मंगलवार, 21 जनवरी 2014

सांप्रदायिक हिंसा 2013 -भाग-2

किश्तवार, जम्मू एवं कश्मीर
9 अगस्त को ईद-उल-फित्र की नमाज के बाद अचानक पत्थरबाजी शूरू हो गई। नमाज के बाद बाहर निकल रहे लोगों का सामना अफजल गुरू और मकबूल भट्ट को फांसी दिए जाने से संबंधित भड़काऊ पोस्टरों से हुआ। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि मस्जिद से निकल रहे लोग, भारत-विरोधी नारे लगा रहे थे जिसके कारण पत्थरबाजी हुई। यह बात अधिक विश्वसनीय नहीं लगती क्योंकि जम्मू में रहने वाले मुसलमानों का कश्मीरी राष्ट्रवादियों की स्व-निर्णय की मांग से बहुत लेनादेना नहीं है। बाद में भड़के दंगों में हिदयाल गांव में तीन व्यक्ति मारे गए और 80 घायल हुए। मृतकों में 23 साल का अरविंद कुमार भगत शामिल था, जो गोली लगने से मारा गया। हिन्दुओं का कहना है कि उसे किसी व्यक्ति ने गोली मारी जबकि मुसलमान कहते हैं कि वह पुलिस की गोली से मारा गया। बशर अहमद मोची पर भीड़ ने हमला किया और बाद में उसे जिंदा जला दिया। जम्मू क्षेत्र के आठ जिलों में कफ्र्यू लगाया गया। किश्तवार में मुसलमानों और हिन्दुओं की आबादी का नाजुक संतुलन है। हिन्दू, आबादी का 45 प्रतिशत हैं और मुसलमान 55। गृह राज्य मंत्री सज्जाद किचलू, जो किश्तवार के रहने वाले हैं, का दावा है कि दंगों की तैयारी पिछले कम से कम एक महीने से जारी थी और हथियारबंद समूह अल्पसंख्यकों पर हमला करने की योजना बना रहे थे। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिंदबरम ने संसद मंे दिए गए अपने एक वक्तव्य में सांप्रदायिकता की आग भड़काने के लिए बजरंग दल को दोषी ठहराया।
किश्तवार में हुई सांप्रदायिक हिंसा के पीछे अलगाववादी राजनीति नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति थी। यही कारण है कि एक छोटा सा झगड़ा बहुत जल्दी दंगे में बदल गया। भाजपा ने इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनीतिकरण करने के लिए अरूण जेटली को किष्तवार भेजा। जम्मू कश्मीर में ऐसी सैंकड़ों घटनाएं हुईं हैं जिनमें लोग मारे गए और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया परंतु कोई भाजपा नेता वहां नहीं गया। भाजपा ने किश्तवार के दंगा पीडि़तों के लिए मुआवजे की राशि  बढ़ाने की मांग भी की। ऐसी मांग उसने पहले कभी नहीं की थी। किश्तवार दोनों समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए जाना जाता था।
ऊत्तर प्रदेश
रमजान के महीने में मेरठ में सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर भगवा ब्रिगेड ने आपत्ति उठाई। इससे दोनों समुदायों में तनाव बढ़ा परंतु पुलिस की तैनाती कर इस तनाव को हिंसा में नहीं बदलने दिया गया।
मेरठ जिले के नंगलामल गांव में एक मस्जिद के नजदीक स्थित मंदिर के बाहर लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर भड़की हिंसा में 26 जुलाई को एक व्यक्ति मारा गया और एक दर्जन घायल हो गए। दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने हस्तक्षेप किया और मामले को शांतिपूर्ण ढंग से निपटा दिया। इसके बाद, एक इफ्तार पार्टी के दौरान श राब के नशे  में चूर कुछ लोगों द्वारा बदतमीजी किए जाने पर हिंसा भड़क उठी। हिंसा के दौरान गोलियां चलाई गईं और पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। सुनील नामक एक युवक गोली से मारा गया और शाहिद को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। गांव के मुस्लिम रहवासियों का आरोप है कि पुलिस ने उनके घरों में घुसकर फर्नीचर और अन्य घरेलू सामान को नुकसान पहुंचाया और लोगों को पीटा (संडे एक्सप्रेस 28.07.2013)।
