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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अन्ना आंदोलन: एक आलोचनात्मक विश्लेषण

अन्ना हजारे के अनशन के विरोध और समर्थन में बहुत कुछ लिखा जा चुका है-विरोध में कम और समर्थन में ज्यादा। फिर, एक और लेख की क्या जरूरत है? हर लेखक का अपना एक दृष्टिकोण होता है और मेरा भी है। हर लेख कुछ ऐसे नए तथ्यों को उद्घाटित करता है जो पुराने लेखों में नहीं होते। इसके पहले भी मैंने अन्ना हजारे के आंदोलन का गांधीवाद के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया था परंतु इस आंदोलन के बारे में कुछ और बातें भी कही जानी चाहिए, कुछ अन्य पहलुओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। चाहे हम इस आंदोलन के साथ हों, उसके प्रति तटस्थ हों या उसके विरोधी हों, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस आंदोलन का हमारे प्रजातानात्रिक ढांचे और हमारे देश की सामूहिक सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
सबसे पहले हम यह जानने की कोषिष करें कि हजारे और उनके तरीके कितने गांधीवादी हैं। मीडिया उन्हें गांधीवादी बताते नहीं थक रहा है, षायद इसलिए क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी की तरह उपवास किया। परंतु क्या केवल उपवास करने से कोई व्यक्ति गांधीवादी हो जाता है? यह एक बहस का विषय है। गांधीजी के लिए अनषन राजनैतिक हथियार नहीं था। वे आत्मशुद्धि के लिए व्रत रखते थे। मेरा यह मत है कि कोई व्यक्ति मात्र इसलिए गांधीवादी नहीं बन जाता क्योंकि वह अनशन करता है। सच्चा गांधीवादी कहलाने के लिए उसे कुछ और शर्तों को भी पूरा करना होगा। ये शर्तें क्या हैं? गांधीजी साध्य और साधन-दोनों की पवित्रता पर जोर देते थे। उनकी यह मान्यता थी कि साध्य चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो, उसे पाने के लिए अनुचित साधनों के उपयोग से साध्य की पवित्रता ही नष्ट हो जाती है। प्रश्न यह है कि साधनों का क्या अर्थ है? क्या केवल अनशन ही साधन को पवित्र बना देता है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमें गांधीजी के जीवन का अध्ययन करना होगा। हमें यह देखना होगा कि उन्होंने किन परिस्थितियों में और किन उद्धेश्यों के लिए अनषन किए थे।
गांधीजी जब भी अनशन करते थे वे उसे या तो प्रायश्चित और या फिर आत्मशुद्धि का नाम देते थे। वे कभी यह नहीं कहते थे कि उनके अनशन के कारण कोई मांग या मांगें स्वीकार की जावें। प्रजातांत्रिक संस्थाओं व सिद्धांतों की कीमत पर अपनी कोई मांग मनवाने की कशिश तो उन्होंने कभी की ही नहीं। सच तो यह है कि उन्होंने कभी सरकार के विरूद्ध कोई अनषन ही नहीं किया। यह मानना या कहना कि केवल मेरी मांग सही और उचित है और कोई भी दूसरा दृष्टिकोण गलत है, न केवल गैर-प्रजातांत्रिक है वरन् प्रजातांत्रिक संस्थाओं का क्षरण करने वाला भी है। इस तरह की सोच से तानाशाही की बू आती है।
