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सोमवार, 4 मई 2015

ताक-झांक : बाबा रामदेव की डायरी में


वैशाख शुक्ल-1, विक्रम संवत 2072
हरिद्वारआज राहुल गांधी ने संसद में मोदी सरकार को ललकारते हुए कहा कि वह सूट-बूट की सरकार है. बात मेरी समझ में नहीं आई. राहुल ने ऐसा क्यों कहा! जबकि मोदी जी का सूट तो कब का नीलाम हो चुका है. वह भी करोड़ों में. सोचता हूं मैं भी अपना सूट नीलाम करवा दूं. निश्चित ही मोदी जी के सूट से ज्यादा धनराशि प्राप्त होगी. इसके दो कारण है. पहला, मेरे कई धनवान चेले हैं. दूसरा, मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे रामलीला मैदान में पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस  से जान बचाई थी. आज भी लोग उस सूट को लेकर चुटकुले बनाते हैं और मेरा परिहास करते हैं. जबकि आपद धर्म में तो सब उचित होता है. आखिर अर्जुन ने भी अज्ञातवास में बृह्नलला का रूप धरा था. इससे क्या अर्जुन की शूरवीरता कम हो गई! आपद धर्म में जान बचाने के लिए उस समय जिस वीरांगना बहन का सूट मैंने लिया था, उसने मुझसे कभी उसे वापस नहीं मांगा. जब मैं खुद ही उसे वापस करने गया तो वह बोली कि रख लो बाबा, आप को ज्यादा सूट करता है.
मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस से जान बचाई थी

