लो क सं घ र्ष !
लोकसंघर्ष पत्रिका
सोमवार, 12 जनवरी 2026
संघी एक विवाह के लिए तरसते हैं भाजपाई मुख्यमंत्री के बेटे का चौथा विवाह
संघी एक विवाह के लिए तरसते हैं
भाजपाई मुख्यमंत्री के बेटे का चौथा विवाह
फिर सुर्खियों में पूर्व मंत्री दीपक जोशी, 20 साल छोटी कांग्रेस नेता से शादी की चर्चा,
मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री दीपक जोशी फिर सुर्खियों में हैं। सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेत्री पल्लवी राज सक्सेना से उनके विवाह की तस्वीरें वायरल हो रही ह ...
भाजपा के पूर्व मंत्री दीपक जोशी के कांग्रेस नेत्री से विवाह की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है।
पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे हैं
शुक्रवार, 9 जनवरी 2026
अटल और कांग्रेस की शेरनी ममता ही शाह को चुनौती दे रही है
अटल और कांग्रेस की शेरनी ममता ही शाह को चुनौती दे रही है
‘अगर मुझे निशाना बनाया तो मैं जनता को सब बता दूंगी…’, सीएम ममता बनर्जी ने दी भाजपा को धमकी
ममता बनर्जी ने ईडी की छापेमारी के विरोध में कोलकाता में मार्च निकाला। बनर्जी ने दावा किया कि सभी एजेंसियों पर कब्जा कर लिया गया है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि टीएमसी की रणनीति को ‘चोरी’ करने के लिए ईडी बीजेपी के राजनीतिक हथियार के रूप में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि ईडी द्वारा इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के कार्यालय और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी के दौरान उनका वहां पहुंचना गलत नहीं था।
ममता बनर्जी ने धमकी दी है कि अगर उन्हें निशाना बनाया गया तो वह बीजेपी से जुड़ी गोपनीय जानकारी का खुलासा कर देंगी।
ममता बनर्जी ने शुक्रवार को दस किलोमीटर लंबे विशाल विरोध मार्च के बाद कोलकाता में आयोजित रैली को संबोधित किया।
‘ममता बनर्जी शेरनी हैं, वह नहीं झुकेंगी…’
कुछ भी गैरकानूनी नहीं किया- ममता
ममता ने कहा कि उन्होंने छापेमारी वाली जगह पर टीएमसी चीफ के रूप में दखल दिया था, न कि मुख्यमंत्री के रूप में। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने कल जो कुछ भी किया, वह तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर किया। मैंने कुछ भी गैरकानूनी नहीं किया है।’
ममता बनर्जी ने कहा कि ईडी सुबह-सुबह I-PAC के कार्यालय पहुंच गई और जब तक वह पहुंचीं, तब तक बहुत सारा सामान पहले ही ले जाया जा चुका था। उन्होंने ईडी पर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले उनकी पार्टी के रणनीतिक दस्तावेजों तक पहुंचने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
एजेंसियों पर कब्जा करने का आरोप
बनर्जी ने केंद्र पर हमला बोलते हुए दावा किया कि सभी एजेंसियों पर कब्जा कर लिया गया है। उन्होंने बीजेपी पर कई राज्यों की सत्ता पर जबरन कब्जा करने का आरोप लगाया। ममता ने सवाल किया, ‘‘आपने ताकत के बल पर महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार की सत्ता पर कब्जा किया। क्या आपको लगता है कि आप बंगाल पर भी कब्जा कर सकते हैं?’’ बनर्जी ने कहा कि कोई भी राजनीतिक हमला उनके संकल्प को और मजबूत करता है।
ममता ने कहा, “आप भाग्यशाली हैं कि मैं अभी भी पद पर हूं; इसीलिए मैंने (बीजेपी से संबंधित गोपनीय जानकारी वाली) पेन ड्राइव का खुलासा नहीं किया है। अगर आप मुझे निशाना बनाने की कोशिश करेंगे तो मैं वह जानकारी सार्वजनिक कर दूंगी… मुझे बहुत कुछ पता है लेकिन देश के हित में मैं नहीं बताना चाहती।”
चुनाव आयोग पर भी बोला हमला
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘अगर कोई मुझे राजनीतिक रूप से निशाना बनाने की कोशिश करता है, तो मुझे नयी ऊर्जा मिलती है और पुनर्जन्म होता है।’’
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी ने उसकी मदद से महाराष्ट्र में जनादेश चुरा लिया था और अब एसआईआर के जरिये वैध मतदाताओं के नाम हटाकर बंगाल में भी ऐसा ही करने का प्रयास कर रही है।
बिरजीस कदर का कुनबा: मोहब्बत से महरूम दस अकेली औरतों की कहानियां विनोद दास
मुंबई इप्टा की नयी प्रस्तुति :
बिरजीस कदर का कुनबा: मोहब्बत से महरूम दस अकेली औरतों की कहानियां
विनोद दास
इन दिनों सत्ता ने आम आदमी की बुद्धि पर कब्जा करने का बीड़ा उठा रखा है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र पर इसकी काली छाया पड़ रही है। वर्तमान पढ़ा-लिखा मानस भारतीय संस्कृति की बहुलतावादी परंपरा को छोड़कर बहुसंख्यकवाद को समर्थन देकर समझता है कि इस तरह वह अपना और अपने जैसे साहित्य -संस्कृति कर्मियों की ऐसे हमले से रक्षा कर लेगा लेकिन वह शायद भूल रहा है कि अंततः मनुष्य विरोधी अभियान के तहत एक दिन उसकी भी बारी आएगी।
