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गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

बंद आँखों में इसी कसर की तसवीर लिये...


आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शामो की लौ
जड़ दिए इस लिये बिजली के सितारे हम ने।
बन गया कसर तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामिर लिये।

अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पेयाम की थकान
बंद आँखों में इसी कसर की तसवीर लिये।
दिन पिघलता है इसी तरह सारों पर अब तक
रात आँखों में खटकती है स्याह तीर लिये।

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी।
सब उठो, मै भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

-कैफ़ी आजमी

बुधवार, 30 नवंबर 2011

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है


आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी।
सब उठो, मै भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

ये जमीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाखों से उतारे हम ने।
इन मकानों को खबर है ना मकीनो को खबर
उन दिनों की जो गुफाओं में गुजारे हम ने।

हाथ ढलते गए सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नए नक्श निखारे हम ने।
कि ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद,
बाम-ओ-दर और जरा, और सँवारा हम ने।

-कैफ़ी आजमी
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