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बुधवार, 19 सितंबर 2012


बनारस के मकान
.....................बनारस के मकानों पर कुछ लिखने से पहले एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ | मेरा मकसद यह नही है की बनारस में कहा ,किस मुहल्ले में कितने किराए पर ,कौन -सा मकान या फ़्लैट खाली है अथवा बिकाऊ है ,इन सब बातो की रिपोर्ट पेश करू | काफी जोर -शोर के साथ अगर तलाश की जाए तो भगवान मिल जायेंगे ,पर नौकरी और मकान नही | आजकल इन बातो का ठेका अखबारों के विज्ञापन मैनजरो ने और हथुआ कोठी के रेंट कंट्रोलर साहब ने ले रखा है |आपके दिमाग में यह ख्याल पैदा हो गया हो की आपका भी बनारस में 'इक बंगला बने न्यारा ' और इस मामले में मैं आपकी मदद करूंगा (मसलन मकान बनवाने के नाम पर सरकार से किस प्रकार कर्ज लिया जा सकता है ,यह सब तिकड़म बताउंगा )  तो आप को गहरा धोखा होगा | मैं तो सिर्फ बनारस के मकानों का भूगोल और इतिहास बताउंगा |
अब आप शायद चौके की मकानों का भूगोल -इतिहास कैसा ? मकान माने मकान |चाहे वह बम्बई में हो या बनारस में | लेकिन दरअसल बात यह नही है | मकान माने महल भी हो सकता है और झोपड़ी भी हो सकती है | बम्बई में एक मकान अपने लिए जितनी जमीन घेरता है ,बनारस में उतनी जमीन में पचास मकान बन सकते है | यह बात अलग है की बम्बई के एक मकान की आबादी बनारस के पचास मकान के बराबर है |
दूसरी जगह आप मकान देखकर मकान मालिक के बारे में अंदाजा लगा सकते है | मसलन वह बड़ा आदमी है ,सरकारी अफसर है ,दूकान दार है ,जमीदार है ,अथवा साधारण व्यवसायी है | लेकिन बनारस के मकानों की बनावट के आधार पर मकान -मालिक के बारे में कोई राय कायम करना जरा मुश्किल काम है |
मान लीजिये आपने एक मकान देखा ,जिसमे मोटर रखने का गैरेज भी है | खामख्वाह यह ख्याल पैदा हो ही जाएगा की मकान मालिक बड़े शान से रहता है | रईस आदमी है  |लेकिन जब आपकी उससे मुलाक़ात हुई तो नजर आया ,गलियों में 'रामदाना के लडुवा,पइसा में चार ' की चलती फिरती दूकान खोले है | राह चलते की शक्ल देखकर आपने नाक सिकोड़ ली ,पर वही आदमी शहर का सबसे सज्जन और कई मकानों का मालिक निकला | इसके विरुद्ध टैक्सी  पर चलने वाले सफारी का सूट पहने सज्जन खपरैल के मकान में किराए पर रहते मिलेंगे |
बनारस में अन्नपूर्णा मन्दिर की बगल में राममंदिर के निर्माता श्री पुरुषोत्तम दास खत्री जब बाहर निकलते थे तब उनके एक पैर में बूट और दूसरे में चप्पल रहता था | बाहर से भव्य दिखने वाला महल भीतर से खंडहर हो सकता है और बाहर से कण्डम दिखने वाला मकान भीतर महल भी हो सकता है | इसीलिए बनारस के मकानों का भूगोल -इतिहास जानना जरूरी है |

