राष्ट्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राष्ट्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 24 मार्च 2016

राष्ट्र की अवधारणा-शिष्य को पत्र


    प्रिय भुवनेश, मैं राष्ट्र के प्रति तुम्हारी भावना की कद्र करता हूं लेकिन फिर भी कहूंगा कि यह एक कृत्रिम अवधारणा है। जिस तरह से किसी की धर्म या ईश्वर में आस्था होती है उसी तरह तुम्हारी आस्था राष्ट्र में है। किंतु तुम्हारी राष्ट्र के प्रति यह आस्था उतनी ही अंध है जितनी किसी की ईश्वर या धर्म के प्रति होती है। मुझे भी सीमा पर मरने वाले सैनिकों की चिंता होती है किंतु तुमसे अलग मुझे सीमा के दोनों तरफ मरने वालों की चिंता होती है सिर्फ अपनी तरफ के लिए नहीं। ये सैनिक बिना वजह मारे जा रहे हैं। इन कीमती जिंदगियों के अंत को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। मुझे बताओ जब दुश्मन देश के नेता कभी भी प्रेम से मिल सकते हैं, याद है न नरेन्द्र मोदी का अफगानिस्तान से भारत लौटते हुए अचानक पाकिस्तान रूकना और नवाज शरीफ के घर शादी में शरीक होना, तो ये हमारे सैनिकों को क्यों एक-दूसरे से मरवाते हैं? क्या तुमने कभी सुना है कि दुश्मन देश के दोनों नेताओं ने आपस में मिलते समय एक-दूसरे को मारने की कोशिश की हो? यदि आप सीमा पार सैनिकों को भी उतना ही प्रेम से मिलने की छूट दे दो जिस तरह नेता मिलते हैं तो शायद देशों के बीच दुश्मनी रहे ही न। वाघा सीमा के पार दोनों देशों के सैनिकों की यदि आपस में बात करने की इच्छा होती भी होगी तो उन्हें आधिकारिक तौर पर एक-दूसरे से दुश्मनी का ही सार्वजनिक प्रदर्शन करना पड़ता है और हरेक शाम तो दोनों तरफ ऐसा माहौल निर्मित करना पड़ता है कि उनके देशवासी युद्धोन्मादी नारे लगा सकें। कल्पना कीजिए कि इन्हीं सैनिकों को हरेक शाम दोनों देशों के बीच मैत्री बढ़ाने वाला कोई कार्यक्रम करने को कह दिया जाए! पूरा माहौल ही बदल जाएगा। कार्यक्रम के स्वरूप में परिवर्तन के लिए सिर्फ एक सरकारी आदेश ही तो चाहिए! एक देश पहल लेगा तो दूसरे को भी ऐसा ही करना पड़ेगा। यह तो दोनों तरफ के नेता ही तय करते हैं कि उनके देशों के बीच दोस्ती रहेगी अथवा दुश्मनी। आम लोग तो दोनों तरफ शांति ही चाहते हैं। यह मैं अपनी पाकिस्तान की दस यात्राओं के आधार पर कह सकता हूं। तो हमारे नेता दोनों देशों के बीच आपसी समस्यायों का समाधान ढूंढ़ कर बीच की सीमा को वैसा क्यों नहीं बना देते जैसा कि यूरोपीय संघ के देशों के अथवा अमरीका-कनाडा के बीच है? हमारे सैनिक तो अधिकांश ग्रामीण इलाकों के नौजवान हैं जो नौकरी करने के लिए आते हैं। नेता या सम्पन्न लोग अपने बेटों को सेना में नहीं भेजते। मैंने सिर्फ गाज़ा में देखा है कि नेताओं के बेटे भी संघर्ष में मारे जाते हैं, शायद इसलिए कि यह एक बहुत छोटा सा देश है। क्या यह उचित है कि जिन नौजवानों के सामने कोई विकल्प नहीं हम उनके जीवन को कुर्बान कर देते हैं? क्या यह उचित है कि दो नौजवानों जिनमें से एक सीमा के इस पार पैदा हुआ, दूसरा उस पार, को हम अपने-अपने राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाकर, जबकि राष्ट्र की सीमाएं इतिहास में बदलती रहती हैं, एक-दूसरे की जान लेने के लिए आमने-सामने खड़ा कर देते हैं? आखिर भारत और पाकिस्तान 1947 के पहले तो एक ही मुल्क थे और भविष्य में वर्तमान रूप में ही मौजूद रहेंगे इसकी कोई गारण्टी नहीं।