वैशाख शुक्ल-2, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा दिया मैंने. अरे यार! मेरी हैसियत मोदी जी के बराबर की है और हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर जी मुझे मंत्री का दर्जा दे रहे हैं. एक बार अपने बयान में मैंने खुद कहा था कि मैं चाहूं तो इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता हूं. ऐसे ही भारत सरकार पद्म भूषण देने का मन बना रही थी. इसकी औपचारिक घोषणा होने से पहले ही मैंने इसे लेने से मना कर दिया. कैबिनेट मंत्री पद छोड़कर मैंने एक बार फिर इतिहास रच दिया. लगातार दो त्याग किए मैंने. सोनिया जी का त्याग मेरे सामने कुछ भी नहीं.
वैशाख शुक्ल-4, विक्रम संवत 2072
हरिद्वार
कल कांग्रेस के प्रवक्ता मनु सिंघवी ने कहा कि मैंने योग को राजनीति से जोड़कर राजयोग शुरू कर दिया जिसमें योग पीछे और बाबा की राजनीति आगे है. मिथ्या आरोप है उनका. मैंने योग को राजनीति से नहीं जोड़ा है अपितु राजनीति में योग को जोड़ दिया है. राजनीति में योग करते-करते मैंने जाना कि वस्तुतः राजनीति भी योग का ही तो खेल है. योग अर्थात जोड़ अर्थात जोड़ना. राजनीति का मर्ज ही जोड़ों का दर्द है. नेता अपने लिए तो जोड़ता जाता है और समाज में दर्द बांटता जाता है. अपने तनिक से जोड़ के लिए वह किसी को भी दर्द बांट सकता है. बाबा सब जानता है. बाबा के अधिकांश शिष्य राजनीतिज्ञ ही तो हैं. वो भी कुशल. मैं योग कराते-कराते राज करने लगा तो कुछ छद्म राष्ट्रवादियों, मनु सिंघवी जैसे लोगों को सहन नहीं हो रहा है. देश में कितने योग गुरू हैं. कोई मेरी तरह से वीआईपी नहीं बन पाया. क्यों! क्योंकि उन्होंने योग में कुछ जोड़ा नहीं. यदि मैं योग में राजनीति को न जोड़ता तो मेरे विरोधी कब का मेरा आश्रम बंद करवा चुके होते. आज यदि योग और बाबा रामदेव एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं तो उसका कारण राजयोग ही है.
राहुल गांधी चिंतन करने विदेश चले जाते हैं. जबकि यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है और उसके चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है.
वैशाख शुक्ल-5, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
इस समय अपने  को कर्ण जैसा ही उपेक्षित महसूस कर रहा हूं. नरेंदर मोदी की ओर से लगातार उपेक्षा मिल रही है. जबकि उनकी जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था मैंने. उनकी सरकार बनने के पश्चात ही मैं हरिद्वार लौटा था. अपने योग शिविर को चुनाव प्रचार कार्यालय में बदल दिया था. परंतु मोदी जी…. अरे काहे का जी… यहां कौन-सा सबके सामने भाषण दे रहा हूं. चुनाव जीतने के बाद एक बार भी पतंजलि योगपीठ नहीं आए. हमारी तरफ पीठ करके बैठ गए. कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने वाला मैं ही था. मोदी के पक्ष में हवा बनाने के लिए मैं आचार्य बालकृष्ण के साथ आमरण अनशन पर बैठा. नौ दिन में ही मेरी हवा टाइट हो गई थी. यहां तक कि अस्पताल पहुंच गया. तब श्रीश्री रविशंकर जी के हाथों जूस पी कर अपना अनशन तोड़ा. उस समय वह जूस नहीं समुद्र मंथन से निकला हुआ साक्षात अमृत लगा था मुझे. तब लोगों ने कैसे-कैसे सवाल किए थे. बाबा आप योगी होकर अस्पताल पहुंच गए जबकि बालकृष्ण का बाल भी बांका न हुआ था. कितनी भद्द पिटी थी मेरी. जिस मोदी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था उसी ने मुझे से दांव खेल दिया. सोचता हूं किसी दिन आश्रम में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और संजय जोशी को बुला कर अपनी व्यथा सुनाऊं!
वैशाख शुक्ल-6, विक्रम संवत 2072
करनाल
योग और आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए मुझे भी भारत रत्न मिलना चाहिए. मेरा काम सुश्रुत,धनवंतरी से बढ़कर है. मैंने योग को दर्शनीय बनाया है. भारत रत्न की लालसा मेरे मन में तब से और ज्यादा बलवती हो गई, जब से इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा को पदम भूषण मिला. वह भी शिक्षा और साहित्य में उनके योगदान के लिए. उन्होंने कितनी किताबें लिखी हैं,  बाबा को पता ही नहीं. जबकि बाबा सब जानता है. आश्रम में ही रहने वाले मेरे एक प्रिय शिष्य ने आज मुझसे कहा कि रजत शर्मा वाली अपनी जिज्ञासा आप गूगलबाबा को बताइए न. यह सुनकर मेरे कान खडे़ हो गए. मैंने सबसे पहले उससे सवाल किया, ‘तेरा गूगल बाबा योग तो नहीं सिखाता है न!’ वह हंसा. परंतु उसका चमत्कारी गूगल बाबा भी रजत शर्मा के द्वारा शिक्षा और साहित्य में किए गए योगदान को खोजने में असफल हो गया. इससे एक बात सिद्ध होती है कि मेरे पास  ‘दिव्य फार्मेसी’ है तो वर्तमान सरकार के पास ‘दिव्य दृष्टि’ है.
यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
वैशाख शुक्ल-7, विक्रम संवत 2072
करनाल
आज मेरे एक शिष्य ने पूछा, ‘बाबा आप प्रवचन देते हैं कि भाषण. पता नहीं चलता.’ आज सुबह से बैठा मैं इसी बात को सोच रहा हूं. शिष्य की बात पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा कर रहा हूं. मध्यरात्रि हो चुकी है परंतु अभी तक सफलता नहीं मिली.
वैशाख शुक्ल-8, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
शेर की तरह दहाड़ने वाले  गिरिराज सिंह आज मीनाकुमारी की तरह रोते हुए आए. आते ही बोले, ‘बाबा जुबान पर काबू रखने के लिए कोई आसन बताइए.’ मैंने उनको झट से सिंहासन करवा दिया. इसे करने के बाद गिरिराज बाबू बोले कि क्या बाबा इसमें भी तो मेरी जुबान बाहर ही निकली रही. यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं रही कि यह आसन करते समय जुबान मुंह के बाहर निकालनी पड़ती है. अंत में अपना पिंड छुड़ाने के लिए मैंने उन्हें नभो मुद्रा जिसमें जुबान तालू में लगानी होती है और मांडुकी मुद्रा जिसमे जुबान को मसूढ़ों के ऊपर घुमाया जाता है, करवाया. इसको करने के बाद वह खुशी-खुशी वहां से चले गए. अबोध! अब यह बाबा उन्हें क्या बताता! यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-9, विक्रम संवत 2072
कुरुक्षेत्र
कुछ लोगों को शंका है कि योग से ज्यादा फायदा नहीं होता हैा.योग से बहुत फायदा होता हैं. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता! आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-11, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल गत माह की बेलैंस सीट देखी तब से  योग करने का मन नहीं कर रहा है. पिछने महीने पतंजलि उत्पाद केंद्र की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई. देखकर मन खिन्न है. आज पूरा दिन इसी सोच-विचार में व्यतीत करूंगा कि अब कौन-सा नया उत्पाद लॉन्च किया जाए. ‘दिव्य पुत्रजीवक बीज’ का अप्रत्याशित परिणाम मिला. उसका विपणन जोरों पर है. जिन्होंने इसका उपयोग किया उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता. हमने मुख्य समाचारपत्रों में प्रथम पृष्ठ पर पूरे-पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया था इसका. यद्यपि मीडिया ने इसके नाम को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. इन मूर्खों को पता नहीं कि अनजाने में वे मेरे उत्पाद का विज्ञापन ही कर रहे थे. प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है. आयुर्वेद के नाम रोज नई-नई ऐरी-गैरी कंपनियां पैदा हो रही हैं. आसन क्रिया से अधिक उत्पादों को बेचने में कसरत है. तनाव बहुत बढ़ गया है. शाम के पांच बज रहे हैं. अभी-अभी भ्रामरी और सुप्त भद्रासन  किया है ताकि तनाव कम हो और मन शांत रहे.
वैशाख शुक्ल-12, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
विपश्यना! पाली भाषा का शब्द. जिसका मतलब होता है जो जैसा है, वैसा देखना. इसी के लिए राहुल गांधी विदेश गए थे.  अच्छा है. जिस वय में बालक बिपाशा के लिए ध्यानमग्न होते हैं वे विपश्यना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. होना भी चाहिए क्योंकि पार्टी की दशा चिंतनीय है. पंरतु ऐसा करना उनके पार्टी के हित में हो सकता है, राष्ट्रहित में नहीं. उन्होंने हमारी परंपरा का पालन नहीं किया. हमारे यहां हिमालय में जाकर चिंतन-मनन करने की परंपरा रही है. देखो तो राहुल की वजह से विपश्यना का कितना प्रचार हो गया. अगर वह प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, कपालभाति करते तो कितना अच्छा होता! सबकुछ भूलभाल के मेरे योग शिविर में ही आ सकते थे. वह तो अच्छा है कि यहां सबकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि विदेश जाकर विपश्यना करें. वरना तो मेरा योग का धंधा मंदा हो जाता. वैसे जब मैं राहुल को शहजादा कहता हूं तो क्या गलत कहता हूं. राहुल गांधी चिंतन करने के लिए विदेश जाते हैं और यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आम आदमी के चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है अब देखना है कि राहुल गांधी के चिंतन से क्या निकलता है!
- अनूप मणि त्रिपाठी
लोकसंघर्ष पत्रिका  में शीघ्र  प्रकाशित

