शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-3-2

भँवर मेघवंशी

दलित साहित्य की अखिल भारतीय दुकान
    तो लीजिए साहब एक चिट्टी मुझे मिली है, जिसमें कहा गया है कि इस साल का अंबेडकर विशिष्ट फेलोशिप अवार्ड मुझे दिया जाएगा, है ना वाकई खुशी की बात, घर बैठे ही यह सौभाग्य प्राप्त होने जा रहा था, दूर दिल्ली में बैठे पारखीजन मेरे बारे में जान चुके थे, तभी तो यह अवसर आया है, मैंने इसे अखबार में छपवाने की सोची, आखिर मेरे इलाके में मुझे यह पहला अवार्ड मिलने जा रहा था, लेकिन मैं इस खबर को छपवा पाता इससे पहले ही कई और सज्जनों की खबरें छप गईं कि उन्हें भी अम्बेडकर फेलोशिप अवार्ड से इसी साल दिल्ली में नवाजा जाएगा, ऐसे लोग भी जिन्हें दलित साहित्य से कोई लेना देना न था, एक श्रीमान तो इतने महान थे कि साहित्य का शब्दार्थ तक नहीं बता पाने में सक्षम, लेकिन अवार्ड के हकदार हो गए, हद तो यह थी कि एक ऐसे ब्राह्मण शिक्षक जिन पर दलित उत्पीड़न का आरोप था, वे भी भारतीय दलित साहित्य अकादमी की ओर से अम्बेडकर फेलोशिप अवार्ड के लिए नामित कर दिए गए, जाँच पड़ताल की तो पता चला कि ये अवार्ड हर साल थोक के भाव बेचे जाते है, जिसके खीसे में दम होता है वह खरीद लेता है, मुझे भी जो चिट्ठी मिली, उसमंे पंजीयन शुल्क के नाम पर रुपये माँगे गए थे, लिखा था कि इस वर्ष का अम्बेडकर विशिष्ट फेलोशिप अवार्ड आपको दिया जाना तय हुआ है, कृपया दिल्ली तालकटोरा स्टेडियम में आ कर महामहिम राष्ट्रपति महोदय के हाथों से स्वीकार करें। आप तो जान ही गए होंगे कि ये अवार्डों के होलसेल विक्रेता सुमनाक्षर साहब हैं, जो दिल्ली में बिराजते हैं, दलित साहित्य अकादमी चलाते हैं, बाबा साहब अम्बेडकर एवं अन्य दलित महापुरुषों को इन्होंने जितना बेचा, उतना तो किसी बनिए ने किराना की दुकान में जीवन भर में शक्कर, चाय की पत्ती भी नहीं बेची होगी। हर साल थोक के भाव अम्बेडकर से लेकर जगजीवन राम और कबीर से लेकर फुले तक के नाम से तरह-तरह के, हर कीमत के फेलोशिप अवार्ड बेचते हैं। पैसा लेकर किसी को भी दे सकते हैं, हमारे भीलवाड़ा में तो अब तक सैंकड़ों लोग इस स्कीम का फायदा उठा चुके हैं, अवार्ड पिपासु लोग सुमनाक्षर जी की सेवाओं का जमकर लाभ उठाते रहते हैं, ज्यादातर प्राइमरी टीचर इससे लाभान्वित हुए हैं, कई लोग जो निजी जीवन में घनघोर दलित विरोधी हैं, वे भी सम्मान पा गए, जिन्हें दलित साहित्य का ककहरा भी नहीं पता, वे भी सुमनाक्षर साहब की कृपा से पुरस्कृत साहित्यकार की श्रेणी में आ गए, ऐसे तमाम बगुले अपने चेहरों पर साहित्य का नकली मुखौटा लगा कर हंस बने घूमते रहते हैं, समाचार पत्रों में खरीदी हुई फेलोशिप के मिल जाने की बधाइयों के विज्ञापन छपवा कर महान बनते हंै।
    मैंने पैसा लेकर अवार्ड देने के इस खेल का हिस्सा बनने के बजाए अकादमी के कर्ताधर्ता सुमनाक्षर को चिट्टी लिखी कि आपकी हिम्मत कैसे हुई इस प्रकार का फर्जी अवार्ड मुझे देने की घोषणा करने की, मैं इसे सम्मान नहीं अपना अपमान समझता हूँ, आइन्दा ऐसी हरकत न करें और बाबा साहब के नाम पर इस तरह की फेलोशिप बेचना बंद करें। अंत में मैंने उन्हें यह सलाह भी दी कि वे तालकटोरा में दलित महापुरुषों की बिक्री करने का पापकर्म करने के बजाए हाथ में भीख का कटोरा ले लें, ताकि अम्बेडकर की विचारधारा और दलित साहित्य बदनाम नहीं हों, इसका असर यह हुआ कि उन्होंने फिर कभी मेरा चयन किसी भी अवार्ड के लिए नहीं किया, पर उनका दलित साहित्य के नाम पर यह धंधा आज तक जारी है। हर साल देश भर में हजारों लोगों को मूर्ख बनाने के लिए अवार्ड की घोषणा करने वाली चिट्ठियाँ भेजी जाती हैं, प्रसिद्धि चाहने वाले कई लोग इनके चंगुल में आकर अपनी जेब कटवा बैठते हैं, फिर ऐसे तमाम मूर्ख बन चुके