कुछ यही डर और कुछ प्रसिद्धि की लालसा में साहित्य -संस्कृति से सम्बद्ध एक बड़ा तबका नखदंत विहीन होकर सत्ता की चरणवंदना या बाजार के उत्सवों में लिप्त है।
ऐसे परिदृश्य में अपनी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को बचाए रखने के लिए विश्व साहित्य के क्लासिक के पास जाने से जहाँ हमें ठहरकर ज़िन्दगी को देखने की दृष्टि मिलती है ,वहीं प्रतिरोध की हमारी आंतरिक शक्तियों को संचित करने की ऊर्जा मिलती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कल साँझ हम स्पेन के कवि-नाटककार फेडरिक गार्सिया लोर्का का लगभग 90 वर्ष पूर्व लिखा अमर नाटक “द हाउस ऑफ बरनाडा अल्बा” का मंचन हम पृथ्वी थियेटर मुंबई में देखने गए। इसका हिन्दी अनुवाद हिन्दी के प्रख्यात कवि -संपादक रघुवीर सहाय ने बिरजीस कदर का कुनबा” नाम से किया था। हालाँकि इस नाटक की प्रस्तुति के लिए उर्दू रूपांतरण चर्चित पटकथाकार शमा जैदी का है। निर्देशन मसूद अख्तर ने किया। मंच की साज- सज्जा का अभिकल्पन गर्म हवा सरीखी फिल्म के प्रख्यात फिल्मकार एम.एस सथ्यू का था।
तो फिर आइए बिलकिस बेगम के कुनबे में तशरीफ़ लाइए।
मंच के अग्रभाग में फर्श पर बिछा फर्शपोश । बाईं ओर खड़ी चारपाई। पृष्ठभूमि में तीन दरवाज़ों वाली हवेली के भीतर झाँकता एक दरवाज़ा। बेंत से बुना एक मोंढा। पास में रखे पुराने मुस्लिम परिवारों में इस्तेमाल किया जाने वाला एक बड़ा और एक छोटा दो टोंटीदार लोटे। एक बिछी चारपाई पर सफ़ेद मसनद के साथ अस्त -व्यस्त बिखरी रंगीन ओढ़ने की चादर। पीछे चबूतरे पर रखा पानी का एक घड़ा। घड़े पर रखा गिलास। इससे सटी हुई गेरुए रंग की ऊपर जाती हुईं सीढ़ियाँ। ऊपर जाता हुआ मुस्काराता दिखता ऊँचा दरवाजा जैसे ऐलान कर रहा हो कि ऊपर छत है। देखते ही दर्शक को समझ में आ जाता है कि यह एक परंपरागत मुस्लिम परिवार के घर की संरचना है। बीच में खुली जगह को इस तरह विकसित किया गया है कि वह घर का दालान लगे। कहना न होगा कि नाटक की अधिकांश गतिविधियां इसी दालान में घटित होती हैं।
इस फिज़ा में रोशनी होते ही दो ख्वातीन मंच पर नमूदार होती हैं। दोनों की गुफ़्तगू से पता चलता है कि वह दोनों बिलकिस बेगम की मुलाज़िम हैं। उसकी मालकिन बिलकिस बेगम एक सख्त दिल खातून हैं। उनके दूसरे शौहर का इंतकाल अभी चार दिन पहले हाल में हुआ है। पहले शौहर से एक बेटी फहमीदा है। दूसरे शौहर से और चार बेटियाँ हैं। हसन नाम की मुलाज़िम चरफर और तेज़ है। वह समझती है कि वह अपनी मालकिन बिलकिस बेगम के बेहद करीब है। उनकी पोशीदा राज़ों की साझेदार है।
शोक में बिलकिस बेगम सफ़ेद लिबास में अपनी पांचों बेटियों के साथ छड़ी टेकती हुई आती है और सामने दालान में बिस्तर पर बैठकर अपनी करख्त आवाज़ में यह फैसला सुनाती हैं कि अगले बारह महीने कुनबे में गम का माहौल रहेगा। न तो कोई साज-सिंगार करेगा और न ही कोई घर के बाहर कदम रखेगा। मर्दों की हवा भी दीवारों को नहीं छूनी चाहिए। खिड़की के बाहर से गुज़रते हुए किसी मर्द को घर की कोई लड़की देखने की जुर्रत नहीं देखेगी। इस ऐलान से लड़कियों के चेहरों के रंग उड़ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा असर पहले शौहर से जनी बड़ी बेटी फहमीदा पर पड़ता है। उसकी मँगनी अतहर से हो चुकी है। उसके लिए सबसे बड़ा सदमा यह है कि उसका निकाह एक साल के लिए मुल्तवी हो गया है।
यहाँ पर किस्से में एक पेंच और जुड़ता है। फहमीदा को अपने सगे अब्बा से विरासत में काफ़ी धन -दौलत और ज़मीन मिली है। बिलकीस बेगम की चारों बेटियाँ इस बात को लेकर फहमीदा से डाह रखती हैं। वे जानती हैं कि उनकी सख्त दिल अम्माँ फहमीदा के अमीर होने को लेकर उनके वास्ते थोड़ी नर्मदिल रहती हैं। जेल जैसे माहौल में रहते हुए पांचों लड़कियाँ तकरीबन गुलाम हवा की आदी होती जाती हैं। लेकिन जवान दिल की चुभन उनके दिल में चुभती रहती है। कभी-कभी यह चुभन बाहर निकलकर एक भारी दर्द की तरह उनके सारे जिस्म को जकड़ लेती है और वे बेहद उदास और निराश हो जातीं हैं जब वह अपनी अम्माँ के सख्त रवैये का खामियाज़ा डाँट-फटकार और मारपीट के तौर पर भुगतती हैं । इन बेकसूर लड़कियों को जेल की सजा बिना किसी जुर्म के मिली हुई है।
हकीकत यह है कि अपने कुनबे की झूठी शान और मर्यादा दिखाने के लिए एक माँ अपनी बेटियों पर बेपनाह जुल्म ढा रही हैं।
जेल जैसी घर की फिज़ा में कुछ तब्दीली तब आती है जब बिलकीस बेगम की छोटी लड़की आदिला एक दिन लाल जम्पर पहनती है। आँखों में काजल-सूरमा लगाकर सिंगार करती है। चुगुलखोर और सितमज़रीफ़ हसन बुआ आग की तरह इस खबर को कुनबे में फैला देती है। एक तरह से बिरजीस बेगम के कुनबे में यह खिलाफ़त की दस्तक है। बिरजीस बेगम के सीने पर साँप लोट जाता है। वह अपनी छोटी बेटी की लानत-मलामत करती है।
लेकिन मोहब्बत की कशिश पाबंदियों की बेड़ियों को कहाँ मानती है !