गांधीजी का उपवास उनका आत्मांदोलन होता था। वे इसमें किसी दूसरे व्यक्ति से सहायता की अपेक्षा नहीं करते थे। उपवास करने का निर्णय वे स्वयं लेते थे और उसे खत्म करने का निर्णय भी केवल उनका ही होता था। वे कभी कोई “टीम“ नहीं बनाते थे और न ही उस “टीम“ से कोई सलाह लेते थे। उन्होंने कभी किसी से उनकी ओर से सरकार या किसी अन्य व्यक्ति से बातचीत करने का अनुरोध नहीं किया। हजारे का जोर न केवल इस बात पर था कि उनकी मांगे मानी जाएं बल्कि उन्होंने एक “टीम“ बना रखी थी जो उनकी ओर से सरकार से बातचीत करती थी और निर्णय लेती थी। मीडिया भी लगातार “टीम अन्ना“ शब्द का प्रयोग करता रहा।
गांधीजी ने कभी अपने उपवास को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए लाखों तो छोडि़ए, हजारों या सैकड़ों की भीड़ नहीं जुटाई। उनके उपवास का लक्ष्य कभी जोर-जबरदस्ती से अपनी मांग मनवाना नहींे रहा। उनकी सोच में तानाशाही के लिए कोई स्थान नहीं था। अन्ना को अपने अनषन के सामने सरकार को झुकाने के लिए लाखों लोगों को सड़कांे पर निकालना पड़ा। अन्ना टीम के एक सदस्य ने उनके अनषन के नौवें दिन धमकी की भाषा में यह कहा कि अगर अन्ना को कुछ हो गया तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? अर्थात, सरकार जिम्मेदार होगी और इसलिए उसे अन्ना (ंअसल में अन्ना टीम) की मांगों को तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए।
अंततः यही हुआ। अन्ना के समर्थन में जो लोग सड़कों पर निकले, वे उच्च मध्यम वर्ग और उच्च जातियों के थे और भारत के सभी सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। उनमें अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और गरीबों की संख्या बहुत कम थी। उल्टे, ये वर्ग अन्ना के उपवास के परिणामों के बारे में सषंकित थे क्योंकि यह उपवास, संविधान और संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दे रहा था।
समाज के कमजोर व वंचित वर्ग भी भ्रष्टाचार से पीडि़त हैं और वे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी संघर्ष को अपना पूरा समर्थन देना चाहते हैं। परंतु यह संघर्ष अल्पसंख्यकों, दलितों व अन्य वंचित वर्गों की अन्य समस्याओं की कीमत पर नहीं हो सकता। अन्ना के आंदोलन का चरित्र ऐसा था कि उससे यह आषंका उत्पन्न होना स्वाभाविक थी कि उससे वंचित वर्गों की अपने अधिकार पाने की लड़ाई कमजोर होगी। इन वर्गों को ऐसा लग रहा था कि उनका अस्तित्व और उनके मूल अधिकार संविधान व संसद की सर्वोच्चता पर निर्भर हैं और यह सर्वोच्चता कमजोर होने से वे भी कमजोर होंगे।
अन्ना हजारे का आंदोलन, देष पर बहुसंख्यकवाद लादने का षड़यंत्र प्रतीत हो रहा था। इस आंदोलन को मुख्य विपक्षी दल भाजपा के अलावा, आरएसएस का भी पूरा समर्थन मिला। आरएसएस ने भाजपा को अन्ना टीम और उनके अनषन को पूरा सहयोग देने की सलाह दी। इससे वंचित वर्गों की आषंकाएं और गहरी हुईं। संघ और भाजपा के समर्थन ने अन्ना के आंदोलन को नैतिक दृष्टि से कमजोर किया।
इससे आंदोलन का राजनीतिकरण हो गया। अन्ना ने एक ऐसी पार्टी का समर्थन स्वीकार किया जिसके सदस्य गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। जिन राज्यों, विषेषकर कर्नाटक, में भाजपा की सराकारें हैं, वहां के मंत्रियों व पार्टी के उच्च पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। अन्ना, जो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, भला कैसे किसी ऐसी पार्टी का समर्थन स्वीकार कर सकते हैं जिस पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हों। संघ और भाजपा ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अन्ना के समर्थन में निकले जुलूसों, धरनों आदि को अपना पूरा समर्थन दिया और उनमें भीड़ जुटाई। इससे भी अन्ना का आंदोलन, नैतिक दृष्टि से कमजोर हुआ।
