गुरुवार, 23 जनवरी 2014

संघ और गोलवलकर देश के संघात्मक ढाँचे के विरोधी थे

पिछले रविवार (12 जनवरी 2014) को गोवा में एक आमसभा को संबोधित करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया कि केन्द्र की वर्तमान सरकार हमारे देश के संघीय ढाँचे को कमजोर कर रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार, राज्य के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करती है। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जब वे सत्ता में आयेंगे तो देश के संघीय ढाँचे व संघीय संस्थाओं को और मजबूत करेंगे।

वैसे तो यह सभी को मालूम है कि नरेन्द्र मोदी का पॄने, लिखने से कोई ज्यादा संबंध नहीं है। इसके बावजूद, उनसे कम से कम यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं द्वारा लिखी किताबें पढ़ी  होंगी। मोदी प्रारंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री एम.एस. गोलवलकर ने संघ के उद्देश्यों व सिद्घांतों को स्थापित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। गोलवलकर एक उच्च कोटि के बुद्धिजीवी थे। उनके द्वारा निर्धारित सिद्घांत और नीतियां आज भी संघ की प्रेरणा का स्त्रोत हैं।

अभी कुछ दिन पहले गोलवलकर, जिन्हें संघ के स्वयंसेवक, गुरू जी कहते हैं, का 100वां जन्मदिन मनाया गया था। उस अवसर पर संघ ने अनेक पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। इसके पूर्व, उनके ही जीवनकाल में गुरू जी द्वारा दिए गए भाषणों और लेखों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह का नाम है 'बंच ऑफ थॉट्स’’। इस ग्रंथ में देश और विदेशों से संबंधित अनेक मुद्दों पर गूरू जी द्वारा प्रगट किए गए विचारों को संग्रहीत किया गया है।

इन्हीं में से एक मुद्दा है हमारे देश का संघीय ढाँचा। आजादी के बाद हमारे देश के नेताओं ने एक संविधान बनाया। उस संविधान का एक महत्वपूर्ण पहलू है देश का संघीय ढाँचा। हमारे संविधान निर्माता इस बात को जानते थे कि हमारे देश की सांस्कृतिक एवं भाषायी बहुलता को देखते हुए भारत को एक संघीय देश बनाना आवश्यक था। संविधान निर्माताओं ने केन्द्र और राज्यों के बीच विषयों का विभाजन किया है। कुछ विषय केन्द्र को सौंपे गए हैं और कुछ राज्यों को। उसके साथ, कुछ ऐसे विषय भी हैं जो समवर्ती सूची में शामिल किए गए हैं। हमारे देश की बहुलता को देखते हुए हमने एक संघीय ढाँचे   को स्वीकार किया।

आजादी के कुछ वर्षों बाद हमारे देश के शासकों ने यह महसूस किया कि राज्यों के गठन का कोई वैज्ञानिक आधार बनाया जाए। वह आधार क्या हो, इसको निर्धारित करने के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया। इसी आयोग ने राज्यों के निर्माण का आधार भाषा को बनाया और तदनुसार हमारे देश में भाषा आधारित अनेक राज्यों का गठन किया गया।

यहां यह उल्लेखनीय है कि गुरू जी देश के संघीय ढाँचे के विरोधी थे। उनका कहना था कि संघीय ढाँचे के कारण देश में पृथकता की भावना पैदा होती है। संघीयढाँचे के कारण देश की एकता की भावना कमजोर होती है। यदि देश एक है, इस भावना को मजबूत करना है तो, गुरू जी का कहना था कि वर्तमान संघीयढाँचे को कब्र में गाड़ देना चाहिए। उनका कहना था कि राज्यों को समाप्त करके एक ही राज्य में उनका विलय कर देना चाहिए। गुरू जी तो हमारे संविधान की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस भारत के संघीय ढाँचे के विरूद्ध है। उनकी किताब 'बंच ऑफ थाट्स’ या 'विचार नवनीत’ में पूरा एक अध्याय है जिसका शीर्षक ही है 'एकात्मक शासन की अनिवार्यता’’। इस अध्याय में एकात्मक शासन को तुरंत लागू करने के उपाय सुझाते हुए गोलवलकर लिखते हैं 'इस लक्ष्य की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण काम और प्रभावी कदम यह होगा कि हम अपने देश के विधान से संघात्मकढाँचे की संपूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर दें। उसके बाद भारत अर्थात भारत के अंतर्गत अनेक स्वायत्त अथवा अर्द्धस्वायत्त राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधानमंडल, एक कार्यपालिका घोषित कर दें। उसमें खंडात्मक, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, भाषाई तथा अन्य प्रकार के गर्व का चिन्ह भी नहीं होना चाहिए एवं इन भावनाओं को हमारे एकत्व के सामंजस्य को उद्ध्वंस करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। संविधान का पुनर्निरक्षण एवं पुनर्लेख हो जिससे कि अंग्रेजों द्वारा किया गया तथा वर्तमान नेताओं द्वारा मू़तावश ग्रहण किया हुआ कुटिल प्रचार कि हम अनेक अलगअलग मानव वंशों अथवा राष्ट्रीयताओं के गुट हैं जो संयोगवश भौगालिक एकता एवं एक समान सर्वप्रधान विदेशी शासन के कारण साथसाथ रह रहे हैं, इस एकात्मक शासन की स्थापना द्वारा प्रभावी ढंग से अप्रमाणित हो जाएं।’’

