शनिवार, 10 जुलाई 2021

मीनाक्षीताई साने सरदेसाई

 

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाई का जन्म, 18 मई 1909 को सोलापुर महाराष्ट्रद्ध में हुआ था। भाकपा के

सुप्रसि( नेता कामरेड एस.जी. सरदेसाई

उनके बड़े भाई थे। जाहिर है मीनाक्षी

ने सरदेसाई से बहुत-कुछ सीखा और

उन्हीं के प्रभाव से आगे चलकर भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुईं।

मीनाक्षी जब काफी छोटी ही थी

जब उसकी माता की लंबी बीमारी से

मृत्यु हो गई। उन्हीं टी.बी. थी जिसके

उपचार के लिए कभी सोलापुर तो कभी

हैदराबाद इ. हवा बदलने के लिए जाना

पड़ता। आखिरकार 1911 में ही

बिलिमोरा में उनकी मृत्यु हो गई। पहले

तो मीनाक्षी बंबई संबंधियों के यहां ले

जाई गई। उसे बचपन से ही लगातार

दमे की शिकायत रहा करती। उसकी

माता किर्लोस्कर परिवार से थीं और

उनका नाम था इंदिराबाई सरदेसाईऋ

पिता का नाम था जी. एस. सरदेसाई।

फिर डॉ. किर्लोस्कर मीनाक्षी को

सोलापुर ले आए। बीमारी के कारण

मीनाक्षी की पढ़ाई अक्सर घर में ही

हुआ करती। सोलापुर और बड़ौदा दोनों

ही जगहों में उसे पढ़ने का बड़ा मौका

मिला। उसके एक संबंधी बड़ौदा में

गायकवाड़ राजपरिवार की सेवा में थे।

7वीं क्लास की परीक्षा की तैयारी

मीनाक्षी ने घर में ही की और परीक्षा में

बैठी। जून 1925 में हिंगण में महिला

विद्यालय में आठवीं में भर्ती हुई।

राजनीति में

1925 में मीना के बड़े भाई

श्रीनिवास सरदेसाई ने बंबई के

सिडेनहैभ कॉलेज में दाखिला लिया।

उन्होंने कहा कि 1925 से 1930

का दौर राष्ट्रीय आंदोलन में उत्साह

और स्फूर्ति का दौर था। नौजवान नए

रास्ते की खोज में थे। वे मीनाक्षी को

विभिन्न विचारकों के बारे में बताय

करते। वे उससे कहते कि हमें

धंधा-व्यवसाय वगैरह नहीं करना है,

नौकरी नहीं करनी है। जो कुछ करना

है वह देश के लिए करना है। हमारे

जीवन का कोई न कोई उद्देश्य होना

चाहिए।

इन बातों का मीनाक्षी पर असर तो

पड़ना ही था। उसे भी लगने लगा कि

अन्याय के विरू( लड़ना चाहिए। वह

कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-52

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाईद्धः

आरंभिक महिला कम्युनिस्टों में

अपने मन में जगी शंकाओं का समाधान

अपने पिता श्री गणपतराव सरदेसाई

;आबाद्ध से पत्र व्यवहार के जरिये

खोजती। बाद में वे बर्लिन चले गए

थेऋ वहां से भी मीना के साथ उनका

पत्र व्यवहार जारी था।

मैट्रिक पास कर लेने के बाद

कॉलेज में भर्ती होने पर मीना ने लिखित

रूप में ‘‘मेरा ध्येय’’ नामक दस्तावेज

तैयार किया। यह उसने 29 नवंबर

1928 को तैयार किया। उसने लिखा

कि वह दो आंदोलनों में विशेषतौर पर

हिस्सा लेगीः एक कृषि तथा दूसरा

पतितो(ार। गरीब और निम्न वर्गों के

लिए कम से कम चार क्लास की पढ़ाई

कराने वाला स्कूल मुझे तैयार करना

ही है। उसने लिखा कि ‘‘अपनी इच्छा

इतनी तीव्र रखूंगी कि ऐसा स्कूल

स्थापित किए बगैर में मरने वाली नहीं।

यह शपथ मैं कभी न भूलूं, इसके लिए

वह कागज हमेशा मैं अपनी आंखों के

सामने रखूंगी’’-मीनाक्षी सरदेसाई!