जहां तक गांधीजी का प्रश्न है, उनके अनशन, राजनीति को आध्यात्मिक व नैतिक दृष्टि से समृद्ध करने के गंभीर प्रयास हुआ करते थे। इसके विपरीत, अन्ना और उनकी टीम ने जमकर राजनीति की। आरोपों और प्रत्यारोप का लंबा सिलसिला चला। रामलीला मैदान पर इकट्ठा भीड़ में कई लोग षराब पीकर षामिल हुए और उन्होंने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, अन्ना के आव्हान पर अन्ना के समर्थकों ने सांसदों का घेराव शुरू कर दिया। सांसदों को यह चेतावनी दी गई कि या तो वे अन्ना की मांगें मान लें अन्यथा उनके साथ कुछ भी हो सकता है। प्रधानमंत्री के निवास का भी घेराव किया गया, जिससे निश्चय ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की गरिमा को आघात लगा।
अन्ना टीम पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने इतनी भारी भीड़ इकट्ठा करने के लिए विदेशों से प्राप्त धन का इस्तेमाल किया। करीब एक लाख लोगों के लिए दस-बारह दिनों तक खाने-पीने की पूरी व्यवस्था की गई। आखिर यह धन कहां से आया? क्या जिन लोगों ने यह धन दिया वे पूर्णतः ईमानदार और स्वच्छ थे? अगर ऐसा है तो उनके नाम क्यों छिपाए जा रहे हैं? कुछ लोगों ने यह आरोप भी लगाया है कि रामलीला मैदान पर भोजन का इंतजाम विहिप ने किया था। अगर इस आरोप में कोई सच्चाई है तो देष अन्ना से यह जानना चाहेगा कि उन्होंने इन स्त्रोतों से आर्थिक सहायता क्यों स्वीकार की? क्या उनके विहिप से कोई संबंध हैं? यदि नहीं तो उन्होंने अपनी टीम के सदस्यों को विहिप व ऐसे ही अन्य स्त्रोतों से आर्थिक मदद क्यों लेने दीं?
गांधीजी के विपरीत अन्ना ने कभी देष में साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ अनषन नहीं किया। बल्कि, उन्होंने कभी साम्प्रदायिक दंगों की निंदा तक नहीं की। अन्ना ने मोदी सरकार के विकास के माडल की तारीफ की। इन्हीं मोदी के नेतृत्व में सन् 2002 में गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विकास का मोदी माडल, गरीबों की कीमत पर करोड़पतियों को अरबपति बनाने वाला माडल है। इस तरह का माडल गांधीजी को कभी मंजूर नहीं होता।
हमें यह याद रखना चाहिए कि अर्थव्यवस्था का उदारीकरण-वैश्वीकरण और बड़ी कंपनियों के अनाप-शनाप मुनाफे, भ्रष्टाचार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। सच तो यह है कि पहले की तुलना में आज बड़े उद्योगपति और कारपोरेट दुनिया भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्त्रोत बन गई है। गांधीजी समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े सबसे आखिरी आदमी के प्रति चिंतित रहते थे। वे कहा करते थे कि ऐसा विकास का माडल किसी काम का नहीं है जो सबसे कमजोर व्यक्ति को लाभान्वित न करे।
