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शनिवार, 7 नवंबर 2015

लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है पुरस्कार वापसी

‘‘पिछले कुछ हतों में लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के सम्मान लौटाने की बाढ़ देखी गई। पुरस्कार लौटाने के जरिये ये सम्मानित और पुरस्कृत लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए खड़े हुए हैं। बढ़ती असहिष्णुता और हमारे बहुलतावादी मूल्यों पर हो रहे हमलों पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए इन शिक्षाविदों, इतिहासकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों के कई बयान भी आए हैं। जिन्होंने अपने पुरस्कार लौटाए हैं वे सभी साहित्य, कला, फिल्म निर्माण और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों में से हैं। इस तरह सम्मान लौटाकर उन सभी लोगों ने सामाजिक स्तर पर हो रही घटनाओं पर अपने दिल का दर्द बयान किया है।
बढ़ती असहिष्णुता की वजह से दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई। गोमांस खाने के मुद्दे पर एक मुस्लिम की पीट-पीट कर हत्या कर दिए जाने की घटना भी हुई है, जिसने समाज के विवेक को हिलाकर रख दिया। समाज के विभिन्न वर्गों के इस तरह का कड़ा संदेश देने के कारण भाजपा से जुड़े लोग, उसके मूल संगठन आरएसएस और उससे संबंधित कई संगठन तथ्यहीन आधार पर इन लोगों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। 
इन घटनाओं से चिंतित भारत के राष्ट्रपति बार-बार देश को बहुलतावादी सामाजिक मूल्यों की याद दिला रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने भी कहा है कि नागरिको के जीने के अधिकार की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। मूडीज जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि अगर मोदी अपने सहयोगियों पर लगाम नहीं लगाते हैं तो भारत अपनी विश्वसनीयता खो देगा। हाल के दिनों में असहिष्णुता के बढ़ते माहौल से चिंतित देश के प्रबुद्ध नागरिक बेचैनी महसूस कर रहे हैं। जुलियस रिबेरो का यह बयान इसकी बानगी है कि भारत में एक ईसाई होने की वजह से वह परेशान महसूस कर रहे हैं। अब नसीरुद्दीन शाह ने कहा है कि देश में पहली बार उन्हें उनके मुस्लिम होने का एहसास कराया जा रहा है। शायर और फिल्मकार गुलजार ने कहा कि आज ऐसा वक्त आ गया है कि लोग आपका नाम पूछने से पहले आपका धर्म पूछते हैं। नारायण मूर्ति और किरण मजूमदार शॉ जैसे प्रख्यात उद्यमियों ने भी बढ़ती असहिष्णुता पर अपनी चिंता जाहिर की है। इसी तरह आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन जैसे लोग भी बहुलता के मूल्यों को संरक्षित करने के लिए आवाज उठाने वालों के साथ खड़े हैं।     
सत्ताधारी समूह भाजपा के नेताओं द्वारा इन रचनाकारों-वैज्ञानिकों पर हमला बोलते हुए इनके कदम को बनावटी विद्रोह करार दिया गया है, जैसा कि अरुण जेटली ने किया। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि जो लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं वे वामपंथी हैं या कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान विशेषाधिकारों के लाभार्थी रहे हैं और अब पिछले एक साल से भाजपा के सत्ता में आ जाने की वजह से ये लोग चकित होकर हाशिये पर हैं इसलिए यह विरोध हो रहा है। आरोप यह लगाया जा रहा है कि ये लोग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा लिखी जा रही विकास की कहानी को पटरी से उतारने या बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जेटली तो यहां तक कह गए कि खुद नरेंद्र मोदी इन सम्मान लौटाने वालों की असहिष्णुता का शिकार रहे हैं। राजनाथ सिंह जैसे कुछ लोगों का कहना है कि ये लोग मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं जबकि ये कानून व्यवस्था की मामूली घटनाएं हैं जो राज्य सरकार की जिम्मेवारी है।
जो घटनाएं हुई हैं वे न तो कानून व्यवस्था की समस्याएं हैं न ही वह संरक्षण के विश्वास के खत्म होने से
संबंधित हैं क्योंकि ये घटनाएं समाज के तीव्र सांप्रदायिकरण की अधिक वृहद प्रक्रिया से संबंधित हैं। इस बार सांप्रदायिकरण की सीमा ने सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर दिया है। पुरस्कार लौटाने वालों पर आपातकाल, सिख विरोधी दंगों, कश्मीरी पंडितों के पलायन और 1993 के मुंबई बम धमाकों के वक्त अपना पुरस्कार नहीं लौटाने का जो आरोप लगाया जा रहा है वह बढ़ती असहिष्णुता की प्र.ति और इसकी सीमा के स्तर पर होने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया से निबटने का एक कृत्रिम प्रयास है। वापस किए गए पुरस्कारों और विभिन्न वर्गों द्वारा जारी बयान में इसके जो कारण बताए गए हैं वे कारण इस तरह की सभी घटनाओं में मौजूद हैं। जेटली और उनकी मंडली द्वारा रेखांकित की गईं ये सभी घटनाएं भारत के हालिया इतिहास के दुखद हिस्से हैं। बहुत सारे लेखकों ने इन घटनाओं के खिलाफ प्रतिरोध किया था। उनमें से कई लोग तो उस समय तक पुरस्कृत भी नहीं हुए थे।
आज के समय की घटनाओ की तुलना कई वजहों से पहले की घटनाओं से नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए आपातकाल के मामले को देखें। आपातकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय था, यह मुख्य रुप से ऊपर से थोपी गई तानाशाही थी। वर्तमान समय में सबसे खतरनाक बात सत्ताधारी पार्टी से संबंधित संगठनों का सघन जाल या तंत्र है जिसके कार्यकर्ता या तो खुद ही समाज में नफरत फैलाते हैं या वे जहर भरे भाषण के जरिये सामाजिक वर्गों को उद्वेलित करते हैं। जिसका नतीजा हिंसा होती है। वर्तमान समय में सहिष्णुता के मूल्यों और और उदार विचारों के ऊपर दोहरा हमला हो रहा है। सत्ताधारी समूह में योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति जैसे नेता हैं जो सत्ता का मजा लेते हुए लगातार नफरत भरे भाषण दे रहे हैं और सामाजिक स्तर पर इस तरह के तोड़ने वाले बयान प्रचलित हो रहे हैं।       
इसका दूसरा स्तर, सांप्रदायिक विचारधारा के द्वारा सांस्थानिक नियंत्रण करना है। हमारे विज्ञान और तकनीक के अग्रणी क्षेत्रों को दिन रात बर्बाद किया जा रहा है। अंधविश्वास को बढावा देना इस नीति का एक उपफल है। वर्तमान राजनीतिक सत्ता में अंधविश्वास और धार्मिक उद्यमियों (बाबा और आधुनिक गुरु) का बड़ा प्रभाव है। आरएसएस द्वारा फैलाई जा रही हिंदू राष्ट्र की विचारधारा सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर हावी है। और अंततः घर वापसी, लव जिहाद और गोमांस जैसे मुद्दों का इस्तेमाल कर विभिन्न जरियों से समाज की सोच में दूसरों से नफरत की विचारधारा फैलाई जा रही है। ये घटनाएं धार्मिक अल्पसंख्यकों में सामाजिक असुरक्षा की तीव्र भावना पैदा कर रही हैं। इसी की वजह से दादरी जैसी घटनाएं घट रही हैं। लोकतांत्रिक क्षेत्रों में हो रहे अतिक्रमण को जानबूझकर नजरअंदाज करते हुए इन घटनाओं को कानून व्यवस्था की समस्या साबित किया जा रहा है।
