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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

थाली में कुत्ता खा सकता है- आदमी नहीं

संसद में छुआ-छूत को लेकर बहस चल रही है. एक पक्ष इस बात को लेकर अड़ा हुआ है कि मंदिरों में जातिगत भेदभाव नहीं है. यह बात कहते हुए अच्छा तो लगता है कि सभी जीव एक परमात्मा ने बनाये हैं और सभी आदमी बराबर हैं लेकिन वस्तुस्तिथि यह है कि जिस थाली में कुत्ता खाता है उस थाली को साफ़ कर लोग खाना खा लेते हैं लेकिन उसी थाली में दलित को नहीं खिलाया जा सकता है. अगर दलित खा ले तो वह थाली फेंक दी जाती है. यह भारतीय समाज का कटु सत्य है और एक साधन संपन्न तबका दलितों को, पिछड़ों को आदमी मानने से ही इनकार करता है. मंदिरों में जातिगत आधार पर ही प्रवेश मिलता है और इसीलिए पूरे देश में अक्सर समाचार मिलते रहते हैं कि मंदिर में जाने पर दलित की पिटाई. मंदिरों में गोत्र पूछा जाता है. गोत्र सिर्फ सवर्ण जातियों में ही होते हैं. अन्य जातियों में गोत्र की कोई व्यवस्था ही नहीं होती है.
मंदिर बनाने का काम दलित करता है, मूर्ति का निर्माण वह करता है लेकिन मंदिर बन जाने के बाद उसमें वह जाकर अपने द्वारा बनायीं गयी मूर्ति को वह छू नहीं सकता है. प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद उस मंदिर और उस मूर्ति पर एक विशेष तबके का अधिकार हो जाता है.
भारतीय समाज में आज भी नौकरी में आवास किराये पर देने का, बगल में बैठाने पर, सरकारी कार्यालयों में कानूनी ढंग से काम करने में तथा न्याय देने वाले व्यक्ति भी जातीय मानसिकता से कार्य करते हैं. लोकतंत्र है वोट चाहिए कुर्सी पाने के लिए इसलिए तरह-तरह की अच्छी-अच्छी बातें चुनाव भर लोग करते हैं. जाति और धर्म के आधार पर विभेद न करने की बात की जाती है. चुनाव का परिणाम आने के बाद फिर वही अभिजातीय मानसिकता काम करने लगती है. इस मानसिकता को जिन्दा रखने का काम अपने को सांस्कृतिक संगठन कहने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उसके द्वारा निर्मित संगठन विश्व हिन्दू परिषद करते हैं. यह लोग जातीय आधार पर मनुस्मृति को ही संविधान बना देना चाहते थे. यह संगठन कभी भी जाति समाप्त करने की दिशा में कोई कार्य नहीं करते हैं वरन जाति को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक रूप से कार्य करते हैं. जातीय विभेद को समाप्त करने में राजनितिक दलों का भी स्वार्थ है. वह लोग जाति को इसलिए जिन्दा रखतें जिससे चुनाव में जीतने में आसानी हो.         
इसी नजरिये से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने राज्यसभा में बहस के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री जब वह गुजरात के द्वारका मंदिर गईं थीं तो उनसे उनकी जाति पूछी गई थी का बयान देखा जाना चाहिए. चुनाव के समय नेतागण- मीडिया जातीय आधार पर ही हार-जीत का परिणाम बताते है. 
           जब तक जाति व्यवस्था का नाश नहीं होगा तब तक देश में स्वस्थ लोकतंत्र नहीं हो सकता है और न ही मानव को मानव के अधिकार ही मिल सकते हैं. जाति व्यवस्था शोषण करने का एक अच्छा और अचूक हथियार है. 

सुमन 

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

संविधान ही इनकी मुसीबत है

राजनाथ ने अपने बड़बोले मंत्रियों को नसीहतदी है. केंद्र सरकार के मंत्री जनरल वीके सिंह और किरण रिजीजू को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने हिदायत देते हुए कहा है कि गो हत्या, हरियाणा में दलितों की हत्या जैसे गंभीर मुद्दों पर सोच समझ कर बयान दे. 
                  राजनाथ सिंह  भी संघ के प्रचारक रहे है और अब शायद भूल रहे है कि संघ की मूल विचारधारा  यही है जिसका जाप मंत्री या भाजापा के नेतागण कर लिया करते है. छुपी हुई बाते या छुपा हुआ एजेंडा कब तक छुपाए रखोगे, चाहे बाबरी मस्जिद को तोड़ने का मामला हो या गुजरात का नरसंघार छुपे  हुए एजेंडे  को लागू किया गया था और यह नेतागण खुशिया मना रहे थे और अदालतों  में इंकार कर रहे थे,  इनकी मुख्य समस्या संविधान की प्रस्तावना में "हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमाऔर राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होना है". संविधान के अनुसार बातें करनी हैं ताकि सत्ता का सुख मिलता रहे सत्तासुख के लिए केंद्र सरकार पर काबिज सत्तारूढ़ दल मुखौटे लगा कर दोहरे जीवन पद्यति को अपना रहा है.
संघ की मूल विचारधारा के अनुसार पिछड़ों दलितों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है और उसी समझ के अनुसार जब केंद्र में बैठे हुए नेतागण व अन्य नेता अपनी बात को जनता के सामने रखते हैं तो सही बात आ जाती है. मंडल कमीशन के आने के बाद पूरे देश में जो आरक्षण विरोधी आन्दोलन चला था उसको सुनियोजित तरीके से संघ के संगठन ने संचालित किया था. अल्पसंख्यकों के सवाल को लेकर 1984 के दंगे के पीछे जो कत्लेआम हुआ था वह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है.
ओडिशा के कंधमाल क्षेत्र में जो ईसाईयों का कत्लेआम हुआ था वह भी संघ की सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. आदिवासियों को, दलितों को, पिछड़ों को धर्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश वर्जित था और आज भी संघ द्वारा चलाई जा रही हिंदुवत्व वाली विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा है तो जगह-जगह इन तबकों पर हमले हो रहे हैं और इन हमलों के बीच में संघ का कहीं न कहीं अदृश्य हाथ नजर आता है. 
सत्ता सुख भोगने के लिए गृह मंत्री  राजनाथ सिंह का मंत्रियों को समझाने या डांटने का कोई अर्थ नहीं है. बल्कि सत्तासुख के लिए कुछ देर के लिए इन घ्रणित एजेंडों को छुपाये रखने का ही मामला है. अगर पूरी ताकत के साथ देश के अन्दर इनको सत्ता प्राप्त होती है तो आने वाले दिनों में इनकी भाषा व चेहरा बड़ा भयानक होगा। इनकी कल्पना में स्वयं को शेर समझने की बाकी सभी शिकार हैं. 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