शनिवार, 15 अगस्त 2009

आयोग एक दवा और एक मर्ज भी!


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हमारा देश कई प्रधान देश है। कृषि प्रधान तो था ही। क्रिकेट प्रधान तो है ही। होते होते देश अब आयोग प्रधान भी हो गया है। देश की आने और जाने वाली सरकार भी करें तो क्या करेंे। बिना आयोग के सरकारे नहीं चला करती। नई सरकार का नये आयोग गठन किए बिना गुजारा नहीं। वो सरकार ही क्या जो अपने कार्यकाल में आयोग का योगासन न करे। कितने आयोगों का गठन हो चुका! उनका हमारे लोंकतंत्र में क्या योगदान है इसका योग यहां पर किया जा रहा है।

आयोग बेराजगारी दूर करने का साधन। आयोग की इस देश को बहुत आवश्यकता है। सरकार किसी गंभीर,पेचीदगीभरी मुद्दे पर स्वेच्छा से या अनिच्छा से आयोग का गठन करती है। वो आयोग का गठन कर एक तरह से बेरोजगारी कम करती है। आयोग रिटायर व्यक्ति को काम देता है। सेवानिवृत्त होने के बाद खाली बैठना बेराजगारी नहीं तो क्या है! आप इसे बेराजगारी न माने तो अर्धबेरोजगारी तो है ही। अब आप इसे मानने से इंकार न करीएगा। करीएगा तो करीएगा। हम तो सेवानिवृत्त अधिकारी को बेराजगार ही कहेंगे।

आयोग अवकाश की पुन:प्रात्ति का एक फरमान। आयोग का गठन कर सरकार कई पुराने घुटे उच्च अवकाश प्राप्त अधिकारियों जिन्हें अनुभवी और दक्ष भी कहा जाता है, रख कर उनका अवकाश समाप्त करती है। आयोग में अवकाश प्राप्त पुराने घुटे हुए उच्च अवकाश प्राप्त अधिकारी ही क्यों! वो अपने घरों में बैठे-बैठे क्या करते। जब बैठना ही है तो आयोग में ही बैठे।

आयोग किसी व्वनप्राश से कम नहीं है। बल्कि सवाया ही बैठेगा। आयोग कें बैठने के नाम से कितने क्रब में पांव लटकाए अधिकारी उठ कर बैठ जाते है। सरकार कहती है सच सबके सामने लाया जाएगा। यह कहकर सत्यवादी हरिश्चंद्र का खिताब अपने नाम करती है। वही विपक्ष भी खुश उनको एक नया मुद्दा मिला। जनता भी इस आस में खुश कि न्याय होगा। यानी सब खुश यानी सबकी सेहत दुरूरत।

आयोग एक रामबाण। प्रजातंत्र के व्याधि को भेदने के लिए आयोग एक रामबाण है। किसी ज्वलंत मुद्दे की हवा निकालने, किसी अप्रिय स्थिती को टालने के लिए,वर्तमान में सच्चाई से फिलहाल बचने के लिए, बैठा दो आयोग। सब सेंटल हो जाएगा।

आयोग एक कछुआ। कई आयोग देश में बैठे तो बैठे रह गए। कुछ हिम्मत करके चले,भले ही मंथर गति से, तो मंजिल तक नहीं पहुंचे। कुछ ऐसे-तैसे पहुंचे तो उनकी रफट को सरकार ने पढ़ा ही नहीं। कुछ रपटों को जैसे-तैसे सरकार ने पढ़ा तो उन पर अमल किया नहीं। कुछ रपटों पर अमल करना चाहा मगर रपट कुछ जमी नहीं। कुल मिलाकर प्रजातंत्र को धीरे-धीरे परिपक्व कर रहा है आयोग।

आयोग एक नाव। जब-जब सरकार भंवर में होती है तो वो आयोग नाम की नाव चलाती है। वो नाव अपनी रपट के पतवार से सरकार को सुविधाजनक स्थिती में खे कर ले आता है। जिस रपट से वो सरकार का बेड़ा पार लगाता है उस रपट को मानने या न मानने की सुविधा सरकार के पास होती है।