मीना की कॉलेज की सखी बिंदू

सप्रे ;बाद में प्रमिला पानवलकरद्ध अपने

संस्मरणों में कहती हैं कि मीना बहुत

लोकप्रिय थी और हमेशा दूसरों की

मदद करने को तैयार रहा करती। उसे

जोर का दमा था फिर भी बड़ी सक्रियता

से मदद करती।

सरदेसाई और किर्लोस्कर परिवार

समाज सुधारक थे। श्रीनिवास सरदेसाई

की बहन होने का उसपर काफी प्रभाव

जो पढ़ने-लिखने, अध्ययनशीलता एवं

प्रगतिशील विचारों में दृष्टिगोचर होता

था।

उस जमाने में पूना ;पुणेद्ध में

देशभक्तों के भाषण हुआ करते। इन

मौकों पर मीनाक्षी सबको इसकी खबर

दिया करती और सखियों को इन सभाओं

में ले जाया करती।

20 मार्च 1929 का गांधीजी ने

नमक कानून तोड़ने का आंदोलन

आरंभ कर दिया। सत्याग्रह शुरू हो

गया। श्रीनिवास सरदेसाई ने गांधीजी

से भेंट करके जंगल सत्याग्रह की

अनुमति ले ली। कांग्रेस के नेता

शंकरराव देव ने जंगल सत्याग्रह की

जिम्मेदारी सरदेसाई को सौंपी। 1930

में नगर जिले के संगमनेर में सत्याग्रह

करने का फैसला किया गया।

मीनाक्षी तुरंत सक्रिय हो गईं और

अपनी दो सखियों को लेकर वह

संगमनेर जा पहुंची। सत्याग्रहियों के

पहुंचने से पहले ही लड़कियां गिरफ्तार

कर ली गईं। खबर अखबारों में छप

गई। सत्याग्रहियों ने पुलिस को समझाया

कि ये लड़कियां केवल सत्याग्रह देखने

आई थीं, पकड़ना है तो सत्याग्रहियों

को पकड़ो।

लड़कियां छोड़ दी गई। कॉलेज

लौटने पर प्रिंसिपल ने उनसे माफी मांगने

को कहा। मीनाक्षी ने साफ इंकार कर

दिया। अन्य लड़कियों ने कहा कि हम

किसी दबाव में नहीं, अपनी इच्छा से

गई थी। मीनाक्षी लोकप्रिय हो गई।

मीना विवाह करने के भी बहुत पक्ष

में नहीं थीं और उसे सामाजिक कार्य में

बाधा समझती थी।

1931 में सरदेसाई जेल से

छुटकर बाहर आए। उन्होंने मीनाक्षी

को 8-10 दिनों के लिए बंबई बुलाया।

उसे मार्क्सवाद संबंधी कईं बातें बताईं

और पढ़ने के लिए मार्क्सवाद की कई

पुस्तकें दीं।

मीनाक्षी ने बंबई में रहते हुए

‘प्रगति’ नामक पत्रिका में काम करना

आरंभ किया। उसने जी.ए. की परीक्षा

अच्छे दर्जे में पास की। इस बीच सतारा

के एस.एन.डी.टी. कॉलेज और कन्या

विद्यालय से उन्हें अस्थायी तौर पर

‘‘लेडी सुपरिंटेंडैंट’ का काम 1931

में मिल गया। वहां उसने एक साल

काम किया जबकि वह केवल2-3

महीनों के लिए गई थी।

उस वक्त सतारा के गणेशोत्सव में

मीनाताई ने दो भाषण दिए। निजी

संपत्ति के बारे में बोलते हुए उसने

लाफार्ग, बुखारिन, रसेल, इ. के विचार

प्रस्तुत किए। भाषण बड़े ही प्रभावशाली

रहे। श्रीनिवास सरदेसाई ने पत्र के

जरिये उनका अभिनंदन किया।

पार्टी में पूरावक्ती कार्यकर्ता

1932 में मीना को आगे पढ़ने

के लिए विदेश, खासकर अमरीका,

भेजने की तैयारियां चल रही थीं। लेकिन

मीना ने आगे पढ़ने या विदेश जाने का

विचार अंतिम रूप से त्याग दिया और

पूरी तरह पार्टी के काम में समय देने

का निर्णय किया। उसने पिताजी को

इसकी खबर भी दे दी। पिताजी ने

दबाव डाले बिना पत्र में उसके निर्णय

के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू

मात्र उसके आगे रख दिए। मीना ने

कॉलेज/स्कूल को एक महीने की नोटिस

देते हुए डॉ. कमलाबाई देशपांडे को

पत्र लिख दिया। इसमें उसने कहा कि

पहले तो उसका इरादा आगे नौकरी

करने का था लेकिन बंबई में कामरेडों

से बातचीत करने तथा परिस्थिति देखते

के बाद उसने तय किया कि बिना कोई

समय गंवाए अब वह पूरी तरह भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी के काम में शामिल हो