भूगोल ........................
अगर आपने आगरे का स्टेशन बाजार ,लाहौर का अनारकली ,बम्बई का मलाड ,कानपुर का कलक्टरगंज ,लखनऊ का चौक ,इलाहाबाद का दारागंज ,कलकत्ते का नीमतल्ला घाट और पुरानी दिल्ली देखा है तो समझ लीजिये उनकी खिचड़ी बनारस में है | हर माडल के ,हर रंग के और ज्युमेट्री के हर अंश -कोण के मकान यहा है | बनारस धर्मिक दृष्टि से और एतिहासिक दृष्टि से दो भागो में बटा हुआ है |धार्मिक दृष्टि से केदार खंड ,विश्वनाथ खंड और एतिहासिक दृष्टि से भीतरी महाल और भरी अलंग | प्राचीन काल में लोग गंगा किनारे बसना अधिक पसंद करते थे ताकि टप से गंगा में गोता लगाया और खट से घर के भीतर |सुरक्षा -की सुरक्षा और पुन्य मुनाफे में |नतीजा यह हुआ की गंगा किनारे आबादी घनी हो गयी | आज तो हालत यह है की भीतरी महाल शहर का नग न होकर पूरा तिलस्म -सा बन गया है |बहुत मुमकिन है 'चन्द्रकान्ता ' उपन्यास के रचयिता बाबू देवकीनंदन खत्री को भीतरी महाल के तिलस्मो से ही प्रेरणा मिली हो |
काश !उन दिनों इम्प्रुमेंट ट्रस्ट होता ,तो हमारे बाप -दादे मकान बनवाने के नाम पर हमारे लिए तिलस्म न बनाते | छड़ी सडको को तंग गलियों का रूप न देते | यदि इम्प्रुमेंट ट्रस्ट जैसी संस्था उन दिनों बनारस में होती तो संभव था बनारस लन्दन या न्यूयार्क जैसा न सही ,मास्को अथवा मेलबोर्न जरुर बन जाता  |बुजुर्गो का कहना है की काशी की तंग गलिया और ऊँचे मकान मैत्री भावना के प्रतीक है |भूत-प्रेत की नगरी में लोग पास -पास बसना अधिक पसंद करते थे ताकि वक्त जरूरत पर एक दूसरे की मदद कर सके | मसलन ,आज किसी के घर आटा नही है तो पडोस से हाथ बदाकर माँग लिया ,रुपया उधार माँग लिया ,नया पकवान बना है तो कटोरे में रखकर पडोसी को दे दिया ,कोई सामान मंगनी में मांगना हुआ अथवा सूने घर का केलापन दूर करने के लिए अपने -अपने घर में बैठे -बैठे गप्प लडाने की सुविधा की दृष्टि से भीतरी महाल के मकान बनाये गये है | इससे लाभ यह होता है की चार -पांच मंजिल नीचे न उतरकर सब काम हाथ बढाकर सम्पन्न कर लिए जाते है | कही -कही पड़ोसियों का आपस में इतना प्रेम बढ़ गया की गली के उपर पुल बनाकर आने -जाने का मार्ग भी बना लिया गया है | यही वजह है की भीतरी महाल के मकानों में चोरी की घटनाए नही होती | इस इलाके में रहना गर्व की बात मानी जाती है | बनारस के अधिकाश:रईस -सेठ और महाजन इधर ही रहते है | बाकी कुली - कबाड़ी और उच्क्को के लिए बाहरी अलंग है | लेकिन जब से बनारस की सीमा वरुणा -असी की सीमा को तोडकर आगे बढ़ गयी है | भले ही गर्मी में शिमले का मजा मिले ,पर आधुनिक युग के लोग उधर रहना पसंद नही करते |
इसका मुख्य कारण है यातायात के साधनों में कमी | आधी रात को आपके यहा बाहर से कोई मेहमान आये अथवा सपत्नी बाढ़ बजे रात -गाडी से सफर के लिए जाना चाहे तो बक्सा बीवी के सर पर और बिस्तर स्वंय पीठ पर रखकर सडक तक आइये ,तब कही रिक्शा मिलेगा | भीतरी महाल में रात को कौन कहे ,दिन में भी कुली नही मिलते | गलिया इतनी तंग है की कोई भी गाडी भीतर नही जाती |दुर्भाग्यवश आग लगने अथवा मकान गिरने की दुर्घटना होने पर तत्काल सहायता नही मिलती | हाँ ,यह बात अलग है की मरीज दिखाने के लिए डाक्टरों को ले जाने में सवारी का खर्च नही देना पड़ता |जिस प्रकार एक ही शक्ल के दो आदमी नही मिलते ,ठीक उसी प्रकार बनारस के दो मकान एक ढंग के नही है | कोई छ: मंजिला है तो उसकी बगल एक मंजिला मकान भी है | किसी मकान में काफी बरामदे है तो किसी में एक भी नही है | भीतरी महाल के मकानों का निचला हिस्सा सीलन ,अन्धकार और गंदगी से भरा रहता है
पुराने जमाने में बाप -दादों के पास धुआधार पैसा रहा ,औलाद के लिए एक महल बनवा गये | बेचारे औलाद की हालत यह है की राशन की दूकान में गेंहू तौल रहा है | उसे इतनी कम तनख्वाह मिलती है की मरम्मत कराना तू दूर रहा दीपावली पर पूरे मकान की सफेदी तक नही करा पाता |
बनारस में छोटे -बड़े सभी किस्म के म्कान्दारो की इज्जत एक -सी है | कोई बड़ा मकान वाला छोटे मकान वाले की ओर उपेक्षा की दृष्टि से नही देखता |
यहा तक की बड़े मकान में रहने वाले अपने मकान से पड़ोस के छोटे मकान झाकर कुछ नही देख सकते | अगर आपने ऐसी गलती की तो दूसरे दिन पूरा परिवार लाठी लेकर आपके दरवाजे पर आ डटेगा ,और सबसे पहले तो शब्दकोश के तमाम शब्दों के द्वारा आपका स्वागत करेगा | अगर आप ताव में आकर बाहर चले आये तो खैरियत नही | इसके बाद भले ही आप 100 पर फोन कीजिये ,थाने  में रिपोर्ट लिखवाइए और दावा कीजिये | छोटे मकान -मालिको की इस हरकत से आज -कल लोगो ने उंचा मकान बनवाना छोड़ दिया है | बनारस में दुसरो के मकान में झाकना शराफत के खिलाफ काम समझा जाता है |
एक कानून है --हक सफा | अन्य शहरों में यह कानून लागू है या नही ,यह तो नही मालूम ,पर बनारस में इस कानून के जरिये कमजोर पडोसी को परेशान किया जा सकता है | अगर कोई कमान बेच रहा है तो उसे अपने पीछे ,अगल बगल तीनो को इत्त्लाक्र उनसे सलाह लेकर बेचना होगा | वह चुपचाप  यह काम नही कर सकता अन्यथा अडगा लगा देने पर वह मकान किसी भी कीमत में नही बिक सकता ..............................
.इतिहास
काशी के प्राचीन इतिहास से पता चलता है की काशी पहले वरुणा नदी के तट पर थी | इसका निरिक्षण फाह्यान ,हेनच्यांग और अलबैहाकी तक कर गये है |
काशी कितना प्राचीन है ,यह तो राम जाने | लेकिन यहा का प्रत्येक मुहल्ला इतिहास से सम्बन्धित है और प्रत्येक मकान ऐतिहासिक है | इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है की सरकार ने जिन मकानों को महत्वपूर्ण समझा है उनके लिए आदेश दिया है की वे मकान गिरने न पावे ,अगल -बगल ,इधर -उधर चारो तरफ से चांड लगाकर उन्हें गिरने से रोका जाए | आज अधिकाश मकान इस हुकम के कारण अपनी जगह पर खड़े है , उन्हें गिरने से रोका जाए | बनारस के दस प्रतिशत मकान जिन्हें नीद आ रही थी ,चांड लगवाने के कारण सुरक्षित है |
कुछ भाई लोगो के मकान इस किस्म  के है की अगर उनके तीनो तरफ का मकान गिर जाए तो उनका मकान नगा हो जाएगा | कहने का मतलब पडोसी के मकान से ही भाई साहब अपना काम चला लेते है और उनके दबाव में इनके मकान का लिफाफा खड़ा है | बनारस का प्रत्येक मुहल्ला ऐतिहासिक है | मसलन जब दाराशोख यहा पढने आया था तब जहा ठहरा उसका नाम दारानगर हो गया | औरंगजेब आया तो औरंगाबाद बसा गया | नबाब सआदतअली खा बनारस में आकर जहा ठहरे उस स्थान का नाम नबाबगंज हो गया | बुल्ला सिंह डाकू के नाम पर बुलानाला महाल बस गया | मानमंदिर ,मीरघाट ,राजघाट और तुलसीघाट के बारे में सभी जानते है | डाक्टर सम्पूर्णानन्द के मतानुसार अगस्तकुंडा में महामुनि अगस्त्य रहते थे | इस प्रकार देखा जाए तो बनारस का प्रत्येक स्थान पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है | चेतगंज मुहल्ला चेतसिंह के नाम पर बसा तब जगतसिंह को अपने नाम पर मुहल्ला बसाने की सूझी | नतीजा यह हुआ की सारनाथ के धर्मराजिक स्तूप को उखाडकर उन्होंने जगतगंज मुहल्ला बसा डाला |कुछ लोग कहते है ,इसे जगतसिंह ने नही बसाया है ,वे सिर्फ यहा रहते थे |यह मुहल्ला तो बौद्धकालीन वाराणसी की बस्ती है | अब इसका ठीक-ठीक निर्णय तभी हो सकता है जब जगतगंज को खुदवाकर उसकी जांच पुरातत्व वाले करे | बनारस में तीन किस्म के मकान बने है |पथ्थर के बने मकान बौद्धकाल के बाद के है; लखवरिया ईटोवाले मकान बौद्ध युग के पूर्व से मुगलकाल तक के है |नमबरिया ईटो के बने मकान ईस्ट इंडिया कम्पनी से लेकर 14अगस्त सन 1947 ई. तक बने है | आजकल नमबरिया ईटो की साइज नौ गुणा साढ़े चार इंच की हो गयी है | इस साइज की ईटो के बने मकान कांग्रेसी शासनकाल के है |
यद्यपि काशी में मुहल्ले और मकान काफी है ,पर हवेली साढ़े तीन ही है | महल कई है | हवेलियों में देवकीनंदन की हवेली ,काठ कि ह्वेली ,कश्मीरीमल की हवेली और विश्वम्भरदास की हवेली काशी में प्रसिद्ध है | इनमे आधी हवेली कौन है ,इसका निर्णय आजतक नही हुआ | पांडे हवेली को हवेली क्यों नही माना जाता ,यह बताना मुश्किल है ,जब की इस नाम से भी एक मुहल्ला बसा हुआ है | यदि आपको भ्रमण का शौक है और पैसे या समय के अभाव से समूचा हिन्दुस्तान देखने में असमर्थ है तो मेरा कहना मानिए ,सीधे बनारस चले आइये | यहा हिन्दुस्तान के सारे प्रांत मुहल्ले के रूप में आबाद है |हिन्दुओं के तैतीस करोड़ देवता काशी वास करते मिलेंगे ,गंगा उत्तर वाहिनी है ,तिलस्मी मुहल्ला है ,ऐतिहासिक मकान है और जो कुछ यहा है ,वह दुनिया के सात पर्दे में कही नही है | बनारस दर्शन से भारत दर्शन हो जाएगा | यहा एक से एक दिग्गज विद्वान् और प्रकांड पंडित है  |प्रत्येक प्रांत का अपना -अपना मुहल्ला भी है | बंगालियों का बंगाली टोला ,मद्रासियो तथा दक्षिण भारतीयों का हनुमान घाट ,केदार घाट पंजाबियों का लाहोरिटोला,गुजरातियों का सुतटोला , मारवाड़ियो की नंदनसाहू गली ,कन्नडियो का अगस्तकुंडा ,नेपालियों का बिन्दुमाधव,ठाकुरों का भोजुवीर ,राजपूताने के ब्राह्मणों की रानीभवानी  गली ,सिंधियो का लाला लाजपतराय नगर ,मराठियों का दुर्गाघाट,बालाघाट ,मुसलमानों का मदनपुरा अलईपूर ,लल्लापुर और काबुलियो का नयी सडक -बेनिया मुहल्ला प्रसिद्ध है |इसके अलावा चीनी ,जापानी ,सिहली ,फ्रांसीसी ,भूटानी ,अंग्रेज और अमेरिकन भी यहा रहते है | सारनाथ में बौद्धों की बस्ती है तो रेवड़ी तालाब पर हरिजनों की |व्यवसाय के नाम पर भी अनेक मुहल्ले आबाद है |
बनारस की चौपाटी
काशी को दुनिया से न्यारी कहा जाता है और यह सारा 'न्यारापन ' बनारसी चौपाटी -दशाश्वमेध घाट पर खीच आया है ,यह निस्संदेह कहा जा सकता है |
जो बम्बई की चौपाटी की चाट खा आये है ,उन्हें दशाश्वमेध घाट की चौपाटी कहते ज़रा झिझक होती है |ऐसे लोगो को असली बनारसी 'गदाई ' के विशेषण से युक्त करने में कभी कोई संकोच नही होगा |किसी बनारसी को अगर बम्बई में छोड़ दिया जाए तो वह अपने को 'पागल 'समझने को विवश हो जाएगा बस कुछ ही दिनों में | बम्बई में पाश्चात्य चमक भले ही हो ,पर भारतीयता की झलक तो अपने बनारस में ही मिलती है|   खैर |
यह निश्चित मन से स्वीकारा जा सकता है की बम्बई की चौपाटी का दशाश्वमेध घाट से कोई मुकाबला नही |   एक में बाजारू सौन्दर्य है तो दूसरे में शाश्वत |
मुलाहजा फरमाइए ---
सुबह होते ही ,घाट पर मालिश का बाजार गरम हो जाता है |  बनारसी के लिए स्नान के पूर्व मालिश का वही महत्व है ,जो आधुनिको के लिए स्नो करीम -पाउडर का | एक रुपया की दक्षिणा में कपड़ो की चौकीदारी ,स्नानोपरांत आईने -कघी की व्यवस्था से लेकर तिलक लगाने तक की सेवा आप यहा उपस्थित घाटिये से ले सकते है |  ब्राह्मण का आशीर्वाद फ़ोकट में मिल जाएगा | जरा सामने निगाह उठाइये तो गंगा की छाती पर धीरे -धीरे उस पार की ओर सरकती नौकाये आपका ध्यान तुरंत आकर्षित कर लेंगी |  बनारस के 'गुरु 'और रईस शहर में भले मॉल -त्यागना अपराध समझते है ,सो उस पार निछ्द्द्म में निपटान को जाते हुए बनारसी की दिव्य छटा से आपकी आत्मा तृप्त हो जायेगी |  ये निपटान -नौकाये ,अधिकतर पर्सनल होती है और इनका दर्शन शाम को भी किया जा सकता है |
स्नानार्थियो में कम -से कम सत्तर परसेंट महिलाये होती है ,इसलिए कुछ बीमार किस्म के 'आँख -सकते 'भी दिखाई पड़ेंगे |  बनारस की महिलाये जरा मर्दानी किस्म की होती है ,सो ऐसे बीमारों की कत्तई परवाह नही करती |
अस्सी और वरुणा -संगम के मध्य में होने के कारण यहा से सम्पूर्ण बनारस की परिक्रमा आप कर सकते है ,इसलिए की काशी का 'रस 'यहा के घाटो में ही सन्निहित है | अब घाट से उपर आइये और देखिये की बनारस कितना कंगाल है ---सडक पर अपनी गृहस्थी जमाए भिखमंगो को देखकर स्वाभाविक है की बनारस के प्रति आपका आइडिया खराब हो जाए , यह अनभिज्ञता और भ्रम का परिणाम है |काशी के भिखमंगो की माली हालत आफिस में कलम रगड़ने वाले सफ़ेद पोश बाबुओं से उन्नीस नही होती |  मरने के बाद उनके लावारिस गुदड़ के अन्दर से सरकार को अच्छी -खासी आमदनी हो जाती है |  एक बार चितरंजन पार्क के पास एक बूढी भिखारिन जब मरी तब उसके गुदड़ से सात सौ अठ्ठासी रूपये साधे तेरह आने की मोती रकम प्राप्त हुई थी | मेरे कहने का यह मतलब नही की आप उन्हें 'छिपा रईस ' समझ कर उनका जायज हक़ हड़प कर ले | भीख माँगा उनका पेशा है और पेशे का सम्मान करना आपका धर्म है |
शाम को इस बनारसी चौपाटी का वास्तविक सौन्दर्य दिख पड़ता है | कराची की फैश्नप्र्स्ती ,लाहौर की शोखी ,बंगाल की कलाप्रियता ,मद्रास की शालीनता ,गुजरात -महाराष्ट्र सब उमड़ पड़ता है यद्यपि दशाश्वमेध का क्षेत्र बहुत ही सीमित है तथापि गागर में सागर का समा जाना आप खूब अनुभव कर लेंगे |
विश्वनाथ गलिवाली नुक्कड़ से सिलसिलेवार स्थित तीन रेस्तरा आपको सर्वाधिक आकर्षित करेंगे | उनके अनुचर मोची से लेकर श्रीमान तक को बिना किसी भेदभाव के भाईसाहब ,चचा ,दादा ,और बहन जी आदि पुनीत संबोधनों  से निहाल  कर देंगे :भले ही आपकी जेब में एक कप चाय तक की कीमत न  हो |
उपयुक्त तीनो जलपान घरो का ऐतिहासिक महत्व है | बनारस के इकन्नी ब्रांड से लेकर रूपये ब्रांड तक के साहित्यकार ,शाम को इन्हें अपने आगमन से पवित्र करना अपना कर्तव्य समझते है  |थोड़ा प्रयत्न करे तो घाट के किसी अँधेरे कोने में साहित्यकारों की मण्डली किसी गम्भीर साहित्य की समस्या में उलझी मिल जायेगी |
यो काशी का ऐसा कोई साहित्यकार आपको नही मिलेगा जो दशाश्वमेध में न जमता हो | अनेक साहित्यक वादों का प्रसार और उनके आपरेशन का थियेटर भी दशाश्वमेध ही है | अधिकतर साहित्य की गोष्ठिया भी यही आयोजित होती है
घाट पर शाम को धर्मो की जो धारा लहराती है ,वह अन्यत्र दुर्लभ ही है | कथावाचक रामायण ,महाभारत ,चैतन्य चरितावली ,भागवत आदि की पुनीत कथा से वातावरण को गमका देते है |
इस स्थान की प्रशंसा भारतीयों ने की ही है ,दूसरे देशवालो ने भी इसका गुणगान किया है | प्रसिद्ध पर्यटक श्री जे.बी .एस .हाल्डेन की पत्नी ने कहा है की मुझे यह जगह न्यूयार्क से अच्छी लगती है | एक रुसी पर्यटक ने इसे पेरिस से सुन्दर नगरी कहा है | विश्व स्वास्थ्य संघ के एक अधिकारी ने इसे सारे जहा से अच्छा स्थल माना है | मेरे एक मित्र ,जो लन्दन गये हुए है ,उन्होंने जब स्वेज नहर का दृश्य देखा तब उन्हें बनारस के घाटो के दृश्य याद आ गये | प्राचीन काल में दशाश्वमेध का नाम 'रूपसरोवर  'था | इसके बगल में घोड़ा घाट है | पहले इसका नाम गऊघाट था | काशी की गाये यहा पानी पीने आती थी | गोदावरी -गंगा का संगम -स्थल आज घोड़ाघाट बन गया है | त्रेता युग में दिवोदास ने यहा दस अश्वमेध यज्ञ करवाए थे ,तभी से इस स्थान का नाम दशाश्वमेध घाट हो गया है | आज भी उपर द्शाश्व्मेधेश्वर की मूर्ति है | शायद ही ऐसी कोई राजनितिक पार्टी होगी जिसकी सभा इस घाट पर न हुई हो  |खासकर सन 42 के आन्दोलन के पूर्व सभी उपद्रव इसी घाट से प्रारम्भ किए जाते थे | शहर का प्रत्येक जलूस इसी स्थान से सज -धजकर चलता है | शहर की सबसे बड़ी सत्ती (तरकारी बाजार )यही है और महामना मालवीय ने हरिजन -शुद्धि का आन्दोलन इसी घाट से प्रारम्भ किया था | अब प्रदेश के मुखिया की कृपा से इस घाट का पुननिर्माण शुरू हुआ है | निर्माण करे समाप्त हो जाने पर यह निश्चित है की यह स्थान काशी का सर्वाधिक आकर्षक केद्र्स्थल बन जाएगा | बम्बइया चौपाटी को मात देने के लिए उत्तर प्रदेशीय सरकार ने भी एक मार्व्लेस प्लान तैयार करने का निश्चय किया है | राजघाट -सारनाथ सडक के पुल के फाटक बंद करके वरुणा नदी से विशाल ज्झिल निर्मित होगी |शांत वातावरण में इस झील में जल- विहार कितना मनोरम होगा अनुमान ही मन में स्फुरण भर देता है |

