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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

मी लार्ड! हमें न्याय चाहिए


किसी की अवमानना मकसद नहीं है। अगर होती है, तो ये उसके अपने कर्म हैं, जिसका जिम्मेदार किसी और को नहीं ठहराया जा सकता। सवाल उठते हैं, तो उठाना भी जरूरी है। लगभग चार महीने पहले वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट ने ‘रूल ऑफ लॉ इंडेक्स 2012’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें 97 देशों की सूची में भारत को 78वां स्थान मिला है। जबकि हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका को हमसे बेहतर बताया गया है जबकि वहां की स्थिति को भी हम अच्छी नहीं कह सकते। रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रशासनिक एजेंसियाँ बेहतर प्रदर्शन नहीं करती और न्यायिक प्रणाली की गति अत्यधिक धीमी है। इसकी मुख्य वजह अदालत की कार्यवाही में होने वाली देरी है। हाल में आई एक रिपोर्ट में जिक्र था कि देश की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमें 15 साल या उससे ज्यादा समय से लम्बित हैं।
संविधान बनाने वाले हमारे बुजुर्गों ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए संविधान में तीन स्तम्भ कायम किये जिसमें एक महत्वपूर्ण स्तम्भ ‘न्यायपालिका’ है। न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा स्तम्भ है, जिसकी ओर कहीं और से न्याय न मिलने पर जनता ताकती है। पुरानी कहावत है कि समय से न्याय न मिलने का मतलब न्याय देने से मुकरना है और आज देश की पूरी न्यायपालिका नीचे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक देश की जनता को न्याय देने से मुकर रही है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में शासक वर्गों को न्याय प्रणाली पर खर्च करना फिजूलखर्ची लग सकती है और अहलूवालिया एवं थरूर जैसे बददिमाग राजनीतिज्ञ न्यायपालिका को गैरजरूरी भी करार दे सकते हैं। ऐसे दौर में भारतीय न्यायपालिका की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं और उसे प्रोएक्टिव तरीके से न्याय मुहैया कराने की ओर बढ़ना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुसलमान युवकों को बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का जिक्र गाहे-बेगाहे हुआ करता है और इस मामले में गठित निमेष आयोग की रिपोर्ट में वर्णित कतिपय अन्य बातों का भी जिक्र होता है। ऐसे वाकये भी हैं जिसमें एक व्यक्ति को पिछले 10 सालों से विभिन्न जिलों में एक के बाद एक मुकदमें ठोके जा रहे हैं और वे लम्बे समय से जेलों में हैं। जिन मुकदमों में फैसला हो चुका है, उसमें वे बरी कर दिये गये हैं। चूंकि प्रदेश सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है, इसलिए उसके निष्कर्षों की अधिकारिक जानकारी नहीं हो सकती परन्तु बार-बार ऐसे नौजवानों की रिहाई की मांग उठती है और सत्तासीन सपा के नेतागण उस पर वायदे करते भी दिखाई देते हैं। अगर न्यायपालिका अपने कर्तव्यों को निभा रही होती तो क्या ऐसी नौबत नहीं आती?
दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्राविधानों के अनुसार किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने के 24 घंटों के अन्दर पुलिस को उसे न्यायालय के सामने पेश करना होता है। न्यायिक अभिरक्षा में किसी को जेल भेजने के 90 दिनों के अन्दर अदालत में आरोप पत्र न दाखिल होने पर उस व्यक्ति को जेल में नहीं रखा जा सकता। जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक/मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जेलों का मुआईना करने के लिए अधिकृत होते हैं। जेलों के मुआइनों का मतलब जेल अधीक्षक के सामने बैठ कर चाय-नाश्ता करना नहीं होता। यह देखना होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई व्यक्ति बिना आरोपपत्र के 90 दिनों से ज्यादा जेल में है अथवा कोई कैदी अपने अपराध के लिए नियत सजा से अधिक समय से बिना सजा पाये ही जेल में है। यह निरीक्षण अमूमन वार्षिक और मासिक आधार पर किये जाते हैं। इस व्यवस्था के विपरीत जब देश की विभिन्न जेलों में तमाम कैदी अनाधिकृत रूप से बन्द हों, तो इसे किसकी लापरवाही कहा जायेगा?
