शनिवार, 10 अप्रैल 2021

इला मित्राः तेभागा संघर्ष तथा पाक तानाशाही के खिलाफ लड़ाई की नायिका

 इला मित्रा का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को कलकत्ता में एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। उनका परिवार एक पढ़ा-लिखा धनी परिवार था। इला के पूर्वज वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही जिले के जेनाइदा सब-डिविजन स्थित बागुतिया ग्राम से थे। उसके पिता नागेंद्रनाथ सेन कलकत्ता में ए.जी.बी. कार्यालय में एकाउंटेंट थे। आरंभिक पढ़ाई के बाद उनकी आगे की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय के बेथ्यून स्कूल एंड कॉलेज में हुई। उसने 1944 में बांगला साहित्य में बी.ए. ;ऑनर्स पास किया। आखिरकार वह बंगला साहित्य और संस्कृति में एम.ए. 1958 में ही कर पाईं। इन 13 वर्षोंं में वह अत्यंत कष्टमय जीवन से गुजरी जिसका उल्लेख हम आगे करेंगे।Comrade Ila Mitra: Light of Inspiration
चैम्पियन खिलाड़ी
अपने स्कूल एवं कॉलेज के दिनों में इला बहुत ही मेधावी खिलाड़ी थी। उसे ढेर सारी ट्रॉफियां मिली थीं। वह 1935 से 38 तक बंगाल प्रेसीडेन्सी की चैम्पियन एथलीट थी। वह बहुत अच्छी बास्केटबॉल खिलाड़ी भी थी।
वह खेलों की दुनिया में स्टार के रूप में प्रसिद्ध हो गई। उसे जापान में आयोजित ऑलिम्पिक खेलों के लिए
भारत से खेलने के लिए चुन भी लिया गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से खेल नहीं हो पाए।
राजनीति में
अपनी पढ़ाई के दौरान इला ए. आई.एस.एफ. के संपर्क में आई। बाद में वह विश्वयुद्ध  के दौरान ‘महिला
आत्मरक्षा समिति’ में शामिल हो गई। वह जल्द ही कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आ गई और 1943 में 18 वर्ष
की आयु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गई।
इला का विवाह 1944 में रामेन्द्र नाथ मित्रा से हुआ। रामेन्द्र भी धनी जमींदारी परिवार के थे। लेकिन जल्द
वे भी किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और होलटाइमर बन गए। इला भी रामचंद्रपुर चली गई और उन्हें 1948 में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
इसी दौर में कलकत्ता में दंगे शुरू हो गए। पार्टी ने इला के दंगा-पीड़ितों के राहत-कार्य के लिए नोआखाली जाने
का आदेश दिया। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं के साथ व्यापक दौरा किया। उन्होंने
बड़े पैमाने पर राहत कार्य किया। वह पहला मौका था जब इला का इतने बड़े पैमाने पर आम जनता से संपर्क स्थापित हुआ ।
देश के विभाजन के बाद मित्रा परिवार की जमींदारी पूर्वी पाकिस्तान में रह गई। इसलिए इला समेत उनका
परिवार वहीं रह गया। एक स्थानीय किसान नेता अल्ताफ हुसैन की पहल पर कृष्णा-गोविंदपुर में एक स्कूल खोला गया जो इला के घर के नजदीक था। लोगों ने मांग की कि ‘‘बधुमाता’ अर्थात इला उनके बच्चों को बढ़ाए। इला तेयार हो गईं पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। स्कूल ने एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया।
उस वक्त पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी को भारी दमन का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए उन्हें अंडरग्राउंड
जाने के लिए कहा गया। उस वक्त इला गर्भवती थी। वे कलकत्ता चली गईं। वहां उन्होंने अपने पुत्र मोहन को जन्म दिया। मोहन की देखरेख इला की सास ने रामचंद्रपुर में किया।
पाकिस्तान में पार्टी कार्य तथा किसान संघर्ष इला अपने पति के साथ वापस पूर्व पाकिस्तान लौट गईं। वे नवाबगंज के नाचोल में रहने लगीं। नाचोल राजशाही से 35 कि.मी. दूर है जहां जाने का रास्ता अत्यंत दुर्गम है। स्थानीय नेतृत्व ने किसानों को संगठित किया जिनका संघर्ष आगे चलकर सुप्रसिद्ध ‘तेभागा’ आंदोलन का हिस्सा बना। पूर्वी पाकिस्तान की मुस्लिम लीग सरकार आंदोलन को अमानवीय तरीके से कुचलने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही थी।आजाद भारत के असली सितारे-14 - सबलोग
नाचोल क्षेत्र में जोतदारों को फसल उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा देना पड़ता था जबकि किसानों के पास मात्र
एक-तिहाई ही बचता था। उत्तरी बंगाल के अन्य जिलों में फसल का आधा-आधा बंटवारा किया जाता था।
धान की सफाई की मजदूरी 20 में से 3 ही हिस्सा ;‘अरास’द्ध थी जबकि वे 7 हिस्से की मांग कर रहे थे।
इला ने चांदीपुर को अपने काम का केंद्र बनाया। चांदीपुर में एक जाने-माने संथाल कम्युनिस्ट नेता
मातला माझी थे जिनका घर आंदोलन का केंद्र बना। इला मित्रा ने उस क्षेत्र में घूम-घमकर काफी काम किया और
खेतिहर मजदूरों तथा किसानों को संगठित किया। वे ‘‘रानी मां’ के नाम से जनता के बीच लोकप्रिय हो गईं
उनके कार्यों की प्रशंसा में गीत रचे जाने लगे।
यह संघर्ष सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण करने लगा। किसान आंदोलन के नेत्ृत्व ने बहुत सरल और प्रभावशाली
तरीका अपनाया। फसल कट जाने पर मालिकों को विशेष दिन बुलाया जाताऋ उस दिन सामान्य ग्रामीण और किसान भी उपस्थित होते। फसल तीन हिस्सों में बांट दी जातीः किसान को दो हिस्से मिलते। जोतदार को एक।
1950 आते-आते भूस्वामियों ने ‘तेभागा’ और ‘सात आरी’ मान ली
लेकिन प्रशासन और बड़े भूस्वामी अंदर-अंदर नाराज हो रहे थे तथा चुप नहीं बैठे थे। उन्होंने सशस्त्र बलों तथा पुलिस को गोलबंद करना आरंभ कर दिया। वे किसानों एवं ग्रामीणें को डराने-धमकाने और लूटने लगे। उनकी
फसलें लूटी जाने लगीं। बड़ी संख्या में किसानों तथा मजदूरों को गिरफ्तार कर उन्हें यातनाएं दी जाने लगीं।
7 जनवरी 1950 को नाचोल में दो हजार सेना पहुंच गई और उन्होंने दर्जनों गांवों को आग लगा दी। फौज के साथ पुलिस और अन्सार भी लगे हुए थे। वे गांवों और घरों में घुसकर लूटपाट करने लगे। सैंकड़ों संथाल मारे गए।
साथियों ने इला मित्रा से अनुरोध किया कि सीमा-पार भारत भाग जाएं।
इसके लिए उन्होंने धान से लदे बैलगाड़ियों में उन्हें छिपाकर ले जाने का इंतजाम का वादा भी किया। लेकिन
इला किसी तरह मानने को तेयार नहीं हुई जब तक कि उनके साथी रिहा नहीं कर दिए जाते। रामेन्द्र मित्रा का
ग्रुप भारत जाने में सफल हो गए लेकिन कई अन्य सफल नहीं हो पाए। इला संथाल वेशभूषा पहने हुए उनकी भाषा
बोलते हुए उनके बीच छिपी हुई थीं लेकिन खुफिया विभाग के एजेंटों ने उन्हें पहचान लिया। वे अपने सैंकड़ों साथियों के साथ गिरफ्तार कर ली गईं। फिर नाचोल पुलिस थाने में अमानवीय शारीरिक यातनाओं का दौर
शुरू हो गया। सैंकड़ों लोगों को बुरी तरह पीटा गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं। पुलिस चाहती थी कि लोग
इला को अपना नेता बताकर गलत काम करवाने की जिम्मेदारी उनपरडालें। लेकिन किसी ने भी अपना मुंह
तक नहीं खोला। इला पर पुलिसवालों की हत्याएं करवाने का आरोप भी लगायागया। सिर्फ यातनाओं के कारण 100 से भी अधिक लोग मारे गए।
पाकिस्तान में इला मित्रा पर आमनवीय अत्याचार उसके बाद इला मित्रा पर अमानवीय और अवर्णनीय अत्याचारों का दौर आरंभ हुआ। उस वक्त पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही का दौर आरंभ हो रहा था। चरमपंथी मुस्लिम सांप्रदायिक लोग हावी थे। इला कम्युनिस्ट थीं,महिला थीं और हिन्दू भी थीं। इन तीनों
का पूरा इस्तेमाल उनके खिलाफ किया गया। पाक सरकार ने उनसे बातें मनवाने के लिए राज्य एवं पुलिस तथा
फौजी मशीनरी का भरपूर प्रयोग किया लेकिन वह बुरी तरह असफल रही। इला की सहयोगी तथा सामाजिककार्यकर्ता मनोरमा मसीमा और भानु देवी तथा अन्य ने इस बात पर दृढ़ता से जोर दिया कि इला मित्रा अपने ऊपर किए गए अत्याचारां का बिना छिपाए पूरा-पूरा विवरण लोगों तक  पहुंचाएं। इला उनके विस्तार में जाने से हिचक रही थीं।
इला को न खाना दिया गया और न ही पानी, उन्हें लगातार राइफलों के‘बट’ से पीटा गया, पेट तथा अन्य
हिस्सों पर बूटों से मारा गया, दाहिने पैर में कील ठोकी गई, और बारम्बार बलात्कार तथा नारी पर जो भी
अत्याचार किए जा सकते थे, किए गए।
इला पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार 3-4 दिनों तक चलता रहा।वह पूरी तरह खून में नहा गई। यह
सबकुछ वर्णनातीत है। उन्हें फिर नवाबगंज जेल ले जाया गया जेल के गेट पर ही उनकी फिर
पिटाई की गई। बाद में जेल के सेल में कुछ पुलिस अफसरों ने उनकी सहायताकी और आगे अत्याचारों से बचाया।
उनमें से एक कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनके साथ पढ़ा करता था। बाद में इला ने उन सबों को धन्यवाद भी दिया।
वह रात में चुपके से भोजन और दवाएं दे आता। जेलों में इला को दी गई यातनाओंका वर्णन उनके वक्तव्य के रूप में ‘‘लियाकत-नूरूल आमीन सत्ता’ केखिलाफ हैंडबिल की शक्ल में सारेदेश में बांटा गया। लोग यह सब पढ़कर
दंग रह गए और गुस्से में आ गए।मुकदमे में इला पर आंदोलन कानेतृत्व कर किसानों को भड़काने, फसलें
लुटवाने और पुलिस अफसरों की हत्याएंकरवाने का आरोप लगाया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति चकनाचूर हो चुकी थी। वे लिखती हैः
‘‘कभी-कभी अपने बच्चे को जन्म देने के खुशी के क्षण सामने से गुजर जाते...........लेकिन जल्द ही लुप्त हो जाते...........मेरे पास कोई भी अच्छी यादें नहींबची थीं.......... सबकुछ जैसे अंधकार में डूब गया था....जज की आवाज उभर आती......लेकिन सबकुछ शून्य में खो जाता।’’
इला को ढाका सेंट्रल जेल लाया गया। फिर उन्हें ढाका मेडिकल कॉलेज 1953 में उस वक्त लाया गया जब वे मरणासन्न थीं। सैंकड़ों लोग उनसे मिलने आते। मौलाना भशानी तथा अन्य नेताओं ने पूर्वी पाकिस्तान असेम्बली
में चिंता व्यक्त करते हुए उनके रिहाई की मांग की।
उन्हें जून 1954 के मध्य में पैरोल पर छोड़ा गया और इलाज के लिए कलकत्ता लाया गया। वे धीरे-धीरे सुधरने लगीं। अब पाकिस्तान की सरकार को मालूम हुआ कि उनकी हालत सुधर रही है तो उसने भारत सरकार पर उन्हें वापस भेजने का दबाव बनना शुरू किया ताकि उन पर मुकदमे आगे बढ़ाए जाए। सबों ने उन्हें वापस भेजने से इंकार कर दिया ताकि वे पाक तानाशाही से दूर रहें।
उनकी देखभाल डॉ. शिशिर मुखर्जी तथा अन्य डॉक्टर कर रहे थे। साहित्यकार दिपेन्द्र बंदोपाध्याय ने उनकी स्थिति का विस्तार से वर्णन किया है। सुचित्र मित्र, सुभाष मुखोपाध्याय तथा अन्य कई साथियों ने उनकी
मानसिक स्थिति बेहतर बनाने में उनकी बड़ी मदद की। सुभाष ने उनपर एक कविता लिखीः 