बनारस की सीढ़िया

रांड ,सांड ,सीढ़ी ,सन्यासी |
इनसे बचे तो सेवे काशी ||
पता नही ,कब किस दिलजले ने इस कहावत को जन्म दिया की काशी की यह कहावत अपवाद के रूप में प्रचलित हो गयी | इस कहावत ने काशी की सारी महिमा पर पानी फेर दिया | मुमकिन है की उस दिलजले का इन चारो से कभी वास्ता पडा हो और काफी कटु अनुभव हुआ हो | खैर जो हो , पर सत्य है की काशी आनेवालों का इन चारो से परिचय हो ही जाता है | फिर भी आश्चर्य का विषय यह है की काशी आनेवालों की संख्या बढती जा रही है और जो एक बार यहा आ बसता है ,मरने के पहले टलने का नाम नही लेता ,जबकि पैदा होने वालो से कही अधिक श्मशान में मुर्दे जलाए जाते है | यह भी एक रहस्य है |
इन चारो में सीढ़ी के अलावा बाकी सभी सजीव प्राणी है | बेचारी सीढ़ी को इस कहावत में क्यों घसीटा गया है ,समझ में नही आता| यह सत्य है की बनारस की सीढ़िया (चाहे वे मन्दिर ,मस्जिद ,गिजाघर अथवा घर या घाट -किसी की क्यों न हो ) कम खतरनाक नही है ,लेकिन यहा की सीढियों में दर्शन और आध्यात्म की भावना छिपी हुई है | ये आपको जीने का सलीका और जिन्दगी से मुहब्बत करने का पैगाम सुनाती है | अब सवाल है की कैसे ? आँख मूंदकर काम करने का क्या नतीजा होता है ,अगर आपने कभी ऐसी गलती की है ,तो आप स्वंय समझ सकते है | सीढ़िया आपको यह बताती रहती है की आप नीचे की जमीन देखकर चलिए ,दार्शनिको की तरह आसमान मत देखिये ,वरना एक अरसे तक आसमान मैं दिखा दूंगी अथवा कजा आई है -जानकर सीधे शिवलोक भिजवा दूंगी | काशी की सीढ़िया चाहे कही की क्यों न हो ,न तो एक नाव की है और न उनकी कोई बनावट में कोई समानता है ,न उनके पथ्थर एक ढंग के है ,न उनकी उंचाई -निचाई एक सी है ,अर्थात हर सीढ़ी हर ढंग की है | जैसे हर इंसान की शक्ल जुदा -जुदा है ,ठीक उसी प्रकार यहा की सीढ़िया जुदा -जुदा ढंग से बनाई गयी है | काशी की सीढियों की यही सबसे बड़ी खूबी है | अब आप मान लीजिये सीढ़ी उपर है ,नीचे तक गौर से सारी सीढ़िया आपने देख ली और एक नाप से कदम फेकते हुए चल पड़े ,पर तीसरी पर जहा अनुमान से आपका पैर पढ़ना चाहिए नही पडा ,बल्कि चौथी पर पड़ गया | आगे आप ज़रा सावधानी से चलने लगे तो आठवी सीढ़ी अंदाज से कही अधिक नीची है ,ऐसा अनुभव हुआ | अगर उस झटके से अपने को बचा सके तो गनीमत है ,वरना कुछ दिनों के लिए अस्पताल में दाखिल होना पडेगा | अब आप और भी सावधानी से आगे बड़े तो बीसवी सीढ़ी पर आपका पैर न गिरकर स्थ पर ही पड़ जाता है और आपका अंदाजा चुक जाता है | गौर से देखने पर आपने देखा यह सीढ़ी नही है चौड़ा फर्श है |


खतरनाक सीढ़िया क्यों ?
अब सवाल यह है की आखिर बनारस वालो ने अपने मकान में ,मन्दिर में ,या अन्य जगह ऐसी खतरनाक सीढ़िया क्यों बनवाई ?इसमें क्या तुक है ? तो इसके लिए आपको जरा काशी का इतिहास उलटना होगा | बनारस जो पहले सारनाथ के पास था ,खिसकते -खिसकते आज यहा आ गया है | यह कैसे खिसककर आ गया ,यहा इस पर गौर करना नही है | लेकिन बनारस वालो में एक ख़ास आदत है ,वह यह की वे अधिक फैलाव में बसना नही चाहते ,फिर गंगा ,विश्वनाथ मन्दिर और बाजार के निकट रहना चाहते है | जब भी चाहा दन से गंगा में गोता मारा और उपर घर चले आये | बाजार से सामान खरीदा ,विश्वनाथ -दर्शन किया ,चटघर के भीतर | फलस्वरूप गंगा के किनारे -किनारे घनी आबादी बस्ती गयी | जगह संकुचित ,पर धूप खाने तथा गंगा की बहार लेने और पड़ोसियों की बराबरी में तीन -चार मंजिल मकान बनाना भी जरूरी है | अगर सारी जमीन सीढ़िया ही खा जायेगी तो मकान में रहने की जगह खा रहेगी ? फलस्वरूप ऊँची -नीची जैसे पथ्थर की पटिया मिली , फिट कर दी गयी -लीजिये भैया जी की हवेली तैयार हो गयी | चूँकि बनारसी सीढियों पर चढने -उतरने के आदि हो गये है ,इसलिए उनके लिए ये खतरनाक नही है ,पर मेहमानों तथा बाहरी अतिथियों के लिए यह आवश्यक है |
........................................काशी के घाट
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विश्व की आश्चर्य वस्तुओं में बनारस के घाटो को क्यों नही शामिल किया गया -- पता नही ,जब की दो मील लम्बे पक्तिवार घाट विश्व में किसी नदी -तट पर कही नही है | ये घाट केवल बाढ़ से बनारस की रक्षा नही करते ,बल्कि काशी के प्रमुख आकर्षण केंद्र है | जैन ग्रंथो के अध्ययन से पता चलता है की प्राचीन काल में काशी के घाटो के किनारे -किनारे चौड़ी सड़के थी ,यहा बाजार लगते थे | वर्तमान घाटो की निर्माण -कला देखकर आज भी विदेशी इंजीनियर यह कहते है की साधारण बुद्धि से इसे नही बनाया गया है | रामनगर ,शिवाला ,दशाश्वमेध ,पंचगंगा ,और राजघाट का निर्माण पानी के तोड़ को दृष्टि में रखते हुए किया गया है ताकि रामनगर तट से धक्का खाकर शिवाला में नदी का पानी टकराए ,फिर वह से दशाश्वमेध से मोर्चा ले ,पंचगंगा और अन्त में राजघाट से टक्कर ले और फिर सीढ़ी राह ले | इस कौशलपूर्ण निर्माण का एक मात्र श्रेय राजा बलवंत सिंह को है ,जिन्होंने अपने समकालीन राजाओं की सहायता से बनारस को बाधो से मुक्ति दिला दी ,अन्यथा अन्य शहरों की तरह बनारस को भी बाढ़ बहा ले जाती |
घाटो की सीढियों की उपयोगिता
सीढियों का दृश्य काशी के घाटो में ही देखने को मिलता है चूँकि काशी नगरी गंगा की स्थल  से काफी ऊँचे धरातल पर बसी है इसलिए यहा सीढियों की बस्ती है | काशी के घाटो को आपने देखा होगा ,उन पर टहले भी होंगे | लेकिन क्या आप बता सकते है की केदारघाट पर कितनी सीढ़िया ?
सिंधिया घाट पर कितनी सीढिया है ? शिवाले से त्रिलोचन तक कितनी बुर्जिया है ? साफालाने लायक कौन सा घाट अच्छा है ? आप कहेंगे की यह बेकार का सरदर्द कौन मोल ले |
लेकिन जनाब ,हरिभजन से लेकर बीडी बनाने वालो की आमसभा इन्ही घाटो पर होती है | हजारो गुरु लोग इन घाटो पर साफा लगाते है ,यहा कवि- सम्मलेन होते है ,गोष्ठिया करते है ,धर्मप्राण व्यक्ति सराटा से माला फेरते है ,पण्डे धोती की रखवाली करते है ,तीर्थयात्री अपने चदवे साफ़ करवाते है | यहा भिखमंगो की दुनिया आबाद रहती है और सबसे मजेदार बात यह है की घर के उन निकलुओं को भी ये घाट अपने यहा शरण देते है ,जिनके दरवाजे आधीरात को नही खुलते | ये घाट की सीढिया बनारस का विश्रामगृहहै ,झा सोने पर पुलिस चालान नही करेगी | नगरपालिका टैक्स नही लेगी और न कोई आपको छेड़ेगा | ऐसी है बनारस की सीढिया |

-सुनील दत्ता
आभार विश्वनाथ मुखर्जी '' बना रहे बनारस से ""

