काशी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
काशी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

काशी का निरालापन

 बनारस -काशी

यदि आप आज भी बनारस की खूबियों से अपरचित है तो आइये आज आपका परिचय उससे करा दूँ | मुमकिन है आपने इस दृश्यों को देखा हो पर इस गरज से न देखा हो की यह सब भी बनारस की खूबियों में है | सुबहे-बनारस कि काफी दाद दी जाती है ,इसलिए जब कभी आप बनारस तशरीफ ले आवे तो इसका ध्यान रहे की सुबह हो; शाम या रात नही |
स्टेशन से बाहर आते ही आपको दर्जनों जलपान -गृह दिखाई देंगे |    इन दुकानों में बनी सामग्री की सोधी
 महक से आपका दिल -दिमाग तर हो जाएगा |   यहा से आप शहर की ओर ठीक नाक की सीध में चले |  दाहिने -बाए देखने की जरूरत नही है |
स्टेशन से एक फर्लांग आगे काशी विद्यापीठ है |   यह वह संस्था है जहा के छात्र या तो नेता बनते है अथवा शासक | काशी विद्यापीठ अथवा नेता जन्मदाता पीठ  |इसी के पीछे काशी का प्रसिद्ध कब्रगाह फातमान है जहा इतिहास के प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध व्यक्ति चिर -निद्रा में सोये हुए है |  पास ही भारत में अपने ढंग का अकेला मंदिर 'भारतमाता का मन्दिर 'है |इसके निर्माता है स्व. दानवीर बाबू शिवप्रसाद गुप्त |  मंदिर के बगल में भगवानदास स्वाध्यायपीठ है | पुस्कालय के ठीक सामने च्न्दुवा   की प्रसिद्ध सट्टी है |  कुछ दूर आगे शरणार्थी बस्ती ,बर्मियोका एक बौद्ध  मंदिर तथा बनारस में खेल -कूद के लिए बनाया गया स्टेडियम है |
कुछ दूर आगे ईसाइयो  का गिरजाघर है |   प्राचीन काल में यहा डाकू रहते थे जो राह चलते व्यक्तियों को कत्ल करके कुए में छोड़ देते थे |  काशी का प्रसिद्ध 'मौत का कुआ 'यही था | यही से दो रास्ते पूर्व और पश्चिम दिशा की ओर गये है |   पश्चिम वाला रास्ता वार -बनिता की नगरी की ओर तथा पूर्व वाला शहर की ओर गया है | पूर्व वाले रास्ते में बनारस का प्रसिद्ध 'आशिक -माशूक की कब्रगाह ' है |  बनारसी प्रेमियों को यही से प्रेरणा और स्फूर्ति प्राप्त होती है |यह वज ऐतिहासिक  स्थान है ,जिसके दर्शन के बिना परें 'अनकनफर्म्ड 'रहता है |इस स्थान पर कैथ के अनेक वृक्ष है |किवदन्ती है ,प्रत्येक वृक्ष से दो कैथ प्रतिपदा के दिन नियमित नीचे गिरते है |
थोड़ी दूर पर औरंगजेब के शासन काल में निर्मित सराय ,पान दरीबा है | औरंगाबाद दर्शनीय मुहल्ला है |   कहा जाता है -'काशी बसकर क्या किया ,जब घर औरंगाबाद |'
मुहल्ला सिगरा के आगे भारत -विख्यात महाप्योध्याय पंडित गोपी नाथ कविराज का  मकान है | ठीक इसके पीछे का स्थान 'छोटी गैबी ' कहलाता है ,जहा गुरुलोग रात बारह बजे तक नहाते -निपटते है | पास ही रथयात्रा की प्रसिद्ध चौमुहानी है | यहा वर्ष में तीन दिन जन - समारोह होता है |  काशी की लोक कला के दर्शन सोरहिया  तथा रथयात्रा  के मेले में ही होते  है | लक्सा की अधिकाश रामलीला यही होती है |
पास ही विश्व विख्यात थिसोसोफिक्ल सोसायटी है   |यहा बनारस के बालक और बालिकाए शिक्षा प्राप्त करते है |  सोसायटी के दक्षिण भाग में वैधनाथ और बटुकभैरव का मंदिर है |  इसी मंदिर के समीप सेन्ट्रल हिन्दू -कालेज ,बड़ी गैवि आदि प्रसिद्ध स्थान है |
कालेज से कुछ दूर आगे खोजवा बाज़ार है ,जो नबाबो के खोजाओ के रहने के कारण मुहल्ला बन गया | आजकल अनाज की मंडी है | पास ही शहर को आलोकित तथा जलदान करने वाला 'बिजली घर 'और पानीकल ' है | थोड़ा ही आगे बढने पर अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त  अथितिशाला दिखाई देगी |  यहा संसार के ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ लोग आकर मेहमान नवाजी करते है |बनारस वालो  को अपनी इस कोठी पर नाज़ है जो संसार के महान पुरुषो को अपने यहा ठहराकर भारतीय संस्कृति का परिचय देती है |  यह भवन है -  महाराजकुमार विजयानगरंम यानी 'ईजा--- नगर 'की कोठी |