    तुम कहते हो कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनंद इसलिए उठा पा रहे हैं क्योंकि हमारे भारत माता को समर्पित सैनिक सीमा पर हमारी रक्षा कर रहे हैं। तुम्हें इस बात का भी अंदाजा तो होगा ही हम जिंदगी का आनंद उठा पाते हैं क्योंकि हमारे किसान की मेहनत से हमारे सामने खाने की मेज पर दिन में तीन-चार बार खाना आ जाता है। पिछले 25 वर्षों में करीब तीन लाख किसानों ने इसलिए आत्महत्या कर ली है क्योंकि वे अपने ऋण अदा न कर पाए, जो देश की रक्षा में मारे गए सैनिकों से कई गुना हैं। जो भाव हम सैनिकों के लिए व्यक्त करते हैं क्या हमने किसान के लिए भी कभी ऐसा महसूस किया है? आखिर सैनिक से मिलने वाली सुरक्षा किसान के किस काम की है? भारत का सम्पन्न वर्ग, हमारे नेताओं ने तो अपने लिए नाभिकीय शस्त्रों तक से बचने की भी व्यवस्था कर रखी है, तो सैनिकों के बिना भी जीवित रह सकता है लेकिन किसान के बिना कोई भी जीवित नहीं बचेगा। हमारे सैनिक तो दुश्मनों की वजह से मर रहे हैं लेकिन हमारे किसान अपनी सरकार की नीतियों के कारण मर रहे हैं, जिसे निश्चित रूप से रोका जा सकता है।
    तुम कहते हो कि तुम्हें भारतीय होने पर नाज़ है और तिरंगा झंडा देख कर तुम अपना सर गर्व से उठा लेते हो। ये तो सिर्फ भावनाएं हैं। तुम्हें प्रतीक अच्छे लगते होंगे और तुम भ्रम में रहना पसंद करते हो। यदि सच्चाई का सामना किया जाए तो मुझे शर्म आती है कि मैं भारत का नागरिक हूं क्योंकि मेरे देश की सकल घरेलू उत्पाद विकास दर अच्छी होते हुए भी उसका फायदा सिर्फ यहां का सम्पन्न वर्ग ही उठा पाता है और गरीब को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है। हमारे सामाजिक मानक दुनिया में सबसे खराब हैं। दुनिया में कुपोषित बच्चे सबसे अधिक अनुपात में हमारे देश में हैं। आधे बच्चे विद्यालय नहीं जाते। शौचालय की उपलब्धता की स्थिति भी दुनिया में सबसे खराब हमारे यहां है। हम अंतरिक्ष सम्बंधी शोध करने में गर्व महसूस करते हैं लेकिन हमारे यहां सफाई हेतु जिंदा इंसान को सीवर में उतारा जाता है जिनमें से कई की दम घुटने से मौत हो जाती है। अपराधी, धोखेबाजों व भ्रष्ट लोगों का राज है। सरकारी नीतियां इंसान की जरूरतों के हिसाब से नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की संभावनाओं को देखकर बनाई जाती हैं। हम दोगले चरित्र के हैं जो पत्थर की मूर्ति पूजते हैं लेकिन जिंदा इंसान के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। पत्थर की मूर्ति तो आलीशान मंदिरों में रहती हैं लेकिन इंसान सड़क पर सोता है जहां से उसके बच्चे देह व्यापार के लिए गायब कर दिए जाते हैं। घरों के अंदर महिलाएं व बच्चे यौन शोषण से सुरक्षित नहीं हैं। सोनी सोरी की तरह के आदिवासियों के साथ राज्य लगातार अत्याचर करता है क्योंकि उसे उनपर भरोसा नहीं और 15 सालों से एक ऐसा कानून जिससे मावनाधिकार हनन हुआ है को हटाने के लिए उपवास पर बैठी इरोम शर्मीला की बात कोई सुनने को तैयार नहीं। वे लोग जिन्हें सरकार से न्याय नहीं मिला उनसे क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि वे भी तिरंगा देख कर आपकी तरह देश के प्रति गर्व महसूस कर सकें?
    आपने आपे पत्र का समापन ’जय हिन्द, जय भारत’ के अभिवादन के साथ किया है। महान राजनीतिक संत व महात्मा गांधी के अनुयायी विनोबा भावे ने ’जय जगत’ के अभिवादन को लोकप्रिय बनाया था। पर्यावरण को बचाने की जरूरत को देखते हुए शायद अब ’जय सृष्टि’ अधिक उपयुक्त अभिवादन होगा। मानवता के हित में क्या हमें अपनी दृष्टि का विस्तार विश्व या ब्रह्माण्ड तक नहीं करना चाहिए? आशा है तुम इन सब बातों पर विचार करोगे।
सप्रेम, संदीप
(यह पत्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग के बी.टेक. अंतिम वर्ष के छात्र भुवनेश कुमार शर्मा के मेरे जवाहरलाल नेहरू वि.वि. में 10 मार्च, 2016 को दिए गए भाषण में राष्ट्र की अवधारणा से विचलित होकर लिखे पत्र के जवाब में है। भुवनेश शैक्षणिक सत्र 2014-15 में डेवलेपमेंट स्टडीज़ की मेरी कक्षा में छात्र रह चुके हैं।)
- संदीप पाण्डेय

