बुधवार, 18 जून 2014

'' जिन्दगी का साज भी क्या साज है ''




कुदरत भी बड़ा अजीब खेल दिखाता रहता है उसने बड़े ही करीने से गढ़कर इसे बनाया उसने इसको विविध रंगों से सजाया वो  बड़ा ही रहस्यमयी है इसके रहस्य को समझना आसान ही नही बड़ा ही कठिन है |
इस कायनात के एहसास के अभिव्यक्ति को महसूस करने के उसने मानव  स्वरूप को गढा  उसने दो स्वरूपों में और इस कायनात में  उसकी सबसे खुबसूरत रचना है '' नारी '' अनादि - काल से आधुनिक काल  तक के सफर में नारी का सौन्दर्य लोगो को आकर्षित करता रहा है | ऐसा ही आकर्षण भारतीय सिनेमा जगत के रुपहले परदे पर अपनी दिलकश अदाओं से पूरे भारतीय समाज को दीवाना बनाने वाली न जाने कितनी अभिनेत्रिया हुई लेकिन चालीस के दशक में एक ऐसी कायनात की रचना हुई  बला की खुबसूरत -- कुदरत खुद ही अगर उसे देख ले तो दीवाना हो जाए ऐसी अभिनेत्री हुई जिसे सुन्दरता की महारानी  के खिताब से नवाजा गया उस सुन्दरता की महारानी का नाम था '' नसीम बानो ''
  4 जुलाई 1916 जन्मी नसीम बानो अपने में बेमिशाल थी शाही परिवार में पैदा  हुई थी उनकी परवरिश शाही अंदाज में हुआ बचपन से ही वह पढने के लिए स्कूल पालकी में जाया करती थी | नसीम बानो की खूबसूरती का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उनको किसी की नजर न लगे इसलिए उन्हें पर्दे में रखा जाता था |
उनका रुपहले पर्दे पे आना महज एक इतेफाक है नसीम बानो अपनी स्कूल की छुट्टिया  मानने अपनी माँ के पास आई थी उन्हें फिल्मो की शूटिंग  देखने का बड़ा शौक था | एक बार  अपनी अम्मीजान के साथ फिल्म '' सिल्वर किंग '' की शूटिंग देखने गयी |
उस फिल्म की शूटिंग देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गयी उन्होंने अपने दिल में निश्चय किया कि वह बतौर अभिनेत्री अपना सिने कैरियर बनाएगी |
जब नसीम बानो शूटिंग देख रही थी तब उस स्टूडियो में कई फिल्मकार उनकी सुन्दरता को निहार रहे थे बहुत से निर्देशकों ने उनके सामने अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव रखा पर उनकी माँ ने यह कहकर उन सारे प्रस्ताव को ठुकरा दिया अभी नसीम बच्ची है | नसीम बानो की माँ का सपना था कि मेरी बेटी डाक्टर बने | पर किस्मत को नसीम बानो  के साथ तो कुछ और करना था इसी दौरान फिल्म निर्माता '' सोहराब मोदी '' ने अपनी फिल्म '' हेमलेट '' के लिए बतौर अभिनेत्री नसीम बानो के सामने प्रस्ताव रखा लेकिन इस बार भी उनकी माँ ने इनकार कर दिया  पर नसीम बानो इस बार अपनी जिद पर अड़ गयी कि उसे अभिनेत्री बनना है अपने माँ को मनाने के लिए उन्होंने बहुत बड़ा कदम भी उठा लिया घर में ही वह भूख हडताल पर बैठ गयी जिसके कारण उनकी माँ को नसीम बानो के आगे झुकना  पडा उन्होंने नसीम को इस शर्तट पर काम करने की इजाजत दे दी कि वह केवल स्कूल की छुट्टियों के दिनों में अभिनय करेगी | 1935 में जब फिल्म ' हेमलेट '' प्रदर्शित हुई और यह फिल्म उस समय जबर्दस्त सुपर हिट हुई इस फिल्म से ज्यादा दर्शको को नसीम बानो और उनके अभिनय ( अदा ) को सराहा गया  |  इस फिल्म की कामयाबी ने उनको फ़िल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया | सभी फिल्मकार  नसीम को अपने फिल्म में काम करने के गुजारिश करने लगे | इन सब बातो को देखते हुए  उन्होंने अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और खुद सदा के लिए सिने- जगत  में  अपने आपको समर्पित कर दिया |