यहा से कुछ दूर पर दुर्गाकुण्ड है ,जहा राम की सेनाये ही नही बल्कि पास ही सेनापति महोदय का भी भवन है | दुर्गाकुण्ड का मंदिर रानी भवानी और वानर -  सेनापति संकटमोचन का मंदिर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित  हुए है | संकटमोचन के मंदिर में नित्य सुन्दरकाण्ड और हनुमानचालीसा के पाठ करने वाले भक्तो की भीड़ लगी रहती है |खासकर इम्तहान के समय छात्रो की भीड़ बढ़ जाती है |  यूनिवर्सिटी के छात्रो  का विश्वास है 'संकटमोचन बाबा '  बिना पढ़े -लिखे ही परीक्षा की वैतरणी पार करा जाते है    |छात्र -छात्राए परस्पर प्रेम के स्थायित्व की शपथ भी यही लेते है | यहा दलवेसन बहुत गुणकारी ,प्रभावशाली होता है |
यह है लंका; रावण वाली नही - ----  काशी की अपनी निजी |  आगे भारत प्रसिद्ध शिक्षा -    संस्था विश्वविद्यालय है |   पास ही नगवा घाट है -   -  जहा बाबू शिवप्रसाद गुप्त की कोठी है |  यही एक बार स्वामी करपात्री जी ने यज्ञ करवाया था |
यह है ,पुष्कर तीर्थ |  इसके आगे अस्सी और कुरुक्षेत्र तालाब है |   सूर्य ग्रहण के दिन तालाब में धर्मपरायण व्यक्ति स्नान के नाम पर कीच स्नान करते है |   आगे भदैनी है और बगल में तुलसी घाट ,जहा तुलसीदास की खडाऊ और उनके द्वारा स्थापित हनुमान जी का मंदिर दर्शनीय है |  बनारस का यह मुहल्ला साहित्यकारो का भी एक गढ़ है |   सोलहवी शताब्दी में यह स्थान काशी का बाहरी अंचल माना जाता था |
यह है हरिश्चन्द्र घाट |  कुछ लोग इसे काशी का प्राचीन श्मशान मानते है ,पर यह बात गलत है |  पहले यहा ड़ोमो  की बस्ती थी | डोम लोग महाश्मशान में अपने परिवार की लाश नही जला पाते थे | यह लोग अपने को राजा हरिश्चन्द्र के वंशज मानते थे इसीलिए यह प्रचारित होता रहा की यही काशी का प्राचीन श्मशान है जहा राजा हरिश्चन्द्र श्मशान के रक्षक बने रहे |
हरिश्चन्द्र घाट के आगे काशी की सबसे खड़ी सीढ़ी वाला घाट केदारघाट है |  यहा का घंटा सभी मंदिर के घंटो से तेज आवाज में गूजता है | यहा से कुछ दूर पर तिलभांडेश्वर महादेव का मंदिर है | कहा जाता है की ये महादेव जी साल में तिल बराबर वजन में बढ़ते है | पता नही ,इसके पूर्व इन्हें कभी तौला गया था या नही ,वरना ये कितने प्राचीन है ,इसका पता पुरातत्व वाले बता देते |
यह है मदनपुरा |   संभवत: प्राचीनकाल में यही मदन का दहन  हुआ था | बनारसी साडियों  के विश्वविख्यात कलाकार इसी मुहल्ले में रहते है |
अब हम गोदौलिया आ गये |  प्राचीन काल में यहा गोदावरी नदी बहती थी |  गोदावरी तीर्थ स्थान के उपर आजकल मारवाड़ी अस्पताल स्थापित है | यही से एक रास्ता दशाश्वमेध घाट की ओर गया है |   आगे बड़ा बाज़ार है ,बड़े -बड़े होटल और शर्बत की दुकाने है | यहा काशी की ठढई सादी  और विजया सहित मिलती है | शाम के समय अधिकाश बुद्धिजीवी का अड्डा यहा जमता है ,जहा साहित्य -चर्चा  से लेकर परचर्चा   तक होती है | यही से उपन्यास लिखने के फार्मूले ,कहानी लिखने के प्लाट ,कविता लिखने की प्रेरणा और आलोचना लिखने का मसाला मिलता है | न जाने कितने लोगो का यहा मुड बनता और बिगड़ता है | साहित्य में इन होटलों की देन महत्त्वपूर्ण है |
यह रहा गिरजाघर ,जहा ईसाई   धर्म का प्रचार खुलेआम होता है | सुनने वालो से अधिक भाषण देने वाले दिखाई देते है | पास ही बनारस की सबसे बड़ी 'सोमरस की मंडी  ' यानी ताड़ीखाना है | कुछ दूर आगे 'नयी सडक 'मुहल्ला है | बनारस में अब तक जितने दंगे हुए है सभी का सूत्रपात इसी मुहल्ले से हुआ है | बगल में शेख सलीम  का फाटक है जिसके बारे में इतिहासकार और पुरातत्वविदों में मतभेद है |  एक का कहना है की अकबर -  --- पुत्र सलीम जब काशी आया था तब उसने इसे बनवाया था |  दूसरे का कहना है की शेख सलीम चिश्ती के नाम पर अकबर ने यहा फाटक बनवाया था   |बात चाहे जो हो यह स्थान है ऐतिहासिक  ; इसे सभी मानते है | यहा भामाशाह का सुरमा मिलता है |  पांच पैसे में सारे जीवन का रहस्य बताया जाता है |
यहा अधिकतर काबुल के सेठ रहते है जो बिना जमानत लिए .रहन  रखे ,सिर्फ शक्ल  देखकर एक आने सूद पर मुक्त हस्त कर्ज़ देकर जनता जनार्दन की सेवा करते है | पास ही एक बड़ा मैदान है जिसे 'विक्टोरिया पार्क 'अथवा 'बेनिया बाग़ ' कह्ते है  |  नाम तो इसका बाग़ है पर इसके एक भाग में अस्पताल,दूसरे में चेतसिंह की मूर्ति और बचा -खुचा भाग नेताओं के प्रवचन तथा नुमाइश के लिए रिजर्व रखा गया है |  |बेनिया बाग़ के आगे चेतगंज है | कहा जाता है की यह मुहल्ला राजा चेतसिंह के नाम पर बसाया गया है | वारेन हेस्टिंग तथा चेत सिंह के सैनिको में यही युद्ध हुआ था | इस मुहल्ले की नक्कटैया की ख्याति सम्पूर्ण भारत में है  |कुछ दूर आगे लालकोठी में नगरपालिका और हथुआ कोठी में भूतपूर्व अन्नदाता  वर्तमान सीमेंट -लोहादाता रहते है | यह है लहुरावीर की चौमुआनी | किसी जमाने में यहा भूत रहते थे ,अब आदम की औलाद रहने लगी है |  इन स्थानों का काशी में अपना निजी महत्त्व है | काशी में प्रत्येक वीर के नाम पर एक -एक मुहल्ला बस गया है | जैसे डयोढ़ीयावीर ,भोजुवीर ,और लहुरावीर आदि |
