रविवार, 21 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-13

धर्मान्तरण की कोशिशे
    मैंने गंभीरता से धर्मान्तरण के बारे में सोचना शुरू किया, संघ में रहते हुए यह समझ थी कि सिख, जैन और बौद्ध तो हिन्दू ही है और मुसलमानों को लेकर अभी भी दिल दिमाग में कई शंकाए आशंकाए थीं, इसलिए इस बारे में सोचना भी जरूरी नहीं लगा, तब एक मात्र विकल्प के रूप में ईसाई ही बचे थे, मैंने सोचा क्यों नहीं ईसाई लोगों से बात की जाये, ये लोग पढ़े लिखे भी होते हैं और कम कट्टर भी, रही बात संघ की तो वे ईसाइयों से भी उतने ही चिढ़ते है जितने कि मुस्लिमों से। लेकिन सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि ये ईसाई लोग पाए कहाँ जाते हैं मैं आज तक किसी भी ईसाई से नहीं मिला और ना ही कोई परिचित था हालाँकि आरएसएस में रहते उनके खिलाफ बहुत पढ़ा था, यह भी सुन रखा था कि जो भी उनके धरम में जाता है, उन्हें लड़की और नौकरी दी जाती है, पर मुझे तो दोनों की ही जरुरत नहीं थी, मुझे तो सिर्फ बदला लेना था, मुझे तो सिर्फ उनको चिढ़ाना था, जिन्होंने मेरी बेइज्जती की थी और मुझे ठुकरा दिया था। मैंने ईसाई खोजो अभियान शुरू कर दिया, जल्दी ही मैं भीलवाड़ा शहर के आजाद नगर क्षेत्र के एक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक से मिलने में सफल रहा जिनका नाम बथुअल गायकवाड़ बताया गया था, दरअसल मेरे जीजाजी जो कि प्रेस पर कम्पोजीटर थे, वे कुछ ही दिन पहले इस प्रेस पर काम पर लगे थे और मैं उनको ढूँढते हुए वहाँ पहँुचा तो मेरी दोनों खोजें पूरी हो गई, ये महाशय एक स्कूल और चर्च के भी मालिक थे, मैंने उनसे बात की और अपना छिपा हुआ एजेंडा बताया और उनसे पूछा कि-क्या मैं ईसाई बन सकता हूँ? उन्होंने पूछा कि क्यों बनना चाहते हो? तब मैंने उन्हें आरएसएस के साथ चल रहे अपने पंगे के बारे में बताया और कहा कि मैं उनको सबक सिखाना चाहता हूँ। इस पर गायकवाड़ जी बोले-मसीहियत बदला लेने में नहीं बल्कि माफ करने में विश्वास करती है। इसलिए तुम भी उन्हें माफ कर दो और रेगुलर चर्च आना शुरू करो, जीजस में यकीन करो, वही हमारा मुक्तिदाता और सारे सवालों का जवाब है। मैंने उनसे साफ कहा कि मैं मुक्ति नहीं खोज रहा और न ही धर्म और भगवान, ना ही मेरा कोई सवाल है, मुझे कोई जवाब नहीं चाहिए मैं तो सिर्फ और सिर्फ संघ की पाखंडी और दोगली नीति को बेनकाब करना चाहता हूँ उन्होंने मेरी बात को पूरी ओढ़ी हुई धार्मिक गंभीरता से सुना और अगले रविवार को प्रार्थना में आने का न्योता दिया, मैं रविवार को उनकी प्रार्थना सभा का हिस्सा बनता इससे पहले ही पादरी साहब ने मेरे जीजाजी के मार्फत मेरे परिवार तक यह समाचार भिजवा दिए कि मुझे समझाया जाए क्योंकि मैं ईसाई बनने की कोशिश कर रहा हूँ।
बाद में उन्हें छोड़ कर मैं मेथोडिस्ट, बैप्टिस्ट, सीएनआई, सीरियन, कैथोलिक और भी न जाने कैसे कैसे अजीबो गरीब नाम वाले चर्च समूहों के पास पहुँचा, उन्हें अपनी बात बताई और कहा कि मुझे ईसाई बना दो, लेकिन सब लोग आरएसएस का नाम लेते ही घबरा जाते थे, उन्हें लगता था कि मैं आरएसएस का ही आदमी था जो किसी साजिश के तहत उन्हें जाल में फँसाने की कोशिश कर रहा था, इसलिए वे जल्दी ही किसी न किसी बहाने अपना पिंड छुड़ा लेते मुझे कहीं भी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
मसीह मंजूर, मसीहियत नामंजूर
