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मंगलवार, 28 जून 2016

कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल

मोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित सामाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहाँ पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
    यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी, के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनैतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहाँ ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर सवर्ण कही जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थी। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनैतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनैतिक सुधार।
    इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वे थे। अब वे राजनैतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
        वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनैतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनैतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ अवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन मुलायम, लालू या नीतीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में
सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग आंदोलन के नाम पर सिर्फ सवर्णों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
    दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धि हो गई हो और वे इसके बल पर सत्ता तक पहुँच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गई। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनैतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया। जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीड़ित की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनैतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिए से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिस पर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनैतिक बहसों को केंद्रित किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी।
    दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनैतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाइयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी। उसका मुसलमानों या ईसाइयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक
धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
    यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनैतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गाँव-गाँव तक पहुँचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गाँव-गाँव और पिछड़ी जातियों तक पहुँचाया। जहाँ स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
    वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढाँचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहाँ गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए
विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थीं, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है। इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता चलाती है तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी इस पर उनका लाजवाब तर्क था कि ब्राह्मणों को राजनीति में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया। इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। इसीलिए सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नीतीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णों की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल राजनीति ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूँढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीति ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक,आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।
   -राजीव कुमार यादव
 मोबाइल: 09452800752 
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

सोमवार, 16 मार्च 2015

कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल

Rajeev Yadav's profile photoमोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित समाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहां पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
                                                    यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8 वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित
किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनीतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहां ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर स्वर्ण कही
जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थीं। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनीतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनीतिक सुधार।
                                              इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वो थे। अब वे राजनीतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
                                                       वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनीतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनीतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ आवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन
मुलायम, लालू या नितीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल
आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग  आंदोलन के नाम पर सिर्फ स्वणों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे
उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
                                                     दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक से पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धी हो गई हो और वो इसके बल पर सत्ता तक पहंुच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गयी। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनीतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया।
                                           जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीडि़त की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनीतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिये से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिसपर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनीतिक बहसों को केंद्रित
किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी। दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ
उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनीतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी
विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाईयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि
यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी।
उसका मुसलमानों या इसाईयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
                                             यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनीतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गांव-गांव तक पहुंचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गांव-गांव और पिछड़ी जातियों तक पहंुचाया। जहां स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
                                                 वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर
सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढांचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहां गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।
                                               यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना
शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थी, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है।
                                                 इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता
चलाती हैं तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और
जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी पर उनका लावजवाब तर्क था कि
ब्राह्मणों को राजनीत में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, जब उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया।
                                                     इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। और इसीलिये सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नितीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णाें की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल
राजनीत ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूंढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक
उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
                      दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीत ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक, आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।

-राजीव कुमार यादव

सोमवार, 12 जनवरी 2015

क्या यह सिर्फ ट्रेलर है

तो क्या यह सिर्फ ट्रेलर है, पूरी फिल्म 26 जनवरी के आस-पास Displaying rajeev pic.JPGरिलीज होनी है?
