सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

आजादी की लड़ाई में मुसलमानों का इतिहास शानदार रहा है - अहमद सईद मलिहाबादी


देश की आजादी की लडाई मे मुसलमानो की अहम भूमिका व शानदार इतिहास रहा है। देश भक्ति के मामले में आज भी मुसलमान अग्रणी भूमिका मे है। पहले जंहा फिरंगियो से मुल्क को आजाद कराने मे मुसलमानो ने अपनी जाने दी हैं। वही आज भी देश की सीमा पर दुश्मनो का मुकाबला करते हुये अपना खून बहाने में किसी से पीछे नही है। उन्हे देशभक्त का प्रमाण पत्र किसी से नही चाहिये। क्योकि देशभक्ति उनके दीन व इमान का हिस्सा है। जिसकी तस्दीक हदीस तैयबा से होती है। उक्त विचार व्यक्त करते हुये ‘यह मुखबिरो का लहू नही है’ पुस्तक के विमोचन अवसर पर मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व सांसद अहमद सईद मलिहाबादी ने कही। उन्होने आगे कहा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु समझौते के लिये जब अमेरिका गये थे। तो वहां के राष्ट्रपति जांर्ज बुश के सामने अपने भाषण मे गर्व से कहा था कि हिन्दुस्तान का एक भी मुसलमान आंतकी नही है। लेकिन पूरी दुनिया मे आंतकवाद के सरगना जार्ज बुश ने उसका बदला यू दिया कि अपने पूरे देश मे धमाके होने लगे। और मुसलमानो को आंतकी बताकर जेल में डालने का सिलसिला शुरु हो गया। यह बात अलग है कि देश की कुछ अदालतो ने उनके साथ न्याय किया है। उन्होने आगे कहा कि जगें आजादी में मुसलमानो की कुर्बानिया का सिलसिला 1912 से प्रारम्भ हो जाता है। देवबन्द के उलेमा देश को आजाद कराने के लिये भारी संख्या मे उलेमा अफगास्तिन भेजे। और वहा पर निर्वाचित सरकार का गठन होता है। जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को चुना जाता है। और प्रधानमंत्री मौलाना बरकत उल्ला और गृहमंत्री उबैद उल्ला सिंघी को बनाया जाता है। उस निर्वाचित सरकार का राष्ट्रपति किसी मुस्लिम को नही बनाया था। उन्होने मौलाना महमूदुर रहमान की रेशमी रुमाल की तहरीक का भी जिक्र किया। यह मुखबिरो की लहू नही है’ के लेखको का हौसला बढ़ाते हुये कहा कि आज के दौर में इस तरह की किताबो की सख्त जरुरत है। और यह लोग मुबारकबाद के पात्र है। इस दौरा में जब पत्रकारिता आनी विश्वसनीयता और बेबाकी खोती जा रही है। तो इस तरह की किताब लिखना व प्रकाशित करना देश व समाज की बड़ी सेवाहै। और देश के दुश्मनो के लिये एक बड़ी चुनौती है। वरिष्ठ पत्रकार उबैदउल्ला नासिर ने कहा कि मुस्लिम क्रान्तिकारियो ने देश को आजाद करने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। और उसके बाद देश के नवनिर्माण मे भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। यह बात अलग है कि आज के दौर मे वह आर्थिक तंगी का शिकार हो रहा है। इसके पूर्व हिन्दी के मूल धन्य विद्वान डा0 विनय दास, रिहाई मंच अध्यक्ष मो0 शुयेब, सामाजिक कार्यकर्ता रफत फातिमा ने भी अपने विचार व्यक्त किये। स्वागत भाषण लोक संघर्ष पत्रिका के प्रबन्ध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने दिया। कार्यक्रम का संचालन तारिक खान व अध्यक्षता बृजमोहन वर्मा ने की। इस अवसर पर कदीर हसन, आल इण्ड़िया पंसमादा मुस्लिम महाज प्रदेश अध्यक्ष वसीन राईन, नफीस राईन, चौधरी महबूब राईन, फजल ईमाम मदनी, मो0 मोहसिन, मो0 हगिश, कलीम युसूफ किदवई, मो0 अतहर, तारिक किदवई, मो0 आमिर अली, सरदार भूपिन्दर पाल िंसह, शहनवाज आलम, डा0 कौशर हुसैन, सुप्रसिद्व ज्योतिषी प्रित्युशकान्त शुक्ला, प्रवीण कुमार, मुज्जवर अहमद लारी समेत भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।

3 टिप्‍पणियां:

RADHA TIWARI ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (28-02-2018) को ) "होली के ये रंग" (चर्चा अंक-2895) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

Rohitas ghorela ने कहा…

मुस्लिम भाइयों को देशद्रोही कौन बोलता है
कौन कहता है कि मुस्लिम आंतकवादी होते हैं??

जो आंतकवादी होते हैं उनको आंतकवादी बोला जाता है चाहे वो किसी भी धर्म से हो।

मुस्लिम भाइयों के बिना साहित्य 60% कचरा है
और साहित्य में वो शक्ति होती जो नवयुवको में जोश भरता है, देशप्रेम पैदा करता है।

अच्छी सोच का स्वागत है।

firoj ansari ने कहा…

Absolutely right