इस चौमुआनी के उत्तर वाली सडक कचहरी ,पश्चिम वाली स्टेशन ,दक्षिण वाली गिरजाघर और पूरब वाली राजघाट की ओर गया है | राजघाट की ओर जाने वाली सडक की ओर आगे बढने पर घोड़ा अस्पताल (पशु अस्पताल ) कबीर मठ  और शिवप्रसाद गुप्त औषधालय भी दिखाई देंगे | अस्पताल के सामने बनारस का सबसे बड़ा किराना बाज़ार है | जहा जाते ही छीक  की बीमारी  शुरू हो जाती है |  अस्पताल के बगल में राधा स्वामी का मंदिर है जहा वारेन हेस्टिंग आकर टिका था |  पास ही 'आज ' अखबार का दफ्तर ,लोहे -लकड़ी की मंडी  लोहटिया  और नखास है | नखास के पास बड़े गणेश जी का मंदिर है | यहा गणेश चौथ के दिन मेला लगता है | इस मुहल्ले के पास ही हरिश्चन्द्र कालेज और दाराशुकोह के नाम पर बसा हुआ मुहल्ला दारानगर है |
यह है , मैदागिन |  काशी के प्रमुख चौमुहानी में अन्यतम | प्राचीन काल में इस स्थान को मन्दाकिनी तीर्थ कहा जाता था | अब उसकी जगह कम्पनी बाग़ और टाउनहाल बन गया है |इस टाउनहाल में पहले अँधेरी कचहरी थी | अब यहा कचहरी है ,पर वह अपना प्रभाव छोड़ गयी है  |  फलस्वरूप टाउनहाल बक्चो का मुरब्बा बन गया है | जिस प्रकार आजतक लंगड़ी भिन्न  का रहस्य (छोटे ,मंझले और बड़े कोष्ठ का रहस्य ) नही समझ सका ,ठीक उसी प्रकार टाउनहाल क्या है समझ नही सका | मुमकिन है आप भी न समझ सके | इस स्थान से कुछ आगे भारत प्रसिद्ध संस्था 'काशी नागरी प्रचारणी सभा 'है |  बाबा विश्वनाथ के कोतवाल का भवन और कोतवाली थाना का घनिष्ठ सम्बन्ध यही है | बनारस की सबसे बड़ी अनाज की मंडी  विश्वेश्वरगंज भी यही है |
इस मुहल्ले के बारे में कुछ लोगो का मत है की प्राचीन काल में काशी का प्रमुख बाज़ार था |   यही पर विश्वनाथ जी का मंदिर था जिसे मुसलमानों ने तोड़ दिया | सम्भवत:इसीलिए इस मुहल्ले का नाम विश्वेश्वरगंज है | प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन से मालूम होता है की तुगलक काल के पूर्व शिवलिंग का नाम देवदेव स्वामी और अविमुक्तेश्वर था |  विश्वनाथ नाम बारहवी शताब्दी के बाद प्रचलित हुआ है  |पास ही भीतरी महाल में गोपाल जी का मंदिर और बिंदुमाधव का धरोहरा है | यही एक मकान में छिपकर गोस्वामी तुलसीदास वाल्मीकि रामायण को मौलिक रूप दे रहे थे |  विश्वेश्वरगंज से एक सडक अलईपूर मुहल्ले की ओर गयी है | यहा एक मुहल्ला आदमपुरा है ,पता नही बाबा आदम से इसका कोई सम्बन्ध है या नही | कुछ दूर आगे मछोदरी पार्क है जहा राजा बलदेवदास द्वारा निर्मित अस्पताल और घंटाघर है | राजा साहब दान देने में जितना सक्रिय रहे ,उतना ही सक्रिय घंटा टगवाने   में रहे | बनारस में उन्होंने कई जगह घंटा टगवाया है | घंटा टगवाने का क्या महत्व है ,इसका कोई उल्लेख्य काशी खंड में नही है पर सुना गया है की आपने लन्दन में भी घंटाघर बनवाया है | ज्ञातव्य रहे की बनारस में घड़ीघर  को जहा घंटे की आवाज़ से समय की सुचना मिलती है ,घंटाघर कहते है | मछोदरी बाग़ प्राचीन में मत्स्योदरी तीर्थ कहलाता था | आगे राजघाट है | यह स्थान शहर का अंतिम भाग है | इस भूभाग का बनारस के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है |