‘‘केनो बोन पारुल डाको रे’। प. बंगाल में पार्टी का काम इला मित्रा पूर्वी पाकिस्तान वापस नहीं लौटी और प. बंगाल में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का काम करती रहीं। उन्होंने 1957 में बंगल में निजी विद्यार्थी के रूप में अपना एम.ए. पूरा किया और फिर सिटी कॉलेज ;साउथ कलकत्ता में प्रोफेसर का काम करना आरंभ किया।
इला मित्रा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  की ओर से प. बंगाल असेम्बली के चुनाव लड़ी। वे
मणिकतला चुनाव क्षेत्र से 1962-71 और 1972-77 में चार बार चुनी गयी।
हालांकि वे पूर्वी पाकिस्तान ;बांगलादेशद्ध वापस नहीं लौटीं लेकिन उसे कभी भी भुलाया नहीं। बांगलादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान उनका घर और पार्टी ऑफिस मुक्ति योधाओं की  गतिविधियों का केंद्र रहा। उन्होने कहा कि वे उस देश की रिणी हैं और यह उनका कर्तव्य है।
उन्होंने 1972 और 1974 में बांगलदेश की यात्रा की। उनकी मुलाकात बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से हुई। बंगबंधु ने कहा कि इला और रामेन्द्र मित्रा उनकी पुत्री और पुत्र के समान हैं और जल्द ही वे उन्हें बांगलादेश के नागरिक के रूप में वापस लाएंगे। लेकिन इस बीच बंगबंधु की हत्या कर दी गई।
बांगलादेश में इला का पुश्तैनी घर  खस्ता हालत में खंडहर बना पड़ा है। दिनाजपुर, बांगलदेश, में इला की याद
में ‘तेभागा छत्र’ बनाया गया है जिसपर उनकी पेंटिंग उकेरी गई है।
1965 में इला मित्रा ने प. बंगाल में मुस्लिम-विरोधी दंगे रोकने में सक्रिय भूमिका अदा की। भारत सरकार से ‘‘ताम्र-पत्र’ इला मित्रा को देश की आजादी के संघर्ष में योगदान के लिए भारत सरकार से ‘ताम्र-पत्र’ प्रदान किया गया। उन्हें साहित्यिक अनुवाद के लिए ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ से भी नवाजा गया।
वे प. बंगाल राज्य किसान सभा की अध्यक्ष चुनी गईं और राज्य इस्कफ की कार्यकारिणी अध्यक्ष भी। उनकी मृत्यु कलकत्ता में 3 अक्तूबर 2002 को हो गई .

-अनिल राजिमवाले

मंगलवार, 30 मार्च 2021

नाबालिग के साथ बलात्कार और भाजपा का राष्ट्रवाद

 

बलात्कार के आरोपी के साथ नाबालिग पीड़िता को भी पीटा, दोनों को रस्सी से बांधकर गांव में जुलूस निकाला गया .

 भाजपा शासित मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले से शर्मसार करने वाला एक वीडियो सामने आया है। यहां कुछ लोगों ने एक युवक और लड़की को रस्सी से बांधकर मारपीट की। युवक पर लड़की से बलात्कार का आरोप है। मारपीट करने वाले लड़की के रिश्तेदार बताए जा रहे हैं। उन्होंने बलात्कार पीड़िता और आरोपी का गांव में जुलूस निकाला।  उनके साथ चल रहे तमाशबीन लोग भारत माता की जय के नारे भी लगा रहे थे।

 The rape victim was beaten up with the accused, tied them both with a rope  and took out a procession in the village, also raised slogans of Bharat  Mata ki Jai |यह मामला जोबट थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है। लड़की के रिश्तेदारों ने शनिवार रात आरोपी को पकड़ा था।

संघ के मुख्य संगठन भारतीय जनता पार्टी शासित  लगभग सभी  प्रदेशों में बलात्कार की घटनाएँ आम बात है उसके पीछे उसकी सोच ही मुख्य कारण  है क्यों कि उसके नेता एक समुदाय विशेष या देश  विशेष की औरतों के साथ बलात्कार  की बातें करते है .आजादी  के बाद दंगों में इन लोगों की भूमिका हमेशा उजागर होती रही है .दंगों में  लूट-हत्या - बलात्कार और आगजनी के शिकार आम जनता होती है .

नाबालिग के साथ बलात्कार और भारत माता की जय के नारे के साथ जलूस निकलना भाजपा के राष्ट्रवाद  का ही असर है .

