बुधवार, 16 मार्च 2016

ऋचा सिंह उस वैचारिक गठजोड़ की नेता हैं जो संघ को चुनौती देगा


एक तरफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जेल से निकलकर परिसर में जोरदार भाषण देने की खबर आ रही थी तो दूसरी तरफ देश के एक दूसरे विश्वविद्यालय की छात्र संघ अध्यक्षा, इलाहाबाद की ऋचा सिंह, जो वि.वि. के इतिहास में पहली महिला अध्यक्षा चुनी गई हैं, को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा निशाना बनाए जाने की खबर आ रही थी।
       सितम्बर, 2015 में अध्यक्षा चुने जाने के बाद जब छात्र संघ के शेष पदाधिकारियों, जो सभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे, द्वारा गोरखपुर के विवादास्पद संासद योगी आदित्यनाथ को छात्र संघ के उद्घाटन कार्यक्रम हेतु निमंत्रित किया गया तो ऋचा सिंह ने उसका विरोध किया। ऋचा की बिना अनुमति के निमंत्रण कार्ड पर उसका नाम भी छाप दिया गया जो दिखाता है कि महिला अध्यक्षा होते हुए भी छात्र संघ पर पुरुषवादी सोच ही हावी थी जो यह मान कर चल रही थी कि जो निर्णय शेष पुरुष पदाधिकारी लेंगे उसे ऋचा मान ही लेंगी। अभी हमें पितृसत्तामक सोच के चंगुल से निकलने में कितना और समय लगेगा?
       जब 19-20 नवम्बर, 2015 की रात ऋचा सिंह अपने साथियों के साथ वि.वि. के पुस्तकालय के बाहर योगी आदित्यनाथ के सम्भावित आगमन के खिलाफ अनशन पर बैठी थीं तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब 30 छात्रों ने उन पर मध्यरात्रि के बाद अश्लील गालियां देते हुए हमला बोल दिया। इसमें ऋचा सिंह समेत कई छात्राओं को चोटें आईं। ऋचा सिंह ने अगली सुबह छात्र संघ के महासचिव सिद्र्धाथ ंिसंह, उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह सहित दस छात्रों व प्राॅक्टर एन.के. शुक्ला, जिन्होंने घटनास्थल पर मौजूद रहने के बावजूद हमले को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई।
       चैंकाने वाले घटनाक्रम में वि.वि. प्रशासन ने हमला करने वालों के बजाए ऋचा सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। ऋचा सिंह पर यह कहते हुए अनुशासनहीनता व दुव्र्यवहार का आरोप लगाया गया है कि वे प्राॅक्टर या वि.वि. के किसी सक्षम अधिकारी को माध्यम बनाए बिना ही पुलिस के पास चली गईं। किंतु वि.वि. ने यह भी नहीं सोचा कि जिस प्राॅक्टर ने ऋचा सिंह को हमले से नहीं बचाया उस पर वे कैसे भरोसा कर सकती हैं?
       कुलपति को 26 नवम्बर को लिखे एक पत्र में वि.वि. की महिला सलाहकार बोर्ड की अध्यक्षा प्रोफेसर रंजना कक्कड़ ने ऋचा सिंह व साथियों पर हुए हमले की निंदा के साथ ही योगी आदित्यनाथ को महिला विरोधी व साम्प्रदासिक बताते हुए उनको भेजे गए निमंत्रण पर भी सवाल खड़ा किया है। प्रोफेसर कक्क्ड़ ने 19-20 नवम्बर को हुई हिसां की जांच के लिए गठित समिति में एक भी महिला के न होने पर भी आपत्ति दर्ज कराई है।
       ऋचा सिंह ने कुलपति कार्यालय में अमित सिंह की विशेष अधिकारी के रूप में नियुक्ति पर भी सवाल खड़ा किया क्योंकि अमित सिंह पर वि.वि. की एक छात्रा ने पूर्व में यौन उत्पीड़न और धमकी देने का आरोप लगाया था। 2014 में अमित सिंह सहित छह लोगों पर प्राथमिकी दर्ज हुई और अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा भी लगी किंतु आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।
       ऋचा सिंह को इस सबकी कीमत चुकानी पड़ी जब उनके निमंत्रण पर बुलाए गए प्रसिद्ध पत्रकार सिद्धार्थ वर्दराजन के व्याख्यान की अनुमति अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों के विरोध पर रद्द कर दी गई। सिद्धार्थ वर्दराजन का भाषण परिसर से बाहर महिला छात्रावास के सामने स्थित स्वाराज विद्यापीठ में हुआ।