दिल्ली में एक बालक के साथ एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा किये यौन अनाचार को पांच साल से अधिक हो चुके हैं। मामला अभी लम्बित है। उस बेचारे को गाहे-बगाहे बिहार से दिल्ली गवाही देने के लिए आना पड़ता है और बिना किसी कार्यवाही के वह वापस लौट जाता है। उस बालक की पीड़ा को समझने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और कौन उसे इस पीड़ा से निजात दिला सकता है।
दिल्ली में ही एक 12 वर्ष की बालिका का पहले अपहरण और फिर उसके साथ बलात्कार होता है। उसे बेहद दर्दनाक स्थिति में पाया गया था। इस मामले को भी पांच साल हो रहे होंगे। मामला अदालत में अभी भी लम्बित है।
दिल्ली कोई अपवाद नहीं है। देश के हर कोने में इस तरह के मामले मिल जायेंगे। सत्र न्यायालयों में गवाही का काम शुरू होने पर लगातार चलता था। अब ऐसा देखा जा रहा है कि एक-एक या दो गवाहियां ही एक बार में होती हैं और फिर उसके बाद लम्बी तारीख लगा दी जाती है।
आज कल एक चुटकुला बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि अगर आप 40-45 साल की उम्र पार कर चुके हैं, कोई भी अपराध कीजिए, आपको इस जिन्दगी में सजा भुगतनी नहीं पड़ेगी। दस-बारह साल मुकदमा निचली अदालत में चलेगा, फिर 20 साल उच्च न्यायालय में और उसके बाद जब तक अपील की सुनवाई का वक्त सर्वोच्च न्यायालय में मुकर्रर होगा, आप गत हो चुके होंगे।
दीवानी मामलों में और श्रम मामलों में तो स्थिति और भी खराब है। अमूमन देखा जाता है कि गांवों में दबंग लोग गरीबों की परिसम्पत्तियों पर लाठी-गोली के बल पर कब्जा कर लेते हैं। पहली बात, अगर आप गरीब हैं तो मुकदमा का खर्च बर्दाश्त कर मुकदमा लड़ नहीं सकते और किसी तरह आपने अगर ऐसी जहमत उठा भी ली तो कई पीढ़ियां पार हो चुकी होंगी। श्रम कानूनों का उल्लंघन आम हो चुका है और न्यायालयों में बढ़ते मामलों की सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार को तो निवेशकों की चिन्ता है, वह कोई कार्यवाही क्यों करेगी?
न्यायपालिका के लोग दलील दे सकते हैं कि मुकदमें बढ़ते जा रहे हैं, न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है। संसाधन नहीं हैं। सरकार न्यायिक सुधार करना नहीं चाहती। आदि-आदि। यह बात भी ठीक है, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में सरकार का यह रवैया हो सकता है लेकिन भारतीय संविधान न्यायपालिका को ऐसी मुरव्वत नहीं देता। याद आता है न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, चंद्राचूड और पी.एन. भगवती का कार्यकाल जब सर्वोच्च न्यायालय में वकीलों को मोटी फीस न दे सकने वाले भी एक पोस्ट कार्ड लिख कर न्याय पा जाते थे। मिनटों में बड़े से बड़े मुद्दों पर खुली अदालत में निर्णय हो जाता था।
उदाहरण के तौर पर गाजीपुर जिला सहकारी बैंक ने सन 1957 में एक ड्राईवर रामेश्वर राय को बर्खास्त कर दिया था, वह श्रम न्यायालय से जीत गया तो बैंक ने उच्च न्यायालय में और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें कीं। बैंक की आखिरी अपील 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी थी। 1962 से 1984 तक रामेश्वर राय बहाली और तनख्वाह के लिए दर-दर की ठोकरें खाता रहा। फिर आया वह वक्त जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, श्रम सचिव, श्रमायुक्त तथा वाराणसी के सहायक श्रमायुक्त तथा गाजीपुर के जिलाधिकारी को सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे निर्देश जारी किये थे कि आदेश के 30 दिनों के अन्दर रामेश्वर राय न केवल बहाल हो गया था बल्कि उसे अपने पूरी पिछली मजदूरी का भी भुगतान मिल गया था।
यह उल्लेख जरूरी होगा कि अगर रामेश्वर राय सर्वोच्च न्यायालय में उस वक्त एक याचिका दाखिल भी करना चाहता तो उसे मिलने वाला पूरा एरियर पहले कहीं से कर्ज लेकर एडवोकेट को देना होता। फैसला जब आता तो मय ब्याज के इस पैसे को वह साहूकार को अदा नहीं कर सकता था। 27 साल की बेरोजगारी का दंश बहुत कष्टकर होता है। वह अपने परिवार के साथ दाने-दाने को मोहताज़ था। जब वह बहाल हुआ था, उसे सेवानिवृत्त होने में कुछ ही समय बचा था। आज का जमाना होता तो वह बिना न्याय पाये मर ही जाता।
विशेष परिस्थितियों में न्यायपालिका को कानून बनाने का भी अधिकार प्राप्त है और इस अधिकार का प्रयोग भारतीय न्यायपालिका ने किया भी है।
मी लार्ड! आप समर्थ हैं, लेकिन करेंगे तो तब जब करना चाहेंगे और आपके चाहने की प्रतीक्षा हिन्दुस्तान के तमाम दबे-कुचले पीड़ित नागरिक कर रहे हैं। उन्हें त्वरित न्याय चाहिए, जिसे आप उपलब्ध करा सकते हैं। कह नहीं सकते कि यह प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी.......
- प्रदीप तिवारी