प्राचीनकाल में यह अनेक राजाओं की आवास भूमि रही | वे सब गंगा की गोद में चले गये | अब यहा केवल खंडहर रह गये है जिसे सरकार खुदवाकर कुछ पुरातत्वविदों की कचूमर निकालना चाहती है | इससे कुछ लोगो का चंडूखाने की दून  हाकने का मौक़ा मिलेगा |  अब हमें पुन:शहर की ओर मुड़ना है और शहर का प्रमुख भाग देखना है | इसीलिए अब पुन:हम मैदागिन के पास आते और यही से दक्षिण की ओर बढ़ते है | मैदागिन से कुछ दूर आगे बढने पर कर्णघंटा नामक स्थान है | कहा जाता है ,यहा का मंदिर गांगेय के पुत्र यशकर्ण ने बनवाया था | इतिहासकारों की बहुत -सी अटकले पच्चुवालीबाते इसलिए स्वीकार करनी पड़ती है की यह सब घटनाए जब हुई तब हम बनारस में नही थे | यहा से कुछ दूर आगे बाबा विश्वनाथ के थर्ड डिप्टी सुपरिटेंड आफ पुलिस आसभैरव रहते है  |काशी के प्रमुख उद्योग धंधो की सामग्री इस इलाके में मिलती है | मसलन लकड़ी के विभिन्न सामान ,पीतल के बर्तन ,जरी और सोने -चाँदी के जेवरात इत्यादि | इसी क्षेत्र में एक जगह कन्नौज ,जौनपुर ---  गाजीपुर का  इलाका बस गया है | दूसरी ओर बनारस का प्रमुख -व्यवसाय बनारसी सादियो का रोजगार होता है |  पुस्तक व्यवसायी ,समाचार -पत्र विक्रेता मंग्लामुखियो का हाट और फल्वालो की दुकाने इसी क्षेत्र में है |
कविराज कालिपद दे का आश्चर्य मलहम जो 101 बीमारियों में फायदा पहुचाता है -- आवाज लगाते हुए बगल में टीन का डब्बा लिए बंगाली बाबू टहलते है | आँखों में चश्मा पहने और हाथ में सिर्फ एक चश्मा लिए -- '' एक चश्मा '' की आवाज देते हुए बड़े मिया कुछ लोगो की आँखे पढ़ते नजर आते है |
जल -- जीरे का पानी , आम का पन्ना बेचने वालो की गाडी , गडेरी मेरी अव्वल पैसा लेना डब्बल , दिया सलइया पैसे में , सुइया चार मुनाफे में आदि सामान बिकता है ||
कुछ दुकानदार यहाँ पर हर माल 5 रूपये में बेचते है कयुनकि कम्पनी का माल वे लुटा रहे है | अब आपको गरज हो तो खरीदिये | गंजी भी पांच रूपये में पेन भी पांच रूपये में मिलती है |
एक ओर से एक बंद कनस्तर लोए '' गरेम' है जी '' की आवाज आती है जब तक आप उनसे सामान न खरीदे तब तक आप यह नही समझ पाइयेगा की क्या गरम है --वातावरण , मौसम , वे स्वंय या बंद कनस्तर का सामान | आज से तीन वर्ष पूर्व सडक पर '' केसरिया तर हव राजा '' की आवाज लगाता हुआ एक आदमी झूमता हुआ नजर आत़ा था | उसकी गैरमौजूदगी आज के बच्चो को खलती है | नरम --गरम , नरम- गरम  की आवाज लगाता हुआ एक आदमी बड़ी तेजी से लाल साइनबोर्ड पहने आपकी बगल से गुजर जाएगा |
यह है परमानेंट हरे -- राम हरे -- राम की फैक्ट्री जहा लाउडिसपीकर से शाम के समय भक्ति प्रदर्शन होता है | सामने बीवी का रोजा की मस्जिद के बारे में कहा जाता है की पहले यहाँ विश्वनाथ मन्दिर था जिसे कुतुबद्दीन ऐबक ने तोड़ा था | नीचे ज्ञानवापी की प्रसिद्ध मस्जिद है जिसका औरंगजेब ने निर्माण कराया था |
यह है सत्यनारायण मन्दिर जहा श्रावण में भगवान झूला झूलते है | उनका श्रृंगार देखने के काबिल होता है | आगे बॉसफाटक  है | बनारस के मुहल्लों का नाम देखकर अनुमान किया जाता है की प्राचीन काल में यह नगर अरब देशो की भांति बंद नगरी थी जिसके चारो तरफ फाटक थे |  मसलन हाथी फाटक , बॉस फाटक , शेख सलीमका फाटक , रंगिलादास का फाटक और सुखलाल साहू आदि का फाटक  अब हम गोदौलिया पर आ गये | इस प्रकार सारा शहर घर बैठे देख लिया | क्या जरूरत की आप बनारस आये और दो नए प्रवेश कर दे | हां यदि गंगा -- स्नान , विश्वनाथ -- दर्शन अथवा शहर देखने के काफी शौक है तो हमे एतराज नही | अगर और निरालापन देखना हो तो यहाँ के धनुषाकार घाट , धरोहर का एक खम्भा , यहाँ की गलिया और यहाँ के मेले देखे | बस , सारा बनारस आपकी नजरो से गुजर जाएगा | 
-सुनील दत्ता
आभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक '' बना रहे बनारस से ''

बुधवार, 12 सितंबर 2012

बनारस : एक दिग्दर्शन



सिर्फ काशी नगरी ही तीन लोक से न्यारी नही है ,बल्कि यहा के लोग ,उनका रहन -सहन ,उनके आचार -विचार ,यहा तक की सरकारी -गैर सरकारी संस्थाए भी अपने ढंग की निराली है |उदाहरण के लिए बनारस नगरपालिका को ही ले लीजिये |इस नगरी का निरालापन कोई मुफ्त में न देख जाए ,इस गरज से वह प्रत्येक यात्री पीछे एक आना प्रवेश -कर लेती है |जहा तक प्रवेश -कर का सवाल है ,हमे एतराज नही है |लेकिन पालिका 'निकासी -कर 'भी लेती है \कहने का मतलब यह की अगर कोई बाहरी आदमी बनारस आये और आकर वापस चला जाए तो उसे दो आने की चपत पड़ जाती है |शायद आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की घर के लोग अर्थात ख़ास बनारस के बाशिंदे भी इस कर से मुक्त नही है |चूँकि यह कर रेलवे के माध्यम से लिया जाता है >इसलिए हम -आप नही जान पाते |काशी जैसी नगरी के लिए क्या यह नियम निरालेपन का द्योतक नही है ?