एक दिन दिलचस्प वाकया होता है। बड़ी लड़की फहमीदा शिकायत करती है कि उसके मंगेतर की तस्वीर गायब है। मिल नहीं रही है। लड़कियों में नोक-झोंक होती है। सबसे छोटी लड़की आदिला बिना पूछे सफ़ाई देने लगती है कि तस्वीर उसके पास नहीं है। चूँकि वह अकुंठ रूप से साज- सिंगार करती रही है और जिस्मानी जरूरतों का नुमाया भी करती रहती है, उसे अंदेशा होता है कि तस्वीर चोरी के लिए शक की सुई उसकी तरफ घूमेगी। तभी हँसना बाँदी यह कहकर सबको चौंका देती है कि वह जानती है कि यह तस्वीर किसके पास है। वह कमरे से तस्वीर ढूंढकर लाती है और बताती है कि तीसरे नंबर की बेटी मुस्तरी के तकिये के नीचे तस्वीर मिली है। सब हैरत में पड़ जाते हैं। सिर्फ़ छोटी बेटी आदिला को हैरत नहीं होती चूँकि उसे पता है कि मुस्तरी दिल ही दिल में अतहर को चाहती है। जब रात में अतहर के साथ छोटी बेटी आदिला इश्क की रासलीला में मुब्तिला होती है तो उसकी यही बड़ी बहन मुस्तरी उसकी निगहबानी करती रहती है। यहाँ बताना ज़रूरी है कि मुस्तरी उम्रदराज़ ही नहीं,पीठ पर उसके कूबड़ है। नाक -नक्श और देखने में आदिला से कमतर है। बिलकीस बानो अपने रौद्र रूप में आती है। मुस्तरी के पास तस्वीर पाए जाने पर बिरजीस उसे मारती-पीटती है।
यहाँ से नाटक में मोहब्बत का त्रिकोण शुरु होता है।
अतहर को हासिल करने के लिए आदिला और मुस्तरी के बीच जबानी जंग चलती रहती है। मुस्तरी आदिला को चुनौती देती है कि अतहर का ब्याह तो फहमीदा से ही होगा क्योंकि उसके पास सबसे अधिक जायदाद है। हँसना बाँदी का भी यही मानना है। आदिला मुस्तरी को कहती है कि अतहर तुमको नहीं चाहता। वह मुझे चाहता है। मैं खूबसूरत हूँ। जवान हूँ।
एक दिन फहमीदा अपनी अम्माँ बिलकीस बेगम से अपनी शादी जल्दी कराने को लेकर बात चलाती है। अम्माँ कहती है कि वह मिलने तो आता है। फहमीदा अपना शक जाहिर करती है कि उसे लगता है कि जब वह मेरे साथ होता है, उसका मन कहीं और होता है। बिलकीस अपनी चुटीले मर्दवादी तर्कों के जरिए उसे समझाती है।
हसना बाँदी अपनी मालकिन बिलकीस को बताती है कि उसके बेटों ने सवेरे चार बजे अतहर को छत पर देखा था। बिलकीस उसकी बात पर भरोसा नहीं करती। उसे लगता है कि उसके मकबूल कुनबे की इज़्ज़त धूल में मिट जाएगी। वह उसे झूठी अफ़वाह फैलाने के लिए रोकती है। हसन बाँदी अपने को उसका खैरख्वाह दिखाना चाहती है। वह बेगम को जताती है कि वह यह राज़ जानती है कि जायदाद की खातिर उसने अपने पहले शौहर से शादी की थी। इस पर बिलकीस उसे धमकाती हुई कहती है कि मुझसे मत उड़ो। तुम किस तरह रंडी बनने से बची हो, मैं जानती हूँ। तुम अपनी हद और औकात में रहो।
छोटी बेटी आदिला की बेताबी अतहर के लिए बढ़ती जा रही है। कभी रात में पानी पीने के बहाने तो कभी चोरी छिपे वह अतहर से मिलती रहती है। एक दिन तो मुस्तरी ने भी आदिला से भरे मन से इकबाल कर लिया कि वह अतहर को चाहती है। लेकिन आदिला को किसी बात की परवाह नहीं। एक शाम जब अतहर ने अपनी मंगेतर फहमीदा को बताया कि वह कस्बे से बाहर जा रहा है और शाम उससे मुलाकात करने नहीं आएगा।
बाद में पता चलता है कि उसने झूठ बोला था। वह रात में मिलने आया था। बिलकिस बेगम अपनी बेटी आदिला को रोकना चाहती है, वह नहीं मानती। वह अपनी माँ से कहती है कि अगर अतहर का ब्याह फहमीदा से हो भी जाए तो घर से दूर एक छोटी झोपड़ी में उसकी दूसरी औरत की तरह रह लेगी और जब अतहर का मन होगा, मुझसे मिलने आ जाया करेगा। आदिला की ऐसी फ़ाहिशा बातें सुनकर बिलकीस बेगम आग बबूला होकर आदिला को मारने के लिए अपनी छड़ी उठाती है। आदिला अपने हाथों से पहले तो उसकी छड़ी रोकती है। फिर उसकी छड़ी तोड़कर उसे फ़र्श पर फेंक देती है। पूरे दालान में सन्नाटा छा जाता है। ऐसा इस कुनबे में कभी नहीं हुआ था। सब लड़कियां सिर झुकाकर पिटती रहती थीं। बिलकिस बेगम को लगता है कि उनका रौबदाब खत्म हो जाएगा। उधर घोड़ों की हिनहिनाहट और आदिला को बुलाने के लिए अतहर सीटी बजाकर इशारा कर रह रहा है। गुस्से में बिलकीस बानो बंदूक निकाल कर और अतहर को मारने के लिए बाहर जाती है। बंदूक की गोली चलने की आवाज़ सुनायी देती है। आदिला को लगता है कि उसकी अम्माँ ने उसके प्रेमी अतहर को मार दिया है। हारे मन से बिलखती हुई वह अपने को कमरे में बंद कर लेती है । सब लड़कियां और बाँदियाँ दरवाजा खटखटाकर खोलने की उससे गुज़ारिश करती हैं।
दरवाजा खोला जाता है।
गले में दुपट्टा बांधकर आदिला ने खुदकुशी कर ली है। इस दृश्य को प्रकाश व्यवस्था के जरिए प्रभावी तरीके से दर्शाया जाता है। बाद में पता चलता है कि बिलकीस बेगम में अतहर पर गोली चलायी लेकिन निशाना चूक गया। अतहर घोड़े पर बैठकर भाग गया। बिलकीस दालान में खड़ी होकर फिर ऐलान करती है कि इस मामले में सब खामोश रहेंगे। कोई ज़बान नहीं खोलेगा कि आदिला पेट से थी। वह तेज़ आवाज में कहती हैं कि आदिला कुँवारी मरी है। अपनी झूठी इज़्ज़त बचाए रखने के लिए वह अब भी इकबाल नहीं कर पा रही है कि उसकी बेटी अतहर से मोहब्बत करती थी। अगर वह आदिला के मुहब्बत को मान लेती तो उसे अपनी बेटी को खोना नहीं पड़ता। हालाँकि हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि झूठी मान-मर्यादा पर बेटी को कुर्बान करना बिलकीस बेगम को मंजूर है। ऊँची जाति का घमंड भी बिलकीस बानो को है। उनकी एक लड़की का रिश्ता कुरेशी जैसी छोटी जाति से आया था लेकिन उन्होंने उसे कुबूल नहीं किया था।
