शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

लाखों बैंककर्मियों की दुनिया का भयावह दस्तावेज

          बैंक कर्मचारियों के सैंकड़ों मैसेज पढे़ गए। उनकी व्यथा तो वाकई भयानक है। क्या किसी को डर नहीं है कि दस लाख लोगों का यह जत्था उसे कितना राजनैतिक नुकसान पहुँचा सकता हैघ् कई दिनों से हजारों मैसेज पढ़ते हुए यही लगा कि बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। उनके भीतर घुटन सीमा पार कर गई है।
    आज जब बैंकों को बेचने की बात हो रही है तो याद आया है कि तब क्यों नहीं हो रही थी जब नोटबंदी हो रही थी। जब बैंक कर्मचारी रात.रात तक बैंकों में रुक कर देश के साथ किए गए एक राष्ट्रीय अपराध से लोगों को बचा रहे थे। कारपोरेट का कप्तान तब क्यों नहीं बैंकों को बेचने की बात करता है जब वह दबाव बनाकर सरकारी बैंकों से लोन लेता है। तब बैंकों को बेचने की बात क्यों नहीं हुई जब प्रधानमंत्री के नाम से बनी योजनाओं को लोगों तक पहुंँचाना था.
    एक बैंक ने अपने कर्मचारियों से कहा है कि अपने बैंक का शेयर खरीदें। पहले भी बैंक कर्मचारियों को अपने शेयर देते रहे हैंए मगर इस बार उनसे जबरन खरीदने को कहा जा रहा है। कुछ मामलों में सैलरी की क्षमता से भी ज्यादा शेयर खरीदने के लिए विवश किया जा रहा है। क्या इस तरह से बैंकों के गिरते शेयर को बचाया जा रहा हैघ् जोनल हेड के जरिए दबाव डाला जा रहा है कि शेयर खरीदे गए या नहीं।
    एक बैंक कर्मचारी ने बताया कि सैलरी की क्षमता से तीन गुना ज्यादा दाम पर शेयर खरीदने के लिए मजबूर किया गया है। इसके लिए उनसे ओवर ड्राफ्ट करवाया जा रहा है। उनकी एफ डी और एल आई सी पर लोन दिया जा रहा है ताकि वे एक लाखए डेढ़ लाख रुपये का शेयर खरीदें। यहाँ तक कि 7000 कमाने वाले स्वीपर पर भी दबाव डाला जा रहा है कि वह 10ए000 रुपये का शेयर खरीदे।
    यह तो हद दर्जे का घोटाला चल रहा है। एक किस्म की डकैती है। किसी को शेयर खरीदने के विकल्प दिए जा सकते हैंए उनसे जबरन खरीदने को कैसे बोला जा सकता है। आज बैंकए बैंक का काम नहीं कर रहे हैं। बैंक का काम होता है पैसों की आवाजाही को बनाए रखना। उन पर दूसरे काम लादे जा रहे हैं। इसे क्रास सेलिंग कहते हैं। इस क्रास सेलिंग ने बैंकों को खोखला कर दिया है।
    बैंकों के काउंटर से पदेनतंदबमए सपमि पदेनतंदबमए जूव ूममसमत पदेनतंदबमए विनत ूममसमत पदेनतंदबमए उनजनंस निदक बेचे जा रहे हैं। इन में 20 प्रतिशत कमीशन होता है। जब तक कोई इन उत्पादों को नहीं खरीदता हैए उसका लोन पास नहीं होता है। इसके लिए ब्रांच मैनेजर से लेकर प्रबंध निदेशक तक का कमीशन
बंधा है। कुछ मामलों में ऊपर के लोगों को कमीशन 10.20 करोड़ तक हो जाते हैं। ऐसा कई मैसेज से पता चला है।