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

नागपुरी हिन्दुवत का असर


हरियाणा में फरीदाबाद के सनपेड गांव के एक दलित परिवार पर दबंगई का कहर टूट पड़ा। बदमाशों ने मंगलवार तड़के पेट्रोल छिड़ककर पूरे दलित परिवार को आग के हवाले कर दिया। इस घटना में कच्चे मकान में सो रहे दो मासूम बच्चों की मौत हो गई और उनके माता-पिता गंभीर रूप से झुलस गए। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह परिवार अपने घर में सो रहा था तभी कुछ लोगों ने उनके मकान में पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। घटना में नौ महीने के एक बच्चे और उसकी ढाई साल की बहन की मौत हो गई। गंभीर रूप से झुलसे उनके माता- पिता को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
हरियाणा के फरीदाबाद में चार दलितों के उपर पेट्रोल डालकर जलाने की घटना कोई आश्चर्य पूर्ण बात नही है यह तो होना ही है नागपुरी हिन्दुवत की विषाक्त विचारधारा ने अल्पसंख्को के खिलाफ जो वातावरण तैयार किया उसका प्रभाव समाज में असर दिखने लगा है .हिन्दुवत की विचारधारा के अनुसार दलित सेवा करने के लिए है और उन्हें सेवा के अलावा कोई कार्य नही कर सकते है . भारतीय समाज में जातिव्यवस्था के अनुसार वह मंदिर में प्रवेश करने के अधिकारी नही है लेकिन समाज सुधारको के प्रयासों से उन्हें मंदिर में प्रवेश करने का थोडा अधिकार मिला तो वह सबसे बड़े हिन्दू हो गएफिर क्या था संघियों ने उन्हें अपना निशाना बनाकर उग्र हिन्दुवत में बदल दिया और मस्लिम विरोध का झंडा भी पकड़ा कर देश में दंगो की अगवाई कराई.लेकिन जब हिन्दुवत मजबूत हुवा तो जातीय व्यवस्था की सिरमौर जातियों की बांछे खिल गई और उन्होंने पुरानी व्यवस्था लागू करना शुरू कर दिया ..जातीय उच्चता बात ने विभिन्न जगहों पर जाति के नाम पर दलितों को मरना पीटना आरम्भ कर दिया . अधिकांश दलित नेता भा ज पा की और से एम. पी.-एम.एल .ए. है वह कुछ बोलने की स्थिथि में नही होता है हरियाणा में बहुत जगहों पर दलितो पर  अत्याचार जैसे  दलित बस्तियों में आग लगाना -पिटाई  करना व बलात्कार आम बात हो गई.भा ज पा शासित प्रदेशो में वोट तो लेने के दलित हिन्दू हो जाता बाद में उसे मनुस्मति के हिसाब  से जीना होता है
सवर्ण  मानसिकता कट्टर हिन्दुवत  से ही पैदा होती है उन विचारो का वाहक संघ है वह देश को एक ऐसे देश में बदलना चाहती है जहाँ सवर्ण जातियों की सेवक अन्य जातिया हो .यह सब ऐसे कदम है जो विनाशकारी है हिटलर का युग वापस लेने  वाले लोगो के यह मंसूबे पुरे नही होने वाले है लेकिन कष्ट तो देगे ही . भारतीय संविधान व कानून न मानने वालो  को अब देशद्रोही  नही  कहा जाता है नई राष्ट्र भक्ति की परिभाषा के अनुसार देश्द्रोहिता  करो -संविधान कानून न मानो उलटे राष्ट्र भक्ति  के गीत गुनगुनाओ तभी आप संघी राष्ट्र वादी होगे.
-रणधीरसिंह   सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 13 अगस्त 2012

