रविवार, 27 अप्रैल 2014

अबुल कलाम आजाद आज होते


                                            ग़म से मरता हूँ कि ऐसा नहीं दुनिया में कोई।
                                            कि करे तअजियते मेहरो वफा मेरे बाद।।  आजादी और कौमी इत्तेहाद के अलमबरदार मौलाना अबुल कलाम आजाद को इस जहाने फानी से रुखसत हुए 56 साल गुजर गए। 22 फरवरी 1958 को मौलाना ने इस दुनिया को खैरबाद कहा। इस मुद्दत में वक्त ने बहुत सी करवटें बदलीं और ज़माने ने बहुत उतार चढ़ाव देखे। मौलाना ने जिस दम दुनिया से रुखसते सफर बँाधा तो वह पूरी तरह शिकस्ता दिल और टूटे हुए इंसान थे। 1947 के पुर आशूब दौर में मौलाना ने खुद को ‘जिन्दा लाश’ कहा था। उनके ख्वाबों का आजाद हिन्दोस्तान दो टुकड़े हो गया था। कौम का इत्तेहाद टूट गया था, मिल्लते मुसलिमा बिखर गई थी। आजादी और कौमी इत्तेहाद के लिए मौलाना ने जिन्दगी भर जद्दोजहद की थी, उसका यह अंजाम इन्तेहाई दर्दनाक था।
    कौमी इत्तेहाद मौलाना को आजादी से बढ़कर अज़ीज़ था। आजादी मिलने में देर हो जाए, मंजूर था, कौमी इत्तेहाद से दस्तबरदार होना कुबूल नहीं था। देहली में 1923 में कांग्रेस इजलास (अधिवेशन) के सदर की हैसियत से मौलाना के खु़तबे (भाषण) का यह लाजवाब और तारीखी कौल (कथन) आबेजर (सोने के पानी) से लिखने के लायक है, आज भी उतना ही ताजा और असर अंगेज और दिलों को छूने वाला है- फरमाया:
    ‘‘आज अगर एक फरिश्ता आसमान की बदलियों से उतर आए और कुतुब मीनार पर खड़े होकर यह ऐलान कर दे कि स्वराज 24 घण्टे के अन्दर मिल सकता है, बशर्ते यह कि हिन्दू मुसलमान इत्तेहाद से दस्तबरदार हो जाएँ तो मैं स्वराज से दस्तबरदार हो जाऊँगा मगर आपसी इत्तेहाद से दस्तबरदार न होऊँगा क्योंकि स्वराज मिलने में ताखीर (देर) हुई तो यह हिन्दोस्तान का नुकसान होगा लेकिन अगर हमारा इत्तेहाद जाता रहा तो यह आलमे इंसानियत का नुकसान होगा।’’  
    मौलाना ने अपने इरशाद (संबोधन) में मुस्तकबिल (भविष्य) की झलक देखी थी और ऐसी पेशगोई (भविष्यवाणी) कर दी थी जो हरफ ब हरफ (शब्द व शब्द) सच साबित हुई। 24 साल बाद वाकई ऐसा ही हुआ कि देहली में राएसीना पहाड़ी पर वाकेअ वायसराॅय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) की बुलंदी पर लंदन से एक वजीय व शकील (लम्बा, चैड़ा सुन्दर) शख्स लार्ड माउन्ट बेटन उतरा, ब्रिटिश हुकूमत का यह आखिरी वायसराॅय था, उसने ऐलान किया कि स्वराज अभी ले लो मगर इसके लिए कौमी इत्तेहाद से दस्तबरदारी और मुल्क की तकसीम कुबूल करनी होगी। मौलाना ने जो उस वक्त भी दुबारा कांग्रेस सदर थे, साफ कह दिया ‘‘नामंजूर’’! मौलाना का खयाल था कि बदहाल अंग्रेज अब साल दो साल से ज्यादा हिन्दोस्तान में रुकने वाले नहीं, थोड़ी देर और सही आजादी में। मौलाना से मालूम हुआ वायसराॅय ने दूसरे कांग्रेसी लीडरों पर डोरे डाले। लैलाए आजादी और हुक्मरानी की झलक दिखलाई तो लीडरों की राल टपकने लगी, वह जल्द से जल्द इक्तेदार (सत्ता) की गंगा जमुनी कुर्सी पर जलवा अफरोज होने के लिए बेताब हो गए। सब से पहले सरदार पटेल ने तकसीमे मुल्क की ज़हरीली गोली खायी।