मूलतः सांप्रदायिक हिंसा के पागलपन की जड़ें उस पूर्वाग्रह में हैं जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत पैदा करती हैं। और यही जहर हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा या किसी भी धर्म या जाति के नाम की अन्य सांप्रदायिक राष्ट्रवाद से बहता है। वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्रवाद के स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जो एक प्रमुख ताकत है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता के अंदर खुद अपना ही विभाजनकारी और अनुपूरक प्रभाव है। अन्य जरियों के माध्यम से इस तरह की विचारधारा दूसरों से नफरत की भावना पैदा करती है और गोहत्या और गोमांस खाना लोगों की हत्या करने का आधार बन जाता है। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के कारकून संकल्प लेते हैं कि अपनी पवित्र मां, गौमाता की हिफाजत करते हुए हम मारेंगे और मारे जाएंगे।
इस तरह का यह सिर्फ एक मामला है। आज के माहौल का प्रमुख कारण दूसरों के लिए नफरत के गुणात्मक परिवर्तन में निहित है। अल्पसंख्यकों को एक खास छवि में पेश करने का चलन जो हिंदू राष्ट्रवाद के साथ शुरू हुआ था भीषण तरीके से बढ़ चुका है, जहां गुलजार जैसे लोगों को वो सब कहना पड़ा जो उन्होंने कहा है। इसलिए जब जेटली जैसे लोगों द्वारा इन लोगों के उठाए गए कदमों को कमतर आंका जा रहा है और राजनाथ सिंह जैसे लोग इसे कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में दोहरा रहे हैं तो लोकतंत्र की आवाज उठा रहे लोगों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है और उदारवादी सोच और सहिष्णुता सिकुड़ती जा रही है। हमारे लोकतांत्रिक समाज पर मंडराते सांप्रदायिक प्रचार और लोकतांत्रिक विचारों की दमघोंटू राजनीति के बड़े खतरे की ओर समाज के बड़े वर्गों का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें और अधिक तरीकों के बारे में सोचना जारी रखना होगा। और ये कोई मामूली समय नहीं हैं, विभाजनकारी प्रक्रियाओं ने खतरनाक अनुपात ले लिया है और उन्हें भ्रामक विकास की कहानी से छिपाया नहीं जा सकता है।
-राम पुनियानी

गुरुवार, 28 मार्च 2013

संसद् हमले में एस.टी.एफ. की कोई भूमिका थी या नहीं?

फाँसी तो हो गयी किन्तु यह तो पता चले कि संसद् पर हमला किया किसने था?
संदीप पाण्डेय
( हाल ही में लियाकत शाह के मामले से साफ हो गया है कि किस तरह पुलिस श्रेय लेने के लिये आत्मसमर्पण किये हुये उग्रवादियों को फर्जी मामलों में फँसा कर आतंकवादी के रूप में पेश करती है। यदि जम्मू-कश्मीर पुलिस और मुख्य मन्त्री उमर अब्दुल्लाह ने खुल कर लियाकत के पक्ष में भूमिका नहीं ली होती तो सारा देश यही मानता कि लियाकत होली के समय दिल्ली में विस्फोट करने आया था। यह भी सवाल उठता है कि पुरानी दिल्ली में बरामद हथियार-बारूद किसने रखे थे ? हमारा मानना है कि अफजल गुरु का मामला लियाकत जैसा ही था। एस.टी.एफ. और दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने उसे बलि का बकरा बना दिया। इस देश में पुलिस अपनी अक्षमता को छिपाने के लिये अन्य मामलों में भी निर्दोष लोगों को फँसाती रही है।
-सं. पा.)