रविवार, 28 मार्च 2021

‘ई.एम.एस.नम्बूदिरीपाद प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री

 देश में संपन्न प्रथम आम चुनावों ;1951-52 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर
उभरी। दूसरे आम चुनावों ;1957 में भी यही हुआ लेकिन एक और ऐतिहासिक घटना घटी। विश्व में दूसरी बार और भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनावों के जरिए सरकार बना ली। केरल में भा.क.पा. को बहुमत मिला और उसकी सरकार बनी। लोग चकित रह गए। स्वयं कम्युनिस्टों को अपने दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमन्त्री : ईएमएस नंबूदिरीपादविचार बदलने पड़े। पुरानी जड़वादी समझ के अनुसार ‘पूंजीवादी’ चुनावों के जरिये कम्युनिस्ट सरकार नहीं बना पाते। लेकिन ‘‘ई.एम.एस.’ को भारत का प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नियुक्त कर इतिहास रच दिया गया।
आरंभिक जीवन
एलमकुलम मनक्कल शंकरन   का जन्म 13 जून 1909 को मलप्पुरम जिले के पेरिथलमन्ना तालुक के कुन्थी नदी किनारे स्थित इलमकुलम में हुआ था। उनके पिता का नाम परमेश्वर नम्बूदिरीपाद और माता का विष्णुदाता अंथारजनम था। उनका खाता-पीता परिवार था। आगे चलकर वे ‘ई.एम. एस. के नाम से विख्यात हो गए।
नम्बूदिरी समुदाय पुरातनपंथ से ग्रसित था लेकिन अब विरोध और विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे थे। फलस्वरूप कई प्रकार के सुधारकउभर रहे थे जैसे, ‘‘योगक्षेम सभा’’ तथा अन्य। इनमें नौजवानों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। ई.एम.एस. भी इससे जुड़ गए। उन्होंने सभा की पत्रिका के लिए एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक थाः ‘‘फ्रांसीसी क्रांति और नम्बूदिरी समुदाय’’।
ई.एम.एस. 1925 में स्कूल में तीसरी क्लास में भर्ती हुए। इससे पहले उनकी पढ़ाई घर में ही ट्यूटर के जरिये हुई थी। उन्होंने 1929 में एस.एससी. पास किया। वे इंगलिश और संस्कृत में काफी अच्छे थे।
राष्ट्रीय आंदोलन में
1927 में ई.एम.एस. को मद्रास में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन को देखने का मौका मिला। वे उस वक्त पांचवीं
क्लास के विद्यार्थी थे। यह पहला मौका था जब वे इतने बड़े राष्ट्रीय आयोजन को देख रहे थे। वे पूरे ध्यानपूर्वक समूचे कांग्रेस नगर में घूमे। वे स्वतंत्रता सेनानी एम.पी. नारायण मेनन से गहरे रूप से प्रभावित हुए। जुझारू नेता वी.जे. मथाई को भी वे बहुत पसंद किया करतेउन्हें सुनने के लिए वे 8 कि.मी.दूर तक भी चले जाते। ई.एम.एस. जहां रहा करते उस लॉज में प्रादेशिक कांग्रेस कमेटी के दो सदस्य पहुंचे। उन्होने ई.एम.एस. से ‘बायकॉट प्रस्ताव’ का अंग्रेजी से मलयालम में अनुवाद करने के लिए कहा।
1928-29 में स्कूल में आगे पढ़ने के लिए वे पालघाट गए। फिर जून 1929 में वे सेंट थॉमस कॉलेज, त्रिचूर में भर्ती हो गए। राजगोपालाचारी और जमनालाल बजाज हिन्दी का प्रचार करने के ख्याल से पालघाट आए।
स्कूल के प्रिंसिपल ने इसका विरोध किया लेकिन प्रिंसिपल के इस रूख का विरोध करते हुए ई.एम.एस. और उनके मित्रों ने आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होने उन दोनों नेताओं से मुलाकात की वे कृष्णास्वामी अय्यर से मिलने शबरी आश्रम भी गए। ई.एम.एस. फिर रामास्वामी नाइकर के साथ हो लिए और उनकी पत्रिका ‘‘मुक्तिवादी’ में काम
करने लगे।
सी.एस.पी. और कांग्रेस कमेटी  में
ई.एम.एस. राष्ट्रीय आंदोलन में अधिक सक्रिय होते गए। एक समय ऐसा आया कि वे महसूस करने लगे कि कॉलेज की पढ़ाई उनकी राजनैतिक गतिविधियों मे बाधक बनती जा रही है। फलस्वरूप उन्होंने 4 जनवरी
1932 को कॉलेज छोड़ दिया और पढ़ाई को अलविदा कह दिया। वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल
हो गए। राष्ट्रीय तथा सुधार आंदोलनों के दौरान वे कम्युनिस्ट विचारधारा के नजदीक आने लगे। इस संदर्भ में उन
पर जी.डी.एच. कोल तथा कई अन्य नेताओं का गहरा प्रभाव पड़ा। साथ ही वे कैथोलिक आंदोलन के विचारों से
भी प्रभावित हुए। उनके शिक्षकों में एक थे जोसेफ मुंडासरी जो इस आंदोलन से जुड़े हुए थे। मुंडासरी बाद में 1957
के कम्युनिस्ट मंत्रिमंल में मंत्री भी बने थे। ई.एम.एस. को असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार कर लिया गया। उनके
शिक्षक एम.पी. पॉेल ने उनकी प्रशंसा की लेकिन इसके लिए उन्हें अपनीनौकरी से हाथ धोना पड़ा।
‘‘नम्बूदिरी युवजन संघम’ ने गरीब लोगों के आंदोलन संगठित किए। दांडी मार्च की तर्ज पर उन्होंने प्रदेश-स्तर
पर पैदल-यात्राएं संगठित कीं। ई.एम. एस. ने इस दौरान जवाहरलाल लेहरू की एक संक्षिप्त जीवनी भी लिखी। खादी पहनने और बेचने का काम जोरों-शोरों से चल पड़ा। गांधी-इरविन पैक्ट के बद ई.एम.एस. ने पय्यान्नूर तथा बाडागारा में राजनैतिक सम्मेलनों में भाग लिया।
इनमें जे.एम. सेनगुप्ता, के.एफ. नरिमन तथा अन्य ने भी हिस्सा लिया। सम्मेलन में भाग लेने वालों में कई आगे चलकर उनके मित्र भी बने।
‘गुरुवय्यूर मंदिर प्रवेश आंदोलन’
का आरंभ 1 नवंबर 1931 के हुआ जिसमें ई.एम.एस. ने भी भाग लिया। उन्होंने साप्ताहिक ‘उन्नी नम्बूथिरी’ के
पाठकों के नाम अपनी पढ़ाई छोड़ने संबंधी एक संदेश लिखा। फिर वे त्रिचूर से कालीकट कांग्रेस के सविनय अवज्ञा
सत्याग्रह में भाग लेने चले गए। उन्हे गिरफ्तार कर विभिन्न जेलों में रखा गया जैसे कालीकट, कन्नानोर, वेल्लोर, इ.। वहां उनकी कृष्ण पिल्लै और बाद में ए.के. गोपालन से मुलाकात हुई। उनकी मुलाकात के.एन. तिवारी, किरण दास, आर.एम. सेनगुप्ता, आरसी. आचार्य, एन.जी. रंगा तथा अन्य से भी हुई। कन्नानोर जेल में
1933-34 में वामपंथी कांग्रेसियों का एक ग्रुप तैयार हआ। ई.एम.एस. जल्द ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी  में शामिल
हो गए। 1934 में कालीकट में वामपंथी कांग्रेसियों ने सी.एस.पी. की केरल इकाई की स्थापना की गई।
इसकी अध्यक्षता केलप्पन ने की। ई. एम.एस. ने पटना में मई 1934 में आयोजित सी.एस.पी के अखिल भारतीय
कन्वेंशन में भाग लिया। वे आगे इसकी कार्यकारिणी में शामिल कर लिए गए।
जयप्रकाश नारायण की रचना
‘समाजवाद क्यों?’ ;अंग्रेजी मेंद्ध ने ई. एम.एस. को बड़ा प्रभावित किया। कम्युनिस्टों ने इस पुस्तक की आलोचना
की। इसका असर ई.एम.एस. पर पड़ा और वे कम्युनिस्ट पार्टी के नजदीक आए। 1935 में उनकी मुलाकात कृष्ष्ण पिल्लै, एस.वी. घाटे और सुंदरैय्या से मद्रास में हुई। जनवरी 1936 में उन्हें भा.क.पा. के सदस्य बनाया गया।
इस प्रकार इस वक्त वे सक्रिय कांग्रेस, सी.एस.पी. के नेता और एक कम्युनिस्ट, तीनों ही थे।
जुलाई 1937 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया। कृष्ष्ण पिल्लै इसके सचिव बनाए गए तथा नेतृत्व के अन्य साथी थे केदामोदरन, एन.सी. शेखर तथा ई.एम. एस. नम्बूदिरीपाद। इसके तुरंत ही
बाद ई.एम.एस. को केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का संगठन मंत्री बनाया गया।
फिर 1938-39 के दौरान वे दो बार के.पी.सी.सी. के सचिव चुने गए। ई.एम.एस. लिखते हैं मद्रास और बंबई प्रदेशों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन से कम्युनिस्ट पार्टी को खुले रूप से काम करने का अधिक मौका मिला। मालाबार की सी.एस.पी. ने ‘प्रभाकर’ नामक एक साप्ताहिक आरंभ किया जिसका संपादन ई.एम.एस. किया करते थे। इस वक्त कम्युनिस्ट और सी.एसपी. वाले प्रदेश कांग्रेस के नियंत्रण में थे। भा.क.पा. का अखबार ‘‘नेशनल फ्रंट’ तथा सी.एस.पी. का ‘‘कांग्रेस सोशालिस्ट’ इस दिशा में सहायक थे।
मालाबार किसान आंदोलन
उन दिनों मलाबार मद्रास प्रेसिडेन्सी का हिस्सा था। कोचीन और त्रावणकोर सामंती रजवाड़े थे जो एकीकृत केरल
का हिस्सा बने। फरवरी 1939 में ई. एम.एस. मद्रास असेम्बली के लिए निर्विरोध चुने गए। उससे पहले 1937
और 1938 में उनका मनोनयन रद्द हो गया था। वे विधायिका द्वारा गठित ‘‘टेनेन्सी एन्क्वायरी कमेटी’ काश्तकारी जांच समितिद्ध के सदस्य चुने गए। ई.एम.एस. समेत समिति में अल्पमत रखे वालों ने मलाबार
काश्तकार अधिनियम तथा कुप्रसिद्ध सामंती ‘जेन्मी’ प्रणाली समाप्त करने पर जोर दिया। इस कार्य के दौरान ई.
एम.एस. को मलाबार, त्रावणकोर तथा कोचीन की कृषि प्रणाली का अध्ययन करने का मौका मिला। आरंभ में ई.एम. एस. ने किसान आंदोलन को ‘‘समाजवादी बारदोली’ का नाम दिया।
वामपंथी कांग्रेसियों ने मलाबार से त्रावणकोर किसान जत्था संगठित किया जिसमें ई.एम.एस. ने सक्रिय हिस्सा
लिया।
1940 में सी.एस.पी. के एक सम्मेलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विलय का निर्णय लिया गया। इसी दौर में ई.एम.एस. ने केरल के किसान आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास लिखा।
1942 में पार्टी पर से पाबंदी हटा ली गई। मार्च 1943 में कय्यूर की घटना घटी जिसमें चार किसान कार्यकर्ताओं
को फांसी की सजा दी गई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की प्रथम कांग्रेस ;बंबई, 1943 में ई.एम. एस. को केंद्रीय समिति का सदस्य चुन लिया गया। जनवरी 1947 में ई. एम.एस. उस समय गिरफ्तार कर लिए गए जब वे चेचक के कारण बिस्तर पर लेटे हुए थे वे सात महीनों तक वेल्लोर जेल में रखे गए।
‘बी.टी.आर. लाइन’ और ई.एम.एस.
1946 से 1951 के बीच पार्टी के बार-बार बदलती लाइन के बारे में ई.एम.एस. का कहना है कि 1946 से पहले वे ‘‘जोशी लाइन’ पर चला करते। 1946 में उन्होंने ‘अधिक जुझारू लाईन’ का समर्थन किया जिसके फलस्वरूप उनकी व्याख्या के अनुसार, ‘पुन्न्प्रा-वायलार’ और ‘तेलंगाना सशस्त्र-संघर्ष’ संभव हो सका। 1948 की कलकत्ता पार्टी कांग्रेस ई.एम.एस. के ही शब्दों में ‘‘मैं बाकी साथियों के साथ बदलाव के पक्ष में रहा और लाईन में परिवर्तन का समर्थन किया।’’ अर्थात वे ‘‘बी.टी.आरलाईन’ का समर्थन करने लगे। इसके बाद वे ‘‘आंध्र लाइन’ के पक्ष में हो
लिए। ई.एम.एस. के अनुसार इस कारण उन्हें न ‘रणदिवे पॉलिट ब्यूरो में शामिल किया गया और न ही राजेश्वर
राव पॉलिट ब्यूरो’ में। ई.एम.एस. ने कभी भी बी.टी.आर. लाइन के बारे में स्पष्ट स्थिति नहीं अपनाई।
ई.एम.एस. को उस वक्त पार्टी केंद्र के इन्चार्ज बनाया गया। यह उस वक्त हुआ जब भा.क. पा. का चार-सदस्यीय
प्रतिनिधिमंडल 1950 में मास्को गया था। लौटने के कुछ समय बाद अजय घोष 1951 में पार्टी महासचिव बनाए
गए। पॉलिट ब्यूरो मे ई.एम.एस. भी शामिल किए गए। इसके बाद वे953-54 ;मदुरै और पालघाट 1956 पार्टी कांग्रेस में पॉलिट ब्यूरो में फिर शामिल किए गए। अमृतसर 1958 और विजयवाड़ा ;1961 पार्टी कांग्रेसों में सांगठनिक ढांचे के तीन-स्तरीय बनने क बाद वे केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल किए गए।
कुछ समय तक वे पार्टी मुखपत्र ‘न्यू एज’ के संपादक भी रहे।
प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री,
1957 केरल राज्य का गठन 1957 में मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर के विलय के बाद हुआ। 1957 में केरल असेम्बली के प्रथम चुनाव हुए जो देशव्यापी चुनावों का हिस्सा थे।
नतीजों ने सारे देश में हलचल मचा दी। भा.क.पा. को बहुमत मिला। लोग चकित रह गए। स्वयं कम्युनिस्टों को
पूर्व के अपने यांत्रिक विचारों में परिवर्तन करना पड़ा। पहले की कठमुल्लावादी समझ के अनुसार कम्युनिस्ट ‘
पूंजीवादी’ चुनाव न जीत सकते हैं और न तो सरकार ही बना सकते। यह समझ गलत साबित हो गई।
भा.क.पा. ने मुख्यमंत्री पद के लिए विचार-विमर्श के बाद ई.एम.एस. को चुना। कम्युनिस्ट सरकार ने भूमि सुधार
आरंभ किए और शिक्षा बिल पेश किए। सरकार को केंद्र ने 1959 में बर्खास्त कर दिया।
ई.एम.एस. 1967 में फिर से एक बाद मुख्यमंत्री बने जब उन्हें 7-सदस्यीय संयुक्त सरकार का नेता बनाया गया। 1969 में मई सरकार बनी जिसमें फूट क बाद पहली बार भा.क.पा. के सी. अच्युत मेनन मुख्यमंत्री बने।
अमृतसर पार्टी कांग्रेस, 1958 इस कांग्रेस में भा.क.पा. ने अपने संविधान, कार्यक्रम संबंधी प्रस्थापनाओं और सांगठनिक ढांचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। पार्टी ने ‘सर्वहारा अधिनायकवाद’ का सिधान्त छोड़ दिया।
समाजवादी भारत में विरोधी पार्टियों के अस्त्ति्व की कल्पना की गई। संगठन का ढांचा 2-टीयर से 3-टीयर वाला
बनाया गया। पार्टी कांग्रेस के तुरंत बाद पार्टी मुखपत्र ‘न्यू एज’ में ई.एम.एसने अपने लेख में न सिर्फ इन निर्णयों
का स्वागत किया बल्कि यह भी कहा कि इनके जरिए भारत के कम्युनिस्ट महात्मा गांधी की विरासत आगे ले जा
रहे हैं।
‘ई.एम.एस.’ः प्रथम कम्युनिस्ट.. महासचिव के रूप में जनवरी 1962 में अजय घोषकी मृत्यु के बाद ई.एम.एस नम्बूदिरीपाद को पार्टी का महासचिव बनाया गया और एस.ए. डांगे को अध्यक्ष।
सी.पी.एम. में शामिल
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में फूट पडने के बाद ई.एम.एसनम्बूदिरीपाद सी.पी.एम. में शामिल हो गए। वे उन 32 साथियों में थे जिन्होंने अप्रैल 1964 की राष्ट्रीय परिषद की बैठक से वॉकआउट कर अलग पार्टी बनाने की घोषणा की थी। वे पीसुंदरैय्या द्वारा सी.पी.एम. के महासचिव पद से इस्तीफा दे देने के बाद उसके 1977 में महासचिव बनाए गए। वे इस पद पर 1992 तक बने रहे।
ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद की मृत्यु
19 मार्च 1998 को 89 की आयु में हुई।
रचनाएं
ई.एम.एस. ने विभिन्न विषयों पर काफी कुछ लिखा। कृषि समस्या पर उनके कई लेख एवं पुस्तिकाएं हैं।
उन्होने अपनी आत्मकथा, स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, महात्मा गांधी के विचारों के बारे में, आर्थिक प्रश्श्नों,
इत्यादि पर व्यापक तौर पर लिखा। मलयालम में उनके लेख संकलित किए गए हैं।
वे सांस्कृतिक क्षेत्र में भी सक्रिय थे।
-अनिल राजिमवाले