    सरदार पटेल के बाद माउन्टबेटन ने जवाहर लाल नेहरू पर जाल फेंका और वह भी आसानी से फँस गए, सब से आखिर में गांधी जी का नम्बर आया। पटेल नेहरू और गांधी एक के बाद एक खुद सुपुर्दगी करते गए, तो मैदाने सियासत में मौलाना बेचारो-मददगार अकेले खड़े रह गये। गांधी जी आखिरी उम्मीद थे, उन्होंने भी साथ छोड़ दिया। अपनी आखिरी किताब ‘‘इंडिया विन्स फ्रीडम’’ में मौलाना ने कहा है कि जिन्दगी में उनकी सबसे बड़ी गलती यह थी कि जंगे आजादी के अंजाम तक उन्हें कांग्रेस का सदर रहना चाहिए था। कैबिनेट मिशन के साथ तमामतर गुफ्तोशुनीद (बातचीत) मौलाना ने की थी और कैबिनेट मिशन प्लान की मंजूरी, कांग्रेस और मुस्लिम लीग से हासिल करने में वह कामयाब रहे थे, जिसके तहत पाकिस्तान के नाम पर मुल्क की तकसीम का मतालिबा तर्क करके मुस्लिम लीग से वकाफी निजाम (संघीय ढाँचा) व मुताहिद हिन्दोस्तान कुबूल कर लिया था।
    मौलाना आजाद 1940 से 1946 तक कांग्रेस के सदर थे। कांग्रेस की सदारत का सवाल उठा तो मौलाना ने यह बार (भार) मजीद उठाने से मआजरत (क्षमा) की। उस की एक वजह यह भी थी कि मौलाना सदारत का इलेक्शन लड़ना नहीं चाहते थे, सरदार पटेल सदारत के उम्मीदवार थे और बिला मुकाबला सदारत का फैसला होना, दुश्वार नजर आ रहा था। यह भी मालूम था कि आजादी मिलेगी तो कांग्रेस का सदर ही वजीर आजम होगा। गांधी जी ने सदारत का मसअला तय करने के लिए जवाहर लाल नेहरू का नाम तजवीज किया और रिवाज के मुताबिक मौलाना ने नेहरू को मनसबे सदारत के लिए नामजद किया, वह बिला मुकाबला मुन्तखब हो गए और 1946 की आरजी हुकूमत में वजीर आजम बन गये। यह कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मख़लूत (साझा) हुकूमत थी जो चल न सकी। सदर कांग्रेस की हैसियत से पंडित नेहरू के एक प्रेस बयान पर जिन्ना साहब भड़क उठे और कैबिनेट मिशन प्लान को मुस्तरद (रदद) करके मतालिबाए पाकिस्तान पर अड़ गए। इस तरह बर्रे सगीर (उप महाद्वीप) हिन्द का सानिहा ए अज़ीम पेश आ गया, मुल्क तकसीम हो गया, दोनों जानिब आग और खून का ज्वार भाटा उठा, लाखों करोड़ों जिन्दगियाँ तबाह व बरबाद र्हुइं और तारीखे आलम का सब से बड़ा तबादला-ए-आबादी हुआ।