अन्ना ने गुजरात के विकास के उस माडल की तारीफ की जो अमीरों को और अमीर बना रहा है और जिसके चलते, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और धनपषु अकूत संपदा इकट्ठा कर रहे हैं। फिर, हजारे को गांधीवादी कैसे कहा जाता सकता है? हजारे ने गांधीजी द्वारा अविष्कृत आंदोलन के तरीके का इस्तेमाल जरूर किया परंतु उनका आंदोलन गैर-गांधीवादी था और उन्होंने उसकी सफलता के लिए अनैतिक और गांधीजी को सर्वथा अस्वीकार्य रणनीतियों का इस्तेमाल किया। अन्ना ने कई बार यह कहा है कि भ्रष्ट लोगांे को फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। गांधीजी, किसी भी उद्धेष्य-चाहे वह कितना ही पवित्र क्यों न हो- के लिए हिंसा के प्रयोग के विरूद्ध थे।
हजारे के “आदर्ष“ गांव में षराब पीने वालों को जूते मारे जाते हैं और उनके मुंह पर कालिख पोतकर उन्हें गधे पर बैठाकर गांव में घुमाया जाता है। यह निहायत बेहूदा और हिंसक तरीका है जिसके इस्तेमाल को गांधीजी कभी स्वीकार नहीं करते। इस सबसे यह साफ है कि अन्ना हजारे क मूल चरित्र तानाषाहीपूर्ण है। वे सफलता पाने की बहुत जल्दी में हैं और उनका यही चरित्र उनके नेतृत्व में चले आंदोलन मंे भी झलकता है।
भ्रष्टाचार का मुकाबला नए कानून बनाकर और कड़ी सजाएं देकर किया जा सकता है। हजारे का जोर हमेषा “कड़ी सजा“ पर रहता है। जैसा कि मैंने अपने पूर्व के एक लेख में लिखा था, भ्रष्टाचार, कानूनी नहीं बल्कि नैतिक समस्या है। चाहे हम कितने ही नए कानून बना दें, उससे भ्रष्टाचार खत्म होने वाला नहीं है। हत्यारों को फांसी पर चढ़ाने की व्यवस्था है। परंतु क्या इससे हत्याएं बंद हो र्गइं हैं? क्या हत्याओं में जरा सी भी कमी आई है? समस्या यह है कि हमारी न्याय व्यवस्था ही भ्रष्ट है। बड़े-बड़े वकील, दुर्दांत खूनियों को मासूम सिद्ध करने के लिए अपनी जान लड़ा देते हैं। इसके विपरीत, गांधीजी का कहना था कि किसी वकील को कोई मुकदमा तब तक अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए जब तक कि वह संतुष्ट न हो कि उसका मुव्वकिल पूरी तरह निर्दोष है। इस बात की क्या गांरटी हैं कि “षक्तिषाली लोकपाल“ स्वयं भ्रष्ट नहीं हो जाएगा और भ्रष्ट वकील और जज, रिष्वतखोरों की वकालत कर उन्हें निर्दोष सिद्ध नहीं कर देंगे?
भ्रष्टाचार से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार है नैतिकता का प्रचार-प्रसार। परंतु हमारे नागरिक, नैतिक कैसे हो सकते हैं जब कि हमारी षिक्षा व्यवस्था ही मोटी रकम कैपिटेषन फीस के रूप में चुकाकर, महंगे कालेजों से डिग्री हासिल करने और उसके बाद भारी-भरकम पैकेज पाने की अंधी दौड़ पर आधारित है। हमें मजबूत लोकपाल की जरूरत तो है परंतु उससे ज्यादा जरूरी यह है कि हमारी षिक्षण संस्थाओं से पढ़कर निकलने वाले छात्र-छात्राओं का नैतिक चरित्र मजबूत हो।
अन्ना षायद ही कभी नैतिकता की बात करते हैं। उनकी सोच केवल कानूनों और सजाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। गांधीजी का जोर नैतिकता और आध्यात्मिकता पर था। वे समस्याओं का हल अपनी अंतरात्मा में ढूढ़ते थे न कि कानूनों में। जो व्यक्ति मसीहा बनने की जल्दी में होता है वह कभी अपनी अंतरात्मा की आवाज नहीं सुन पाता। वह सभी समस्याओं का हल बाहरी उपायों से करना चाहता है। गांधी बनने के लिए अपनी अंतरात्मा में डूबने की क्षमता अनिवार्य है ।

