बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या मुस्लिम पार्टियों से मुसलमानों का भला होगा ?


पिछले लगभग एक दशक में भारत में कई ऐसे राजनैतिक दलों का उदय हुआ है जिनमें या तो मुसलमानों का प्रभुत्व है या जिनका नेतृत्व मुसलमानों के हाथों में है। सन् 2005 में असम में मौलाना बदरूद्दीन अजमल ने एआईयूडीएफ की स्थापना की, सन् 2007 में मुफ्ती इस्माइल ने मालेगांव में मुस्लिम नेतृत्व वाला एक मोर्चा बनायाए जिसके काफी सदस्य चुनकर विधानसभा में पहुंचे। सन् 2008 में उत्तरप्रदेश के एक सर्जन मोहम्मद अय्यूब ने पीस पार्टी की स्थापना की। इसके बाद, सन् 2009 में पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने अपनी राजनैतिक शाखाए सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की नींव रखी, जिसके अध्यक्ष बने ए. सईद। जमायते इस्लामी ने अपने संस्थापक मौलाना अबू.अल.मोदूदी की सलाह, कि मुसलमानों को विभाजित भारत में राजनीति में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और परोक्ष रूप से भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए, के लगभग 70 वर्ष बादए सोशल वेल्फेयर पार्टी ऑफ इंडिया के नाम से अपना राजनैतिक दल गठित किया। वेल्फेयर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे मुज़तबा फारूख और उसके वर्तमान अध्यक्ष हैं एसक्यूआर इल्यिास। इनके अतिरिक्त,ऑल इंडिया इत्तेहाद.अल. मुसलमीन ;एमआईएम ने पहली बार तेलंगाना से बाहर अपने उम्मीदवार खड़े किए और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतने में सफल रही।
प्रजातंत्र में हर हितबद्ध समूह को यह अधिकार है कि वह अपने हितों की रक्षा करने व उन्हें ब़ढ़ावा देने के उद्धेश्य से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने और संसाधनों में अपनी वाजिब हिस्सेदारी हासिल करने के लिए प्रजातंत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले। इस अधिकार पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता बशर्ते संबंधित समूह संविधान और कानून की हदों में रहकर अपना काम करे। देश में ऐसी कई पार्टियां हैं जो विशिष्ट समुदायों या यहां तक कि जातियों के हितों की रक्षा करने के लिए गठित की गई हैं। इसके उदाहरण हैं दलितों की आवाज को बुलंद करने के लिए बनाई गईं पार्टियां जैसे रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, जस्टिस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी। जाति.आधारित दलों में शामिल हैं,अपना दल,जो कुर्मियों का प्रतिनिधित्व करता है। इनके अतिरिक्त, हमारे देश में कई क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं जो 'धरती के लालों' के हितों का संरक्षण करने का दावा करती हैं। इनमें शामिल हैं दक्षिण भारत की द्रविड पार्टियां और महाराष्ट्र की शिवसेना। हमारे देश में ऐसे दल भी हैं जो केवल एक धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे अकाली दल। परंतु किसी भी ऐसी पार्टी के गठन, जिसमें मुसलमानों का नेतृत्व या प्रभुत्व हो, से मीडिया व गैर.मुस्लिम समुदायों के कान खड़े हो जाते हैं। उनका डर तब और बढ़ जाता है जब ऐसी पार्टियां चुनावों में वोट हासिल कर लेती हैं। इसका कारण यह है कि हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हमारे दिमाग में यह भर दिया है कि मुसलमान अलगाववादी, आतंकवादी और साम्प्रदायिक हैं। ज्योंहि कोई मुस्लिम पार्टी अस्तित्व में आती है,यह संदेह व्यक्त किया जाने लगता है कि अंततः वह देश को एक और विभाजन की ओर ले जाएगी। यह तो मानकर ही चला जाता है कि वह पार्टी घोर साम्प्रदायिक होगी।