कथित तौर पर पाकिस्तान से आने वाली ‘आतंकी नाव’ मामले में सरकार के दावों पर सवाल उठाने वालों को भाजपा ने तीन तरह से कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। पहला, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर आप कैसे संदेह कर सकते हैं, क्या ऐसा करने वालों को भारतीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों पर भरोसा नहीं है और क्या ऐसा करने से उनका मनोबल नहीं गिरेगा? दूसरा, इन एजेंसियों  ने 26/11 जैसे एक और आतंकी हमले को नाकाम कर दिया जिससे कि देश खुशी-खुशी नव वर्ष का जश्न मना सका। लेकिन ऐसा करने वालों को बधाई देने के बजाए उन पर सवाल उठा कर उन्होंने  साबित कर दिया है कि वे जनता की खुशी से दुखी हैं। तीसरा, ऐसे सवाल उठा कर वे पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं क्योंकि उनकी और पाकिस्तान की भाषा एक जैसी है।
भाजपा के इन आरोपों के पीछे की वैचारिकी पर बात करने से पहले जरूरी है कि इस मामले से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर किया जाए। पहला, रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा आक्रामक तरीके से उसे पाकिस्तान द्वारा आतंक फैलाने के लिए भेजा गया नौका बताने के बावजूद अधिकृत तौर पर वह नहीं कह पा रहे हैं कि उस नौका में विस्फोटक था
Crew was in touch with Pak army. The Hindu. 6 January 2015½A यानी जिस मुख्य बुनियाद पर उसके आतंकी नाव होने का दावा किया जा रहा है उसके होने पर ही स्पष्टता नहीं है। दूसरा, तमाम दावों के बावजूद कि उसमें चार आतंकी सवार थे जिनकी बातचीत भी इंटरसेप्ट की गई बताई जाती है, अभी तक उस पर चार लोगों के होने या किसी के भी न होने का कोई प्रमाण सुरक्षा एजेंसियां नहीं दे पाई हैं यानी चार लोगों के होने का दावा सिर्फ मौखिक है उसका कोई प्रमाण नहीं है। उनके बहुप्रचारित बातचीत के ‘इंटरसेप्ट’ किए जाने की माजूदा हकीकत भी यही है। तीसरा जब नौका कि अधिकतम स्पीड 10 से 12 नाॅट प्रति किलोमीटर ही हो सकती थी तब उसे क्यों नहीं पकड़ा जा सका क्यांेकि जिन सैन्य जहाजों से उनका पीछा किया जा रहा था कि उनकी स्पीड लगभग 34 नाॅट होती है?
¼was coast guard ship fast enough\ The Hindu. 4 January 2015½A
   चौथा , खबरों के मुताबिक
¼IB sore at being ignored. The Hindu. 6 January 2015½ खुफिया विभाग यानी आईबी को पूरे प्रकरण में नजरअंदाज करके रखा गया। जबकि नियमतः वह सबसे पहला संगठन था जिसे इस मामले में सूचित किया जाना चाहिए था। क्या गुजरात कोस्टल गार्ड ने ऐसा इसलिए किया कि यह कोई आतंकी घटना ही नहीं थी और पूरा मामला ड्रग्स या पेट्रोलियम पदार्थो की तस्करी करने वाले गिरोहों से जुड़ा था जिससे कोस्टल गार्ड अपने स्तर पर निपट सकते थे? और अगर वह आतंकी नाव थी तो फिर आईबी से उसकी जानकारी न शेयर किए जाने की क्या वजह हो सकती है? क्या ऐसा तो नहीं था कि कोस्टल गार्ड आतंकी नौका के प्रयासों को विफल कर देने का अकेले ही श्रेय लेना चाहती थी? लेकिन अगर ऐसा था तो कोस्टल गार्ड को ऐसा कर लेने का आत्मविश्वास किस बुनियाद पर था क्योंकि वे तो ‘मोटीवेटेड’ आतंकी थे जो ‘26/11’ दोहराना चाहते थे। यानी वे पूरी तरह तैयार और अपने मिशन के प्रति समर्पित रहे होंगे और उनके पास कितना हथियार और गोला बारूद था यह कोस्टल गार्ड्स को तो पता हो ही नहीं सकता था क्यांेकि वे उनसे काफी दूर थे। ऐसे में क्या कोस्टल गार्ड्स द्वारा लिया गया ‘बहादुराना’ निर्णय ‘कि हम खुद इससे निपट लेंगे’ स्वाभाविक मानी जा सकती है? दरअसल ऐसा तभी हो सकता है जब मदद के लिए तमाम विकल्पों के मौजूद होने के बावजूद किसी सुरक्षा एजेंसी के लोग यह तय कर लें कि उन्हें पागलपन की हद तक आत्मघाती होते हुए अकेले ही लोहा लेना है और वीरगति को प्राप्त हो जाना है और दूसरा तब जब उसे मालूम हो कि ‘दुश्मन’ वास्तव में ‘दुश्मन’ है ही नहीं। दूसरी सम्भावना के सच होने की सम्भावना इससे बढ़ जाती है कि पहली सम्भावना सच नहीं हो सकती। यानी युद्ध कौशल में प्रशिक्षित कोस्टल गार्ड इस तरह के अनप्रोफेशनल और मूर्खतापूर्ण निर्णय नहीं ले सकते, कम से कम उसके सभी सदस्य तो ऐसा नहीं कर सकते। तो क्या यह भी देश भर में होने वाली उन संदिग्ध आतंकी घटनाओं जैसे ही घटना थी जिसमें एक ही अपराध के लिए अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग मास्रमाइंडों को पकड़ती हैं, जो दरअसल आतंकवाद से निपटने के नाम पर अलग-अलग एजेंसियों के बीच श्रेय लेने के लिए मची होड़ का नतीजा होता है जो पूरे आतंकी घटना में भी इन एजेंसियों की भूमिका को संदिग्ध बना देता है। तो क्या यह भी ऐसा ही मामला था?
