शनिवार, 28 जून 2014

बाकी हैं अभी पत्तों पे जले तिनकों की तहरीरें

मई 14 में सम्पन्न हुए लोकसभा घटना पूर्ण उत्तेजक चुनाव के परिणामों से कुछ और साबित हुआ हो या न हुआ हो यह तो लगभग सिद्ध हो ही गया हे कि इस महान देश की जनता के बड़े हिस्से को धर्मनिरपेक्षता अथवा साम्प्रदायिकता की कोई चिंता नहीं। जबकि धर्मनिरपेक्षता का राजनैतिक सामाजिक दर्शन संघर्षशील जनता ही का हथियार है। उसकी जितनी उपयोगिता दलित, दमित, वंचित वर्गों के लिए है, उतनी साधन सम्पन्न वर्गों के लिए नहीं। इतिहास इसे बार-बार प्रमाणित करता रहा है। हाल के चुनाव में कारपोरेट सेक्टर, देशी धन्ना सेठों ने जिस भामाशाही अन्दाज में पार्टी विशेष के लिए अपनी तिजोरियों के दरवाजे खोल दिए वह भी इसी यथार्थ को प्रमाणित करता है। इसके विपरीत सामाजिक समानता, न्याय के सिद्धांत तथा अवामी एकता के प्रबल पक्षधर लोग, संगठन ही प्रमुख रूप से इस दर्शन का पक्ष लेते रहे हैं। उन्होंने इस लक्ष्य को पाने के लिए कठिन संघर्ष किया, आज भी कर रहे हैं। धर्म निरपेक्षता अवाम के सभी हिस्सों के बीच मजबूत एकता का आवश्यक सिद्धांत है। यह सहसा या ईश्वरीय आदेश नहीं है कि देश की आजादी के बाद ही से साम्प्रदायिक विभेदकारी शक्तियाँ, सरकारों की जनविरोधी नीतियों के पक्ष में खड़ी होती रही हैं। जब कभी वे सत्ता में आईं तो उन्होंने उन्हीं नीतियों का अनुसरण भी किया। यहाँ तक कि वे ऐसी नीतियों कार्यवाइयों के प्रति अधिक उत्साही व उदार नजर आईं। दुःखद घटनाओं की यादें अभी पूरी तरह धूमिल नहीं हुई हैं जिनके कारण अवाम के संकटों से घिरे वर्गों को कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ा। दो भिन्न धार्मिक सामाजिक पहचान वाले वर्गों के बीच हिंसक टकराव की स्थितियों का निर्मित होना, फिर उनका भयावह तबाही के यथार्थ का रूप ले लेना अन्ततः किसके हित साधने के काम आता है, आजाद भारत के अनेक दंगों के समान गुजरात एवं जमशेदपुर दंगे भी इसका साक्ष्य प्रस्तुत कर चुके हैं। समय की शिला पर मासूम इंसानों के रक्त से लिखी इबारत बताती है कि इन दंगों में इंसानी प्राणों की बलि ही नहीं चढ़ी, बहुत कुछ जो मूल्यवान व महत्वपूर्ण था, वह भी नष्ट हुआ। देश के मेहनतकश वर्गों, जिनमें छोटे किसान, कुटीर उद्योगों में लगे लोग तथा तमाम तरह के मजदूर शामिल हैं, उनकी तबाही ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही से अधिक गति पकड़ी। निजी उद्योग पतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली लूट की छूट का इतिहास वहीं से आरंभ होता है। आर्थिक नीतियों में बड़े बदलावों का प्रस्थान बिन्दु भी वही है। एक ओर सबको साथ ले चलने, सबका हित  साधने का दावा दूसरी ओर ऐसी रणनीति को अपनाना कि सबसे अधिक सीटों वाले महाप्रदेश से दूसरे सबसे बड़े समुदाय का एक भी प्रतिनिधि लोकसभा के लिए न चुना जा सके, आबादी के अनुपात में संसद में बहुत कम प्रतिनिधित्व मिल पाना, इस समुदाय को हताश करने वाली स्थिति के प्रति राजनैतिक, सामाजिक व बौद्धिक हलकों में किसी तरह की बेचैनी के लक्षण प्रकट न होना, किन गंभीर खतरों की ओर संकेत कर रहा है, इसे बआसानी समझा जा सकता है। मंत्री मण्डल में देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय को न्यूनतम प्रतिनिधित्व मिलना समुदाय को निराश करने वाली स्थिति है। इस निराशा को निकट भविष्य में होने वाले चुनावों के माध्यम से कम किया जा सकता है। बनने को तो राज्य सभा भी माध्यम बन सकती है। असल चीज तो नीयत व इरादे हैं। किन्हीं भी कारणों से सत्ताधारी दल को वोट न दे सकने वाले मतदाताओं के प्रति अरुचि अथवा कटुता का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे चुनाव अभियान का धार्मिक प्रतीकों से आरंभ होना, जैसे गंगा स्नान या आरती के दृश्य, जाहिर सी बात है इनसे धार्मिक भावनाओं का उद्वेलित होना स्वाभाविक ही था और वह हुई जिसकी परिणति धर्म निरपेक्ष देश के प्रमुख के शपथ ग्रहण समारोह में धार्मिक नारों की गूँज तथा धार्मिक नेताओं की उपस्थिति के रूप में दिखाई पड़ी। वह मूल्य और परम्पराएँ जो हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं तथा सभी वर्गों द्वारा समादृत हैं, उनके ध्वंस के उपक्रम से बचना राष्ट्रीय दायित्व के समान है। कहा जा सकता है कि एन0डी0ए0/भाजपा की भारी जीत के पीछे राजनैतिक संस्कृति में बदलाव की इच्छा के साथ ही धार्मिक भावनाओं की आवेगमयिता की भी उपस्थिति रही है। सामाजिक धु्रवीकरण ने निश्चय ही अपना काम किया है। सरकार बनने के बहुत छोटे अन्तराल के बाद ही राम मन्दिर तथा धारा 370 का मुद्दा उठने-गर्माने का संकेत तो यही है कि भाजपा अपनी पुरानी कार्य पद्धति में कोई बड़ी तब्दीली नहीं करने जा रही है जो अन्ततः कांग्रेस तथा दूसरे जातिवाद कथ्य की सेक्युलर संरचना वाली पार्टियों के काम आएगा ही। इस यथार्थ की उपेक्षा कर पाना संभव नहीं है कि मुसलमानों द्वारा कांग्रेस को वोट देने का दबाव, स्वयं कांग्रेस ने नहीं बल्कि भाजपा ने बनाया, ठीक उसी तरह जैसे मुसलमानों पर धार्मिक नेतृत्व थोपने के पीछे जैसी सक्रियता राजनैतिक दलों, (वामपंथियों को छोड़कर) की रही वैसी कोई कोशिश या इच्छा स्वयं मुसलमानों के भीतर से उठती हुई नहीं दिखाई पड़ी। मुसलमानों की बहुसंख्या ने धार्मिक नेतृत्व, मौलवी मुल्ला को मुँह लगाया भी नहीं। उन्होंने आम तौर पर अपने विवेक से मतदान किया। जाति तथा धर्म के नाम पर उन्होंने कभी मतदान किया भी नहीं। यहाँ तक कि वह अपनी तबाही को संभव करने वाले दल के साथ भी खड़े हुए। बहुधा वह मुख्य धारा के साथ रहे। इस तथ्य की ओर ध्यान जाना चाहिए कि प्रचण्ड बहुमत के बावजूद सत्ताधारी गठबंधन तीस से तैंतीस प्रतिशत मतदाताओं का ही विश्वास प्राप्त कर सका । 70 प्रतिशत मतदाता अब भी उससे सहमत नहीं हंै तो क्या 70 प्रतिशत मतदाताओं को दण्डित किया जाएगा। यदि नहीं तो शिक्षा, सेवा क्षेत्र, व्यापार तथा विधान सभाओं एवं संसद में उनका प्रतिशत में अपेक्षित वृद्धि के लिए विशेष अभियान चलाया ही जाना चाहिए। वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन ऐसा कर पाने में सक्षम है बस उसे अच्छे दिन के वायदे को याद रखने की जरूरत है।














 -शकील सिद्दीकी
मो.09839123527
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-06-2014) को "सबसे बड़ी गुत्थी है इंसानी दिमाग " (चर्चा मंच 1660) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'