पहचान की राजनीति या तो वर्चस्ववादी हो सकती है या प्रजातांत्रिक। पहचान की वर्चस्ववादी राजनीति अक्सर राष्ट्रवाद का चोला ओढ़े रहती है। वह अपने समुदाय या नस्ल को श्रेष्ठ मानती है और उसका दावा होता है कि धरती के लाल या मूलनिवासी होने के कारण उसके समुदाय को अप्रवासियों की तुलना में ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए। वह राष्ट्रीय संसाधनों और सत्ता में गैर.आनुपातिक हिस्सेदारी चाहती है।  उदाहरणार्थ, भारत के हिन्दू राष्ट्रवादी यह कहते हैं कि छोटे भाई ;अल्पसंख्यकों का कर्तव्य है कि वह बड़े भाई ;बहुसंख्यकों की सेवा करे। दूसरी ओर, पहचान की प्रजातांत्रिक राजनीति समावेशिता की बात करती है और वह सत्ता व संसाधनों में केवल अपना उचित हिस्सा मांगती है। वह अपने धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी संघर्ष करती है। इसका उदाहरण है दलित और आदिवासी पहचान की राजनीति, जो दमनकारी सामाजिक.सांस्कृतिक व्यवस्था का विरोध करती है।
एमआईएम की पहचान की राजनीति  
 एमआईएम और एसडीपीआई की पहचान की राजनीति, वर्चस्ववादी श्रेणी में आती है। एमआईएम का लक्ष्य है मुस्लिम समुदाय में साम्प्रदायिक चेतना जगाना और इस धार्मिक समुदाय को राजनैतिक समुदाय में परिवर्तित कर उसका राजनैतिक प्रतिनिधि बनना। वह इस बात पर जोर देती है कि मुसलमान अन्य समुदायों से एकदम अलग, बल्कि 'श्रेष्ठ' हैं, और इसलिए उन्हें राजनैतिक दृष्टि से भी एक होना चाहिए। सांस्कृतिक, भाषायी व नस्लीय दृष्टि से विविधवर्णी व विभिन्न पंथों में बंटे मुस्लिम समुदाय को एक करने के लिए एमआईएम मुसलमानों के'गौरवशाली अतीत' पर जोर देती है और भावनात्मक  प्रतीकों का इस्तेमाल करती है। एमआईएम शरीयत, पवित्र कुरान, इस्लाम के पैगम्बर व उर्दू भाषा जैसे कई प्रतीकों का अपनी राजनीति में इस्तेमाल करती रही है। सन् 1980 के दशक के अंत और सन् 1990 के दशक की शुरूआत में उसने बाबरी मस्जिद के प्रतीक का इस्तेमाल कर जमकर वोट कबाड़े। हैदराबाद में तस्लीमा नसरीन की एक सभा पर एमआईएम के गुंडों ने हमला किया। एमआईएम लंबे समय से यह मांग करती रही है कि तस्लीमा नसरीन और सलमान रूश्दी को भारत सरकार को वीजा नहीं देना चाहिए और उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। अकबरउद्दीन ओवैसी पर घृणा फैलाने वाले भाषण देने के आरोप में एक मुकदमा भी चल रहा है।
एमआईएम ने कभी उन मुस्लिम युवकों के मानवाधिकारों की रक्षा की बात नहीं की, जिन्हें आतंकी होने के झूठे आरोपों में जेलों में ठूंस दिया गया है।
एमआईएम की शक्ति में वृद्धि और उसके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार, हिंदू राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप और उसके बहाने से किया जा रहा है। एमआईएम मुसलमानों से यह कहती है कि केवल वह ही हिंदू राष्ट्रवादियों की चुनौती का उपयुक्त प्रतिउत्तर देने में सक्षम है। जबकि सच यह है कि वह हिंदू राष्ट्रवादियों को मजबूती दे रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में एमआईएम के उतरने के फैसले से हिंदू राष्ट्रवादी भारी प्रसन्न हैं। अगर एमआईएम समाज से स्वयं को अलग.