-डाॅ. असगर अली इंजीनियर

बुधवार, 24 अगस्त 2011

अन्ना का आन्दोलन: असलियत क्या है ? भाग 2


सिविल सोसाइटी या नागरिक समाज और संसद : मीडिया की भूमिका

सिविल सोसाइटी के प्रति बड़ा प्रेम उमड़ आया है अन्ना आन्दोलन में। कहाँ हैं वे मजदूर, किसान, भूखे, खेत मजदूर इत्यादि इसमें जिनको दो जून खाना नहीं मिलता? इसमें सिर्फ बड़े बड़े धनी, कमाऊ, उपरी मध्यम तबकों के लोग ही क्यों शामिल हैं? है कोई जवाब? यहाँ वर्ग विभेद साफ़ दीखता है. एन.आर.आइ भी कूद पड़े हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ , और इन्कोम टैक्स छुपाने वाले बड़े बड़े फ़िल्मी कलाकार तथा अन्य कई लोग भी।

तो इस नागरिक समाज में क्या सिर्फ धनी लोग ही शामिल हों? यही है परिभाषा सिविल सोसाइटी की? किसने आपको, कुछ थोड़े से, आधा दर्जन या एकाध दर्जन लोगों को पूरे समाज की ओर से बोलने का अधिकार दिया? पुछा आपने मेह्नात्काशो से? क्या पोस्को का आन्दोलन नागरिक समाज का नहीं है जिसमें आम आदमी हिस्सा ले रहा है? उसपर मीडिया क्यों चुप्पी साधे हुए है? और क्यों रात-दिन अन्ना आन्दोलन की ‘रनिंग कमेन्ट्री’ दे रहा है ? पिछले अन्ना I चरण में ही स्पष्ट हो गया था की बड़े मीडिया बरोंस (मालिकों) का बड़ा हिस्सा करोड़ों रुपये बहाकर इस आन्दोलन के पीछे खड़ा हो गया है। यह कैसे हो सकता है की कुछ टीवी चैनल रात दिन सिर्फ यही खबरें दें, और कोई दूसरी नहीं? इसके पीछे जरूर संगठित कोर्पोराते ताकतें हैं जो भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर हमारे देश की जनतांत्रिक व्यवस्था और सच्चे जन आन्दोलन को कमजोर बनाना चाहते हैं।

यह सभी जान चुके हैं की कुछ बड़े मीडिया मालिकों ने आपस में मिलकर यह तय किया था की वे हर तरह से अन्ना आन्दोलन को मदद और पब्लिसिटी देंगे उनकी कमेन्ट्री, उनके फ़ोन नंबर , उनकी लगातार गतिविधियों की खबरें टीवी पर आती रहती है। आम मज्द्दोरों के आन्दोलन को यह क्यों नसीब नहीं ? क्योंकि बड़े इजारेदार पूंजीपति अन्ना आन्दोलन का पूरा समर्थन कर रहे हैं।

नागरिक समाज आखिर कहते किसे हैं? ऐसा समाज वह होता है जिसमे समाज के आम लोग , बुद्धिजीवी , आम नागरिक मिलजुल कर समस्याओं विचार करते हैं। लेकिन इन करोड़ों लोगों को तो अलग कर दिया गया है। और इसमें सिर्फ वे ही बचते हैं जो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हुए कारों में घुमते हुए टाइम -पास के रूप में भ्रष्टाचार की बात करते हैं। जाइये और देखिये एक आम खदान मजदूर या रिक्शा वाला कैसे इस व्यवस्था से पीड़ित है।