यह पूरा नाटक उच्च मध्यवर्गीय रूढ़िग्रस्त मुस्लिम परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है। पितृसत्ता किस तरह से सूक्ष्म रूप से काम करती है, इसकी एक उम्दा मिसाल यह नाटक है कि कुनबे में किसी मर्द की नामौजूदगी के बावजूद एक औरत मर्द की तरह अपने परिवार को सामंती ढंग से चलाती है। सदियों से चले आ रहे उन्हीं परंपरागत रुग्ण मूल्यों और संस्कारों को अपनाती है चाहे सामाजिक मान-मर्यादा का मामला हो या रीति रिवाज या छोटी -बड़ी जाति का।
पूरे कुनबे में दस औरतें है। स्वामित्व की डोर बिलकीस बेगम के पास है। बिलकीस बेगम और उनकी सनकी माँ के साथ पाँच बेटियाँ दो बाँदियों के साथ रहती हैं। नाटक में एक दफा लड़कियों की खालाजान की भी आमद होती है। मगर कुनबे में एक भी मर्द नहीं दिखता। मर्दों का ज़िक्र तो होता है। फहमीदा का मंगेतर और आदिला के इश्क में गिरफ़्तार अतहर का साया नाटक की कहानी को आगे बढ़ाता है लेकिन ये सभी खातून मर्दों के साथ और मोहब्बत से महरूम हैं। एकाध हैं तो चोरी छिपे। मर्दों को लेकर उनके मन में इच्छाएं ही नहीं, कामेच्छाएं भी हैं। ऐसा होना सहज भी है। सभी युवा हैं और उनके भीतर देहराग बजता है। वे अपने घर की मुंडेर से जब खेतों में काम करते हुए बलिष्ठ और सुंदर किसानों को देखती हैं तो पुरुष गंध और प्रेम के सहज अधिकार से वंचित लड़कियों की मुरझाई देहों में उनकी अतृप्त कामनाएं अंगड़ाई लेने लगती हैं।
प्रेम एक सामाजिक मूल्य है। लेकिन उसके लिए परिवार में लोकतान्त्रिक वातावरण अपेक्षित है। बिलकीस बेगम के कुनबा एक उपनिवेश की तरह है। यहाँ निजी कामनाओं और आकांक्षाओं को अपने भीतर दफन करने के अलावा इन युवतियों के पास कोई विकल्प नहीं दिखता। नाट्य निर्देशक ने इन कामनाओं को मूर्त रूप में दिखाने के लिए एक नृत्य दृश्य प्रस्तुत किया। फसल कटने के बाद लड़कियों के इस नृत्य संरचना को रश्मि ने अत्यंत कलात्मकता से सृजित किया। नाटक के गमगीन माहौल में नृत्य का यह पहला उल्लास भरा दृश्य आता है जो दर्शकों के लिए राहत की सौगात है।
पितृसत्ता के अनेक रंगों को नाटक में जगह मिली है। शुरु में ही बाँदी हसना बताती है कि किस तरह एक मर्द ने उससे मोहब्बत का इज़हार किया। फिर उससे बोला कि जल्दी उसके घर उसकी माँ उसका रिश्ता माँगने आएगी लेकिन वह इंतज़ार करती ही रह गयी। फिर पता चला कि उसने किसी और से शादी कर ली। नाटक शमा जैदी के चुटीले संवादों में पितृसता के बहुस्तरीय परतों को उकेरा गया है। लेकिन मैंने नोट किया कि जब पितृसत्ता की ताकत को हास्य के जरिए निशाना बनाया जाता था तो हमारे पीछे और बगल में बैठे दर्शक लुत्फ़ लेकर खूब हँसते और तालियाँ बजाते थे। पितृसत्ता का यह साक्षात उदाहरण सभागार में प्रकट हो रहा था।
इस नाट्य प्रस्तुति में तीन चार –दृश्य बिम्ब प्रभावी और सुंदर थे। एक दृश्य दस्तरखान का था जब लड़कियों की खाला उनसे मिलने आती हैं। फहमीदा अपनी सगाई की अंगूठी खाला को दिखाती है। हाथ में खाने की रकाबियाँ लिए हुए यह दृश्य पारिवारिक गर्माहट से दर्शकों को सराबोर कर रहा था। नाटक के अंत में आदिला के खुदकुशी का कारुणिक दृश्य बिंब भी अत्यंत प्रभावी ढंग से पेश किया गया था। फसल कटने की बाद गाया गीत कर्णप्रिय था। इतने गमगीन माहौल में उमंग से भरा नृत्य आँखों के लिए सचमुच एक सुख था।
इस प्रस्तुति में ध्वनि के प्रभावी प्रयोग की चर्चा न करना नाइंसाफी होगी। कम नाटकों में ही ध्वनि को लेकर रचनात्मक प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रस्तुति के अनेक प्रसंगों में ध्वनि के सटीक इस्तेमाल करके कथ्य की प्रभुविष्णुता में वृद्धि की गयी। अजान की गूँज, कुत्तों का भोंकना, घोड़ों को हिनहिनाना, दरवाजा खटखटाने के लिए धम -धम की आवाज़, गोली चलने की आवाज़, अतहर द्वारा आदिला को बुलाने के सीटी भरे इशारे, छत पर अतहर की पदचाप आदि तत्काल स्मरण में आ रहे हैं। सबसे प्रभावी ध्वनि प्रयोग लड़कियों की कामेच्छाओं को प्रकट करने के लिए घोड़ों के हिनहिनाने को माध्यम से सुनने को मिलता है। बताने की जरूरत नहीं, घोड़ों को हमेशा से ही पुरुषोचित भावनाओं से जोड़ा जाता रहा है। पुरुष स्पर्श से वंचित लड़कियों में घोड़ों के हिनहिनाने से कामोत्तेजना को उद्दीप्त करने का दृश्य रचा गया है।