गुरुवार, 21 मार्च 2013

हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व और न्यायपालिका

  1. हिन्दू धर्म की परिभाषा के संबंध में भारतीय न्यायपालिका लंबेे समय से विभ्रम का शिकार रही है। और इस विभ्रम से हिन्दू राष्ट्रवादी और हिन्दू धार्मिक संस्थाएं लाभ उठाती रहे हैं। हिन्दू धर्म को परिभाषित करने के मामले में न्यायपालिका घड़ी के पेंडुलम की तरह, एक कोने से दूसरे कोने तक झूलती रही है। आयुक्त संपत्तिकर मद्रास बनाम स्वर्गीय आर. श्रीधरन के मामले में हिन्दू को एक धर्म बताया गया-एक ऐसा धर्म जिसमें कई भगवान, अनेक ग्रंथ और अलग-अलग धार्मिक कर्मकांड हैं। मनोहर जोशी मामले में कहा गया कि ‘‘हिन्दुत्व जीवनपद्धति है“। हाल में आयकर अपीलीय अधिकरण, नागपुर ने अपने एक निर्णय में कहा कि ‘‘हिन्दू न तो कोई धर्म है और ना ही हिन्दुओं को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है।‘‘ इन परस्पर विरोधाभासी व्याख्याओं का धार्मिक संगठन और मंदिर तो लाभ उठा ही रहे हैं, इससे उन हिन्दू राष्ट्रवादियों की बांछें भी खिल रही हैं जो हिन्दू धर्म को राष्ट्रीय संस्कृति के नाम पर देश पर लादने पर आमादा हैं।
    आयकर अपीलीय अधिकरण ने अपीलकर्ता शिव मंदिर देवस्थान पंच कमेटी संस्थान के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि शिव, हनुमान और देवी दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं और वे किसी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। अपीलकर्ता ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80जी(5)(6) के अंतर्गत मंदिर के रखरखाव पर किए गए खर्च को इस आधार पर करमुक्त घोषित करने की मांग की थी कि शिव की भक्ति, धार्मिक गतिविधि नहीं है और इसमें सभी समुदायों के लोग भाग ले सकते हैं। अपीलकर्ता का यह भी तर्क था कि शिवभक्ति, परोपकार का कार्य है।
    हिन्दू मूर्तियों का विधिशास्त्र
    हालिया निर्णय, जिसमें यह कहा गया कि शिव कोई भगवान नहीं वरन् महाशक्ति हैं, के विपरीत, पूर्व में न्यायालयों ने मूर्तियों को भगवान का दर्जा दिया है और उन्हंे कानून की दृष्टि में व्यक्ति माना है। देवकीनंदन बनाम मुरलीधर मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विधि के अनुसार मूर्ति, विधिक दृष्टि से एक व्यक्ति है, जो संपत्ति धारण कर सकती है और धार्मिक संस्थान को प्राप्त संपत्ति, दरअसल, वहां स्थापित मूर्तियों की संपत्ति है। बाबरी मस्जिद विरूद्ध राम जन्मभूमि मामले में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने मूर्तियों को शाश्वत अवयस्क का दर्जा दिया है जो संपत्ति की मालिक हो सकती हैं और जिनपर परिसीमा विधि लागू नहीं होती। हिन्दू विधि के अनुसार, मूर्तियां अदालतों में याचिका दायर कर संपत्ति के बंटवारे की मांग भी कर सकती हैं (श्री श्री श्रीधर ज्यू विरूद्ध महिन्द्रा के मिटर)।
    स्वामीनारायण संप्रदाय ने शास्त्री यज्ञ पुरूष दासजी बनाम मूलदास भुनादरदास वैश्य मामले में उच्चतम न्यायालय में यह तर्क दिया कि वे हिन्दू धर्म से विशिष्ट और अलग हैं। यह इसलिए कहा गया ताकि यह दावा किया जा सके कि ‘‘बाम्बे हिन्दू प्लेसिस आॅफ पब्लिक वरशिप एक्ट‘‘ स्वामीनारायण सम्प्रदाय पर लागू नहीं होता। इस अधिनियम के जरिए, दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिया गया था। इस मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार करते हुए कि हिन्दू धर्म में धार्मिक कर्मकाण्डों और प्रथाओं की विविधिता है और वह एक जीवनपद्धति है यह भी कहा कि ‘‘इन सब मसलों में विविधताओं के बाद भी कुछ मूल अवधारणाएं ऐसी हैं जिनमें सभी हिन्दू विश्वास करते हैं। जैसे, वेदों की सर्वाेच्चता, दार्शनिक मसलों में गीता की श्रेष्ठता और पुनर्जन्म व पूर्वजन्म में विश्वास।‘‘
     जीवनपद्धति
    हिन्दू राष्ट्रवादी, उनकी सुविधानुसार, कभी यह कहते हैं कि हिन्दू एक धर्म है तो कभी यह कि वह एक संस्कृति और जीवनपद्धति है। वे इन दोनों में से उस व्याख्या को चुनते हैं जिसमंे उन्हें तत्समय लाभ नजर आता है। जब मध्यप्रदेश के स्कूलों में सूर्य नमस्कार, योग की शिक्षा और गीता की पढ़ाई अनिवार्य की गई, तब भाजपा राज्य सरकार ने यह दावा किया कि गीता, धार्मिक ग्रंथ नही है। वह इसलिए क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य के अंशतः या पूर्णतः  अनुदान से संचालित स्कूलों में कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके विपरीत, जब जून 2011 में भगवत गीता के रूसी भाषा के संस्करण को प्रतिबंधित करने के लिए रूस की एक अदालत में इस आधार पर याचिका प्रस्तुत की गई कि गीता धार्मिक अतिवाद को बढ़ावा देती है, तब भाजपा ने रूस के राष्ट्रपति को गीता की एक प्रति भेजते हुए लिखा कि गीता आध्यात्मिकता को बढ़ावा देती है। इस मामले में संसद में दिए गए अपने वक्तव्य में विदेशी मामलों के मंत्री एस. एम. कृष्णा ने गीता को ‘धार्मिक ग्रंथ‘ बताया था। मध्यप्रदेश सरकार तो वरिष्ठ नागरिकों की तीर्थयात्राओं का खर्च भी उठाती है परंतु केवल हिन्दू तीर्थस्थलों की। बाद में, धर्मनिरपेक्षतावादियों के दबाव के चलते, अजमेर शरीफ को इस सूची में जोड़ा गया।
