सोमवार, 9 मार्च 2015

अमरीकी मुखौटा अबू बकर अलबगदादी----2

 यूरोप के कई देश आई.एस.आई.एस. से कच्चा तेल खरीदते हैं अब इस बात में कोई संदेह नहीं है। यह बात स्वयं जना हाइबसकोवा ने स्वीकार किया है जो यूरोपियन यूनियन की इराक में अम्बेसडर हैं। उन्होंने यूरोपियन फारेन अफेयर्स कमेटी के सामने बोलते हुए कहा कि यूरोपियन यूनियन के कुछ सदस्य आई.एस.आई.एस. से तेल खरीदते थे। हालाँकि उन्होंने उन देशों के नाम नहीं बताए। अमरीकी कंपनियाँ भी ब्लैक मार्केट से इस तेल को खरीदने में पीछे नहीं हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस प्रकार से बेचा जाने वाला तेल सऊदी अरब और जार्डन के रास्ते गन्तव्य देशों तक पहुँचता है। सऊदी अरब और जार्डन, अमरीका और उसके द्वारा दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध करने वाले मित्र देशों के बहुत करीबी माने जाते हैं। यह किसी पेड़ को सुखाने के लिए उसकी जड़ में पानी देने जैसा है। दूसरी तरफ अमरीकी कंपनियाँ इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र से तेल की कालाबाजारी कर रही हैं। कुर्दिस्तान से कच्चा तेल अमरीका में टेक्सास की गालवेस्टन बंदरगाह पर पहुँचाया जाता है यह जानकारी अमरीकी प्रशासन को भी है। कोस्टगार्ड के एक अधिकारी सैंडी कैड्रिक के अनुसार उसने यूएस नेशनल सेक्योरिटी कौंसिल और होमलैंड सेक्योरिटी डिपार्टमेंट को टेक्सास की गालवेस्टन बंदरगाह पर आने वाले कुर्दिस्तानी कच्चे तेल के बारे में सूचना दी थी। अमरीकी कानून के अनुसार किसी भी स्वायŸा देश की सरकार से इतर किसी भी स्वायत क्षेत्र से या गैर सरकारी प्रतिष्ठान से तेल की खरीदारी गैरकानूनी है। कुर्दिस्तान क्षेत्र से अमरीकी कंपनियों के तेल खरीदने पर अमरीकी सरकार ने चिंता भी जताई लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए उसने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। जबकि बहुत पुरानी बात नहीं है जब अमरीकी नवसेना ने कथित रूप से लीबियाई मिलीशिया द्वारा बेचे गए तेल को ले जा रहे उत्तर कोरियाई जहाज को सीज कर दिया था। यूरोपीय यूनियन के देशों और अमरीकी कंपनियों का आई.एस.आई.एस. और कुर्द लड़ाकों से कच्चा तेल खरीदने और उन देशों की तरफ से इसके खिलाफ कोई सख्त कदम न उठाने से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि परिस्थितियों का लाभ उठाना उनकी प्राथमिक्ता है न कि आई.एस.आई.एस. को खत्म करना जैसा कि वह दावा करते हैं।
    इसका एक और महत्वपूर्ण पक्ष है आई.एस.आई.एस. को हथियारों की आपूर्ति। आई.एस.आई.एस. जिन हथियारों से यह युद्ध लड़ रहा है उसका पचासी प्रतिशत हिस्सा अमरीकी और यूरोपीय हथियारों का है। एक तरफ इन देशों की कंपनियाँ आई.एस.आई.एस. से तेल खरीदकर उसे आर्थिक रूप से मजबूत कर रही हैं दूसरी और उन्हीं देशों के हथियार इस कथित आतंकवादी संगठन को उपलब्ध हैं। आई.एस.आई.एस. के खिलाफ लड़ाई में एक अहम और निर्णायक मोड़ उस समय आया था जब उसके लड़ाके बड़ी सख्या में कुर्दों के घेरे में आ गए थे लेकिन अमरीका ने उस नाजुक मोड़ पर कुर्दों को दिए जाने वाले हथियार बगदादी के समर्थकों के क्षेत्र में गिरा दिए जिससे पूरी बाजी पलट गई। इस गलती का सारा ठीकरा अमरीका ने इराकी पाइलटों के सिर फोड़ दिया और कहा गया कि अनुभवहीन इराकी पाइलटों की गलती से ऐसा हुआ। जबकि यह पूरा आपरेशन अमरीका की निगरानी में चल रहा था। अमरीका और उसके मित्र देश इराक सरकार को नजरअंदाज करके कुर्द लड़कों को आई.एस.आई.एस. से लड़ने के लिए हथियार दे रहे हैं। पश्चिम की इस नीति से केवल इराक की सम्प्रभुता ही आहत नहीं होती बल्कि आने वाले समय में उसके अस्तित्व को गम्भीर खतरा हो सकता है। अमरीका की इस रणनीति को विशेषज्ञ भविष्य में अलग कुर्दिस्तान राज्य के लिए सशस्त्र संघर्ष की भूमिका के तौर पर देख रहे हैं जो ईरान और तुर्की जैसे देशों को भी अपनी लपेट में ले लेगी। इस तरह यह पूरा क्षेत्र अशांति की भेंट चढ़ जाएगा। इस तरह देखा जाए तो अमरीका केवल आई.एस.आई.एस. के पैदा करने का ही जिम्मेदार नहीं बल्कि इस बहाने से उसे मध्यपूर्व में एक बार फिर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का मौका मिल गया है जहाँ उसकी कंपनियाँ कच्चे तेल और हथियारों की कालाबाजारी कर रही हैं। दिन के उजाले में वह साँप मारने का नाटक करता है और दुनिया की आँख में धूल झोंककर रात के  अंधेरे में उसे दूध भी पिलाता है। जेहादी या आतंकवादी संगठन के तौर पर प्रचारित करके दुनिया को डराना और फिर इस काल्पनिक खतरे से निपटने के नाम पर अपने हित  साधने का यह अमरीकी हथकंडा है। अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन से लेकर इराक में आई.एस.आई.एस. और अलबगदादी के उदय तक अमरीकी साम्राज्य का इतिहास गंदगी से भरा हुआ है। यदि दुनिया अब भी न चेती तो भविष्य में भी वह ऐसे खतरों से पाक नहीं हो सकेगी।
     जहाँ तक मुस्लिम जगत का सम्बंध है उसने अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है। वह आई.एस.आई.एस. के तौर तरीकों को पहले ही एक स्वर में गैर-इस्लामी करार दे चुका है। जार्डेन के पाइलट को जिस क्रूरता के साथ आई.एस.आई.एस. ने जला कर मारा है उसकी पूरी इस्लामी दुनिया में निंदा हुई है। अमरीका विरोधी माने जाने वाले यूसुफ अल-करजावी ने भी उसकी इस हरकत को इस्लाम मुखालिफ बताते हुए कहा है कि आग से जला कर मारने की सजा की इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं है चाहे वह दुश्मन सेना का हमलावर सिपाही क्यों न हो। आई.एस.आई.एस. इस्लाम और मुसलमानों का शुभचिंतक नहीं दुश्मन है।
-मसीहुद्दीन संजरी
मो.09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-03-2015) को "सपना अधूरा ही रह जायेगा ?" {चर्चा अंक-1913} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'