नागपुरी हिन्दुवत का असर


हरियाणा में फरीदाबाद के सनपेड गांव के एक दलित परिवार पर दबंगई का कहर टूट पड़ा। बदमाशों ने मंगलवार तड़के पेट्रोल छिड़ककर पूरे दलित परिवार को आग के हवाले कर दिया। इस घटना में कच्चे मकान में सो रहे दो मासूम बच्चों की मौत हो गई और उनके माता-पिता गंभीर रूप से झुलस गए। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह परिवार अपने घर में सो रहा था तभी कुछ लोगों ने उनके मकान में पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। घटना में नौ महीने के एक बच्चे और उसकी ढाई साल की बहन की मौत हो गई। गंभीर रूप से झुलसे उनके माता- पिता को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
हरियाणा के फरीदाबाद में चार दलितों के उपर पेट्रोल डालकर जलाने की घटना कोई आश्चर्य पूर्ण बात नही है यह तो होना ही है नागपुरी हिन्दुवत की विषाक्त विचारधारा ने अल्पसंख्को के खिलाफ जो वातावरण तैयार किया उसका प्रभाव समाज में असर दिखने लगा है .हिन्दुवत की विचारधारा के अनुसार दलित सेवा करने के लिए है और उन्हें सेवा के अलावा कोई कार्य नही कर सकते है . भारतीय समाज में जातिव्यवस्था के अनुसार वह मंदिर में प्रवेश करने के अधिकारी नही है लेकिन समाज सुधारको के प्रयासों से उन्हें मंदिर में प्रवेश करने का थोडा अधिकार मिला तो वह सबसे बड़े हिन्दू हो गएफिर क्या था संघियों ने उन्हें अपना निशाना बनाकर उग्र हिन्दुवत में बदल दिया और मस्लिम विरोध का झंडा भी पकड़ा कर देश में दंगो की अगवाई कराई.लेकिन जब हिन्दुवत मजबूत हुवा तो जातीय व्यवस्था की सिरमौर जातियों की बांछे खिल गई और उन्होंने पुरानी व्यवस्था लागू करना शुरू कर दिया ..जातीय उच्चता बात ने विभिन्न जगहों पर जाति के नाम पर दलितों को मरना पीटना आरम्भ कर दिया . अधिकांश दलित नेता भा ज पा की और से एम. पी.-एम.एल .ए. है वह कुछ बोलने की स्थिथि में नही होता है हरियाणा में बहुत जगहों पर दलितो पर  अत्याचार जैसे  दलित बस्तियों में आग लगाना -पिटाई  करना व बलात्कार आम बात हो गई.भा ज पा शासित प्रदेशो में वोट तो लेने के दलित हिन्दू हो जाता बाद में उसे मनुस्मति के हिसाब  से जीना होता है
सवर्ण  मानसिकता कट्टर हिन्दुवत  से ही पैदा होती है उन विचारो का वाहक संघ है वह देश को एक ऐसे देश में बदलना चाहती है जहाँ सवर्ण जातियों की सेवक अन्य जातिया हो .यह सब ऐसे कदम है जो विनाशकारी है हिटलर का युग वापस लेने  वाले लोगो के यह मंसूबे पुरे नही होने वाले है लेकिन कष्ट तो देगे ही . भारतीय संविधान व कानून न मानने वालो  को अब देशद्रोही  नही  कहा जाता है नई राष्ट्र भक्ति की परिभाषा के अनुसार देश्द्रोहिता  करो -संविधान कानून न मानो उलटे राष्ट्र भक्ति  के गीत गुनगुनाओ तभी आप संघी राष्ट्र वादी होगे.
-रणधीरसिंह   सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