    यह खून आशाम (खूंखार) मंजर मौलाना आजाद अपनी खूंखार (खून बरसाने वाली) आँखों से देख रहे थे। स्वराज तो उजलत में मिल गया मगर कौमी इत्तेहाद पारा पारा हो गया। तकसीम के सानहे अजीम का एक दर्दनाक पहलू था कि न सिर्फ जमीन बँटी बल्कि मिल्लते मुस्लिमा भी दो टुकड़े हो गई और बंग्लादेश वजूद में आते ही तीन टुकड़े हो कर तीन तेरह हो गई। जमीन के नक्शे पर रेड वलिफ ने मसनूअी (अप्राकृतिक) सरहदों की सुर्ख लकीरें खींच दी। पाकिस्तान से हिन्दुओं और सिक्खों की और हिन्दुस्तान से मुसलमानों की भगदड़ शुरू हुई। पाकिस्तान से भगदड़ रोकना मौलाना के बस में नहीं था, लेकिन हिन्दुस्तान से मुसलमानों के तर्के वतन को रोकने के लिए खस्ता ए जा आजाद, जामा मस्जिद देहली की सीढि़यों पर जा खड़े हुए और खानमां बरबाद मुसलमानों के काफिले को आवाज दी कि रुक जाओ! मेरी बात सुन लो।
    फरमाया-
    ‘‘यह फरार की जिन्दगी जो तुम ने हिजरत के मुक़दद्स नाम पर अख्तियार की है उस पर ग़ौर करो, अपने दिलों को मजबूत बनाओ और अपने दिमागों को सोचने की आदत डालो और फिर देखो कि तुम्हारे यह फैसले कितने आजिलाना हैं। आखिर कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो? मैं कहता हूँ कि उजले नक्शो निगार तुम्हें इस हिन्दुस्तान में माजी की यादगार के तौर पर नजर आ रहे हैं, वह तुम्हारा ही काफिला था, उन्हें भुलावो नहीं, छोड़ो नहीं, उनके वारिस बनके रहो और समझ लो कि अगर तुम भागने के लिए तैयार नहीं तो फिर तुम्हें कोई ताकत भगा नहीं सकती। आओ अहद करो कि यह मुल्क हमारा है, हम उसके लिए हैं और तकदीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज के बगैर
अधूरे रहेंगे।
    अज़ीजो! मेरे पास तुम्हारे लिए कोई नया नुस्खा नहीं है, वही पुराना नुस्खा है जो बरसों पहले का है। वह नुस्खा जिस को कायनाते इंसानी का सबसे बड़ा मोहसिन लाया था। वह नुस्खा कुरआन का यह ऐलान कि ‘‘ला तहनू अव्वला तहजनू औ अन्तुम इला अलूना इन कुन्तुम मोमिनीन’’ (......फिर कहता हूँ बार-बार कहता हूँ अपने हवास पर काबू रखों, अपने गिर्दोपेश अपनी जिन्दगी खुद फराहम करो। यह मंडी की चीजें नहीं कि तुम्हें खरीद कर ला दूँ। यह तो दिल की दुकान ही में से आमाले सालेह की नकदी से दस्तयाब हो सकती है)’’
    आजादी की यह दिल सोज आवाज सुनकर मुलसमानों के उखड़े हुए कदम रुक गए। खाना बदोश काफिलों ने डेरा डाल दिया और पाँव जमा लिए, धरती को मजबूती से पकड़ लिया, बादे सर (तेज हवा) का कोई झोंका और तूफान व आँधी का कोई थपेड़ा उनके खेमों को उखाड़ न सका। बेकरार दिलों को करार आया और मिल्लत की खुद ऐतमादी बहाल हुई। मुसलमानाने हिन्द पर मौलाना आजाद का यह बहुत बड़ा एहसान है कि उन्हें बेघर और बेवतन होने से बचा लिया। जिन्हें जाना था वह चले गए और दर दर की ठोकरें उनका मुकद्दर बनीं।
    हिन्दुस्तानी मुसलमान अपने वतन में सिर ऊँचा करके खड़ा है और अज़्म व हौसले के साथ अपनी दुनिया बना रहा है, मुल्क की मखलूत आबादी में मिलीजुली और भाईचारे की जिन्दगी बसर करने के लिए वह कोशां है।
