बुधवार, 25 जून 2014

कब धुलेगा मेरठ के माथे से ‘दंगों के शहर’ का कलंक

 ऐेतिहासिक शहर मेरठ। इस शहर को इस बात पर बहुत नाज है कि भारत की जंग-ए-आजादी की पहली चिंगारी इसी शहर से भड़की थी। जंग-ए-आजादी की लड़ाई में शहीद होने वालों की फेहरिस्त गवाह है इस बात की कि हिंदुस्तान को आजादी दिलाने में 10 मई 1857 से लेकर 15 अगस्त 1947 तक हिंदुओं और मुसलमानों ने बराबर की कुरबानियाँ दी थीं। मेरठ के लोगों को इस पर नाज है कि हमने ही सबसे पहले देश को आजाद कराने के लिए  लड़ाई शुरू की थी। नाज तो इस पर भी है कि हम दुनियाभर में खेलों का सामान भेजते हैं। बेहतरीन कपड़ा बुनते हैं। पूरी दुनिया हमारी रेवड़ी और गजक की दीवानी है। कैंचियाँ भी मेरठ शहर की पसंद की जाती हैं। इतराते तो इस बात पर भी हैं कि क्रांतिकारी शायर हफीज मेरठी इसी सरजमीं पर पैदा हुए थे, तो कवि हरिओम पवार का नाम भी मेरठ शहर से ही जुड़ा है। न जाने कितनी हस्तियाँ इस शहर से वाबस्ता रहीं, जिनके नाम से मेरठ को पहचाना जाता है। अगर इन बातों पर गर्व है, तो मेरठ को इस बात पर शर्मिंदगी भी महसूस करनी चाहिए कि दुनियाभर में इसी शहर के लोगों ने इस शहर को ‘दंगों का शहर’ के लिए भी कुख्यात किया है। किसी दूसरे शहर में जब कोई यह बताता है कि मेरठ से ताल्लुक रखता हूँ, सामने से जवाब आता है कि वहाँ सांप्रदायिक दंगे बहुत होते हैं। कहते हैं कि मेरठ नए मिजाज का शहर है। वाकई ऐसा ही है। यहाँ किस बात पर कब दंगा भड़क जाएगा, कहना मुश्किल है। इसी शहर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ अंडा फूटने पर भी दंगा हो जाता है। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। 1993 में मात्र अंडा फूटने पर दंगा भड़क उठा था। दरअसल, सियासत ने मेरठ में कुछ इस तरह की साजिशें रची हैं कि उनसे पार पाना मुश्किल लग रहा है। इंसानों को हिंदू मुसलमान में बाँट दिया गया। आबादियाँ बाँट दी र्गइं। यहाँ तक कि दिलों का बँटवारा करने की नापाक कोशिशें भी की जाती हैं। जब-जब यह लगता है कि अब मेरठ के लोग छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, तब-तब सियासत ऐसी चाल चलती है कि हिंदुओं और मुसलमानों को आमने-सामने कर दिया जाता है। मेरठ खूंरेज दंगों के लिए याद किया जाता है। 1968 में जब जम्मू कश्मीर के वजीर ए आज़म रहे स्वर्गीय शेख अब्दुल्लाह मेरठ आए थे, तो मेरठ सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसा था। इसके बाद सितंबर 1982 में मंदिर-मजार विवाद के चलते मेरठ ने लगभग तीन महीने कफ्र्यू की मार झेली थी। इसी दंगे में उत्तर प्रदेश की पीएसी का सांप्रदायिक चेहरा तब सामने आया था, जब यहाँ की फिरोज बिल्डिंग पर सीधी फायरिंग करके कई मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया था। सरकार कांग्रेस की थी। बहुत शोर-शराबा हुआ। जाँच आयोग गठित कर दिया गया, लेकिन दोषियों (पीएसी) का कुछ नहीं बिगड़ा। रिपोर्ट में क्या था, इस पर धूल जम गई। मई 1987 में  हुआ दंगा सबसे ज्यादा खूरेंज था। पीएसी ने सभी सीमाएं लांघ कर हाशिमपुरा से मुसलमानों को घर से निकालकर ट्रकों में भरा और उन्हें मुरादनगर (गाजियाबाद) गंगा नहर पर ले जाकर सीधे गोली मारकर नहर में बहा दिया। मलियाना में भी पीएसी ने कहर बरपाया और 73 लोगों की जान ले ली थी। दुनियाभर में इन हत्याकांडों की गूंज हुई, लेकिन सजा किसी को आज तक नहीं मिली। मलियाना कांड की जीएल श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट कहाँ दफन कर दिया गया, कोई नहीं जानता। मलियाना कांड पर सबसे ज्यादा राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव और आज़म खान की जुबान पर भी ताले लग गए। 1987 के खूंखार दंगों के निशान अभी पूरी तरह से मिटे नहीं हैं। वे लोग उन दिनों को याद करते हुए काँप उठते हैं, जिन्होंने उन दंगों को झेला और जिसकी आग में कितनों के अपने जल मरे।
    राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के चलते नवंबर 1990 में और मई 1991 में भी मेरठ ने खूनी दंगों की दास्तान लिखी। 1991 में मेरठ के निगार सिनेमा में दंगाइयों ने 14  मुसलमानों को मार डाला। इंसाफ के नाम पर कुछ नहीं मिला। उल्टा इस कांड के आरोपियों को हमेशा बचाया गया। इसके बाद हर साल दो साल के अंतराल में छोटे-मोटे दंगे होते रहे। इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली बात क्या होगी कि इस साल जिस सुबह मेरठ 10 मई 1857 के शहीदों को याद कर रहा था, दोपहर तक सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस गया। मेरठ अपने माथे पर एक और दंगे का दाग लगवा बैठा। कभी-कभी लगता है कि इस शहर के लोग इतने परिपक्व हो गए हैं कि यह कलंक धुल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। हाँ, इतना शऊर तो आया है कि अब दंगा शहर के दूसरे इलाकों तक नहीं पहँुचता। ऐसा इसलिए हुआ है कि अब लोग दंगों की सियासत को समझ गए हैं। 1991 तक यह होता था कि शहर में कोई सांप्रदायिक हिंसा की वारदात होते ही फौरन शहर के कई हिस्सों में चाकूबाजी और आगजनी की वारदातें शुरू हो जाती थीं। जिससे दंगा का दायरा विस्तार पा जाता था और पूरा शहर कफ्र्यू की जद में आ जाता था।
    इसे भी समझना जरूरी है कि दंगा अब पूरे शहर में क्यों नहीं फैलता? दरअसल, सांप्रदायिक संगठन हमेशा ही दंगों में दलित जातियों का इस्तेमाल करते थे। पैसा देकर उन्हें उकसाया जाता था। लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा के उभार के बाद दलित-मुस्लिम समीकरण बनने के बाद दलित जातियों को समझ में आ गया है कि हमें दंगों की सियासत के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसलिए वे अब सांप्रदायिक संगठनों के बहकावे में नहीं आते। हालांकि कभी-कभी जेहाद के नाम पर तो कभी गौ हत्या के नाम पर मेरठ की जनता को भड़काया जाता है। सांप्रदायिक संगठन ऐसे-ऐसे भड़काऊ पर्चे बाँटते हैं कि दंगा होने में देर नहीं लगे, लेकिन अब लोग समझ गए हैं कि यह सब उकसाने के लिए किया जा रहा है। 10 मई को जिस  तीरगरान इलाके में प्याऊ को लेकर भारी बवाल हुआ, उस पर पहले से ही विवाद है। विवाद भी नया नहीं, बहुत पुराना है। 1952 से मामला कोर्ट में है और कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दे रखे हैं। यह सवाल मौजूं है कि विवादित जगह पर किसी भी तरह का निर्माण किया ही क्यों जा रहा था? बेहतर तो यह होता कि दूसरे पक्ष की सहमति से कोई निर्णय लिया जाता। यह ठीक है कि पानी प्याऊ का निर्माण किया जा रहा था। इसके बावजूद भी दूसरे पक्ष की सहमति लेनी जरूरी तो थी ही। यदि निर्माण हो भी रहा था, तो दूसरे पक्ष को कानून का सहारा लेकर उसे रुकवाना चाहिए था। आखिर देश में कानून नाम की भी कोई चीज है या नहीं? खुद ही फैसला करने की जिद का नतीजा बड़े बवाल के रूप में सामने आया है। अविश्वास के घटाटोप अंधकार में ऐसा नहीं है कि उजाले की उम्मीद की कोई किरण है ही नहीं। जब अखबारों में हिंसा की खबरों के बीच ऐसी खबर नजर में आती है, जो यह बताती है कि कैसे दंगाइयों के बीच फँसे बच्चों या बड़ों को निकाला गया, तो लगता है कि हमारी आँखों का पानी अभी पूरी तरह खुष्क नहीं हुआ है। आँखों के कहीं किसी कोने में नमी बाकी है, जो उम्मीद की लौ जलाए रखने में मदद करती है। आपसी सौहार्द की खबरें  हौसला देती हैं कि मेरठ में ऐसे इंसान भी रहते हैं, जो नहीं चाहते कि मेरठ ‘दंगों के शहर’ के रूप में कुख्यात रहे।
   -सलीम अख्तर सिद्दीकी
मोबाइल: 09045582472
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा -1655 में दिया गया है
आभार