       अफजल गुरु को फाँसी हो गयी। अफजल को फाँसी की सजा इसलिये दी गयी थी कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना संतुष्ट हो सके। राष्ट्र की सामूहिक चेतना संतुष्ट हो गयी होगी। राष्ट्रवादी लोगों ने नाच-गा कर, एक-दूसरे को मिठाई खिला कर, पटाखे चला कर खुशियां मनायीं। शायद सजा सुनाने के पीछे उद्देश्य भी यही था कि एक अध्याय पूरा हो।
किन्तु एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। संसद् पर हमले की साजिश आखिर रची किसने थी? जो पाँच कड़ी सुरक्षा भेद कर संसद् भवन तक पहुँच गये थे वे तो मौके पर ही मारे गये। जाँच एजेंसियों के अनुसार साजिशकर्ता हैं मसूद अज़हर, गाजी बाबा और तारिक अहमद जो पाकिस्तान में हैं। जाहिर है कि इन्हें अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।
फिर अफजल कौन था और संसद् हमले में उसकी क्या भूमिका थी? आइये देखें उसका और उसकी पत्नी का पक्ष जो पत्र रूप में उसकी सजा से पहले सार्वजनिक हो चुका था।
अफजल गुरु को फाँसी की सजा हुयी मात्र उस इकबालिया बयान के आधार पर जो उसने विशेष पुलिस सहायक पुलिस आयुक्त राजबीर सिंह के दबाव में मीडिया के सामने दिया। उसे यह धमकी दी गयी थी कि यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसके परिणाम उसकी पत्नी और बच्चों के लिये सही नहीं होंगे।
अफजल गुरु जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की ओर 1990 में आकर्षित हुआ और प्रशिक्षण के लिये पाकिस्तान गया। किन्तु तीन माह ही रहने के बाद वह लौट आया क्योंकि उसे इन संगठन के नेताओं की बातें, खासकर पाकिस्तान के पक्ष में, पसन्द नहीं आयीं। उसने लौटकर सीमा सुरक्षा बल के सामने आत्मसमर्पण किया। उसे जल्दी ही समझ में आया कि आत्मसमर्पित उग्रवादी के रूप में रहना आसान नहीं। उसे समय समय पर सेना, बी.एस.एफ. व एस.टी.एफ. जैसी सुरक्षा एजेंसियाँ परेशान करती रहती थीं। उसका परिवार सुरक्षित रहे इसलिये अफजल गुरु जैसे आत्मसमर्पण किये हुये उग्रवादी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बताये गये सही या गलत काम करने को मजबूर थे। जो पैसे दे सकते थे उन्हें परेशान नहीं किया जाता। यानी यहाँ भी भ्रष्टाचार। एक बार पारमपोर पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मी अकबर ने उससे पाँच हजार रुपये माँगे थे और फिरौती न मिलने की सूरत में उसे नकली दवायें व चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार किये जाने की धमकी दी गयी। अफजल के मुदकमे के दौरान अकबर भी गवाह के रूप में न्यायालय में पेश हुआ और अफजल के खिलाफ बयान दिया। अफजल ने 1997-98 में दवाओं और उपकरणों का व्यापार कमीशन के आधार पर शुरू किया था चूँकि आत्मसमर्पित उग्रवादियों को नौकरी नहीं मिल सकती थी। इससे अफजल की चार-पाँच हजार प्रति माह की कमाई हो जाती थी। वर्ना एस.टी.एफ. के साथ विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में काम करना पड़ता जिसमें आतंकवादियों के हाथ मारे जाने का खतरा रहता था। अफजल को एस.पी.ओ. को भी 300-500 रुपये घूस देनी पड़ती थी ताकि वे उसे परेशान न करें।
एक दिन सुबह 10 बजे जब वह दो माह पुराने स्कूटर से जा रहा था तो एस.टी.एफ. उसे पकड़ कर पलहल्लन शिविर ले गयी। यहाँ उसे काफी प्रताड़ित किया गया। फिर उसे हमहामा शिविर ले गये। यहाँ भी यातनाओं का

दौर चलता रहा। एस.टी.एफ. उससे रुपयों की माँग कर रही थी जिसके लिये उसे अन्ततः उसे अपनी पत्नी के जेवर बेचने पड़े। कुल मिलाकर 80 हजार रुपये नकद और अपने नये स्कूटर से उसे हाथ धोना पड़ा। हर एक प्रताड़ना के बाद स्थिति ये होती थी कि कई दिनों तक इलाज कराना पड़ता था।