     पांचवा, इस घटना को 36 घंटे से ज्यादा समय तक क्यों  गुप्त रखा गया और नए साल के दूसरे दिन ही इसे ब्रेक किया गया। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इनके जो जवाब गृहमंत्रालय ने दिए हैं वो संतोषजनक नहीं हैं। मसलन, इसकी वजह यह बताई गई कि सुरक्षा एजेंसियां इस दरम्यान यह जानकारियां पुख्ता कर लेना चाहती थीं कि आतंकियों के टारगेट्स क्या हैं, वो अपने आकाओं से क्या बात कर रहे हैं और इसीलिए सुरक्षा एजेंसियों ने इस खबर को पहले रक्षामंत्री पर्रिकर और रक्षा सचिव आरके माथुर को दिया जिन्हें बाद में उनसे हरी झंडी मिलने के बाद ही सार्वजनिक किया गया। सवाल उठना लाजिमी है कि इन 36 घंटों में सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों के बारे में कौन सी पुख्ता जानकारी इकठ्ठा कर पाईं और वो कहां हैं? क्योंकि इन जानकारियों के आधार पर रक्षामंत्री यह तक दावे के साथ नहीं कह पा रहे हैं कि नौका में विस्फोटक था भी या नहीं। यानी पूरे नाव कथा में 36 घटों का घपला रहस्यमई है। वहीं जब 36 घंटे में कुछ भी महत्वपूर्ण हासिल नहीं हो पाया तब किस आधार पर इसे सार्वजनिक करने की हरी झंडी पहले भी पाकिस्तान से युद्ध करने की बात कर चुके रक्षामंत्री ने दिया? क्या इसकी वजह नए साल का जश्न मना रहे लोगों में आतंकी हमले का डर भर कर उन्हें एक सम्भावित हमले से बचा लेने की वाह-वाही लूटनी थी?