जाएगी।

उस जमाने के लिए मीनाक्षी का

यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण और

साहसिक था। नौकरी छोड़ एक अच्छे

खाते-पीते घर की लड़की कठिन

परिस्थिति में बंबई में कम्युनिस्ट पार्टी

का पूरावक्ती काम करे, यह अत्यंत

कठिन निर्णय था। तीस के दशक में

शायद ही किसी अन्य महिला ने ऐसा

कदम उठाया हो। उसके इस निर्णय से

लोग चकित हो गए।

पार्टी मीना का खर्च उठने की स्थिति

में नहीं थी। इसलिए अण्णासाहेब बरवले

नामक वकील और उनकी पत्नी

माईसाहेब ने यह जिम्मेदारी बखूबी

निभाई। अण्णासाहेब मीना को पत्रों में

‘‘उल कंनहीजमत’’ ;मेरी पुत्रीद्ध संबोधित

किया करते।

मीना बंबई पहुंचकर घर जाने के

बजाय सीधे कम्यून चली गई। अब

वह क्रांति की सेवा में पूरी तरह समर्पित

हो गई। बंबई के कम्युनिस्टों का संभवतः

प्रथम ‘‘कम्यून’’ जनवरी 1933 में

स्थापित किया गया था। वह मांटुगा में

था। वहां रामकृष्ण जाम्भेकर, बसंत

खले, डॉ. अधिकारी, कराडकर,

कोल्हटकर, सरदेसाई इ. मंडली रहा

करतीऋ और इन सबके साथ अब मीना

भी रहने लगी। यह वह दौर था जब

पार्टी संकट से गुजर रही थी। मेरठ

षडयंत्र केस में उसके शीर्षस्थ नेता

गिरफ्तार हो चुके थे। पार्टी में गहन

आर्थिक एवं सांगठनिक संकट था।

मीना मजदूर बस्तियों में जाकर

मजदूरों, खासकर स्त्रियों से मिलने

लगीं। यहां तक कि वे मदनपुरा जैसी

बदनाम बस्ती में भी काम करने लगी।

‘‘लाल बावटा’ गिरणी कामगार यूनियन

12 मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक 11 - 17 जुलाई, 2021

के तहत बड़ी-बड़ी सभाएं संगठित की

जाने लगीं। उनमें मीना, जाम्भेकर,

कराडकर, इ. साथी काम करने लगे।

दो आने में सस्ती ‘राइस प्लेट’

तथा चाय-पाव वगैरह में ही काम चल

रहा था। अक्सर उनके पास खर्च के

लिए पैसे नहीं हुआ करते।

कभी-कभी मीनाक्षी इस बात से

नाराज होती और विरोध करती कि

मीटिंगों में उसे चाय बनाने के लिए

कहा जाता। वह साफ कहती कि आप

में से कोई भी चाय बनाने के सक्षम हैंऋ

फिर भी मुझे ही कहते है क्योंकि मैं

स्त्री हूं। वे सभी निरूत्तर हो गए।

सोलापुर में कार्य

कम्यून में मीनाक्षी की मित्रता

रघुनाथ कराडकर से बढ़ने लगी। वे

एक गरीब परिवार से थे और कम्युनिस्ट

विचारधारा से भलीभांति अवगत थे।

जल्द ही, दिसंबर 1932 में, उन

दोनों का विवाह हो गया। विवाह के

एक सप्ताह के अंदर ही दोनों को 3

दिसंबर को मजदूर आंदोलन के

सिलसिले में सोलापुर जाना पड़ा।

1920 में मजदूर 12 घंटे से

भी अधिक काम किया करते। उन्हें बहुत

थोड़ा वेतन, सड़ा हुआ अन्न और

साल-भर में पुरूष को एक जोड़ी धोती

और स्त्री को एक साड़ी मिल जाय तो

बहुत था!

इसके खिलाफ मजदूरों ने कई

हड़तालें कीं। 16 जनवरी 1920

को सोलापुर में मजदूरों की प्रथम बड़ी

हड़ताल हुई। इन हड़तालों को मजदूर

‘‘अड्डा करना’ कहते। अभी वे

‘हड़ताल’ से ठीक से अवगत नहीं थे।

तिलक ने उनका समर्थन किया।

1928 में सोलापुर में टेक्सटाइल

यूनियन ;लाल बावटा गिरणी कामगार

यूनियनद्ध की स्थापना की गई। सरदेसाई,

कराडकर, साने इ. नेता सोलापुर जाने

लगे।

अखबारों मे मीनाक्षी और कराडकर

के सोलापुर आगमन और स्टेशन पर

पहुंचते ही कराडकर की गिरफ्तारी की

खबरें छपीं। मीना के बारे में भी

सरदेसाई की बहन होने, इत्यादि संबध्ां

खबरें छपीं।

सोलापुर समाचार ;6

दिसंबर1933द्ध के अनुसार मीनाक्षी

ने मजदूरों की आम सभा में ‘इंकलाब

जिंदाबाद’ इ. नारे लगाए। बाद में अपने

भाषण में उन्होंने सारे देश में चल रहे

मजदूर आंदोलनों का ब्यौरा दिया।

ट्रेड यूनियन और मजदूर

आंदोलन में

कराडकर, साने तथा अन्य नेताओं

की गिरफ्तारी के कारण उनकी

गैर-हाजिरी में भी मजदूर आंदोलन

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाईद्धः आरंभिक महिला कम्युनिस्टों में