सफाई पसंद शहर
इस कर  ' की बाबत कहा जाता है की यह इसलिए लिया जाता है की तीर्थ स्थान होने की वजह से यहा गंदगी काफी होती है |लिहाजा सफाई खर्च (बनाम जर्माना )'तीर्थयात्री 'कर के रूप में लिया जाता है |बनारस कितना साफ़ -सुधरा शहर है ,इसका नमूना गली -सड़के तो पेश करती ही है अखबारों के 'सम्पादक के नाम पत्र ' वाले कालम भी प्रसंशा-शब्दों से रंगे रहते है |माननीय पंडित नेहरु तथा स्वच्छ काशी आन्दोलन के जन्मदाता आचार्य विनोवा भावे इस बात के प्रत्यक्ष गवाह है |
खुदा आबाद रखे देश के मंत्रियों को जो गाहे -बगाहे कनछेदन ,मुंडन ,शादी और उदघाटन के सिलसिले में बनारस चले आते है जिससे कुछ सफाई हो जाती है ; नालियों में पानी और छुने का छिडकाव हो जाता है |
निराली भूमि
अगर आप कभी काशी नही आये है तो आपको लिखकर सारी बाते समझाई नही जा सकती |अगर आये है और इसका निरालापन नही देखा है तो यह आपके लिए दुर्भाग्य की बात है |शायद आप यह सवाल करे की आखिर बनारस में इतना क्या निरालापन है जिसके लिए ढिढोरा पीटा जा रहा है ,तो अर्ज़ है ---
विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है की पृथ्वी शून्य में स्थित है और वह सूर्य के चारो तरफ चक्कर काटती है |लेकिन इस तथ्य को भारत वासी नही मानते |उनका विज्ञान यह कहता है की पृथ्वी 'शेषनाग 'के फेन 'पर स्थित है और स्वं सूर्य उसके चारो ओर चक्कर काटता है |हमने कभी पश्चिम ,उत्तर या दक्षिण से सूरज को उगते नही देखा |यह सब विज्ञान की बाते चंडूखाने की गप्प है |एक बेपेदी का लोटा जब बिना सहारे के इधर --उधर लुढकता है तब पृथ्वी जैसी भारी गोलाकार वस्तु (बकौल पश्चिमी विज्ञान )बिना किसी लाग (सहारे ) के कैसे स्थिर रह सकती है ?बताइए ,है कोई वैज्ञानिक -खगोलवेत्ता जो उत्तर देने का साहस करे !
बनारस वालो का दृढ विश्वास है -पृथ्वी शेषनाग के फन  पर स्थित है पर उनका बनारस भगवान  शंकर के त्रिशूल पर है |शेषनाग से उनका कोई मतलब नही |इसीलिए काशी को तीन लोक से न्यारी कहा गया है |यहा गंगा उत्तरवाहिनी  है ,यहा कभी भूकम्प नही आता  |कभी -कभी शंकर भगवान जब आराम करने के लिए त्रिशूल पर पथ टेक देते है तब यहा की जमीन कुछ हिल भर जाती है |अधिक दूर क्यों ,काशी शंकर के त्रिशूल पर है या नही ,इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यहा की भूमि की बनावट है |
अब आप एक त्रिशूल की कल्पना करे जिसमे तीन फल होते है |बीचवाला फल सबसे उंचा और दोनों ओर ढलुवा होता है |बाकी दोनों फल ऊपरी दिशा में मुड़े होते है |बीचवाला फल वर्तमान चौक -ज्ञानवापी है |प्राचीन काल में काशी का महाश्मशान यही था |वर्तमान विश्वनाथ मंदिर के निकट से गंगा बहती थी |शंकर का सबसे प्रिय स्थान श्मशान होने की वजह से उसे शीर्ष स्थान दिया गया है |आज भी आधी रात के बाद शंकर के 'गण ' इस स्थान के प्रसिद्ध बाज़ार कचौड़ी गली में मिठाई खरीदने आते है |चौक के दोनों ओर भयंकर ढाल है |यह ढाल कितना भयंकर है इसका अंदाज रिक्शे की सवारी में अनुभव हो जाता है | दक्षिण का ढाल जगमबाड़ी में और उत्तर का ढाल मैदागिन में जाकर समाप्त होता है |फिर दूसरी चढाई वाला ढाल मछोदरी से राजघाट और उधर जगमबाड़ी से भदैनी तक है |इसके बाद दोनों तरह उतराई है |काशी के इस भूगोल को पढने के पश्चात अब आपको भी मानना पड़ेगा की काशी शंकर के त्रिशूल पर अवश्य स्थित है |इसमें संदेह करने की कोई गुंजाइश नही है |
.
जिस प्रकार हिन्दु धर्म कितना प्राचीन है पता नही चलता ठीक उसी प्रकार काशी कितनी प्राचीन है ,पता नही लग सका |
यद्धपि बनारस की खुदाई से प्राप्त अनेक मोहरे ,ईट,पथ्थर ,हुक्का ,चिलम और सुराही के टुकडो का पोस्मार्टम हो चुका है फिर भी सही बात अभी तक प्रकाश में नही आई है |जन -साधारण में अवश्य काशी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है |कहा जाता है कि सृष्टि कि उत्पत्ति के पूर्व काशी को शंकर भगवान अपने त्रिशूल पर लादे घूमते -फिरते थे |जब सृष्टि कि उत्पत्ति हो गयी तब इसे त्रिशूल से उतारकर पृथ्वी के मध्य में रख दिया गया |
यह सृष्टि कितनी प्राचीन है ,इस सम्बन्ध में उतना ही बड़ा मतभेद है जितना यूरोप और एशिया में या पूर्वी गोलार्द्ध में है |सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बार प्रसिद्ध पर्यटक बर्नियर को कौतूहल हुआ था |अपनी इस शंका को उसने काशी के तत्कालीन पंडितो पर प्रगट की,नतीजा यह हुआ कि उन लोगो ने अलजबरा कि भांति इतना बड़ा सवाल लगाना शुरू किया जिसे देखकर बर्नियर कि बुद्धि गोल हो गयी |फलस्वरूप उसका हल बिना जाने उसने यह स्वीकार कर लिया कि काशी बहुत प्राचीन है |इसका हिसाब सहज नही |अगर हजरत कुछ दिन यंहा और ठहर जाते टी सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में सिर्फ उन्हें ही नही ,बल्कि उनकी डायरी से सारे संसार को यह बात मालूम हो जाती |चूँकि पृथ्वी के जन्म के पूर्व काशी कि उत्पत्ति हो गयी थी इसलिए इसे 'अपुनभर्वभूमि ' कहा गया है |एक अर्से तक शंकर के त्रिशूल पर चक्कर काटने के कारण 'रुद्रावास 'कहा गया |प्राचीन काल में यंहा के जंगलो में भी मंगल था ,इसीलिए इसे 'आनंदवन 'और 'आनन्द-कानन ' कहा गया |इन्ही जंगलो में ऋषि -मुनि मौज -पानी लेते थे ,इसीलिए इसे 'तप: स्थली 'कहा गया |    तपस्वियों की अधिकता के कारण यंहा की भूमि को 'अविमुक्त -क्षेत्र 'की मान्यता मिली |
इसका नतीजा यह हुआ की काफी तादाद में लोग यंहा आने लगे |उनके मरने पर उनके लिए एक बड़ा श्मशान बनाया गया |  कहने का मतलब काशी का 'नाम 'महाश्मशान ' भी हो गया |
प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह पता चलता है कि काश्य नामक राजा ने काशी नगरी बसाई :अर्थात इसके पूर्व काशी नगरी का अस्तित्व नही था |जब काश्य के पूर्व यह नगर बसा नही था तब यह निश्चित है कि उन दिनों मनु कि सन्ताने नही रहती थी ,बल्कि शंकर के गण ही रहते थे |हमे प्रस्तरयुग ,ताम्रयुग ,और लौहयुग कि बातो का पता है |हमारे पूर्वज उत्तरी ध्रुव से आये या मध्य एशिया से आये ,इसका समाधान भी हो चुका है |पर काश्य के पूर्व काशी कहा थी ,पता नही लग सका |
काशी की स्थापना
.......................