    मनोहर जोशी मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के बीच अंतर न कर सका। वह दोनों के बीच भ्रमित हो गया और यह कह बैठा कि हिन्दुत्व भी एक
    जीवनपद्धति है। तथ्य यह है कि हिन्दुत्व एक राजनैतिक विचारधारा है, जो हिन्दू समुदाय को सावरकर व गोलवलकर के विचारों के अनुरूप, एक अलग नस्ल मानती है। राष्ट्र व नस्ल की विभाजक रेखाएं खींचकर, हिन्दुत्व ने मुसलमानों और ईसाईयांे को हिन्दू राष्ट्र का शत्रु घोषित कर दिया है। सावरकर तक हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म में अंतर करते थे परंतु दुर्भाग्यवश उच्चतम न्यायालय यह नहीं कर सका। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को एक बताने के पीछे उच्चतम न्यायालय ने तार्किक कारण तो छोडि़ए, कोई भी कारण नहीं बताया। सावरकर ने हिन्दू धर्म नहीं बल्कि हिन्दू नस्ल को श्रेष्ठ बताया था। सावरकर ने लिख था, ‘‘हिन्दू भारतीय राज्य के नागरिक मात्र नहीं हैं। वे मातृभूमि के प्रति प्रेम के धागे से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। अपने वैदिक पूर्वजों से अवतीर्ण शक्तिशाली नस्ल के सदस्य बतौर वे खून के रिश्तों से भी बंधे हुए हैं।‘‘ परंतु सावरकर एक मातृभूमि-एक नस्ल की अवधारणा पर रूके नहीं। उनके लिए हिन्दू केवल वह व्यक्ति था जिसे भारतीय सभ्यता विरासत में प्राप्त हुई हो। और भारतीय सभ्यता क्या है? सावरकर के अनुसार उसमें शामिल हैं ‘‘एक इतिहास, एक साहित्य, एक से नायक, एक कला, एक कानून, एक विधिशास्त्र, एक से मेले और त्यौहार, एक से कर्मकाण्ड और संस्कार, एक से समारोह और धार्मिक कृत्य।‘‘ इस तरह, सावरकर हिन्दुओं को उनकी सांझा सांस्कृतिक विरासत के आधार पर भी परिभाषित करते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू ‘‘वह व्यक्ति है जो सिन्धु से लेकर समुद्रों तक फैले भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानता है।‘‘ हिन्दू कहलाने के लिए भारतवर्ष को पितृभूमि और मातृभूमि दोनों मानने की अनिवार्यता के जरिए, सावरकर ने हिन्दुओं की एक अलग राजनैतिक श्रेणी का निर्माण किया। इस श्रेणी में गैर-हिन्दुओं, विशेषकर मुसलमानों और ईसाईयों के लिए, कोई स्थान न था। यह इस तथ्य के बावजूद कि मुसलमानों और ईसाईयों की भी यही मातृभूमि है और उन्होंने भी हमारी सांझा संस्कृति-भाषा, कानून, परंपराएं, लोककलाएं और इतिहास-विरासत में पाए हैं, वे हिन्दू नहीं हैं और ना ही हिन्दू माने जा सकते हैं।
    इस मायने में आयकर अपीलीय प्राधिकरण का आदेश एक दुधारी तलवार है और हिन्दुत्व की विचारधारा की जड़ों पर प्रहार करती है। हिन्दुत्व का दावा है कि हिन्दू केवल एक सामाजिक नहीं बल्कि एक राजनैतिक समुदाय हैं। यद्यपि हिन्दू धर्म में आस्थाओं की चकरा देने वाली विविधता है तथापि हिन्दुत्व उन्हीं धर्मों की नकल करना चाहता है, जिनका वह विरोधी है। हिन्दुत्व, हिन्दुओं के विचारों को एकसार करना चाहता है। वह हिन्दुओं का सैन्यीकरण करने का इच्छुक है। हिन्दुत्ववादी, हिन्दुओं को ऐसे राजनैतिक ढ़ांचे में ढालना चाहते हैं जिसके शीर्ष पर होगी एक उदार सत्ता, जिसके समक्ष सारे सदस्यों को सिर झुकाना होगा। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे उनपर समुचित बल प्रयोग किया जाएगा और उनके लिए उचित सजा की व्यवस्था होगी। अधिकरण का आदेश, हिन्दुत्व के इन इरादों को इस अर्थ में पलीता लगाता है कि वह कहता है कि हिन्दू तो एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय भी नहीं हैं।
    भेदभाव
    हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की  अलग-अलग और कदाचित विरोधाभासी न्यायिक परिभाषाओं का कारण यह है कि वे हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक और कर्मकाण्डीय विविधता को देखते हैं उसके सिद्धांतो को नहीं। इसके विपरीत, जब इस्लाम या ईसाई धर्म के बारे में कोई न्यायिक समीक्षा होती है तो सिद्धांतों और ग्रंथों पर अधिक जोर होता है व इस पर कम कि इन धर्मांे के मानने वालोें की जीवनपद्धति कैसी है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म विविधतापूर्ण प्रतीत होता है व इस्लाम और ईसाई धर्म, सिद्धांतों से बंधे हुए और संकीर्ण जान