लोग दिल्ली में बुलवाए जाकर आयोजन स्थल पर लम्बी कतार में खड़े करवा दिए जाते हैं, कुछ लोगों को वहाँ लाए गए अतिथि के हाथों अवार्ड दिला दिए जाते हैं, शेष को खाली प्रशस्तिपत्र ओर स्मृति चिह्न पकड़ा दिया जाता है। खुद का नाम भी खुद ही भरकर सम्मानित होना पड़ता है क्योंकि मंच तक पहुँचने की धक्कामुक्की में पहले काफी अपमान हो चुका होता है, जो जितना पैसा दे सकता है, वह उतने ही बड़े अवार्ड का हकदार हो जाता है। वर्षांे से दलित साहित्य की यह अखिल भारतीय दुकान अपना धंधा कर रही है। देश भर में जगह जगह पर सुमनाक्षर एंड कम्पनी के इस कारोबार से कई साहित्य माफिया जुड़े हुए है, मेरे शहर में तो भारतीय दलित साहित्य अकादमी का जिला अध्यक्ष एक ऐसा गैंड़ा टाइप आदमी बन बैठा जो दलित युवाओं से अवैध शराब की तस्करी करवाता था और गरीब दलित परिवारों को दस रुपये सैंकड़ा की ब्याज दर पर पैसा देकर शोषण का काम करता था। इस व्यक्ति को साहित्य किस चिड़िया का नाम है और उसका क ख ग क्या है, यह तक पता नहीं, जय भीम कहने में ही मुँह से थूक निकलने लगता और साहित्य शब्द का उच्चारण तक उसके बस की बात नहीं, वह हमारे दलित साहित्य का सिरमौर बना, उसने साहित्य के नाम पर खूब गंध मचाई और खूब सारे फर्जी लोगों को फेलोशिपें दिलाईं। एक बार तो उन्हें यह गलतफहमी हो गई कि वे अम्बेडकर के समकक्ष हो गए हैं।
    दलित साहित्य के नाम पर जो साहित्यिक माफिया देश भर में खड़ा हुआ, वह दलित रचना संसार के लिए शर्मनाक बात ही कही जा सकती है, वैसे भी दलित साहित्य में आत्मकथा लेखन के नाम पर जिस प्रकार सदलित लेखकों ने अपनी यौन कुंठाओं का बाजारीकरण किया है तथा भोगे हुए यथार्थ के नाम पर वाहियात घटनाओं का अतिरंजित चित्रण किया है, वह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। क्या कहानियाँ लिखी गई हैं? किसी की पत्नी ने पति को मरवाने के लिए भेड़िया पाला, तो किसी की पत्नी अपने ही पति के सगे भतीजे के साथ हमबिस्तर हो गई। किसी ने पति को मारने के लिए जहर दे दिया तो कोई किसी के साथ भाग गई, किसी ने असफल प्यार में जूते खाए तो किसी ने खुद के ही बाल नोचे, क्या गजब के अनुभव हैं, घर की गंदगी को सजा कर बाजार में ले आए और उसे सबको परोस कर महान दलित साहित्यकार बन गए। सवर्ण जातिवादी साहित्यकारों ने ऐसी तमाम सारी बेहूदी आत्मकथाओं को अद्भुत रचनाएँ घोषित करके इस कूड़े के ढेर को श्रेष्ठ दलित साहित्य बना डाला, मगर आज भी मैं सोचता हूँ कि इन कतिपय कहानियों को पढ़ कर या जान कर दलित समुदाय स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेगा या संतप्त? कुछ भी समझ में नहीं आता है, मेरी इच्छा होती है कि मैं कथित महान दलित साहित्यकारों से पूछँू कि क्या हम भारतीय जातिवादी साहित्यिक तत्वों का मनोरंजन करने के लिए दलित साहित्य का तमाशा कर रहे हैं या अपने समुदाय को दिशा देने के लिए जलती हुई मशाल थामे हुए हैं, कई दलित साहित्यकारों ने प्रतिरोध और परिवर्तन के स्वर को मुखर करने वाली आत्मकथाएँ भी लिखी हैं, मगर ज्यादातर ने बहुत ही बेहूदगी भरा साहित्य रचा है, जिसे दलित साहित्य कहने के बजाए कचरा साहित्य कहना ही उचित है और ऐसे लोगों को रचनाकार के बजाए कचराकार कहा जाना ही उपयुक्त होगा। आज दलित साहित्य को संघर्ष और प्रतिरोध का साहित्य बनाना जरुरी है, निसंदेह कई लोग यह कर भी रहे हैं, उन्हें लाखों लाख सलाम और जिन्होंने गन्दगी परोसी है, उन्हें लानत और बारम्बार धिक्कार।

-भँवर मेघवंशी 

क्रमस:

लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-01-2015) को "एक और वर्ष बीत गया..." (चर्चा-1848) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नव वर्ष-2015 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'