जहाँ तक अभिनय की बात है, इसमें एक दो अभिनेत्रियों को छोड़कर सभी इप्टा के नए सदस्य हैं। निवेदिता बाउनथियाल ने बिलकीस बेगम के रूप में सख्त खातून की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। नाटक में हसना बाँदी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह पात्र घर की मालकिन और उनकी पांचों बेटियों के बीच पुल का काम करता है। वह कभी मालकिन से दोस्ताना बर्ताव करती है और कभी उसकी जासूस बनकर उनकी बेटियों की हरकतों का कच्चा -चिठ्ठा खोलती रहती है। दिलचस्प यह है कि वह ऐसी केन्द्रीय धुरी बन जाती है जिसमें वह उन बेटियों की दोस्त की तरह रहती है। शायद यही कारण है कि बेटियाँ उसे अपने परिवार के सदस्य के रूप में अपनी बुआ का दर्ज़ा देती हैं । यही नहीं, उसे हसना बुआ से संबोधित करती हैं। इस भूमिका को प्रगति कोठारी ने संवेदनशीलता से निभाया।
बिलकीस बेगम की सनकी माँ और बेटियों की नानी भी मंच पर दो बार आती हैं। दोनों दृश्यों में उनकी भूमिका छोटी है लेकिन अपने अभिनय से वह दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। इस पात्र को भी नाट्य कथा के प्रसंग के अनुकूल ही प्रस्तुत किया गया है। वह एक कोठरी में कैद रहती हैं। मौका पाकर वह दो बार कोठरी से बाहर आती हैं। उम्रदराज़ होने के बावजूद पहले दृश्य में बुढ़ापे की सनक में वह अपने ब्याह के सुंदर सपने देखती है और दूसरे दृश्य में संतान जन्म देने की इच्छा को व्यक्त करती हैं।
इस नाटक का सबसे जटिल चरित्र मुस्तरी है। वह उम्रदराज़ है और उस मर्द को मन ही मन में चाहती है जिसका उसकी छोटी बहन को जिस्मानी तौर से रिश्ता चल रहा है। यही नहीं, वह उसकी बड़ी बहन का मंगेतर भी है। कुरूप और कुबड़ी होने का एहसास उसे तो है ही, उसकी छोटी बहन आदिला भी उसकी कमतरी पर छींटाकशी करती रहती है। एक कुरूप को क्या प्रेम करने का हक नहीं है, इसके दर्द को अपने अभिनय की भाव-भंगिमा से अभिनेत्री सबा ने बखूबी व्यंजित किया है।
आदिला तो कैदखाने सरीखे कुनबे में बगावत की आग जलाती है। उसे अपनी देह और खूबसूरती पर अभिमान है। सजना संवरना और दिल फेंकना उसकी फितरत है। वह कभी चुलबुली दिखती है तो कभी ईर्ष्या से भरकर तंज़िया रुख अख्तियार कर लेती है। जरूरत पड़ने पर वह तानाशाही की प्रतीक अपनी अम्माँ की सजा देने वाली छड़ी को तोड़कर फेंक देती है। इश्क में इतनी डूबी कि अपना जिस्म प्रेमी को हवाले करने और उसकी दूसरी औरत की तरह गरीबी में गुज़र -बसर करने के लिए तैयार रहती है। इतनी भावुक कि प्रेमी के गोली से मरने के अंदेशे भर से खुदकुशी कर लेती है। ऐसे पात्र की विविधवर्णी भूमिका को निभाने वाली प्रिया मेहता अभिनेत्री का स्वागत किया जाना चाहिए जिसने रंगकर्म की दुनिया में हाल में प्रवेश किया है। अन्य पात्रों ने भी अपनी भूमिका को कथ्य के अनुरूप संवेदनशीलता से निभाया है।
नाटक के दृश्यों की दृष्टि से मंच की सभी रंग सामग्री का उपयोग इस नाटक के निर्देशक करते हैं चाहे छत हो जहाँ से बाहर फसल काटने का दृश्य लड़कियां देखती हैं या पीने का पानी का घड़ा हो जब छोटी लड़की आदिला को उसके प्रेमी से मिलने से रोकने के लिए बाँदी घड़े से गिलास में पानी निकाल कर उसे देती है या पृष्ठभूमि में झाँकता हुआ कमरा जहाँ नाराज होने पर लड़की दरवाज़ा खोलकर चली जाती है या खुदकुशी करने के लिए दरवाज़ा बंद कर लेती है और बाहर से हाथ से दरवाज़ा पीट कर सभी औरतें उसे खोलने की इल्तजा करती हैं।
हमें यह समझना होगा कि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की संरचना तभी सशक्त होगी जब हमारे घर-परिवार के भीतर लोकतंत्र होगा। बिलकीस बेगम के कुनबे में लोकतंत्र न होने से इन पांचों बहनों के बीच न तो प्यार मोहब्बत है और न ही बहनापा । सभी के बीच रंजिश और ईर्ष्या है जबकि सभी अपनी माँ की तानाशाही का शिकार हैं। वे माँ की तानाशाही के खिलाफ़ एकजुट भी नहीं होती। कुनबे में लोकतंत्र न होने से बिलकिस बानो माँ अपने वात्सल्य के सहज गुण को भी खो देती है जिसके लिए माँ की वंदना ईश्वर के प्रतिरूप के रूप में की जाती है।
आज हमारे देश में जिस तरह लोकतान्त्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है और आम नागरिकों के बीच घृणा के बीज बोए जा रहे हैं, ऐसे में कुनबे के भीतर लोकतंत्र की जरूरत को रेखांकित करने वाला यह नाटक बिलकीस बेगम का कुनबा प्रासंगिक और ज़रूरी नाटक है।
इप्टा की इस नयी टीम की ताज़ा प्रस्तुति का स्वागत किया जाना चाहिए।
गुरुवार, 8 जनवरी 2026
संघ भाजपा ने राजपूत समाज को धर्म अफीम की घुट्टी पिला कर बर्बाद कर दिया है
मैंने नोटिस किया है कि सामान्य राजपूत बच्चे जिनमें से ज्यादातर बहुत गरीब होते हैं वे एक अलग तरह की फेंटेसी में जीते हैं। भले ही उसका आर्थिक हालात बहुत खराब हो लेकिन वे अपने को राजा-महाराजा के बच्चे से कम नहीं समझते हैं। कुछ चिरकुट टाइप के टूटपुंजिये राजपूत नेताओं की बहकी हुई बातों में आकर वे पढ़ाई-लिखाई और मेहनत करने से भागते हैं।