पड़ते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म की भी कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं और जहां तक ईसाईयों और मुसलमानों के दैनिक जीवन का प्रश्न है, उसमें उतनी ही विविधिताएं हैं जितनी कि हिन्दू धर्म में। जैसे लक्षद्वीप के मुसलमान और मेघालय के ईसाईयों में मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं। भारत में हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच कई धार्मिक व सांस्कृतिक समानताएं हैं। अगर शिव, हनुमान और दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं तो कुरान भी अल्लाह को रब-उल-अलामीन (पूरे ब्रम्हांड का ईश्वर ) बताती है न कि रब-उल-मुसलमीन (मुसलमानों के ईश्वर )। कुरान में अल्लाह के जो कई नाम दिए गए हैं उनमें से एक है ‘‘जब्बार‘‘ अर्थात ईश्वर शक्तिशाली है। इस तरह, अल्लाह भी ब्रम्हांड की महाशक्ति है। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर अजर-अमर है, उसने ही सृष्टि का निर्माण किया है और वही उसे संचालित कर रहा है। अधिकरण के अनुसार, चर्च और मस्जिदें, मंदिरों की तुलना में, सबके लिए अधिक खुले हुए हैं। जहां अधिकांश मंदिरों में दलितों को प्रवेेश नहीं दिया जाता वहीं मस्जिदों, चर्चाें और सूफी दरगाहों में किसी के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं होता। वहां सभी का स्वागत है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम और ईसाईयत को हमेशा धर्म ही माना जाएगा और मुसलमानों और ईसाईयों को धार्मिक समुदाय। 
    19वीं सदी में धर्म के नए अर्थ
    19वीं सदी के भारत में धर्म ने नए अर्थ ग्रहण किए। हिन्दू शब्द का प्रयोग मूलतः भौगोलिक अर्थ में होता था। इसका अर्थ था सिन्धु नदी के दक्षिण-पूर्व की भूमि पर रहने वाले लोग। सिन्धु को हिन्दू कहा जाने लगा। हिन्दू धर्म मानने वाले लोग अलग-अलग परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं का पालन करते थे जिन्हें उन्होंने इतिहास के विभिन्न दौरों से ग्रहण किया था। परंतु हिन्दू धर्म में जातिगत ऊँचनीच के मामले में कोई विविधता नहीं थी।  ऊँचनीच हिन्दू समुदाय का एक आवश्यक लक्षण थी। लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधे अपनाने पर मजबूर किया जाता था और समुदाय के एक बड़े हिस्से को कई अधिकार प्राप्त नहीं थे। धार्मिक शुद्धता और धार्मिक प्रदूषण के सिद्धांतों का अविष्कार ही इसलिए किया गया ताकि कुछ लोगों के अपवर्जन को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जा सके। जिन समुदायों को अलग-थलग रखा जाता था वे अपनी अलग धार्मिक परंपराएं और कर्मकाण्ड अपनाने के लिए स्वतंत्र रहते थे बशर्ते वे अपने पारंपरिक काम-धंधे ही करते रहें और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करें। जहां विशेषाधिकार प्राप्त ऊँची जातियां अपना उच्च दर्जा कायम रखने के लिए अपनी परंपराओं की विशुद्धता को बनाए रखने में जुटी रहीं वहीं नीची जातियों ने अलग-अलग परंपराओं और इस्लाम व ईसाई धर्म सहित अन्य धर्मों से बहुत कुछ अपना लिया। इन लोगों को जातिगत ढ़ांचे को बनाए रखने में कोई रूचि नहीं थी। इससे एक ओर हिन्दू धर्म में विविधताएं आईं तो दूसरी ओर मिलीजुली परंपराएं उभरीं, जिनमें से कुछ का पालन एक से अधिक धार्मिक समुदाय करते थे। इन परंपराओं के अनुयायियों के बीच धर्म के आधार पर विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं था।
    हमारे औपनिवेशिक शासकों ने यह जरूरी समझा कि वे अपनी प्रजा की संख्या गिनें और उनके धर्मों को नाम दें। इस प्रक्रिया में धार्मिक सीमाएं कठोर बन गईं। औपनिवेशिक राज्य ने धार्मिक पहचानों का निर्धारण किया। चूंकि अधिक संख्या का अर्थ था सत्ता पाने की अधिक संभावना, इसलिए उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग ने उन समुदायों का,े जिनकी धार्मिक वफादारी बहुत स्पष्ट नहीं थी,  अपने झंडे तले लाने के लिए शुद्धि और तबलीगी आंदोलन शुरू किए। शुद्धि आंदोलन का उद्धेश्य था इन समुदायों को संस्कृतनिष्ठ बनाना तो तबलीगी आंदोलन का लक्ष्य था ऐसे समुदायों का इस्लामीकरण। इस प्रक्रिया में धार्मिक विभाजक रेखाएं और कठोर और गहरी हुईं।
    इस यथार्थ और इतिहास को हमारी न्यायपालिका नजरअंदाज करती आई है और यही कारण है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक निर्णय सुनाने वाली हमारी अदालतों ने हिन्दू  धर्म और हिन्दुत्व के मसलो पर ऐसे कई निर्णय दिए हैं जिनका लाभ हिन्दुत्ववादी शक्तियां अपने विचारों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उठा रही हैं। हमें आशा है कि भविष्य में न्यायिक संस्थाएं इस मामले में अधिक सावधानी से काम करेंगी।
  2. -इरफान इंजीनियर