यहाँ आती है व्यवस्था की बात । और आज आर्थिक व्यवस्था के शीर्ष पर हैं अम्बानी और बिरला जैसे इजारेदार। मजेदार बात है की इस पर तो अन्ना आन्दोलन बिलकुल चुप्पी साधे हुए है । आखिर क्यों ? किसका हित साधन कर रहे हैं वे ? एक शब्द भी उन्हों ने नहीं कहा है इन बड़े बड़े उद्यमियों, कारोबारी घरानों और फिनांस या वित्त पूँजी के खिलाफ क्या बिना बड़े पूंजीपतियों पर रोक लगाये आप भ्रष्टाचार रोक सकते हैं ? एक भी आर्थिक मुद्दा नहीं उठाया है इस आन्दोलन ने जिससे भ्रष्टाचार के मूल स्रोत को बंद किया जाये। हम यह तो नहीं मान सकते की अन्ना और उनके सहयोगी इसके बारे में अनभिज्ञ हैं ।

जनतंत्र पर चोट

यह आन्दोलन जेपी आन्दोलन की याद दिलाता है , जो एक दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी आंदोलन था। उसने संपूर्णा क्रांति और दलविहीन जनतंतरा का नारा दिया था. अन्ना आंदोलन अन्या तरीकों, नारों और रास्ते से वे ही उद्देश्या अपना रहा है. इसके प्रवक्ता कहते हैं की हम हैं जो संसद के बजे कम करेंगे. अभी संसद चल रही है. इनके समर्थक उसमे मौजूद हैं. क्यों नहीं वे इन्ही सवालों को सही तरीकों से उठाते? इसके तरीके हैं, और आंदोलन के नेता और नागपुर में मौजूद उनके संघ परिवार के सलाहकार अच्छी तरह जानते हैं की क्या तरीके होते हैं. फिर आप सीधे तौर पर कैसे संसद कोई बिल पेश कर सकते हैं? क्या बीजेपी की सरकार के समय इसका सवाल उठाया गया था और क्यों नहीं? अभी ही क्यों? लोकपाल बिल पर कीजिए बहस बहुत सारे सुधारों की ज़रूरत हैं उसमें। लेकिन यह कैसी बात है की आप सामानातार संसद चलाना चाहते हैं? और जब बहस चल रही है तो आप उसमे बहस नहीं होने देना चाहते हैं? कौन हैं इस सारी चाल के पीछे?

हम इस लेख के ज़रिए लोगों को आगाह करना चाहते हैं की इसके पीछे ना सिर्फ़ देश के बड़े पूंजीपति और व्यापारी बल्कि विदेश, ख़ासकर अमरीका के हित सक्रिया हैं। अमरीका अब भारत में वही नीति लागू करना चाहता है, धमकी वाली नीति, “यह करो, ऐसा करो, वरना…”। अख़बारों में अमेरिका से चेतावनी आए है की इस आंदोलन के प्रति कोई सख्ती ना बरती जाए. अमरीका को क्यों दिलचस्पी है इसमे? और क्यों नहीं उसे दिलचस्पी है जब आम आदमी भूखों मरता है? जाहिर है, तार कहीं ना कहीं जुड़े हुए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं की सोनिया बीमार हैं तो उसका फायदा उठाया जा रहा हो? हमें सावधान रहने की ज़रूरत है. यह सॉफ है की अमरीका इस आंदोलन के पक्षों में दिलचस्पी ले रहा है. दूसरे शब्दो में वा भारतिया संसदिया प्रणाली के विरोध में दिलचस्पी ले रहा है.

अमरीका काफ़ी समय से भारत के टुकड़े करने की नीति पर चल रहा है. उसके समर्थक यहाँ की कमज़ोरियों का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. यहीं से फॅसिज़म शुरू होता है. और हमारे देश में संप्रदायिक-फॅसिज़म मौजूद है. और वही इस आंदोलन की मुख्या रीढ़ है.