मंगलवार, 23 मार्च 2021

भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए मुखबिर राज समाप्त करें-रणधीर सिंह सुमन

 


बाराबंकीः भगत सिंह के सपनों का भारत बनाने के लिए मुखबिर राज समाप्त कर किसान मजदूरों का राज स्थापित करना होगा अखिल भारतीय नौजवान सभा द्वारा आयोजित शहीद दिवस के अवसर पर श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि भगत सिंह शोषण विहीन मजदूर किसान राज चाहते थे, वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि अगर आज भगत सिंह होते तो वर्तमान किसान मजदूर विरोधी सरकार उन्हे पुनः जीवित फांसी पर लटका देती है’’ भगत सिंह को फांसी कराने में इन्ही तत्वों का हाथ था। पार्टी के जिला सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि किसान आन्दोलन चल रहा है, मजदूर आन्दोलन चल रहा है सरकार चुनाव लड़ने में व्यस्त है। चुनाव मंे मोदी की लहर नहीं है लेकिन कार्पोरेट सेक्टर की धन की लहर है।
किसाना सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि किसान आन्दोलन तय करेगा कि किसानों के हालात सुधरंगे या नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि किसानों मंे आन्दोलन को हम सब मदद कर भगत सिंह के सपनों को सरकार करें। 

श्रद्धांजलि सभा मेें  धीरेन्द्र कुमार यादव, रमेश कुमार सच्चिदानन्द, संदीप तिवारी, राम दुलारे यादव, लवकुश वर्मा, योेगेन्द सिंह, महेन्द्र यादव, राजकुमार दीपक वर्मा, आशीष शुक्ला, राजेन्द्र सिंह राणा, मो0 फदीर, धर्मेन्द्र, दिग्विजय सिंह, कुलदीप यादव, मुनेश्वर प्रसाद गोस्वामी, विनोद यादव, गिरीश चन्द्र तथा श्याम सिंह आदि प्रमुख लोग थे।
श्रद्धांजलि सभा का संचालन किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया सभा में प्रारम्भ मंे सभी लोगों ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू के चित्रों पर माल्यापर्ण कर श्रद्धांजलि दी।

सोमवार, 22 मार्च 2021

मोदी चुनाव प्रचार में गोडसे की जय नहीं बोलते है

 loksabha elections 2019 bjp is full confident with pm narendra modi but  also has worried with sp and bsp alliance - मिशन 2019: बीजेपी को पीएम मोदी  पर पूरा भरोसा, लेकिन इस                     मोदी बंगाल में कहते हैं अपराध है, अपराधी हैं, लेकिन जेल में नहीं है, माफिया हैं, घुसपैठिया हैं लेकिन खुलेआम घूम रहे हैं। सिंडिकेट है, स्कैम है, लेकिन कार्यवाही नहीं होती है, मोदी भूल जाते हैं कि भाजपा शासित , उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राज्यों में स्थित बद से बदतर है, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री के बजाए संघ के प्रचारक की भूमिका में ही बने रहते हैं, पार्टी में अपराध की स्थिति यह है कि दो सांसदों ने बड़े नेताओं के दबाव के कारण आत्महत्या कर ली है, तमाम सारे लोग सत्तारूढ दल के पोर्न स्टार को भी फेल कर रहे हैं, उनके ब्लू फिल्म के वीडियो वायरल हो रहे हैं, तमाम सारे नेता- उपनेता सेक्स उद्योग के व्यापारी होने के कारण पकड़े गये हैं यहां तक कि मध्य प्रदेश के एक मंत्री राघव साहब अप्रकृतिक यौन सम्बंध बनाते हुए जब वीडियो वायरल हुआ तब उनको मजबूरी में इस्तीफा दे देना पड़ा था।
    सावरकर, गोलवरकर, हेड गवारकर व महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे को प्रेरणा स्रोत मानकर संघ प्रचारक उनके नाम पर वोट नहीं मांगते हैं, शैतान -साधू की भूमिका में दाढ़ी रखकर आजादी के महानायक पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद जैसे महान व्यक्तियों का मुखौटा लगाकर वोट मांगते हैं।
    हिटलर या मुसोलिनी के रक्त पिपाशु के यह भक्तगण कभी भी जनता के बीच में इनका नाम नहीं लेते हैं, लेकिन हिटलर के प्रचारमंत्री गोविल्स का अनुशरण करते हुए हर वक्त एक झूठ को हजारों  बार सुमिरनी लेकर जाप करते हुए मिलते हैं। हाँ लेकिन यह भी है कि हिटलर की मन की बात की तरह यह भी मन की बात करते हैं, लेकिन दूसरों की मन की बात सुनना यह पसंद नहीं करते हैं।
    मोदी बंगाल में या राज्यों में आम चुनाव में गैस, पेट्रोलियम पदार्थों या महंगाई की चर्चा नहीं करते हैं न ही देश के कल कारखानों को बेचने की बात ही करते हैं, मोदी बंगाल के चुनाव में एक प्रधानमंत्री के रूप में संघ का प्रचार अभियान चला रहे हैं, और जनता के करोड़ों रूपये खर्च कर गोविल्स के झूठ को प्रचारित कर रहे हैं चाहे बंगाल हो या तमिलनाडु हर जगह केन्द्र सरकार के मंत्री और प्रधानमंत्री स्वयं सरकारी खर्चों व सुरक्षा व्यवस्था का उपयोग कर जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं। बंगाल में प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं, तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस व वामदलों के निष्कासित लोगों की खरीद फरोख्त कर प्रत्याशी बना रहे है, हद तो यहां तक हो गई है कि चार सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए बाध्य किया है, नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री की भूमिका में कभी होते ही नहीं है हमेशा वह संघ के प्रचारक के रूप में ही होते हैं, यह देश का दुर्भाग्य है कि गलत बयानी करने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री है। 

-रणधीर सिंह सुमन

रविवार, 21 मार्च 2021

मोदी सरकार से मुक्ति दिलाना ही असली देशभक्ति है- रणधीर सिंह सुमन

मोदी सरकार से मुक्ति दिलाना ही असली देशभक्ति है. दिल्ली बॉर्डर पर सैकड़ों किसानों की मृत्यु हो चुकी है. ऐसी कसाई सरकार इस देश में कभी नहीं रही है. अंग्रेजों के जुल्मों को इस सरकार ने पीछे छोड़ दिया है.

  यह बात किसान सभा के प्रांतीय उपाध्यक्ष रणधीर सिंह सुमन ने मोहम्मदपुर गाँव में किसानों की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी, पुर्तगाली, फ़्रांसिसी व डच उपनिवेशकों ने ऐसे अत्याचार किसानों के ऊपर नहीं किये हैं जितना यह सरकार कर रही है. किसान आन्दोलन के कारण पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा के चुनावों में संघी गिरोह पूरी तरह से चुनाव हार जायेगा.   

 संयुक्त किसान मोर्चा के नेता यादवेन्द्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने किसानों से अपील की कि पंचायत चुनाव में कमल छाप समर्थक कोई भी व्यक्ति चुनाव नहीं जीतना चाहिए यही किसानों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव कामरेड बृजमोहन वर्मा ने कहा कि उनकी पार्टी गाँव-गाँव किसान आन्दोलन के समर्थन में किसानों को जागरूक करेगी. वहीँ, किसान सभा के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि किसानों से हर गाँव से दिल्ली बॉर्डर पर पांच-पांच किसान भेजकर किसान आन्दोलन का समर्थन करना चाहिए.
किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि वह किसान आन्दोलन के लिए जान भी दे सकते हैं और आखिरी सांस तक किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए आन्दोलनरत रहेंगे. वहीँ,सामाजिक कार्यकर्ता व क्षेत्र में जनप्रिय मौलाना मेराज अहमद कमर ने कहा कि चाँद पूरी दुनिया को रौशनी देता है लेकिन एक स्तिथि ऐसी आती है कि चाँद नहीं निकलता है सितारे जुगनू की तरह से चमकते हैं. आज देश में सितारे जुगनू की तरह चमक रहे हैं जो किसी का भला नही कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि वह दिल्ली में किसानों के समर्थन में एक माह विभिन्न आन्दोलन स्थलों पर रहकर आये हैं, किसानों का उत्साह बढ़ाने की जरूरत है.  


श्रद्धांजलि सभा का संचालन डॉ अलाउद्दीन ने किया, अध्यक्षता मौलाना मेराज अहमद कमर ने की. सभा में अधिवक्ता श्याम सिंह, मुनेश्वर बक्श, कमरुद्दीन अंसारी, जसीम अंसारी, कमलेश मौर्या, रेहान मलिक, अली काजिम खान, हमीदुल्लाह शेख, मौलाना गयासुद्दीन फलाही, डॉ रईस सिद्दीकी, राम खेलावन यादव पूर्व प्रधान, जगदीश मौर्या पूर्व प्रधान, अय्यूब अंसारी प्रधान, मोहम्मद सलीम, चन्द्रिका प्रसाद यादव पूर्व प्रमुख, लईक पूर्व प्रधान सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे.