रविवार, 4 मार्च 2012

न्यायपालिका – कुछ रोचक तथ्य



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ईस्ट इंडिया कं. व्यापारी के छद्म वेश में भारत को लूटने आई थी| 1857 की क्रांति के बाद जनता की आवाज़ को दबाने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर ब्रिटिश सरकार ने कानून निर्माण प्रारम्भ किया जिसमें अभियोजन स्वीकृति, राज कार्य में बाधा, न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम आदि थे किन्तु विदेशों (ब्रिटेन) में आज ऐसे कानून नहीं हैं जबकि भारत में न्यायाधीश संरक्षण अधिनयम 1985 बना कर राजतन्त्रिक व्यवस्था को और मज़बूत कर दिया गया है ... लोक व्यवस्था राज्य का विषय है, अतः जहाँ केंद्र उदासीनता बरते, दंड विधि और दंड प्रक्रिया विधि, राज्यों को स्वयं ही बनानी चाहिए|

  1. जोगिन्दर कुमार बनाम उ प्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जघन्य अपराध के अतिरिक्त गिरफ्तारी को टाला जाना चाहिए जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 59 के अंतर्गत न वकील बिना जमानत रिहाई की मांग करते हैं और न गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट रिहा करते हैं| राष्ट्रीय पुलिस आयोग की 1980 की रिपोर्ट के अनुसार 60% गिरफतारियां अनावश्यक हैं जिन पर जेलों का 43.2% व्यय होता है| एक ओर संसाधनों का अभाव व दूसरी ओर अनावश्यक गिरफतारी एवं जमानत में सीमित साधनों और संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है| जिन मामलों और जिन परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय जमानत ले उनमें मजिस्ट्रेट क्यों नहीं ले सकता ...एक विचारणीय प्रश्न है |
  2. किन्तु वकीलों को भी 5-7 पृष्ठ की याचिका और 5 मिनट की बहस में उ न्या में अच्छी फीस 20000-30000 रु. मिल जाती है| इस प्रकार राज उ न्या में वर्ष में 18000 जमानत आवेदनों में 36 करोड़ रु. का कारोबार होता है| जिस दिन जमानत का कोई आवेदन नहीं आये उस दिन सभी संबद्ध उदास दिखाई देते हैं| आस्ट्रेलिया में जमानत पर एक पूर्ण अलग कानून है और जमानत को वहाँ पर अधिकार बताया गया है जबकि भारत में कानून में मात्र 4-5 धाराएं ही हैं|
  3. फिर गिरफ्तारी क्यों ?.... यातना न देने व सुविधाएं देने के लिए वसूली होती है| अभिरक्षा में भी इन्हीं बातों के लिए वसूली होती है और खानपान पर खर्चे में भी कमिशन मिलता है| गिरफ्तारी व अभिरक्षा में जेल स्टाफ, पुलिस, न्यायाधीश, वकील और सरकारी वकील आदि सभी का हित निहित है| आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि तो मात्र 1.5% है किन्तु अभियोजन व अभिरक्षा की हिंसा का न्यायिकेतर (Extra Judicial Punishment) दंड गिरफ्तार सभी कमजोर व्यक्तियों को झेलना पडता है|
  4. भारत में केंद्र अथवा राज्यों द्वारा न्यायाधीशों के पदों के लिए कोई नीति घोषित नहीं है| मामलों के निपटान में लगने वाला उ. न्या. द्वारा निर्धारित समय ---मूल मामले में 3 दिन, रिविजन में 1/10 दिन है ...फिर भी दोनों में समान विलम्ब से 5-7 साल में निर्णय हो पाता है| बिहार में एक अधीनस्थ न्यायाधीश वर्ष में औसत 284 मामले निपटता है जबकि केरल में 2575 राज में 1286 | मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीश वर्ष में औसत 5005 मामले निपटता है जबकि दिल्ली में 1258 राज में 2656 | दूसरी ओर समस्त भारत में लागू मौलिक कानून- संविधान, दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य विधि, सिविल संहिता एक हैं फिर भी कानून की मनमानी व्याख्या और स्वयं के लिए सुहावनी प्रक्रियाएं अपनाकर भिन्न भिन्न परिणाम दे रहे हैं| यह स्थिति न्यायपालिका के अनियंत्रित और स्वछन्द होने के अशुभ संकेत देती है|
  5. विदेशों में जन प्रतिनिधियों, पुलिस, न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों तक के लिए आचार संहिताएं बनी हुई हैं और उनका जांच में सहयोग न करना अर्थात स्वयं के मामले में झूठ बोलना भी एक दंडनीय दुराचरण माना गया है| अमेरिका में पूर्ण कालिक न्यायाधीश 8 वर्ष और अंशकालिक न्यायाधीश 4 वर्ष के लिए नियुक्त होते हैं जबकि भारत में सरकार तो गिराई जा सकती किन्तु जैसा कि अरुण जेटली ने कहा था न्यायाधीश को नहीं हटाया जा सकता|
  6. विधायिका एवं कार्यपालिका पर नियंत्रण है किन्तु न्यायपालिका पर नियंत्रण का भारत में संसदीय लोकतंत्र में भी अभाव, न्यायपालिका किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं है जबकि इंग्लॅण्ड, अमेरिका (न्यायिक लोकतंत्र) में स्वतंत्र न्यायिक आयोग हैं जो न्यायपालिका पर नियंत्रण रखते हैं| अमेरिका में न्यायालयों के निष्पादन पर सरकार निजी एजेंसी से सर्वे करवाती है| भारत में जागरण द्वारा 3 वर्ष पूर्व करवाए गए सर्वे में 74% ने माना था कि न्यायपालिका भ्रष्ट है |
  7. अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो रिकार्डिंग 1961 से ही होती है ताकि कार्यवाही का सही एवं सत्य रिकार्ड रहे , भारत में तो जो पक्षकार (लोक अभियोजक) उपस्थित नहीं होते उनकी भी झूठी उपस्थिति दिखा दी जाती है| न्यायाधीश घंटों देरी से आते हैं और आनन फानन में सुनवाई करते हैं.. दो-दो मामलों में एक साथ बहस सुनली जाती, साथ में अथवा न्यायाधीश की अनुपस्थिति में भी गवाहों के बयान होते रहते हैं| विरोध का मानस बनाने वाले वकीलों को डर रहता है कि उनके मामलों में स्वेच्छाचारी आदेश पारित कर दिए जायेंगे जिनका कोई उपचार नहीं होगा|
  8. भारत में न्यायिक वातावरण ऐसा है जिसमें कोई भी प्रतिभाशाली गरिमामयी व्यक्ति कार्य करना पसंद नहीं करेगा| विधि संकाय की प्रतिभाएं कोर्पोरेट क्षेत्र की ओर पलायन कर रही हैं| मध्य प्रदेश में 3000 में से एक भी वकील ऐ डी जे परीक्षा पास नहीं कर सका ... 6 करोड़ की आबादी वाले राज. में एक भी विधि शोध सहायक लिखित परीक्षा उत्तीर्ण नहीं.आखिर साक्षात्कार से भर्ती की गयी| हरियाणा एवं उ प्र की स्थिति भी समान ही है|
  9. अमेरिका में मिसिसिपी राज्य में न्यायाधीश डीयरमेन को मात्र अन्य न्यायधीश द्वारा पूर्व में निर्णित मामले में ( गलती से) सिफारिश पर भी दण्डित कर दिया गया था| वहीँ न्यायाधीश कुक ने नियमों के अनुसरण में अपनी सम्पतियों का ब्यौरा निर्धारित समय सीमा दिनांक 09.07.2010 के स्थान पर दिनांक 18.11.10 को प्रस्तुत किया था| अभियुक्त न्यायाधीश कुक ने यह बचाव लिया कि इस दौरान उसकी माँ कैंसर से पीड़ित थीं और अंततः उनका देहावसान भी हो गया था अतः वह समय पर ब्यौरा प्रस्तुत नहीं कर सका| फिर भी न्यायिक आयोग ने यह शिकायत प्रस्तुत की और अनुशंसा की कि न्यायाधीश कुक पर 132 दिन की चूक के लिए 6600 डॉलर अर्थदंड और 332.5 डॉलर खर्चा लगाया जाना चाहिए| न्यायिक अधिकारियों को विलम्ब व अव्यवस्था के लिए भी दण्डित किया जाता है| अमेरिका में जिला न्यायाधीशों को लगभग 25000डॉलर वार्षिक भुगतान किया जाता है और वहाँ उचित (न्यूनतम) मजदूरी 15000 डॉलर वार्षिक है| संचार, परिवहन आदि विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी तकनीक और प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं तो न्यायिक क्षेत्र में ऐसी तकनीक क्यों नहीं अपनाई जा सकती ... जय हिंद
  10. -मनीराम शर्मा