साम्राजी ताकतों से सम्बन्ध और देश की आजादी का सवाल-2


अब अगर ब्रिटेन के इस एकाधिकारी लूट - पाट एवं प्रभुत्व के संबंधो से अलग करके अंग्रेजो द्वारा ब्रिटिश राज की स्थापना एवं संचालन को ही देश की गुलामी मान लिया जाय तो इससे गुलामी के मूल सम्बन्ध छिपने ही नही जायेंगे , चर्चा तक में नही आयेंगे | फलत: ये सम्बन्ध छिप ही नही जायेंगे बल्कि विरोध से बच जायेंगे और ज्यो के त्यों बने रहेंगे | 1947 में यही हुआ है |
राज के संचालन से अंग्रेजो के हटने और उस राज पर हिन्दुस्तानियों के चढने को ही परतंत्रता का अन्त और स्वतंत्रता का शुभारम्भ घोषित कर दिया गया | मुख्यत: इसीलिए ब्रिटेन और ब्रिटेन की कम्पनियों के साथ बने संबंधो को संचालित करने वाले राज का ढाचा भी जस का तस रह गया | उसमे मुख्य परिवर्तन हुआ तो यही की उसके मुख्य संचालक अब अंग्रेज नही बल्कि भारतीय थे | उच्च अफसरशाही में अंग्रेज नही बल्कि भारतीय बैठे हुए थे | इस राज के मूल ढाचे को ज्यो का त्यों बने रहने का एक बड़ा सबूत यह भी है अभी भी सारे प्रमुख या बुनियादी कानून ब्रिटिश दासता के काल के ही बने हुए है और लागू भी है | कोई भी समझ सकता है की कानून का राज कहे जाने वाले आधुनिक भारतीय राज में अगर मूल या प्रमुख कानून ही दासता के काल के हो तो उसे स्वतंत्र और जनतांत्रिक राज कहना या बताना न्याय संगत नही कहा जा सकता |
इसलिए आँखे मूंदकर 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता को मनाने या मानने की जगह अब यह अहम सवाल खड़ा होना चाहिए की 1947 में ब्रिटेन के साथ लूट व दस्ता के आर्थिक संबंधो को बनाये रखकर फिर ब्रिटिश राज उसके शासन -- प्रशासन के मूल ढाचे को , उसे संचालित करने वाले प्रमुख कानूनों को बनाये रखकर 1947 में घोषित स्वतंत्रता को क्या राष्ट्र की स्वतंत्रता माना जाए ? या स्वतंत्रता के रूप में छिपी परतंत्रता ? देश का धनाढ्य वर्ग , कम्पनिया और देश का उच्च हुकुमती तथा गैर हुकुमती हिस्सा इसे स्वतंत्रता मानता है , क्योकि उसे राज के संचालन नियंत्रण से लेकर देश के संसाधनों की लूट का प्रभुत्व अधिकार मिल गया है | ब्रिटिश राज के रहते ही इस देश की धनाढ्य कम्पनियों को तथा उच्च हिस्सों को ( खासकर 1920 के बाद से ) ये अधिकार बढ़ते रहे थे जो 1947 में ब्रिटिश सरकार के आसन पर चढने के साथ परिपूर्ण हो गये | आपसी समझौते से मिली इस स्वतंत्रता में सत्ताधारी , भारतीयों को ये अधिकार ब्रिटेन के साथ ब्रिटिश दासता के समय में बनते बढ़ते रहे आर्थिक , राजनितिक , सामाजिक , सांस्कृतिक संबंधो को बनाये रखने के लिए ही मिले थे | यही सम्बन्ध बाद के दौर में अमेरिका और अन्य साम्राज्यी देशो से भी बढ़ते रहे है | इसके फलस्वरूप इस देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा साम्राज्यी देशो के सहयोग व साठगाठ से और ज्यादा धनाढ्य एवं अधिकार सम्पन्न होता गया है | लेकिन इन्ही स्थितियों एवं संबंधो खासकर आर्थिक , कुटनीतिक संबंधो के चलते जनसाधारण हिस्से की बुनियादी समस्याए -- महगाई , बेकारी से लेकर साधन -- हीनता , अधिकारहीनता की समस्याए प्रत्यक्ष ब्रिटिश दासता काल से लेकर आज तक न केवल विभिन्न रूपों में बढती भी रही है | इन संबंधो में जीते -- मरते हुए कोई भी गम्भीर व समझदार आदमी जनसाधारण के लिए इसके निरंतर बदतर होती दिशा या कहिये जन्घाती दिशा का पूर्वानुमान लगा सकता है | ऐसी स्थिति में जन साधारण 1947 की स्वतंत्रता को ज्यादा से ज्यादा ऐसी आशिक स्वतंत्रता कह सकता है , जिसके भीतर परतंत्रता के मूल सम्बन्ध मौजूद थे व है | बाद के दौर में और वे बढ़ते भी रहे है | इसीलिए ब्रिटिश काल से आज तक चली आ रही अपनी इस परतंत्रता तथा संकटों से युक्त अपनी स्थितियों को बदलने के लिए भी तथा 1947 की स्वतंत्रता को पूर्ण स्वतंत्रता में बदलने के लिए भी देश के इसी जनसाधारण को अपरिहार्यत:खड़ा होना पडेगा | इसके लिए अब साम्राज्यी देशो के साठ लूट व प्रभुत्व बनाये रखने वाले संबंधो को तोड़ने इससे इस राष्ट्र को मुक्त कराने औनिवेशिक काल के कानूनों को खत्म करने और औपनिवेशिक राज्य के ढाचे को राष्ट्र हित एवं जनहित के जनतांत्रिक ढाचे के रूप में बदलने की जिम्मेवारी भी अब देश के जनसाधारण की ही है | इसलिए उसे ही 1947 के वास्तविक चरित्र को अब अपरिहार्य रूप से समझना होगा |