आयोग सरकार का एक सेफटी वाल्व है। जिसका वाल्व समय समय पर सरकार के राजनैतिक नफे नुकसान के हिसाब से फैलता सिकुड़ता है। जिससे लोगों का आक्रोश निकल जाता है और सचाई कही वाल्व में अटक जाती है। उसका कुछ अंश लटकता हुआ दिखता है कुछ अंश छुपा रहता है। सरकार सेफ रहती है। क्योंकि सचाई कितना दिखना है कितना उघाड़ना है, ये सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है।

आयोग एक चिमटा। सरकार जिसको पकड़कर सच को झाड कर उठाती है। नगं हाथों से पकड़ेगी तो उसके हाथ जलने का खतरा बना रहता हैं। कमब्ख्त सच ऐसी ही चीज है। वो इस चिमटे से अपने चूल्हे की आग को दूसरे के चूल्हे में डाल सकती है। दूसरे चूल्हे की आग से अपने चूल्हें की आग भी जला सकती है।

आयोग एक खेल। गंभीर मुद्दों पर खेला जाने वाला एक छुपा हुआ खेल। जिसे सरकार और विपक्ष एक दूसरे के साथ खेलते है। जब सतारूढ़ दल गठित करता है तो विपक्ष आयोग पर और उसकी रपट पर सवाल खडे क़रता है। विपक्ष जब सरकार में आती है वो गर किसी आयोग का गठन करती है तो विपक्ष जो कभी सरकार थी, वो आयोग और उसकी रपट पर सवाल उठाता है।आयोग-आयोग का खेल सरकारपक्ष-विपक्षी दल संजीदा हो खेल-खेल में खेलते रहते है!

आयोग एक फुकनी। सरकार जिससे जनता के करोड़ों रूपये उस सच को जानने में फुकती है।जिसे जनता पहले से एक दमड़ी खर्च किए बिना ही जानती और समझती है।

आयोग एक ड्रा टेस्ट मैच। जनता प्रतीक्षारत। देखे क्या परिणाम आता है! परिणाम आने पर ही तो पता चलेगा कौन सही कौन गलत ! अवव्ल रिजल्ट तो आता नहीं। रिजल्ट आता भी है तो पता चलता है कि सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया। अक्सर परिणाम की ड्रा वाली परिणिती होती है। न खेलते हुए भी हारा कौन! प्रतीक्षारत जनता क्योंकि वो प्रतीक्षारत है।

आयोग एक अजीब-सी कशमश। गठित करो तो मुसीबत न करो तो मुसीबत। रपट आए तो बवाला न आए तो बवाला। कार्यकाल बढाओ तो सवाल। समय से पहले भंग करो तो सवाल। कुल मिलाकर आयोग सबको खुश न करना वाला सबको कुछ न कुछ देने वाला कोई अजब-सा सरकारी शह है।

आयोग एक ठण्ड़ा बस्ता। जिसमें तत्कालीन आक्रोश जो उबाल मारता है, को डाला जाता है। जबतक इसमें से कुछ निकलता है तबतक सब जानने का जोश ठण्ड़ा पड़ जाता है। क्या हुआ था! क्यों हुआ था! क्या निकला है! क्या आया है! जो होना था सो हो गया में बदल जाता है।

आयोग एक औजार। जिसमें सत्तारूढ़ दल का सेनापति अपने तेज से रपट में धार लगाता है। उसकी रपट को कोई अपनी तलवार बनाता है तो कोई अपनी ढाल बनता है। उसकी रपट कुछके विश्लेषण का धुरा बनेगी तो कुछके बहसों को सिरा बनेगी।

आयोग एक पहल। आयोग किसी सच को सामने लाने के लिए एक पहल है। जो एक पहल बन शुरू होती है और एक पहेली बन खत्म होती है।

