बुझाने के लिए कोई भी राजनैतिक दल आगे नहीं आया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दगंा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के दौरान शरणार्थी शिविरों में दंगा पीडि़तों से मुलाकात करके कुसूरवारों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही और दंगे के समय बर्बाद हुए मकान और दुकानांे के पुनर्वास का विष्वास दिलाया। परन्तु लोगों में ग़म और ग़ुस्सा, भय और दहशत अभी भी बरकरार है। काँधला में लोगों ने मुख्यमंत्री को काले झण्डे भी दिखाए। दंगा पीडि़तांे से ऐसे ही वादे  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी किए। अब नेताओं को वोट बैंक खिसकता नज़र आ रहा है तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। परन्तु अभी भी दंगा पीडि़तो को न तो केन्द्र सरकार और न ही उ0प्र0 सरकार की ओर से कोई सहायता मिली है। इससे इन्सानियत शर्मसार हो रही है। गाँव के क्षेत्रों में पहुँची राजनीति ने शहरों की आग को भी गाँवों में पहुँचा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से साबित होता है कि मुलायम सिंह ने एक बार फिर मुसलमानों के साथ विष्वासघात किया है। 
                                        मुज़फ्फरनगर और शामली में जो कुछ हुआ वह उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब के मुताबिक बिल्कुल नहीं है। इन परिस्थितियों में आम जनता को ही भूखे पेट सोना पड़ रहा है। ऐसे में बैठकर सफे़द पोश सुखि़र््ायाँ देख रहे हैं जबकि दंगे की चपेट में आए घरों में मातमी सन्नाटा छाया है। साम्प्रदायिकता के ज़हर में जितनी मुसीबत हिन्दू झेल रहे हैं उतना ही नुकसान मुसलमान उठा रहे हैं। अहम सवाल यह भी है कि आखि़र इन्सानियत की डोर कहाँ पर और किस तरह कमज़ोर पड़ी है कि 5 प्रतिषत दंगाई 95 प्रतिशत शांतिप्रिय लोगों पर हावी हैं। सँभलने, सोचने के लिए अभी मौक़ा और वक्त दोनों है। बाँटती राजनीति से मोर्चा लेकर शांति पसंद नागरिकों को एकजुटता का आईना दिखाना होगा।
                                            दंगे में लाशो  के ढेर लग गए। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने लाशो को खुले में सड़ने के लिए छोड़ दिया। चील कौए शवों पर मंडराते रहे और उन्हें नोचते रहे। लोग यह दृष्य देखकर आहत हुए। न जाने कितने लाचार लोग कड़वी सच्चाई से इस समय दो चार हैं। घरों में क़ैद हैं या घरों को छोड़कर जा चुके हैं। व्यापार ठप्प हैं। घरों में खाने पीने का सामान नहीं, बच्चे दूध को तरस रहे हैं। पढ़़ाई का नुकसान है। लेंकिन फ़ायदा किसे है? एकांत में सेाचोगे तो सिर्फ वही चेहरे दिखेंगे जो लोगों को इन्सान नहीं वोट समझते हैं।
    उत्पात से प्रभावित गाँवों में बेसिक शिक्षा की रीढ़ टूट गई। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में दलित और मुस्लिम समाज के बच्चे ही पढ़ते हैं। हिंसा की घटनाओं के बाद लगभग 200 परिषदीय स्कूल ऐसे हैं जहाँ ताला लटका हुआ है। डर के मारे शिक्षक और बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं।
                                            जिस घटना (लड़की के साथ छेड़छाड़ और उसके बाद शाहनवाज़, सचिन और गौरव की मौत) को मीडिया दंगों की असल वजह बना कर पेश कर रही है वह दरअसल है नहीं। शाहनवाज़ और दूसरे दो लड़कांे की मौत के बारे में जो एफ़.आई.आर. दर्ज कराई गई उसमें कहीं भी लड़की छेड़ने तक का जि़क्र नहीं है। एक मामूली घटना को साम्प्रदायिक दंगे का रूप दिया गया, दो वर्ष पहले के दगों के एक वीडियो को भाजपा के परम्परागत समर्थकों द्वारा सोशल नेटवर्किंग और मोबाइल फ़ोन के ज़रिए, सचिन और गौरव की हत्या का वीडियो बताकर लोगों को दिखाया गया। इस वीडियों को सबसे पहले संगीत सिंह सोम ने सोशल नेटवर्क के  माध्यम से जारी किया। इस वीडियों ने बहुसंख्यक समुदाय के लोगों के दिलों में बदले की भावना को उकसाया।