       ऐसा प्रतीत होता है कि इलाहाबाद वि.वि. महिलाओं के प्रति अति संवेदनहीन है। यह सुखद आश्चर्य की ही बात है कि उ.प्र. के विश्वविद्यालयों जहां छात्र राजनीति अपराधीकरण की भेंट चढ़ गई हो के एक ऐसे पितृसत्तामक गढ़ को ऋचा सिंह ने भेदा है।
       इलाहाबाद वि.वि. प्रशासन ऋचा सिंह को अभी भी परेशान कर रहा है। अब उसके दो वर्ष पूर्व हुए दाखिले पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता रजनीश कुमार उससे अध्यक्ष पद में हारा हुआ उम्मीदवार है जिसका ऋचा सिंह के विभाग से कोई लेना देना नहीं है। अभी उसने एक दूसरी शिकायत में ऋचा सिंह पर बहुत भद्दे आरोप लगाए हैं।
       यह मेरे साथ काशी हिन्दू वि.वि. में जो हुआ उससे कुछ मिलता-जुलता मामला है। मेरे खिलाफ भी एक राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी अविनाश कुमार पाण्डेय से शिकायत करवा, जबकि मैं पढ़ाता था भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान में, मेरा अनुबंध समय से पूर्व समाप्त करवाया गया। मेरे खिलाफ मुझे बदनाम करने की दृष्टि से बेबुनियाद आरोप लगाए गए जिनका मेरे शिक्षण कार्य की गुणवत्ता से कोई सम्बंध नहीं था।
       यदि ऋचा सिंह को निशाना बना संघ परिवार हैदराबाद वि.वि. व ज.ने.वि.वि. के बाद अब इलाहाबाद वि.वि. को विवादित बनाना चाहता है तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। ऋचा सिंह को वि.वि. के अलावा इलाहाबाद शहर और भारत के अन्य शहरों में भी समर्थन प्राप्त है। उ.प्र. के मुख्य मंत्री ने ऋचा सिंह को महिला दिवस पर रानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार देकर सम्मानित किया। उन्होंने ऋचा सिंह के कहने पर पांच बसें भी दी हैं जिससे इलाहाबाद शहर के विभिन्न इलाकों से छात्र वि.वि. आसानी से आ जा सकें। यह ऋचा की बड़ी जीत है। दूसरी तरफ लोग समझ रहे हैं कि हिन्दुत्ववादी अकादमिक परिसरों का माहौल बिगाड़ने में लगे हुए हैं।
       भारतीय राजनीति में गुणत्मक सुधार के लिए ऋचा सिंह का इलाहाबाद वि.वि. में बतौर छात्रा व छात्र संघ अध्यक्षा के रूप में बना रहना जरूरी है। ऋचा सिंह और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता ही भविष्य की राजनीति के सूत्रधार हैं। इलाहाबाद वि.वि. छात्र संघ के दो भूतपूर्व अध्यक्ष भारत के प्रधान मंत्री बन चुके हैं। अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में जो गुणात्मक सुधार की प्रक्रिया शुरू की है उसको वैचारिक दिशा देने का काम अपनी मृत्यु के बाद भी रोहित वेमुला और उसके हैदराबाद वि.वि. के अम्बेडकर छात्र संगठन के साथी, अखिल भारतीय छात्र संघ के और एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ती के पुत्र कन्हैया कुमार, उनके ज.ने.वि.वि. के अन्य साथी जिसमें उमर खालिद भी शामिल है, और समाजवादियों द्वारा समर्थित इलाहाबाद वि.वि. की ऋचा सिंह कर रहे हैं। यह नेतृत्व भारतीय समाज के वंचित तबकों दलित-गरीब-अल्पसंख्यक-महिला का प्रतिनिधित्व करता है जो भारतीय राजनीति की भविष्य की रूपरेखा तय करने वाला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी की जीत के माध्यम से भारतीय शासन-प्रशासन व्यवस्था पर जो पकड़ बनाई थी उसको ढीला करने कर काम यह गठजोड़ करने लगा है। इस बात से ब्राह्मणवादी सोच में विश्वास रखने वाले, जिनका संघ में वर्चस्व है, बहुत परेशान हैं।ऋचा सिंह उस वैचारिक गठजोड़ की नेता हैं जो संघ को चुनौती देगा