थलग महसूस कर रहे महत्वाकांक्षी मुस्लिम युवकों के एक हिस्से के मत भी पाने में कामयाब हो जाती है तो इससे'आप' उम्मीदवारों की हार की संभावना बढ़ेगी। यही कारण है कि कुछ लोगों का मानना है कि चुनावी मैदान में एमआईएम के प्रवेश के पीछे भाजपा है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के एक बड़े तबके ने एमआईएम का साथ दिया। यह भाजपा के उदय के साथ बढ़े धार्मिक ध्रुवीकरण का नतीजा तो था ही, इसके पीछे भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ का 'लव जिहाद' अभियान भी था। योगी आदित्यनाथ,सन् 2014 में 11 विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनावों में भाजपा के प्रचार मैनेजर थे। इसके अतिरिक्त,एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बताया।  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रांगण में राजा महेन्द्र प्रताप की जयंती मनाने का प्रयास भी किया गया, जिससे जाटों को खुश किया जा सके और तनाव बढ़े। मुसलमानों के दानवीकरण के साथ.साथ, हिंदू राष्ट्रवादियों ने राजनैतिक शक्तिप्रदर्शन भी किए और त्रिलोकपुरी ;दिल्ली व अहमदाबाद, बड़ौदा व सोमनाथ ;सभी गुजरात में दंगे भी भड़काए। इस पूरे 'दानवीकरण' अभियान के दौरान, 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियां चुप्पी साधे रहीं।
एमआईएम की राजनैतिक रणनीति यह है कि सभी मुसलमानों को एक करके उनके एकतरफा वोट डलवाए जाएं और गैर.मुस्लिम मतदाताओं को विभाजित रखा जावे। सभी मुसलमान एक होकर उसे वोट दें, यह सुनिश्चित करने  के लिए एमआईएम को मुसलमानों को यह विश्वास दिलाना होगा कि केवल कोई मुसलमान ही उनके हितों का सच्चा रक्षक हो सकता है और उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकता है। और यह भी कि एमआईएम ही मुसलमानों की असली प्रतिनिधि है। यह हमें जिन्ना के इस दावे की याद दिलाता है कि वे ही मुसलमानों के एकमात्र प्रवक्ता हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में औरंगाबाद व अन्य स्थानों पर चुनाव सभाओं में बोलते हुए ओवैसी बंधुओं ने स्वयं को  'निडर'बताते हुए कहा कि कोई ताकत उन्हें डरा नहीं सकती और वे मुसलमानों की खातिर कोई भी नतीजा भुगतने को तैयार हैं। उन्होंने मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय का हवाला देते हुए यह याद दिलाया कि मुसलमान एक समय देश के शासक थे। उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान अपनी बेहतरी चाहते हैं तो उन्हें एक होकर एमआईएम को वोट देना चाहिए।
इस रणनीति में मूलभूत कमियां हैं। इसके सहारे, एमआईएम तेलंगाना के बाहर एक.दो सीटें जीतने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर सकती। और शायद यही उसका लक्ष्य भी है। अपनी लड़ाकू छवि बनाकर एमआईएम अन्य मुस्लिम प्रभुत्व व नेतृत्व वाली पार्टियों को किनारे करना चाहती है। परंतु उसकी यह रणनीति केवल उन्हीं चुनाव क्षेत्रों में सफल हो सकती है जहां मुसलमान,आबादी का कम से कम 35 प्रतिशत हैं। केवल ऐसे चुनाव क्षेत्रों में ही मुसलमानों के प्रभुत्व और उनके नेतृत्व वाली पार्टियां चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकती हैं। समस्या यह है कि देश में केवल 19 ऐसे जिले हैं जहां मुसलमानों का आबादी में प्रतिशत 50 से ज्यादा है। इस स्थिति से मुकाबला करने के लिए एमआईएम ने दलितों के साथ सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश की। परंतु यह एक पुराना और असफल फार्मूला है, जिसका सबसे पहले इस्तेमाल हाजी मस्तान ने किया था। हाजी मस्तान एक गैंगस्टर थे, जो बाद में राजनीतिज्ञ बन गए और उन्होंने सन् 1985 में दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ का गठन किया। परंतु उनकी पार्टी एक भी सीट न जीत सकी और उसके सभी उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं।