आंदोलन पार्टियों की भूमिका कमजोर करने की कोशिश कर रहा है. याद रहे, वो सिर्फ़ सरकार बदलने की ही नहीं बल्कि राजनैतिक व्यवस्था बदलने की बातें कर रहा है. इसका मतलब? यदि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था बदलतें हैं तो कौन सी ला रहे हैं? पार्टी-विहीन? प्रधान मंत्री विहीन? तानाशाही? या अर्ढा तानाशाही? उसकी जगह तथाकथित ‘नागरिक समाज’ को लाना चाहते हैं क्या? अर्थात इन कुछ मुट्ठी भर सा-नियुक्ता ‘जान प्रतिनिधियों’ को? यही अर्थ निकलता है, और कोई नहीं, और इसे छिपाने की कोशिश की जा रही है. किसने चुना इन्हे?
सबसे अच्छा होता यदि इनमे शामिल लोग पहले अपना भ्रष्टाचार, अपनी भ्रष्ट छवि दूर कर लेते। इनमे से ज़्यादातर खुद भरषटाचार में लिपटा हैं. कौन जवाब देगा इस बात का?

कॉंग्रेस की भूमिका

इस पूरे प्रकरण में कॉंग्रेस की भूमिका अत्यंता ही कमजोर, लचर और दिशाहीन साबित हो रही है। इसमे दो राय नहीं की इधर एक से एक स्कॅम और भ्रष्टाचार के कांड सामने आ रहे हैं. कॉंग्रेस इन्हे रोकने के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं. इस प्रकार कॉंग्रेस इन जनतंतरा-विरोधी शक्तियों को मौका ही दे रही है. भ्रष्टाचार का मुख्या कारण निहित स्वार्थों को बढ़ावा है, और कॉंग्रेस उन्हे खुला मौका दे रही है।

भ्रष्टाचार डोर करने का तरीका वैकल्पिक आर्थिक नीति और निहित स्वार्थों पर चोट है. कॉंग्रेस गले तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है. भले ही प्रधान मंत्री स्वयं इससे दूर हों, लेकिन उन्हों ने ऐसे लोगों को बढ़ावा दे रखा है जो ग़लत तरीकों से काम धन इकट्ठा कर रहे हैं.

जे.पी आंदोलन की छाप

अभी हाल में अन्ना टीम के कुछ सदस्यों ने कई सवालों पर अन्ना के खिलाफ आपत्ति उठाने लगे हैं। मसलन, अरुणा रॉय ने सॉफ कहा है की इस आंदोलन में संघ परिवार का बोलबाला है। यह बिल्कुल सही है. संघ परिवार इस आंदोलन को अपने नियंत्रण में रखकर चला रहा है. आश्चर्या की बात है की गाँधी के हत्यारे गाँधी का ही नाम लेकर आज भ्रष्टाचार के खिलाफ झूठे नारे लगा रहे हैं. कहाँ थे वे जब बाजपई सरकार में सेठ साहूकार और नेता देश का धन लूट रहे थे? तिरंगा झंडा का विरोध करने वेल आज तिरंगा झंडा लहराते हुए भ्रष्टाचार विरोधी नारे लगा रहे हैं. इनसे सावधान रहने की ज़रूरत है.

जेपी आंदोलन में दल विहीन जनतंतरा और संपूर्णा क्रांति का नारा दिया गया था जो वास्तव में भारतीय जनतंत्र पर दक्षिण पंथी प्रतिक्रियावादी हमला था। आज अन्ना को आगे रखकर देश के राजनैतिक तंत्र के समानांतर कुछ लोगों द्वारा नागरिक समाज के नाम पर एक अलग तंत्र कायम करने का अभियान चलाया जा रहा है. इसमे मुख्या वर्गिया निहित स्वार्थों का बचाव किया जा रहा है. और अब तो भ्रष्टाचार के अलावा अन्या कई सवाल भी जोड़े जा रहे हैं। अर्थात आंदोलन का इरादा दूरगामी है.

मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय भी आंदोलन के विरोध में आ गयीं हैं.