  बैंक कर्मचारी प्रधानमंत्री के नाम से बनी बीमा योजनाओं को भी बेचने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। किसान को पता नहीं मगर उसके खाते से बीमा की रकम काटी जा रही है। इसका सीधा लाभ किसे हुआघ् बीमा कंपनी को। बीमा कंपनी कहाँ तो इन कामों के लिए हजारों को रोजगार देती मगर बैंकों के स्टाफ का ही खून चूस कर अपनी पॉलिसी बेच गईं। शुक्र मनाइये कि हिन्दू मुस्लिम की हवा चलाई गई वरना इन मुद्दों पर चर्चा होती तो पता चलता कि आपके खजाने पर कैसे.कैसे डाके डाले गए हैं।
    बैंक शाखाओं में स्टाफ की भयंकर कमी है। नई भर्ती नहीं हो रही है। बेरोजगार सड़क पर हैं। जहाँ 6 लोग होने चाहिए वहाँ 3 लोग काम कर रहे हैं। जाहिर है दबाव में कर्मचारियों से गलती होती है। एक मामले में दो कर्मचारियों को अपनी जेब से 9 लाख रुपये भरने पड़ गए। सोचिए उनकी क्या मानसिक हालत हुई होगी।
    बैंकों में नोटबंदी के समय कैशियर नहीं थे। सबको बिना काउंटिग मशीन के नोट लेने और देने के काम में लगा दिया गया। गिनती में अंतर आया तो बड़ी संख्या में बैंक कर्मचारियों ने अपनी जेब से भरपाई की। काश ऐसे लोगों की संख्या और रकम का अंदाजा होता तो इनका भी नाम एक फर्जी युद्ध के शहीदों में लिखा जाता।
    बैंक कर्मचारियों से कहा जा रहा है कि आप म्यूचुअल फंड भी बेचें। आम लोगों को समझाया जा रहा है कि एफण्डीण् से ज्यादा पैसा फंड में हैं। एक कर्मचारी ने अपने पत्र में आशंका जाहिर की है कि आम लोगों की बचत का अरबों रुपया शेयर बाजार में लगाया जा रहा है। जिस दिन यह बाजार गिरा आम लोग लुट जाएँगे।
    बैंकों के बुनियादी ढाँचे खराब हैं। कई शाखाओं में शौचालय तक ढंग के नहीं हैं। महिलाओं के लिए अलग से शौचालय तक नहीं हैंए कूलर नहीं हैंए इंटरनेट की स्पीड काफी कम है। बैंकों को 64 केबीपीएस की स्पीड दी जाती है और डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटा जाता है। बैंक कर्मचारी भयंकर तनाव में हैं। वे तरह.तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। सर्वाइकलए स्लिप डिस्कए मोटापाए विटामिन डी की कमी के शिकार हो रहे हैं।
    बैंक कर्मचारियों की सैलरी नहीं बढ़ाई जा रही है। हालत ये हो गई है कि केंद्र सरकार का चपरासी भी अब बैंकों के क्लर्क से ज्यादा कमा रहा है। काम ज्यादा क्लर्क कर रहे हैं। दिल्ली जैसे शहर में बैंक का क्लर्क 19000 में कैसे परिवार चलाता हैए हमने तो कभी सोचा भी नहींए भयावह हैण्
    सैंकड़ों मैसेज में बैंक कर्मचारियों अधिकारियों ने लिखा है कि सुबह 10 बजे से रात के 11 बजे तक काम करते हैं। छुट्टी नहीं मिलती है। रविवार को भी सरकार का टारगेट पूरा करने के लिए आना पड़ता है। ऊपर से अब जिलाधिकारी भी टारगेट को लेकर धमकाते हैं। जेल भेजने की
धमकी देते हैं।
    एक बैंक कर्मचारी ने वाजिब बात बताई। सरकारी बैंक के कर्मचारी जो राष्ट्रीय सेवा करते हैं क्या कोई दूसरा बैंक करेगा। क्या कोई प्राइवेट बैंक किसी गरीब मजदूर का मनरेगा अकाउंट रखेगाघ् क्या प्राइवेट बैंक स्कूल फंड का खाता खोलेंगेघ् इन खातों में 200.300 रुपये जमा होता है। वृद्धा पेंशन से लेकर आंँगनवाड़ी वर्कर की सैलरी इन्हीं बैंकों में आती है जो 2000 से 2500 रुपये से ज्यादा नहीं होती है। जो गरीब बच्चा 1000 रुपये स्कॉलरशिप के लिए हर रोज बैंक के चक्कर लगता हैए क्या वह 500 रुपये हर साल ।ज्ड चार्ज कटवा पाएगा।
    उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक त्त्ठे में शाखाओ की संख्या की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा बैंक हैं और त्त्ठे में व्यवसाय की दृष्टि से 8वाँ सबसे बड़ा बैंक हैए लेकिन यहाँ मानव संसाधन की भयंकर कमी है। 1032 शाखाओं में से 900 के आसपास शाखाओं में सिर्फ 2 कर्मचारी मिलेंगे जिसमें एक कार्यालय सहायक दूसरा बी0एम0 जबकि हर शाखा में औसतन 12ए000 खाते हैं। जिसमें ग्राहकों को सारी सुविधाएँ देने की जिम्मेदारी अकेला कार्यालय सहायक का है। ठड ज्ञब्ब् तमदमूंस और अन्य ऋण खातों के ऋण वसूली के नाम पर 10 से 5 बजे तक क्षेत्र भ्रमण में रहते हैं। जबकि बैंकिंग नियमानुसार सभी शाखाओं में उांमते . बीमबामत बवदबमचज पर कार्य होनी चाहिए। इस प्रकार से पूर्णतः इस नियम की
धज्जियांँ उड़ाई जाती हैं। बिहार के हिन्दुस्तान अखबार में 20 फरवरी की खबर है कि युवा बैंक कर्मी ग्रामीण बैंक छोड़ रहे हैं। 15 ने इस्तीफा दे दिया है।
    सरकार को तुरंत बैंकरों की सैलरी और काम के बारे में ईमानदारी से हिसाब रखना चाहिए। आवाज दबा देने से सत्य नहीं दब जाता है। वह किसी और रास्ते से निकल आएगा। बैंकों का गला घोंटकर उसे प्राइवेट सेक्टर के हाथों थमा देने की यह चाल चुनाव जितवा सकती है मगर समाज में खुशियाँ नहीं आएँगी। बहुत से लोगों ने अपने मैसेज के साथ बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या की खबरों की क्लिपिंग भेजी है। पता नहीं इस मुल्क में क्या क्या हो रहा है। मीडिया के जरिए जो किस्सा रचा जा रहा है वह कितना अलग है। दस लाख बैंकरों के परिवार में चालीस लाख लोग होंगे। अगर चालीस लाख के सैंपल की पीड़ा इतनी भयावह है तो आप इस तस्वीर को किसानों और बेरोजगार नौजवानों के साथ मिलाकर देखिए। कुछ कीजिएए कुछ बोलिए।
    नोट.यह लेख बैंकरों की बताई पीड़ा का दस्तावेज है। उन्होंने जैसा कहाए हमने वैसा लिख दिया। एक हिन्दू.मुस्लिम सनक के पीछे देश के लोगों को क्या.क्या सहना पड़ रहा है।

  एक महिला बैंक की बात सही लगी कि कमीशन का पैसा पूरे ब्रांच या बैंक के कर्मचारियों में बराबर से क्यों नहीं बँटता हैघ् क्यों ऊपर के अधिकारी को ज्यादा मिलता हैए नीचे वाले को कम मिलता हैघ् यही नहींए इन उत्पादों को बेचने के लिए रीजनल आफिस से दबाव बनाया जाता है। डेली रिपोर्ट माँगी जाती है। इंकार करने पर डांट पड़ती है और तबादले का खौफ दिखाया जाता है।

-रवीश कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 में प्रकाशित 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (08-04-2017) को "करो सतत् अभ्यास" (चर्चा अंक-2934) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Randhir Singh Suman ने कहा…

नाइना