सन् 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में ऐसे 25 जिले हैं जिनमें 10 लाख से अधिक मुसलमान रहते हैं। इनमें सबसे बड़ा है मुर्शिदाबाद, जिसकी मुस्लिम आबादी 37 लाख है। दूसरे स्थान पर है मल्लापुरम व इसके बाद आता है दक्षिण व पूर्व चैबीस परगना। ये तीनों जिले हिंदी पट्टी के बाहर हैं। देश के 593 जिलों में से केवल 9 को मुस्लिम बहुल कहा जा सकता हैए जहां कि मुसलमानों की आबादी 75 प्रतिशत या उससे ज्यादा है। इनमें शामिल हैं लक्ष्यद्वीप और जम्मू और कश्मीर के 8 जिले। ऐसे जिलो की संख्या 11 है जिनमें मुसलमानों की आबादी 50 से 75 प्रतिशत के बीच है और 38 जिलों में वे आबादी का 25 से 50 प्रतिशत हैं। कुल 182 जिलों में मुस्लिम आबादी,10 से 25 प्रतिशत के बीच है। इन 182 जिलों में कुल मुसलमानों के 47 प्रतिशत निवास करते हैं और 65 प्रतिशत मुसलमान ऐसे जिलो में रहते हैं जहां उनकी आबादी 25 प्रतिशत से कम है।
जिन जिलों में मुस्लिम आबादी 10 से 25 प्रतिशत के बीच है वहां वे केवल अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकतेए यद्यपि वे चुनाव परिणामों को प्रभावित अवश्य कर सकते हैं। और यह भी तब होगा जब मुसलमान केवल सांप्रदायिक आधार पर वोट दें, जो कि शायद ही कभी होता हो। ऐसे कई मुसलमान हैं जो चुनावी मैदान में किसी मुसलमान के होते हुए भी हिंदू उम्मीदवार को वोट देते हैं क्योंकि वह उनकी पसंद की पार्टी का प्रतिनिधि होता है। एक बात और, इन जिलों में भी मुसलमान चुनाव परिणामों पर निर्णायक प्रभाव तभी डाल सकते हैं जब हिंदू, जातिगत, सांस्कृतिक व राजनैतिक आधार पर विभाजित हों। जिन जिलों में मुसलमानों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां स्थिति इसके उलट होती है क्योंकि एक से अधिक पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर देती हैं और मुस्लिम वोट बंट जाते हैं। कभी.कभी ऐसा भी होता है कि गैर.मुसलमान एकतरफा वोट देकर गैर.मुस्लिम उम्मीदवार को जिता देते हैं। उदाहरणार्थ,, हालिया लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश के रामपुर संसदीय क्षेत्र से भाजपा के नेपाल सिंह विजयी हो गए जबकि रामपुर में मुसलमानों की आबादी 51 प्रतिशत से अधिक है। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों के कारण लोकसभा चुनाव के समय धार्मिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर था और इसलिए भाजपा रामपुर में सभी जातियों के वोट हासिल करने में सफल रही। मुसलमानों के वोट समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नसीर अहमद खान, कांग्रेस के नवाब काजि़म अली खान और बसपा के अकबर हुसैन के बीच बंट गए।