आंदोलन का चरित्रा इस बात से स्पष्ट हो जाता है की उसे कौन चला रहा है, कौन उसकी मुख्या प्रेरका और सक्रिया शक्ति है. आर.एस.एस इस बार बड़ी चालाकी से काम ले रहा है. इसके अलावा उप और देश के अन्या हिस्सों में मुसलमान घबराए हुए हैं की संघ परिवार फिर उनके खिलाफ सक्रिया ना हो जाए. संप्रदायिक तनाव बढ़ता जा रहा है.

वामपंथी शक्तियाँ को अन्ना आंदोलन के असली वर्ग और निहित चरित्र का सॉफ विश्लेषण करके उन्हे उजागर करना चाहिए।

अनिल राजिमवाले

सुप्रसिद्ध लेखक चिन्तक व सिद्धांतकार

समाप्त




मंगलवार, 23 अगस्त 2011

अन्ना का आन्दोलन: असलियत क्या है ? भाग 1


मुझे इस बात की ख़ुशी है कि इस लोकसंघर्ष पत्रिका में कुछ लेखको ने अन्ना आन्दोलन के कई पहलुओं की आलोचना की है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन के नाम पर जिस तरह देश के लोगों को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिशें हो रही हैं उनसे सावधान रहने की जरूरत है।

इसमें कोई शक नहीं की हमारे देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या बनती जा रही है और विकराल रूप धारण करती जा रही है लेकिन इसके नाम बराबर और इसका आवरण लेकर एक ऐसी राजनीति और विचारधारा का बड़ी चालाकी से प्रचार किया जा रहा है जो हमें जर्मनी में हिटलर के दिनों की याद दिलाता है जर्मनी में पूंजीवादी सरकार और व्यवस्था की कमजोरी का पूरा फायदा उठाकर नाजी पार्टी सत्ता में आयी। यहाँ हिटलर की बात क्यों कर रहे हैं ये आगे स्पष्ट हो जायेगा हो सकता है की कुछ लोगों की दृष्टि में ये जरा ज्यादती होगी, लेकिन याद रहे इटली और जर्मनी में फासीवाद पूर्वोत्तर मिलते जुलते तरीके अपनाये

अन्ना का गुट और आंदोलन मुख्य रूप से आरएसएस तथा संघ परिवार के बल पर बराबर चल रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है. अन्ना के पिछले आंदोलन में (अन्ना I में) ये साफ़ हो गया था कि नरेंद्र मोदी, आडवाणी और पूरा संघ परिवार इसका सञ्चालन कर रहा है। उस समय अन्ना ने नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ भी की थी। इस समय लगता है की जरा सावधानी बरती जा रही है, और हाँ यह और भी खतरनाक है। इसलिए अपने दूसरे संस्करण (अन्ना द्वितीय) में अन्ना और उनके सहयोगी, खासकर उनके पीछे उनका निर्देशन करनेवाली ताकतें बड़ी चालाकी से थोड़ा स्वर बादल कर बातें पेश कर रही हैं।

सबसे पहले ये पूछना चाहेंगे कि अन्ना कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चल रहे असीम भ्रष्टाचार पर बराबर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं ? वे क्यों चुप हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री पिछले ९ वर्षों से लोकायुक्त की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं? अन्ना कहाँ थे जब कर्नाटक का तमशा चल रहा था ? वहीँ जाकर उन्होंने भूख 'हड़ताल' क्यों नहीं कर डाली, जिसका उन्हें इतना शौक है?! राम मंदिर के नाम बराबर ज़मा किये गए अरबों रुपये कहाँ गए? क्या जवाब है?

बीजेपी के इन राज्यों की बात हम इसलिए कर रहें हैं क्योंकि बीजेपी इस समय सबसे सक्रिय रूप से आन्दोलन का समर्थन और सञ्चालन कर रहा है। कहाँ से आ रहें हैं पैसे आन्दोलन चलने के लिये?

-अनिल राजिमवाले

सुप्रसिद्ध लेखक चिन्तक व सिद्धांतकार

(क्रमश:)

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