गुरुवार, 14 अगस्त 2014

क्या 'हिन्दू' हमारी राष्ट्रीय पहचान है ?

सन् 1980 के दशक से पहचान.आधारित राजनीति ने हमारे देश में जड़ें जमानी शुरू कीं। शाहबानो मामले,राममंदिर की समस्या और रथयात्राओं ने पहचान पर आधारित मुद्दों को देश के सामाजिक.राजनीतिक रंगमंच के केन्द्र में ला दिया। इस राजनीति का सबसे पहला बड़ा शिकार बनी बाबरी मस्जिद। कुछ लोग गंभीरतापूर्वक यह विश्वास करने लगे कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और 'हम सब हिन्दू हैं' के नारे की गूंज जगह.जगह सुनाई देने लगी। हाल में, मोदी.भाजपा को लोकसभा में बहुमत मिलने के बाद से यह मुद्दा और जोरशोर से उठाया जा रहा है। सन् 1990 में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं.मुसलमान, अहमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रीस्टी हिन्दू हैं और जैन, सिक्ख और बौद्ध तो हिंदू हैं ही। आरएसएस यह मानता है कि बौद्ध, सिक्ख और जैन धर्म, हिन्दू धर्म के पंथ हैं। यह अलग बात है कि कुछ समय पूर्व, जब तत्कालीन सरसंघचालक के. सुदर्शन ने यह कहा था कि सिक्ख, अलग धर्म नहीं वरन् हिन्दू धर्म का पंथ मात्र है तो इसके खिलाफ पंजाब में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए थे। मोदी के सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद से, आरएसएस बार.बार,लगातार यह दोहरा रहा है कि सभी भारतीयों को स्वयं को हिन्दू कहना चाहिए। अंग्रेजी की कहावत है कि कुछ लोगों को जब झुकने को कहा जाता है तो वे दंडवत करने लगते हैं। इसी तर्ज पर, गोवा के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता फ्रांसिस डिसूजा ने कहा कि सभी ईसाई, हिन्दू हैं। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि 'सारी दुनिया भारतीयों को हिन्दू मानती है इसलिए भारत, हिन्दू राष्ट्र है। यह बहुत साधारण सी बात है। जिस तरह ब्रिटेन में रहने वाले ब्रिटिश हैं, जर्मनी के सभी निवासी जर्मन हैं और अमेरिका के सभी नागरिक अमरीकी हैं उसी तरह हिन्दुस्तान के सभी रहवासी हिन्दू हैं।' हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म जैसी दो नितांत अलग.अलग चीजों का मिश्रण करते हुए उन्होंने कहा, 'सारे भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिन्दुत्व है और इस वर्तमान में इस देश में रहने वाले सभी लोग एक ही महान संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।' इस तरह के दावों के पीछे असली राजनीतिक एजेण्डा क्या है, इसकी पोल खोलते हुए गोवा के सहकारिता मंत्री दीपक धावलीकर ने विधानसभा में कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतए हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर उद्यत है।
सच यह है कि हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र ये तीनों अलग.अलग चीजें हैं और इनका राजनैतिक निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है। इन तीनों अवधारणाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। हिन्दू धर्म के बारे में जो दावे किये जा रहे हैं, उनकी वर्तमान संदर्भों में पड़ताल अपेक्षित है। हिन्दू शब्द के उदय की कहानी लंबी है। समय के साथ इस शब्द के अर्थ और संदर्भ बदलते रहे हैं। हिन्दू धर्म का राजनैतिक संस्करण हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व का राजनैतिक लक्ष्य, हिन्दू राष्ट्र है। इन तीनों शब्दों को संघ परिवार ने अपने राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा बना लिया है।
यह दिलचस्प है कि जिन ग्रंथों को हिन्दू धर्मग्रंथ कहा जाता है, उनमें भी 8वीं सदी ईस्वी तक, हिन्दू शब्द का जिक्र नहीं मिलता। दरअसल, हिन्दू शब्द अस्तित्व में तब आया जब अरब और मध्यपूर्व से मुसलमान यहां पहुंचे। उन्होंने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। इस प्रकार, हिन्दू मूलतः एक भौगोलिक अवधारणा है। यही कारण है कि दुनिया के कुछ हिस्सों, विशेषकर पश्चिम एशिया में आज भी भारत को हिन्दुस्तान कहा जाता है। भागवत का यह कहना गलत है कि पूरी दुनिया में भारत को हिन्दुस्तान नाम से पुकारा जाता है। केवल सऊदी अरब और पश्चिम एशिया में यह शब्द प्रचलन में है। सऊदी में आज भी भारत से जाने वाले हाजियों को हिन्दी कहा जाता है और सऊदी अरब की स्थानीय भाषा में गणित को हिन्दसा ;हिन्द से आया हुआ; कहा जाता है।
समय के साथ हिन्दू, भौगोलिक के स्थान पर धार्मिक अवधारणा बन गया और सिंधू नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों की धार्मिक परंपराओं और कर्मकाण्डों को हिन्दू कहा जाने लगा। यह दावा कि प्राचीन भारत में हिन्दू संस्कृति का बोलबाला था, बेबुनियाद है। सिंधू घाटी की सभ्यता, देश के दूसरे इलाकों की सभ्यता व संस्कृति से एकदम भिन्न थी। शुरूआत में आर्य पशुपालक थे परंतु बाद में उन्होंने एक जगह रहकर खेती करना और राज्यों व साम्राज्यों की स्थापना करना शुरू कर दिया। भारत में पहले से रहने वाले आदिवासियों की अपनी एक अलग संस्कृति थी। उसी तरह, ब्राह्मणवादी व बौद्ध परंपराएं एकदम अलग.अलग थीं। जहां ब्राह्मणवाद जन्म.आधारित जातिगत ऊँचनीच में विश्वास करता था वहीं बौद्ध धर्म इसका विरोधी था। यह कहना कि पूरे प्राचीन भारत में एक सी संस्कृति थी, एकदम गलत है। हम सब जानते हैं कि संस्कृति, नए लोगों के किसी स्थान पर बसने और उस स्थान पर रहने वाले लोगों के दूसरी जगह जाने से परिवर्तित होती रहती है।
