गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम ---6

हिन्दू राष्ट्र की ओर..
    मेरी जल्दी ही पदोन्नति हो गई, मैं मुख्य शिक्षक से कार्यवाह बना दिया गया, दोनों ही नियुक्तियाँ जबानी ही थी, किसी प्रकार का लिखित आदेश नहीं, जब स्वयंसेवकों को ही सदस्यता की कोई रसीद या पहचान पत्र देय नहीं है तो पदाधिकारियों को भी उसकी क्या जरुरत है? मैंने पूछा था इस बारे में भी तो जवाब मिला कि संघ में इस प्रकार की कागजी खानापूर्ति के लिए समय व्यर्थ करने की परम्परा नहीं है।
    खैर, कार्यवाह बनने के बाद मेरी जिम्मेदारियों में प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तरीय बैठकों में भाग लेना भी शामिल हो गया, जब मैं पहली बार दो दिवसीय बैठक में भाग लेने तहसील मुख्यालय मण्डल गया, तो साथ में बिस्तर, गणवेश, लाठी और खाने के लिए थाली कटोरी भी साथ ले जानी पड़ी। किराया भी खुद देना पड़ा और बैठक का निर्धारित शुल्क भी चुकाना पड़ा। रात का खाना भी घर से बाँधकर ले गया। दूसरे दिन भोर में तकरीबन 5 बजे विसल की आवाज से नींद खुली, नित्यकर्म से निवृत होने के बाद संस्कृत में प्रातः स्मरण
मधुर समवेत स्वरों में दोहराया गया, प्रातःकालीन शाखा लगी, दिन में पूरे प्रखण्ड में आरएसएस के काम का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। भोजन और बौद्धिक सत्र चले, अलग-अलग समूहों में बैठकर राष्ट्र की दशा और दिशा पर गंभीर चर्चा हुई, इस दो दिन के एकत्रीकरण से मुझे स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्र निर्माण का कार्य ‘मानवीय’ न होकर  ‘ईश्वरीय’ कार्य है, इसमंे काम करने का अवसर बिरले और नसीब वाले लोगों को ही मिलता है, संघ कोई संस्था नहीं है, यह तो व्यक्ति निर्माण का कारखाना है। जिससे हम जैसे संस्कारवान युवाओं का निर्माण हो रहा है, जिला स्तर से आए प्रचारक जी और संघ चालक जी ने बहुत ही प्रभावी उद्बोधन दिया, उनका एक-एक वाक्य मुझे वेद वाक्य लगा, कितने महान और तपस्वी लोग है ये, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया, मैंने भी मन ही मन निश्चय कर लिया कि अपना जीवन भी संघ के पवित्र उद्देश्यों को पूरा करने में लगाऊँगा। मैंने जीवन व्रती प्रचारक बनने की ठान ली।
हमें प्रचारक चाहिए विचारक नहीं
    घर परिवार त्याग कर सन्यासी की भाँति जीवन जीते हुए राष्ट्र सेवा में स्वयं को समर्पित करने के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बनने की अपनी इच्छा को मैंने संघ के जिला प्रचारक जी के समक्ष रखा, उनके द्वारा दिए गए लम्बे जवाब में से दो बातें अब तक मुझे जस की तस याद है।
मैं: भाई साहब मैं प्रचारक बनना चाहता हूँ।
जिला प्रचारक: बन्धु, आपके विचार तो बहुत सुन्दर हैं, लेकिन दृष्टि समग्र नहीं है, आज उत्साह में हो तो प्रचारक बन जाना चाहते हो, लेकिन हमारा समाज काफी विषम है, कल कोई आपसे नाम पूछेगा, गाँव पूछेगा और अंततः समाज (जाति) भी पूछेगा और अगर उन्हें पता चला कि ये प्रचारक जी तो वंचित (दलित) समुदाय से आए हैं, तो उनका व्यवहार बदल सकता है, तब अपमान का घूँट भी पीना पड़ेगा, मुझे मालूम है, आप यह नहीं सह पाओगे, दुखी हो जाओगे, प्रतिक्रिया करने लगोगे, वाद विवाद होगा, इससे संघ का काम बढ़ने के बजाए कमजोर हो जाएगा, इसलिए मेरा सुझाव है कि आप प्रचारक नहीं विस्तारक बन कर थोड़ा समय राष्ट्र सेवा में लगाओ।
    जिला प्रचारक के इस जवाब से मैं बहुत दुखी हुआ, मुझे अपने निम्न समाज में पैदा होने पर कोफ्त होने लगी, पर इसमें मेरा क्या कसूर था? यह कैसी विडम्बना थी कि मैं अपना पूरा जीवन संघ के ईश्वरीय कार्य हेतु समर्पित करना चाहता था, लेकिन मेरी जाति इसमें आड़े आ रही थी, पर यह सोच कर मैंने खुद को तसल्ली दी कि महर्षि मनु के विधान के मुताबिक हम सेवकाई करने वाले शूद्र समुदाय हैं, अभी सम्पूर्ण हिन्दू समाज में हमारी स्वीकार्यता नहीं बन पाई है, खैर, कोई बात नहीं है, संघ सामाजिक समरसता के लिए प्रयासरत तो है ही, जल्दी ही वह वक्त भी आ जाएगा, जब मेरे जैसे वंचित समुदाय के स्वयंसेवक भी पूर्णकालिक प्रचारक बन कर अपना जीवन राष्ट्र सेवा में लगा पाएँगे, ये वे दिन थे जब मैंने लिखना शुरू कर दिया था, मैं शुरू शुरू में उग्र राष्ट्रभक्ति की कविताएँ लिखता था, मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका ‘हिन्दू केसरी’ का पाकिस्तान मिटाओ अंक भी निकाला था, स्थानीय समाचार पत्रों में राष्ट्र चिंतन नाम से स्तम्भ लिखने लगा था, कई शाखाओं में गणवेश धारण किए हुए जाकर बौद्धिक दे आया था मैंने खुद को हिंदूवादी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी थी, फिर भी मैं महसूस करता था कि मुझे वह स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है, जिसका मैं हकदार था, लेकिन उस दिन प्रचारक बनने के सवाल पर जो उनकी दूसरी बात थी, उसने मुझे अपनी औकात दिखा दी, प्रचारक जी ने मेरे सिर की तरफ इशारा करके मेरी बुद्धिजीविता का मखौल उड़ाते हुए साफ तौर पर कह दिया कि-आप जैसे ज्यादा सोचने वाले लोग केवल अपनी गर्दन के ऊपर-ऊपर मजबूत होते है, शारीरिक रूप से नहीं, वैसे भी संघ को ‘प्रचारक’ चाहिए, जो नागपुर से कही गई बात को वैसा का वैसा हिन्दू समाज तक पहँुचाए, आप की तरह के सदैव सवाल करने वाले विचारक हमें नहीं चाहिए और इस तरह मैं विचारक से प्रचारक बनते बनते रह गया।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

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