      1990 से 1996 के दौरान अफजल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और उस दौरान ट्यूशन भी पढ़ाता था। बड़गाम के एस.एस.पी. अशफाक हुसैन के साले अल्ताफ हुसैन ने उसे अपने दो बच्चों को पढ़ाने के लिये कहा। एक दिल अल्ताफ अफजल को डी.एस.पी. दरविंदर सिंह के पास ले गया। उससे कहा गया कि उसे मोहम्मद नामक एक आदमी, जो गैर-कश्मीरी था, को दिल्ली ले जाना है और उसे वहाँ किराये का घर दिलवाना है। वहाँ कार खरीदवाने से लेकर उसने मोहम्मद की सभी प्रकार से मदद की। एक दिन मोहम्मद ने उसे पैंतीस हजार रुपये देकर कश्मीर वापस जाने के लिये मुक्त कर दिया। इस बीच अफजल ने दिल्ली में आकर अपनी पत्नी और चार वर्ष के बेटे गालिब के साथ रहने के फैसले के साथ एक कमरा भी इन्दिरा विहार में किराये पर ले लिया। उसने चाभियाँ मकान मालकिन को सौंपते हुये उनसे कहा कि वह शीघ्र परिवार के साथ लौटेगा।
संसद् हमले के बाद कश्मीर पहुँच कर जब अगले दिन वह सोपोर की बस पकड़ने के लिये बस स्टैण्ड पर खड़ा था तो श्रीनगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गयी। उससे पैंतीस हजार रुपये ले लिये गये। एस.टी.एफ. मुख्यालय ले गये। वहाँ से दिल्ली ले जाया गया। विशेष सेल ने यहाँ उसको प्रताड़ित करना शुरू किया।
विशेष सेल द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में जब उसने यह कह दिया कि सैयद अब्दुर रहमान गिलानी निर्दोष हैं तो ए.सी.पी. राजबीर सिंह मीडिया के सामने उस पर बहुत नाराज हुये और मीडिया को उस बयान को न दिखाने या छापने का आग्रह किया।
अफजल को यह समझाया गया कि एस.टी.एफ. का सहयोग करने में ही उसकी भलाई है। दिल्ली में उसे उन जगहों पर ले जाया गया जहाँ से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। फिर उसे कश्मीर ले गये और वहाँ से वापस दिल्ली। उससे कई सादे कागजों पर हस्ताक्षर करयेए गये।
अफजल को न्यायालय में अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला। न्यायाधीश ने उससे कहा कि अन्त में उसे मौका दिया जायेगा लेकिन अदालत ने उसके बयान दर्ज नहीं किये और न ही दर्ज किये बयानों को उसे दिखाया गया। यदि सिर्फ उसे किये गये फोन कॉल का ही रिकॉर्ड निकाला जाता तो पता चल जाता कि एस.टी.एफ. ने उसे कितने फोन किये। उच्च न्यायालय का फैसला आने तक उसके मुकदमे की कैसी सुनवाई हो रही है उसे इसका कोई अँदाजा ही नहीं था।
हो सकता है अफजल ने अपने को बचाने के लिये उपर्यक्त बात कही हों। किन्तु यदि ये बातें सही हैं तो बड़ी गम्भीर हैं। एक तो अफजल का संसद् हमले से सिर्फ इतना सम्बंध था कि उसने मोहम्मद नामक एक आदमी की मदद की जिसकी कोई भूमिका संसद् हमले में प्रतीत होती है। यह मोहम्म्द कौन है? सबसे गम्भीर बात यह है कि उसने मोहम्मद की मदद एस.टी.एफ. के कहने पर की जिस बात को न्यायालय ने नहीं माना। क्या यह न्यायोचित नहीं है कि यदि अफजल ने यह बात कही है तो इस कोण की भी जाँच हो कि संसद् हमले में एस.टी.एफ. की कोई भूमिका थी या नहीं? एस.टी.एफ. की भी जिम्मेदारी है कि एक निष्पक्ष जाँच के उपरान्त अपनी भूमिका साफ करे।
यदि हम ऐसा नहीं करते तो संसद् हमले की साजिश की तह तक कभी नहीं पहुचेंगे और इस तरह के हमलों का खतरा बना रहेगा। अपनी सुरक्षा के लिये यह सच पता लगाना जरूरी है कि संसद् पर हमले की साजिश किसने की?
 -संदीप पाण्डेय, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और मेगसेसे पुरस्कार विजेता हैं
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