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

कल्पना दत्तः चटगांव शस्त्रागार कांड की नायिका

गिरफ्तार हुईं कल्पना

 कल्पना दत्त (बाद में कल्पना जोशी )का जन्म 27 जुलाई 1913 को श्रीपुर, बोउल खाली उपजिला, चटगांव जिला, बंगाल प्रदेश ;अब बांग्लादेश में हुआ था। श्रीपुर मात्र 300 घरों का छोटा-सा गांव था। उनका परिवार पुरातनपंथी
परम्परावादी विचारों का बड़ा जमींदार परिवार था। कल्पना के पिता विनोद बिहारी दत्त थे और माता का नाम
शोभना देवी। परिवार शिक्षित था और इसके सदस्य बाद में स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गए।

शिक्षा और राजनैतिक सक्रियता

 कल्पना की आरंभिक शिक्षा घर पर हुई। उसके बाद उसे डॉ. खास्तगीर बालिका हाई स्कूल में दाखिल करा दिया गया। यह स्कूल परिवार के ही कुछ सदस्यों ने स्थापित किया था। कल्पना पढ़ाई में बड़ी तेज थी और हमेशा अव्वल आया करती। उसने सुप्रसिद्ध  बंगला पुस्तक ‘‘पथेर दाबी’ पढ़ ली, साथ ही कन्हाईलाल तथा कई क्रांतिकारियों की जीवनियां भी पढ़ीं। उसक दो चाचा गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। इसका
उस पर बड़ा असर पड़ा। कल्पना को विज्ञान का बड़ा शौक था। महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय को वह अपना आदर्श मानती थी। कल्पना संस्कृत और गणित में भी बहुत तेज थी।
समय के साथ उसके परिवार में राजनैतिक मतभेद पैदा हो गए। गांधी जी चटगांव आए और इस परिवार की
कपड़े की दुकान पर बंग लक्ष्मी मिल्स के स्वदेशी कपड़े रख गए। परिवार की कई स्त्रियां गांधी का ‘दर्शन’ करने
गईं, यहां तक अपने गहने तक उन्हें दान कर आईं।
कल्पना ने 1929 में चटगांव से मैट्रिक पास किया। उसी वर्ष वहां एक विद्यार्थी सम्मेलन आयोजित किया गया
जिसमें कल्पना ने अपने चाचा की सहायता से भाषण भी दिया। चटगांव के नौजवान क्रांतिकारी संगठनों में
संगठित होने लगे। उसके एक सदस्य पूर्णेन्दु दस्तीदार कल्पना के घर आने-जाने लगे। कल्पना धीरे-धीरे
प्रशिक्षित होने लगी।
कल्पना ने कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में भर्ती ले ली। उसके विषय थे भौतिक शास्त्र, गणित और वनस्पति
शास्त्र। साथ ही उसने व्यायाम, बोटिंग, इ. भी सीखी। उसने हिन्दी और फ्रेंच का भी अध्ययन किया। जल्द ही उसका संपर्क सूर्यसेन, अनंत सिंह, गणेश घोष तथा अन्य प्रसिद्ध  क्रांतिकारियों से हुआ।
उसने लाठी, छुरा, इत्यादि चलाने में ट्रेनिंग पाई।
कल्पना ने अप्रैल 1930 में जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए बेथ्यून कॉलेज मे हड़ताल संगठित की। कॉलेज की महिला प्रिंसिपल ने विद्यार्थियों से दुर्व्यवहार किया। बाद में प्रिंसिपल को माफी मांगनी पड़ी।
कल्पना दत्त ’छात्री संघ’ ;गर्ल स्टूडेंट ऐसोसिएशनमें शामिल हो गई। यह एक अति-क्रांतिकारी संगठन था
जिसमें बीना दास और प्रीतिलता व द्देदार जैसी क्रांतिकारी छात्राएं शामिल थीं।
चटगांव शस्त्रागार पर हमला
क्रांतिकारी युवाओं ने 18 अप्रैल 1931 को चटगांव के ब्रिटिश शस्त्रागार पर हमला कर दिया। इस खबर ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया। खबर तेजी से फैल गई। कल्पना जल्द से जल्द चटगांव चली जाना चाहती थी लेकिन उसे कॉलेज से ट्रांसफर नहीं मिल रहा था। काफी समय बर्बाद हो गया जिसका उसकी पढ़ाई पर असर पड़ा। वह प्राइवेट छात्र के रूप में परीक्षा में बैठी। उसका सेंटर चटगांव में ही पड़ा। कल्पना ने चटगांव कॉलेज में बी.एस.सी. में एडमिशन ले लिया।
वह क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए अधीर हो रही थी। उसने पिस्तौल तथा अन्य हथियारों की ट्रेनिंग लेना अधिक सक्रियता से लेना शुरू कर दिया। अपने मैट्रिक के दिनों मे कल्पना एक कम्युनिस्ट साथी के संपर्क में आ चुकी थी जिसका नाम था सुरभा दत्त। इससे उसके विचार बनने लगे थे। कल्पना ने अनन्त सिंह को, जो क्रांतिकारी दल के नेताओं में से एक थे, दल में शामिल होने पर मजबूर कर दिया। उसे रेलवे लाइन उड़ाने के
ग्रुप में शामिल कर लिया गया। इंडियन रिपब्लिकन आर्मी के सूर्य सेन ने कल्पना दत्त को कलकत्ते से एसिड, रसायन तथा अन्य सामग्री का इंतजाम करने के लिए कहा। कल्पना खुद यह सारा सामान ले आई। वह विस्फोटक तैयार करने की विशेषज्ञ बन गई। उसे ‘एक्शन स्क्वाड’ में शामिल कर लिया गया।
जेल को बम से उड़ने की पहली कोशिश असफल रही। जेल में दिनेश गुप्ता और रामकृष्ण बिस्वास को फांसी
दी जाने वाली थी। कल्पना को 17 दिसंबर 1932 को चटगांव के पहाड़ तली में स्थित योरपियन क्लब के पास से गिरफ्तार कर लिया गया। वह पुरुष वेश में घूम रही थी। इसके एक सप्ताह बाद ही प्रीतिलता वद्देदार
के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने क्लब पर हमला कर दिया। यह हमला जलालाबाद के उस नरंसहार के बदले
में था जिसमें ब्रिटिश सैनिकों ने कई युवाओं की हत्या कर दी थी। प्रीतिलता गंभीर रूप से घायल हो गई और पकड़े
जाने से बचने के लिए उसने सायनाड खाकर आत्महत्या कर ली। प्रीतिलता कल्पना दत्त की सहपाठिनी और
क्रांतिकारी दल में सहयोगिनी थी। पुलिस ने कल्पना को उक्त कांड में फंसाने की कोशिश की लेकिन सबूतों
के अभाव में उसे जमानत पर छोड़ दिया गया। उसे अपने घर में बंदी बनाकर चारों ओर पुलिस का पहरा
बिठा दिया गया। उसे घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।
फिर भी कल्पना मौका पाते ही घर से भाग निकली। उनके पिता को काम से निकाल दिया गया और घर पर
छापा मारकर सारा सामान जब्त कर लिया गया।
कल्पना और सूर्यदा

सूर्यसेन किसी तरह रात और दिन में छिपते तथा भागते रहे और पुलिस के जाल से बचते रहे। इसी दौरान वह पुलिस फायरिंग में घायल हो गई। वह और मणिन्द्र दत्त पूरे दो घंटे एक तालाब के पानी में छिपे रहें। फिर भी वह भागती गई। आखिरकार उसे चटगांव के पास समुद्री किनारे एक छोटे-से कस्बे से गिरफ्तार कर लिया गया।
कल्पना और कई अन्य साथियों को पकड़कर पुलिस ले गई। एक पुलिस अफसर ने उसे थप्पड़ मारा। इस पर
वहां उपस्थित फौजी कमांडर ने थप्पड़ मारने वाले को डांटते हुए कहाः ‘‘उसे उचित सम्मान दो।’’ कल्पना पुलिस
और फौजी अधिकारियों के बीच बड़ी लोकप्रिय हो गई।
सूर्यसेन और तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी की सजा सुनाई गई जबकि कल्पना दत्त को आजन्म कारावास की
सजा मिली। विशेष ट्रिब्यूनल जज ने कहा कि वह सिर्फ 18 वर्ष की थी। उसे अंडमान में काला पानी की सजा
के लिए भेजा जाने वाला था लेकिन महाकवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने हस्तक्षेप कर रुकवा दिया। उसे पहले तो हिजली
और राजशाही जेलों में भेजा गया, फिर सितंबर 1934 से अक्टूबर1935 तक मेदिनीपुर जेल में रखा गया। फिर
दिनाजपुर जेल और उसके बाद मेदिनीपुर जेल में वापस लाया गया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
कल्पना दत्त और अन्य कैदियों की रिहाई के लिए आंदोलन जोर पकड़ता गया तथा सरकार पर दबाव बढ़ता
गया। 1938-39 में कैदियों की रिहाई का आंदोलन तेज हो गया। इसके अलावा गांधीजी और टैगोर ने भी दबाव
बनाया। फलस्वरूप कल्पना दत्त तथा कई अन्य को 1 मई 1939 को रिहा कर दिया गया।
रिहाई के बाद कल्पना को रविन्द्रनाथ टैगोर की ओर से पत्र मिला। इसमें उन्होंने कल्पना को उसके भविष्य के कर्तव्यों का ध्यान दिलाते हुए उसे आशीर्वाद दिया।
कल्पना के अधिकतर साथी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो चुके थे। अभी कल्पना पशोपेश में थी। वह वेदान्त
और गीता के आध्यात्मिक प्रभाव में भी थी। साथ ही उसे कम्युनिस्टों के विचार जरा ज्यादा ही सिधान्तिक लगते थे। उसे महसूस हो रहा था कि ‘जनता के बीच’ काम होना चाहिए। कोई भी कॉलेज कल्पना दत्त को एडमिशन देने
को तैयार नहीं था। आखिरकार उसने 1940 में बी.ए. पास किया ओर एम. ए.;गणित में एडमिशन लिया।
1940-41 में उसे फिर ‘गृह-बंदी’ में रखा गया वापस कलकत्ता लौटकर उसने ‘अध्ययनमंडली’ का गठन किया। साथ ही हस्तलिखित पत्रिका ‘पथेय’ निकालना शुरू किया। उसने लगभग सौ सदस्यों वाली एक नारी समिति भी गठित की।
उसने ‘रात-दिन’ स्कूल स्थापित किए। उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चटगांव पर जापानियों द्वारा बमबारी के दौरान रक्षा-उपायों संबंधी काम किया। इस संदर्भ में उसने महिला आत्मरक्षा समिति’ के गठन में भाग लिया। इस बीच वह दो बार टाइफायड से गंभीर रूप से बीमार हुई।
कल्पना को अब जनता के बीच काम करने के कई अवसर मिले। उसने संथाल मजदूरों, आदिवासियों, सफाई
श्रमिकों, धोबियों, इ. तबकों के बीच, उनकी झुग्गियों में जाकर बहुत सक्रियतासे काम किया। इसके अलावा उसने
1943 के बंगाल में पड़े महा-अकाल में बड़ा काम किया। उसे किसान सभा में भी काम करने का मौका मिला।
कलकत्ता में उसने ट्रामवे तथा अन्य मजदूरों के बीच सक्रिय काम किया।
वह ट्रामवे वर्कर्स यूनियन के ऑफिस में होलटाइमर बन गईं।
इन कार्योंं के दौरान कल्पना दत्त कम्युनिस्ट पार्टी के काफी नजदीक आ गईं। उन्हें 1942 में, जब वे
टाइफायड से बीमार थीं, सूचना दीगई कि उन्हें भा.क.पा. का सदस्य बना लिया गया है।
दिसंबर 1942 में कल्पना पार्टी स्कूल में भर्ती होने बंबई गईं। वहां उनकी मुलाकात पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी से हुई। उन्हें प्रादेशिक स्तर पर पार्टी संगठनकर्ता बनाया गया।
उनकी चार बहनें भी पार्टी की सदस्य बन गईं। अगस्त 1943 में पी.सीजोशी और कल्पना दत्त की शादी हो गई।
कल्पना जोशी ने कई जनसंघर्षोंं का नेतृत्व किया और कई अन्य में भाग लिया। इनमें से एक था जनवरी 1946 में चटगांव के पाटिया में हड़तालें और प्रदर्शन। यह ब्रिटिश सिपाहियों द्वारा किए गए अत्याचारों के विरोध में था। कल्पना और उसके साथियों ने इनका नेतृत्व किया।
1946 में कल्पना जोशी ने भाक. पा. उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान सभा के लिए चुनाव लड़ा। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

