बुधवार, 3 सितंबर 2014

तुम्हारा डर-----------2

यह हमला है, यह कब्जा है।
    अगर पिछली सदी से अब तक जमीन पर कोई सबसे बड़ा नाजायज कब्जा कहा जाएगा तो वह इजराइल का फिलिस्तीनी जमीन पर कब्जा होगा। 1948 में जंग करके इजराइल फिलिस्तीनी जमीन के करीब
आधे से ज्यादा हिस्से पर काबिज हो गया। जर्मनी के हिटलर का कहर 60 लाख से ज्यादा यहूदियों पर टूटा था। दुनिया की हमदर्दी उनके साथ थी, सियासत हमदर्दी से ज्यादा आगे का सोचकर चल रही थी। इजराईली उस जंग को आजादी की जंग कहते हैं और फिलिस्तीनी उसे नकबा यानी महाविनाश कहते हैं। अत्याचार से पीडि़त, भयानक यातना की स्मृतियों से भरे यहूदी लोग कहीं छांव की तलाश में थे और उन्होंने इसके लिए दूसरों के घर उजाड़ दिए। इजराईली सेना ने 13,80,000 फिलिस्तीनी लोगों को अपनी जमीन से खदेड़ दिया। ये फिलिस्तीन की तब की आधी आबादी थी। फिर 1967 मंे इजराइल ने जंग जीत कर अपना कब्जा फिर बढ़ाया। इस दौरान फिर ढाई लाख फिलिस्तीन लोग खदेड़े गए। अब वेस्ट बैंक और गाजा में कुल मिलाकर करीब 35-40 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं लेकिन उनके पास जमीन का दस प्रतिशत से भी कम हिस्सा बचा है। धर्म और सुविधाओं के नाम पर दुनिया के कोने-कोने से यहूदी लोग इजराइल में जाकर बसे हैं और आज अकेले इजराइल में दुनिया के 41 फीसदी से ज्यादा यहूदी बसे हुए हैं। इजराइल की कुल आबादी का 80 फीसदी सिर्फ यहूदी हैं। फिलिस्तीन की पूरी जमीन पर 1922 में 11 फीसदी यहूदी थे, जो दूसरे विश्वयुद्ध के अंत तक 33 फीसदी हुए और 1948 से 1958 के दस साल के वक्फे में इजराइल की आबादी 8 लाख से 20 लाख हो गई। इनमें से
अधिकांश लोग उजाड़ हालात में शरणार्थी बनकर खाली हाथ आए थे। इजराइल ने कानून बनाकर इन यहूदियों को 49 साल के पट्टे पर वही जमीनें जोतने के लिए दीं, जिनसे फिलिस्तीनी अरबों को खदेड़ा था।
    इजराइल-फिलिस्तीन का मसला बेहद पेचीदा है। इसके सूत्रों को तलाशें तो फ्रांस और इंग्लैंड के स्वेज नहर से जुड़े स्वार्थ, अमरीका के पश्चिम एशिया में अपना मजबूत वफादार बनाने की साजिश, धर्म के नाम पर फैलाई जा रही लड़ाई का सैनिक नाभिक, सब कुछ सामने आता है। जो छिप जाती है, वह है बेगुनाह, आत्मसम्मान के साथ जीना चाह रहे फिलिस्तीनी अरबों की चाह। उनकी लाखों लाशें और, जिंदगी और मौत के फर्क को भूल चुकीं करीब तीन पीढि़याँ।
    आज दुनिया में ताकत के समीकरणों में अमरीका और इजराइल सबसे निकट के सहयोगी हैं। अमरीका के योजना खर्च का एक बड़ा हिस्सा इजराइल को मदद के तौर पर जाता है। अमरीकी हथियारों का न केवल सबसे बड़ा खरीदार इजराइल है, बल्कि पूरे अरब विश्व में वह अमरीकी हितों का सबसे बड़ा पहरेदार भी है। इसीलिए इजराइल द्वारा किए गए किसी भी अत्याचार पर या तो अमरीका चुप रहता है या उसे खुलकर समर्थन देता है।
    यह बात मैंने सन् 2008 में भी लिखी थी और आँकड़ों को छोड़ जो थोड़ी-बहुत चीज़ें बदली हैं, वे कोई हौसला नहीं बढ़ातीं। हम हिंसा को इस वर्ष भी जमा हुई बेगुनाहों की लाशों के ढेर पर अट्टहास करता देख रहे हैं। इस वक्त भी हिंसा को सिर्फ सेलिब्रेट किया जा रहा है, बगैर ये जाने कि कौन सी हिंसा बचाव की है और कौन सी जुल्म की। इसीलिए हिंदुस्तान में भी आमतौर पर इजराईली हमले की प्रतिक्रिया में ये सुनने को मिल रहा है कि जैसे इजराइल फिलिस्तीनी आतंकवादियों से निपट रहा है, वैसे ही पूरी बेदर्दी से भारत को भी पाकिस्तान से निपटना चाहिए। ये जाने बगैर कि इजराइल द्वारा की गई कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि खुद आतंकवादी कार्रवाई है। सन् 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के हरे घाव में उन्मादियों को सबसे अच्छा मौका मिला था कि वह पूरे झूठ से ज्यादा खतरनाक आधे