हिन्दू बनने की चाह में शम्बूक वध भूल गए

साभार
हिन्दू बनने की चाह में शम्बूक वध को भूल कर एक दलित मंदिर चला गया और उसकी हत्या कर दी गयी . कहने को देश में लोकतंत्र है, समानता का अधिकार है, न्याय मिलेगा लेकिन यह कोरे कागजों पर है. दलितों को हिन्दू न मानने की परंपरा बहुत पुराणी है. उसी परंपरा का निर्वाह नागपुरी मुख्यालय करता है. वोट के लिए नागपुर मुख्यालय दलितों को हिन्दू बनाने की मुहीम चलता है और उनमें अल्पसंख्यक विरोध के घृणा का भाव भरता है और दंगे कराता है लेकिन जब वही हिंदुवत्व वाला दलित जब मंदिर जाने लगता है तो उनका धर्म खतरे में पड़ जाता है और उसकी हत्या तक हो जाती है, नागपुर मुख्यालय चुपचाप रहता है. नागपुर मुख्यालय मनुस्मृति आधारित हिंदुवत्ववादी समाज बनाना चाहता है. जिसमें दलितों और पिछड़ों का कोई स्थान नहीं होगा. सेवा भाव ही उनका धर्म होगा. 
नागपुरी मुख्यालय के विषाक्त विचारधारा के कारण बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले में  मंदिर जा रहे एक दलित बुजुर्ग को अगड़ी जाति के शख्स ने वहां जाने से रोका।  रोके जाने के बावजूद न मानने पर पहले उसके सिर पर कुल्हाड़ी मारी, फिर मौके पर ही जिंदा जला दिया।
आसपास के लोगों ने काफी देर बाद आरोपी को पकड़ा और पुलिस को सूचना दी। जलालपुर थाने के एसओ रामाश्रय यादव के अनुसार, आरोपी को हत्या की धाराओं में गिरफ्तार कर लिया गया है।
जलालपुर के बिलगांव के बाहर मैदानी बाबा का मंदिर बना है। गांव के छिम्मा (90) अपने बेटे दुर्जन, भाई और पत्नी के साथ बुजुर्गों का पिंडदान करने बुधवार को गया जा रहे थे। परंपरा के तहत इसके पहले वह दर्शनों के लिए बुधवार शाम मैदानी बाबा के मंदिर पहुंचे। वहां उन्हें संजय तिवारी मिला और अंदर जाने से मना किया। छिम्मा ने इनकार किया तो संजय बौखला गया और कुल्हाड़ी से वार करने भागा। यह देख छिम्मा की पत्नी और भाई वहां से भागकर मदद मांगने के लिए गांव पहुंचे। इस बीच संजय ने छिम्मा के सिर पर कुल्हाड़ी से कई वार किए। बेसुध होने के बाद उसे केरोसिन डालकर जिंदा जला दिया और आज कोई भी हिन्दुवत्ववादी नेता इन घटनाओ की निंदा नहीं कर रहा है और चुप्पी साधे हुए है. उसी तरह से अल्पसंख्यकों का नरसंहार करने के लिए विभिन्न बहाने ढूंढे जा रहे हैं. दादरी में घटित घटना इस प्रत्यक्ष प्रमाण है. मनुस्मृति (अध्याय - 5, पद्य - 35) में उल्लेख है:- ."(श्राद्ध और मधुपर्क में) तथा विधि नियुक्ति होने पर जो मनुष्य माँस नहीं खाता वह मरने के इक्कीस जन्म तक पशु होता है।"  को नागपुरी जब चाहे माने, जब चाहे न माने अल्पसंख्यकों को मारना पीटना हो तो गाय हमारी माता है अन्यथा मांस उत्पादन में प्रथम स्थान भी चाहिए. 
दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, प्रगतिशील, तर्कशील व बौद्धिक तबके को आगे आकर नागपुरी विचारधारा का विरोध करना पड़ेगा अन्यथा इस देश का यह इतना नुक्सान कर देंगे कि सैकड़ों साल तक उसकी भरपाई संभव नहीं होगी. ऐतिहासिक तथ्यों को भूल कर सम्मान पाने की जिजीविषा में दलित शम्बूक वध भूल कर हिन्दुवत्व वाली विचारधारा की ओर अग्रसर हो रहा है. यह खतरे की घंटी है उसी के लिए. 

