शनिवार, 3 मई 2014

मुस्लिम वोटों की आपाधापी

भाजपा ने दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी के उस वक्तव्य की कड़ी निंदा की है जिसमें उन्होंने मुसलमानों से अपील की थी कि सांप्रदायिक ताकतों को पराजित करने के लिए वे कांग्रेस को वोट दें। इमाम बुखारी की राजनीति में यह दखल अवांछनीय है और इसकी उन सब लोगों द्वारा निंदा की जानी चाहिए जो प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों में आस्था रखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जामा मस्जिद के प्रांगण के बाहर, बुखारी की कोई नहीं सुनता और यह बात काफी हद तक सही भी है। जामा मस्जिद इलाके के माटिया महल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार शोएब इकबाल का इमाम बुखारी हमेशा  से विरोध करते आ रहे हैं परंतु उनके फतवों के बावजूद, शोएब इकबाल तीन बार चुनाव जीत चुके हैं। सन् 2007 के उत्तरप्रदेश विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनावों में बुखारी ने मुसलमानों से बसपा को वोट देने की अपील की थी परंतु बसपा के अधिकांश मुसलमान उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत सके थे। सन् 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में बुखारी ने समाजवादी पार्टी का समर्थन करने की अपील मुसलमानों से की। नतीजा यह हुआ कि इमाम के दामाद उमर अली खान, जिन्हें सपा ने टिकट दिया था, भी चुनाव हार गए और वह भी तब जब बेहाट  विधानसभा क्षेत्र में वे एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार थे और वहां की 80 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। इमाम की अपील के बावजूद, मुस्लिम-बहुल इलाकों से कई सपा उम्मीदवार हार गए। उसके बाद इमाम ने सपा से यह माँग की कि उनके भाई को राज्यसभा का सदस्य बनाया जावे और उमर अली को मंत्री।  सपा ने दोनों ही मांगे मानने से इंकार कर दिया। नतीजे में इमाम व सपा के रिश्तों में कड़वाहट घुल गई।
वर्तमान शाही इमाम के पिता सैय्यद अब्दुल्ला बुखारी तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने आपातकाल में, संजय गाँधी की जिद के चलते, दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में झुग्गियों के ढहाए जाने का विरोध किया। जब जनता पार्टी बनी, तब अटल बिहारी वाजपेई व चन्द्रशेखर, शाही इमाम से मिलने पहुँचे और उनसे अनुरोध किया कि वे नई पार्टी को अपना आशीर्वाद दें। शाही इमाम ने उनके अनुरोध को स्वीकार किया और 1977 के चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने वाजपेई के साथ कई आमसभाओं को संबोधित किया। उन्होंने मुसलमानों से जनता पार्टी को वोट देने की अपील की और मुसलमानों ने काफी हद तक उनकी अपील को स्वीकार भी किया क्योंकि उस समय देश में कांग्रेस-विरोधी वातावरण था। उसके बाद, इमाम ने अपनी ब्रांड इमेज बनाने का पूरा प्रयास किया और वे राजनैतिक पार्टियों से सौदेबाजी करने लगे। सन् 2004 के आमचुनाव में भी उन्होंने मुसलमानों से भाजपा को मत देने की अपील की परंतु भाजपा को तब इस पर कोई आपत्ति नहीं थी।