सहारनपुर में कांग्र्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने मुसलमानों को अपने पक्ष में ध्रुवीकृत करने के लिए अपनी एक सभा में कहा कि'गुजरात में मुसलमान केवल चार प्रतिशत हैं। यहां मुसलमान 42 प्रतिशत हैं। अगर वे ;भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी, रामपुर को गुजरात में बदलने की कोशिश करेंगे तो हम उनके हाथ.पांव काट डालेगे'। यहां यह महत्व्पूर्ण है कि मसूद ने जिन आंकड़ों का हवाला दिया, उनकी सत्यता संदेहास्पद है। इस तरह की बातों के कारण ही इस बार लोकसभा में मुसलमानों की संख्या,आजादी के बाद से सब से कम है। अलीगढ़ का उदाहरण लीजिए। इस संसदीय क्षेत्र की 40 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। अगर मुसलमान एकसाथ मिलकर वोट देते और हिंदू वोटों का विभाजन होता तो वहां से मुस्लिम उम्मीदवार को जीतना चाहिए था। परंतु हुआ इसके ठीक उलट। समाजवादी पार्टी के जफर आलम तीसरे नंबर पर अटक गए। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के डॉ.अरविंद कुमार सिंह जिन्हें 2,27,886 मत प्राप्त हुए और 5,14,622 वोट लेकर भाजपा के सतीश कुमार गौतम चुनाव जीत गए। अर्थात, भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति सफल रही, मुस्लिम मतदाता विभाजित हो गए और हिंदुओं को एक करने के लिए भाजपा ने मतदान के दिन यह अफवाह फैला दी कि मतदान केंद्रों पर मुसलमानों की लंबी.लंबी कतारें लगी हैं और वे जफर आलम को जिताने पर आमादा हैं। मुरादाबाद में, जहां 45.5 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, भाजपा के कुंवर सिंह ने 4,85,224 वोट प्राप्त कर समाजवादी पार्टी के डॉ. एस.टी. हसन को हरा दिया। हसन को 3,97,720 वोट प्राप्त हुए। भिवंडी में, जहां मुस्लिम आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा है, भाजपा के कपिल  मोरेश्वर पाटिल 4,11,070 वोट प्राप्त कर विजयी रहे। उनके निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के विश्वनाथ रामचंद्र पाटिल को 3,01,620 वोट मिले जबकि मुस्लिम उम्मीदवारों में से सबसे ज्यादा मत प्राप्त करने वाले अंसारी मुमताज अब्दुल सत्तार को केवल 1,14,068 वोट मिले। सुब्रमण्यम स्वामी ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि भाजपा की रणनीति, मुस्लिम मतों को बांटने और हिन्दू मतों को एक करने की थी।
दरअसल,मुसलमानों को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आवश्यकता नहीं है। उनके लिए बेहतर यह होगा कि उन्हें पर्याप्त प्रजातांत्रिक प्रतिनिधित्व मिले ताकि वे राष्ट्रनिर्माण में हिस्सेदारी कर सकें। उन्हें अपनी साम्प्रदायिक पहचान पर जोर नहीं देना चाहिए। ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोट बैंक का निर्माण की कोशिशों से उनका प्रतिनिधित्व कम ही होता है,जैसा कि लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजों से जाहिर है। हमें ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जिसमें सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए सभी वंचित समुदाय एकसाथ आएं और राज्य को इस बात के लिए मजबूर करें कि वह सभी नागरिकों के मानवाधिकारों का सम्मान करे। हमें साम्प्रदायिक चेतना को जगाने की आवश्यकता नहीं है। हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मूल्यों पर जोर देना चाहिए जिसकी आवश्यकता हाशिए पर पड़े सभी समुदायों को है,चाहे वे धार्मिक अल्पसंख्यक हों,भाषायी अल्पसंख्यक हों या फिर दलित,आदिवासी,महिलाएं या श्रमिक।
-इरफान इंजीनियर

1 टिप्पणी:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-12-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1838 में दिया गया है
धन्यवाद