रविवार, 16 सितंबर 2012

बनारस की गलिया


जो लोग बम्बई ,कलकत्ता और दिल्ली जैसे शहरों में एक बार हो आये है अथवा किसी कारणवश अब वही रहने लग गये है ,ऐसे लोग जब कभी किसी छोटे शहर में आयेंगे तो उस शहर के बारे में इस तरह बातचीत करेंगे मानो परमाणु बम का भेद बता रहे हो |  चूँकि हम कभी दिल्ली ,बम्बई गये नही इसलिए हम उनकी मुँह बाकर इस तरह निगल जाते थे जैसे बरसात में  छिपकलिया पतिंगो को |  कभी -कभी हम यह महसूस करने लगते है ,नाहक हमारी पैदाइश बनारस जैसे शहर में हुई |काश !हम बम्बई ,कलकत्ता जैसे शहरों में पैदा हुए होते |  वहा ऊँची -ऊँची इमारतो से नीचे की झांककर देखते की आदमी अंगूठे से कितना बड़ा होता है ,चौपाटी और मिलावर हिल से समुद्र की अजगर सरीखी लहरे गिनते |
इन शहरों की तारीफ़ में ख़ास चर्चा मकानों और सडको के बारे में होती है | वहा के मकान इतने ऊँचे है की सडक पर खड़े होकर उपर देखो तो टोपी गिर जाए | सड़के इतनी खुशनुमा है की पैर फिसल जाते है | चौड़ाई तो इतनी की यहा की तीन एक ही में घुस जाए | गलिया तो वहा है ही नही और जो है भी ,वे यहा की सडको की नानी से कम नही | धीरे-धीरे उनकी बातचीत का असर इस कद्र होता है की हम यहा फरमान जारी कर देते है - --  इस साल चाहे जैसे हो कलकत्ता ,बम्बई जाकर ही रहेंगे | हमारे ऐलान को सुनकर हजरत यो मुँह सिकोड़ लेते जैसे 100 ग्रेन कुनैन का मिक्सचर पी लिया हो | मस्तक पर मुठ्ठी भर बल डाले इस अंदाज से कह उठते ,'खुदा झूठ न बोलाए | आज तीन साल हो गये वहा  रहते ,पर अभी तक हम यह नही जान सके की कौन सडक किधर जाती है | फंला जगह जाने के लिए किन -किन सडको से या किस बस पर सवार होकर जा सकते है ,नही बता सकते |  रात को कौन कहे ,दिन को भी हम अक्सर रास्ता भूल जाते है |फिर आप जैसा आदमी जाए तो खो जाने में कोई शुबहा नही |दाए -बाए का ख्याल न रखे तो हवालात में बन्द हो जाए या सीधे नर्क का टिकट कटाए |  अगर आप किसी ठग या सुंदरी के चक्कर में आ गये तो बड़ा गरक ही समझिये |"
चूँकि हम अपने मा -बाप की इकलौती संतान और अपनी बेगम के इकलौते मिया है ,इसलिए मुफ्त में खो जाना या हवालात में बन्द होकर नर्क का टिकट कटाना कतई पसंद नही करते | जबकि हम पैदा होते ही अपने बाप को यह सार्टिफिकेट दे चुके है की आपकी गैरमौजूदगी में मैं और मेरी औलाद आपको पितृपक्ष के दिनों पानी जरुर देंगे |नतीजा यह होता है की हम अपना फैसला चुचाप वापस ले लेते है ,फिर कभी उधर जायंगे -यह ख़्वाब में भी नही लाते है |
यह अजीब इत्तिफाक की बात है की एक बार हमारे घर एक नजूमी आया और उसने बताया और उसने बताया की मैं बम्बई ,कलकत्ता और दिल्ली जैसे शहरों में जरुर जा सकता हूँ | बात ठीक निकली | वह अरमान जो की कुचल दिया गया था ,पुष्पित हो उठा |हम गये और वापस भी चले आये |न कही खोये ,न कही पैर फिसला |न कही टोपी गिरी ,न हवालात में बन्द हुए |ठग और सुन्दरी से भेट हुई ,पर हम उनकी चकल्लस में नही आयी |  लेकिन जो मजा बनारस की गलियों में है ,वह मजा दुनिया के किसी पर्दे में नही है |  जो आजादी यहा के हर गली -कूंचे में है उसे ये सात जन्म में नही पा सकते   |बनारसी गलियों का कुछ मजा सिर्फ मथुरा में मिल सकता है ........
बनारस की सड़के
................................बनारस में जितनी सड़के है , उससे सौ गुनी अधिक गलिया है |  यदि आप बनारस की सडको का मुआइना कर बनारस के बारे में फैसला देंगे तो यह सेंट -परसेंट अन्याय होगा |  असली मजा तो बनारस की गलियों में दुबका हुआ है |  बनारसी भाषा में उन्हें 'पक्का महाल '-'भीतरी महाल ' कहते है |  काशी खंड के अनुसार विश्वनाथ खंड -केदारखंड की तरह वर्तमान बनारस भी दो भागो में बसा हुआ है -भीतरी महाल (पक्का महाल ) और बहरी तरफ |  आपने सिर्फ बाहरी रूप अर्थात कच्चा रूप देखा है |  पक्का रूप देखना हो तो गलियों में थरान दीजिये |  यहा की सड़के अभी जुमा -जुमा आठ रोज हुए बनी है यानी 'लली ' है |   बेचारी ठीक से सुख भी नही पायी है |  यकीन   न हो तो किसी दिन गर्मी के मौसम में पैदल चलकर देख लीजिये | सुकतल्ला सडक पर चिपककर रह जाएगा और हवाली जुटा आपके पैरो में |  यदि जूता काफी मजबूत हुआ तो बनारस की धरती इस कदर प्यार से आपके कदमो को चूमेगी की उससे अपना दामन छुडाने में आप को छठी का धुध याद आ जाएगा |  अगर आपकी यह कसरत बनारसी -पठ्ठो ने देखि तो -'बोल छ्माना छे ;खिल्छे रहे पठ्ठे ,जाए न पावे 'फिकरा कास ही देंगे |कहने का मतलब यह है की बनारस की सड़के हर पैदल चलनेवाले मुसाफिरों से बेहद मुहब्बत करती है |  इनकी मुहब्बत हर मौसम में अलग -अलग ढंग से पेश आती है |बरसात में इनकी होली देश विख्यात है और बसंत ऋतू में जब ये आप पर 'गुलाल 'बरसाने लगती है तो मत पूछिए !  आनन्द आ जाता है |
स्कूलो में आप ज्योमेट्री की शिक्षा पा चुकर होंगे |  मुमकिन है की उसकी याद धुधली हो गयी हो |  यदि आप बनारस की सडको पर तहलान दे तो मजबूरन ज्योमेट्री के प्रति दिलचस्पी पैदा ओ जायेगी |  जब कोई बैलगाड़ी ,तर्क ,जीप या टैक्सी इस सडको पर से गुजरती है तब हर रंग की हर ढंग की समानान्तर रेखाए ,त्रिभुज ,चत्तुर्भुज और षटकोण के ऐसी अजीब -गरीब नक्शे बन जाती है जिसका अंश बिना परकार की सहायता के ही बताया जा सकता है |  नगरपालिका को चाहिए की वह अपने यहा के अध्यापको को इस बात का आदेश दे दे की वे अपने छात्रों को सडक पर बने हुए ज्योमेट्री का परिचय अवश्य करा दे |सुना है काशी के कुछ माडर्न आर्टिस्ट इन नक्शों के सहयोग से प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके है |
यहा की सड़के डाक्टरों की आमदनी भी बढाती है |  यही वजह है की अन्य शहरों से कही अधिक बनारस में डाक्टर है   |यदि आप किसी रिक्शे पर सवार होकर एक बार शहर की परिक्रमा कर ले तो इसका अनुभव हो जाएगा | बनारस के बाशिंदे तो इसके आदि हो गये है | यहा के कुछ गुरुओ का ,(जो लन्दन ,पेरिस और अमेरिका हो आये है )  कहना है की उन्हें हवाई जहाज या समुद्री जहाज में चक्कर देने वाली बीमारी इन सडको के हिचकोले खाने के कारण नही हुई   |इसीलिए आपको जब कभी विदेश जाने की जरूरत हो तो एक बार बनारस आकर रिक्शे की सवारी पर हिचकोले जरुर खाइए | यहा हर पांच कदम पर गढ्ढे है | जब इन गढ़ढो  में रिक्शे का पहिया फंसेगा तब पेट का सारा भोजन कंठ तक आ जाएगा | दूसरे दिन बदन में इतना दर्द हो जाएगा की आप को डाक्टर का दरवाजा खटखटाना पडेगा |
अंग्रेजी काल में जब कोई गवर्नर या अधिकारी काशी -दर्शन के लिए आता  था तब उसे ख़ास सडको से ले जाया जाता था | जब लगातार लोग यहा आने लगे तब कैंट से नदेसर तक और कैंट से पानी कल तक सीमेंट की सड़के बना दी गयी | विश्वविद्यालय के छात्र खुरापाती होते ही है \एक बार उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व गवर्नर माननीय कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी जी की मोटर लंका से अस्सी की ओर इन लोगो ने चलवा दी |  नतीजा यह हुआ की नगरपालिका ने उस सडक की खाज को दूसरे साल मलहम पट्टी लगाकर कुछ हद तक ठीक कर दिया |भगवान करे हर प्रांत के गवर्नर यहा आवे और इस प्रकार प्रत्येक सडक का खाज एक्जिमा दूर होता रहे .....
गलियों की विशेषता ...............
काशी में सडको का कोई महत्व नही है ,इसलिए बहुत कम लोग सडको पर चलते है | सडको का उपयोग जुलूस निकालते समय होता है | उस पर पैदल से अधिक लोग सवारी से चलते है | इधर कुछ ऐसे लोग (शायद मेंटल हास्पिटल से छूटकर ) आ गये है जो सडको को महत्व देने लग गये है | ऐसे लोग लम्बे सडक 'मकान बिकाऊ है 'दूकान खाली है '' अथवा 'भाड़े पर लेना है ' का विज्ञापन छपवाते है |
काशी की अधिकाश गलिया ऐसी है ज़हा सूर्य की रौशनी नही पहुचती | कुछ गलिया ऐसी है जिनमे दो आदमी एक साथ गुजर नही सकते | इन गलियों की बनावट देखकर कई विदेशी इंजीनियरों की बुद्धि गोल हो गयी थी! जो लोग यह कहते है की बम्बई -कलकक्ता की सडको पर खो जाने का डर रहता है ,वे काशी की गलियों का चक्कर काटे तो दिन भर के बाद शायद ही डेरे तक पहुच सकेंगे | आज भी ऐसे अनेक बनारसी मिलेंगे जो बनारस की सभी गलियों को छान चुके है ,कहने में दांत निपोर देंगे |
इन गलियों से गुजरते समय जहा कही चुके तुरंत ही दूसरी गली में जा पहुचेंगे | कलकक्ता ,बम्बई की तरह सडक की मोड़ पर अमुक दूकान ,अमुक निशान रहा -याद रहने पर मंजिल तक पहुच सकते है -- पर बनारस में इस तरह के निशान - दूकान -साइनबोर्ड भीतरी महाल में नही मिलेंगे | नतीजा यह होगा की काफी दूर आगे जाने पर रास्ता बन्द मिलेगा | उधर से गुजरने वाले आपकी ओर इस तरह देखेंगे की यह 'चाईया' इधर कहा जा रहा है | नतीजा यह होगा की आपको पुन:गली के उस छोर तक आना पडेगा ज़हा से आप गडबड़ाकर मुद गये थे  |कुछ गलिया ऐसी है की आगे बढने पर मालूम होगा की आगे रास्ता बंद  है ,लेकिन गली के छोर के पास पहुचने पर देखेंगे की बगल से एक पतली गली सडक से जा मिली है | अक्सर इन गलियों में जब खो जाने में आता है ,खासकर रात के समय ,तब लगता है जैसे -ऊँचे फादो की घाटियों में खो गये है | इन गलियों में लोग चलते -फिरते कम नजर आते है | जो नजर भी आते है ,वे उस गली के बारे में पूर्ण विवरण नही बता सकते | हो सकता है ,वे भी आपकी तरह चक्कर काट रहे हो | गलियों का तिलस्म इतना भयंकर है की बाहरी व्यक्ति को कौन कहे अन्य लोग भी जाने में हिचकते है | कुछ गलिया ऐसी है जिनसे बाहर निकलने के लिए किसी दरवाजे या मेहराबदार फाटक के भीतर से गुजरना पड़ता है |
बम्बई ,कलकक्ता की तरह यहा की सडको में चार से अधिक रास्ते नही है ,पर गलियों में चार से चौदह तक रास्ते है | किस गली से आप तुरंत घर पहुंच सकते है यह बिना जाने पूछे  नही जान सकते |जिस गली से आप घर पहुच सकते है उसी गली से आप श्मशान या नदी किनारे भी जा सकते है |
गलियों का नगर
शैतान की आँत की भांति यह भूल -भुलैया संसार का एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थान है | इन गलियों में कितनी आज़ादी है | नगे -घुमो गमछा पहिने चलो ,जहा जी में आये बैठो और जहा जी आये सो जाओ | कोई बिगड़ेगा नही ,भगाया नही और न डाटेगा | गावटी का गम्च्छा या सिल्क का कुर्ता पहने बनारसी रईस भी इन गलियों में छाता लगाए चलते है | शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा की जिस गली में सूर्य की रौशनी नही पहुचती ,बरसात का मौसम नही हहै ,फिर भी लोग छाता लगाकर क्यों चलते है ? कारण है -गन्दगी | मान लीजिये आप बाज़ार से लौट रहे है ,अचानक उपर से कूड़े की बरसात हो गयी |यह बात अच्छी तरह जान लीजिये --बनारसी तीन मंजिले या चार मंजिले पर से बिना नीचे झाके ठुक सकता है ,पानी फेक सकता है और कूड़ा गिर सकता है | दूकान झाड बटोरकर आपके चेहरे पर सारा गर्दा फेक सकता है | यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है ;नीचे इस सत्कार्य से घायल व्यक्ति जब गालिया देता है तब सुनकर भाई लोग प्रसन्न हो उठते है | उनका रोम -रोम गाली देने वाले को साधुवाद देगा | अगर कही वे सज्जन चुपचाप चले गये तो इसका उन्हें अपार दुःख होगा और उस दुःख को मिटाने के लिए मुख से अनायास ही निकल जाएगा ----'मुरदार निकसल !'
किसी -किसी गली में बनारसीयो  का पनाला इस अदा से पता  है की फुहारे का मजा आता है ! गर्मी के दिनों में रात को ऐसी गलियों से गुजरना और खतरनाक होता है | सोते समय 'शंका समाधान 'के लिए बनारसी अपने को अधिक कष्ट नही देगा | परिणाम स्वरूप छत के पनाले से आप पर 'शुद्ध गंगाजल 'बरस सकता है | गुस्सा उतारने के लिए ऐसे घरो में आप घुसने  की हिम्मत नही कर सकते | एक तो बाहर का भारी दरवाजा बन्द है ,दूसरे भीतर जाने पर भी यह पता चलना मुश्किल है की यह सत्कार्य किसने किया है | मुँह आपका है ,गालिया बक लीजिये और राह लीजिये ,बस! खासकर नगे पैर चलना तो और भी मुश्किल है | घर के बच्चे 'दीर्घशंका ' गलियों में रात को कर देते है | अगर इन गलियों में भगवान शंकर के किसी मस्ताने वाहन से भेट हो गयी उसने नाराज होकर आपको हुरपेटा तो जान बचाकर भागना  मुश्किल हो जाएगा | खासकर उन गलियों में जो आगे बंद मिलती है  | क्योंकि आप पीछे भाग नही सकते ,आगे रास्ता बन्द है ,बगल के सभी मकानों में भीतर से भारी सांकल लगी है और इधर सांड महराज हुरपेटते  आ रहे है ! साल में दो -एक व्यक्ति इन सांडो के कारण काशी -लाभ करते है | लगे हाथ एक  उदाहरण सुन लीजिये | अब्राहम लिकन के बाद जनरल ग्रांट अमेरिका के राष्ट्रपति हुए थे | एक बार जब वे हिन्दुस्तान में दौरे पे आये तब बनारस भी आये थे | उन्होंने इस शहर को 'एक सिटी आफ लेंस "अर्थात गलियों का शहर कहा है | कहा जाता है की उनकी पत्नी शंकर भगवान के वाहन ने अपने सींग पर उठा लिया था |
कहा जाता है की राजा रामचन्द्र के सुपुत्रों (लव -कुश ) से बुरी तरह शिकस्त खाकर पवनसुत हनुमान जी अपनी बिरादरी के साथ बनारस में आकर बस गये | आज वे इन गलियों में क्रीडा -स्थल बनाकर प्रसन्न है | ऐसी घटनाए प्राय: सुनने में आती है की गली से गुजरते समय अचानक उपर छत से पथ्थर का रोड़ा सर पर आ गिरा और बड़ी आसानी से स्वर्ग में सीट रिजर्व हो गयी | असल में यह पवनसुत के वंशजो का महज खिलवाड़ है |' खिलवाड़   '  से अगर कोई स्वर्ग पहुंच जाता है तो वह अपराध कैसे हो सकता है ? पवनसुत के वंशजो का तर्क कानून शास्त्री को घपले में डाल देता है | इस आसमानी खतरे से बचने के दो ही उपाय है -एक तो सिर पर फौजियों वाली लोहे की टोपी या फिर आपका अपना भाग्य ! क्योंकि इस तरह की फौजदारी की घटना किसी थाने में दर्ज नही होती और न इसके मुकदमे अदालत में स्वीकार किए जाते है | इन गलियों के नामकरण और उनकी दूरी को यदि आप नजरअंदाज करे तो बनारस के पोस्टल विभाग की प्रसंशा करेंगे |हर बनारसी अपने को 'सरनाम ' (प्रसिद्ध ) समझता है |मुहल्ले का एक व्यक्ति समूचे मुहल्ले की जानकारी रखता है | उसका विश्वास है की मुहल्ले के डाकिये से मुख्यमंत्री तक उसके नाम से परिचित है | काशी में 'दसपुतरिया गली " महज आठ -दस मकानों का एक मुहल्ला है ,पर वहा के रहने वाले को 'दसपुतरिया 'गली' के नाम पर पत्र मिल जाते है | इस प्रकार छोटी -छोटी गलिया यहा काफी प्रसिद्ध है | नगरपालिका भले ही नेताओं के नाम पर गलियों का नामकरण करे ,पर बनारस वाले अपनी पुरानी परम्परा नही बदल सकते |
इस गलियों में गर्मी के दिनों में शिमला का मजा ,जाड़े में पूरी का मजा ,और बरसात में पहाड़ी स्थानों का मजा अनायास मिलता रहता है | यही वजह है की बनारसी लोग पहाड़ी स्थानों में कभी नही जाते  |रहा गंदगी का प्रश्न ,सो कहा नही है | जिस गली में इमली के बीज बिखरे ही समझ ले इस गली में मद्रासी रहते है | जिस गली में मछली महकती हो ,वह बंगालियों का मुहल्ला है  |जिस गली में हड्डी लुढकी हो ,वह मुसलमान दोस्तों का मुहल्ला है | इस प्रकार हर गली में प्रत्येक वर्ग का साइन बोर्ड लटकता रहता है | अध्ययन करने वालो को इन साइनबोर्डो से बड़ी हेल्प मिलती है | मदनपुरा ,पांडये हवेली ,सोनारपुरा आदि मुहल्लों में सादिया बनती है और रानी कुआ ,कुंज्गली आदि मुहल्लों में बिकती है | गोविन्दपुरा ,राजा दरवाजा ,कोदई की चाकी में सोने चाँदी का व्यवसाय होता है  |कचौड़ी गली की कचौड़ी ,ठठेरी बाजार के पीतल के बर्तन ,विश्वनाथ गली की चुदिया ,लकड़ी के खिलौने भारत प्रसिद्ध है |मिश्रपोखरा स्थित जर्दे के कारखाने ,लोह्तिया और ख़ास में लोहे ,लकड़ी का व्यवसाय होता है |अधिक दूर क्यों ,काशी में मंगलामुखियो का व्यवसाय भी गलियों में ही होता है |दालमंडी -छ्त्ताताले ,म्द्वादिः में आशिक लोग नित्य शाम को जुटा करते है |मतलब यह की बनारस की प्रसिद्धि जिन वस्तुओ के कारण है ,उन वस्तुओ का व्यवसाय गलियों में ही होता है |
-सुनील दत्ता 
आभार विश्वनाथ मुखर्जी "" बना रहे बनारस से ''