     वहीं जब पुख्ता तथ्य नहीं थे और सवाल गहराने लगे तब अचानक मीडिया माध्यमों में खुफिया सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरों की बौछार क्यों होने लगी कि लश्कर ने 26/11 दोहराने के लिए नाव भेजा था और समुद्र मार्ग से वह 200 और आतंकियों को भेजने की फिराक में है। या डूबे नौका में आतंकी जो सिगरेट पी रहे थे उन पर पाकिस्तान में बने होने पता लिखा था या मलवा इसलिए नहीं मिल पा रहा है कि पानी का बहाव पाकिस्तान की तरफ था जिसके कारण मलवा कराची पहंुच गया है। जैसे की मलवा और समुद्र की धाराएं भी ‘राजनीति से प्रेरित’ हो कर पाकिस्तान परस्त हो गई थीं। किसी भी निष्कर्ष तक पहंुचने से पहले इन सभी तथ्यों को नजर में रखना जरूरी होगा।
     अब भाजपा द्वारा उठाए गए सवालों पर आते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाना कहीं से भी गलत नहीं है। क्योंकि इस मसले पर लोगों की अपनी-अपनी समझ है। मसलन, मोदी सरकार की वैचारिक अभिभावक संघ परिवार के गुरू गोलवलकर की पुस्तक ‘वी आॅर आवर नेशनहुड डिफाईन’ के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ा खतरा मुसलमान और इसाई हैं जिन्हें या तो देश से बाहर निकाल देना चाहिए या उन्हें हिंदू बना देना चाहिए। वहीं भाजपा के पूर्ववर्ती अवतार जनसंघ के जमाने में संघ की समझदारी थी कि राष्ट्र की रक्षा के लिए जरूरी है कि लोग दस-बीस बच्चे पैदा करें जिसके लिए उन्होंने नारा दिया था ‘जिनके बच्चे हों दस बीस, उनकी मदद करें जगदीश’। जाहिर है राष्ट्रीय सुरक्षा के उसके इस नजरिए से सभी लोग सहमत नहीं हो सकते। इसलिए वे अपनी समझदारी के हिसाब से सवाल उठा सकते हैं। इसलिए यह कहना कि इस मुद्दे पर सवाल नहीं उठाया जा सकता गलत और अलोकतांत्रिक है। वहीं यह कहना कि ऐसा करने से सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिर जाएगा भी गलत है। क्योंकि इशरत जहां फर्जी एंकाउंटर से लेकर कई ऐसे उदाहरण हैं जहां सवाल उठने पर गुजरात की मोदी सरकार ने मनोबल गिरने का शोर मचाया था लेकिन जांच के बाद पता चला कि इन फर्जी मुठभेड़ों को मोदी को लाभ पहुँचाने के लिए अंजाम दिया गया जिसमें आईबी अधिकारी राजेंद्र कुमार भी शामिल था और जिसमें कई पुलिस अधिकारी जेल में बंद हैं। जाहिर है अगर जांच नहीं होती तो सच्चाई सामने नहीं आ पाती। दरअसल, खुफिया विभाग पर सवाल उठाना इसलिए भी जरूरी है कि वे अक्सर हिंदुत्ववादी राजनीतिक एजंेडे पर काम करती देखी जाती हैं। जैसा कि खुद आईबी के ज्वाइंट डायरेक्टर रहे मलयकृष्ण धर ने अपनी पुस्तक ‘ओपन सिक्रेट’ में लिखा है कि कैसे बाबरी मस्जिद तोड़ने की साजिशी बैठकें संघ परिवार के लोग उनके घर पर करते थे। वहीं हाल ही में आई राॅ अधिकारी रहे आरके यादव ने भी अपनी पुस्तक ‘मिशन राॅ’ में बताया है कि कैसे उसे मिलने वाले बिना आॅडिट के  पैसे से कई अधिकारी निजी व्यवसाय चलाते हैं और सिर्फ दिल्ली में ही कहां-कहां वे सेक्स रैकेट चलाते हैं। जाहिर है खुफिया एजेंसियों  पर सिर्फ सवाल उठाना ही जरूरी नहीं है उन्हें अन्य देशों की तरह संसद के प्रति जवाबदेह भी बनाने की जरूरत है।