शनिवार, 5 नवंबर 2011

न्यायपालिका में पसरा भ्रष्टाचार-2

इतना ही नहीं पराकाष्ठा तो उस समय हो गई जब उच्चतम न्यायालय की जस्टिस एस.एस. बेदी और जस्टिस के.सी. प्रसाद की खण्डपीठ ने दिनाकरन के इम्पीचमेंट (न्यायाधीश की नौकरी से बर्खास्त किए जाने की कार्यवाही) से पूर्व होने वाली जाँच को ही रोक दिया। स्मरण रहे कि दिनाकरन के खिलाफ आरोपों की जाँच के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय समिति को राज्य सभा ने बनाया था जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति आफताब आलम, कर्नाटक  उच्च  न्यायालय  के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. केहर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.पी. राव थे।
इस तीन सदस्यीय समिति ने दिनाकरन को नोटिस भेज कर चेताया था कि वे अपने ऊपर लगाए गए 16 आरोपों का 20 अप्रैल, 2011 तक उत्तर दें अन्यथा समिति अपनी आगे की कार्यवाही करेगी।
    इस बीच दिनाकरन ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की कि चूँकि वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी.पी. राव, जो समिति के सदस्य हैं उनसे (दिनाकरन से) दुराग्रह रखते हैं अतः जब तक वह जाँच समिति में हैं तब तक समिति निष्पक्ष जाँच नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय ने इसी अपील के आधार पर पूरी जाँच पर ही रोक लगा दी। वाह! बहुत खूब! प्रश्न उठता है कि राज्य सभा के निर्णय पर उच्चतम न्यायालय ने रोक क्यों लगाई? हमारे देश में तो संसद ही सर्वोपरि है। इसके उपरान्त भी यदि श्री पी.पी. राव, एडवोकेट से दिनाकरन को निष्पक्षता की आशा नहीं थी तो उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आफताब आलम और कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केहर भी क्या दिनाकरन से दुराग्रह रखते थे? यदि उच्चतम न्यायालय इतनी निष्पक्षता और पादर्शिता का हिमायती है और भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कृत संकल्प है, तो उसे श्री पी.पी. राव, एडवोकेट, के स्थान पर किसी अन्य को समिति में नियुक्त करने का आदेश देना चाहिए था। क्या उच्चतम न्यायालय का यह आदेश न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति केहर का अपमान नहीं है? उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से कौन से तत्वों को, किस प्रकार के लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा?
    दिनाकरन की ही भाँति उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के.जी. बालाकृष्णन पर भी आय से अधिक सम्पत्ति रखने, बेनामी सम्पत्तियाँ रखने, अपने परिवार के सदस्यों द्वारा की गई बेईमानी, भ्रष्टाचार आदि कुकृत्यों पर पर्दा डालने के आरोप हैं। बालाकृष्णन तो अपनी सम्पत्ति का विवरण देने के लिए भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने जो आयकर रिटर्न दाखिल किए हैं उसका भी वह खुलासा करने से मना कर रहे हैं।
    दिनाकरन, सौमित्र सेन बाल कृष्णन की भाँति ही देश के लगभग पचास से अधिक न्यायाधीशों के विरुद्ध बेईमानी, भ्रष्टाचार, आय से अधिक सम्पत्ति रखने, हेराफेरी, धोखाधड़ी, नाजायज सम्पत्ति रखने, अपने मित्रों-सम्बन्धियों के साथ पक्षपात करने और उनको लाभ पहुँचाने आदि के मुकदमे चल रहे हैं।
    देखना है कि उच्चतम न्यायालय कब अपने घर-न्यायपालिका में गंदगी फैलाने वालों पर चाबुक चलाती है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाती है।