                                               मुज़फ़्फ़रनगर में अभी स्थिति नियन्त्रित भी नहीं हो पाई है और अधिकतर दंगा पीडि़त शरणार्थी कैम्पों से घर नहीं लौट पाए हैं, लेकिन छिट-पुट हिंसा अभी भी जारी है। 10 अक्टूबर देर रात को मुज़फ़्फ़रनगर में 2 लोगों की हत्या से स्थिति फिर तनावपूर्ण हो गई। मुज़फ़्फ़रनगर में मोटरसाइकिल सवार युवको ने सैलून के मालिक गाँव गढ़ी निवासी 28 वर्षीय आबिद की गोली मारकर हत्या कर दी, तो वहीं मेरठ के लावड गाँव के पास जमालपुर रोड पर बदमाशों ने एक कारपेन्टर मोहसिन और उसके भाई शौकीन पर चाकुओं से हमला किया। जिसमें मोहसिन की मौके पर ही मृत्यु हो गई। इसके बाद 4 नवम्बर 2013 को बुढ़ाना मार्ग पर हुसैनपुर गाँव में एक खेत मंे अल्पसंख्यक समुदाय के 3 युवकों को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने कत्ल कर दिया और गाँव फ़ुगाना के जोगियाखेड़ा के राहत शिविर मंे रह रही युवती के साथ बहुसंख्यक समुदाय के 2 युवकांे ने खेत मे खींचकर सामूहिक रुप से बलात्कार किया।
                                                सुप्रीम कोर्ट में मुज़फ्फ़रनगर ’सांम्प्रदायिक हिंसा’ मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश वकील राजीव धवन और रवि प्रकाश मेहरोत्रा ने बृहस्पतिवार 17 सितम्बर 2013 को अपनी रिपोर्ट पेश की। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, मेरठ, बाग़पत और सहारनपुर मंे कुल 128 मामले दर्ज हुए हैं। इसमें 11 हिन्दू घायल और 57 मुसलमान, जबकि 16 हिन्दुओं की और 46 मुसलमानों की मौत हुई। इसी तरह दर्ज मामलों में अभियुक्तों का विवरण भी हिन्दू व मुसलमान के आधार पर दिया गया। राज्य सरकार ने बताया कि इन 5 जि़लों मे कुल 876 लोग अभियुक्त हैं जिनमे से अभी तक 243 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 12 लोगों पर रासुका लगाई गई है, और 16,112 लोगों के खिलाफ ़प्रिवंटिव एक्शन  लिया गया है। इसके अलावा 5,708 लोगों से अच्छे आचरण का बंधपत्र लिया गया है। सरकार ने बताया कि कुल 128 एफ.आई.आर. दर्ज की गई। गत् 13 अक्टूबर तक राहत शिविरों में भी 325 एफ.आई.आर. औरशिकायतें दर्ज कराई गईं। जबकि सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए तथ्य सर्वेक्षण के अनुसार साम्प्रदायिक हिंसा में घायल और मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है। सरकारी तंत्र निष्क्रिय रहा। 27 तारीख़़ के दंगों से पूर्व ही उ0प्र0 के मुख्य सचिव ने राज्य सरकार को सर्तकता बरतने हेतु आदेश दे दिए थे।                                    
                                            यही नहीं केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी सरकार को आगाह किया था। लेकिन उ0प्र0 सरकार ने इन गुप्त सूचनाओं के बावजूद भी कोई सर्तकता नहीं बरती और पष्चिमी उ0प्र0 के मुज़फ़्फ़रनगर और उसके आस-पास के जि़लों को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया। साम्प्रदायिक दंगे और उनके बाद बने माहौल का राज्य का हर राजनैतिक दल अपने तरीके से फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। दंगा पीडि़त अपने मृतकांे की और लापता लोगों की तलाश में व्यस्त हैं। गिनती राजनैतिक दल भी कर रहे हैं पर हिंसा से प्रभावित लोगों की नहीं, ’वोटों’ की। कितने वोट किसके खाते में आए और विरोधी के खाते में कितने वोट गए इसका हिसाब-किताब चल रहा है। यदि इन साम्प्रदायिक ताक़तों को न रोका गया तो उ0प्र0 ही नहीं बल्कि पूरा भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस जाएगा। दंगों की न्यायिक जाँच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ़ सख्त से सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।
-डा0 मोहम्मद आरिफ  (चेयरमेन)
सेन्टर फ़ाॅर हारमोनी एण्ड पीस एवं (संयोजक)
आल इंडिया सेक्यूलर फोरम (उ0प्र0)
मो0-9415270416
तथ्य सर्वेक्षण टीम के सदस्य-
1. शाहीन अन्सारी (सहारनपुर)
2. अब्दुल्लाह (सहारनपुर)
3. शाहनवाज़ बदर (देवबन्द, सहारनपुर)
4. सुरेश  कुमार ’अकेला’ (वाराणसी)

लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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