काश्य के पूर्वज राजा थे इसीलिए उन्हें राजा कहा गया है अथवा काशी नगरी बसाने के कारण उन्हें राजा कहा गया है ,यह बात विवादास्पद है |ऐसा लगता है की इन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नही मिला ,फलस्वरूप ये नाराज होकर जंगल में चले गये |वहा जंगल आदि साफ़ कर एक फर्स्ट क्लास का बंगला बनवाकर रहने लगे |धीरे -धीरे खेती -बारी भी शुरू की |लेकिन इतना करने पर भी स्थान उदास ही रहा |नतीजा यह हुआ की कुछ और मकान बनवाये और उन्हें किराए पर दे दिया |इस प्रकार पहले -पहल मनु की संतानों की आबादी यहाँ बस गयी |आजकल जैसे मालवीय नगर ,लाला लाजपत नगर आदि बस रहे है ठीक उसी प्रकार काशी की स्थापना हो गयी |
ऐसा अनुमान किया जाता है की उन दिनों काशी की भूमि किसी राजा की अमलदारी में नही रही वरना काश्य को भूमि का पत्ता लिखवाना पड़ता ,मालगुजारी देनी पड़ती और लगान भी वसूल करते |चूँकि इस नगरी को आबाद करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त हुआ था ,इसीलिए लोगो ने समझदारी से काम लेकर इसे काशी नगरी कहना शुरू किया |आगे चलकर इनके प्रपौत्र ने इसे अपनी राजधानी बनाया कहने का मतलब परपोते तक आते -आते काशी नगरी राज्य बन गयी थी और उस फर्स्ट क्लास के बंगले को महल कहा जाने लगा था |इन्ही काश्य राजा के वंशधर थे -दिवोदास |सिर्फ दिवोदास ही नही ,महाराज दिवोदास |कहा जाता है की एक बार इन पर हैहय वंश वाले चढ़  आये थे |लड़ाई के मैदान से रफूचक्कर होकर हजरत काशी से भाग गये |  भागते -भागते गंगा -गोमती के संगम पर जाकर ठहरे |अगर वहा गोमती ने इनका रास्ता न रोका होता तो और भी आगे बढ़ जाते |जब उन्होंने यह अनुभव किया की अब पीछा करने वाले नही आ रहे है तब वे कुछ देर के लिए वही आराम करने लगे |जगह निछ्द्द्म थी |बनारसवाले हमेशा से निछ्द्द्म जगह जरा अधिक पसंद करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने वही डेरा डाल दिया |कहने का मतलब वही एक नयी काशी बसा डाली | कुछ दिनों तक चवनप्रास का सेवन करते रहे ,दंड पेलते रहे और भांग छानते रहे |जब उनमे इतनी ताकत आ गयी की हैहय वंश वालो  से मोर्चा ले सके ,तब सीधे पुरानी काशी पर चढ़ आये और बात की बात में उसे ले लिया |इस प्रकार फिर काशीराज  बन बैठे |हैहय वालो के कारण काशी की भूमि अपवित्र हो गयी थी ,उसे दस अश्वमेघ यज्ञ से शुद्ध किया और शहर के चारो तरफ परकोटा बनवा दिया ताकि बाहरी शत्रु झटपट शहर पर कब्जा न कर सके |इसी सुरक्षा के कारण पूरे 500 वर्ष यानी 18 -20 पीढ़ी तक राज्य करने के पश्चात इना वंश शिवलोक वासी हो गया |
काशी से वाराणसी
इस पीढ़ी के पश्चात कुछ फुटकर राजा हुए |  उन लोगो ने कुछ कमाल नही दिखाया ,अर्थात न मंदिर बनवाए ,न स्तूप खड़े किए और न खम्भे गाड़े |फलस्वरूप ,उनकी ख़ास चर्चा नही हुई |कम -से -कम उन भले मानुषो को एक -एक साइनबोर्ड जरुर गाढ़ देना चाहिए था |   इससे इतिहासकारों को कुछ सुविधा होती |
ईसा पूर्व सातवी शताब्दी में ब्रम्हदत्त  वंशीय राजाओं का कुछ हालचाल ,बौद्ध -साहित्य में है ,जिनके बारे में बुद्ध भगवान ने बहुत कुछ कहा है ,लेकिन उनमे से किसी राजा का ओरिजनल नाम कही नही मिलता |
पता नही किस्मे यह मौलिक सूझ उत्पन्न हुई की उसने काशी नाम को सेकेण्ड हैण्ड समझकर इसका नाम वाराणसी कर दिया |  कुछ लोगो का मत है की वरुणा और अस्सी नदी के बीच उन दिनों काशी नगरी बसी हुई थी ,इसीलिए इन दोनों नदियों के नाम पर नगरी का नाम रख दिया गया ,ताकि भविष्य में कोई राजा अपने नाम का सदुपयोग इस नगरी के नाम पर न करे |इसमें संदेह नही की वह आदमी बहूदूरदर्शी था वरना इतिहासकारों को ,चिठ्ठीरसो को और बाहरी यात्रियों को बड़ी परेशानी होती |
लेकिन यह कहना की वरुणा और असी नदी के कारण इस नगरी का नाम वाराणसी रखा गया बिलकुल वाहियात है ,गलत है और अप्रमाणिक है | जब पद्रहवी शदाब्दी में यानी तुलसीदास जी के समय ,भदैनी का इलाका शहर का बाहरी क्षेत्र माना जाता था तब असी जैसे बाहरी क्षेत्र को वाराणसी में मान कैसे लिया गया ? दूसरे विद्वानों का मत है की असी नही ,नासी नामक एक नदी थी जो कालान्तर में सुख गयी ,इन दोनों नदियों के मध्य वाराणसी बसी हुई थी ,इसलिए इसका नाम वाराणसी रखा गया |यह बात कुछ हद तक काबिलेगौर है लिहाजा हम इसे तस्दीक कर लेते है |