जारी था जिसमें मीनाक्षी बड़ी ही सक्रिय

थीं। वे हजारों मजदूरों को संबोधित

किया करतीं। लोग उन्हें देख आश्चर्य

चकित रह जाते- ‘ये कौन है?’ पूछते।

लोग कहा करतेः ‘‘डॉक्टर साब

;डॉ. बी.के. किर्लोस्करद्ध की नातिन है’!

किर्लोस्कर सुविख्यात समाज-सुधारक

थे। उन्होंने श्रीनिवास और मीनाक्षी के

रास्ते को समझने के लिए अपने 70वें

वर्ष की आयु के बाद मार्क्सवाद का

अध्ययन आरंभ किया! वे स्वयं एक

मार्क्सवादी बन गए और इस दृष्टिकोण

से कई लेख मराठी में लिखे। उन्होंने

कम्युनिस्टों की बड़ी मदद की।

मीनाक्षी को अक्सर ही गुप्त रूप

से मजदूर बस्तियों में रहना पड़ता था।

वे गुप्त बैठकों को संबोधित किया करतीं।

1934 की हड़ताल में मीनाक्षी तथा

कराडकर, बाटलीवाला, नांदेड, विभूते

इ. को 6 महीनों की सजा देकर बीजापुर

जेल में कैद रखा गया। यह हड़ताल

3 महीने चली।

यह पहला मौका था जब मीनाक्षी

जेल गई। उस समय वे गर्भवती थीं।

उन्हें कठोर कारावास की सजा दी गई।

लेकिन वे फिर भी डगमगाई नहीं जबकि

मैजिस्ट्रेट ने बी क्लास देने की

सिफारिश की थी। इसकी लोगों में तथा

अखबारों में तीखी आलोचना की गई।

छह महीनों बाद मीनाक्षी और

कराडकर अक्टूबर 1934 में जेल

से छूटे। जनवरी 1935 में उन्हें

पुत्र-प्राप्ति हुई। उसका नाम जतींद्र रखा

गया जो क्रांतिकारी जतीन सेन के नाम

पर था।

जेल से छूटने पर उन्हें रहने की

कई जगहें बदलनी पड़ी। इनमें से एक

स्थान पर मीनाक्षी ने ‘‘ए.बी.सी. ऑफ

कम्युनिज्म’ विषय पर कार्यकर्ताओं की

क्लास को संबोधित किया। सोलापुर

में संभवतः यह अपने ढंग का पहला

क्लास था। वे अपने बच्चे को कंधे पर

लादे मजदूरों के बीच इधर-उधर जाती

औेर बैठकें, आम सभाएं तथा दूसरी

गतिविधियां जारी रखती।

इस बीच उन्होंने बीड़ी महिला

मजदूरों को संगठित करना आरंभ किया।

मजदूरों के काम करने और रहने की

स्थितियां अत्यंत ही दयनीय थी।

10-10 घंटे गर्दन मोड़कर वे

महिलाएं बीड़ी बनाया करती। हजार

बीड़ियां पर उन्हें मात्र 5 आने मिला

करते। इसमें से भी मालिक किसी न

किसी बहाने पैसे काट लेते।

29 अक्टूबर 1934 को

शिवकरण मांगीलाल के बीड़ी कारखाने

में लगभग 125 महिला मजदूरों ने

हड़ताल कर दी। उनकी मांग थी कि

5 आने प्रति हजार के बजाय 8 आने

प्रति हजार बीड़ी मजदूरी दी जाए।

संभवतः सारे भारत के असंगठित क्षेत्र

के मजदूरों की यह प्रथम हड़ताल थी।

इसकी नेता मीनाक्षी थी। इन महिला

कामगारों को पुरूष कामगारों का पूर्ण

समर्थन हासिल था। पहली बार महिला

कामगार बाहर खुले में घूमने लगीं और

यूनियन की गतिविधियां करने लगीं जो

बहुतां को पसंद नहीं आया।

अंग्रेजों के प्रभुत्व वाले उस जमाने

में यूनियन और पार्टी का काम करने

वालों को आसानी से न रहने की जगह

मिला करती और न ही ऑफिस बनाने

और न आम सभा करने की। अक्सर

ही मालिक और प्रशासन के दबाव से

मालिक-मकान कमरे किराये पर देने

से इंकार कर दिया करते।

मीनाक्षी के नेतृत्व में हड़ताल कैसी

दीखती है, इसे ‘‘किर्लोस्कर मासिक’’