कल्पना जोशी 1948 में अंडरग्राउंड चली गईं। 1951 में जब पार्टी पर से पाबंदी हटाई गई तो उन्हें वित्तीय एवं राजनैतिक कारणों से नौकरी करनी पड़ गई। उन्हें प्रो. पी.सीमहालनोबिस के तहत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीच्यूट में काम मिल गया। उन्होंने मुख्यतः नेशनल सैम्पल सर्वे ;एन.एस.एस. में काम किया। वे इंस्टीच्यूट ऑफ स्टडीज इन रश्शियन लैंग्वेज की संस्थापक-डाइरेक्टर भी थीं। उन्होंने ‘चिटगांग आर्मरीरेडर्सःरेमिनिसेन्सेज’ ;चटगांव शस्त्रगार कांड के साथियों के संस्मरण नाम से आत्म-कथात्मक पुस्तक भी लिखी। इसे अंग्रेजी में पी.सी. जोशी और निखिल चक्रवर्ती ने अनूदित किया। जोशी ने इसकी भूमिका भी लिखी। कल्पना ने लिखाः ‘‘हमें अपने स्कूली दिनों में अपने भविष्य का कोई खाका स्पष्ट नहीं था। और तब झांसीं की रानी की कहानी ने हमें प्रेरित कर दिया।’’ कल्पना दत्त जोशी की मृत्यु 5 फरवरी 1995 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले

 

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

बी.वी. काक्लियाः सभी तबकों द्वारा सम्मानित नेता-अनिल राजिमवाले

 कर्नाटक के सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता बेविन्जे विष्णु काक्लिया का जन्म  11 अप्रैल 1919 के बेविन्जे नामक
गांव में हुआ था। यह स्थान उत्तर केरल के कासरगोड तालुक में चेरकला ग्रामके पास पायसविनी ;चंद्रगिरी नदी
किनारे स्थित है। यह नदी मलयालम-भाषी तथा टुलु-भाषी लोगों की परम्परागत सीमा है लेकिन इस पूरे क्षेत्र पर कन्नड़-भाषी शासकों का आधिपत्य रहा है। बी.वी. काक्लिया विष्णु काक्लिया नामक एक धनी जमींदार और गंगम्मा के सबसे छोटे बेटे थे। उन्हें अपने पिता का ही नाम ‘विष्णु’ दिया गया।
ऐसा माना जाता है कि ‘काक्लिया’ नाम कासरगोड तालुक के मुलियार ग्राम के ‘कक्कोल’ नामक स्थान से आया
है। काक्लिया वंश के लोग ‘कुम्बले सीमे’ के राजाओं के सलाहकार हुआ करते थे।
आरंभिक जीवन एवं शिक्षा
बी.वी. काक्लिया के पिता का निधन उसी वक्त हो गया जब विष्णु मात्र वर्ष की उम्र का था। उसकी देखभाल माता ने ही की। साथ ही उसके सबसे बड़े भाई सुबराया काक्लिया ने भी सहायता की। विष्णु ने एस.एल.एल.सी. तक की
पढ़ाई कासरगोड में ही की। फिर उसका दाखिला 1937 में मंगलौर के सेंट अल्योसिस कॉलेज में कर दिया गया।
यहां उसने इंटरमीडियट की पढ़ाई की। फिर रसायन शास्त्र ;केमिस्ट्रीद्ध में गरेज्युएशन किया। इसके बाद विष्णु
कर्नाटक में ही रह गया। इस बीच विष्णु काक्लिया का संपर्क आजादी के आंदोलन और फिर कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ। विष्णु ने विद्यार्थी आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और ए.आई.एस.एफ. में शामिल हो गया। वह ए.आई.एस.एफ का जिला सचिव बन गए।
विष्णु काक्लिया ने 1942 के आंदोलन में भी सक्रिय हिस्सा लिया और गिरफ्तार हुआ।
इस बीच मंगलौर में सी.एस.पी. ;कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ। इस सिलसिले में युसुफ मेहर अली, अशोक मेहता, सोली बाटलीवाला तथा अन्य नेता वहां गए। सी.एस.पी.वी. की प्रमुख नेता कमला देवी चट्टोपाध्याय थीं। एस.वी. घाटे भी मंगलौर के ही थे। उनका विद्यार्थियों पर गहरा असर था।
काक्लिया भी उनके प्रभाव में आए। विद्यार्थी बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल हुए। काक्लिया विद्यार्थी
आंदोलन के अलावा मजदूरों और किसानों के बीच काम करने लगे।
1935 से 45 के दौरान उन्होंने खपरैल ;टाइल, बीड़ी, कॉफी, काजू, हैंडलूम, इ. मजदूरों के बीच काम किया
तथा उनके संगठन गठित करने में हिस्सा लिया।
वे औपचारिक रूप से 1939 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए।
जनता के बीच काम
1943 के बंगाल के महा अकाल के दौरान काक्लिया ने रिलीफ का बड़ा काम किया। उन्होंने कालेबाजारियों और जमाखोरों के खिलाफ व्यापक आंदोलन संगठित किया। 1946 में मद्रास प्रदेश के गवर्नर आर्किबाल्ड नी ;छमल मंगलौर पहुंचे। सरकार ने राशन में 2 औंस की कटौती कर दी थी। इससे व्यापक रोष फैला हुआ था। नी उसी सिलसिले में आए थे। कम्युनिस्ट पार्टी ने व्यापक आंदोलन छेड़ दिया जिसमें विष्णु काक्लिया ने सक्रिय भाग लिया। लगभग 30 हजार लोग पुलिस थाने गए और कैदियों को छुड़ा लिया। काक्लिया गिरफ्तार कर कन्नूर जेल में रखे गए। उन्हें 15 अगस्त 1947 को रिहा किया गया।
काक्लिया 1948 में अंडरग्राउंड चले गए। उस वक्त पार्टी पर संकीर्णतावादी ‘बी.टी.आर.लाईन’ हावी हो गई थी। 1950 में वे देवनगिरी में गिरफ्तार हो गए। उन्होंने दक्षिण कन्नड़ जिला में पार्टी में एकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
विधायिका में
विष्णु काक्लिया 1952 से 1954 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। वे 1952 में मद्रास प्रदेश से कर्नाटक ;तत्कालीन मैसूर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 1972 में वे बंतवाल से सबसे अधिक अंतर से एम. एल.ए. चुने गए और 1978 तक रहे। फिर विट्ठल से वे 1978 से 1983 तक एम.एल.ए. रहे। विधायक के रूप में उन्होंने कर्नाटक भ्ूमि सुधार अधिनियम 1974 तैयार करने में सक्रिय भूमिका अदा की। इस काम में उन्होंने मुख्यमंत्री देवराज अर्स की सक्रिय सहायता की। अर्स द्वारा गठित भूमि सुधार संबंधी सलाहकार समिति में वे बड़े ही सक्रिय रहे। वे बंतवाल में भूमि ट्रिब्यूनल के सदस्य थे। वे विधायिका के पब्लिक एकाउंट्स कमिटि के अध्यक्ष भी चुने गए।
भूमि सुधारों के लिए संघर्ष
जैसा कि पहले हम देख आए हैं, काक्लिया ने भूमि सुधार कानूनों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
उनके तथा अन्य कइयों के प्रयत्नों के फलस्वरूप कर्नाटक में बड़े पैमाने पर भूमि-सुधार लागू हुए। केवल दक्षिण
कन्नड़ जिले में ही एक लाख से भी अधिक परिवारों का इससे फायदा पहंचा। उनके सदस्यों और बच्चों की
शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवा देने एवं सुधारने में बड़ी सहायता मिली। इन मूलभूत परिवर्तनों के फलस्वरूप पढ़े-लिखे
मध्यमवर्ग के परिवार उभर आए। काक्लिया ने बंगलौर, कोलार, श्रीरंगापट्टनम, हम्पी तथा गुलबर्गा में किसान सभा के कन्वेंशन आयोजित किए। काक्लिया और श्रीनिवास गुडी ने अन्य के साथ मिलकर कर्नाटक राज्य
रैयत संघ गठित किया। जनवरी-फरवरी 1979 में रैयत संघ ने धान, गन्ना, कपास, मूंगफली, इ. उत्पादों के लिए
लाभकारी मूल्यों की मांग करते हुए राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ दिया।
गोवा मुक्ति आंदोलन में
बी.वी. कक्लिया ने 15 अगस्त 1955 को एक 50-सदस्यीय जत्थे का बंगलौर से गोवा जाने में नेतृत्व किया। वे चुपके से गोवा के अंदर ‘इद्दुस’ नामक गांव में प्रवेश कर गए और तिरंगा फहरा दिया। फलस्वरूप पुर्तगाली
पुलिस ने काक्लिया तथा अन्य की जमकर पिटाई कर दी।
ट्रेड यूनियन आंदोलन में
काक्लिया ने बीड़ी तथ खपरैल ‘टाईल’ मजदूरों को उनके अधिकार दिलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा
की। इससे उन्हें कई कानूनी अधिकार और संरक्षण मिले। उन्होंने मंगलौर के खपरैल/टाइल मजदूरों की समस्याएं
प्रकाश में लाईं। इसके अलावा उन्होंने कॉफी, इलायची, बागानों, इ. के श्रमिकों की समस्याएं भी उठाईं। उन्होंने 1943 से ही दक्षिण कन्नड़ जिले के बुनकरों तथा अन्य मजदूरों की मांगों क लिए संघर्ष किया।
कर्नाटक राज्य पुनर्गठन
आंदोलन