सुनील दत्ता ....पत्रकार

साम्राजी ताकतों से सम्बन्ध और देश की आजादी का सवाल



1947 में अंग्रेजो द्वारा बनाये गये राज शासन - प्रशासन के संचालन व नियंत्रण के अधिकार हिन्दुस्तानियों के हाथ में आ जाने को ही राष्ट्र की स्वतंत्रता का द्योतक माना जाता है | क्योंकि राष्ट्र की परतंत्रता या गुलामी को मुख्यत: ब्रिटिश राज और उसके राष्ट्रव्यापी प्रभुत्व में ही निहित माना जाता था व है | इसे मानने को दो तीन प्रमुख कारण है | पहला तो किसी क्षेत्र या राष्ट्र का राज्य ही उसका सर्व प्रमुख और सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में नजर आता है | चाहे वह सामन्ती रहा ब्रिटिश राज हो या चाहे किसी देश का स्वतंत्र माना जाने वाला वर्तमान दौर जैसा जनतांत्रिक राज हो | इसका दुसरा कारण यह है ब्रिटिश राज ही ब्रिटेन द्वारा देश की श्रम संपदा की लूट- पाट को संचालित करने के साथ इसके विरोध के राष्ट्रव्यापी दमन का काम प्रत्यक्षत: करता रहा था | उसके लिए नीतियों और कानूनों को लागू करता रहा था | इसका तीसरा कारण खुद इस राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में लगी रही शक्तियों के एक हिस्से द्वारा लगातार किया जाता रहा यह प्रचार की राज्य का संचालन अंग्रेजो के हाथ से देशवासियों के हाथ में आते ही यह राष्ट्र स्वतंत्र हो जाएगा | जैसा की 1947 के बाद कहा और मान गया |

इन तीनो प्रमुख कारणों के चलते राज व शासन प्रशासन से हटते ही इस देश की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र मान लिया | सवाल है की क्या ऐसा मानना ठीक है ? अशत: जाहिरा तौर पर तो ठीक है , लेकिन दरअसल व मुकम्मल तौर पर इसे राष्ट्र की स्वतंत्रता मानना गलत है भ्रामक है | क्योंकि किसी भी परतंत्र व्यक्ति , वर्ग या राष्ट्र की परतंत्रता उसको परतंत्र बनाने वाली द्रश्य या अदृश्य शक्ति में नही है , बल्कि मुख्यत: उन उद्देश्यों व संबंधो में निहित होती है जो उसे परतंत्र बनाने के लिए बनाये गये होते है | इसलिए ब्रिटिश काल में इस देश की परतंत्रता को जानने समझने के लिए ब्रिटेन द्वारा इस देश के साथ बनाये गये संबंधो और उद्देश्यों को
जरुर देखा जाना चाहिए |