में लिखने के लिए सुप्रसि( मराठी

साहित्यकार ना. सी. फड़के को लेकर

शंकरराव किर्लोस्कर सोलापुर पहुंचे।

उनके घर पहुंचने के कुछ देर बाद

बाहर से नारों की आवाजें आने लगी।

महिला बीड़ी मजदूरों का जुलूस निकल

रहा थाऋ सभी छत पर पहुंच गएऋ देख

मीनाक्षी जुलूस के आगे-आगे लाल

झंडा लिए नारे लगाते चल रही थी।

सारा दृश्य उनके लिए विस्मयकारक

था। सारी महिलाएं रणचंडी बनी हुई

थीं!

जुलूस खत्म होने पर सरदेसाई और

मीनाक्षी दोपहर घर लौटे। वे सभी

हड़ताल और जुलूस के बारे में बातें

करते रहे। फिर रात नौ बजे यूनियन

ऑफिस में बातचीत और मीटिंगों का

सिलसिला आरंभ हो गया। मजदूरों की

एकता की ताकत का प्रभाव स्पष्ट था।

1937 के आम चुनाव

1935 के नए संविधान के

अनुसार 1937 के फरवरी में सारे

देश में सीमित आम चुनाव संपन्न हुए।

सोलापुर के कपड़ा मिल मजदूर संगठनों

और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ना

तय किया। मजदूर सीट से का.

खेडगीकर को खड़ा किया गया और वे

प्रचंड बहुमत से विजयी हुए। ‘‘इंजन’

चिन्ह से लड़ते हुए उन्हें 7719 वोट

मिले जबकि उनके प्रतियोगी श्री बखले

को मात्र 973 वोट ही मिले। बीड़ी

मजदूरों, खासकर महिला कामगारों,

के बीच असीम उत्साह का संचार हो

गया। उनमें भारी आत्मविश्वास पैदा

हुआ।

ब्रिटिश सरकार ने कुछ आदिवासी

समुदायों को ‘गुनाहगार’ का दर्जा दे

दिया था। उन पर सही-गलत मुकदमे

चला करते और समाज से बहिष्कृत

किया जाता। यूनियन ने संघर्ष करके

यह कानून वापस करवाया।

यूनियन के कार्यकर्ताओं ने

‘‘एकजुट’ ;एकजुटताद्ध नाम साप्ताहिक

पत्रिका आरंभ की। इसमें मीना सक्रिय

थीं। 14 फरवरी 1930 को

‘‘राजबंदी दिवस’ मनाया गया इसके

दौरान आम हड़ताल का आयोजन किया

गया। इसमें मीनाक्षी, कराडकर, विभूते

इ. नेता सक्रिय थे। मीनाक्षी को फिर 6

महीनों की सजा दी गईं उन्हें यरवदा

जेल मे रखा गया। वह जतींद्र को उसकी

दादी के पास रख गई।

रिहाई और नया जीवन

जेल में रहते हुए मीनाताई ने अपने

व्यक्तिगत जीवन पर पुनर्विचार किया।

वे इस नतीजे पर पहुंची कि परिवार,

विशेषकर बच्चे पर, अधिक ध्यान देना

आवश्यक है। परिवार को लेकर

कराडकर से उनकी दूरी बढ़ती गई।

जेल से छूटने के बाद मीनाताई ने

उनसे तलाक ले लिया और का. साने

के साथ विवाह कर लिया। इससे पहले

उन्होंने घर चलाने के लिए एक जगह

सेवासदन में शिक्षिका की नौकरी करने

की कोशिश भी की लेकिन कम्युनिस्ट

होने के नाते उनकी नौकरी छूट गई।

1938 में यरवदा जेल से छूटने

पर रेलवे स्टेशन पर सैंकड़ों मजदूरों ने

उनका स्वागत किया। 7 नवंबर को

औद्योगिक विवाद बिल के खिलाफ

हड़ताल आयोजित कीं गई जिसमें

मीनाक्षी अत्यंत सक्रिय रहीं। विशाल

जुलूस निकाले गए।

21 नवंबर 1938 को मीनाक्षी

मध्यप्रांत बीड़ी कामगार परिषद की

अध्यक्ष चुनी गई। 3 अक्टूबर 1939

को सोलापुर में ‘‘यु(-विरोधी दिवस’