ऐसे राजपूत बच्चों से मैं कहना चाहता हूं कि होगा कभी संपूर्ण भारत पर राजपूत राजाओं का राज। तुम्हें आज के यथार्थ को स्वीकार करना होगा। जब भारत में राजपूत राज था तब भी राजाओं की संख्या बहुत चंद थी। सामान्य राजपूतों की स्थिति उस जमाने में भी बहुत अच्छी नहीं थी। आप के पूर्वज उन चंद राजाओं के या तो सैनिक होते थे या फिर रैयत। दुनिया में बड़े पैमाने पर मानवता का उत्थान करने वाली कोई व्यवस्था है तो उसका नाम "लोकतंत्र" है। इन पंक्तियों का लेखक (राजीव सिंह जादौन) आज जो कुछ भी है वह इस देश में लागू हुए लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के कारण है। वरना मैं अपने गांव के ही किसी जमींदार की जी हजूरी कर रहा होता।
इसलिए राजपूत समाज और खास करके उसकी नई पीढ़ी इस बात को जितना जल्दी समझ ले उतना उसके लिए फायदेमंद होगा। आप जितना जल्दी लोकतांत्रिक व्यवस्था को आत्मसात कर लेंगे, जितना ज्यादा शिक्षा और खास करके उच्च शिक्षा हासिल करेंगे उतना जल्दी आपका विकास होगा। सामान्य राजपूत बच्चे जो राजपाठ के फितूर में जीते हैं उन्हें समझना चाहिए कि जो वास्तव में राजा थे जैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह उन्होंने बहुत पहले राजपाट के फितूर को अपने दिमाग से निकाल कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को ओढ़ते और बिछाते थे/हैं।
वीपी सिंह जी और अर्जुन सिंह जी को तो मैं नजदीक से नहीं देख पाया क्योंकि वो जब इस दुनिया को अलविदा कहे तब मेरी उम्र बहुत कम थी। दिग्विजय सिंह जी से दो-तीन बार वन टू वन मुलाकात का अवसर मिला। हर मुलाकात में मैंने पाया कि दिग्विजय सिंह जी सिर से लेकर नख तक लोकतंत्र को जीने वाले राजनेता हैं। राज परिवार से होने का वो एक मिनट भी सामने वाले को एहसास नहीं होने देते हैं।
पिछले साल के एक सितंबर को पटना में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह सर के साथ दिग्विजय सिंह जी से मिलने के बाद का अनुभव आप सबसे साझा करना चाहूंगा। शीतल सर को इंटरव्यू देने के बाद हमलोग करीब आधा घंटा साथ में बैठे थे। इस दरम्यान उन्होंने हम सब से चाय और कॉफी के बारे में पूछा। फिर वे खुद से फोन करके चाय और कॉफी मंगवाए। टेबल पर रखे ड्राई फ्रूट के पैकेट को फाड़ कर जब दिग्विजय सिंह जी प्लेट में डाल रहे थे तब उसमें से चार-पांच टुकड़ा नीचे फर्श पर गिर गया था जिसे वे उठाकर स्वयं खाए। इसी तरह अगर दिग्विजय सिंह जी अपने घर से निकलते हैं तो यदि उनकी नजर गेट से इंट्री करते हुए किसी नए आदमी पर पड़ती है तो वो गाड़ी रुकवा कर उसका हाल-चाल लेते हैं और बैठने के लिए बोलते हैं। हिंदी के बड़े आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि "मनुष्य अपनी छोटी-छोटी बातों से बड़ा बनता है।" दिग्विजय सिंह जी से मिलकर विश्वनाथ त्रिपाठी की यह बात बरबस याद आती है।
लोकतंत्र में आप किसी को भयाक्रांत करके अपने से नहीं जोड़ सकते हैं। उनके लिए आपको अपने मन, वचन और कर्म को एकाकार करना पड़ता है। आज का राजपूत युवा इस बात को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी समझ ले। कुछ गलत नेतृत्व के बहकावे के कारण हमारी पिछली ने अपनी जवानी निराशा में काट ली। नए राजपूत युवा भी उसी दिशा में चलेंगे तो उनके लिए आत्मघाती होगा।
आप हर तरफ से तोप के मुहाने पर हैं। ऐसे में एक ही उपाय है। खूब शिक्षा हासिल कीजिए। हर तरह की शिक्षा हासिल करके अपने को लोकतंत्र में मिलने वाले अवसरों के काबिल बनाईए। योग्यता हासिल करके मीडिया, ज्यूडिशियरी, एकेडमिया तथा पॉलिटिकल और इकोनॉमिक स्ट्रक्चर में अपनी हिस्सेदारी हासिल कीजिए। मोदी सरकार में जो सरकारी शिक्षण संस्थानों को बर्बाद किया जा उसका भुक्तभोगी राजपूत समाज भी हो रहा है। आरएसएस और भाजपा ने युवाओं को जो धर्म की अफीम चटाई है उसका बड़ा शिकार राजपूत समाज का युवा भी हुआ है। मोदी/भाजपा सरकार का अंधभक्त बनके समर्थन करने के बजाय राजपूत समाज के युवाओं को देश की बर्बाद होती शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए सरकार से सवाल करना भी जरूरी है। क्योंकि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के बर्बाद होने से सबसे ज्यादा राजपूत समाज के लोगों का नुकसान होगा।
:~ राजीव सिंह जादौन
बुधवार, 7 जनवरी 2026
अमेरिका ने रुसी मालवाहक जहाज को जब्त कर लिया
अमेरिका ने कहा है कि उसने वेनेज़ुएला से जुड़े दो तेल टैंकरों को ज़ब्त कर लिया है.
इनमें से एक टैंकर (जिसके बारे में बताया गया है कि उसमें कोई तेल नहीं था) उत्तरी अटलंटिक सागर में (आइसलैंड और ब्रिटेन के बीच) क़ब्जे़ में लिया गया.
अमेरिकी तटरक्षक बल इसको वेनेज़ुएला के तट के पास रोकने के बाद इसका कई हफ़्तों से पीछा कर रहा था. इस दौरान टैंकर ने अपना नाम बदल लिया और रूसी झंडा लगा लिया.
टैंकर को बचाने के लिए रूस की ओर से पनडुब्बी सहित समर्थन रास्ते में था, लेकिन उससे पहले ही टैंकर को ज़ब्त कर लिया गया.
दूसरा टैंकर, जो तेल लेकर जा रहा था और कैमरून के झंडे के तहत सफ़र कर रहा था. उसे कैरेबियन सागर में ज़ब्त किया गया. इस समय उसे अमेरिका के एक बंदरगाह की ओर सुरक्षा घेरे में ले जाया जा रहा है.
रूस ने क्या कहा?