सुमन 

शनिवार, 14 मार्च 2015

दलित की नाक कटने पर चुपक्यों ------------------दलित राजनीति

Displaying anil yadav pic.jpgजालौन जिले के सुरपति गांव के अमर सिंह दोहरे उस वक्त चर्चा में आए जब यह मामला सामने आया कि उच्च जाति के लोगों के साथ खाना खा लेने के बाद उनकी नाक काट ली गई। उच्च जाति के लोगों ने दोहरे की नाक इसलिए काट ली कि उनकेसाथ खाना खाने की वजह से समाज में उनकी नाक कट गई थी। यह घटना उत्तर प्रदेश के उस दलित बाहुल्य गांव की है जिसमें दलित आबादी पचास फीसदी से अधिक है। वैसे तो न सिर्फ यह बुंदेलखंड या फिर यूपी ही नहीं बल्कि देश की ऐसी घटनाओं के लिए जाना जाता है बस फर्क इतना सा है कि इन घटनाओं पर देश ‘शर्मसार’ होकर इंडिया गेट पर ‘कैंडिल’ नहीं जलाता है। पर जिस बुंदेलखंड क्षेत्र को एसटी/एससी आयोग ने भी दलित ंिहंसा के लिए अति संवेदनशील घोषित किया है उस प्रदेश में यह कैसा ‘समाजवाद’ या फिर ‘बहुजनवाद’ पल रहा है, इसकी तफ्तीश जरूरी हो जाती है। क्योंकि यहां यह तर्क भी नहीं टिकता कि दलित या फिर पिछड़ा सत्ता को नियंत्रित नहीं कर रहा है।
                                                                           ठीक इसी दौर में उस राजनीति जिसके खिलाफ गोलबंद होने के नारे के साथ ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति सत्ता के शिखर पर पहुंची हैं उसी ने पिछले दिनों अछूतों को धर्मयोद्धा करार देते हुए ‘कोई नहीं दलित-अछूत, सब हैं भारत माता के सपूत’ का नारा दिया। विहिप नेता अशोक सिंघल द्वारा फरवरी 2015 में इलाहाबाद के विहिप सम्मेलन से किया यह आह्वान हो या फिर 1983
में भाजपा के समरसता आंदोलन के दौरान कालाराम मंदिर के पुजारी का दलितों के प्रति अपने पूर्वजों के व्यवहार पर मांफी मांगने की परिघटना स्पष्ट संकेत देती हैं कि हिन्दुत्वादी राजनीति दलितों को समाहित करने के लिए हर स्तर पर समरस हो सकती है। जिस कालाराम मंदिर में प्रतिरोध स्वरूप जब अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों के प्रवेश के वक्त उनकी हत्याएं की जाती हैं उस मंदिर के इस लचीलेपन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
                                                      यह तब और जरूरी हो जाता है जब यूपी में बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या गोबर-गणेश की पूजा को अंधविश्वास व आडंबर बताते हुए नकारते हैं तो बसपा की सुप्रिमो मायावती इसे मौर्या के निजी विचार कहते हुए किनारा कर लेती   हैं। यह सब उस उत्तर प्रदेश में हो रहा है जहां इसी बुंदेलखंड में सितंबर 2014 में झांसी के एक दलित युवक को उच्च जाति के लोगों ने मल-मूत्र ही नहीं खिलाया बल्कि उस युवक के प्राइवेट पार्ट में आग भी लगा दिया। यह सवाल हो या फिर ऐसे बहुतेरे सवाल इन सवालों को न उठाने के पीछे ठोस विचार काम करता है। बहरहाल, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के    लोकतांत्रिकअधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन रिहाई मंच ने इस सवाल को न सिर्फ उठाया बल्कि फरवरी में विधानसभा सत्र के दौरान ‘इंसाफ दो’ धरना देकर अमर सिंह दोहरे के इंसाफ की मांग की। पर सवाल यह है कि सामाजिक न्याय और दलित राजनीति की जुगाली करने वाले नेता अंधविश्वास व रूढि़वादी विचारों के खिलाफ उस दौर में चुप्पी साध रखे हैं जब नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पंसारे की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी
जाती है कि वह उन दकियानूस विचारों के खिलाफ सशक्त जनप्रतिरोध खड़ा करते हैं। इसके विपरीत जिस दूसरी राजनीति ‘तिलक, तराजू और तलवार’ को जूते मारने की बात कहकर व्यापक दलित समाज को संबोधित करते हुए सत्ता का सफर तय किया वह ‘गोबर-गणेश’ के सहारे सोशल इंजीनियरिंग कर रही है। 2012 के विधानसभा चुनावों में एक बसपा नेता ने तर्क दिया कि भारतीय राजनीति कीमुख्यधारा से दलित और ब्राह्मण कटे रहे हैं, इसलिए यह गठजोड़ जरूरी है।
                                       दलित अस्मिताओं की राजनीति अपने इतिहासबोध से कोसों दूर मनुवादी व्यवस्था
में ही अपने अस्तित्व की तलाश कर रही है। एक तरफ दलित नेता अपनी अस्मिताओं का रोना रोते हैं, वहीं जब सवाल दलित उत्पीड़न का आता है तो वोट बैंक की राजनीति का पहाड़ा पढ़ाने लगते हैं। वस्तुतः दलित राजनीति अपने अपमानबोध से संघर्षों की यात्रा को भुला चुकी है। तभी तो दल राजनीति का खुद को अगुवा बताने वाले ‘लाल फीता धारियों’ के वर्चस्व वाले संगठन भी दलित हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं और अपना दायित्व जनपदीय, प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मेलनों तक ही सीमित रखते हैं। जब व्यवहारिक  राजनीति की बात आती है तो सरकारी नौकरी की दलील देते हुए और उसमें बना रहना ‘दलित समाज’ के लिए कितना जरूरी है, कहते हुए प्रतिरोध की संस्कृति को नकार देते हैं। वह जरूर मूल निवासियों के गौरवशाली इतिहास का प्रवचन करते हैं पर उस इतिहास के व्यवस्था विरोधी तेवर को वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ न खड़ा हो इसका हर संभव प्रयास करते हैं। ऐसा इसलिए कि उनका अस्तित्व बरकरार रहे।
                                                           एक तरफ जब देश ‘नमामि गंगे’ में मशगूल है तो वहीं इसकी कर्ता धर्ता और बुंदेलखंड इलाके से ही सांसद उमा भारती के निर्वाचन क्षेत्र में एक दलित की इसलिए हत्या कर दी जाती है कि उसने उन सामंती तत्वों की पार्टी को वोट नहीं दिया था। ऐसे में आदर्श गांव की जो परिपाटी देश में रचने की कोशिश की जा रही है उसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अब सवाल यह है कि क्या केन्द्र सरकार संघ के ‘आदर्श ग्राम’ के एजेंण्डे पर तो काम नहीं कर रही है? आरएसएस के पास आदर्श ग्रामों को स्थापित करने का एक पुरातनपंथी खाका है। जिसमें दलितों और पिछड़ों का सैन्यीकरण करते हुए उनको उच्च जातियों का रक्षक अथवा हिंदू धर्म का योद्धा बताया जाता है। यदि उत्तर भारत में संघ द्वारा प्रचारित धारणाओं पर गौर करें तो पूरा मामला साफ हो जाता है। उदाहरण के तौर पर दलित जातियों के बाल्मीकी और पासी समुदाय को लिया जा सकता है। बाल्मीकी समुदाय को संघ परिवार ने क्षत्रिय बताते हुए यह धारणा
गढ़ी है कि वे उन्होंने मुसलमान बनना नहीं स्वीकार किया भले ही इसके एवज में उनसे मल-मूत्र साफ करवाया जाने लगा। ठीक इसी तरह पासी जाति को सूअर पालन की नसीहत जमीनी स्तर पर संघ परिवार के नेताओं द्वारा दी जाती रही है। ताकि पहले की तरह वह सूअर पालन करके आदर्श ग्रामों की मुसलमानों से रक्षा करें। 2014 लोकसभा का चुनाव इस बात की पुष्टि करता है कि संघ परिवार और भाजपा का यह अस्मिताओं का मायाजाल इस तरह फैल चुका है जिसका कोई काट दलित राजनीति के पास नहीं है।
                                            कमण्डल की राजनीति के गर्भ से उपजी अस्मिताओं की राजनीति के पास शायद अब नैतिक साहस भी नहीं बचा है कि वह दलित हिंसा पर अपना प्रतिरोध दर्ज करा पाए। इसीलिए अमर सिंह दोहरे की नाक काटे जाने पर अस्मितावादी राजनीति आपराधिक चुप्पी साधे हुये है।
 -अनिल कुमार यादव