मनाया गया इसमें सरदेसाई, साने,

मीनाक्षी इ. के भाषण हुए। 5 से 7

दिसंबर 1939 को सोलापुर में

महाराष्ट्र महिला परिषद का अधिवेशन

संपन्न हुआ। मीनाक्षी इसके

संगठनकर्ताओं में थीं।

मई 1940 में भारत संरक्षण

कानून के तहत मीनाताई को फिर

गिरफ्तार कर लिया गया और वे

1942 तक बंद रहीं। छूटने के बाद

वे तुरंत सोलापुर में मजदूर आंदेलन

में सक्रियता से कूद पउ़ी।

बी.टी.आर. लाईन और मीनाताई

का इस्तीफा

1948 में पार्टी पर ‘‘बी.टी.आर.

लाईन’ हावी होने के बाद मीनाताई

फिर गिरफ्तार हो गईं। साने तथा अन्य

सहयोगी भी गिरफ्तार कर लिए गए

और उन सबकों यरवदा जेल में रखा

गया। पार्टी के अंदर फूट और तीव्र

मतभेदों तथा बहसा-बहस से मीनाताई

परेशान हो गईं। उन्होंने पार्टी नेतृत्व से

यह सब समाप्त करने की अपील करते

हुए सात पन्नों का एक पत्र लिखा।

उनकी कोशिशों का कोई असर नहीं

हुआ और उन्हें पार्टी से इस्तीफा दे

दिया।

1950 में उन्हें रिहा कर दिया

गया। इस्तीफा देने के बावजूद वे पार्टी

के साथ ही बनी रहीं और सोलापुर मे

टी.यू. का काम करती रही। साथ ही

1950 में विधिवत रूप से उनका

विवाह का. साने से हो गया।

1953 में मीनाताई सोलापुर

नगरपालिका स्कूल बोर्ड की सदस्य

चुनी गईं। 1956 में उन्होंने ‘‘शांति

निकेतन’’ नामक नई शिक्षा संस्था की

स्थापना की।

1952-53 में सोलपुर में

असाधारण अकाल पड़ा जिसमें मीनाताई

ने सक्रियता से सहायता कार्य किया।

1960 और 1970 क ेदशकों में

मीनाताई भारतीय महिला फेडरेशन में

सक्रिय हो गईं। 14-15 नवंबर

1980 को औरंगाबाद में संपन्न

महाराष्ट्र राज्य महिला फेडरेशन के

अधिवेशन की अध्यक्षता मीनाताई ने

की।

बाद में मीनाताई बंबई से तलेगांव

;पूना के नजदीकद्ध आकर रहने लगीं।

आगे चलकर वे ‘‘महिला आंदोलन

पत्रिका’ में सहायता करने लगीं।

मीनाताई साने की मृत्यु 17 अगस्त

1989 को हो गई।

 - अनिल राजिमवाले




रविवार, 27 जून 2021

भालचंद्र त्रिवेदी एक आदर्श कम्युनिस्ट नेता


भालचंद्र त्रिवेदी का जन्म 13फरवरी 1923 को गुजरात में हुआथा। भालचंद्र कुल पांच भाई-बहन थेःदो भाई तीन बहनें। उनके पिता का नाम था बापूजी श्री हरिशंकर आत्माराम त्रिवेदी। वे एक गुजराती स्कूल मेंप्रिंसिपल थे। माता श्रीमती सुलीबा चाहती थीं कि भालचंद्र संस्कृत पढ़े।