     दूसरा, सुरक्षा एजेंसियों के दावों को बिना परखे उन्हें ‘बहादुरी’ के लिए बधाई नहीं देना कहीं से भी देशविरोधी काम नहीं है और ना यह नए साल का जश्न मनाने वाले लोगों की खुशी में दुख घोलने जैसा है। ऐसे सवाल उठाकर सरकार खुद अपने खिलाफ पैदा हो रहे शक को और पुख्ता कर ही है कि कहीं उसने राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तो उत्सवधर्मिता के माहौल में आतंक के हव्वे को मिलाकर राष्ट्रवाद का काॅकटेल नहीं तैयार करना चाह रही थी। जो कि दिल्ली आने से पहले मोदी गुजरात में करते रहे हैं? यह शक चार वजहों से और गहरा जाता है। पहला, उनके पीएमओ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ ही पीके मिश्रा जैसे शख्स हैं। जिन पर गुजरात में मोदी को कथित तौर पर मारने आने वाले लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मारने की साजिश में अहम भूमिका माना जाता रहा है। यानी यह पुराना और काफी परखा हुआ आतंक का गुजरात माॅडल है जिसे शायद अब दिल्ली से संचालित किया जा रहा है। दूसरा, ठीक इसी तरह नोएडा से कथित तौर पर दो आतंकी जो ‘नए साल पर दिल्ली को दहलाने आए थे’ भी 19 दिसम्बर को पकड़े गए थे। लेकिन मीडिया को इसकी सूचना 1 जनवरी को दी गई। सवाल उठता है कि आतंक की ‘आहट’ पा जाने भर पर जो सुरक्षा एजेंसियां मीडिया को खबर बे्रक कर देती हैं वो आश्चर्यजनक रूप से नए साल के आने तक क्यों खबर को दबाए रहीं? आखिर नए साल के पहले दिन इस खबर को बे्रक करके ऐसा क्या हासिल हो सकता था जो उसके 19 दिसम्बर के ब्रेक होने से नहीं हो सकता था? यहां यह जानना भी रोचक होगा कि आतंकियों की गिरफ्तारी को सार्वजनिक किये जाने से ठीक एक दिन पहले यानी 31 दिसम्बर को ही गाजियाबाद के एसपी धमेंद्र सिंह यादव ने प्रेस कांफे्रस किया और बताया कि गाजियाबाद में 10 आतंकी घुस आए हैं जिनकी तलाश की जा रही है और यह तलाशी 26 जनवरी तक चलेगा
¼10 terrorists believed to be hiding in Ghaziabad: police. The Hindu 1 January 2015½A जाहिर है यह नए साल का जश्न मना रहे लोगों को आतंक का डर दिखा कर उनमें असुरक्षाबोध भरने के लिए किया गया ताकि लोग इससे उत्तन्न होने वाले सम्भावित दहशत को अपने जश्न के समकक्ष रखकर सोचें। यह डर की राजनीति का एक बहुत ही कारगर और पुराना तरीका है जिसे यूरोप में काफी लम्बे समय से दक्षिणपंथी राजनीति आजमाती रही है- खुश लोगांे या खुशी मनाते लोगों को यह बताना कि अगर हम नहीं होते तो आप की खुशियां छिन जातीं। तीसरा, अगर नौका कथा और नोएडा की कहानी को एक साथ देखा जाए तो कुछ और सवाल उठने लाजिमी हैं। मसलन, गाजियाबाद के एसपी ने यह क्यों कहा कि आतंकवादियों की तलाश 26 जनवरी तक चलेगी। क्या उन्हें पूरा यकीन है कि 26 जनवरी तक आतंकी पकड़ ही लिए जाएंगे? अगर ऐसा है तो किस आधार पर है? वे 26 जनवरी से काफी पहले यानी 12,13,14, या 15, 16 जनवरी तक क्यों नहीं पकड़े जा सकते? या अगर वे 26 जनवरी तक नहीं पकड़े जा सके तो क्या उसके बाद उन्हें पकड़ने का अभियान नहीं चलेगा? क्या देश को उन आतंकियों से खतरा सिर्फ 26 जनवरी तक ही है? उसके बाद वे धमाका नहीं करेंगे? दरअसल इस पूरे मामले में 26 जनवरी का वही मतलब है जो नए साल की पहली तारीख का है, इन दोनों दिनों होने वाले आतंकी हमले या विस्फोट का राजनीतिक और मार्केट वैल्यू ज्यादा होता है। और यह कोई नई परिघटना नहीं है पहले भी होता रहा है। खास तौर से