उत्तरप्रदेश  में सांप्रदायिक हिंसा की अधिकांश  घटनाएं सितंबर 7 और 8 को हुईं। अगस्त की 27 तारीख से लेकर 16 सितंबर के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 128 घटनाएं हुईं। लगभग 50,000 लोग घर से बेघर हो गए और मुजफ्फरनगर में अमानवीय परिस्थितियों में राहत शिविरों में रह रहे हैं। सरकार ने उनके प्रति जुबानी सहानुभूति तो दिखलाई परंतु राहत शिविरों के हालात बेहतर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। कड़ाके की सर्दी और कंबलों की कमी के कारण राहत शिविरों में 40 बच्चे मौत के शिकार हो गए (इंडियन एक्सप्रेस दिनांक  3.12.2013)। मुजफ्फरनगर दंगों में 6 अक्टूबर तक 46 मुसलमान और 16 हिन्दू मारे जा चुके थे जबकि 57 मुसलमान और 11 हिन्दू घायल हुए थे। ये आधिकारिक आंकड़े हैं। अक्टूबर की 13 तारीख तक 352 एफ.आई.आर. दर्ज की गईं थीं जिनमें 5 जिलों- मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत व सहारानपुर- में हुई साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में 1068 व्यक्तियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे। कुल मिलाकर 243 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से अधिकांश  हिन्दू थे। अब भी करीब 17 हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। मेरठ जिले के भाजपा विधायक संगीत सोम को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया परंतु उन्हें सलाहकार परिषद के आदेश  पर जल्दी ही रिहा कर दिया गया। इसका कारण यह था कि उनके खिलाफ मामला मजबूत नहीं था। ऐसा मिलीभगत के चलते हुआ या लापरवाही से, यह कहना मुष्किल है। भाजपा ने अपने
विधायकों और अन्य आरोपियों के जमानत पर रिहा होने के बाद उनका सार्वजनिक सम्मान किया।
मुजफ्फरनगर दंगों में पुलिस की भूमिका घोर लापरवाही की रही। पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण हालात और बिगड़े। पुलिस महानिदेशक ने यह स्वीकार किया कि पुलिस ने अपेक्षित  भूमिका नहीं निभाई (टाईम्स आॅफ इंडिया दिनांक 25/09/2013)। पुलिस उस समय हस्तक्षेप कर सकती थी जब ‘लव जेहाद‘ के नाम पर मुस्लिम समुदाय को बदनाम किया जा रहा था परन्तु पुलिस ने कुछ नहीं किया। सचिन और गौरव की हत्या के मामले में पुलिस ने कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया परंतु स्टिंग आपरेशनों से यह पता चला है कि आजम खान के दबाव में उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बाद, निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद मुसलमानों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें बसपा व सपा के सांसद मौजूद थे। जिले के एसपी ने स्वयं इस गैरकानूनी सभा के नुमांइदों से ज्ञापन स्वीकार किया। तत्पश्चात भाजपा ने जाटों की महापंचायत आयोजित करने का फैसला किया। इसमें भाग लेने के लिए हजारों हथियारबंद जाट पहुंचे और उन्होंने रास्ते में कई मुसलमानों का अपहरण कर लिया। हथियारों से लैस ये लोग कई पुलिस चौकियों व नाकों से गुजरे परंतु उन्हें किसी ने नहीं रोका। सभा के आयोजन पर लगे प्रतिबंध का पालन करवाने की कोई कोशिश  नहीं की गई जबकि यह स्पष्ट था कि सभा में भाग लेने जा रहे हथियारबंद लोग गुस्से से भरे हुए थे। महापंचायत में भड़काऊ भाषण दिए गए और इसके बाद दंगे शुरू हो गए। सभा से लौट रहे लोगों ने मुस्लिम गांवों पर हमला किया। कुछ अपवादों को छोड़कर, पुलिस उन स्थानों पर नहीं पहुंची जहां से हिंसा की खबरें आ रही थीं।
मुसलमानों ने ट्रेक्टर से अपने गांव लौट रहे जाटों को रोका और उन्हें गन्ने के एक खेत में ले जाकर मौत के घाट उतार दिया। जिन गांवों में मुसलमान बहुसंख्या में थे वहां हिन्दुओं पर हमले हुए। खराद गांव के सरपंच ने 150 मुसलमानों को अपने घर में शरण देकर उनकी जान बचाई।
कुछ दंगा पीडि़तों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा गया कि अगर वे यह शपथपत्र दे दें कि वे अपने गांव नहीं लौटेंगे तो उन्हें 5 लाख रूपये का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार ने इस आशय की अधिसूचना भी जारी की। यह एक अभूतपूर्व कदम था। भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को देश में कहीं भी बसने का अधिकार देता है और कार्यपालिका को कतई यह हक नहीं है कि वह नागरिकांे से उनके गांव में रहने का हक ‘खरीद‘ ले। सरकार ने दंगाईयों के अधूरे काम को पूरा करते हुए पीडि़तों को उनके गांवों से बाहर कर दिया। उनसे इस आशय के शपथपत्र हासिल कर लिए गए कि वे अपने गांव वापिस लौटना नहीं चाहते। अगर किसी को भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मिलीभगत का प्रमाण चाहिए तो वह यह है।