- राम किशोर
मो. 09452242237

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

न्यायपालिका में पसरा भ्रष्टाचार-1

यह बात अब जन सामान्य में ही नहीं वरन् न्याय के सर्वोच्च मन्दिर में भी गूँज रही है कि न्यायपालिका में भ्रष्ट, पतित, बेईमान और रिश्वतखोर न्यायाधीशों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही है।
    अप्रैल 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडि़या ने एम.सी. सीतलवाड़ स्मृति व्याख्यान माला में भाषण देते हुए कहा कि “बेईमान और भ्रष्ट न्यायधीशों को राजनैतिक संरक्षण नहीं प्रदान किया जाना चाहिए। यदि न्यायपालिका से भ्रष्टचार को समाप्त करना है तो भ्रष्ट न्यायधीशों के साथ किसी भी प्रकार की दयालुता, कृपा या मेहरबानी नहीं दिखाई जानी चाहिए।” अपने भाषण में उन्होंने एक ओर तो राजनीतिज्ञों को सुझाव दिया कि वे भ्रष्ट एवं बेईमान न्यायाधीशों से दूर रहें, वहीं दूसरी ओर उन्होंने न्यायाधीशों को सलाह दिया कि वे सुविधादायक व्यवहार, सुविधाजनक बर्ताव तथा सेवानिवृत्ति के पूर्व ही या बाद में पद पाने की लालसा में किसी राजनैतिक संरक्षण प्राप्त करने की कामना के साथ राजनीतिज्ञों, विशेषकर सत्ताधारी, राजनीतिज्ञों से निकटता न बनाएँ।” न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडि़या ने चेतावनी देते हुए कहा कि “न्यायाधीश राजनीतिज्ञों से दूरी बना कर रखें।“ यह प्रवृति “तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊँगा” या “तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा“ को जन्म देती है और भ्रष्टाचार को पोषित करती है।“
    उन्होंने आगे कहा कि यदि “कोई न्यायाधीश पक्षपात के आरोप से बचे रहना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह समाज से थोड़ी दूरी और अलगाव बना कर रखे।
      उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “एक व्यक्ति जो न्यायाधीशों के संसार में प्रवेश करता है उसे स्वयं में अपने ऊपर कुछ नियंत्रण रखने होंगे। उसे वकीलों से, राजनैतिक दलों, उनके नेताओं से, मंत्रियों आदि से सामाजिक समारोहों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के मेल मिलाप नहीं रखना चाहिए।“ उन्होंने कहा कि “न्यायपालिका अपने गुप्त भवनों में, जिन्हें भ्रष्ट और बेईमान न्यायाधीश सुरक्षा कवच समझते हैं, सूर्य का प्रकाश आने से भयभीत नहीं है परंतु सूर्य का प्रकाश इतना अधिक और प्रभावी न हो जाय कि उससे शरीर की खाल ही जल जाय।“
    यह सत्य है कि पिछले कुछ महीनों से, विशेषकर जब से न्यायमूर्ति एस.एच. कपाडि़या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद पर आसीन हुए हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने जनता की आशाओं में पर लगा दिए हैं, न्यायापालिका के प्रति सम्मान बढ़ा है और लोकतंत्र को मजबूती प्रदान हुई है परंतु भ्रष्ट न्यायाधीशों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। हम भूले नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश रामा स्वामी पर संसद में जब भ्रष्टाचार का महाभियोग चला था उस समय उनके भ्रष्टाचार की पैरवी करने में, उसे सही ठहराने में केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल आगे आए थे, उन्हीं तर्कों के साथ जो आज वह टू जी स्पैक्ट्रम और कामनवेल्थ खेल घोटालों के बचाव में दे रहे हैं- “कोई घोटाला नहीं हुआ”, “कोई नुकसान नहीं हुआ” इत्यादि-इत्यादि।
    आज भी भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह से घिरे सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरन के प्रकरण पर अच्छी-अच्छी, सुन्दर-सुन्दर और उपदेशात्मक बातें करने वाले उच्चतम न्यायालय के व्यवहार पर आश्चर्य होता है। सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने के पूर्व वह कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे। उनका नाम उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए प्रस्तावित किया गया था, यद्यपि वह भ्रष्टाचार के अनेक आरोपों में लांक्षित थे। उन पर जमीन घोटालों, आय से कई हजार गुना अधिक सम्पति बटोरने, भूमि सीमाबन्दी से अधिक जमीन रखने, सार्वजनिक, सरकारी एवं दलितों की भूमि पर जबरदस्ती कब्जा करने, साक्ष्यों को नष्ट करने, विक्रय प्रपत्रों में सम्पति का वास्तविक मूल्य से कम मूल्य दिखाने और इस प्रकार कर चोरी करने, स्टैम्प ड्यूटी की चोरी करने, गैर कानूनी निर्माण करने, बेनामी ट्रांजक्शन्स करने, तमिननाडु हाउसिंग बोर्ड द्वारा अपनी पत्नी एवं पुत्रियों के नाम से पाँच प्लाट आबंटित कराने इत्यादि के अनेक आरोप हैं। इतना ही नहीं दिनाकरन पर आरोप हैं कि उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर रहते हुए नियमों के विरुद्ध जानबूझ कर गलत एवं बेईमानी भरा प्रबन्धन किया, वह न्यायाधीशों का क्रम इस प्रकार निश्चित करते थे जिससे बेईमानीपूर्ण न्यायिक निर्णय दिए जा सकें। उनको अविलम्ब हटाने, उनके ऊपर लगे आरोपों की जाँच के लिए, कर्नाटक के अधिवक्ताओं ने धरना दिया, प्रदर्शन किए, हड़तालें कीं, अदालतों का बहिष्कार किया। संसद में भी इस भ्रष्टाचारी न्यायाधीश के करतूतों की गूँज उठी।
    इन तमाम आन्दोलनों की अगुवाई मुख्यतः कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.पी. राव एवं कमेटी फार जुडीशियल एकाउन्टेबिलिटी के संयोजक वरिष्ठ एडवोकेट श्री वागाई कर रहे थे। अन्ततः दिनाकरन के ऊपर लगे आरोपों की जाँच के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आफताब आलम, कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. केहर एवं वरिष्ठ एडवोकेट श्री पी.सी. राव थे। जनता और अधिवक्ताओं के दबाव के चलते पी.डी. दिनाकरन को कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद पर स्थानान्तरण कर दिया गया। प्रश्न उठता है कि यदि सरकार और उच्चतम न्यायालय ने दिनाकरन जैसे बेईमान और भ्रष्ट न्यायाधीश को जेल की राह नहीं दिखाई तो उन्हें कम से कम कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन की भाँति, जिनके ऊपर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जबरन छुट्टी पर क्यों नहीं भेजा? जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर आरोप लगे हों, जिनकी जाँच चल रही हो और जाँच समिति में उच्चतम न्यायालय का एक वर्तमान न्यायाधीश हो, उस आरोपित न्यायाधीश को दूसरे राज्य का मुख्य न्यायाधीश बना दिया जाय? यह कैसी और किस प्रकार की न्यायिक पारदर्शिता और निर्णय है?

- राम किशोर
क्रमश:
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