बुधवार, 29 जून 2016

मुस्लिम आरक्षण की राजनीति और सामाजिक न्याय का सवाल

        सामाजिक न्याय के पुरोधा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथप्रताप सिंह कहते थे कि मुसलमानों को वोट बैंक नहीं वोट मैनेजर बनना चाहिए लेकिन हालात बताते हैं यह वोट बैंक मैनेजर तो नहीं बना लेकिन कंडक्टर या पीयून ज़रूर बन चुका है जिसके नेताओं के हाथ में 3 करोड़ के उत्तर प्रदेश के विधानसभा टिकट के अवसर भी हंै, ज़ुबान पर ताले और अपमान फ्री मंे है साथ ही उसके उद्योग धंधे पर ताले पड़ चुके हैं!
    उत्तर प्रदेश में समाजवादी के बड़े नेता शिवपाल यादव ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सच्चर कमेटी का हवाला देते हुए कहा है कि 18 प्रतिशत मुसलमानांे को आरक्षण देने मंे कई तकनीकी खामिया हैं ऐसे बयान बड़े हिम्मत वाले हंै, शिवपाल यादव जैसे नेता कम हैं जो संविधान के दायरे मंे साफ बात अवाम को बताएँ लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसे वादे कोई भी राजनैतिक दल क्यों करते हैं और लोग उनके धोखे मे फँसते क्यों हंै या शिवपाल यादव ने यह बात वादे करते वक़्त अपनी पार्टी की मुखालिफत क्यों नहीं की?
    मुसलमानांे उनमंे ज़ात और उनके पिछड़ेपन को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाने की ज़रूरत है, भारत उपमहादीप मंे ज़बरदस्त तरीके से यहाँ के मुसलमान वर्ण-व्यवस्था मंे संलिप्त हैं और जाति व्यवस्था रगों में बसती है, यहाँ भी पंडित हंै जुलाहे हंै भंगी कहे जाने वाले दलित हंै! इस्लाम के आगमन पर उलेमाआंे और सूफियांे की तहरीक से इतना हुआ कि ये मस्जिदों में तो एक सफ में खड़े हो जाते हंै लेकिन मस्जिद के बाहर रंग और अदाए कुछ और हंै, मतलब यह कि मुसलमानों ने मस्जिद कबूल की लेकिन उनके पीछे के मजहब से मिली वर्ण व्यवस्था को नहीं छोड़ा, जिस भेद-भाव सामाजिक असमानता के खिलाफ ही इस्लाम खड़ा हुआ था, जौनपुर के गाँव मंे लेखक को याद है कि धोबी या अंसारी समाज उच्च वर्ग मुसलमानांे की चारपाई के पैताने बैठा करते थे और उच्च वर्ग की गाली मंे जुलहा-जुलहटी जैसे जुमले साफ कानों में याद हंै जैसे बहुसंख्यक वर्ग मंे पिछड़ा और दलित का जो हाल है वही हालात यहाँ अशराफ़ अजलाफ़ के बीच है, उलेमा ए एकराम जातिवाद को तोड़ने की कोशिश इत्तेहाद के नाम पर करते दिखते हंै लेकिन यह सिर्फ अभी तक मस्जिदों तक हो सका है यहाँ तक कि मसलक की मस्जिदें उनके इमाम अलग-अलग हैं जहाँ मुसलमान को एक काग़ज़ पर बेदखल करने की ताकत है, उलेमाआंे का, प्रगतिशील समाज का असर कभी पूरे समाज में नहीं बन पाया कि मसलक या जातियों के बीच आपस में शादी ब्याह रचाए जाएँ या समाजी इक्तेसादी तौर पर पिछड़े समाज को मौका देने के लिए कोई पहल होना तो दूर की बात है! मुसलमानांे के जो भी कल कारखाने थे उसमें यही पिछड़ा दबा कुचला समाज मजदूरी करता था, बर्तन बनाना, कपड़े सिलना, कपड़े धुलना, रूई धुनना, बाल बनाना, खेतों को जोतना यानी यह कहा जाए कि वह मुस्लिम उच्च वर्ग के अधीन रह तालीम और समाज व राजनीति मंे पिछड़ता रहा और रजवाड़े जमींदारी निज़ाम टिका रहा, जब मण्डल कमीशन जैसे समाजी इंसाफ की लड़ाई लड़ी गई तो बहुसंख्यक उच्च वर्ग की चुटिया यानी एंटीना खड़ा हो गया वैसे ही मुस्लिम समाज का उच्च वर्ग भी कहने लगा कि यह मुसलमानों को जाति में बांटने की साजिश है और रिज़र्वेशन आर्थिक आधार पर होने चाहिए, माफी के साथ बताना चाहता है आर्थिक आधार एजेंडा ब्राह्मणवादी संघी एजेंडा है जिसे मुसलमानांे ने अपनाया है, मण्डल के तहत ही 27 प्रतिशत में पिछड़े शोषित मुसलमान बिरादरियों को भी हिस्सा मिल रहा है, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को देश की 80 प्रतिशत अवाम को आभार कहना होगा। इस साजिश को भी समझना होगा कि मण्डल देने की वजह से सामाजिक न्याय के ही चलते उनकी सरकार के परखचे उड़ा दिए गए और उसकी कितनी हड्डिया कहाँ गिरीं मंडवा के राजा वीपी सिंह कभी गिन भी नहीं पाए होंगे लेकिन जो मिलना था पिछड़ांे को वह मिला, इसी मिले अधिकार पर संघ नज़र गड़ाए बैठा है जबकि आजभी 12 प्रतिशत उच्च वर्ग के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू है!