सभी जानते है की ब्रिटेन के साथ इस राष्ट्र के दासता के संबंधो की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने की थी | यह उसके विश्वव्यापी बाजार और उस पर एकाधिकार के प्रयासों का ही एक हिस्सा था , ताकि कम्पनी अपने व्यापार , बाजार व लाभ -- मुनाफे का निरंतर विस्तार कर सके | कम्पनी ने इस देश के साथ सम्बन्ध बढाने के साथ -- साथ उस पर एकाधिकार स्थापित करने में आई हर बाधा को हटाने के लिए सैन्य कारवाइयो को चलाते रहने का भी काम निरन्तर किया | इसी के अंतर्गत उसने सबसे पहले 1757 में बंगाल में छोटे से इलाके में
कम्पनी राज स्थापित किया | फिर बाद में शासन प्रशासन में बदलाव , सुधारों को निरंतर आआगे बढाते हए कम्पनी ने अपने व्यापार के साथ राज्य का विस्तार जारी रखा | कम्पनी ने यह काम पूरे देश की व्यापारिक लूट - पाट के लिए तथा अपने फ्रांसीसी , डच ,जैसे विदेशी व्यापारिक विरोधियो को यहाँ से भगाने के लिए और राजाओं , नबावो द्वारा खड़े किए जाते रहे विरोधो -- प्रतिरोधो को खत्म कर देने के लिए किया था | साफ़ बात है की ईस्ट इंडिया कम्पनी वाला ब्रिटिश राज या 1857 के बाद का ब्रिटिश साम्राज्यी राज ब्रिटेन के साथ बने
इन उन संबंधो के बुनियाद में नही था | उसकी बुनियाद तो ब्रिटिश कम्पनी और 1840 के बाद से खासकर 1857 के बाद सभी ब्रिटिश कम्पनियों के व्यापारिक और फिर औद्योगिक व महाजनी लूटपाट के लिए बनाये व बढाये गये आर्थिक संबंधो में निहित थी | कम्पनी यहा के उत्पादनों को कच्चे मालो को तथा श्रम शक्ति को
सस्ते में खरीदने और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशो के उत्पादन को ऊँचे मूल्यों पर बेच करके भारी लाभ लुटने के व्यापारिक सम्बन्ध शुरू से ही अर्थात अपने राज्य की स्थापना के पहले से ही बनाती रही | बाद में वह देश के समूचे बाजार पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आगे बढाने के साथ देश के कच्चे माल के स्रोतों पर भी लगातार कब्जा जमाती बढाती रही | अपने उद्योग व्यापार के लिए नए किस्म के कच्चे -- पक्के मालो का उत्पादन करवाती रही | नील , अफीम कपास तम्बाकू आदि की खेतियो को बढावा देकर स्थानीय एवं परम्परागत खेतियो को तोड़ने का काम करती रही | दस्तकारियो को नष्ट करने का भी काम किया | इस सारे काम में कम्पनी राज या 1857के बाद ब्रिटेन की संसद सवारा संचालित ब्रिटिश राज , ब्रिटिश कम्पनियों की