पहचान की राजनीति व एनडीए लगभग सभी विचारधाराओं वाली पार्टियाँ, विभिन्न नस्लीय, भाषाई व समान-हित समूहों के अतिरिक्त, अलग-अलग जातियों व धर्मों के लोगों के वोट कबाड़ने के लिए जीतोड़ प्रयास कर रही हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी भी यही कर रहे हैं। वे विभिन्न समूहों और समुदायों के लोगों से उसी भाषा में बात कर रहे हैं, जिसमें वे चाहते हैं और उनके हितार्थ निर्णय लेने व नीतियाँ बनाने का वायदा कर रहे हैं। ये वायदे झूठे हैं। परंतु एक समूह ऐसा भी है जिससे मोदी कोई वायदा नहीं कर रहे हैं और वह है मुसलमानों का। वे हर तरह की पगडि़याँ और टोपियाँ पहनने को तैयार हैं परंतु मुस्लिम टोपी पहनना उन्हें मंजूर नहीं है। यद्यपि वे देश के सबसे पिछड़े समुदाय-मुसलमानों-की भलाई के लिए कोई कदम उठाने को तैयार नहीं हैं परंतु वे मुसलमानों के वोट पाना चाहते हैं। राजस्थान में उनकी एक सभा के दौरान पार्टी कार्यकर्ता बुरके और टोपियाँ बाँट रहे थे ताकि यह दिखलाया जा सके कि उनकी सभाओं में बड़ी संख्या में मुसलमान आ रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, मुस्लिम नेताओं से मिले और उनसे पार्टी द्वारा की गई गलतियों के लिए माफी मांगी परंतु यह स्वीकार नहीं किया कि पार्टी ने कोई गलती की है। इस बैठक का उद्देश्य यही था कि भाजपा, मुसलमानों के कम से कम कुछ वोट हासिल कर सके।
यदि कोई पार्टी, मुसलमानों को छोड़कर, अन्य किसी भी जातिगत या भाषाई समूह के वोट पाने की कोशिश करती है या अपील करती है तो भाजपा को कोई आपत्ति नहीं होती। महाराष्ट्र में भाजपा के गठबंधन साथी शिवसेना ने मराठी भाषियों वोट हासिल करने के लिए उत्तर भारतीयों के खिलाफ घृणा फैलाई परंतु भाजपा ने इसका तनिक भी विरोध नहीं किया। पंजाब में एनडीए का गठबंधन साथी अकाली दल, केवल सिक्ख समुदाय के हितों से जुड़े मुद्दे उठाता है और भाजपा कभी उससे असहमति व्यक्त नहीं करती। भाजपा और संघ परिवार के अन्य अनुषांगिक संगठन, स्वयं भी हिन्दू समुदाय के धार्मिक मुद्दे उठाते रहे हैं। उनका उद्देष्य यह है कि धीरे-धीरे हिन्दू-जो कि एक विविधवर्णी धार्मिक समुदाय है-को एकसार बनाकर, उसे वोट बैंक में परिवर्तित कर दिया जाए जिससे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की राह प्रशस्त हो सके। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भाजपा और संघ परिवार, विभिन्न बाबाओं की मदद लेते रहे हंै। इनमें से कुछ बाबा अपनी काली करतूतों के लिए कुख्यात भी रहे हैं। जब भाजपा सत्ता में आती है तब वह राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल करने की बाबाओं को पूरी छूट दे देती है ताकि वे संकीर्ण सोच और हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रचार कर सकें।
भाजपा और बाबा
श्री श्री रविशंकर और रामदेव जैसे बाबा हमेशा से भाजपा के साथ रहे हैं, यद्यपि रामदेव की तुलना में श्री श्री रविशंकर उतने खुले तौर पर भाजपा का समर्थन नहीं करते। मोदी ने रामदेव को मंच पर गले लगाया और दोनों का यह चित्र अखबारों और पत्रिकाओं में खूब छपा। रामदेव कई बार यह कह चुके हैं कि मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए। यह इमाम बुखारी की कांग्रेस को वोट देने की अपील से किस तरह अलग है? श्री श्री अक्सर भाजपा नेताओं के साथ देखे जाते हैं। वे एल.के. आडवाणी की आत्मकथा के लोकार्पण समारोह में तो मंच पर विराजमान थे ही, वे नितिन गडकरी के भाषणों के संग्रह के लोकार्पण में भी उपस्थित थे। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे ‘नैतिक और ईमानदार‘ नेताओं को अपना मत दें (जिन नेताओं के साथ वे रहते हैं, उनको देखते हुए उनके अनुयायियों के मन में शायद ही कोई संदेह होगा कि ‘नैतिक और ईमानदार‘ नेता कौन है?) उन्होंने यह भी अपील की कि मतदाता देश में खिचड़ी सरकार न बनाएं (अर्थात तीसरे मोर्चे को वोट न दें)। उन्होंने सोनिया गांधी की इस बात के लिए निंदा की कि वे केवल एक धर्म के धार्मिक नेता से वोट मांगने के लिए मिलीं।