हिंदू त्योहारों के दौरान जब धार्मिक पारा काफी चढ़ा रहता है तब भी इस स्ट्रेटजी का इस्तेमाल होता है। जैसे पिछले साल ही बहुचर्चित लियाकत शाह जो सरकार की सहमति से सरेंडर करने पाकिस्तान से भारत आया था के मामले में हुआ था जिसे दिल्ली पुलिस ने यूपी के गोरखपुर से पकड़ने के बाद दिल्ली में गिरफ्तार दिखा दिया, इस दावे के साथ कि वह होली के दौरान दिल्ली में दहला कर अफजल गुरू की फांसी का बदला लेना चाहता था। जिसके पास से पुलिस ने एक होटल से एके 47 और भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद करा दिया था लेकिन गलती यह कर दी थी कि हथियार रखने वाले ने होटल की एंट्री रजिस्टर में अपना पता दिल्ली स्पेशल सेल लिख दिया था जिससे पूरा मामला खुल गया। या फिर जैसा कि 2008 में भी 24 जनवरी के दिन नोएडा में हुआ था जब दो बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकी बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। तो क्या इस साल से फिर राष्ट्रीय त्योहारों के दौरान लगभग हफ्ते भर तक चलने वाले ‘एंकाउंटर सप्ताह’ की वापसी होगी? और क्या इस बार ये ‘आतंकी’ मध्य प्रदेश की खंडवा जेल से कथित तौर पर भागे बताए जाने वाले चार नौजनाव होंगे, जो आश्चर्यजनक तरीके से पूरे देश भर में खुफिया एजंेसियों के मुताबिक ‘देखे’ तो जा रहे हैं लेकिन पकड़े नहीं जा पा रहे हैं? जिनके बारे में आतंक की राजनीति का कोई भी जानकार बता सकता है कि ये लड़के खुफिया एजेंसियों के ही पास हैं। तो क्या सुरक्षा और खुफिया एजंेसियां किसी आतंकी व्यूह रचना की तैयारी मंे हैं? गणतंत्र दिवस के मौके पर आने वाले अमरीकी राष्ट्रपति को ये बताने के लिए कि हम आपके खिलाफ होने वाले हर हमले या उसकी ‘योजना’ को नाकाम कर सकने मे सक्षम हैं।
      इसीलिए इन घटनाक्रमों से संदेह उत्पन्न होना लाजिमी है कि 26 जनवरी तक दिल्ली या उसके आसपास आतंकवाद के नाम पर कोई विस्फोट या फर्जी मुठभेड़ करने की फिराक में खुफिया एजेंसियां लगी हुयी हैं जैसा कि 2008 में भी 24 जनवरी के दिन नोएडा में हुआ था जब दो बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकी बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। यानी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि नौका और नोएडा से जो कहानी शुरू हुई है उसमें 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस जिसमें मुख्य अतिथि के बतौर अमरीकी राष्ट्रपति आ रहे हैं, एक अहम पड़ाव हो। जिसकी सम्भावना इससे भी बढ़ जाती है कि पिछली राजग सरकार के दौरान भी अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्ल्ंिाटन के भारत दौरे की पूर्वसंध्या पर कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा गांव में भारतीय सेना की वर्दी पहने और हिंदू धार्मिक नारे लगा रहे लोगों ने 36 कश्मीरीयों को कत्ल कर दिया था। जिसके बारे में क्लिंटन तक का सार्वजनिक तौर पर मानना रहा है कि उसे हिंदुत्वादी आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया था। यहां गौरतलब है कि इसमें आरोपी बता कर पकड़े गए सभी लोग निर्दोष साबित हो कर छूट चुके हैं। जाहिर है सुरक्षा एजंेसियों के दावों को बिना जांचे-परखे उन्हें बधाई देना कहीं से भी देशभक्ति नहीं है। क्योंकि देशभक्ति अपारदर्शी और संदिग्ध क्रियाकलापों की बुनियाद पर नहीं निर्मित होती है। चैथा और सबसे अहम कि इस मसले पर सुरक्षा एजंसियांे की भूमिका सदिग्ध इससे भी हो जाती है कि इस मुद्दे पर सरकार के दावों पर सबसे पहले सवाल उठाने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार प्रवीण स्वामी के खिलाफ ‘देशविरोधी रिपोर्टिंग’ कारण प्रदर्शन किया है।