शुक्ल तीर्थ के गुजराती स्कूल में भालचंद्र की आरंभिक शिक्षा हुई। बाद

में अंकलेश्वर के गुरुकुल नर्मदा हाई

स्कूल में उसकी पढ़ाई हुई। भालचंद्र

की कम उम्र में ही पिता की मृत्यु हो

गई। पिता की मृत्यु के करीब एक साल

बाद उसके बड़े भाई रामचंद्र उसे बड़ौदा

ले आए। इस प्रकार भालचंद्र का

अधिकतर बचपन अंकलेश्श्वर में गुजरा

और विद्यार्थी जीवन बड़ौदा में। उनके

बड़े भाई रामचंद्र ने उन्हें बड़ौदा के

श्राॅफ मेमोरियल स्कूल में भर्ती करा

दिया। फिर उनकी भर्ती जयश्री माॅडल

हाई स्कूल में करा दी गई। 1940 में

उन्होंने मैट्रिक परीक्षा प्रथम नंबर से

पास की। उनमें उसी समय से

नेतृत्वकारी गुण थे। स्कूल में पढ़ते वक्त

ही उनमें आजादी के प्रति लगाव पैदा

हो गया और वे खादी पहनने लगे।

वे मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आए।

आगे चलकर उन्होंने 1939 में माॅडल

हाई स्कूल में स्टूडेंट्स यूनियन बनाई।

इंटर-साइंस की परीक्षा के बादवह आशा

की जा रही थी कि भालचंद्र को

अहमदाबाद मेडिकल काॅलेज में

एडमिशन मिल जाएगा। विद्यार्थियों की

संख्या भी बहुत कम थी परंतु एडमिशन

नहीं होने का कोई कारण नहीं था।

अगर उसने दूसरों की सलाह मान ली

होती तो एडमिशन मिल जाता। क्या

थी सलाह? खादी मत पहनो! लेकिन

भालचंद्र कहां मानने वाला था? वह

खादी पहने-पहने ही इंटरव्यू बोर्ड के

सामने उपस्थित हुआ! नतीजा वही हुआ

जो होना था। उसका एडमिशन नहीं

हुआ। भालचंद ने युवा-अवस्था में ही

जनेऊ और चोटी काट डाली जबकि

लोगों ने बहुत मना किया।

वे पढ़ाई में काफी तेज थे। लेकिन

वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। हालांकि

वे खुद नहीं चाहते थे, वे परिवार को

नाखुश नहीं करना चाहते थे, इसलिए

बड़ौदा काॅलेज में आगे पढ़ाई जारी

रखी। यह काॅलेज बाम्बे यूनिवर्सिटी से

सम्ब( था।

भालचंद्र त्रिवेदीः गुजरात तथा भारत में टी.यू.

एवं कम्युनिस्ट आंदोलन के निर्माता

राजनीति में

उनमें गरीबी और अन्याय के

खिलाफ बड़ा गुस्सा था तथा वे हमेशा

इन्कलाब की बात किया करते। वे

कामगारों के बीच समय बिताने लगे।

उन्हंे माक्र्स और लेनिन की रचनाएं

पसंद आने लगीं।

भालचंद्र 1942 से ए.आई.एस.

एफ. में सक्रिय हो गए। उनके काॅलेज

के दिनों के सहयोगी दीनानाथ प्रधान

के अनुसार, भालचंद्र परीक्षा मे सर्वप्रथम

आया करते लेकिन पढ़ाई में उनका

मन नहीं था। प्रधान उनके साथ ए.

आई.एस.एफ. में काम किया करते।

1943 में वे भा.क.पा. के सदस्य

बन गए।

भालचंद को प्रशासन के रूप में

नौकरी मिली लेकिन उन्होंने लेने से

इंकार कर दिया। गायकवाड़ी बड़ौदा

स्टेट ;जी.बी.एसद्ध रेलवे में भालचंद्र ने

रेलवे मेन्स यूनियन गठित करने में

महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस काम

में उन्हांेने रसूल खान पठान, एस.आर.

गोखले; जो बाद में केंद्रीय कानून मंत्री

बनेद्ध, पोंतदार, चीमनभाई अम्बालाल

पटेल, जोशी, शांताराम सबनीस, इ.

के साथ काम किया।

भालचंद्र त्रिवेदी लिखते है कि

उस जमाने में धर्म का उतना महत्व

नहीं था। जी.बी.एस. रेलवे मेन्स यूनियन

के अध्यक्ष रसूल खान कुछ समय बाद

बडौदा के गायकवाड़ी राज्य में ‘स्थानीय

दीवान’ बनाए गए। पहला काम उन्हांेने

किया कि वह यह कि उन्होंने सारे

बर्खास्त लोगों को वापस काम पर ले

लिया। यूनियन के जनरल सेक्रेटरी

जोशी और अन्य कइयों कां काम पर

वापस ले लिया गया। यूनियन की ओर

से रखी गई मांगें भी गायकवाड़ सरकार

ने मान ली।

30 जनवरी 1948 को गांधीजी

की हत्या की खबर पहुंची। चारों ओर

तहलका मच गया। प्रोग्रेसिव यूथ

यूनियन ने विरोध प्रदर्शन निकाला। यह

बहत बड़ा प्रदर्शन था। उस समय

गायकवाड़ी शासन जारी था और

रजवाड़े अभी भारत में नहीं मिले थे।

भालचंद्र, मनुराव, वसंत जोगलेकर,

शांताराम सबनीस, गोखले वगैरह

गिरफ्तार हो गए। उन्हें सैनिक कारावास

में डाल दिया गया। अगले दिन वे सेंट्रल

जेल स्थानांतरित कर दिए गए। आर.