बी.वी. काक्लिया अखंड कर्नाटक निर्माण परिषद के महासचिव थे। उन्होंने कन्नड़भाषी क्षेत्रों का कर्नाटक में विलय करने का संघर्ष चलाया। ब्रिटिश शासन के दौरान कासरगौड तत्कालीन दक्षिण कनारा जिले का एक तालुका था। नए कर्नाटक राज्य से इसे अलग रखकर 1956 में केरल में मिला दिया गया।
विष्णु काक्लिया को 1 नवंबर 2006 को सुवर्ण कर्नाटक एकीकरण अवार्ड से नवाजा गया। इस अवसर पर
उन्होंने राजाओं, सामंतों और सरकारों के खिलाफ एकीकृत कर्नाटक के लिए लंबे संघर्षोंं का जिक्र किया। उन्होंने
कहा कि छोटे अनावश्यक मुद्दों को लेकर राज्य की एकता को हानि नहीं पहुंचाईजानी चाहिए।
सक्रिय लेखक
बी.वी. काक्लिया ने कई सारे लेख और पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं। यह इस बात के बावजूद कि वे आम जनता के
बीच सक्रिय कार्य में लगे रहते। उन्हें अपनी साहित्यिक रचनाओं के लिए
कन्नड़ साहित्य एकेडेमी अवार्ड दिया गया। उन्हेंने एम.एस.कृष्णन, एस.एमनाय क तथा अन्य साथियों के साथ
मिलकर नव कर्नाटक पब्लिकेशन्स प्रालि. की स्थापना की। वे इसके अंतिम समय तक अध्यक्ष पद पर रहे।
उनकी कुछ रचनाएं इस प्रकार थींः ‘कम्युनिज्म’, ‘भारतीय चिंतने, हिन्दू धर्म, कम्युनिज्म‘, ‘भूमि माथु आकाश’, इ.। उन्होंने सच्चर कमिटि रिपोर्ट तथा कई अन्य पुस्तकों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने आत्मजीवनी भी लिखी जिसका शीर्ष थाः ‘बारेयादा दिनचर्या’ मारेदा पुतागालु’ ;अप्रकाशित डायरी के अनजान पन्ने।
1983 और 86 के बीच उन्होंने मार्क्स और एंगेल्स की जीवनियां लिखीं। कार्ल मार्क्स संबध्ां उनकी रचना को
1986 में ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ मिला। फ्रेडरिक एंगेल्स की जीवनी संबंधी उनकी रचना को कर्नाटक
साहित्य एकेडेमी से अवार्ड मिला।
उनकी पत्नी अहिल्या का 21 जून 1998 को देहान्त हो गया। वे श्री नारायण सोमैय्याजी की सबसे छोटी
बेटी थीं। श्री नारायण स्वतंत्रता सेनानी थे। अहिल्या ने ही मुख्यतः अपने चार बेटों की देखभाल की।
राज्य पार्टी सचिव के रूप में
1962 को काक्लिया को एम. एस.कृष्णन, एम.सी. नरसिम्हा, सी.आरकृष्ण् ा राव, वासन, गोविन्दन तथा अन्य
के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 1964 में पार्टी में फूट पड़ने तथा सी.पी.एम. बनने के बाद बी.वीकाक्लिय
ा राज्य भा.क.पा. के सचिव बनाए गए। इस पद पर वे 1972 तक बने रहे। वे भा.क.पा. की 7वीं कांग्रेस ;बंबई,1964 में क्रिडेन्शियल कमिटि में शामिल किए गए। वे पार्टी की पांचवीं ;अमृतसर, 1958, छठी ;विजयवाड़ा, 1961, सातवीं ;बंबई,1964द्ध और आठवीं ;पटना,1968द्ध कांग्रेसों में राष्ट्रीय परिषद के सदस्य के रूप में चुने गए।
वे 1986 से 1991 तक राज्य पार्टी के मुखपत्र ‘केम्बावटा’ के संपादक रहे।
1980 के दशक में उन्होंने कई सारे जन-आंदोलनों में हिस्सा लिया।
इनमें एक बड़ा आंदोलन 1982 में हुआ। किसानों का एक विशाल मार्च नारागुंड से बंगलौर तक निकाला गया
जिसका नेतृत्व काक्लिया, देवराज अर्स, डी.बी. चंद्रगौड़ा तथा अन्य कर रहे थे।
काक्लिया को कम्युनिस्ट आंदोलन में उनके योगदान के लिए इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मकि्र्सस्ट थियोरी,
धारवाड की ओर से कार्ल मार्क्स अवार्ड प्रदान किया गया।
उनके सम्मान में 22 मार्च 2009 को बंगलौर स्थित एम.एस. कृष्णन मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा एक सादा समारोह
आयोजित किया गया। इस अवसर पर एन.सी. नरसिम्हन ने उन्हें ‘निरंतर’ नामक सम्मान पुस्तक प्रदान किया।
इसमें उनसे संबंधित लेख एवं सामग्री एकत्र की गई है। वे लेख और भाषण भी हैं जो ‘काक्लिया-90ः युवा पीढ़ी
के साथ विमर्श’ के अवसर पर दिए गए थे।
उन्हें 25 अक्तूबर 2006 को तुलू साहित्य अकादमी द्वारा तुलू भाषा, साहित्य एवं संस्कृति में योगदान के
लिए सम्मानित किया गया। बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने पार्टी द्वारा विट्ठल मलिकुडिए तथा
उसके पिता लिंगन्ना मालेकुडिए की रिहाई के आंदोलन में हिस्सा लिया।
उक्त दोनों पर नक्सलपंथी संबंध होने का आरोप लगाया गया था। यह उनकी अंतिम सार्वजनिक उपस्थिति साबित हुई।
10 और 11 अगस्त 2019 को मंगलौर ;मंगलुरूद्ध में दो-दिवसीय ‘बी.वी. काक्लिया शती समारोह’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर उनके सम्मान में लेक्चर और संस्मरण प्रस्तुत किए गए। उनके योगदान के विभिन्न पहलू रखे गए। भा.क.पा. नेता सिद्दनगौड़ा पाटिल ने ‘बी.वी. काक्लियाः मलाबार से कर्नाटक असेम्बली’ विषय
पर व्याख्यान दिया।
यह आयोजन संयुक्त रूप से एम. एस. कृष्णन मेमोरियल ट्रस्ट, मासिक पत्रिका ‘होसाथु’, नवकनार्टक प्रकाशन
और समदर्शी वेदिके की ओर से संयुक्त रूप से किया गया। इसमें भाग लेने वालों में अमरजीत कौर, कन्हैय, प्रोतेलतुम्बडे, प्रो. चंद्र पुजारी, दिनेश मट्टू, पी.वी. लोकेश, डॉ. टी.एसवेण् ागोपाल, डॉ. विजय थम्बंदा, टी.एमकृष्ण्
ान तथा अन्य ने हिस्सा लिया।
बी.वी. काक्लिया की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद ‘ब्रेन हेमरेज’ के कारण 4 जून 2012 को मंगलौर में हो गया था

शनिवार, 30 जनवरी 2021

बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न नेता:के.टी.के. थंगमणि

 

 

के.टी.के. थंगमणि संक्षेप में ‘के.टी.के.’ के नाम से जाने जाते थे। वे मद्रास प्रेसिडेंसी  और  बाद  में  तमिलनाडु  में पार्टी और मजदूर आंदोलनों के महारथी थे।  उनका  जन्म  19  मई  1914 को मद्रास प्रेसिडेंसी के मदुरई जिले केथिरूमंगलम में हुआ। उनके पिता का नाम  कुलै ̧या  नाडर  और  माता  का कलिअम्मल था। पिता बहुत धनवानथेः वे रैली इंडिया लिमिटेड नामक एक ब्रिटिश  कंपनी  की  ओर  से  जावा;इंडोनेशिया से आयात की जाने वाली चीनी के एकमात्र वितरक थे। इसके अलावा  उनकी  दो  कपड़ा  मिलें  थीं,एक थिरूमंगलम में और दूसरी थेनी जिले में। 

शिक्षा-

‘के.टी.के’ ने अपनी स्कूली शिक्षा के.एस.आर. विद्यालय, तिरूमंगलम में पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1935में गणित में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर केबी.ए.  ;ऑनर्स किया।  उसी  वर्ष  वे उच्चतर  शिक्षा  के  लिए  इंगलैंड  चले गए। लंदन यूनिवर्सिटी से उन्होंने मिडल टेम्पल लॉ कॉलेज से अप्रैल 1940में बार-एट-लॉ की डिग्री प्राप्त हो गई।इंग्लैंड मेंः 

मार्क्सवाद का प्रभाव 

 लंदन में पढ़ाई के दौरान ‘‘के.टी.के’ का संपर्क कई सारे उन भारतीय विद्यार्थियों से हुआ जो आगे चलकर महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट और आजादी के बाद भारत के नेता बने। इनमें शामिल थे,  एन.के.  कृष्णन,  पार्वती  कृष्णन,इंद्रजीत  गुप्त,  ज्योति  बसु,  निखिल चक्रवर्ती, मोहन कुमार मंगलम, इंदिरागांधी, फिरोज गांधी, डा. ए.के. सेन,इ.।उस वक्त एन.के. कृष्णन ‘इंडियन मजलिस’  के  संगठन  मंत्री  थे।  यह भारतीय विद्यार्थियों का संगठन था। के.टी.के इसमें सक्रिय हो गए। जल्द ही वे मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने लगे।थंगमणि उस मीटिंग में उपस्थित थे जिसेमं माइकेल ओ’ डायर की हत्या हुई। यह घटना 13 मार्च 1940 की है जब ऊधम सिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में ओ’डायर पर गोलियां चलाईं जिसे  के.टी.के    ने  अपनी  लाखों  से देखा।  माइकेल  ओ’डायर  उस  वक्त पंजाब के गवर्नर थे जब अप्रैल 1919में  जनरल  डायर  की  देख रेख  में जालियांवाला  गोलीकांड  किया  गया जिसमें सैकड़ों लोग गोलियों से भून दिए गए थे।इससे पहले के.टी.के की मुलाकात नेता सुभाष चन्द्र बोस से डबलिन, आयरलैंड में हुई। बोस 1935-38 के दौरान योरप के दौरे पर थे। उन्हें लंदन नहीं जाने दिया गया था। 