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान अनेक बाबाओं को संरक्षण और प्रोत्साहन दे रहे हैं। इन बाबाओं की राजनीति में जबरदस्त दखल है। विधानसभा चुनाव के बाद, चैहान और उनकी पत्नि  संत श्री रावतपुरा सरकार से आशीर्वाद लेने पहुंचे। रावतपुरा सरकार एक प्रभावशाली धार्मिक नेता हैं जिन्हें भाजपा शासन में काफी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। रावतपुरा सरकार के अनेक व्यवसाय हैं और वे मध्यप्रदेश के लोकनिर्माण विभाग में ‘ए’ श्रेणी के ठेकेदार के रूप में पंजीबद्ध हैं। इसी तरह, संत साध्वी माँ कंकेष्वरी देवी व भय्यू महाराज के चेलों में चैहान के अलावा उनके मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी शामिल हैं। इनमें से कुछ बाबा आपराधिक प्रकरणों में लिप्त हैं जिनमें जमीनों पर कब्जा करना, बलात्कार आदि शामिल हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मालेगांव के बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था और उनका बचाव करते हुए भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि केवल हिन्दू संतों को निशाना बनाया जा रहा है।
संघ परिवार, तथाकथित धर्मसंसद को भी वैधता प्रदान करता आया है और धर्मसंसद का विभाग उसने विष्व हिन्दू परिषद को सौंपा हुआ है।  इसका उद्देष्य हिन्दू समुदाय की विभिन्न परंपराओं के संतों को इकट्ठा कर उनका इस्तेमाल हिन्दुत्व के राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए करना है। पहली धर्मसंसद का आयोजन दिल्ली के विज्ञान भवन में 7-8 अप्रैल, 1984 को किया गया था और इसकी अध्यक्षता शंकराचार्य शांतानंद महाराज ने की थी। इस संसद में चिन्मयानंद महाराज ने मुख्य वक्तव्य दिया था और हिन्दू समुदाय के 76 पंथों के 558 धर्माचार्यों ने इसमें भागीदारी की थी। धर्मसंसद ने जो मांगे कीं उनमें शामिल था संस्कृत भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा देना और उसे आम बोलचाल की भाषा बनाना। इसके अतिरिक्त, यह मांग भी की गई थी कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक शिक्षण के लिए स्थान बनाया जाए। संसद द्वारा पारित एक दूसरा प्रस्ताव तो पूरी तरह राजनैतिक था। ‘‘विदेशी  धर्मों द्वारा हिन्दू आबादी को कम करने के षड़यंत्रपूर्ण प्रयासों को हर तरीके से विफल करना व प्रशसन को हिन्दू हितों के प्रति प्रतिबद्ध होने के लिए मजबूर करना।’’ प्रस्ताव के अंतिम शब्द भारतीय संविधान के सीधे-सीधे खिलाफ हैं। भारतीय संविधान यह कहता है कि राज्य को सभी नागरिकों को, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, समान दृष्टि से देखना है और यह भी कि हर व्यक्ति को अपने धर्म का आचरण करने, उसे धारण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता है। धर्मसंसद ने अन्य राजनैतिक मांगे भी उठाईं जैसे रामजन्म भूमि, काशी  विष्वनाथ व कृष्ण जन्मस्थान को हिन्दुओं को लौटाया जाए। यह मांग उस कानून के खिलाफ है जो यह कहता है कि धर्मस्थलों के मामले में 1947 की स्थिति बनाए रखी जाएगी।