फिल्म ' हेमलेट '' के बाद नसीम बानो की दूसरी फिल्म '' खा बहादुर '' फिल्म के प्रचार के वक्त उन्हें सुन्दरता की महारानी के रूप में प्रचारित किया गया यह फिल्म  भी सुपरहिट हुई | इसके बाद '' डायबोर्स '' '' मीठा जहर '' और वासन्ती जैसी फिल्मे कामयाब रही | वर्ष 1939 में फिल्म '' पुकार '' नसीम बानो के सिने-- कैरियर में अहम फिल्म साबित हुई | फिल्म में चन्द्रमोहन सम्राट जहागीर की भूमिका में थे , जबकि नसीम बानो ने नुरजहा की भूमिका निभायी थी | ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में नसीम बानो  ने अपने ही सारे गीतों को गाया  था और इसके लिए उन्हें लगभग दो वर्ष तक रियाज करना पड़ा था | नसीम बानो का गाया  यह गीत '' जिन्दगी का साज भी क्या साज है '' आज भी पुराने फिल्म दर्शको के बीच  लोकप्रिय है |
फिल्म '' पुकार के बादनसीम बानो की शोहरत  बुलन्दियो पर पहुच गयी | नसीम बानो ने जितनी भी फिल्मे की वो सब सफल रही उनके दमदार अभिनय को दर्शको ने खुले  मन से स्वीकार किया | इस बीच नसीम बानो ने चुनौती पूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी | इसी क्रम में नसीम बानो ने फिल्म '' शीश महल '' में एक जमीदार की स्वाभिमानी लड़की कि भूमिका को बड़े ही करीने और भावपूर्ण तरीके से निभाया | इसके साथ ही '' उजाला में उन्होंने एक रंगमंच की अभिनेत्री की भूमिका निभायी , जिसे शास्त्रीय नृत्य और संगीत पसन्द है इसके बाद उन्होंने '' बेताब '' चल चल रे नौजवान '' बेगम '' चाँदनी रात '' मुलाकाते '' बागी ' जैसे सुपरहिट फिल्मो के जरिये सिने प्रेमियों का मन मोह लिया | साठ के दशक में प्रदर्शित फिल्म '' अजीब लड़की '' बतौर अभिनेत्री नसीम बानो की आखरी फिल्म थी | इस फिल्म के बाद उन्होंने सिने-- जगत से सन्यास ले लिया | इसकी मुख्य वजह थी उनके बेटी '' सायरा बानो '' उस समय सायरा बानो फिल्म इण्डस्ट्रीज में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत थी और अपनी बेटी से नसीम बानो अपनी तुलना नही करना चाहती थी | इसीलिए नसीम बानो ने निश्चय किया कि वह अपनी बेटी के साइन कैरियर को सजाने - सवारने के लिए अब फिल्मो में काम नही करेगी |
साठ और सत्तर के दशक में नसीम बानो ने बतौर ड्रेस डिजानर फिल्मइण्डस्ट्रीज में काम  करना शुरू कर दिया | अपनी पुत्री सायरा बानो की अधिकाश फिल्मो में ड्रेस डिजाइन नसीम बानो ने किया | जिसमे यह फिल्मे शामिल है '' अप्रैल फूल '' '' पड़ोसन '' '' झुक गया आसमान '' '' पूरब और पश्चिम '' '' ज्वार - भाटा '' '' विक्टोरिया नम्बर 203  ' पाकेटमार '' चैताली '' बैराग '' और काला आदमी शामिल है | लगभग चार दशक तक सिने--- प्रेमियों को अपनी दिलकश अदाओ से दीवान बनाने वाली अद्वितीय सुन्दरी नसीम बानो 18 जून 2002 को इस खुबसूरत कायनात को अलविदा करके अपनी रूह की दुनिया में विलीन हो गयी आज वो हमारे बीच नही है पर हम आज भी  उस  अद्वितीय सुन्दरी को फिल्मो के रुपहले पर्दे पर देख सकते है |
आज पुण्यतिथि है '' सुन्दरता की महारानी नसीम बानो '' की
-sunil kumar dutta's profile photoसुनील दत्ता
स्वतंत्र प्रकार
समीक्षक

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