भगवान बुद्ध के कारण काशी की ख्याति आधी दुनिया में फ़ैल गयी थी |   इसलिए पड़ोसी राज्य के राजा हमेशा इसे हडपना चाहते थे |  जिसे देखो वही लाठी लिए सर पर तैयार रहने लगा |नाग ,शुंग और कण्व वंश वाले  हमेशा एक दूसरे के माथे पर सेंगरी बजाते रहे |     इन लोगो की जघन्य कार्यवाही के प्रमाण -पत्र सारनाथ की खुदाई में प्राप्त हो चुके है |
ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रथम विदेशी आक्रामक बनारस आया |  यह था -कुषाण सम्राट कनिष्क |  लेकिन था बेचारा भला आदमी |  उसने पड़ोसियों के बमचख में फायदा जरुर उठाया    पर बनारस के बहरी  अलंग सारनाथ को खूब सवारा भी |  कनिष्क के पश्चात भारशिवो और गुप्त सम्राटो का रोब एक अरसे तक बनारस वालो पर ग़ालिब होता रहा |  इस बीच इतने उपद्रव बनारस को लेकर हुए की इतिहास के अनेक पृष्ठ इनके काले कारनामो से भर गये है |मौखरी वंश वाले भी मणिकर्णिका घाट पर नहाने आये तो यहाँ राजा बन बैठे |  इसी प्रकार हर्षवर्द्धन के अन्तर में बौद्ध धर्म के प्रति प्रेम उमड़ा तो उन्होंने भी बनारस को धर दबाया |  आठवी शताब्दी में इधर के इलाके में कोई तगड़ा राजा नही था ,इसीलिए बंगाल से लपके हुए पाल नृपति चले आये |  लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रतिहारो ने उन्हें खदेड़ दिया और स्वंय 150 वर्ष के लिए यहा जम गये |  कन्नौज से इत्र  की दूकान लेकर गाह्डवाले भी एक बार आये थे | मध्य प्रदेश से दुधिया छानने के लिए कलचुरीवाले भी आये थे |कलचुरियो का एक साइनबोर्ड  कर्दमेश्वर मंदिर में है |  यह मंदिर यंहा 'कनवा 'ग्राम में है |   यही बनारस का सबसे पुराना मंदिर है |    इसके अलावा जितने मंदिर है सब तीन सौ वर्ष के भीतर बने हुए है |
वाराणसी से बनारस

अब तक विदेशी आक्रमक के रूप में वाराणसी में कनिष्क  आया था | जिस समय कलचुरी वंश के राजा गांगेय कुम्भ नहाने प्रतिष्ठान गये हुए थे ,ठीक उसी समय नियालतगिन चुपके से आया और यहा से कुछ रकम चुराकर भाग गया |  नियालतगिन के बाद जितने विदेशी आक्रमक आये उन सबकी अधिक कृपा मंदिरों पर ही हुई | लगता है इन लोगो ने इसके पूर्व इतना उंचा मकान नही देखा था |  देखते भी कैसे ?   सराय में ही अधिकतर ठरते थे जो एक मंजिल से ऊँची नही होती थी |  यहा के मंदिर उनके लिए आश्चर्य की वस्तु रहे | उनका ख्याल था की इतने बड़े महल में शहर के सबसे बड़े रईस रहते है ,इसलिए उन्हें गिराकर लूटना अपना कर्तव्य समझा |  नियालतगिन के बाद सबसे जबर्दस्त लुटेरा मुहम्मद गौरी सन 1914 ई. में बनारस आया |  उसकी मरम्मत पृथ्वीराज पांच -छ बार कर चुके थे ,पर जयचंद के कारण उसका शुभागमन बनारस में हुआ |  नतीजा यह हुआ की उस खानदान का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट गया |  सन 1300 ई ,में अलाउद्धीन खिलजी आया | उसके बाद उसका दामाद बाबर्कशाह आया ,जिसे 'काला पहाड़ ' भी कहा गया है |सन 1494 ई. में सिकन्दर लोदी साहब आये और बहुत कुछ लाद  ले गये |  जहागीर ,शाहजहा और औरंगजेब की कृपा  इस शहर पर हो चूकि है | फरुखासियर और ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद अभी ताजा है |  पता नही ,इन लोगो ने बनारस को लुटने का ठेका क्यों ले रखा था ?  लगता है ,उन्हें लुटने की यह प्रेरणा स्वनामधन्य लुटेरे महमूद गजनबी से प्राप्त हुई थी |  संभव है, उन दिनों बनारस में काफी मालदार लोग रहा करते थे अथवा ये लोग बहुत उत्पाती और खतरनाक रहे हो   |इसके अलावा यह संभव है की बनारस वाले इतने कमजोर रहे की जिसके में  आया वही दो धौल जमाता गया |  खैर कारण चाहे जो कुछ भी रहे हो बनारस को लुटा खूब गया है ,इसे धार्मिक  और इतिहास के पंडित दोनों ही मानते है | बनारस को लुटने की यह परम्परा फरुखसियर के शासनकाल तक बराबर चलती रही |इन आक्रमणों में कुछ लोग यहा बस गये |   उन्हें वाराणसी नाम श्रुतिकटु लगा ,फलस्वरूप वाराणसी नाम घिसते -घिसते बनारस बन गया |जिस प्रकार रामनगर को आज भी लोग नामनगर   कहते है |  मुगलकाल में इसका नाम बनारस ही रहा |