अनूप मणि त्रिपाठी

09956789394


लोकसंघर्ष पत्रिका में जल्द प्रकाशित

बुधवार, 15 जुलाई 2009

औसत का खेल

मुझे इस बात का जरा भी भान न था कि मैं अपने लिए एक मोटरसाइकल नहीं, एक नई मुसीबत मोल ले रहा हूं। खैर, जो होना था सो हो गया। यह हम जैसे आम आदमी का मूलमंत्र है। मोटरसाइकल मैंने अपनी सहुलियत के लिए ली थी। कही आने-जाने में आसानी होती। समय की बचत सो अलग। मोटरसाइकल पर बैठ कर मेरी गतिशीलता में वृद्धि होती। इन सब बातों को मद्देनजर रखते हुए, मैंने एक मोटसाइकल खरीदी। अभी उसे ले कर घर आता नहीं हूं कि मेरे पड़ोसी पूछ उठाते हैं,‘‘ कितने का एवरेज कंपनी वाले क्लेम कर रहे है।’’ पड़ोसी का मतलब गाड़ी के माइलेज से था। उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,‘‘ कंपनी वाले जितना बताए उससे दस-बीस किलोमीटर कम मान कर चलना चाहिए, भाईसाहब।’’ पहले दिन से ही यह सवाल ‘ क्या एवरेज दे रही है!’ मेरे पीछे लग गया। मैं जहाँ जाता, यह सवाल मुझसे टकरा जाता। कभी सीधे-सीधे , तो कभी एक लंबी भूमिका के बाद। कभी यह मेरी गाड़ी के पीछे-पीछे आता, तो कभी मुझसे पहले ही पहुंच जाता। गाड़ी लेने के बाद शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब यह सवाल ‘ क्या एवरेज दे रही है ’ मुझ पर न दागा गया हो। मेरा जवाब सिर्फ इतना होता,‘‘पता नहीं’’। मेरा जवाब सुनकर लोग मुझ पर शक करते। जबकि मैं अपने जानिब उन्हें सही कहता । कुछ दिन बाद मेरी हालत यह हो गई, जैसे ही कोई ‘ क्या एवरेज दे रही है ’ पूछता, मुझे सांप सूंघ जाता। गाड़ी चलाने को मजा फुर्र हो जाता। नई-नई गाड़ी लाने के उत्साह के समंदर को, यह सवाल एक पल में खाली कर देता। आखिर,, मैंने ठान लिया कि गाड़ी का एवरेज पता करके छोडूंगा। फिर शुरू हुआ मेरा एवरेज पता लगाने का एक अंतहीन सिलसिला। जिसने मेरी मानसिक शांति को हर लिया। गाड़ी में कितना पेट्रोल है ! गाड़ी कितने किलोमीटर चली ! कल कितने का एवरेज दिया ! आज कितने का एवरेज है ! एक-एक बात का, मैं हिसाब रखने लगा। गाड़ी जब अधिक एवरेज देती, तो खुशी का ठिकाना न रहता। मगर अगले दिन का कम एवरेज मेरे कल की खुशी को ठिकाने लगा देता। एवरेज कम आने पर पेट्रोल की गुणवत्ता कभी मेरे निशाने पर होती, तो कभी शहर का टैªफिक। एवरेज कम आने के कारणों में भिन्नता हो सकती थी, मगर एवरेज अधिक आने का सारा श्रेय सिर्फ और सिर्फ मेरी गाड़ी चलाने की कुशलता को जाता। उन दिनों मेरी हालत देखकर आप मुझे एवरेज का मारा कह सकते थे। एवरेज यानी औसत। इस शब्द ने पहले कभी मेरा घ्यान नहीं खींचा था। मोटरसाइकिल लेने के बाद औसत को लेकर मैं बुरी तरह से उलझ गया। हालांकि मोटरसाइकिल से मेरा स्नेह बराबर बना रहा, मगर औसत ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उसके बारे में कुछ सोचूं। कुछ सवाल मेरे जहन में उठने लगे। मसलन, इसकी उत्पति कैसे हुई ! अविष्कारक कौन है ! औसत प्रचलन में कैसे आया ! औसत मुझे बड़ा ही चमत्कारी लगा, जब इसके विषय में मैं सोचने लगा। आखिर क्यों, नितिनियंता इस एक शब्द का काफी इस्तेमाल करते हैं। मैंने इसके उत्पति के बारे में कल्पना की; -