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-3-2

भँवर मेघवंशी

दलित साहित्य की अखिल भारतीय दुकान
    तो लीजिए साहब एक चिट्टी मुझे मिली है, जिसमें कहा गया है कि इस साल का अंबेडकर विशिष्ट फेलोशिप अवार्ड मुझे दिया जाएगा, है ना वाकई खुशी की बात, घर बैठे ही यह सौभाग्य प्राप्त होने जा रहा था, दूर दिल्ली में बैठे पारखीजन मेरे बारे में जान चुके थे, तभी तो यह अवसर आया है, मैंने इसे अखबार में छपवाने की सोची, आखिर मेरे इलाके में मुझे यह पहला अवार्ड मिलने जा रहा था, लेकिन मैं इस खबर को छपवा पाता इससे पहले ही कई और सज्जनों की खबरें छप गईं कि उन्हें भी अम्बेडकर फेलोशिप अवार्ड से इसी साल दिल्ली में नवाजा जाएगा, ऐसे लोग भी जिन्हें दलित साहित्य से कोई लेना देना न था, एक श्रीमान तो इतने महान थे कि साहित्य का शब्दार्थ तक नहीं बता पाने में सक्षम, लेकिन अवार्ड के हकदार हो गए, हद तो यह थी कि एक ऐसे ब्राह्मण शिक्षक जिन पर दलित उत्पीड़न का आरोप था, वे भी भारतीय दलित साहित्य अकादमी की ओर से अम्बेडकर फेलोशिप अवार्ड के लिए नामित कर दिए गए, जाँच पड़ताल की तो पता चला कि ये अवार्ड हर साल थोक के भाव बेचे जाते है, जिसके खीसे में दम होता है वह खरीद लेता है, मुझे भी जो चिट्ठी मिली, उसमंे पंजीयन शुल्क के नाम पर रुपये माँगे गए थे, लिखा था कि इस वर्ष का अम्बेडकर विशिष्ट फेलोशिप अवार्ड आपको दिया जाना तय हुआ है, कृपया दिल्ली तालकटोरा स्टेडियम में आ कर महामहिम राष्ट्रपति महोदय के हाथों से स्वीकार करें। आप तो जान ही गए होंगे कि ये अवार्डों के होलसेल विक्रेता सुमनाक्षर साहब हैं, जो दिल्ली में बिराजते हैं, दलित साहित्य अकादमी चलाते हैं, बाबा साहब अम्बेडकर एवं अन्य दलित महापुरुषों को इन्होंने जितना बेचा, उतना तो किसी बनिए ने किराना की दुकान में जीवन भर में शक्कर, चाय की पत्ती भी नहीं बेची होगी। हर साल थोक के भाव अम्बेडकर से लेकर जगजीवन राम और कबीर से लेकर फुले तक के नाम से तरह-तरह के, हर कीमत के फेलोशिप अवार्ड बेचते हैं। पैसा लेकर किसी को भी दे सकते हैं, हमारे भीलवाड़ा में तो अब तक सैंकड़ों लोग इस स्कीम का फायदा उठा चुके हैं, अवार्ड पिपासु लोग सुमनाक्षर जी की सेवाओं का जमकर लाभ उठाते रहते हैं, ज्यादातर प्राइमरी टीचर इससे लाभान्वित हुए हैं, कई लोग जो निजी जीवन में घनघोर दलित विरोधी हैं, वे भी सम्मान पा गए, जिन्हें दलित साहित्य का ककहरा भी नहीं पता, वे भी सुमनाक्षर साहब की कृपा से पुरस्कृत साहित्यकार की श्रेणी में आ गए, ऐसे तमाम बगुले अपने चेहरों पर साहित्य का नकली मुखौटा लगा कर हंस बने घूमते रहते हैं, समाचार पत्रों में खरीदी हुई फेलोशिप के मिल जाने की बधाइयों के विज्ञापन छपवा कर महान बनते हंै।
    मैंने पैसा लेकर अवार्ड देने के इस खेल का हिस्सा बनने के बजाए अकादमी के कर्ताधर्ता सुमनाक्षर को चिट्टी लिखी कि आपकी हिम्मत कैसे हुई इस प्रकार का फर्जी अवार्ड मुझे देने की घोषणा करने की, मैं इसे सम्मान नहीं अपना अपमान समझता हूँ, आइन्दा ऐसी हरकत न करें और बाबा साहब के नाम पर इस तरह की फेलोशिप बेचना बंद करें। अंत में मैंने उन्हें यह सलाह भी दी कि वे तालकटोरा में दलित महापुरुषों की बिक्री करने का पापकर्म करने के बजाए हाथ में भीख का कटोरा ले लें, ताकि अम्बेडकर की विचारधारा और दलित साहित्य बदनाम नहीं हों, इसका असर यह हुआ कि उन्होंने फिर कभी मेरा चयन किसी भी अवार्ड के लिए नहीं किया, पर उनका दलित साहित्य के नाम पर यह धंधा आज तक जारी है। हर साल देश भर में हजारों लोगों को मूर्ख बनाने के लिए अवार्ड की घोषणा करने वाली