    मुसलमानो को धर्म या एकोनोमिक आधार पर रिजर्वेशन देने या इसके वादे करने का खेल पुराना है और यही काम अब भारतीय जनता पार्टी कर रही है जिसमंे उसकोे करारी हार हरियाणा की अदालत ने दी और सरकार को फटकार लगी है, अगर हम याद करंे तो 2011 के आस पास तत्कालीन केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री सलमान खुर्शीद के हाथांे 3.5 प्रतिशत रिजर्वेशन मुसलमानांे को देने का ऐलान किया गया लेकिन वह कोर्ट मंे टिक नहीं पाया था, बसपा सहित समाजवादी पार्टी ने घोषणा पत्र मंे 18 प्रतिशत रिजर्वेशन देने का वादा किया था जो 2016 तक नहीं हुआ, कारण यह है कि संविधान मे आरक्षण देने की सीमा 50 प्रतिशत है जिसमें जगह नहीं अगर संविधान में संशोधन के लिए केंद्र सरकार जो बहुमत में है वह राज़ी हो यानी संसद, संघ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह जी तैयार हांे तो ही संशोधन हो सकता है ऐसा ही करवाने के लिए चार साल माथा पच्ची करने के बाद समाजवादी पार्टी संसद मंे अमेंडमेंट को तैयार हुई है और वह संविधान मंे सीमा को बढ़ाने के लिए प्रस्ताव रखना चाहती है, रिज़र्वेशन और संविधान के जो जानकार हैं वह समाजवादी पार्टी की इस समझ को बचकाना मानते हैं अगर ऐसा हो भी जाए तो हर धर्म के उच्च वर्ग के लिए एक नई जंग शुरू हो जाएगी, आपको हमंे मानना होगा कि आरक्षण कोई केक नहीं उच्च वर्ग द्वरा दलित आदिवासी पिछड़े पर शोषण के पश्चात संविधान का दिया एक पश्चाताप है!
     उच्च वर्ग मंे जन्म लेने वाले प्रगतिशील कमज़ोर तबके की तकलीफ समझ सकते हंै, रिज़र्वेशन पर बात करते हुए एक आलिम ने लेखक को एक दिलचस्प वाकया समझाया कि इस्लाम में बादशाहत नहीं है कोई हिज हायनेस नहीं है, किसी मजलिस मंे मेहमान के आने पर खड़ा हो जाना यह आदाब मंे नहीं है, इस्लाम के पैग़ंबर जनाब ए रसूलल्लाह एक मजलिस में थे जहाँ हज़रत उमर और हज़रत अली भी थे मीटिंग शुरू हो गई थोड़ी देर में इसी बीच हज़रत बिलाल तशरीफ लाए जिनका समाज ग़ुलाम था, वे उस जमाने मंे अछूत की हैसियत रखते थे, जब वे अंदर आए तो जगह न होने की वजह से अपनी जगह आफ़र करते हुए हज़रत अली खड़े हुए और फरमाया बिलाल मेरी जगह बैठ जाएँ, हज़रत अली की तरफ जनाब ए रसूलल्लाह  ने देखकर मुस्कराते हुए कहा कि अली, “हीरे की क़दर जौहरी ही जानता है”! उस आलिम ने समझाया कि हज़रत बिलाल ग़ुलाम दबे कुचले समाज से आए थे उन्हें समाज में जगह दी गई यही समाजी इंसाफ और रिज़र्वेशन है, आपको महकूम मख़लूक़ को साइड देना होगा, मेरे खयाल से मुसलमानों को जिसमंे 80 प्रतिशत पिछड़े पसमांदा लोगों की आबादी है अगर उन्हंे संविधान के जरिये कुछ मिलता है तो उसके लिए हमें अड़चन न बनकर, मुसलमानों में ज़ात है इस सच्चाई को मानकर हमें उनके अधिकारांे के लिए लड़ना चाहिए लेकिन अफसोस कि रुलिंग पार्टी के नजदीक मुसलमानों का सामंत वर्ग और अशराफ़ असर रखता है, जो मुसलमान कोटे से लोग विधानसभा या संसद में जाते हैं या तो वे अपनी पार्टियांे से डरते हैं या उन्हें आरक्षण की समझ नहीं, आज भी राजनैतिक दलों के डिसीजन में मुसलमान पिछड़ांे की हैसियत सियासी कंडक्टर की तरह ही है इसलिए उन्हंे इस बीच अपने सियासी मुहसिनों की तलाश करनी होगी!