भारत वापसी  

बार-एट-लॉ  मिलने  के  बाद थंगमणि  भारत  लौट  आए  और  जून1940 में मद्रास हाईकोर्ट में वकील बन गए। ‘के.टी.के’ बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे। वे हॉकी के बहुत ही अच्छे खिलाड़ी  थे।  वे  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘आत्म-सम्मान आंदोलन में भी सक्रिय रहे।इस बीच सी.पी. अधिथानर ने, जो सिंगापुर में कानून की प्रैक्टिस कर रहे थे, के.टी.के  को सिंगापुर बुलाया। वहां के.टी.के ने प्रैक्टिस शुरू कर दी और वहां डेढ़ साल से भी अधिक रहे। उनकी शादी  ए.  रामास्वामी  नाडार  की  पुत्री बहिअम्मल  के  साथ  31  अक्टूबर1941 को हुई। नाडार सिंगापुर में एक धनी उद्यमी और उद्योगपति थे।इस  बीच  के.टी.के  मलाया  की कम्युनिस्ट  पार्टी  के  सम्पर्क  में  आए।उनके कम्युनिस्ट विचार अधिक गहरे हुए। 1942 में सिंगापुर पर जापानी सेना  ने  बमबारी  शुरू  कर  दी।फलस्वरूप थंगमणि, उनकी पत्नी और आधिथानर को सिंगापुर छोड़ मद्रास वापस आना पड़ा।सिंगापुर निवास के दौरान के.टी.के की मुलाकात वियतनाम के भावी नेता हो ची मिन्ह के साथ हुई। आगे जब सफल  क्रांति  के  बाद  हो  ची  मिन्ह वियतनाम के प्रमुख के रूप में भारत आए तो उनकी मुलाकात फिर के.टी.के से हुई।इस  बीच  1942  का  आंदोलन समूचे  भारत  में  फैल  गया।  मद्रास प्रेसीडेंसी में भी आंदोलन फैल गया।तिरूनववेली, रामनाथ पुरम, मदुरई तथा अन्य स्थानों पर कांग्रेस के तथा अन्य स्वयंसेवकों  ने  आंदोलन  किए  और गिरफ्तारियां दीं। कुलशेखर नपट्टिनम;तिरूनलवेली में कांग्रेस के स्वयंसेवकों एवं पुलिस के बीच झड़पें हुई। अंग्रेज पुलिस अफसर डब्ल्यू लोन ने गोलियां चलाई जिससे झडपें तेज हो गईं और लोन मारा गया। इसकी हत्या का दोष का शी राजन और राजगोपालन पर डाला गया।के.टी.के ने उनका मुकदमा अपने हाथों  में  लिया।  यह  एक  ऐतिहासिक मुकदमा  बन  गया।  दोनों  अभियुक्तों को जिला कोर्ट और हाई कोर्ट ने फांसीकी  सजा  सुनाई।  प्रसिद्ध कम्युनिस्ट एडवोकेट ए. रामचंद्र ने भी यह केस लड़ा।प्रीवी  काउंसिल  के  सामने  दूसरी अपील की गई। उस जमाने में सुप्रीमकोर्ट  नहीं  हुआ  करता  था।  सुप्रसिद्ध ब्रिटिश कम्युनिस्ट वकील डी.एन. प्रिट से के.टी.के थंगमणि ने सम्पर्क किया और  प्रिट  ने  केस  लड़ा।  केस  काफी कठिनाइयों के बीच लड़ा गया। मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलजुलकर उन दोनों की रिहाई के सवाल पर संघर्ष किया।आखिर कार  फांसी  की  सजा  को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।यह बहुत बड़ी सफलता थी जो लंबी और कठिन लड़ाई के बाद हासिल की जा सकी। के.टी.के ने 1942 से 1946तक प्रैक्टिस थी। 

ट्रेड यूनियन आंदोलन में 

के.टी.के  थंगमणि  1943  मेंकम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। वे पहले  ही  ट्रेड  यूनियन  आंदोलन  में सक्रिय हो चुके थे। उनकी मुलाकात कांग्रेस के सुप्रसिसिद्ध नेता, तमिल विद्वानऔर टी यू नेता थिरू वी.का. तथा अन्य से हुई। उन्होंने सिंगारवेलु की देखरेख में मजदूरों में सक्रिय कार्य किया।के.टी.के ने मदुरई में बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। वे टी.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट यूनियन और एस.आर.वी.एस. बस ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष रहे। यूनियन के कामों के दौरान वे कई बार गिरफ्तार हुए। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों की भी यूनियन बनाई। इसके अलावा उन्होंने कपड़ा और हैंडलूम मजदूरों के बीच भी काम किया।ये मजदूर आजाद हिन्द फौज और रॉयल इंडियन नेवी के नौ सैनिकों के समर्थन में भी उतरे।1945  में  मदुरई  में  मद्रास प्रादेशिक ट्रेड यूनियन कांग्रेस ;एटक से सम्बद्ध  का  सम्मेलन  हुआ।  इसकी स्वागत  समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के थंगमणि थे। 1946 में उन्होंने एस.आर.वी.एस.  की  हड़ताल  का  नेतृत्व किया। अंग्रेज सुपरिटेंड्ट ऑफ पुलिस ने के.टी.के से हड़ताल न करवाने की अपील की। के.टी.के ने जवाब में कहा कि वे खुद इंगलैंड में अपनी आंखों से ब्रिटिश मजदूर वर्ग के लड़ाकू संघर्ष देख चुके हैं। पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। उन्हें गिरफ्तार कर तीन महीनेकी जेल की सजा दी गई।1948  में  वे  फिर  एस आर वी हड़ताल  में  गिरफ्तार  कर  लिए  गए। इस बार उन्हें 4 साल की सजा मिली और 1952 में ही छूट पाए। उन्होंने पोर्ट एंड डॉक ;बंदरगाह मजदूरों के बीच भी काम किया। उन्हें मजदूर वर्ग के सर्वोच्च नेता एस.ए. डांगे तथा ए.एस.के. अ ̧यंगर, कल्याणसुंदरम एवं अन्य के साथ काम करने का मौका मिला। 

एफ.एस.यू. का गठन 

1943  में  मद्रास  प्रेसिडेंसी  में‘फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन’ ;एस.एस.यू. अर्थात सोवियत संघ के मित्र नामक संगठन की स्थापना की गई। आजादी के बाद यही संगठन ‘इस्कस’बन  गया।  सुप्रसिद्ध कांग्रेस  नेता  एवं तमिल विद्वान थिरू वी. कल्याण सुंदरम इसके  प्रथम  अध्यक्ष  एवं  के.बालदंडा युधम सचिव चुने गए। मदुरई में 1943 में इसका प्रथम अधिवेशन आयेजित किया गया। इसकी स्वागत समिति  के  अध्यक्ष  के.टी.के  थंगमणि बनाए  गए।  इसमें  कम्युनिस्टों  एवं कांग्रेसियों  ने  संयुक्त  रूप  से  हिस्सा लिया। एक कला एवं फोटो प्रदर्शनी भी आयोजित की गई जिसका उद्घाटन मदुरई जिला एवं सेशन्स जज एस.ए.पी. अ ̧यर ने किया। सम्मेलन में 10 हजार से भी अधिक लोग शामिल हुए। 

मदुरई षडयंत्र केस 

 दिसंबर  1946  में  के.टी.केथंगमणि को 135 अन्य कम्युनिस्टों के साथ सुप्रसिद्ध ‘मदुरई षडयंत्र केस’ में  गिरफ्तार  कर  लिया  गया।  अन्य गिरफ्तार नेताओं में पी. माणिकम, पी.राममूर्ति,  शांतिलाल,  सुबै ̧या,  एस.कृष्णमूर्ति, इत्यादि थे।लेकिन वे सभी भारत की आजादी से  एक  दिन  पहले  14  अगस्त 1947  को  बिना  मुकदमे  के  रिहा कर  दिए  गए।  मदुरई  की  एक  आम सभा में उनका भारी स्वागत किया गया। 

‘बी.टी.आर.’ काल  

फरवरी-मार्च 1948 में सम्पन्न भाकपा  की  दूसरी  पार्टी  कांग्रेस;कलकत्ता के लिए के.टी.के प्रतिनिधि चुने गए लेकिन वे इसमें शामिल नहीं हो पाए। वे 30 जनवरी 1948 को ही टीवीएस और एस आर वी एस ट्रांसपोर्ट कम्पनियों में हड़ताल के सिलसिले मेंगिरफ्तार कर लिए गए।1948  में  इस  पार्टी  कांग्रेस  से कुछ पहले से ही वाम-संकीर्णतावादी दुस्साहसिक ‘बीटीआर’ लाइन हावी हो गई। मद्रास प्रदेश की पार्टी को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा। के.टी.के  तथा  134  अन्य  पार्टी नेता गिरफ्तार कर वेल्लोर जेल में बंद कर दिए गए। इनमें ए एस के अ ̧यंगर,गोपालन तथा अन्य शामिल थें11 फरवरी 1950 को सेलम डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल जेल में पुलिस द्वारा गोलीकांड में 22 कम्युनिस्ट मारे गए। उस वक्त ‘बीटीआर’ लाइन के  तहत जेल में ‘वर्ग-संघर्ष’ चलाने की नीति से भी कई अनावश्यक घटनाएं घटीं जिनसे पार्टी को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा। पुलिस और अधिकारियों का रूख दमनकारी था सो अलग। के.टी.के तथा अन्य साथियों ने वेल्लोर जेल में 26 दिनों तक भूख हड़ताल थी। पुलिस ने अमानवीय लाठीचार्ज किया जिसमें के.टी.के बाएं हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया।उन्हें 1952 के प्रथम सप्ताह में रिहा कर दिया गया। पार्टी ने उन्हें ट्रेडयूनियन आंदोलन की देखभाल करने का जिम्मा दिया और वे मद्रास में एटककार्यालय से काम करने लगे। 

चुनावों में हिस्सेदारी 

थंगमणि पार्टी द्वारा 1952 के आम चुनावों में मदुरई लोकसभा सीट सेखड़े किए गए। वे मात्र कुछ सौ वोटों से ही हार गए। उन्हें फिर 1957 के चुनावों में उसी सीट से खड़ा किया गया। इस बार वे लोकसभा के लिए चुन लिए गए। संसद में उन्हांने प्रभावशाली और सक्रिय वक्ता के रूप में अपना स्थान बनाया। उन्होंने संसद में मजदूरों और किसानों की समस्याएं विशेष तौर पर उठाई। वे प्रथम सांसद थे जिन्होंने ‘प्रश्नकाल’ का विशेष सदुपयोग कियाः उन्होंने जनता के एक हजार से भी अधिक प्रश्न उठाए। उन्होंने पब्लिक सेक्टर और राष्ट्रीयकरण के मसलों पर खास ध्यान दिलाया। ट्रांसपोर्ट मजदूरों के नेता होने के नाते उन्होंने मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट, 1961 को पास कराने में विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने 1957 में बीजिंग ;उस वक्त पीकिंग में सम्पन्न डब्ल्यू एफ टी यू के सम्मेलन में भाग लिया। 1961 में उन्होंने अजय घोष, भूपेश गुप्ता तथा अन्यके साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से तुग के साथ बातचीत करने भाकपा प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। जब थंगमणि दिल्ली में थे तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे योजना कमिशन की समितियों में काम करने का अनुरोध किया। इस प्रकार वे एक साल काम करते रहे।1971 में के.टी.के तमिलनाडु विधानसभा में मदुरई से चुने गए। 1971से 76 के बीच उन्होंने विधानसभा ामें जनता की आवाज जोरदार तरीके से उठाई। तमिलनाडु एटक के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या महासचिव की हैसियत से 50 वर्षों से भी अधिक काम करते रहे। वे कई वर्षों तक एटक के उपाध्यक्ष रहे। उनकी 80वें जन्मदिन के अवसर पर तमिलनाडु की पार्टी और एटक ने विशेष ‘सुवेनर’ ;विशेष अंक प्रकाशित किया। हीरेन मुखर्जी ने उनका जीवन गांधीवादी आदर्शों पर चला बताया। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने अंतिम वर्ष उन्होंने राज्य पार्टी हेडक्वार्टर ‘बालन इल्लम’ में बिताए। के.टी.के. थंगमणि की मृत्यु वर्ष की उम्र में 26 दिसंबर 2001 को हो गई।

-अनिल राजिमवाले