चिट्ठियाँ भेजी जाती हैं, प्रसिद्धि चाहने वाले कई लोग इनके चंगुल में आकर अपनी जेब कटवा बैठते हैं, फिर ऐसे तमाम मूर्ख बन चुके लोग दिल्ली में बुलवाए जाकर आयोजन स्थल पर लम्बी कतार में खड़े करवा दिए जाते हैं, कुछ लोगों को वहाँ लाए गए अतिथि के हाथों अवार्ड दिला दिए जाते हैं, शेष को खाली प्रशस्तिपत्र ओर स्मृति चिह्न पकड़ा दिया जाता है। खुद का नाम भी खुद ही भरकर सम्मानित होना पड़ता है क्योंकि मंच तक पहुँचने की धक्कामुक्की में पहले काफी अपमान हो चुका होता है, जो जितना पैसा दे सकता है, वह उतने ही बड़े अवार्ड का हकदार हो जाता है। वर्षांे से दलित साहित्य की यह अखिल भारतीय दुकान अपना धंधा कर रही है। देश भर में जगह जगह पर सुमनाक्षर एंड कम्पनी के इस कारोबार से कई साहित्य माफिया जुड़े हुए है, मेरे शहर में तो भारतीय दलित साहित्य अकादमी का जिला अध्यक्ष एक ऐसा गैंड़ा टाइप आदमी बन बैठा जो दलित युवाओं से अवैध शराब की तस्करी करवाता था और गरीब दलित परिवारों को दस रुपये सैंकड़ा की ब्याज दर पर पैसा देकर शोषण का काम करता था। इस व्यक्ति को साहित्य किस चिड़िया का नाम है और उसका क ख ग क्या है, यह तक पता नहीं, जय भीम कहने में ही मुँह से थूक निकलने लगता और साहित्य शब्द का उच्चारण तक उसके बस की बात नहीं, वह हमारे दलित साहित्य का सिरमौर बना, उसने साहित्य के नाम पर खूब गंध मचाई और खूब सारे फर्जी लोगों को फेलोशिपें दिलाईं। एक बार तो उन्हें यह गलतफहमी हो गई कि वे अम्बेडकर के समकक्ष हो गए हैं।
    दलित साहित्य के नाम पर जो साहित्यिक माफिया देश भर में खड़ा हुआ, वह दलित रचना संसार के लिए शर्मनाक बात ही कही जा सकती है, वैसे भी दलित साहित्य में आत्मकथा लेखन के नाम पर जिस प्रकार सदलित लेखकों ने अपनी यौन कुंठाओं का बाजारीकरण किया है तथा भोगे हुए यथार्थ के नाम पर वाहियात घटनाओं का अतिरंजित चित्रण किया है, वह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। क्या कहानियाँ लिखी गई हैं? किसी की पत्नी ने पति को मरवाने के लिए भेड़िया पाला, तो किसी की पत्नी अपने ही पति के सगे भतीजे के साथ हमबिस्तर हो गई। किसी ने पति को मारने के लिए जहर दे दिया तो कोई किसी के साथ भाग गई, किसी ने असफल प्यार में जूते खाए तो किसी ने खुद के ही बाल नोचे, क्या गजब के अनुभव हैं, घर की गंदगी को सजा कर बाजार में ले आए और उसे सबको परोस कर महान दलित साहित्यकार बन गए। सवर्ण जातिवादी साहित्यकारों ने ऐसी तमाम सारी बेहूदी आत्मकथाओं को अद्भुत रचनाएँ घोषित करके इस कूड़े के ढेर को श्रेष्ठ दलित साहित्य बना डाला, मगर आज भी मैं सोचता हूँ कि इन कतिपय कहानियों को पढ़ कर या जान कर दलित समुदाय स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेगा या संतप्त? कुछ भी समझ में नहीं आता है, मेरी इच्छा होती है कि मैं कथित महान दलित साहित्यकारों से पूछँू कि क्या हम भारतीय जातिवादी साहित्यिक तत्वों का मनोरंजन करने के लिए दलित साहित्य का तमाशा कर रहे हैं या अपने समुदाय को दिशा देने के लिए जलती हुई मशाल थामे हुए हैं, कई दलित साहित्यकारों ने प्रतिरोध और परिवर्तन के स्वर को मुखर करने वाली आत्मकथाएँ भी लिखी हैं, मगर ज्यादातर ने बहुत ही बेहूदगी भरा साहित्य रचा है, जिसे दलित साहित्य कहने के बजाए कचरा साहित्य कहना ही उचित है और ऐसे लोगों को रचनाकार के बजाए कचराकार कहा जाना ही उपयुक्त होगा। आज दलित साहित्य को संघर्ष और प्रतिरोध का साहित्य बनाना जरुरी है, निसंदेह कई लोग यह कर भी रहे हैं, उन्हें लाखों लाख सलाम और जिन्होंने गन्दगी परोसी है, उन्हें लानत और बारम्बार धिक्कार।