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के तुरंत बाद आयोजित चैथी धर्मसंसद में 4000 संतों ने भागीदारी की। ऐसा कहा जाता है कि इस धर्मसंसद ने हिन्दू राष्ट्र के गठन का प्रस्ताव पारित किया-एक ऐसा हिन्दू राष्ट्र जो एकाधिकारवादी और विस्तारवादी होगा। संसद ने यह मांग भी की कि रामजन्मभूमि को श्रीरामजन्मभूमि न्यास को सौंप दिया जाए और हिन्दुओं से यह अपील की कि वे उस पार्टी (अर्थात भाजपा) की सरकार बनाएं जो ऐसा करे। हिन्दुओं को यह चेतावनी दी गई कि वे मुसलमानों के हिन्दुओं को समाप्त करने के ‘देश व्यापी’ षड़यंत्र से सावधान रहें और हिन्दू महिलाओं की मुस्लिम गुंडों से रक्षा करें। संसद ने हिन्दुत्व विचारधारा वाले उम्मीदवारों को चुनाव में विजय दिलवाने के लिए खुद की पीठ थपथपाई।
सन् 2003 की फरवरी में आयोजित 10वीं धर्मसंसद की अध्यक्षता महंत अवैद्यनाथ महाराज ने की और इसमें मुख्य वक्तव्य विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने दिया। अवैद्यनाथ, श्रीरामजन्मभूमि मंदिर आंदोलन के अध्यक्ष हैं। पूरे देश  से लगभग 9000 संतों ने इस संसद में भाग लिया। संसद ने यह संकल्प किया कि वह हिन्दू राष्ट्र की ‘पुनस्र्थापना’ करेगी। तात्पर्य यह है कि भारत हमेशा  से हिन्दू राष्ट्र रहा है और अब केवल हिन्दू राष्ट्र की पुनस्र्थापना की दरकार है। स्वतंत्रता के पहले, भारतीय समाज, जन्म-आधारित विशेषाधिकारों को मान्यता देता था जिसमें जाति, लिंग व धर्म-आधारित ऊँचनीच का बोलबाला था। पिछड़ों, दलितों व महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे उच्च जाति के जमींदारों और समाज के श्रेष्ठी वर्ग की सेवा करने को अपना सौभाग्य समझें। अतः संघ परिवार द्वारा आयोजित दसवीं धर्मसंसद, समानता व समावेशी नागरिकता के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ थी और इसका आयोजन संघ परिवार द्वारा भाजपा सहित अपने सभी अनुषांगिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी से किया गया था। धर्मसंसद ने यह संकल्प भी लिया कि वह सावरकर के पितृभू-पुन्यभू के सिद्धांत पर आधारित अखण्ड भारत का निर्माण करेगी। अखण्ड भारत के निर्माण का अर्थ है भारत के विभाजन को बलप्रयोग द्वारा पलटना और पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांनामार, अफगानिस्तान व चीन के कुछ हिस्सों को सैन्य बल के जोर पर भारत का हिस्सा बनाना। धर्मसंसद ने यह मांग भी की कि मदरसों पर प्रतिबंध लगाया जाए और दारूल उलूम देवबंद जैसे इस्लामिक संस्थानों को बंद करवाया जाए क्योंकि वे आतंकवाद की नर्सरी हैं! सच यह है कि दारूल उलूम से सैंकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निकले थे और देवबंद के उलेमाओं द्वारा बनाया गया संगठन जमायत-ए-उलेमा-ए- हिन्द ने देश के विभाजन का कड़ा विरोध किया था। यह संगठन समग्र राष्ट्रवाद का समर्थक था। परंतु नफरत में अंधे