¼rightwing protest against journalist Pravin Swami over ‘antinational’ news item. Outlook 7 January½Aजाहिर है जिस संगठन पर पूरे देश में मुसलमानों की दाढ़ी-टोपी लगाकर सुरक्षा और खुफिया एजंेसियों के सहयोग से मस्जिदों, ट्रेनों, अदालतों में बम विस्फोट करने के सबूत हों ,वे अगर इस पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ बोल रहे हैं तो सरकार पर उठने वाले संदेह और पुख्ता हो जाते हैं। कम से कम इन संगठनों और सरकार की भूमिका को केंद्र मंे रखकर इस प्रकरण में जांच की जरूरत तो इससे जरूर पैदा हो जाती है।
      तीसरे, सरकार के दावों पर सवाल उठाने वालों और पाकिस्तान सरकार दोनों की भाषा और तर्कों  के एक जैसे हो जाने से कोई देश विरोधी या पाकिस्तान परस्त नहीं हो जाता। क्या ऐसे तर्क ‘पाकिस्तान समर्थक’ घोषित कर देने की धमकी जैसे नहीं हैं जिसका मकसद इस डर को दिखा कर सवाल उठाने वालों को चुप कराना है? और क्या यही वजह नहीं है कि पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस मसले पर सवाल उठाने वालों के बारे में कहा कि ऐसा करने वाले भूल गए हैं कि उन्हें भारत में चुनाव लड़ना है पाकिस्तान में नहीं। यानी, अगर भारत में चुनाव लड़ना है तो अनिवार्यतः आपको अंधराष्ट्रवादी, अतार्किक और इस हद तक पाकिस्तान विरोधी होना होगा कि यदि पाकिस्तान के लोग दिन को दिन कहें तो आप को उसे रात कहना होगा? तो क्या भारत को विश्वगुरू बनाने का संघ का रास्ता मूखर्ता की इन्हीं संर्कीण गलियों से हो कर जाता है। और अगर मान लिया जाए कि ये तथ्य पाकिस्तान जो इस मसले पर भारत सरकार पर उसे बदनाम करने का आरोप लगा रहा है, के पक्ष में हैं तो क्या सिर्फ इस वजह से इन तथ्यों को नहीं उठाना चाहिए। दरअसल सच्चाई को सच्चाई की तरह ही लेना चाहिए उसमें नफा नुकसान नहीं देखा जाना चाहिए। मसलन क्या इस बात के लिए नाराज होते समय कि मुम्बई हमलों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले लखवी को जमानत कैसे मिल गई हमें इस बात पर नाराज नहीं होना चाहिए कि समझौता एक्सप्रेस धमाके के मास्टरमाइंड असीमानंद को सिर्फ जमानत नहीं मिली, लखवी के विपरीत वह रिहा भी हो गया। क्योंकि पाकिस्तान सरकार इस मामले में हमसे ज्यादा इमानदार निकली और उसने लखवी की जमानत को चैलेन्ज किया लेकिन हमारी सरकार जिसके मुख्यिा के साथ असीमानंद की तस्वीरें भी सार्वजनिक हो चुकी हैं, ने असीमानंद के मामले में ऐसा नहीं किया। यानी यह नहीं हो सकता कि हमारा मारा जाना सच्चाई हो और उनका मारा जाना अफवाह। दरअसल, सच्चाई सिर्फ सच्चाई होती है। वह भारतीय या पाकिस्तानी और भाजपाई या वामपंथी नहीं होती। और इस समय सच्चाई यही है कि नौका मामले में जो सरकार कह रही है वह सच्चाई नहीं है। 
 
-राजीव कुमार यादव
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