-भँवर मेघवंशी 

क्रमस:

लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 4 मार्च 2014

समकालीन दलित राजनीति और अंबेडकर का जाति उन्मूलन का लक्ष्य

गत 28 फरवरी 2014 को लोकतांत्रिक जनता पार्टी (एल.जे.पी.) के अध्यक्ष रामविलास पासवान अपनी पार्टी सहित, एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए। ये वही पासवान हैं, जो 12 साल पहले, गुजरात में कत्ल-ओ-गारत शुरू होते ही एनडीए गठबंधन से यह कहते हुए बाहर हो गए थे कि गुजरात में हो रही हिंसा वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। ताकि ऐसा न लगे कि वे थूक कर चाट रहे हैं इसलिए उनके पुत्र ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों के मामले में क्लीनचिट मिल गर्इ है और इसलिए एनडीए में शामिल होने में कुछ भी गलत नहीं है। कुछ दिन पहले, एक अन्य दलित नेता उदित राज भी भाजपा में शामिल हो गए थे। उन्होंने इस आश्वासन पर भाजपा की सदस्यता ली कि उन्हें लोकसभा का टिकिट दिया जाएगा। महाराष्ट्र में रिपबिलकन पार्टी आफ इणिडया के रामदास अठावले एनडीए का हिस्सा बन गए और उन्हें राज्यसभा के टिकिट से नवाजा गया। ऐसे कर्इ अन्य दलित नेता हैं जो या तो भाजपा के सदस्य हैं या उन दलों से जुड़े हुए हैं, जो कि एनडीए गठबंधन में शामिल हैं। इन सभी नेताओं का यह दावा रहा है कि वे डाक्टर बी.आर. अंबेडकर के अनुयायी हैं। अंबेडकर जाति के उन्मूलन के हामी थे और वे उस हिन्दू राष्ट्रवाद के कड़े विरोधी थे, जिसकी अवधारणा भाजपा-आरएसएस ने दी है।
भारत के स्वाधीनता संग्राम के समय देश में तीन तरह के राष्ट्रवाद असितत्व में थे : भारतीय राष्ट्रवाद, मुसिलम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद। भारत के अधिकांश लोग भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक और अनुयायी थे। अधिकांश हिन्दू और अधिकांश मुसलमान, दोनों ही भारतीय राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे। सामाजिक फिज़ा में सांप्रदायिकता घोलने का काम श्रेष्ठी वर्ग ने किया, जिसमें शामिल थे राजे-रजवाड़े, जमींदार और दोनों धर्मों की ऊँची जातियों के समृद्ध लोग। अंग्रेजों ने बड़ी कुटिलता से धार्मिक राष्ट्रवाद की आग को जलाए रखा। मुसिलम राष्ट्रवादियों ने अलगाववाद की राह पकड़ ली और पाकिस्तान का निर्माण उनकी प्रमुख मांग बन गर्इ। हिन्दू राष्ट्रवादी, धार्मिक राष्ट्रवाद के तो समर्थक थे परंतु पाकिस्तान उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उनका कहना था कि भारत हमेशा से हिन्दू राष्ट्र रहा है। असल में इस दावे में कोर्इ दम नहीं है क्योंकि प्राचीनकाल में राष्ट्र की अवधारणा ही नहीं थी। राष्ट्र-राज्य की अवधारणा आधुनिक है।शायद इसलिए अपनी पुस्तक ''पार्टिशन आफ इणिडया के संशोधित संस्करण में, अंबेडकर ने पाकिस्तान के निर्माण का इस आधार पर पुरजोर विरोध किया कि उससे हिन्दू राज की स्थापना की राह प्रशस्त हो सकती है। उन्होंने लिखा, ''अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें इससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ता परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए''। (पाकिस्तान आर पार्टिशन आफ इणिडया, पृष्ठ 358)। यहां अंबेडकर जिस हिन्दू धर्म की बात कर रहे हैं, वह ब्राह्राणवादी हिन्दू धर्म है जो कि संघ परिवार के हिन्दुत्व का वैचारिक आधार है। 
अंबेडकर ने दलित आंदोलन की नींव रखी। उन्होंने अनुसूचित जाति फेडरेशन का निर्माण किया और उसके बाद रिपबिलकन पार्टी आफ इणिडया की आधारशिला रखी। सन 1952 के आम चुनाव, जिनमें पहली बार भारत के सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिलने वाला था, के पहले, अनुसूचित जाति फेडरेशन ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से गठबंधन कर लिया। अनुसूचित जाति फेडरेशन के घोषणापत्र में ''किसी भी प्रतिक्रियावादी पार्टी जैसे हिन्दू महासभा या जनसंघ के साथ गठबंधन की संभावना को सिरे से नकारा गया था (अंबेडकर के गायकवाड़ को पत्र, पृष्ठ 280-296, गोपाल गुरू द्वारा इकोनामिक एण्ड पालिटिकल वीकली, दिनांक 16 फरवरी 1991 में उद्धृत)। अंबेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जनसंघ-हिन्दू महासभा का अंतिम और दूरगामी एजेण्डा हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है और यह भी कि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना, धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत के विरूद्ध है। अंबेडकर का दलितों के लिए मंत्र था ''शिक्षा प्राप्त करो, संगठित होे और संघर्ष करो। वे जाति के उन्मूलन के हामी थे और स्वंतत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों के समर्थक। वे इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि केवल प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ही शिक्षा प्राप्त करना, संगठित होना और संघर्ष करना संभव हो सकता है। इसलिए उन्होंने हिन्दुत्ववादी राजनैतिक दलों से किसी भी प्रकार के समझौते की बात कभी सोची ही नहीं।