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

काशी का निरालापन

 बनारस -काशी

यदि आप आज भी बनारस की खूबियों से अपरचित है तो आइये आज आपका परिचय उससे करा दूँ | मुमकिन है आपने इस दृश्यों को देखा हो पर इस गरज से न देखा हो की यह सब भी बनारस की खूबियों में है | सुबहे-बनारस कि काफी दाद दी जाती है ,इसलिए जब कभी आप बनारस तशरीफ ले आवे तो इसका ध्यान रहे की सुबह हो; शाम या रात नही |
स्टेशन से बाहर आते ही आपको दर्जनों जलपान -गृह दिखाई देंगे |    इन दुकानों में बनी सामग्री की सोधी
 महक से आपका दिल -दिमाग तर हो जाएगा |   यहा से आप शहर की ओर ठीक नाक की सीध में चले |  दाहिने -बाए देखने की जरूरत नही है |
स्टेशन से एक फर्लांग आगे काशी विद्यापीठ है |   यह वह संस्था है जहा के छात्र या तो नेता बनते है अथवा शासक | काशी विद्यापीठ अथवा नेता जन्मदाता पीठ  |इसी के पीछे काशी का प्रसिद्ध कब्रगाह फातमान है जहा इतिहास के प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध व्यक्ति चिर -निद्रा में सोये हुए है |  पास ही भारत में अपने ढंग का अकेला मंदिर 'भारतमाता का मन्दिर 'है |इसके निर्माता है स्व. दानवीर बाबू शिवप्रसाद गुप्त |  मंदिर के बगल में भगवानदास स्वाध्यायपीठ है | पुस्कालय के ठीक सामने च्न्दुवा   की प्रसिद्ध सट्टी है |  कुछ दूर आगे शरणार्थी बस्ती ,बर्मियोका एक बौद्ध  मंदिर तथा बनारस में खेल -कूद के लिए बनाया गया स्टेडियम है |
कुछ दूर आगे ईसाइयो  का गिरजाघर है |   प्राचीन काल में यहा डाकू रहते थे जो राह चलते व्यक्तियों को कत्ल करके कुए में छोड़ देते थे |  काशी का प्रसिद्ध 'मौत का कुआ 'यही था | यही से दो रास्ते पूर्व और पश्चिम दिशा की ओर गये है |   पश्चिम वाला रास्ता वार -बनिता की नगरी की ओर तथा पूर्व वाला शहर की ओर गया है | पूर्व वाले रास्ते में बनारस का प्रसिद्ध 'आशिक -माशूक की कब्रगाह ' है |  बनारसी प्रेमियों को यही से प्रेरणा और स्फूर्ति प्राप्त होती है |यह वज ऐतिहासिक  स्थान है ,जिसके दर्शन के बिना परें 'अनकनफर्म्ड 'रहता है |इस स्थान पर कैथ के अनेक वृक्ष है |किवदन्ती है ,प्रत्येक वृक्ष से दो कैथ प्रतिपदा के दिन नियमित नीचे गिरते है |
थोड़ी दूर पर औरंगजेब के शासन काल में निर्मित सराय ,पान दरीबा है | औरंगाबाद दर्शनीय मुहल्ला है |   कहा जाता है -'काशी बसकर क्या किया ,जब घर औरंगाबाद |'
मुहल्ला सिगरा के आगे भारत -विख्यात महाप्योध्याय पंडित गोपी नाथ कविराज का  मकान है | ठीक इसके पीछे का स्थान 'छोटी गैबी ' कहलाता है ,जहा गुरुलोग रात बारह बजे तक नहाते -निपटते है | पास ही रथयात्रा की प्रसिद्ध चौमुहानी है | यहा वर्ष में तीन दिन जन - समारोह होता है |  काशी की लोक कला के दर्शन सोरहिया  तथा रथयात्रा  के मेले में ही होते  है | लक्सा की अधिकाश रामलीला यही होती है |
पास ही विश्व विख्यात थिसोसोफिक्ल सोसायटी है   |यहा बनारस के बालक और बालिकाए शिक्षा प्राप्त करते है |  सोसायटी के दक्षिण भाग में वैधनाथ और बटुकभैरव का मंदिर है |  इसी मंदिर के समीप सेन्ट्रल हिन्दू -कालेज ,बड़ी गैवि आदि प्रसिद्ध स्थान है |
कालेज से कुछ दूर आगे खोजवा बाज़ार है ,जो नबाबो के खोजाओ के रहने के कारण मुहल्ला बन गया | आजकल अनाज की मंडी है | पास ही शहर को आलोकित तथा जलदान करने वाला 'बिजली घर 'और पानीकल ' है | थोड़ा ही आगे बढने पर अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त  अथितिशाला दिखाई देगी |  यहा संसार के ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ लोग आकर मेहमान नवाजी करते है |बनारस वालो  को अपनी इस कोठी पर नाज़ है जो संसार के महान पुरुषो को अपने यहा ठहराकर भारतीय संस्कृति का परिचय देती है |  यह भवन है -  महाराजकुमार विजयानगरंम यानी 'ईजा--- नगर 'की कोठी |
यहा से कुछ दूर पर दुर्गाकुण्ड है ,जहा राम की सेनाये ही नही बल्कि पास ही सेनापति महोदय का भी भवन है | दुर्गाकुण्ड का मंदिर रानी भवानी और वानर -  सेनापति संकटमोचन का मंदिर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित  हुए है | संकटमोचन के मंदिर में नित्य सुन्दरकाण्ड और हनुमानचालीसा के पाठ करने वाले भक्तो की भीड़ लगी रहती है |खासकर इम्तहान के समय छात्रो की भीड़ बढ़ जाती है |  यूनिवर्सिटी के छात्रो  का विश्वास है 'संकटमोचन बाबा '  बिना पढ़े -लिखे ही परीक्षा की वैतरणी पार करा जाते है    |छात्र -छात्राए परस्पर प्रेम के स्थायित्व की शपथ भी यही लेते है | यहा दलवेसन बहुत गुणकारी ,प्रभावशाली होता है |
यह है लंका; रावण वाली नही - ----  काशी की अपनी निजी |  आगे भारत प्रसिद्ध शिक्षा -    संस्था विश्वविद्यालय है |   पास ही नगवा घाट है -   -  जहा बाबू शिवप्रसाद गुप्त की कोठी है |  यही एक बार स्वामी करपात्री जी ने यज्ञ करवाया था |
यह है ,पुष्कर तीर्थ |  इसके आगे अस्सी और कुरुक्षेत्र तालाब है |   सूर्य ग्रहण के दिन तालाब में धर्मपरायण व्यक्ति स्नान के नाम पर कीच स्नान करते है |   आगे भदैनी है और बगल में तुलसी घाट ,जहा तुलसीदास की खडाऊ और उनके द्वारा स्थापित हनुमान जी का मंदिर दर्शनीय है |  बनारस का यह मुहल्ला साहित्यकारो का भी एक गढ़ है |   सोलहवी शताब्दी में यह स्थान काशी का बाहरी अंचल माना जाता था |
यह है हरिश्चन्द्र घाट |  कुछ लोग इसे काशी का प्राचीन श्मशान मानते है ,पर यह बात गलत है |  पहले यहा ड़ोमो  की बस्ती थी | डोम लोग महाश्मशान में अपने परिवार की लाश नही जला पाते थे | यह लोग अपने को राजा हरिश्चन्द्र के वंशज मानते थे इसीलिए यह प्रचारित होता रहा की यही काशी का प्राचीन श्मशान है जहा राजा हरिश्चन्द्र श्मशान के रक्षक बने रहे |
हरिश्चन्द्र घाट के आगे काशी की सबसे खड़ी सीढ़ी वाला घाट केदारघाट है |  यहा का घंटा सभी मंदिर के घंटो से तेज आवाज में गूजता है | यहा से कुछ दूर पर तिलभांडेश्वर महादेव का मंदिर है | कहा जाता है की ये महादेव जी साल में तिल बराबर वजन में बढ़ते है | पता नही ,इसके पूर्व इन्हें कभी तौला गया था या नही ,वरना ये कितने प्राचीन है ,इसका पता पुरातत्व वाले बता देते |
यह है मदनपुरा |   संभवत: प्राचीनकाल में यही मदन का दहन  हुआ था | बनारसी साडियों  के विश्वविख्यात कलाकार इसी मुहल्ले में रहते है |
अब हम गोदौलिया आ गये |  प्राचीन काल में यहा गोदावरी नदी बहती थी |  गोदावरी तीर्थ स्थान के उपर आजकल मारवाड़ी अस्पताल स्थापित है | यही से एक रास्ता दशाश्वमेध घाट की ओर गया है |   आगे बड़ा बाज़ार है ,बड़े -बड़े होटल और शर्बत की दुकाने है | यहा काशी की ठढई सादी  और विजया सहित मिलती है | शाम के समय अधिकाश बुद्धिजीवी का अड्डा यहा जमता है ,जहा साहित्य -चर्चा  से लेकर परचर्चा   तक होती है | यही से उपन्यास लिखने के फार्मूले ,कहानी लिखने के प्लाट ,कविता लिखने की प्रेरणा और आलोचना लिखने का मसाला मिलता है | न जाने कितने लोगो का यहा मुड बनता और बिगड़ता है | साहित्य में इन होटलों की देन महत्त्वपूर्ण है |
यह रहा गिरजाघर ,जहा ईसाई   धर्म का प्रचार खुलेआम होता है | सुनने वालो से अधिक भाषण देने वाले दिखाई देते है | पास ही बनारस की सबसे बड़ी 'सोमरस की मंडी  ' यानी ताड़ीखाना है | कुछ दूर आगे 'नयी सडक 'मुहल्ला है | बनारस में अब तक जितने दंगे हुए है सभी का सूत्रपात इसी मुहल्ले से हुआ है | बगल में शेख सलीम  का फाटक है जिसके बारे में इतिहासकार और पुरातत्वविदों में मतभेद है |  एक का कहना है की अकबर -  --- पुत्र सलीम जब काशी आया था तब उसने इसे बनवाया था |  दूसरे का कहना है की शेख सलीम चिश्ती के नाम पर अकबर ने यहा फाटक बनवाया था   |बात चाहे जो हो यह स्थान है ऐतिहासिक  ; इसे सभी मानते है | यहा भामाशाह का सुरमा मिलता है |  पांच पैसे में सारे जीवन का रहस्य बताया जाता है |
