गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

लेनिन की स्मृतियां संजोए एक अनूठा संग्रहालय

देश में जिस प्रकार  गांधीजी का अथवा नेहरूजी का नाम आदरभाव तथा आत्मीयता से लिया जाता है, उसी प्रकार श्रद्धा-भक्ति एवं गौरव से रूस के निवासी लेनिन का नाम लेते हैं। सारे देश में स्थान-स्थान पर लेनिन की मूर्तियां और चित्र लगे हैं। रूस में बच्चे-बच्चे की याद में आज भी लेनिन बसते हैं।
लेनिन के स्मारक मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। केंद्रीय लेनिन संग्रहालय एक विशाल भवन में है। इस भवन का निर्माण सन् 1892 में प्राचीन रूसी शैली में हुआ था। इस विशाल भवन में 19 बड़े-बड़े हाल है जिनमें वस्तुओं को देखते-देखते रूस के इतिहास के अनेक पृष्ठ आंखों के सामने खुल जाते हैं। लेनिन की जीवनी के साथ-साथ रूस के राजनीतिक, आर्थिक विकास की कहानी वहां की चीजें अपने आप कह देती हंै।
लेनिन ऐसी शासन व्यवस्था चाहते थे, जिसमें कोई भी किसी का शोषण करने की स्थिति में न रहे। गांधीजी भी भारत में ऐसे ही समाज की स्थापना करने के अभिलाषी थे, लेकिन दोनों के अन्तिम लक्ष्य एक होते हुए भी दोनों के साधनों में बड़ा अन्तर था। गांधीजी ने कभी हिंसा का समर्थन अथवा आह्वान नहीं किया लेकिन लेनिन ने अक्तूबर क्रांति के समय हिंसा की छूट दे दी थी। लेनिन की छोटी से लेकर बड़ी चीजें इस संग्रहालय में सुरक्षित हंै। लेनिन का जीवन बड़ा सादा था और वो अपने देश के करोड़ों किसान-मजदूरों की भांति रहते थे। तिथि क्रम से लेनिन की सारी जीवनी बचपन से लेकर अन्तिम समय तक की चित्रों में प्रस्तुत की गई है। लेनिन का जन्म कब और कहां हुआ, प्रारम्भिक तथा आगे की शिक्षा उन्होंने किस प्रकार पाई, वे क्रांतिकारी कैसे बने, जेल में उनका समय किस तरह बीता, किस तरह उन्होंने रूसी सोशलिस्ट-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी को संगठित करने का प्रयत्न किया—ये सब चित्र एकदम आंखों के सामने घूम जाते हैं।
एक शीशे की अलमारी में लेनिन का ओवरकोट रखा है, देखने में मामूली-सा है, पर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसका कितना ऐतिहासिक महत्व है। सन् 1918 में लेनिन के जीवन का अन्त करने के लिए जो गोली चलाई गई थी, वह उनके इसी ओवरकोट को पार करके शरीर में प्रविष्ट हुई थी।
गोर्की, जो मास्को से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है, अपने अन्तिम 6 वर्षों में लेनिन यहीं पर रहे थे। सन् 1918 से 1924 में लेनिन यहीं पर रहे लेकिन विशेष अवसरों पर मास्को आते-जाते रहते थे। 11वीं कांग्रेस अन्तिम कांग्रेस थी, जिसमें लेनिन ने आखिरी बार भाग लिया। उसके बाद वे बहुत अस्वस्थ हो गये। सन् 1922 के दिनों में कुटुम्बी-जनों तथा राष्ट्र के विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लिए गये कुछ चित्र बड़े भावपूर्ण हंै। सन् 1919 में उन्होंने लालसेना के समक्ष जो भाषण दिया उसका रिकार्ड भी सुरक्षित है।
एक पत्र वहां आज भी देखने को मिलता है जिसमें एक मजदूर ने लिखा था, ‘मैं आपको कुछ कपड़ा भेंट करना चाहता हूं। उसमें से आप अपने पहनने के लिए कपड़े बनवा लें।’ उसका आभार मानते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक लेनिन ने वह कपड़ा लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने लिखा कि अपनी निजी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह कोई भेंट स्वीकार नहीं करते।
20 नवम्बर, 1922 को लेनिन ने अन्तिम भाषण दिया। इस भाषण के साथ-साथ उनका कोट, कमीज, जूते, बन्दूक आदि सब ज्यों की त्यों रखे हैं।
एक कमरे में लेनिन की छोटी-सी लाइबे्ररी है, जिसमें अन्य पुस्तकों के बीच कुछ पुस्तकें तुर्गनेव तथा शेक्सपियर की हैै। आखिरी दिनों में वे गोर्की की ‘मेरे विश्वविद्यालय’ पुस्तक पढ़ रहे थे, वह उनकी बड़ी प्रिय कृति थी।  21 जनवरी, 1924 को सायंकाल लगभग 7 बजे लेनिन का देहांत हुआ। चारों तरफ प्रिय नेता के लिए शोक प्रदर्शित किया गया। लेनिन के शव पर मजदूरों ने जो मालाएं अर्पित की थीं, वे भी सुरक्षित रखी हैं।
लेनिन को गए आज इतने वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उनके निवास तथा उनकी वस्तुओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे कहीं किसी सभा में गये हंै, और शीघ्र आ जाएंगे।
- वीणा भाटिया
साभार





1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23 -04-2016) को "एक सर्वहारा की मौत" (चर्चा अंक-2321) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'