धर्मसंसद के सदस्यों ने इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज किया। उन्हांेने जिहाद के लिए मौत की सजा मांगी। दरअसल जिहाद से सूफी संतों का अर्थ था अपनी इच्छाओं पर काबू पाना। स्थान की कमी के कारण हम यहां संसद द्वारा पारित अन्य प्रस्तावों की चर्चा नहीं कर रहे हैं परंतु वे भी आक्रामक और अपमानजनक भाषा में लिखे गए थे जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में स्थित आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों को ‘नेस्तनाबूद’ कर दिया जाए, तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से खदेड़ा जाए और पंष्चिम बंगाल की सरकार को बर्खास्त किया जाए। धर्मसंसद ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि पष्चिम बंगाल सरकार को क्यों बर्खास्त किया जाना चाहिए। उसने यह मांग भी की कि सभी प्रकार के धर्मपरिवर्तनों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अर्थात उन धर्मपरिवर्तनों को भी जो लालच, धोखाधड़ी या धमकी के द्वारा नहीं कराए गए हों।
सन् 2004 में हुई धर्मसंसद में 30,000 साधुओं ने भाग लिया और यह मांग की कि सरकार को
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित डंकल प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए! संसद में मुरलीमनोहर जोशी  भी उपस्थित थे जिन्होंने डंकल प्रस्ताव के बारे में संसद को बताया। तत्कालीन दिल्ली सरकार में मंत्री साहब सिंह वर्मा संसद के सामने उपस्थित हुए और दिल्ली सरकार के प्रस्तावित गौवध निषेध कानून के लिए संतों का आशीर्वाद मांगा। संतों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ र्गइं कि आरएसएस को उन्हें यह सलाह देनी पड़ी कि टिकिट मांगने से बचंें। भाजपा हमेशा से  साधुओं को टिकिट बांटती आ रही है और अपने चुनाव अभियान में उनकी मदद भी लेती आई है। इलाहाबाद में सन् 2013 में हुए कुंभ  के दौरान, आर.एस.एस.और भाजपा के नेता साधुओं से मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की मांग का अनुमोदन करवाने पहुंचे। साधुओं ने उनकी अपेक्षा पूरी की। 
निष्कर्ष
भाजपा के दोहरे मानदण्ड हैं। जहां वह स्वयं अपने राजनैतिक और चुनावी लाभ के लिए हिन्दू धार्मिक नेताओं का आशीर्वाद, समर्थन व सहयोग प्राप्त करने के लिए सब कुछ करती है वहीं जब दूसरे धर्मों के नेता-विशेषकर मुस्लिम- राजनीति में दखलअंदाजी करते हैं तो उसे गंभीर आपत्ति होती है। वह उसे धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति बताती है। भाजपा की यह सोच है कि हिन्दू धर्म, भारत का राष्ट्रीय धर्म है जबकि इस्लाम और ईसाईयत विदेशीं  हैं। संविधान की दृष्टि से धर्मों का ऐसा कोई वर्गीकरण मान्य नहीं है और ना ही किसी भी प्रजातांत्रिक देश को ऐसा वर्गीकरण करना चाहिए। यद्यपि हम इमाम बुखारी के जरिए मुसलमानों के वोट हासिल करने की कांग्रेस की कोशिश की निंदा करते हैं परंतु यहां हमें यह याद रखना चाहिए कि सोनिया गांधी और इमाम, दोनों ने ही यह कहा है कि उनकी मुलाकात का उद्धेष्य धर्मनिरपेक्ष मतों का विभाजन रोककर संविधान के धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा करना है। इस स्पष्टीकरण में कोई खास दम नहीं है क्योंकि इसका अर्थ यह है कि केवल मुसलमान ही धर्मनिरपेक्ष हैं और उनके मतों का बंटवारा धर्मनिरपेक्ष मतों का बंटवारा है। दूसरी ओर, भाजपा साधुओं का पल्लू पकड़कर संवैधानिक सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाना चाहती है और उनके जरिए अखण्ड भारत और हिन्दू राष्ट्र जैसी असंवैधानिक मांगे उठा रही है।

-इरफान इंजीनियर

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-05-2014) को "संसार अनोखा लेखन का" (चर्चा मंच-1602) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Sunita Patidar ने कहा…

लेख अच्छा है .