बनारस बनाम मुहम्मदाबाद
औरंगजेब जरा ओरिजनल टाइप शासक था |  सबसे अधिक कृपा उसकी इस नगर पर हुई |  उसे बनारस नाम बड़ा विचित्र लगा |  कारण बनारस में न तो कोई रस बनता था और न यहा के लोग रसिक रह गये थे |   औरंगजेब के शासनकाल में इसकी हालत अत्यंत खराब हो गयी थी |   फलस्वरूप उसने इसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया |
मुहम्मदाबाद से बनारस
मुगलिया सल्तनत भी 1857 के पहले उखड़ गयी |   नतीजा यह हुआ की सात समुन्द्र सत्तर नदी और सत्ताईस देश पार कर एक हकीम शाहजहा के शासनकाल में आया था ,उसके वंशधरो ने इस भूमि को लावारिस समझकर अपनी सम्पत्ति बना ली |   पहले कम्पनी आई ,फिर यहा की मालिकन रानी बनी |  रानी के बारे में कुछ रामायण प्रेमियों को कहते सुना गया है की वह पूर्व जन्म में त्रिजटा थी |  संभव है उनका विश्वास ठीक हो   |ऐसी हालत में यह मानना पडेगा की ये लोग पूर्व जन्म में लंका में रहते थे अथवा बजरंगबली की सेना में लेफ्ट -राईट करते रहे होंगे | गौरांग प्रभुओ की 'कृपा से ' हमने रेल ,हवाई जहाज ,स्टीमर ,मोटर ,साइकिल देखा |  डाक -तार ,कचहरी और जमीदारी के झगड़े देखे |  यहा से विदेशो में कच्चा माल भेजकर विदेशो से हजारो अपूर्व सुन्दरिया मंगवाकर अपनी नस्ल बदल डाली |
ये लोग जब बनारस आये तब इन्होने देखा --यहा के लोग बड़े अजीब हैं |  हर वक्त गहरे में छानते है ,गहरेबाजी करते है और बातचीत भी फराटे के साथ करते है |  कहने का मतलब हर वक्त रेस करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने इस शहर का नाम 'बेनारेस' रख दिया |
बनारस से पुन:वाराणसी
ब्राह्मणों को सावधान करने वाले आर्यों की आदि भूमि का पता लगानेवाले डाक्टर सम्पूर्णानन्द को यह टेढा नाम पसंद नही था |  बहुत दिनों से इसमें परिवर्तन करना चाहते थे पर मौक़ा नही मिल रहा था |लगे हाथ बुद्ध की 2500 वी. जयंती पर इसे वाराणसी कर दिया |  यद्धपि इस नाम पर काफी बमचख मची ,पर जिस प्रकार संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश बन गया ,उसी प्रकार अब बनारस से वाराणसी बनता जा रहा है |
भविष्य में क्या होगा ?
भविष्य में वाराणसी रहेगा या नही ,कौन जाने |  प्राचीनकाल की तरह पुन:वाराणसी नाम पर साफा -पानी होता रहे तो बनारस बन ही  जाएगा इसमें कोई संदेह नही | जिन्हें वाराणसी बुरा लगता हो उन्हें यह श्लोक याद रखना चाहिए ---------
ख़ाक भी जिस जमी का पारस है ,
शहर मशहूर यही बनारस है |
पांचवी शताब्दी में बनारस की लम्बाई आठ मील और चौड़ाई तीन मील के लगभग थी |  सातवी शताब्दी आते -आते नौ -साढे नौ मील लम्बाई और तीन -साढे तीन मील चौड़ाई हो गयी |
ग्यारहवी शताब्दी में ,न जाने क्यों इसका क्षेत्रफल पांच मील में हो गया | इसके बाद १1881 ई. में पूरा जिला एक हजार वर्ग मील में हो गया | अब तो वरुणा -असी की सीमा तोडकर यह आगे बढती जा रही है ; पता नही रबड़ की भाति   इसका घेरा कहा तक फ़ैल जाएगा | आज भी यह माना जाता है की गंगा के उस पार मरने वाला गधा योनी में जन्म लेते है ,जिसके चश्मदीद गवाह शरच्चन्द्र चटर्जी थे |  लेकिन अब उधर की सीमा को यानी मुगलसराय को भी शहर बनारस में कर लेने की योजना बन  रही है | अब हम मरने पर किस योनी में जन्म लेंगे ,इसका निर्णय शीघ्र होना चाहिए ,वरना इसके लिए आन्दोलन -सत्याग्रह छिड़ सकता है | बनारस में शहरी क्षेत्र उतना ही  माना जाता है जहा की नुक्कड़ पर उसके गण अर्थात चुंगी अधिकारी बैठकर आने -जाने वालो की गठरी टटोला करते है | इस प्रकार अब बनारस शीघ्र ही  मेयर के अधिकार में आ जाएगा |
                            
                                                      
-सुनील दत्ता
.साभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक  ""बना रहे बनारस से  ""
Share |