एक तरफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जेल से निकलकर परिसर में जोरदार भाषण देने की खबर आ रही थी तो दूसरी तरफ देश के एक दूसरे विश्वविद्यालय की छात्र संघ अध्यक्षा, इलाहाबाद की ऋचा सिंह, जो वि.वि. के इतिहास में पहली महिला अध्यक्षा चुनी गई हैं, को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा निशाना बनाए जाने की खबर आ रही थी।
       सितम्बर, 2015 में अध्यक्षा चुने जाने के बाद जब छात्र संघ के शेष पदाधिकारियों, जो सभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे, द्वारा गोरखपुर के विवादास्पद संासद योगी आदित्यनाथ को छात्र संघ के उद्घाटन कार्यक्रम हेतु निमंत्रित किया गया तो ऋचा सिंह ने उसका विरोध किया। ऋचा की बिना अनुमति के निमंत्रण कार्ड पर उसका नाम भी छाप दिया गया जो दिखाता है कि महिला अध्यक्षा होते हुए भी छात्र संघ पर पुरुषवादी सोच ही हावी थी जो यह मान कर चल रही थी कि जो निर्णय शेष पुरुष पदाधिकारी लेंगे उसे ऋचा मान ही लेंगी। अभी हमें पितृसत्तामक सोच के चंगुल से निकलने में कितना और समय लगेगा?
       जब 19-20 नवम्बर, 2015 की रात ऋचा सिंह अपने साथियों के साथ वि.वि. के पुस्तकालय के बाहर योगी आदित्यनाथ के सम्भावित आगमन के खिलाफ अनशन पर बैठी थीं तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीब 30 छात्रों ने उन पर मध्यरात्रि के बाद अश्लील गालियां देते हुए हमला बोल दिया। इसमें ऋचा सिंह समेत कई छात्राओं को चोटें आईं। ऋचा सिंह ने अगली सुबह छात्र संघ के महासचिव सिद्र्धाथ ंिसंह, उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह सहित दस छात्रों व प्राॅक्टर एन.के. शुक्ला, जिन्होंने घटनास्थल पर मौजूद रहने के बावजूद हमले को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई।
       चैंकाने वाले घटनाक्रम में वि.वि. प्रशासन ने हमला करने वालों के बजाए ऋचा सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। ऋचा सिंह पर यह कहते हुए अनुशासनहीनता व दुव्र्यवहार का आरोप लगाया गया है कि वे प्राॅक्टर या वि.वि. के किसी सक्षम अधिकारी को माध्यम बनाए बिना ही पुलिस के पास चली गईं। किंतु वि.वि. ने यह भी नहीं सोचा कि जिस प्राॅक्टर ने ऋचा सिंह को हमले से नहीं बचाया उस पर वे कैसे भरोसा कर सकती हैं?
       कुलपति को 26 नवम्बर को लिखे एक पत्र में वि.वि. की महिला सलाहकार बोर्ड की अध्यक्षा प्रोफेसर रंजना कक्कड़ ने ऋचा सिंह व साथियों पर हुए हमले की निंदा के साथ ही योगी आदित्यनाथ को महिला विरोधी व साम्प्रदासिक बताते हुए उनको भेजे गए निमंत्रण पर भी सवाल खड़ा किया है। प्रोफेसर कक्क्ड़ ने 19-20 नवम्बर को हुई हिसां की जांच के लिए गठित समिति में एक भी महिला के न होने पर भी आपत्ति दर्ज कराई है।
       ऋचा सिंह ने कुलपति कार्यालय में अमित सिंह की विशेष अधिकारी के रूप में नियुक्ति पर भी सवाल खड़ा किया क्योंकि अमित सिंह पर वि.वि. की एक छात्रा ने पूर्व में यौन उत्पीड़न और धमकी देने का आरोप लगाया था। 2014 में अमित सिंह सहित छह लोगों पर प्राथमिकी दर्ज हुई और अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा भी लगी किंतु आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।
       ऋचा सिंह को इस सबकी कीमत चुकानी पड़ी जब उनके निमंत्रण पर बुलाए गए प्रसिद्ध पत्रकार सिद्धार्थ वर्दराजन के व्याख्यान की अनुमति अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों के विरोध पर रद्द कर दी गई। सिद्धार्थ वर्दराजन का भाषण परिसर से बाहर महिला छात्रावास के सामने स्थित स्वाराज विद्यापीठ में हुआ।