व्यापारिक लूट व प्रभुत्व के संबंधो को बनाने बढाने एवं चलाने में सहयोग करता रहा | यह राज खुद भी लगान तथा टैक्सों करो आदि के जरिये इस देश की जनता की लूट को उन पर ब्रिटेन के प्रभुत्व व दासता को बढाता रहा | इसके फलस्वरूप और देश के बाजार पर देश की श्रम संपदा पर ब्रिटिश कम्पनियों का और ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित होता रहा |बीसवी शताब्दी अर्थात १९०० की शुरुआत से इन लूट के संबंधो में व्यापारिक औद्योगिक शोषण लूट के साथ महाजनी लूट का सम्बन्ध भी जुड़ गया | अब ब्रिटेन से मालो मशीनों तकनीको के इस देश में निर्यात के साथ पूंजी का भी निर्यात होने लगा | ब्रिटेन के विशाल बैंको व उद्योगों की सम्मलित पूंजी ने इस देश के विभिन्न क्षेत्रो में माल मशीन तकनीक के बिक्री बाजार से भारी लाभ कमाने के साथ देश की श्रम संपदा से सूद दर सूद कमाने का महाजनी सम्बन्ध भी बना लिए | इन्ही संबंधो में ब्रिटिश कम्पनिया लाभ सूद के साथ ब्रिटेन की औध्यिगिक जरूरतों के साथ आम उपभोग के मालो सामानों को भी इस देश से ले जाती रही है | फलस्वरूप ब्रिटेन को धनाढ्य , विकसित था साधन सिविधा व शक्ति सम्पन्न बनाती रही तो इस देश को पराधीन , परनिर्भर , पिछड़ा . गरीब व कमजोर बनाती रही |
मुल्त: इन्ही संबंधो को बढाने व मजबूत करने के लिए ही ब्रिटेन से आधुनिक एवं अंग्रेजी शिक्षा का अंग्रेजी सभ्यता संस्कृति का भी निर्यात किया जाता रहा | और उसके प्रभाव प्रभुत्व को भी इस देश पर फैलाया , बढाया जाता रहा | स्पष्ट बात है की ब्रिटिश राज को स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेजो ने इस देश को अपना गुलाम नही बनाया था , बल्कि मुख्यत: अपने व्यापारिक , औद्योगिक व महाजनी लूट पाट के लिए तथा इस देश के बाजार से लेकर श्रम संपदा पर एकाधिकार प्रभुत्व जमाने के लिए इस देश को पराधीन बनाया था | लूट के इन संबंधो को संचालित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए ही ब्रिटिश राज को , शासन प्रशासन व सैन्य व्यवस्था को स्थापित किया था | इसी के लिए ब्रिटिश राज व शासन -- प्रशासन ने शताब्दियों तक इस देश में एक के बाद एक नीतियों , कानूनों को बनाया व लागू किया | इनका विरोध करने वाले देशवासियों एवं राष्ट्रवादियो को ब्रिटिश राज अपने पूरे दौर में हर तरह के जुल्म व अत्याचार का शिकार बनाता रहा।
क्रमश:

-सुनील दत्ता
पत्रकार
Share |