अधूरे विकृत सच फैलाकर जुल्मी का नकाब मजलूम को और मजलूम का नकाब जुल्मी को पहना सकें। लेकिन अब उस नकाब की भी ज़रूरत नहीं रह गई। जिस देश की विदेश मंत्री को ही यह स्पष्ट न हो कि उसे फि़लिस्तीन के साथ खड़ा होना है या इज़राईल के, और जो कहे कि हम दोनों से ही समान दोस्ती और समान दूरी रखेंगे तो देश के अलग-अलग तबके यह समझ लेते हैं कि यह ख़ामोशी किसके हक़ में है और किसके खि़लाफ़।
    2008 में गाजा पर हुए इजराईली हमले में करीब 1000 फिलिस्तीनी मारे गए थे और 10000 से ज्यादा घायल हुए। तब भी इजराइल के गाजा पर किए गए हमले पर उसके अमरीकी मौसेरे भाई ने व्हाइट हाउस से ये बयान दिया था कि इजराइल तो महज आत्म रक्षात्मक कार्रवाई कर रहा है। साथ ही अमरीका ने फिलिस्तीनियों को लुटेरा और आतंकवादी बताया था। सन् 2000 से 2008 के बीच के आठ वर्षों में इजराइल ने 5000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को लाशों में बदल दिया जबकि इसी दौरान फिलिस्तीनी हमलों में मारे गए इजराइलियों की तादाद बहुत कम है। इजराइल का हाल का हमला गाजा के सबसे भीड़ भरे इलाके में हुआ, जहाँ बाजार था, गरीबों की तंग घनी आबादी थी और उस वक्त बच्चों का झुंड स्कूल से घर लौट रहा था। अपनी ही जमीन पर कीड़े-मकोड़ों से बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त फिलिस्तीनी लोग लंबे वक्त तक अहिंसा व बातचीत के सहारे विश्व मंचों पर अपनी आवाज उठाते रहे। याद हो कि फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के नेता यासर अराफात को उनकी फौजी पोशाक के बावजूद शांति का अग्रदूत माना जाता है और कोट-पेंट-टाई पहने रीगन बुश-क्लिंटन या एरियल शेरोन सारी दुनिया में सबसे ज्यादा अमानवीयताओं व आतंकवाद को फैलाने वालों के तौर पर कुख्यात हैं।
    हिंदुस्तान और फिलिस्तीन का रिश्ता नया नहीं है। महात्मा गांधी ने फिलिस्तीनियों पर ढाये गए अत्याचारों की निंदा की थी। नेहरू फिलिस्तीन मुक्ति के पक्ष में थे। आजादी के भी पहले, 1947 में ही नेहरू ने निर्विवाद स्वर में पहले एशियाई संबंध सम्मेलन में कहा था-‘फिलिस्तीन बिना शक अरबों का देश है और उन्हें विश्वास में लिए बगैर कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। यहूदियों की अपना देश होने की चाहत का शिकार फिलिस्तीनियों को हर्गिज नहीं बनाया जाना चाहिए।’ भारत ही वह पहला देश था जिसने अराफात को बिना किसी देश का अध्यक्ष होते हुए भी राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा दिया और पीएलओ को दिल्ली में अपना दूतावास खोलने की अनुमति दी।
     जब हमारे देश में आज जितने न अरबपति थे न ही हथियार, तब हमारी आवाज दुनिया में सुनी जाती थी क्योंकि हम सच्चाई और अवाम के संघर्ष की आवाज में अपनी आवाज मिलाते थे, लेकिन आज हम ताकत, लालच और नफरत की दौड़ में हैं और अमरीका-इजराइल जैसा ही बनने की चाह में जिनके खिलाफ कभी हमारी आवाज गूँजती थी।            

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
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