रूस ने अपने झंडे के तहत चल रहे टैंकर को ज़ब्त किए जाने की कड़ी निंदा की है. रूस के परिवहन मंत्रालय ने कहा कि उसने इस जहाज़ (मैरिनेरा) को रूसी झंडा इस्तेमाल करने की अस्थायी अनुमति दी थी.
मंत्रालय ने यह भी कहा कि किसी भी देश को दूसरे देशों के अधिकार क्षेत्र में विधिवत रजिस्टर्ड जहाज़ों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है.
विदेश सेवा में रहकर घास छीलते हुए पूरा करियर निकालने वाले संघी एस जयशंकर ने कभी दावा किया था कि नरेंद्र मोदी से पूछे बिना दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता।
सौमित्र राय
विदेश सेवा में रहकर घास छीलते हुए पूरा करियर निकालने वाले संघी एस जयशंकर ने कभी दावा किया था कि नरेंद्र मोदी से पूछे बिना दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता।
किसे मालूम था कि एक दिन चार वाक्यों की बेइज्जती से जयशंकर और मोदी दोनों के शरीर से इस झूठी शान के सारे पत्ते उड़ जाएंगे।
सिर्फ़ जयशंकर ही नहीं, अजित डोवाल के डिप्टी की भी इज़्ज़त चली गई।
मैं कल चुपचाप देख रहा था कि कैसे पूरे दिन मोदी का पीएमओ सन्नाटे में रहा।
सबसे पहले तो ट्रंप से लॉबिंग के लिए 18 लाख डॉलर सालाना पर किराए पर ली गई फर्म ने FRR के तहत पीएमओ और अमेरिका में भारतीय दूतावास के हर फोन कॉल और ईमेल का ब्यौरा जारी कर दिया।
इन्हीं में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान पर हमले और सीजफायर का भी ब्यौरा शामिल था, जिसमें मोदी सत्ता ट्रंप से मीटिंग के लिए गिड़गिड़ा रही थी।
बदन से पत्ते उतरते देखकर हमारे विदेश मंत्रालय ने बेशर्मी से कहा कि लॉबिंग कोई नई बात नहीं है।
फिर देर रात ट्रंप ने विश्वगुरु को नंगा कर दिया और तू–तड़ाक का सारा रिश्ता एक झटके में धुल गया।
ट्रंप ने कहा–मोदी मुझसे मिलने आए थे। पूछा–सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? मैंने कहा–हां।
उन्होंने हमसे अपाचे हेलीकॉप्टर मांगे। हमने 5 साल तक नहीं दिए। फिर मोदी मुझसे मिलने आए थे। पूछा–सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? मैंने कहा–हां।
मोदी बहुत अच्छे इंसान हैं, लेकिन मुझे खुश नहीं कर पा रहे हैं।
मैंने आपको बीते मई में ही बता दिया था कि आज का दिन आयेगा और आया भी।
गोदी चैनल चुप हैं। बीजेपी आईटी सेल चुप है। समूची हिंदू सत्ता की बकलोली बंद है।
अमेरिका में भारत के राजदूत तक वहां के सांसदों से गिड़गिड़ा रहे हैं कि कुछ टैरिफ कम करवा दो।
लेकिन, ट्रंप खुद मोदी को बाहर इंतज़ार करवाते हैं। मुलाकात का समय लॉबिंग फर्म तय करती है।
व्हाइट हाउस के लिए जयशंकर की अहमियत किसी चपरासी से कम नहीं। फिर पीयूष गोयल की क्या बात करें।
70 साल में भारत की ऐसी बेइज्जती कभी नहीं हुई। इतनी बेइज्जती तो गोधरा दंगों के बाद भी नहीं हुई, जब अमेरिका ने मोदी का वीज़ा रोक था।
नरेंद्र मोदी अब जीवन के सबसे बुरे दिनों से गुज़र रहे हैं।
उनकी बात खुद उनकी पार्टी के भीतर कोई नहीं सुनता।
मैंने यह भी चेताया था कि 14 जनवरी तक यह दिन भी देखने पड़ेंगे।
बेहतर होगा कि बदन पर इज़्ज़त के बचे–खुचे पत्तों को लपेटे मोदी इस्तीफ़ा देकर निकल लें।
वरना जल्द ही वे पत्ते भी नहीं रहेंगे।
उ प्र योगी पुलिस का वसूली अपहरण उद्योग
उ प्र योगी पुलिस का वसूली अपहरण उद्योग
यूपी के बांदा में पुलिस की खाकी फिर दागदार हुई है। पुलिस ने एक युवक का न सिर्फ अपहरण किया बल्कि उससे 20 लाख रुपये की अवैध वसूली भी कर ली। बाद में उसे 2 किलो 250 ग्राम गांजा और एक अवैध तमंचा के साथ जेल भेज दिया। युवक की शिकायत पर तत्कालीन थानाध्यक्ष अतर्रा सहित छह पुलिसकर्मियों को पहले निलंबित किया गया। अब कोर्ट के आदेश पर मुकदमा किया जा रहा है।
निशातुन्निसा_बेगम - बेगम हसरत मोहानी
#_निशातुन्निसा_बेगम (बेगम हसरत मोहानी )
2 जनवरी 1885 यौमें पैदाईश
बेगम हसरत मोहानी की कहानी भी उन बहुत-सी भूली बिसरी दास्तानों में शुमार की जा सकती है, जिनके साथ आज़ाद हिन्दुस्तान की तवारीख़ ने मुनासिब इंसाफ नहीं किया, बेगम हसरत का शुमार उन औरतौं में किया जाता है,जिन्होंने बीसरवीं सदी में कौमी तहरीके आज़ादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।आप उन औरतों में सेथीं,जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी मुल्क की ख़िदमात में लगा दी,
चकबस्त नेउनकी कौमी ख़िदमात को सराहते हुए सुबहे उम्मीद में कौम के नौजवानों को मश्वरा दिया था कि बेगम हसरत की हैसियत आम जलसों में सियासी मर्दानगी का राग गाने के लिए ही नहीं, बल्कि कुर्बानी का सबकृ हासिल करने के लिए भी है, निशातुन्निसा (बेगम हसरत मोहानी) की पैदाइश 2 जनवरी 1885 में मोहान जिला उन्नाव के एक इज़्जतदार घराने में हुई थी, आपके वालिद सैय्यद शबीब हसन मोहानी रियासते हैदराबाद के हाईकोर्ट में वकील थे, निशातुन्निसा बेगम उस ज्माने के लिहाज से पढ़ाई लिखाई से महरूम नहीं थीं और उन्हें मज़हबी तालीम के साथ-साथ उर्दू, अरबी, फारसी जुबानों
की माकूल तालीम दी गयी थी,