यहा अधिकतर काबुल के सेठ रहते है जो बिना जमानत लिए .रहन  रखे ,सिर्फ शक्ल  देखकर एक आने सूद पर मुक्त हस्त कर्ज़ देकर जनता जनार्दन की सेवा करते है | पास ही एक बड़ा मैदान है जिसे 'विक्टोरिया पार्क 'अथवा 'बेनिया बाग़ ' कह्ते है  |  नाम तो इसका बाग़ है पर इसके एक भाग में अस्पताल,दूसरे में चेतसिंह की मूर्ति और बचा -खुचा भाग नेताओं के प्रवचन तथा नुमाइश के लिए रिजर्व रखा गया है |  |बेनिया बाग़ के आगे चेतगंज है | कहा जाता है की यह मुहल्ला राजा चेतसिंह के नाम पर बसाया गया है | वारेन हेस्टिंग तथा चेत सिंह के सैनिको में यही युद्ध हुआ था | इस मुहल्ले की नक्कटैया की ख्याति सम्पूर्ण भारत में है  |कुछ दूर आगे लालकोठी में नगरपालिका और हथुआ कोठी में भूतपूर्व अन्नदाता  वर्तमान सीमेंट -लोहादाता रहते है | यह है लहुरावीर की चौमुआनी | किसी जमाने में यहा भूत रहते थे ,अब आदम की औलाद रहने लगी है |  इन स्थानों का काशी में अपना निजी महत्त्व है | काशी में प्रत्येक वीर के नाम पर एक -एक मुहल्ला बस गया है | जैसे डयोढ़ीयावीर ,भोजुवीर ,और लहुरावीर आदि |
इस चौमुआनी के उत्तर वाली सडक कचहरी ,पश्चिम वाली स्टेशन ,दक्षिण वाली गिरजाघर और पूरब वाली राजघाट की ओर गया है | राजघाट की ओर जाने वाली सडक की ओर आगे बढने पर घोड़ा अस्पताल (पशु अस्पताल ) कबीर मठ  और शिवप्रसाद गुप्त औषधालय भी दिखाई देंगे | अस्पताल के सामने बनारस का सबसे बड़ा किराना बाज़ार है | जहा जाते ही छीक  की बीमारी  शुरू हो जाती है |  अस्पताल के बगल में राधा स्वामी का मंदिर है जहा वारेन हेस्टिंग आकर टिका था |  पास ही 'आज ' अखबार का दफ्तर ,लोहे -लकड़ी की मंडी  लोहटिया  और नखास है | नखास के पास बड़े गणेश जी का मंदिर है | यहा गणेश चौथ के दिन मेला लगता है | इस मुहल्ले के पास ही हरिश्चन्द्र कालेज और दाराशुकोह के नाम पर बसा हुआ मुहल्ला दारानगर है |
यह है , मैदागिन |  काशी के प्रमुख चौमुहानी में अन्यतम | प्राचीन काल में इस स्थान को मन्दाकिनी तीर्थ कहा जाता था | अब उसकी जगह कम्पनी बाग़ और टाउनहाल बन गया है |इस टाउनहाल में पहले अँधेरी कचहरी थी | अब यहा कचहरी है ,पर वह अपना प्रभाव छोड़ गयी है  |  फलस्वरूप टाउनहाल बक्चो का मुरब्बा बन गया है | जिस प्रकार आजतक लंगड़ी भिन्न  का रहस्य (छोटे ,मंझले और बड़े कोष्ठ का रहस्य ) नही समझ सका ,ठीक उसी प्रकार टाउनहाल क्या है समझ नही सका | मुमकिन है आप भी न समझ सके | इस स्थान से कुछ आगे भारत प्रसिद्ध संस्था 'काशी नागरी प्रचारणी सभा 'है |  बाबा विश्वनाथ के कोतवाल का भवन और कोतवाली थाना का घनिष्ठ सम्बन्ध यही है | बनारस की सबसे बड़ी अनाज की मंडी  विश्वेश्वरगंज भी यही है |
इस मुहल्ले के बारे में कुछ लोगो का मत है की प्राचीन काल में काशी का प्रमुख बाज़ार था |   यही पर विश्वनाथ जी का मंदिर था जिसे मुसलमानों ने तोड़ दिया | सम्भवत:इसीलिए इस मुहल्ले का नाम विश्वेश्वरगंज है | प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन से मालूम होता है की तुगलक काल के पूर्व शिवलिंग का नाम देवदेव स्वामी और अविमुक्तेश्वर था |  विश्वनाथ नाम बारहवी शताब्दी के बाद प्रचलित हुआ है  |पास ही भीतरी महाल में गोपाल जी का मंदिर और बिंदुमाधव का धरोहरा है | यही एक मकान में छिपकर गोस्वामी तुलसीदास वाल्मीकि रामायण को मौलिक रूप दे रहे थे |  विश्वेश्वरगंज से एक सडक अलईपूर मुहल्ले की ओर गयी है | यहा एक मुहल्ला आदमपुरा है ,पता नही बाबा आदम से इसका कोई सम्बन्ध है या नही | कुछ दूर आगे मछोदरी पार्क है जहा राजा बलदेवदास द्वारा निर्मित अस्पताल और घंटाघर है | राजा साहब दान देने में जितना सक्रिय रहे ,उतना ही सक्रिय घंटा टगवाने   में रहे | बनारस में उन्होंने कई जगह घंटा टगवाया है | घंटा टगवाने का क्या महत्व है ,इसका कोई उल्लेख्य काशी खंड में नही है पर सुना गया है की आपने लन्दन में भी घंटाघर बनवाया है | ज्ञातव्य रहे की बनारस में घड़ीघर  को जहा घंटे की आवाज़ से समय की सुचना मिलती है ,घंटाघर कहते है | मछोदरी बाग़ प्राचीन में मत्स्योदरी तीर्थ कहलाता था | आगे राजघाट है | यह स्थान शहर का अंतिम भाग है | इस भूभाग का बनारस के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है |
प्राचीनकाल में यह अनेक राजाओं की आवास भूमि रही | वे सब गंगा की गोद में चले गये | अब यहा केवल खंडहर रह गये है जिसे सरकार खुदवाकर कुछ पुरातत्वविदों की कचूमर निकालना चाहती है | इससे कुछ लोगो का चंडूखाने की दून  हाकने का मौक़ा मिलेगा |  अब हमें पुन:शहर की ओर मुड़ना है और शहर का प्रमुख भाग देखना है | इसीलिए अब पुन:हम मैदागिन के पास आते और यही से दक्षिण की ओर बढ़ते है | मैदागिन से कुछ दूर आगे बढने पर कर्णघंटा नामक स्थान है | कहा जाता है ,यहा का मंदिर गांगेय के पुत्र यशकर्ण ने बनवाया था | इतिहासकारों की बहुत -सी अटकले पच्चुवालीबाते इसलिए स्वीकार करनी पड़ती है की यह सब घटनाए जब हुई तब हम बनारस में नही थे | यहा से कुछ दूर आगे बाबा विश्वनाथ के थर्ड डिप्टी सुपरिटेंड आफ पुलिस आसभैरव रहते है  |काशी के प्रमुख उद्योग धंधो की सामग्री इस इलाके में मिलती है | मसलन लकड़ी के विभिन्न सामान ,पीतल के बर्तन ,जरी और सोने -चाँदी के जेवरात इत्यादि | इसी क्षेत्र में एक जगह कन्नौज ,जौनपुर ---  गाजीपुर का  इलाका बस गया है | दूसरी ओर बनारस का प्रमुख -व्यवसाय बनारसी सादियो का रोजगार होता है |  पुस्तक व्यवसायी ,समाचार -पत्र विक्रेता मंग्लामुखियो का हाट और फल्वालो की दुकाने इसी क्षेत्र में है |
कविराज कालिपद दे का आश्चर्य मलहम जो 101 बीमारियों में फायदा पहुचाता है -- आवाज लगाते हुए बगल में टीन का डब्बा लिए बंगाली बाबू टहलते है | आँखों में चश्मा पहने और हाथ में सिर्फ एक चश्मा लिए -- '' एक चश्मा '' की आवाज देते हुए बड़े मिया कुछ लोगो की आँखे पढ़ते नजर आते है |
जल -- जीरे का पानी , आम का पन्ना बेचने वालो की गाडी , गडेरी मेरी अव्वल पैसा लेना डब्बल , दिया सलइया पैसे में , सुइया चार मुनाफे में आदि सामान बिकता है ||
कुछ दुकानदार यहाँ पर हर माल 5 रूपये में बेचते है कयुनकि कम्पनी का माल वे लुटा रहे है | अब आपको गरज हो तो खरीदिये | गंजी भी पांच रूपये में पेन भी पांच रूपये में मिलती है |
एक ओर से एक बंद कनस्तर लोए '' गरेम' है जी '' की आवाज आती है जब तक आप उनसे सामान न खरीदे तब तक आप यह नही समझ पाइयेगा की क्या गरम है --वातावरण , मौसम , वे स्वंय या बंद कनस्तर का सामान | आज से तीन वर्ष पूर्व सडक पर '' केसरिया तर हव राजा '' की आवाज लगाता हुआ एक आदमी झूमता हुआ नजर आत़ा था | उसकी गैरमौजूदगी आज के बच्चो को खलती है | नरम --गरम , नरम- गरम  की आवाज लगाता हुआ एक आदमी बड़ी तेजी से लाल साइनबोर्ड पहने आपकी बगल से गुजर जाएगा |
यह है परमानेंट हरे -- राम हरे -- राम की फैक्ट्री जहा लाउडिसपीकर से शाम के समय भक्ति प्रदर्शन होता है | सामने बीवी का रोजा की मस्जिद के बारे में कहा जाता है की पहले यहाँ विश्वनाथ मन्दिर था जिसे कुतुबद्दीन ऐबक ने तोड़ा था | नीचे ज्ञानवापी की प्रसिद्ध मस्जिद है जिसका औरंगजेब ने निर्माण कराया था |
यह है सत्यनारायण मन्दिर जहा श्रावण में भगवान झूला झूलते है | उनका श्रृंगार देखने के काबिल होता है | आगे बॉसफाटक  है | बनारस के मुहल्लों का नाम देखकर अनुमान किया जाता है की प्राचीन काल में यह नगर अरब देशो की भांति बंद नगरी थी जिसके चारो तरफ फाटक थे |  मसलन हाथी फाटक , बॉस फाटक , शेख सलीमका फाटक , रंगिलादास का फाटक और सुखलाल साहू आदि का फाटक  अब हम गोदौलिया पर आ गये | इस प्रकार सारा शहर घर बैठे देख लिया | क्या जरूरत की आप बनारस आये और दो नए प्रवेश कर दे | हां यदि गंगा -- स्नान , विश्वनाथ -- दर्शन अथवा शहर देखने के काफी शौक है तो हमे एतराज नही | अगर और निरालापन देखना हो तो यहाँ के धनुषाकार घाट , धरोहर का एक खम्भा , यहाँ की गलिया और यहाँ के मेले देखे | बस , सारा बनारस आपकी नजरो से गुजर जाएगा | 
-सुनील दत्ता
आभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक '' बना रहे बनारस से ''