हिन्दुत्व शब्द का उदय 19वीं सदी में हुआ जब उभरते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के विरूद्ध सांप्रदायिक राजनीति ने मोर्चा संभाला। जब सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तब मुसलमान और हिन्दू, दोनों धर्मों के सामंती तत्वों ने इसका विरोध किया और अपनी सांप्रदायिक सोच को हवा दी। हिन्दू संप्रदायवादियों की सोच को ही मोटे तौर पर हिन्दुत्व कहा जाता है। इस विचारधारा को आकार देने में सावरकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ने ही सबसे पहले सन् 1924 में हिन्दू शब्द की परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि हिन्दू वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनो भारत हैं। इस तरह ईसाई और मुसलमान, अपने आप हिन्दू धर्म की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू वह है जो आर्य है, ब्राह्मणवादी संस्कृति में विश्वास रखता है और हिमालय से लेकर समुद्र तक फैले भूभाग में रहता है। सावरकर ने ही हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को आकार दिया। इस अवधारणा को 1925 में आरएसएस ने अपने लक्ष्य के रूप में अपना लिया। हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य से एकदम भिन्न था। राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत का निर्माण करना था।
यह बार.बार कहा जा रहा है कि हम सब को अपने आप को इसलिए हिन्दू कहना चाहिए क्योंकि हिन्दू,दरअसल, कोई धर्म नहीं बल्कि जीने का तरीका है। और इस देश के सभी निवासी एक ही तरह से जीते हैं। यह लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल है। कोई मुस्लिम भी यह कह सकता है कि इस्लाम,धर्म नहीं वरन् जीवन पद्धति है। यह स्पष्ट है कि केवल धर्म, जीवनपद्धति नहीं हो सकता। जीवनपद्धति धर्म से अधिक विस्तृत अवधारणा है और इसमें भाषा, स्थानीय संस्कृति आदि शामिल हैं,जो कि पूरे देश में कभी एक नहीं हो सकते। उसी तरह, धर्म भी एकसार नहीं है। दरअसल, धर्म, जीवनपद्धति का एक हिस्सा है। वह जीवनपद्धति नहीं है और न हो सकता है। नवस्वतंत्र देश का क्या नाम होना चाहिएए इस पर संविधान सभा में लंबी बहस हुई थी और अंत में यह तय किया गया कि देश का नाम 'इंडिया देट इज भारत' होगा। यह नाम किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है। हिन्दू शब्द के राष्ट्रीय.सांस्कृतिक अर्थ नहीं है। यह एक विशुद्ध धार्मिक शब्द है। भारत के सभी निवासियों को हिन्दू बताने के खेल के पीछे एक कुटिल चाल है। पहले भौगोलिक पहचान की बात करोए फिर कहो कि चूंकि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और चूंकि हम सब हिन्दू हैं इसलिए गीता और मनुस्मृति हमारी राष्ट्रीय पुस्तकें हैं और गाय हमारा राष्ट्रीय पशु हैं और हम सबको राम आदि की पूजा करनी चाहिए।
आरएसएस जो कुछ कर रहा है वह कोई सीधा.साधा या सामान्य सा प्रयास नहीं है। उसका अंतिम तर्क यह होगा कि 'हम सब हिन्दू हैं अतः भारत हिन्दू राष्ट्र हैए, अतः हमें हिन्दू धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों और हिन्दू साधु.संतों के निर्देष मानने हैं।' इस मुद्दे पर हमारा संविधान बहुत साफ है हिन्दू एक धार्मिक पहचान है जबकि भारतए राष्ट्रीय पहचान है। आरएसएस का न तो स्वाधीनता संग्राम से कोई लेनादेना रहा है और ना ही भारतीय संविधान में उसे कोई विशेष श्रद्धा है। आश्चर्य नहीं कि उसका एजेण्डा भारतीय संविधान की आत्मा और उसके प्रावधानों के ठीक उलट है। आरएसएस दरअसल देश पर हिन्दू पहचान लादना चाहता है। संघ का अगला कदम क्या होगा, यह आरएसएस के एक अभ्यास वर्ग में हुए प्रश्नोत्तर से जाहिर है। आरएसएस के एक नेता यादवराव जोशी का कुछ दशक पहले का निम्नांकित कथन महत्वपूर्ण है और आरएसएस के असली एजेण्डे की झलक दिखलाता है। 'प्रश्नोत्तर के दौरान एक स्वयंसेवक ने जोशी, जो कि उस समय आरएसएस के दक्षिण भारत प्रमुख थे, से जानना चाहा 'हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिन्दू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत हिन्दुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि ईसाई और मुसलमान अपने.अपने धर्मों का पालन करते रह सकते हैं बशर्ते वे भारत के प्रति वफादार रहें और देश से प्रेम करें। हमें यह छूट देने की क्या आवश्यकता है? हम यह क्यों साफ नहीं कहते कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और उसमें मुसलमानों और ईसाईयों के लिए कोई स्थान नहीं है।यादवराव जोशी ने उत्तर देते हुए कहा, 'वर्तमान में हिन्दू समाज और आरएसएस इतने शक्तिशाली नहीं है कि हम ईसाईयों और मुसलमानों से यह कह सकें कि यदि उन्हें भारत में रहना है तो उन्हें हिन्दू धर्म को स्वीकार करना होगा। या तो वे हिन्दू बनें या मारे जायें। परंतु जब हिन्दू समाज और आरएसएस पर्याप्त शक्तिशाली हो जायेंगे तब हम उनसे कहेंगे कि यदि वे भारत में रहना चाहते हैं और यदि वे भारत से प्रेम करते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि कुछ पीढि़यों पहले तक वे हिन्दू थे और उन्हें हिन्दू धर्म में वापसआनाहोगा।'http://www.caravanmagazine.in/reportage/rss-30#sthash.GmBGCZLQ.dpuf
जो बात आरएसएस वर्षों से कहता आ रहा हैए केन्द्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके सदस्य अब वही बात और जोर.जोर से साफ शब्दों में कह रहे हैं। आरएसएस के मुखिया भागवत के बयान और आरएसएस के सदस्यों द्वारा टीवी पर आयोजित बहसों में जो भी कहा जा रहा हैए वह भारतीय संविधान के मूल्यों के स्पष्टतः खिलाफ है। अतः आवश्यक है कि भारत के हम सभी नागरिक इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करें कि हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम उन मूल्यों और सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग देना चाहते हैं जो हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान की रीढ़ हैं? इन सिद्धांतों और मूल्यों को हमें बचाए रखना है और देश को संकीर्ण ताकतों के हाथों का खिलौना नहीं बनने देना है। यही समय की मांग है।
-राम पुनियानी,