    यह सच है कि कौमी इत्तेहाद को टूटने और मुल्क को तकसीम होने से महात्मा गांधी और मौलाना आजाद बचा न सके, लेकिन न महात्मा गांधी और न मौलाना आजाद ने हार मानी, दिलो को जोड़ने के मिशन में दोनों रहनुमा दिलो जान से लग गए। गांधी जी ने तो उसी राह में जान दे दी और आजाद ने सेकुलर इण्डिया की तामीर व तरक्की के लिए अपनी बाकी उम्र वक्फ कर दी। उस कठिन काम में मौलाना को अपने अजीज दोस्त नेहरू की हिमायत और ताईद (समर्थन) हासिल रही। आज तालीम, साइंस, टेक्नोलाॅजी और सनअत (उद्योग) व हिरफत (हुनर) में तरक्की की जो बहार नजर आती है उसकी बुनियाद आजाद और नेहरू की डाली हुई है। एक नया जीता जागता ताबिन्दा हिन्दुस्तान उफ़क आलम पर जगमगा रहा है।
    बेशक, यह सब तो बहुत अच्छा है और बहुत कुछ हो रहा है मगर कौमों की जिन्दगी में लमहों की गफलत भी सदियों की सजा बन जाती है। अन्दरूनी और बैरूनी (बाहरी) खतरों से हमेशा चैकन्ना और चैकस रहना जरूरी होता है। फिर्का परस्ती के नाग ने कल भी हमें डसा था और आज भी नाग फन फैलाए हुए डसने की ताक में है। फिर्का परस्ती किसी की भी हो, इंसानियत के लिए जहर कातिल है। वक्त और हालात के तहत फिर्का परस्ती का नाम और चोला बदलता रहता है, उसकी हलाकत खेेजी सदा बाकी रहती है आज एक मरतबा फिर फिर्का परस्ती तवाना और ताजादम होकर शमशीर वकफ (तलवारधारी) है।
    मुल्क को उसने दो राहें पर खड़ा कर दिया है। हिन्दुस्तान एक सेकुलर और जम्हूरी मुल्क रहेगा कि नहीं, मुल्क में भाईचारा और अमनो अमान रहेगा या नहीं? यह सवाल जबानों पर है और अंदेशे दिमागों में गूँज रहे हैं।
    महात्मा गांधी और मौलाना आजाद जिन्दा होते तो कौम और मुल्क के दुश्मन फिर्का परस्तों के सामने आज भी सीना सिपर होते। वह तो अब वापस आने वाले नहीं मगर उनका पैगाम जिन्दा है और अहले वतन को आवाज दे रहा है। महात्मा गांधी और मौलाना आजाद ने वतन दोस्ती और कौमी इत्तेहाद का जो सबक दिया था उसे याद रखना और उस पर अमल करते रहना इसलिए जरूरी है कि मुल्क व कौम को फूट, नफरत, अदावत और नतीजे में दुबारा तकसीम दर तकसीम के जानलेवा सानिहे से फिर कभी न गुजरना पड़े। उफक (आसमान का किनारा) पर यह सवालिया निशान बहुत नुमाया नजर आ रहा है कि सेकुलर जम्हूरी हिन्दोस्तान उसी रास्ते पर गामजन रहेगा, जिस पर कौमी रहनुमा गांधी जी और मौलाना आजाद चलते हुए अपने नक्शे कदम छोड़ गए हैं या चिंघाड़ती, गरजती फिर्कापरस्ती की सुनामी सबकुछ बहा ले जाएगी और अपने पीछे तबाही व बरबादी का होलनाक मंजर छोड़ जाएगी? मुहिब्बाने वतन के जवाब का आलमे बाला में रूहे आजाद को जरूरी बेचैनी से इन्तेजार रहेगा।
   -अहमद सईद मलिहाबादी
 सदस्य, राज्य सभा
फोन नं0-913322255455

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (29-04-2014) को "संघर्ष अब भी जारी" (चर्चा मंच-1597) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'