बुधवार, 12 सितंबर 2012

बनारस : एक दिग्दर्शन



सिर्फ काशी नगरी ही तीन लोक से न्यारी नही है ,बल्कि यहा के लोग ,उनका रहन -सहन ,उनके आचार -विचार ,यहा तक की सरकारी -गैर सरकारी संस्थाए भी अपने ढंग की निराली है |उदाहरण के लिए बनारस नगरपालिका को ही ले लीजिये |इस नगरी का निरालापन कोई मुफ्त में न देख जाए ,इस गरज से वह प्रत्येक यात्री पीछे एक आना प्रवेश -कर लेती है |जहा तक प्रवेश -कर का सवाल है ,हमे एतराज नही है |लेकिन पालिका 'निकासी -कर 'भी लेती है \कहने का मतलब यह की अगर कोई बाहरी आदमी बनारस आये और आकर वापस चला जाए तो उसे दो आने की चपत पड़ जाती है |शायद आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की घर के लोग अर्थात ख़ास बनारस के बाशिंदे भी इस कर से मुक्त नही है |चूँकि यह कर रेलवे के माध्यम से लिया जाता है >इसलिए हम -आप नही जान पाते |काशी जैसी नगरी के लिए क्या यह नियम निरालेपन का द्योतक नही है ?
सफाई पसंद शहर
इस कर  ' की बाबत कहा जाता है की यह इसलिए लिया जाता है की तीर्थ स्थान होने की वजह से यहा गंदगी काफी होती है |लिहाजा सफाई खर्च (बनाम जर्माना )'तीर्थयात्री 'कर के रूप में लिया जाता है |बनारस कितना साफ़ -सुधरा शहर है ,इसका नमूना गली -सड़के तो पेश करती ही है अखबारों के 'सम्पादक के नाम पत्र ' वाले कालम भी प्रसंशा-शब्दों से रंगे रहते है |माननीय पंडित नेहरु तथा स्वच्छ काशी आन्दोलन के जन्मदाता आचार्य विनोवा भावे इस बात के प्रत्यक्ष गवाह है |
खुदा आबाद रखे देश के मंत्रियों को जो गाहे -बगाहे कनछेदन ,मुंडन ,शादी और उदघाटन के सिलसिले में बनारस चले आते है जिससे कुछ सफाई हो जाती है ; नालियों में पानी और छुने का छिडकाव हो जाता है |
निराली भूमि
अगर आप कभी काशी नही आये है तो आपको लिखकर सारी बाते समझाई नही जा सकती |अगर आये है और इसका निरालापन नही देखा है तो यह आपके लिए दुर्भाग्य की बात है |शायद आप यह सवाल करे की आखिर बनारस में इतना क्या निरालापन है जिसके लिए ढिढोरा पीटा जा रहा है ,तो अर्ज़ है ---
विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है की पृथ्वी शून्य में स्थित है और वह सूर्य के चारो तरफ चक्कर काटती है |लेकिन इस तथ्य को भारत वासी नही मानते |उनका विज्ञान यह कहता है की पृथ्वी 'शेषनाग 'के फेन 'पर स्थित है और स्वं सूर्य उसके चारो ओर चक्कर काटता है |हमने कभी पश्चिम ,उत्तर या दक्षिण से सूरज को उगते नही देखा |यह सब विज्ञान की बाते चंडूखाने की गप्प है |एक बेपेदी का लोटा जब बिना सहारे के इधर --उधर लुढकता है तब पृथ्वी जैसी भारी गोलाकार वस्तु (बकौल पश्चिमी विज्ञान )बिना किसी लाग (सहारे ) के कैसे स्थिर रह सकती है ?बताइए ,है कोई वैज्ञानिक -खगोलवेत्ता जो उत्तर देने का साहस करे !
बनारस वालो का दृढ विश्वास है -पृथ्वी शेषनाग के फन  पर स्थित है पर उनका बनारस भगवान  शंकर के त्रिशूल पर है |शेषनाग से उनका कोई मतलब नही |इसीलिए काशी को तीन लोक से न्यारी कहा गया है |यहा गंगा उत्तरवाहिनी  है ,यहा कभी भूकम्प नही आता  |कभी -कभी शंकर भगवान जब आराम करने के लिए त्रिशूल पर पथ टेक देते है तब यहा की जमीन कुछ हिल भर जाती है |अधिक दूर क्यों ,काशी शंकर के त्रिशूल पर है या नही ,इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यहा की भूमि की बनावट है |
अब आप एक त्रिशूल की कल्पना करे जिसमे तीन फल होते है |बीचवाला फल सबसे उंचा और दोनों ओर ढलुवा होता है |बाकी दोनों फल ऊपरी दिशा में मुड़े होते है |बीचवाला फल वर्तमान चौक -ज्ञानवापी है |प्राचीन काल में काशी का महाश्मशान यही था |वर्तमान विश्वनाथ मंदिर के निकट से गंगा बहती थी |शंकर का सबसे प्रिय स्थान श्मशान होने की वजह से उसे शीर्ष स्थान दिया गया है |आज भी आधी रात के बाद शंकर के 'गण ' इस स्थान के प्रसिद्ध बाज़ार कचौड़ी गली में मिठाई खरीदने आते है |चौक के दोनों ओर भयंकर ढाल है |यह ढाल कितना भयंकर है इसका अंदाज रिक्शे की सवारी में अनुभव हो जाता है | दक्षिण का ढाल जगमबाड़ी में और उत्तर का ढाल मैदागिन में जाकर समाप्त होता है |फिर दूसरी चढाई वाला ढाल मछोदरी से राजघाट और उधर जगमबाड़ी से भदैनी तक है |इसके बाद दोनों तरह उतराई है |काशी के इस भूगोल को पढने के पश्चात अब आपको भी मानना पड़ेगा की काशी शंकर के त्रिशूल पर अवश्य स्थित है |इसमें संदेह करने की कोई गुंजाइश नही है |
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जिस प्रकार हिन्दु धर्म कितना प्राचीन है पता नही चलता ठीक उसी प्रकार काशी कितनी प्राचीन है ,पता नही लग सका |
यद्धपि बनारस की खुदाई से प्राप्त अनेक मोहरे ,ईट,पथ्थर ,हुक्का ,चिलम और सुराही के टुकडो का पोस्मार्टम हो चुका है फिर भी सही बात अभी तक प्रकाश में नही आई है |जन -साधारण में अवश्य काशी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है |कहा जाता है कि सृष्टि कि उत्पत्ति के पूर्व काशी को शंकर भगवान अपने त्रिशूल पर लादे घूमते -फिरते थे |जब सृष्टि कि उत्पत्ति हो गयी तब इसे त्रिशूल से उतारकर पृथ्वी के मध्य में रख दिया गया |
यह सृष्टि कितनी प्राचीन है ,इस सम्बन्ध में उतना ही बड़ा मतभेद है जितना यूरोप और एशिया में या पूर्वी गोलार्द्ध में है |सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बार प्रसिद्ध पर्यटक बर्नियर को कौतूहल हुआ था |अपनी इस शंका को उसने काशी के तत्कालीन पंडितो पर प्रगट की,नतीजा यह हुआ कि उन लोगो ने अलजबरा कि भांति इतना बड़ा सवाल लगाना शुरू किया जिसे देखकर बर्नियर कि बुद्धि गोल हो गयी |फलस्वरूप उसका हल बिना जाने उसने यह स्वीकार कर लिया कि काशी बहुत प्राचीन है |इसका हिसाब सहज नही |अगर हजरत कुछ दिन यंहा और ठहर जाते टी सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में सिर्फ उन्हें ही नही ,बल्कि उनकी डायरी से सारे संसार को यह बात मालूम हो जाती |चूँकि पृथ्वी के जन्म के पूर्व काशी कि उत्पत्ति हो गयी थी इसलिए इसे 'अपुनभर्वभूमि ' कहा गया है |एक अर्से तक शंकर के त्रिशूल पर चक्कर काटने के कारण 'रुद्रावास 'कहा गया |प्राचीन काल में यंहा के जंगलो में भी मंगल था ,इसीलिए इसे 'आनंदवन 'और 'आनन्द-कानन ' कहा गया |इन्ही जंगलो में ऋषि -मुनि मौज -पानी लेते थे ,इसीलिए इसे 'तप: स्थली 'कहा गया |    तपस्वियों की अधिकता के कारण यंहा की भूमि को 'अविमुक्त -क्षेत्र 'की मान्यता मिली |
इसका नतीजा यह हुआ की काफी तादाद में लोग यंहा आने लगे |उनके मरने पर उनके लिए एक बड़ा श्मशान बनाया गया |  कहने का मतलब काशी का 'नाम 'महाश्मशान ' भी हो गया |
प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह पता चलता है कि काश्य नामक राजा ने काशी नगरी बसाई :अर्थात इसके पूर्व काशी नगरी का अस्तित्व नही था |जब काश्य के पूर्व यह नगर बसा नही था तब यह निश्चित है कि उन दिनों मनु कि सन्ताने नही रहती थी ,बल्कि शंकर के गण ही रहते थे |हमे प्रस्तरयुग ,ताम्रयुग ,और लौहयुग कि बातो का पता है |हमारे पूर्वज उत्तरी ध्रुव से आये या मध्य एशिया से आये ,इसका समाधान भी हो चुका है |पर काश्य के पूर्व काशी कहा थी ,पता नही लग सका |
काशी की स्थापना
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काश्य के पूर्वज राजा थे इसीलिए उन्हें राजा कहा गया है अथवा काशी नगरी बसाने के कारण उन्हें राजा कहा गया है ,यह बात विवादास्पद है |ऐसा लगता है की इन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नही मिला ,फलस्वरूप ये नाराज होकर जंगल में चले गये |वहा जंगल आदि साफ़ कर एक फर्स्ट क्लास का बंगला बनवाकर रहने लगे |धीरे -धीरे खेती -बारी भी शुरू की |लेकिन इतना करने पर भी स्थान उदास ही रहा |नतीजा यह हुआ की कुछ और मकान बनवाये और उन्हें किराए पर दे दिया |इस प्रकार पहले -पहल मनु की संतानों की आबादी यहाँ बस गयी |आजकल जैसे मालवीय नगर ,लाला लाजपत नगर आदि बस रहे है ठीक उसी प्रकार काशी की स्थापना हो गयी |
ऐसा अनुमान किया जाता है की उन दिनों काशी की भूमि किसी राजा की अमलदारी में नही रही वरना काश्य को भूमि का पत्ता लिखवाना पड़ता ,मालगुजारी देनी पड़ती और लगान भी वसूल करते |चूँकि इस नगरी को आबाद करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त हुआ था ,इसीलिए लोगो ने समझदारी से काम लेकर इसे काशी नगरी कहना शुरू किया |आगे चलकर इनके प्रपौत्र ने इसे अपनी राजधानी बनाया कहने का मतलब परपोते तक आते -आते काशी नगरी राज्य बन गयी थी और उस फर्स्ट क्लास के बंगले को महल कहा जाने लगा था |इन्ही काश्य राजा के वंशधर थे -दिवोदास |सिर्फ दिवोदास ही नही ,महाराज दिवोदास |कहा जाता है की एक बार इन पर हैहय वंश वाले चढ़  आये थे |लड़ाई के मैदान से रफूचक्कर होकर हजरत काशी से भाग गये |  भागते -भागते गंगा -गोमती के संगम पर जाकर ठहरे |अगर वहा गोमती ने इनका रास्ता न रोका होता तो और भी आगे बढ़ जाते |जब उन्होंने यह अनुभव किया की अब पीछा करने वाले नही आ रहे है तब वे कुछ देर के लिए वही आराम करने लगे |जगह निछ्द्द्म थी |बनारसवाले हमेशा से निछ्द्द्म जगह जरा अधिक पसंद करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने वही डेरा डाल दिया |कहने का मतलब वही एक नयी काशी बसा डाली | कुछ दिनों तक चवनप्रास का सेवन करते रहे ,दंड पेलते रहे और भांग छानते रहे |जब उनमे इतनी ताकत आ गयी की हैहय वंश वालो  से मोर्चा ले सके ,तब सीधे पुरानी काशी पर चढ़ आये और बात की बात में उसे ले लिया |इस प्रकार फिर काशीराज  बन बैठे |हैहय वालो के कारण काशी की भूमि अपवित्र हो गयी थी ,उसे दस अश्वमेघ यज्ञ से शुद्ध किया और शहर के चारो तरफ परकोटा बनवा दिया ताकि बाहरी शत्रु झटपट शहर पर कब्जा न कर सके |इसी सुरक्षा के कारण पूरे 500 वर्ष यानी 18 -20 पीढ़ी तक राज्य करने के पश्चात इना वंश शिवलोक वासी हो गया |
काशी से वाराणसी
इस पीढ़ी के पश्चात कुछ फुटकर राजा हुए |  उन लोगो ने कुछ कमाल नही दिखाया ,अर्थात न मंदिर बनवाए ,न स्तूप खड़े किए और न खम्भे गाड़े |फलस्वरूप ,उनकी ख़ास चर्चा नही हुई |कम -से -कम उन भले मानुषो को एक -एक साइनबोर्ड जरुर गाढ़ देना चाहिए था |   इससे इतिहासकारों को कुछ सुविधा होती |
ईसा पूर्व सातवी शताब्दी में ब्रम्हदत्त  वंशीय राजाओं का कुछ हालचाल ,बौद्ध -साहित्य में है ,जिनके बारे में बुद्ध भगवान ने बहुत कुछ कहा है ,लेकिन उनमे से किसी राजा का ओरिजनल नाम कही नही मिलता |
पता नही किस्मे यह मौलिक सूझ उत्पन्न हुई की उसने काशी नाम को सेकेण्ड हैण्ड समझकर इसका नाम वाराणसी कर दिया |  कुछ लोगो का मत है की वरुणा और अस्सी नदी के बीच उन दिनों काशी नगरी बसी हुई थी ,इसीलिए इन दोनों नदियों के नाम पर नगरी का नाम रख दिया गया ,ताकि भविष्य में कोई राजा अपने नाम का सदुपयोग इस नगरी के नाम पर न करे |इसमें संदेह नही की वह आदमी बहूदूरदर्शी था वरना इतिहासकारों को ,चिठ्ठीरसो को और बाहरी यात्रियों को बड़ी परेशानी होती |
लेकिन यह कहना की वरुणा और असी नदी के कारण इस नगरी का नाम वाराणसी रखा गया बिलकुल वाहियात है ,गलत है और अप्रमाणिक है | जब पद्रहवी शदाब्दी में यानी तुलसीदास जी के समय ,भदैनी का इलाका शहर का बाहरी क्षेत्र माना जाता था तब असी जैसे बाहरी क्षेत्र को वाराणसी में मान कैसे लिया गया ? दूसरे विद्वानों का मत है की असी नही ,नासी नामक एक नदी थी जो कालान्तर में सुख गयी ,इन दोनों नदियों के मध्य वाराणसी बसी हुई थी ,इसलिए इसका नाम वाराणसी रखा गया |यह बात कुछ हद तक काबिलेगौर है लिहाजा हम इसे तस्दीक कर लेते है |
भगवान बुद्ध के कारण काशी की ख्याति आधी दुनिया में फ़ैल गयी थी |   इसलिए पड़ोसी राज्य के राजा हमेशा इसे हडपना चाहते थे |  जिसे देखो वही लाठी लिए सर पर तैयार रहने लगा |नाग ,शुंग और कण्व वंश वाले  हमेशा एक दूसरे के माथे पर सेंगरी बजाते रहे |     इन लोगो की जघन्य कार्यवाही के प्रमाण -पत्र सारनाथ की खुदाई में प्राप्त हो चुके है |
ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रथम विदेशी आक्रामक बनारस आया |  यह था -कुषाण सम्राट कनिष्क |  लेकिन था बेचारा भला आदमी |  उसने पड़ोसियों के बमचख में फायदा जरुर उठाया    पर बनारस के बहरी  अलंग सारनाथ को खूब सवारा भी |  कनिष्क के पश्चात भारशिवो और गुप्त सम्राटो का रोब एक अरसे तक बनारस वालो पर ग़ालिब होता रहा |  इस बीच इतने उपद्रव बनारस को लेकर हुए की इतिहास के अनेक पृष्ठ इनके काले कारनामो से भर गये है |मौखरी वंश वाले भी मणिकर्णिका घाट पर नहाने आये तो यहाँ राजा बन बैठे |  इसी प्रकार हर्षवर्द्धन के अन्तर में बौद्ध धर्म के प्रति प्रेम उमड़ा तो उन्होंने भी बनारस को धर दबाया |  आठवी शताब्दी में इधर के इलाके में कोई तगड़ा राजा नही था ,इसीलिए बंगाल से लपके हुए पाल नृपति चले आये |  लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रतिहारो ने उन्हें खदेड़ दिया और स्वंय 150 वर्ष के लिए यहा जम गये |  कन्नौज से इत्र  की दूकान लेकर गाह्डवाले भी एक बार आये थे | मध्य प्रदेश से दुधिया छानने के लिए कलचुरीवाले भी आये थे |कलचुरियो का एक साइनबोर्ड  कर्दमेश्वर मंदिर में है |  यह मंदिर यंहा 'कनवा 'ग्राम में है |   यही बनारस का सबसे पुराना मंदिर है |    इसके अलावा जितने मंदिर है सब तीन सौ वर्ष के भीतर बने हुए है |
वाराणसी से बनारस