समाजवादी पार्टी और भाजपा, दोनों को इन दंगों में अपना फायदा नजर आ रहा था। परंतु हिंसा इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लेगी,  इसका समाजवादी पार्टी को अंदाजा नहीं था और अब इस पार्टी को इन दंगों से नुकसान ही होगा। मुसलमान अब समाजवादी पार्टी से दूर हो रहे हैं। पष्चिमी उत्तरप्रदेष और विशेषकर दंगा प्रभावित जिले, अजीत सिंह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय लोकदल के गढ़ हैं। चरण सिंह ने इस इलाके के मुसलमानों और जाटों में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। साम्प्रदायिक धु्रवीकरण से अजीत सिंह की पार्टी को नुकसान होगा क्योंकि जाट मत भाजपा की ओर चले जाएंगे। समाजवादी पार्टी को यह उम्मीद थी कि मुसलमानों को कुछ मुआवजा देकर वह उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत कर लेगी। इस तरह इन दंगों से भाजपा और सपा दोनों को यह आशा  थी कि वे  अजीत सिंह की पार्टी की कीमत पर अपना आधार बढ़ा लंेगीं। लाशों पर इस तरह के राजनैतिक खेल खेले जाना दुर्भाग्यपूर्ण किंतु कटु सत्य है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार 84 कोसी परिक्रमा को रोक सकती थी तब वह जाट महापंचायत को भी रोक सकती थी। ऐसा न करके उसने आपराधिक लापरवाही की है। मुजफ्फरनगर दंगों के लिए भाजपा के साथ-साथ सपा भी जिम्मेदार है।  
मध्यप्रदेश
इंदौर के चंदननगर थाना क्षेत्र में 20 अगस्त को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान हुई पत्थरबाजी में 30 पुलिसकर्मियों सहित 45 लोग घायल हो गए। झगड़े की शुरूआत एक क्रिकेट मैच के नतीजे और एक मंदिर के पास किसी जानवर का शव पाए जाने के साथ हुई। संघ परिवार से जुड़े लोगों ने भड़काऊ नारेबाजी की। दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया और करीब 100 वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। दो पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए।
हरदा जिल के छीपाबड़ में 19 सितंबर को हुई साम्प्रदायिक हिंसा में कई घरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया और 22 लोग घायल हुए। हिंसा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि इससे पीडि़तों, विषेषकर महिलाओं और बच्चों को गहरा सदमा लगा और वे अब तक उससे उबर नहीं सके हैं। बजरंग दल के गुुंडों ने मुसलमानों के घरों को आग के हवाले कर दिया और यहां तक कि घरों में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा। घरों में आग लगाने के लिए नजदीक के एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल लाया गया। लगभग 60-70 बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हिंसक भीड़ एक स्कूल में पहुंची और यह मांग की कि मुसलमान बच्चों को उसके हवाले कर दिया जाए। परंतु स्कूल के शिक्षकों ने मुस्लिम बच्चों को पहले ही एक कमरे में बंद कर दिया था और उन्होंने भीड़ से कहा कि बच्चे अपने घर चले गए हैं। एल. एस. हरदेनिया के नेतृत्व में दंगों की जांच करने गए एक दल ने सुरेन्द्र राजपुरोहित उर्फ टाईगर की गिरफ्तारी की मांग की जिसकी कथित रूप से हिंसा भड़काने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। जांचदल ने यह मांग भी की कि हिंसा में एक स्थानीय भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री के पुत्र की भूमिका की जांच की जाए और सभी दोषियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाएं।
बिहार
राज्य के बेतिया में 9 अगस्त को नागपंचमी के जुलूस के दौरान हिंसा हुई। पत्थर फेंके गए और जिला मजिस्ट्रेट और एसपी के वाहनों को जला दिया गया। जिले में कफ्र्यू लगाना पड़ा। नागपंचमी के धार्मिक जुलूस में शामिल लोग बिहार के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यह जदयू के एनडीए से अलग हो जाने का नतीजा था। महावीर अखाड़े के लठैत जुलूस मंे आगे चल रहे थे और उनके हाथों में तख्तियां थीं जिनपर राजनैतिक   नारे लिखे हुए थे।
नवादा में दो समुदायों की हिंसक भीड़ के बीच लगभग 48 घंटे तक खूनी संघर्ष चला, जिसमें 2 लोग मारे गए। हिंसा की शुरूआत 10 अगस्त को हुई जब कुछ मुस्लिम युवकों ने नवादा शहर के बाहरी हिस्से में स्थित ‘बाबा का ढाबा‘ में बुर्का पहने हुए कुछ मुस्लिम लड़कियों की उपस्थिति पर आपत्ति की। इस ढाबे का मालिक एक हिन्दू था। युवकों ने ढाबे पर हमला किया और वहां तोड़फोड़ की। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई जिसमें कई लोग घायल हो गए। मुसलमानों की कई दुकानें जला दी गईं। जब पुलिस स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी तब बहुसंख्यक वर्ग के एक युवक ने एक पुलिसकर्मी की बंदूक छीननेे की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने गोलीचालन किया जिसमें वह युवक मारा किया। जुलाई में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा था। तबसे लेकर 9 अगस्त तक बिहार में 6 दंगे हुए।
कर्नाटक
चिकमंगलूर में 28 दिसंबर को भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में 31 लोग घायल हुए जिनमें दो पुलिसकर्मी शामिल हैं। दिनांक 1 जनवरी 2014 के ‘इंकलाब‘ अखबार के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने अल्पसंख्यकों के साथ अत्यंत क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। महात्मा गांधी रोड पर स्थित एक पूजास्थल केे पास एक जानवर का कटा हुआ सिर पाया गया। इसका विरोध करने लोग सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। टीपूनगर के 61 वर्षीय साहब जान को पुलिस ने सड़क पर घसीट-घसीटकर पीटा। यह तब हुआ जब साहब जान मृत जानवर के अवशेशों  को हटाकर उस स्थान को पानी से धो रहा था।
असम
कछार जिले के रंगपुर में 25 अगस्त को तीन मंदिरों के पास मांस के टुकड़े पाए गए। इसके बाद हुई हिंसा मंे सात पुलिसकर्मी घायल हो गए और शांति स्थापित करने के लिए सेना की तैनाती करनी पड़ी। मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने दंगों के लिए विहिप और भाजपा को जिम्मेदार बताया। कई दुकानें और वाहन जला दिए गए।
निष्कर्ष
हमारे देश में दंगे भड़काने के लिए कोई कारण छोटा नहीं होता। किसी मुसलमान द्वारा गाय को मार कर भगाना, मंदिरों / मस्जिदों के पास मांस के टुकड़े मिलना, महिलाओं के साथ छेड़छाड़, अंतःधार्मिक विवाह/प्रेम संबंध, लाउडस्पीकरों का उपयोग, रेस्टोरेंट के बिल पर विवाद, धार्मिक लबादे में राजनैतिक जुलूस आदि कुछ ऐसे मसले हैं जो गुजरे साल, दंगों का कारण बने। पुलिस द्वारा समय पर कार्यवाही न करने या कबजब उसकी दंगाईयों से मिलीभगत से असामाजिक तत्वों का हौसला बढ़ता है और वे शनैः-शनैः ताकतवर होते जाते हैं और राजनीति में भी उतर जाते हैं। यद्यपि इस तरह की घटनाओं से संवेदनशीलता और कड़ाई से निपटने की जरूरत है तथापि असली चुनौती यह है कि हम साम्प्रदायिक सोच का जड़मूल से सफाया करने की कोषिष करें ताकि हममें से हरेक हमारे देश की विविधता का आनंद लेना सीख सके और अपने से अलग ढंग से आराधना करने वालों, अपने से अलग खानपान की आदत वालों, अपने से अलग कपड़े पहनने वालों और अपने से अलग तरीके से जीने वालों को अपना शत्रु मानना बंद करे। ‘दूसरे‘ के प्रति दुराग्रह ही वह सीमेंट है जो साम्प्रदायिक पहचान को मजबूती देता है। इसके स्थान पर हमें मानवता, प्रेम, न्याय और सबके प्रति सहानुभूति के भाव को बढ़ावा देना चाहिए जिससे अंतःधार्मिक रिश्ते मजबूत हों। एक ऐसे कानून की भी आवश्यकता है जो दंगे रोकने में राज्य तंत्र की विफलता की स्थिति में संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करे।

 -इरफान इंजीनियर



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