मंगलवार, 10 मार्च 2015

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक



  

 130 साल पुरानी सियासी पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस जो कई नशेब व फराज से गुजर कर अब इस मुकाम पर खड़ी हैं जहाँ उसके वजूद तक पर सवाल उठ रहे हैं। ‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ का सपना अवाम को दिखाया जा रहा है, इन हालात का मुकाबला करने के बजाए कांग्रेसी आपस में ही बयानबाजी कर उलझ रहे हैं। इसका क्या नतीजा मुल्क की सियासत और उसके भविष्य पर पड़ेगा, यह अपने आप में एक अहम सवाल है।
    इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज बम्बई में ब्रिटिश ब्यूरोक्रेट एलेन आॅकटेवियन ह्यूम्स ने इस उद्देश्य से की थी कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जो दूरी ब्रिटिश हुकमरानों व आम जनमानस में बढ़ी थी उसे कम किया जाए और आपसी विश्वास व सहयोग को बढ़ावा दिया जाए, जिससे ब्रिटिश हुकूमत को फिर किसी विरोधी हालात या विद्रोह/बगावत का सामना न करना पड़े।
    कांग्रेस पार्टी की स्थापना बाकायदा ब्रिटिश वायसराय की इजाजत से की गई थी। प्रारम्भ में मात्र 72 सदस्यों से यह पार्टी वजूद में आई थी और उनमें से सब के सब ऊँचे ओहदों पर बैठे सरकारी अफसर व राजे महराजे ही थे और इसका दायरा केवल महाराष्ट्र, बंगाल एवं पंजाब तक ही सीमित था।
      द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्रपाल, लाला लाजपतराम व मुहम्मद अली जिनाह ने स्वराज्य का नारा देकर इंडियन नेशनल कांग्रेस का ताल्लुक आम हिन्दुस्तानियों से पैदा किया और फिर इसमें मोतीलाल नेहरू, चितंरजन दास, राजगोपालाचारी, नरहरी पारिख जैसे लीडर जुड़ते चले गए।
    प्रारम्भ में कांग्रेस से मुसलमान नहीं जुड़ा था और मौलाना मुहम्मद अली जौहर, शौकत अली जौहर, हसरत मोहानी, हकीम अजमल खाँ, सैयद अताउल्ला शाह, बैरिस्टर जान मुहम्मद जुनेजो, डाॅ0 मुख्तार अहमद अंसारी और पीर गुलाम मुजाहिद सरहंगी (प्रथम) जैसे मुस्लिम लीडर अंग्रेजों द्वारा तुर्की की खिलाफते उस्मानिया तहरीक को कुचलने से नाराज होकर भारत में खिलाफत तहरीक का परचम उठाए हुए थे और अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करने की तहरीक चला रहे थे जिसका असर न केवल मुसलमानों बल्कि गैर मुस्लिम कौमों पर भी पड़ना शुरू हो गया था। यह वह दौर था जब मोहनदास करम चन्द्र गांधी, बार एट लाॅ नाम का एक व्यक्ति दक्षिणी अफ्रीका से रंग भेद की नीतियों के विरूद्ध मोर्चा अंग्रेजों से लेकर लौटा था। गांधी ने जब देखा कि मुल्क में एक ओर इंडियन नेशनल कांग्रेस है जिसके अधिकांश लीडर हिन्दू धर्म से जुड़े हुए हैं और दूसरी ओर खिलाफत की तहरीक है जिसके झंडे तले मुसलमान अंग्रेजी हुकूमत से मोर्चा लेने की कोशिश में जुटे जुए हैं। गांधी ने मौके की नजाकत को भाँपकर कांग्रेस का समर्थन खिलाफत तहरीक के हक में कर दिया और असहयोग आन्दोलन की जंग में स्वराज्य को शामिल कर कांग्रेस मंे मुसलमानों के प्रवेश के दरवाजे खोल दिए। इसके नतीजे में ब्रिटिश हुकूमत के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। कहाँ तो अंग्रेजों ने कांग्रेस जैसे एक सियासी दल को अपने रिश्ते भारतीय जनता से खुशगवार बनाने के लिए खड़ा किया था लेकिन गांधी ने दांव उलट दिया और इंडियन नेशनल कांग्रेस का प्लेटफार्म अंग्रेजों के खिलाफ ही इस्तेमाल होना शुरू हो गया। अंग्रेज इस बात से काफी फिक्रमंद थे, कि अचानक गोरखपुर के चैरी चैरा में असहयोग आन्दोलन हिंसक हो गया और 23 सिपाहियों को जिन्दा पुलिस चैकी में भीड़ ने जला दिया। जिसमें अधिकांशतः भारतीय सिपाही थे। गांधी ने इस बात से दुःखी होकर असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा 1942्र में कर दी। खिलाफत तहरीक