अब क्या हो रहा है? पिछले कुछ सालों में देश में एक नया दलित नेतृत्व उभरा है जो एक ओर अंबेडकर से विचारधारा के स्तर पर जुड़ा रहना चाहता है तो दूसरी ओर, अपनी और अपने परिवार की चुनावी महत्वाकांक्षाओं को भी पूरा करना चाहता है। इसलिए ये नेता बिना किसी संकोच के सांप्रदायिक पार्टियों की गोदी में बैठ रहे हैं। महान कवि नामदेव ढसाल ने शिवसेना की सदस्यता ले ली थी, जिसने अंबेडकर की पुस्तक ''रिडल्स आफ हिन्दुइज्म के प्रकाशन पर भारी हंगामा मचाया था। रामदेव अठावले भी सांप्रदायिक ताकतों के साथ हैं, जिन्होंने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दिलवार्इ है। उदित राज ने भी हिन्दू राज की पार्टी को गले लगा लिया है और रामविलास पासवान ने बेशर्मी से भाजपा के साथ जुुड़ने का निर्णय लिया है। जाहिर है कि उनके इस निर्णय के पीछे दबे-कुचलों की भलार्इ का उददेश्य नहीं है। उन्होंने स्वयं की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए यह निर्णय लिया है। सांप्रदायिक दलों के साथ जुड़ने से दलित नेताओं को भले ही कुछ समय के लिए फायदा हो जाए परंतु ऐसा करके वे हिन्दुत्व-हिन्दू राज की राजनीति को मजबूती देंगे। यह वह राजनीति है जो जाति और लिंग के पदानुक्रम में विश्वास करती है।
भाजपा की दलितों से जुड़े मुददों पर क्या सोच है, इसे केवल एक उदाहरण से समझा जा सकता है। हाल में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखित पुस्तक ''कर्मयोग को वापस ले लिया गया। इस पुस्तक में मोदी ने लिखा है, ''मुझे यह विश्वास नहीं है कि वे (वाल्मीकि) इस काम को केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए करते आए हैं। अगर ऐसा होता तो वे यह काम पीढी़ दर पीढी़ नहीं करते...किसी न किसी समय, किसी न किसी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज व र्इश्वर की प्रसन्नता की खातिर यह काम करना उनका (वाल्मीकि) कर्तव्य है। यह काम उन्हें र्इश्वर द्वारा सौंपा गया है और सफार्इ का यह काम वे सदियों से एक आंतरिक आध्यातिमक गतिविधि के बतौर करते आ रहे हैं। यह पीढि़यों से चल रहा है। यह विश्वास करना असंभव है कि उनके पूर्वज कोर्इ अन्य काम या व्यवसाय शुरू नहीं कर सकते थे।
सफार्इ के कार्य के इसी मुददे को लेकर डा. अंबेडकर ने उस सामाजिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की जो किसी एक तबके के लोगों को ऐसे घिनौने व अपमानजनक काम करने पर मजबूर करती है। यधपि विकास और 'सभी समुदायों की फिक्र के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं परंतु सच यह है कि गुजरात में दलितों की हालत बहुत खराब है। कर्इ जगह उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है और उनके विरूद्ध हिंसा के मामलों में दोषसिद्धी की दर बहुत कम है। हाथों से मैले की सफार्इ का काम अभी भी जारी है और मोदी उसे महिमामंडित कर रहे हैं। दलितों को कर्इ स्थानों पर पानी के स्त्रोतों से पानी नहीं भरने दिया जाता है। गुजरात में कर्इ दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबरें भी आती रही हैं। ये तो हुर्इ हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला गुजरात की बात। परंतु हम उन दलित नेताओं के बारे में क्या कहें जो डा. अंबेडकर के मूल्यों से समझौता कर रहे हैं और राजनैतिक सत्ता हासिल करने की खातिर सामाजिक न्याय और जाति उन्मूलन के अपने दूरगामी लक्ष्य को भुला बैठे हैं। इन नेताओं को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। ऐसे नेताओं के अनुयायियों को भी यह विचार करना होगा कि वे आखिर कब तक इतने घोर अवसरवादी और सिद्धांतविहीन लोगों को अपना नेता मानते रहेंगे।
-राम पुनियानी
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