सन् 1901 में जब आप हसरत मोहानी की जिंदगी में दाखिल हुई तब आप सियासी ज़िन्दगी से अंजान न थीं,देहाती माहौल की पली इस लड़की का हौसला हर तरह से हसरत मोहानी के लिए माकूल था, माली एतबार से कम होने के बावजूद उनको कभी किसी किस्म की शिकायत नहीं थी, हर कदम पर आप मौलाना साहब के साथ खड़ी रहती थीं, इसलिए हसरत मोहानी को उन पर फख्र था, इस तरह जंगे आजादी में उनकी कुर्बानी और उनकी सियासी मालूमात हसरत मोहानी की जिंदगी में बड़ी अहम थी,
जब हसरत मोहानी कैद किये गये तो उस वक्त बेगम हसरत जंगे आजादी में कुद पड़ीं और उन्होंने यह साबित कर दिया कि शौहर के चन्द सालों का साथ और देहाती माहौल में पली बढ़ी हुई लड़की की मालूमात कितनी बेदार और पुख्ता थी! इस तरह आप अपनी मंज़िल की तरफ़ आगे बढ़ रही थीं,
13 अप्रैल सन् 1916 को हसरत मोहानी को दूसरी बार गिरफ्तार किया गया,मगर यह गिरफ़्तारी बेगम हसरत के लिए मील का पत्थर साबित हुई और उन्होंने घर की चहारदीवारी से निकलकर हसरत के मुकुदमे की पैरवी अपने ज़िम्मे ली और इस काम को बड़ी हिम्मत व दिलेरी से अंजाम दिया, मुक़दमे की पैरवी के दौरान एक अंग्रेज़ अफ़्सर ने डराने की कोशिश की तो आप उससे डरने के बजाय लड़ गयीं और कहा कि तुम मुझे गिरफ्तार कर सकते हो लेकिन रोक नहीं सकते,
हसरत मोहानी अभी कैद में ही थे कि बेगम हसरत ने वज़ीरे-हिन्द से मुलाकात करने वाले हिन्दुस्तानी ख़्वातीन के एक डेलीगेशन में शिरकत की, इस शिरकत की अहमियत इस वजह से भी बढ़ जाती है कि निशातुन्निसा बेगम ने जिस हिम्मत और बहादुरी से अपनी बात रखी, वह अकेला ही आपके किरदार की बुलन्दी के लिए काफ़ी था,
सन् 1919 वह ज़माना था जब हिन्दुस्तान की सियासी जिंदगी एक नयी करवट ले रही थी, बेगम हसरत के किरदार और कौमी महाज़ पर उनकी सरगर्मियों की वजह से बी. अम्मा जैसी आज़ादी की अरज़ीम मुजाहिद की नज़़र में उनके लिए कितनी इज्जत थी
इसका पता श्रीमती उमा नेहरू के नाम लिखे उनके खत से चलता हैं, जिसमें 13 दिसम्बर सन् 1917 उन्होंने लिखा था कि अख़बारों से मुझे मालूम हुआ है कि आपके और उस बहादुर और प्यारी बेटी निशातुन्निसा बेगम के साथ मुझे भी ख़्वातीन के उस डेलिंगेशन की कृयादत करनी है, जो तमाम ख़्वातीने हिन्द की तरफ से जनाब वज़ीरे हिन्द से मिलने के वास्ते इस महीने की 18 तारीख़ को मद्रास में तय हुआ है,
इस तमाम तफसील का मतलब यह है कि कौमी जंगे-आज़ादी में बेगम हसरत मोहानी की कुर्बानियों, उनकी हिम्मत बहादुरी और मुल्क के लिए मोहब्बत को मुलाक़ात के वक्त भुलाया नही जा सकता, उनकी कुव्वते-इरादी की फ़ौलाद जैसी हिम्मत हर चट्टान से टकराने के लिए काफ़ी थी,
साभार
मंगलवार, 6 जनवरी 2026
वेनेजुएला की तरह ट्रंप क्या हमारे प्रधान मंत्री का भी अपहरण करेंगे?', कांग्रेस नेता का चौंकाने वाला बयान
'वेनेजुएला की तरह ट्रंप क्या हमारे प्रधान मंत्री का भी अपहरण करेंगे?', कांग्रेस नेता का चौंकाने वाला बयान
वेनेजुएला पर अमरीकी कार्रवाई को लेकर कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर एक टिप्पणी की है.कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने वेनेजुएला की घटना का हवाला देते हुए भारत में प्रधानमंत्री के अपहरण की चर्चा की.कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण के इस बयान को लेकर मामला गरमा गया है. कई लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं.
सोमवार, 5 जनवरी 2026
लखनऊ में वेनेजुएला पर अमरीकी हमले के विरोध में प्रदर्शन कान्ती मिश्रा नेत्री भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में प्रदर्शन
लखनऊ में वेनेजुएला पर अमरीकी हमले के विरोध में कान्ती मिश्रा नेत्री भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में प्रदर्शन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करते हुए विरोध प्रदर्शन किया
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करते हुए विरोध प्रदर्शन किया
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने रविवार को शहर में प्रदर्शन किया और वेनेजुएला के खिलाफ अमरीका के हमले की निंदा की और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ने की कड़ी आलोचना की।
पार्टी ने आरोप लगाया कि अमरीका की घुसपैठ एक आज़ाद और आज़ाद देश पर हमला है और यूनाइटेड नेशंस चार्टर का खुला उल्लंघन है।
विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उडीसा राज्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि अमरीकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में खुलेआम वेनेजुएला के तेल रिसोर्स पर कब्ज़ा करने की बात कही, जिससे इस हमले के पीछे का असली मकसद सामने आ गया। उन्होंने कहा कि अमरीका के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रुबियो ने एक कदम और आगे बढ़कर चेतावनी दी कि क्यूबा और मेक्सिको अगले टारगेट होंगे।
उन्होंने कहा, "US 2025 नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी डॉक्यूमेंट जारी होने के कुछ ही दिनों के अंदर आए ये सभी बयान साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद पूरी दुनिया पर अपना दबदबा बनाना चाहता है और ज़रूरत पड़ने पर मिलिट्री हमले का सहारा लेने के लिए भी तैयार है।"
मिश्रा ने भारत सरकार से वेनेजुएला के साथ मजबूती से खड़े होने और दूसरे देशों के साथ मिलकर अमरीका के हमले की निंदा करने की अपील की।
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