से जुड़े लीडर मुहम्मद अली जौहर इत्यादि तथा गांधी के बीच इस मुद्दे पर विवाद का पूरा लाभ अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने अपनी कूटनीतिक चालों से एक तरफ हिन्दुओं को भड़का कर हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उदय में अहम भूमिका अदा की तो उसके जवाब में मुहम्मद अली जौहर ने इंडियन मुस्लिम लीग की ओर पुनः वापसी कर ली। एक और बात अली भाइयों को कांग्रेस के विरुद्ध ले गई वह यह कि अंग्रेजी शासकों की मंशा के अनुरूप मोती लाल नेहरू द्वारा लिखित एक संविधान के अधीन देश में भारतीय हुकूमत का समर्थन कांग्रेस करने पर राजी हो गई थी। इस पर मुहम्मद अली जौहर राजी नहीं थे।
    कांग्रेस में मौलाना अबुल कलाम आजाद ही सबसे वफादार मुस्लिम कांग्रेसी साबित हुए और बाकी साथ निभाया अफगानिस्तान के पश्तो लीडर खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने। 1937 में गवर्नमेन्ट आॅफ इण्डिया एक्ट के तहत होने वाले प्रान्तीय चुनावों में मद्रास, सेन्ट्रल प्राविन्सेज बिहार, उड़ीसा, यूनाइटेड प्राविन्सेज बम्बई प्रेसीडेन्सी, आसाम, नार्थ वेस्ट फ्रन्टियर प्राविसेंज में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को पराजित कर जीत दर्ज की। केवल बंगाल, पंजाब एण्ड सिंध प्रान्तों में मुस्लिम लीग को जीत मिली। यहीं से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच दूरियाँ बढ़नी शुरू हुई। इसी बीच 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। मुहम्मद अली जिनाह ने अंग्रेजों का साथ देने का निर्णय लिया, लेकिन कांग्रेस इसके लिए राजी नहीं हुई बल्कि सुभाष चन्द्र बोस ने तो अंग्रेजों के साथ सीधे युद्ध करने के मकसद से आजाद हिन्द फौज का गठन कर दिया। अन्ततः 22 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस के नेतृत्व में कांग्रेस मुस्लिम लीग की मिली जुली प्रान्तीय सरकारें गिर गईं।
    इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध का भी अंत हो गया। अमरीका व उसके सहयोगी राष्ट्रों ने हिटलर व उसके सहयोगियों को शिकस्त तो दे दी थी परन्तु इंग्लैण्ड बुरी तरह से तबाह व बर्बाद हो गया। इसका असर उसके शासित देशों पर भी पड़ा और आजाद भारत की प्राप्ति की ओर कांग्रेस ने और दबाव भारत छोड़ो आन्दोलन’’ 1942 में छेड़ दिया। अंग्रेजों ने भी भारत से जाने का मन बना लिया था। 1946 में कैबिनेट मिशन प्लान की घोषणा के साथ भारत में सत्ता हस्तान्तरित करने की योजना पर अंग्रेजी शासकों ने कार्य शुरू कर दिया। उधर मुहम्मद अली जिनाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों की शह से कांग्रेस को मात देने के लिए पाकिस्तान के अलग राष्ट्र का ट्रम्प कार्ड फेंक कर कांग्रेस के साथ ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू कर दिया और मात्र 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के लिए स्वतंत्र भारत में राज्य करने के लिए 50 प्रतिशत की भागीदारी की माँग उठाई जो कांग्रेस ने नामंजूर कर दी और फिर चल पड़ा मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा के लीडरों के उत्तेजनात्मक भाषणों का सिलसिला, जिसके चलते कत्ल, गारतगरी व खूंरेजी का खौफनाक दौर। ट्रेनों व ट्रकों में मर्दों, औरतों, बूढ़ांे व बच्चों की लाशों के लोथडे़ हिन्दू व मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से आते जाते रहे। करोड़ों लोगों के पलायन का क्रम भी जारी रहा। अंत में 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बन जाने के बाद तथा एक दिन बाद 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद इस रक्तरंजित राजनीति का अंत हुआ।
-तारिक खान
 मो.09455804309
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित