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गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

चुनावी भगवान

पत्रकार अरूण शौरी, एनडीए सरकार में मंत्री थे। वे न केवल भाजपा के सदस्य थे वरन् उसके प्रमुख विचारक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से कई अल्पसंख्यकों और दलितों के विरूद्ध हैं। ऐसी ही एक पुस्तक, जिसका आमजनों, विशेषकर दलितों, ने जमकर विरोध किया था, वह थी ‘वर्षिपिंग फाल्स गाॅड्स’ (नकली भगवानों की आराधना)। इस पुस्तक में उन्होंने अंबेडकर के प्रति आरएसएस-भाजपा के दृष्टिकोण को प्रगट किया है। इस बहुत मोटी पुस्तक में उन्होंने अंबेडकर की विचारधारा व प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिए उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन और सामाजिक न्याय के उनके संघर्ष की कड़ी आलोचना की है। आज, लगभग 15 साल बाद, एक ओर रामविलास पासवान, उदित राज व रामदास अठावले जैसे दलित नेता, अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति की खातिर, भाजपा की गोद में  जा बैठे हैं वहीं दूसरी ओर, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी, दलितों को भाजपा की ओर आकर्षित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात है कि वे अपनी आदत के अनुसार, लगातार झूठ बोल रहे हैं, घटनाओं को तोड़-मरोड़ रहे हैं और दलितों की भलाई के लिए जो कुछ नहीं हो सका या नहीं किया गया, उसके लिए अपने राजनैतिक विरोधियों को दोषी ठहरा रहे हैं।
गत् 14 अप्रैल (2014) को हमने देखा कि प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक नरेन्द्र मोदी, नीली जैकेट पहनकर, भारत के संविधान निर्माता को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उस दिन अंबेडकर जयन्ती थी। बाबासाहब के चित्र के समक्ष सर झुकाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के बाद उन्होंने कहा कि अंबेडकर जैसे व्यक्तियों के कारण ही वे और उनके जैसे अन्य लोग समाज में आगे बढ़ सके हैं। आरएसएस कभी अपने या भाजपा के नेताओं की जाति की बात नहीं करता। उसका जोर केवल हिंदुत्व पर रहता है। परंतु मोदी, कम से कम उत्तरप्रदेश और बिहार में, अपनी जाति का ढोल जमकर पीट रहे हैं। जहां तक जातिगत पदानुक्रम का सवाल है, आरएसएस, यथास्थिति बनाए रखना चाहता है। मोदी जो कुछ कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि हमारे देश में जातिवादी राजनीति की जड़ंे बहुत गहरी हैं और उन पार्टियों को भी जातिवादी राजनीति करनी पड़ रही है, जो कि जाति के नाम पर राजनीति को गलत ठहराते आ रहे थे। चुनाव आते ही वे अपनी पुरानी बातें भूलकर जाति के कार्ड को खेलने में जुट गए हैं। यहां हमें एक बात समझनी होगी। और वह यह कि कई बार नीची जाति का दलित व्यक्ति भी ऐसी मानसिकता या विचारधारा का हो सकता है जो उसकी जाति के हितों के विपरीत हो। इसी तरह, कई बार, ऊँची जातियों के व्यक्ति भी सामाजिक न्याय और जाति के उन्मूलन के पक्षधर हो सकते हैं। अंबेडकर के कई अनुयायी ऊँची जातियों से थे। मोदी, आज चुनावी मजबूरियों के चलते उत्तरप्रदेश और बिहार में अपनी जाति का प्रचार करते घूम रहे हैं जबकि गुजरात में उनकी राजनीति और उनके पितृसंगठन आरएसएस की विचारधारा में सामाजिक न्याय की स्थापना के लक्ष्य के लिए कोई स्थान नहीं है।
एक ओर मोदी अपनी जाति का ढिंढोरा पीट रहे हैं वहीं दूसरी ओर गुजरात में उनकी नीतियां केवल और केवल बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाली रही हैं। समाज के इन वर्गों की भलाई के लिए केन्द्र सरकार द्वारा षुरू की गई योजनाओं को गुजरात में या तो लागू ही नहीं किया जा रहा है या फिर आधे अधूरे ढंग से लागू किया जा रहा है।  योजना आयोग के निर्देशों के विपरीत, मोदी सरकार ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सबप्लान के संबंध में एक भी बैठक आयोजित नहीं की। गुजरात में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए आरक्षित 27,900 पद खाली हैं। इसका एक कारण यह अजीब नीति है की किसी भी जिले में खाली पद पर केवल उसी जिले के रहवासी की नियुक्ति हो सकती है। अहमदाबाद, जहां से नरेन्द्र मोदी विधानसभा के लिए चुने गए हैं, में अनुसूचित जाति के 3,125 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति नहीं मिली है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि गुजरात के कम से कम 1,600 गांवों में आज भी अछूत प्रथा व्याप्त है व दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।
अहमदाबाद के विभिन्न हिस्सों के दलित, 13 अप्रैल को इकट्ठा हुए और उन्होंने ‘‘गुजरात सरकार के बहुप्रचारित विकास माॅडल’’ का जमकर विरोध किया। उनका दावा है कि गुजरात सरकार ने दलितों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कुछ भी नहीं किया है।
आंदोलनरत दलितों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है, ‘‘मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी विकास के एकतरफा माॅडल का प्रचार करते आ रहे हैं, जिसमें दलित अधिकारों के लिए कोई स्थान नहीं है। सरकार ने दलितों की बजाय उद्योगपतियों को जमीनें दी हैं...हमने दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए लैंड सीलिंग एक्ट के तहत् जमीन दिए जाने की मांग की है। हमने यह मांग भी की है कि सिर पर मैला ढोने की प्रथा और अनुबंध के आधार पर नौकरियां देने की व्यवस्था को समाप्त किया जाना चाहिए।’’ यहां यह दिलचस्प है कि अपनी पुस्तक कर्मयोग में मोदी ने वाल्मीकियों द्वारा हाथ से मैला साफ करने को ‘‘आध्यात्मिक अनुभव’’ बताया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि गुजरात में अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत दोष सिद्धि की दर मात्र 4 प्रतिशत है। यद्यपि इस अधिनियम के तहत् प्रकरण चलाने के लिए हर जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान है तथापि सरकार ने इन न्यायालयों की स्थापना आज तक नहीं की है।
झूठ बोलने के अभ्यस्त मोदी ने एक आमसभा में कहा कि कांग्रेस सरकारों ने बाबासाहब की उपेक्षा की और भाजपा सरकार ने उन्हें भारत रत्न दिया। आमसभाओं में आने वाले लोग षायद ही कभी किसी वक्ता के झूठ का खुलकर
प्रतिरोध करते हैं। परंतु मोदी के इस झूठ का मीडिया ने भी पर्दाफाश करने का प्रयास नहीं किया। सच यह है कि केन्द्र में भाजपा की पहली सरकार सन् 1996 में बनी थी और मात्र 13 दिनों में धराशयी हो गई थी। डाक्टर अंबेडकर को सन् 1990 में विश्वनाथप्रताप सिंह सरकार द्वारा मरणोपरांत भारत रत्न से विभूषित किया गया था और संसद में उनकी मूर्ति का अनावरण भी हुआ था। वी .पी. सिंह सरकार ने ही मंडल आयोग की सिफारिषों को लागू किया था और यह भी एक तरह से बाबा साहब को श्रद्धांजली थी। सच तो यह है कि भाजपा का उन मूल्यों से कभी कोई लेना ही नहीं रहा, जिनके प्रति बाबा साहब प्रतिबद्ध थे। इनमें शामिल हैं भारतीय संविधान के मूल्य, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व व भारतीय राष्ट्रवाद की मूल अवधारणाएं। मोदी ने हाल में कहा था कि उनका जन्म एक हिन्दू के रूप में हुआ था और वे राष्ट्रवादी हैं इसलिए वे हिन्दू  राष्ट्रवादी हैं। अंबेडकर हिन्दू राष्ट्रवाद के कड़े विरोधी थे। अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस, मनुस्मृति का हामी रहा है और उसका तो यहां तक कहना था कि जब हमारे पास मनुस्मृति मौजूद है तो हमें अपना संविधान बनाने के लिए इतना समय और ऊर्जा खर्च करने की क्या आवष्यकता है।
जहां तक सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों का सवाल है, दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता, गांधीजी और कांग्रेस के आलोचक रहे हैं। उनकी आलोचना पूरी तरह से निराधार भी नहीं है। परंतु यह आष्चर्य की बात है कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद की उस राजनीति का तनिक भी विरोध नहीं करते जो डाक्टर अंबेडकर के मूल्यों के खिलाफ है और जो सामाजिक न्याय की असली विरोधी है। हिन्दू राष्ट्रवाद व आरएसएस की इसी राजनीति का प्रतिनिधित्व मोदी करते हैं। मोदी जिस राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं उसने मंडल आयोग की सिफारिषों को लागू करने और इसी तरह के अन्य कदमों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विरोध किया था। चुनावी राजनीति, राजनैतिक दलों और नेताओं से कुछ भी करवाने में सक्षम है, यहां तक कि नेता ऐसी बातें कहने लगते हैं जो उनकी मूल विचारधारा के खिलाफ हैं। ‘‘अंबेडकर-पूजक नरेन्द्र मोदी’’ इसी का उदाहरण है।
 -राम पुनियानी

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

महादेवी वर्मा - यात्रा वृत्तांत



महादेवी वर्मा जी ने यह यात्रा बीसवी सदी के तीसरे दशक में की थी | तब
से बहुत समय व्यतीत हो चुका है पर प्रस्तुत यात्रा - वृत्तांत के बहुतेरे अनुभव आज भी प्रासंगिक लगते है |

मन्दिर अपनी प्रसिद्धि के अनुरूप नही है और भीतर द्वारों पर कटघरे से लगाकर मानो भगवान को भी बन्धन में डाल दिया है | द्वारपाल उन्ही को सरलता से प्रवेश करने देता है , जो वेशभूषा से संभ्रांत व्यक्ति जान पड़ते है |
और मलिन वेश वाले दरिद्र , घंटो सतृष्ण दृष्टि से उन जाने -- आनेवालों को देखते रहते है | भीतर जाकर लाल पगड़ीवाले सिपाहियों को अन्त:द्वार की रक्षा करते देखकर हमारे विस्मय की सीमा नही रही | वे भी वस्त्रो को आदर की दृष्टिसे देखते थे और दीन स्त्री -पुरुषो को हाथ पकडकर रोक देते थे | उस द्वार को भी पार कर नारायण की मूक प्रतिमा देखी, जिस पर न हर्ष था न विषाद , न कभी कुछ होने की आशा ही थी | केवल उनके पुजारी की आँखे हर्ष से नाच रही थी , वे दोनों हाथो से चढावे के थाल से चाँदी की राशि बटोर रहे था | भगवान के
लिए नही , परन्तु उनके पुजारी की प्रसन्नता के लिए मैंने भी रजत खंड चढाकर विषष्ण मुख से विदा ली


मार्ग में निरन्तर ' सुई दो रानी , डोरा दो रानी ' इत्यादि सुनते -- सुनते बद्रीनाथ के निकट पहुचने तक मुझे यह विश्वास हो चला था की उस सुदूर पर्वत प्रांत में न तो रानी होने से अधिक कोई सहज काम है और न सुई से अधिक
महत्वपूर्ण देने योग्य वस्तु |
मलिन भूरे बाल वाले बालक , लाल मुंगो की मालाओं से अपने को सजाये हुए , चकित दृष्टि वाली युवतिया तथा वात्सल्य से भरी हुई वृद्धाए और जहा -- तहा जाते हुए निश्चित निरीह से पुरुष सबको एक ही धुन थी | यहा तक की वे स्थान भी , जहा शीत की अधिकता के कारण स्त्रिया और पुरुष कम्बल के दोनों छोरो को कंधे पर चाँदी या किसी और धातु के कांटे से अटकाकर केवल उसी को अपना परिधान बनाये थे , इस राग से मुखरित हो रहे थे | कई बार तो छोटे -- छोटे बालको ने इस प्रकार घेर लिया की अपना सारा सुई -- डोरा फेंकर हमें भागना
पडा |
कई पहाड़ी संभ्रांत व्यक्तियों से पूछने पर ज्ञात हुआ की इस विचित्र भिक्षावृति का कारण सुई का अभाव नही है | अब तो सब आवश्यक वस्तुए भेड़ो के द्वारा बद्रीनाथ तक पहुचाने का समुचित प्रबंध हो गया है , परन्तु यह प्रथा
उस समय से सम्बन्ध रखती है जब यात्रियों के अतिरिक्त ऐसी वस्तुए पहुचाने काकोई और साधन न था |
उस समय विचार आया की हमारे परम्परागत संस्कारों का मिटना कितना कठिन है | मांगना छोड़ना तो दूर की बात , उनके हृदय में कुछ और मांगने की इच्छा ही नही उत्पन्न होती | प्रत्येक व्यक्ति केवल हजार -- पांच सौ सुइयों के संग्रह का स्वप्न देखता रहता है | किसी वस्तु के प्राप्त कर लेने की इच्छा में जो मधुरता है वह उस इच्छा की पूर्ति में नही , इसका अनुभव मुझे बद्रीनाथ के , धूप में पारे के समान झिलमिलाते हुए हिम -- मय शिखरों के निकट पहुंचकर हुआ | हनुमान चट्टी से पांच: छ: मील की जो दुर्गम और विकट चढाई आरम्भ हुई थी ,
उसका अन्त एक ओर नर और दूसरी ओर नारायण नाम के पर्वतों तथा उनकी असंख्य श्रेणियों से घिरी हुई समतल भूमि में हुआ | श्वेत कमल की पखुडियो के समान लगनेवाले पर्वतों के बीच में निरन्तर कल -- कल नादिनी अलकनन्दा के तीर पर बसी हुई वह पूरी , हिमालय के हृदय में छिपी हुई इच्छा के समान जान पड़ी |
वृक्ष , फूल और पत्तो का कही चिन्ह भी नही था | जहा तक दृष्टि जाती थी निस्पंदन समाधि में मग्न तपस्वनी जैसी आडम्बरहीन सूनी पृथ्वी ही दिखाई देती थी | और उतने ही निश्छल तथा उज्जवल हिमालय के शिखर ऐसे लगते थे , मानो किसी शरद पूर्णिमा की रात्री में पहरा देते -- देते , चांदनी समेत जमकर जड़ हो गये हो |
बद्रीनाथ के एक मील बाहर वहा के वयोवृद्ध रईस नारायणदत्त ने फूलो से सजा हुआ एक सुन्दर बंगला बनवा रखा है , जिसमे कभी -- कभी कोई संभ्रांत व्यक्ति ठहर जाता है | परन्तु प्राय: उसकी दीवारों को पथिको का दर्शन दुर्लभ रहता है | पक्के तीर्थ यात्री पण्डे के संकीर्ण घर में भेड़--बकरियों की तरह भरे रहने में ही पुण्य की प्राप्ति समझते है |

नारायण जी ऐसे विदेह गृहस्थ है , जो अपनी साधना का फल औरो को समर्पण कर देने में ही सिद्धि समझते थे | बद्रीनाथ जैसे स्थान में उन्होंने बाग़ लगवाया , फलो के पेड़ लगाए है , आलू की खेती आरम्भ की है और न जाने कितने उपयोगी कार्य किए है | इतनी वृद्धवस्था में भी दिन -- दिन भर धूप में उन्हें काम करते और कराते देखकर हमें बड़ा विस्मय हुआ | फूलो के निकट रहने की इच्छा से , एकांत के आकर्षण से और अपने स्वभाव के कारण मैंने वही ठहरने का निश्चय किया , परन्तु हमारे सहयात्रियों में जो एक दो सच्चे तीर्थयात्री थे , वे उसी समय अपने पण्डे का आतिथ्य स्वीकार करने चले गये | पंडा जी हमे बुलाने आये और उनके नम्रता और उनका शील देखकर मेरा पंडो के प्रति उपेक्षा भाव तो दूर हो गया , परन्तु वह स्थान इतना रमणीक था की उसे छोड़ने की कल्पना भी अच्छी नही लगी |
वही रूपये सेर दूध , रूपये सेर आटा और एक आने की एक छोटी लकड़ी के हिसाब से लकडिया मंगाकर भोजन की व्यवस्था की गयी | कदाचित इस महंगेपंन के कारण ही बद्रीनाथ में यात्रियों से स्वंय भोजन न बनाकर पंडे के यहा या बाजार में भोजन का प्रबंध करने की प्रथा है | इस प्रथा का अनुकरण करने के कारण पूरी में ठहरने वाले हमारे साथी इतने अस्वस्थ हो गये की दूसरे ही दिन उन्हें उसे छोड़ देना पडा |
उस दिन तीसरे पहर तक उन रुपहले शिखरों को मन भरकर देखने के उपरान्त अलकनन्दा का छोटा -- सा पुल पार करके हम सब पूरी देखने निकले , परन्तु देखकर केवल निराशा हुई | संकीर्ण गलियों और घर दुर्गन्ध पूर्ण और गंदे थे |देखकर सोचा की जब हम इतने बड़े तीर्थ स्थान को भी स्वच्छ और सुन्दर नही रख सकते है , तब
किसी और स्थान को स्वच्छ रखने की आशा तो दुराशा मात्र है | उतुंग स्वर्ग के चरणों से ही नर्क की अटल गहराई बंधी है , इसका प्रमाण ऐसे ही स्थानों में मिल सकता है जहा पुण्य -- पाप , पवित्रता -- मलिनता और करुणा -- क्रूरता के एक दूसरे में जीने वाले द्वंद प्रत्यक्ष आ जाते है | असंख्य गणमान्य और नगण्य ,धनी और दरिद्र , शक्ति सम्पन्न और दुर्बल , सपरिजन और एकाकी यात्री वह प्रतिवर्ष जाते -- आते है | धनिकों के सारे अभाव तो उनका धन दूर कर देता है , परन्तु दरिद्रो के लिए न रहने का अच्छा प्रबंध है न भोजन का | फलत: अधिकाश: यात्री रोगी होकर लौटते है और कुछ मार्ग में ही परमधाम चल देते है |
उस दिन हम लोग दो मील दूर उस मन्दिर को देखने गये , जो द्रोपदी के गलने के स्थान पर उसकी स्मृति में बनाया गया है | वह से थोड़ी ही दूर पर दो पर्वतों के बीच से निकलती हुई वसुधारा की पतली धार दिखाई दी जो दूर से बादलो से छनकर आती हुई किरणों की तरह जान पड़ती थी | उसी के पास व्यास गुफा और तिब्बत जाने का मार्ग है और वही तिब्बती लोगो के एक ग्राम का भग्नावशेष , जिसमे अब भी कुछ लोग आते -- जाते दृष्टिगोचर हो जाते है |
बद्रीनाथ पूरी में देखने योग्य वस्तुओं में मन्दिर और अलकनन्दा के बीच में एक बहुत उष्ण जल का और एक ठंडे जल का सोता है | वही एक कुण्ड बना दिया गया है जिसमे दोनों स्रोतों का जल मिलाकर यात्रियों को स्नान कराया जाता है | संभव है यही तप्त कुण्ड इस स्थान की प्रसिद्धि का कारण हो | मन्दिर अपनी प्रसिद्धि के अनुरूप नही है और भीतर द्वारों पर कटघरे से लगाकर भगवान को भी बंधन में डाल दिया है | द्वारपाल उन्ही को सरलता से
प्रवेश करने देते है , जो वेशभूषा से संभ्रांत व्यक्ति जान पड़ते है | और मलिन वेश वालो को घंटो सतृष्ण दृष्टि से उन जाने -- आने वालो को देखते रहते है | भीतर जाकर लाल पगड़ी वाले सिपाहियों को अन्त:द्वार की रक्षा करते
देखकर हमारे विस्मय की सीमा नही रही | वे भी वस्त्रो को आदर की दृष्टि से देखते थे और दिन स्त्री -- पुरुषो को हाथ पकड -- पकडकर रोक देते थे | उस द्वार को भी पार कर नर नारायण की मूक प्रतिमा देखी , जिस पर न हर्ष था न विषाद , न कभी कुछ होने की आशा ही थी | केवल उनके पुजारी की आँखे हर्ष से नाच रही थी
| , वे दोनों हाथो से चढावे के थाल से चाँदी की राशि बटोर रहे थे | भगवान के लिए नही , परन्तु उनके पुजारी की प्रसन्नता के लिए मैंने भी रजत खंड चढाकर विषष्ण मुख से विदा ली |
दूसरे दिन हमने निकटवर्ती चाँदी के पहाड़ पर चढना आरम्भ किया , जिसमे बड़ा आनन्द आया | कही -- कही वर्फ जमकर ऐसी हो गयी थी की संगमरमर का भ्रम हो जाता था | न वह गलता था और न कुछ विशेष ठंडा लगता था | उससे ठंडा तो अलकनंदा का जल था , जिसमे हाथ डालते ही उंगलिया ऐठ जाती थी | हवा में कुछ विशेष सर्दी नही मालूम हुई | मुझे तो गर्म कपडे भी नही पहनने पड़े | जहा वर्फ पिघल रही थी , वहा से खोदकर कुछ वर्फ खाई और कुछ के गोले बनाकर लाये | तीसरे दिन प्रस्थान के समय फिर मन्दिर में जाकर फूलो की माला न मिलने के कारण जंगली तुलसी के पत्ते की माला चढाकर विदा हुए | पंडा जी सुफल बोलने के लिए उत्सुक थे , परन्तु मुझसे यह सुनकर की मेरी यात्रा की सफलता मेरे मन पर निर्भर है , मौन ही रहे | उन्होंने मुझे प्रसाद दिया और मैंने उनके आतिथ्य के बदले में उन्हें कुछ अर्पण किया | केवल उनसे स्वर्ग के लिए प्रवेश -- पत्र लेना मुझे स्वीकार नही था | बंगले में लौटकर कैमरे का कुछ दुरपयोग -- सदुपयोग किया | फिर नारायण दत्त से मिलकर उनके आतिथ्य के बदले में कुछ भेट देनी चाही | परन्तु उन्हें तो भगवान के मन्दिर में रहने का सौभाग्य प्राप्त नही था , जो लक्ष्मी की चरण - सेवा करना जाते | वे हमारी श्रद्धांजली से ही संतुष्ट हो गये |
बद्रीनाथ हमारा ऐतिहासिक तीर्थ स्थान है , परन्तु असंख्य यात्रियों में से दो चार ने कभी इसकी दुर्व्यवस्था के कारणों पर विचार किया होगा ऐसा विश्वास नही होता | ग्राम गंदा है , मन्दिर टूटा जा रहा है और तप्त कुण्ड की ओर अलकनंदा की धारा बढती जा रही है | संभव है , किसी दिन यह पवित्र और ऐतिहासिक केवल पुरात्व्त वेत्ताओं की खोज का विषय रह जाए
-सुनील दत्ता
-साभार लोक गंगा से
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