बहुत समय पहले, किसी राज्य में एक राजा राज करता था। जो निरंकुश और विलासी था। प्रजा की भलाई छोड़, वो सुरा-सुंदरी में डूबा रहता। राज्य का सारा कार्यभार उसके कुछ चापलूस मंत्री चलाते । राजा की अकर्मण्यता और उदासीनता के चलते प्रजा की हालत दयनीय हो गई। जब स्थिति असहनीस हो गई, तब प्रजा ने विद्रोह कर दिया। उसने चारों तरफ से महल को घेर लिया। तब राजा ने घबराकर अपने मंत्रियों से अपातकालीन मंत्रणा की। राजा ने बदहवाशी में अपने मंत्रियों से कहा,‘‘ ऐसा कोई उपाय निकालो जिससे यह आसन्न संकट टल जाए। नहीं तो आज हम सब मारे जाएंगे। अगर प्रजा ने महल पर कब्जा करने की ठान ली, तो उसको हमारी सेना भी नहीं रोक पाएंगी।’’ तभी एक बूढा मंत्री मुस्कुराया। उसने कुछ सोच लिया था। वो राजा से बोला,‘‘ महाराज, आप चिंता न करें। मैंने एक ऐसा उपाय निकाला है कि प्रजा उल्टे पांव लौट जाएंगी।’’ राजा को सहसा विश्वास नहीं हुआ। परन्तु बूढे़ मंत्री के कहने पर, वो महल के बाहर आया। उसने देखा कि प्रजा नारे लगा रही, ‘ हम भूखे है हमंे रोटी दो !’ ‘हम नंगे है हमे कपडे़ दो !’ बूढ़ा मंत्री बोला, ‘‘भूखे हो तो रोटी खाओ। नंगे हो तो कपड़े मोल लो।’’ इस पर प्रजा चिल्लाई,‘‘ हम कहां से खरीदे ! हमारे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है।’’ तभी बूढ़े मंत्री ने एक कागज का टुकड़ा निकाला और बोला,‘‘झूठ बोलते हो तुम सब, यह देखो इस कागज पर स्पष्ट लिखा है कि राज्य के प्रत्येक व्यक्ति के पास दस सोने के मोहरे है।’’ प्रजा अचरज में पड़ गयी। भला ये कैसे हो सकता है ! बूढ़ा मंत्री न जाने क्या बक रहा है ! प्रजा अभी कुछ कहती कि बूढ़ा मंत्री बोला,‘‘ इघर देखो, अभी मैं तुम सब को कुछ दिखाता हूं।’’ तब उसने राजकोष में जमा कुल मोहरों में राज्य की समस्त प्रजा से भाग दे दिया। चमत्कार ! सबके हिस्से में दस-दस मोहरंे आ गई। हिस्सेदारों में मंत्रियों के साथ राजा भी शामिल था।‘‘ मगर वो मोहरें हमें नहीं दिखती ! वो मोहरें है कहां!’’ प्रजा ने बूढे़ मंत्री से कहा। ‘‘ तुम सब के दिखने न दिखने से क्या होता है ! कागज पर तो दिख रही है न! अब सारे यहां से भाग जाओ , नहीं तो हाथियों से कुचलवा दूंगा।’’ बूढ़ा मंत्री गरजा। कागज में तो सबके हिस्से दस-दस मोहरें दिख रही थी। यह देख, प्रजा भुनभुनाते हुए लौट गई। तब बूढे़ मंत्री ने राजा से कहा,‘‘ देखा, महाराज औसत का खेल !’’ इस प्रकार औसत ने प्रजा के अंसतोष को असंमजस में डाल दिया और राजा का सिंहासन सुरक्षित रखा। तभी से औसत प्रचलन में आ गया और आज भी औसत हमारे निति नियंताओं का प्रिय बनकर उनके गोद में बैठा हुआ हैं।


अनूप मणि त्रिपाठी
ई- 5003 , सेक्टर - 12
राजाजी पुरम,लखनऊ
मो. न. 09956789394
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