    पर हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं था, मैं एक स्कूल टीचर से मिला जो मूलतः ब्राह्मण थे मगर वे धर्मान्तरण कर हरिनारायण से अच न्यूमेन हो गए थे। उन्होंने मुझे कुछ धार्मिक शिक्षा दी, मुझे धरम करम में कोई रुचि नहीं थी, सही बात तो यह थी कि मुझे बाइबिल, चर्च, जीसस और मुक्ति जैसी किसी भी बात में रुचि नहीं थी, मेरा मकसद तो कुछ और ही था, मैं न्यूमेन से संतुष्ट नहीं था, उन्होंने मुझे एक सेवंथ डे एडवेंटिस्ट पास्टर परवेज लाल का पता देकर कहा कि इनको चिट्ठी लिखना शायद ये तुम्हारी कुछ मदद कर पाएँगे, मैंने चिट्ठी लिख दी और गाँव आ गया। कुछ ही दिनों में दो अपरिचित सज्जन मेरे घर की दहलीज पर खड़े हो कर मुझी से मेरा पता पूछ रहे थे, मैंने कहा कि मैं ही हूँ वह जिसे आप खोज रहे है। उन्होंने बताया कि वे जोधपुर से आए हैं पादरी पीम लाल, मैंने उनका स्वागत किया, चाय पिलाई, उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और मुस्करा कर बोले कल मेरे साथ चलो।
    मैं उनके साथ जोधपुर आ गया करीब तीन महीने उनके पास रहा, उन्होंने पूरी बाइबिल शब्दशः पढ़ा दी, क्षमा, करुणा और प्रायश्चित का महत्व समझाया, इतना कुछ समझाया जितना कि एक ‘’बेचलर ऑफ थियोलोजी‘ के लिए जरुरी होता है, मगर मैं अब भी एक बागी हिन्दू ही था, इसी कारण ज्यादा भरोसेमंद नहीं था उनके लिए, एक रोज उनके चर्च के तमाम विश्वासियों और खुद पास्टर साहब ने तय किया कि मेरा बप्तिस्मा किया जाए, पर इसके लिए जरुरी था कि मैं जोधपुर के जिला कलेक्टर के सामने यह शपथपत्र प्रस्तुत करूँ कि मैं ईसाई बनना चाहता हूँ मैंने यह करने से साफ इंकार कर दिया, मैं तो सिर्फ आरएसएस को चिढ़ाना चाहता था मुझे सिर्फ इतना ही करना था, न इससे कुछ कम और न ही इससे ज्यादा  उन्होंने आपस में कुछ तय किया तथा कानूनन धर्म परिवर्तन करने की योजना को त्याग दिया। अंततः उन्होंने बपतिस्मे की केवल धार्मिक रीति गुपचुप तरीके से करने का निश्चय किया।
    फिर एक रविवार को उन्होंने कुछ गीत गाए, बाइबिल से कुछ आयतें पढ़ीं और मुझे पानी के एक टैंक में डुबोकर बाहर निकला, बाहर निकालते वक्त उन्होंने मुझे सफेद कपड़े में ढँका और मेरे कान में कहा कि ‘आज से तुम्हारा पुनर्जन्म हो गया है‘, इस प्रक्रिया को वो ‘बोर्न अगेन‘ कहते है, अब मैं उनकी नजर में एक भरोसेमंद व्यक्ति था लेकिन मुझे धर्म का खोखलापन साफ नजर आ रहा था, यह क्या धर्म है, जो हर सवाल के लिए जीसस को ही उत्तरदायी मानता हो, मेरे अन्दर विद्रोह की लहर सी उठी, मैं यह क्या होने दे रहा हूँ अपने साथ मुझे लगा कि मैं एक खाई से निकल कर कुँए में गिर गया हूँ, एक गुलामी से निकल कर दूसरी दासता में जा रहा था। वास्तव में मैं उस दिन खुद को एक ऐसे कैदी के रूप में पा रहा था जो सिर्फ जेल बदल रहा था।
    मैं अपने भीतर के विद्रोही इन्सान को दबा नहीं पा रहा था, मैंने स्पष्ट कर दिया कि मुझे मसीह तो फिर भी मंजूर हो सकते हैं पर आपकी यह मसीहियत मुझे कतई मंजूर नहीं है मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा भले ही आप लोग टाई, कोट और जूते पहन कर अंग्रेजी में प्रार्थना करते हैं लेकिन मूर्खताओं में आपका भी मुकाबला नहीं है। मुझे धर्म के किसी भी संगठित स्वरूप पर घिन आने लगी, मैं ईसाइयत के अन्धे कुँए से बाहर आने को छटपटाने लगा, जल्दी ही मैंने उनको उनकी तमाम मूर्खताओं के साथ अलविदा कह दिया। मुझे सुकून तब मिला जब मैं उनसे मुक्त हुआ मैं आराम की नींद सोया, मुझे लगा कि मुक्ति जीसस, बाइबिल या मसीहियत अथवा किसी भी धर्म में नहीं है बल्कि मुक्ति तो इनसे मुक्त हो जाने में है और मैं इनसे मुक्त हो रहा था मैं खुश था मुझे खुशी हो रही थी कि मैं अब धार्मिक नहीं था मैं विश्वासी नहीं था मैं स्वर्ग में स्थान नहीं पाने जा रहा था मैं अब नरक जाने वाली गाड़ी में सवार था और मैं वाकई इससे बेहद खुश था।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-09-2014) को "जिसकी तारीफ की वो खुदा हो गया" (चर्चा मंच 1744) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'