3 टिप्‍पणियां:

Neetu Singhal ने कहा…

हिंदू फ़ारसी भाषा का एक शब्द है । यवनों का जब भारत में पदार्पण हुवा तब वे 'स' का उच्चारण ह' करते थे ( जैसा की इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है ) शनै-शनै सिंधू पार के निवासी हिन्दू कहलाने लगे । वेदोक्त विचारों पर आधारित आचार-विचार, रीति-नीति, सामाजिक व्यवस्था पर विश्वास करने एवं उसका अनुशरण करने वाले भारतीय हिंदू धर्म के अनुयायी कहलाए ।

हिन्दू धर्म वस्तुत:वैदिक धर्म है ।

Hrishikesh Bibrale ने कहा…

@ हिंदू हमारे गुलाम होणे कि पहचान ही...

याहाके सिंधू संकृती पे वैदिक ब्राह्मनोने किया हुवा अतिक्रमण है...

महाराष्ट्र मी भी इअसाके प्रती बहोत कूच चाल राहा ही..

चलो साथ साथ चाले..एक देश के लिये...अपने समाज के लिये...

इस गुलामी के खिलाफ...

Hrishikesh Bibrale ने कहा…

छत्रपती शिवाजी महाराज को भी आज सिर्फ हिंदुओके राजा कह्लाया जाता ही...जबकी उन्होने कभी खुद हिंदू होणे का जिक्र नाही किया...

बल्की उन्होने आपने जलदुर्ग को सिंधुदुर्ग नाम दे दिया...

इससे ये साबित होता ही कि शिवाजी महाराज सिंधू संस्कृती के रक्षक थे...

मराठा लोगो ने इस भारत को राष्ट्रीय स्तर पार जोडणे कि कोशिश कियी...

जय शिवराय...