अब तक विदेशी आक्रमक के रूप में वाराणसी में कनिष्क  आया था | जिस समय कलचुरी वंश के राजा गांगेय कुम्भ नहाने प्रतिष्ठान गये हुए थे ,ठीक उसी समय नियालतगिन चुपके से आया और यहा से कुछ रकम चुराकर भाग गया |  नियालतगिन के बाद जितने विदेशी आक्रमक आये उन सबकी अधिक कृपा मंदिरों पर ही हुई | लगता है इन लोगो ने इसके पूर्व इतना उंचा मकान नही देखा था |  देखते भी कैसे ?   सराय में ही अधिकतर ठरते थे जो एक मंजिल से ऊँची नही होती थी |  यहा के मंदिर उनके लिए आश्चर्य की वस्तु रहे | उनका ख्याल था की इतने बड़े महल में शहर के सबसे बड़े रईस रहते है ,इसलिए उन्हें गिराकर लूटना अपना कर्तव्य समझा |  नियालतगिन के बाद सबसे जबर्दस्त लुटेरा मुहम्मद गौरी सन 1914 ई. में बनारस आया |  उसकी मरम्मत पृथ्वीराज पांच -छ बार कर चुके थे ,पर जयचंद के कारण उसका शुभागमन बनारस में हुआ |  नतीजा यह हुआ की उस खानदान का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट गया |  सन 1300 ई ,में अलाउद्धीन खिलजी आया | उसके बाद उसका दामाद बाबर्कशाह आया ,जिसे 'काला पहाड़ ' भी कहा गया है |सन 1494 ई. में सिकन्दर लोदी साहब आये और बहुत कुछ लाद  ले गये |  जहागीर ,शाहजहा और औरंगजेब की कृपा  इस शहर पर हो चूकि है | फरुखासियर और ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद अभी ताजा है |  पता नही ,इन लोगो ने बनारस को लुटने का ठेका क्यों ले रखा था ?  लगता है ,उन्हें लुटने की यह प्रेरणा स्वनामधन्य लुटेरे महमूद गजनबी से प्राप्त हुई थी |  संभव है, उन दिनों बनारस में काफी मालदार लोग रहा करते थे अथवा ये लोग बहुत उत्पाती और खतरनाक रहे हो   |इसके अलावा यह संभव है की बनारस वाले इतने कमजोर रहे की जिसके में  आया वही दो धौल जमाता गया |  खैर कारण चाहे जो कुछ भी रहे हो बनारस को लुटा खूब गया है ,इसे धार्मिक  और इतिहास के पंडित दोनों ही मानते है | बनारस को लुटने की यह परम्परा फरुखसियर के शासनकाल तक बराबर चलती रही |इन आक्रमणों में कुछ लोग यहा बस गये |   उन्हें वाराणसी नाम श्रुतिकटु लगा ,फलस्वरूप वाराणसी नाम घिसते -घिसते बनारस बन गया |जिस प्रकार रामनगर को आज भी लोग नामनगर   कहते है |  मुगलकाल में इसका नाम बनारस ही रहा |

बनारस बनाम मुहम्मदाबाद
औरंगजेब जरा ओरिजनल टाइप शासक था |  सबसे अधिक कृपा उसकी इस नगर पर हुई |  उसे बनारस नाम बड़ा विचित्र लगा |  कारण बनारस में न तो कोई रस बनता था और न यहा के लोग रसिक रह गये थे |   औरंगजेब के शासनकाल में इसकी हालत अत्यंत खराब हो गयी थी |   फलस्वरूप उसने इसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया |
मुहम्मदाबाद से बनारस
मुगलिया सल्तनत भी 1857 के पहले उखड़ गयी |   नतीजा यह हुआ की सात समुन्द्र सत्तर नदी और सत्ताईस देश पार कर एक हकीम शाहजहा के शासनकाल में आया था ,उसके वंशधरो ने इस भूमि को लावारिस समझकर अपनी सम्पत्ति बना ली |   पहले कम्पनी आई ,फिर यहा की मालिकन रानी बनी |  रानी के बारे में कुछ रामायण प्रेमियों को कहते सुना गया है की वह पूर्व जन्म में त्रिजटा थी |  संभव है उनका विश्वास ठीक हो   |ऐसी हालत में यह मानना पडेगा की ये लोग पूर्व जन्म में लंका में रहते थे अथवा बजरंगबली की सेना में लेफ्ट -राईट करते रहे होंगे | गौरांग प्रभुओ की 'कृपा से ' हमने रेल ,हवाई जहाज ,स्टीमर ,मोटर ,साइकिल देखा |  डाक -तार ,कचहरी और जमीदारी के झगड़े देखे |  यहा से विदेशो में कच्चा माल भेजकर विदेशो से हजारो अपूर्व सुन्दरिया मंगवाकर अपनी नस्ल बदल डाली |
ये लोग जब बनारस आये तब इन्होने देखा --यहा के लोग बड़े अजीब हैं |  हर वक्त गहरे में छानते है ,गहरेबाजी करते है और बातचीत भी फराटे के साथ करते है |  कहने का मतलब हर वक्त रेस करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने इस शहर का नाम 'बेनारेस' रख दिया |
बनारस से पुन:वाराणसी
ब्राह्मणों को सावधान करने वाले आर्यों की आदि भूमि का पता लगानेवाले डाक्टर सम्पूर्णानन्द को यह टेढा नाम पसंद नही था |  बहुत दिनों से इसमें परिवर्तन करना चाहते थे पर मौक़ा नही मिल रहा था |लगे हाथ बुद्ध की 2500 वी. जयंती पर इसे वाराणसी कर दिया |  यद्धपि इस नाम पर काफी बमचख मची ,पर जिस प्रकार संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश बन गया ,उसी प्रकार अब बनारस से वाराणसी बनता जा रहा है |
भविष्य में क्या होगा ?
भविष्य में वाराणसी रहेगा या नही ,कौन जाने |  प्राचीनकाल की तरह पुन:वाराणसी नाम पर साफा -पानी होता रहे तो बनारस बन ही  जाएगा इसमें कोई संदेह नही | जिन्हें वाराणसी बुरा लगता हो उन्हें यह श्लोक याद रखना चाहिए ---------
ख़ाक भी जिस जमी का पारस है ,
शहर मशहूर यही बनारस है |
पांचवी शताब्दी में बनारस की लम्बाई आठ मील और चौड़ाई तीन मील के लगभग थी |  सातवी शताब्दी आते -आते नौ -साढे नौ मील लम्बाई और तीन -साढे तीन मील चौड़ाई हो गयी |
ग्यारहवी शताब्दी में ,न जाने क्यों इसका क्षेत्रफल पांच मील में हो गया | इसके बाद १1881 ई. में पूरा जिला एक हजार वर्ग मील में हो गया | अब तो वरुणा -असी की सीमा तोडकर यह आगे बढती जा रही है ; पता नही रबड़ की भाति   इसका घेरा कहा तक फ़ैल जाएगा | आज भी यह माना जाता है की गंगा के उस पार मरने वाला गधा योनी में जन्म लेते है ,जिसके चश्मदीद गवाह शरच्चन्द्र चटर्जी थे |  लेकिन अब उधर की सीमा को यानी मुगलसराय को भी शहर बनारस में कर लेने की योजना बन  रही है | अब हम मरने पर किस योनी में जन्म लेंगे ,इसका निर्णय शीघ्र होना चाहिए ,वरना इसके लिए आन्दोलन -सत्याग्रह छिड़ सकता है | बनारस में शहरी क्षेत्र उतना ही  माना जाता है जहा की नुक्कड़ पर उसके गण अर्थात चुंगी अधिकारी बैठकर आने -जाने वालो की गठरी टटोला करते है | इस प्रकार अब बनारस शीघ्र ही  मेयर के अधिकार में आ जाएगा |
                            
                                                      
-सुनील दत्ता
.साभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक  ""बना रहे बनारस से  ""
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