       ऐसा प्रतीत होता है कि इलाहाबाद वि.वि. महिलाओं के प्रति अति संवेदनहीन है। यह सुखद आश्चर्य की ही बात है कि उ.प्र. के विश्वविद्यालयों जहां छात्र राजनीति अपराधीकरण की भेंट चढ़ गई हो के एक ऐसे पितृसत्तामक गढ़ को ऋचा सिंह ने भेदा है।
       इलाहाबाद वि.वि. प्रशासन ऋचा सिंह को अभी भी परेशान कर रहा है। अब उसके दो वर्ष पूर्व हुए दाखिले पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता रजनीश कुमार उससे अध्यक्ष पद में हारा हुआ उम्मीदवार है जिसका ऋचा सिंह के विभाग से कोई लेना देना नहीं है। अभी उसने एक दूसरी शिकायत में ऋचा सिंह पर बहुत भद्दे आरोप लगाए हैं।
       यह मेरे साथ काशी हिन्दू वि.वि. में जो हुआ उससे कुछ मिलता-जुलता मामला है। मेरे खिलाफ भी एक राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी अविनाश कुमार पाण्डेय से शिकायत करवा, जबकि मैं पढ़ाता था भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान में, मेरा अनुबंध समय से पूर्व समाप्त करवाया गया। मेरे खिलाफ मुझे बदनाम करने की दृष्टि से बेबुनियाद आरोप लगाए गए जिनका मेरे शिक्षण कार्य की गुणवत्ता से कोई सम्बंध नहीं था।
       यदि ऋचा सिंह को निशाना बना संघ परिवार हैदराबाद वि.वि. व ज.ने.वि.वि. के बाद अब इलाहाबाद वि.वि. को विवादित बनाना चाहता है तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। ऋचा सिंह को वि.वि. के अलावा इलाहाबाद शहर और भारत के अन्य शहरों में भी समर्थन प्राप्त है। उ.प्र. के मुख्य मंत्री ने ऋचा सिंह को महिला दिवस पर रानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार देकर सम्मानित किया। उन्होंने ऋचा सिंह के कहने पर पांच बसें भी दी हैं जिससे इलाहाबाद शहर के विभिन्न इलाकों से छात्र वि.वि. आसानी से आ जा सकें। यह ऋचा की बड़ी जीत है। दूसरी तरफ लोग समझ रहे हैं कि हिन्दुत्ववादी अकादमिक परिसरों का माहौल बिगाड़ने में लगे हुए हैं।
       भारतीय राजनीति में गुणत्मक सुधार के लिए ऋचा सिंह का इलाहाबाद वि.वि. में बतौर छात्रा व छात्र संघ अध्यक्षा के रूप में बना रहना जरूरी है। ऋचा सिंह और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता ही भविष्य की राजनीति के सूत्रधार हैं। इलाहाबाद वि.वि. छात्र संघ के दो भूतपूर्व अध्यक्ष भारत के प्रधान मंत्री बन चुके हैं। अरविंद केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में जो गुणात्मक सुधार की प्रक्रिया शुरू की है उसको वैचारिक दिशा देने का काम अपनी मृत्यु के बाद भी रोहित वेमुला और उसके हैदराबाद वि.वि. के अम्बेडकर छात्र संगठन के साथी, अखिल भारतीय छात्र संघ के और एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ती के पुत्र कन्हैया कुमार, उनके ज.ने.वि.वि. के अन्य साथी जिसमें उमर खालिद भी शामिल है, और समाजवादियों द्वारा समर्थित इलाहाबाद वि.वि. की ऋचा सिंह कर रहे हैं। यह नेतृत्व भारतीय समाज के वंचित तबकों दलित-गरीब-अल्पसंख्यक-महिला का प्रतिनिधित्व करता है जो भारतीय राजनीति की भविष्य की रूपरेखा तय करने वाला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी की जीत के माध्यम से भारतीय शासन-प्रशासन व्यवस्था पर जो पकड़ बनाई थी उसको ढीला करने कर काम यह गठजोड़ करने लगा है। इस बात से ब्राह्मणवादी सोच में विश्वास रखने वाले, जिनका संघ में वर्चस्व है, बहुत परेशान हैं।
- संदीप पाण्डेय

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