गोलवलकर को नरेन्द्र मोदी समेत भाजपाई नेता उसी तरह अपनी प्रेरणा का स्त्रोत मानते हैं जैसे कांग्रेस गांधी को मानती हैं। गोलवलकर ने 1961 में राष्ट्रीय एकता परिषद के प्रथम अधिवेशन को भेजे गए अपने संदेश में भारत में संघ राज्य को समाप्त करने का आह्वान करते हुए कहा था कि 'आज की संघात्मक (फेडरल) राज्य पद्धति पृथकता की भावनाओं का निर्माण तथा पोषण करने वाली, एक राष्ट्रभाव के सत्य को एक प्रकार से अमान्य करने वाली एवं विच्छेद करने वाली है। इसको जड़ से ही हटा कर तदनुसार वर्तमान संविधान को समाप्त कर एकात्मक शासन प्रस्थापित हों’’। गोलवलकर संघीय व्यवस्था से कितनी घृणा करते थे और किस हद तक उसके घोर विरोधी थे उसका एक प्रमाण यह है कि जब महाराष्ट्र को भाषा आधारित राज्य बनाने का आंदोलन चल रहा था उस समय वे प्रांतीयता विरोधी सम्मेलनों में भाषण देते हुए कहते थे कि मैं एक राज्य का समर्थन करता हूं। भारत में केन्द्रीय शासन होना चाहिए। उन्होंने यह भी आह्वान किया था कि हमारे नेताओं को साहस दिखाना चाहिए और वर्तमान संघीय ढाँचे के खतरे को महसूस करते हुए संघीय ढाँचे को समाप्त करने की योजना बनाना चाहिए।

मैं जानना चाहूंगा कि क्या मोदी ने गुरू गोलवलकर को और संघ के इस विचार को त्याग दिया है? क्या उन्होंने संघ के इस दशर्न को नकार दिया है? संघीय ढाँचे की बात करना और उसके साथ ही संघ के राजनीतिक दशर्न के प्रति प्रतिबद्धता दिखाना एक साथ संभव नहीं है।

जहां तक राष्ट्र के संघीय ढाँचे का सम्मान करने का सवाल है मैं यहां पर एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण दिलाना चाहूंगा। 1977 के आमचुनाव में इंदिरा गांधी समेत कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई थी। उस हार के बाद देश की पहली चुनी हुई गैरकांग्रेसी सरकार ने केन्द्र में सत्ता संभाली थी। इस सरकार में जनसंघ, जो भारतीय जनता पार्टी का पुराना अवतार था, शामिल था। इस सरकार में जनसंघ के प्रतिनिधि के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी शामिल थे। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में दोनों की उपस्थिति के बावजूद यह निर्णय लिया गया कि चुनी हुई समस्त राज्य सरकारों को बर्खास्त किया जाए और वे बर्खास्त भी की गई । क्या यह संघीय ढाँचे के प्रति सम्मान का प्रदशर्न था? यदि जनसंघ, संघीय ढाँचे के प्रति प्रतिबद्ध था तो उसे चुनी हुई राज्य सरकारों की बर्खास्तगी के प्रस्ताव को मंजूर नहीं होने देना चाहिए था। इसलिए मोदी से यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या वे संघ की विचारधारा से एकात्मक शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को समाप्त करवाएंगे? जब तक वे यह नहीं करवा पाते हैं तब तक उन्हें केन्द्र की सरकार पर राज्यों के साथ भेदभाव करते हुए संघीय ढाँचे को कमजोर करने का आरोप लगाने का नैतिक अधिकार नहीं है।

-एल.एस. हरदेनिया

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