    देश में चार राज्यों सबसे पहले केरल, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के रिज़र्वेशन हंै लेकिन उसका आधार सामाजिक शैक्षणिक पिछड़ापन था, केरल मंे सीपीआई के मुख्यमंत्री कॉमरेड सी अचुता मेनन ने 12 प्रतिशत, इसी को आधार बनाकर तमिलनाडू मंे हेगड़े सरकार ने 3.5 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश मे वाईएसआर कॉंग्रेस ने 4 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल की कॉमरेड बुद्धदेव सरकार ने 10 प्रतिशत रिज़र्वेशन केरल माॅडल पर आरक्षण में सब कोटा लागू किए जो अदालतों में टिक पाए और आज तक लागू है जिसका असर केरल में मुसलमानांे की साक्षरता दर और तरक़्क़ी में मुसलमानो के हिस्से को देखा जा सकता है, और अगर बिहार उत्तर प्रदेश में मुसलमान रिज़र्वेशन चाहता है उसे पहले ईमानदारी से जातिवाद के खात्मे पर सोचना होगा इसके साथ उपरोक्त राज्यों का अध्ययन कर किसी एक राज्य को माॅडल बनाना होगा, अफसोस की बात कि पिछड़ांे की राजनीति के नाम पर उन्हीं के बीच एक क्रीमीलेयर तैयार हो गया है जो खुद उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ है, साथ ही मसावात की फर्जी वकालत करने वाले जिन्होंने इस्लाम जो कि मुसावात के नाम पर क्रांति बना लेकिन भारतीय उप महादीप में ब्राह्मणवाद की चादर लपेटे आजतक अलग नहीं हो सका, आई एम सॉरी इसके लिए संघ कई दशकों का ब्राह्मणवाद जिम्मेदार है!
    राजनैतिक दलों को चाहिए कि वे अवाम से, चाहे भाजपा का पाटीदार समाज से, हरियाणा में जाट समाज जिसने हिंसा के बलपर आरक्षण की बात मनवायी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को अवाम से साफ कह देना चाहिए कि धर्म, जाति या आर्थिक आधार पर संविधान मंे कोई आरक्षण नहीं हो सकता, समाजवादी, कॉंग्रेस या बसपा के मुस्लिम आरक्षण कार्यक्रम संविधान के खिलाफ कार्यक्रम हंै जो दिए भी जाएँ तो अदालत इसपर रोक लगा देगी, उत्तर प्रदेश मे रुलिंग समाजवादी पार्टी अगर मुसलमानों को रिज़र्वेशन देना चाहती है तो पिछड़े मुसलमानों के लिए केरल माॅडल पर सब कोटा के तहत रोजगार और शिक्षा में हिस्सा दे सकती है इसके लिए उसके मुस्लिम उच्च वर्ग को सामाजिक न्याय के मामले मंे, कमज़ोरों पर हुई नाइंसाफी का एतराफ़ करते हुए इंसाफ कर हज़रत अली के पैरांे की खाक नहीं बन सकते तो कम से कम उच्च वर्ग मंे जन्मे प्रगतिशील नेताओं को पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तो बनना ही होगा!
     -अमीक जामेई     

मोबाइल: 09871589153
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

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