एस.एस. के लोगों ने हमला किया था।

महारानी शांतिदेवी टाॅकीज के पास

पुलिस ने प्रगतिशील युवा संघ का जुलूस

रोकने की कोशिश की। फायरिंग में

चंद्रकांत आजाद की मृत्यु हो गई।

भालचंद्र त्रिवेदी का विवाह सुशीला

बेन से 1961 में हुआ। सुशीला बेन

के पिता दत्तात्रेय अमृतराव पेटीवाले

गायकवाड़ी राज्य में जेलर थे। जब

उन्हें एक कम्युनिस्ट से विवाह करने

की अपनी बेटी के इरादों का पता चला

तो बड़े ही नाराज हुए। सुशीला अड़

गई और आखिरकार उनके पिता को

झुकना पड़ा तथा उनका विवाह हो गया।

भालचंद्र का विवाह 40 वर्ष की आयु

में हुआ।

आगे चलकर उन्होंने ‘कम्युनिज्म’

को ही अपनंी राष्ट्रीयता, जाति और

धर्म बताया। उनको संक्षेप में ‘भाल’

कहा जाता कभी-कभी उनको ‘‘भाला’’

भी कहा जाता है शोषकों के खिलाफ

चलाया जानेवाला ‘‘भाला’।

टेªड यूनियन और रेलवे यूनियन में

भालचंद्र त्रिवेदी आजादी से पहले

ही आॅल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन

;ए.आई.अर.एफ.द्ध में सक्रिय हो गए थे।

1 जनवरी को अखिल भारतीय रेलवे

हड़ताल का नारा दिया गया। भालचंद्र

ने इसमें खूब काम किया। इस काम में

वे भरूच से बड़ौदा साइकिल से गए!

1944 में अलेम्बिक, इंडियन

ह्यूम पाइप तथा अन्य जगहों में यूनियनें

बनाईं।

भालचंद्र ने व्यापक तौर पर मीटिंगें

संबोधित कीं, खासकर बिलिमारा और

नवसारी में। वे ए.आई.आर..एफ. में

सक्रिय काम करने लगे। वे जयप्रकाश

नारायण और ज्योति बसु के संपर्क में

आए। ए.आई.आर.एफ. का सम्मेलन 6

और 7 जून 1947 को गोरखपुर मे

संपन्न हुआ। इसमंे भालचंद्र त्रिवेदी ने

बड़ी ही सक्रियता से हिस्सा लिया। इस

सम्मेलन में जयप्रकाश नारायण ए.आई.

आर.एफ. के अध्यक्ष चुने गए। ज्योति

बसु उपाध्यक्ष थे।

ए.आई.आर.एफ. ने 27 जून

1947 को ‘‘रेलवे मजदूर दिवस’’

के रूप में मनाया। इसमें भालचंद्र बड़े

ही सक्रिय रहे।

भालचंद्र ने 1945 में

गायकवाड़-बड़ौदा स्टेट ;जी.बी.एस.द्ध

रेलवे में रेलवे मेन्स यूनियन स्थापित

करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

रसूल खान यूनियन के अध्यक्ष थे।

इस यूनियन के 1947 में 1000

से भी अधिक सदस्य थे। हड़ताली

मजदूरों का उत्साह बनए रखने के लिए

भालचंद्र रात मे घर-घर जकर मजदूरों

से मिला करते। उन दिनों बड़ौदा के

गरबा, बजवा, कराचिया, उन्देश, इ.

गांवों को जोड़नेवाले रास्ते कच्चे और

ऊबड़-खाबड़ हुआ करते। भालचंद्र इन

कच्चे और अंधेरे रास्तों से इधर-उधर

आया-जाया करे। उन दिनों वहां सांप

और बिच्छू घूमा करते। साथी साइकिलों

पर भी घूमा करते। 1945 में बड़ौदा

राज्य के बिलिमोर में सि(पुर में 22

मिलों में एक महीने तक हड़ताल का

नेतृत्व किया।

भालचंद्र त्रिवेदी के नेतृत्व में यह

हड़ताल चार दिनों तक चली। बड़ौदा

के इतिहास में यह पहली हड़ताल थी।

1950 आते-आते क्षेत्रीय तथा

रजवाड़ों की रेलवे भारतीय रेल में शामिल

कर ली गई।

भालचंद्र ने ‘इलेम्बिक’ कंपनी में

भी लाल-झंडा यूनियन का गठन कर

लिया। कंपनी संस्थापक भाई लाल

अमीन चकित रह गए। उन्होंने यूनियन

तोड़ने की भरपूर कोशिश कीं। लेकिन

असफल रहे ं‘लाल बावटा’ यूनियन

को मान्यता मिलने का सवाल ही नहीं

था!

1948 में भालचं्रद अंडरग्राउंड

;गुप्तप्रवासद्ध में चले गए और 1951

तक रहे। बाहर निकलने पर बड़ौदा के

मजदूरों ने भारी संख्या में उनका स्वागत

किया।

अंडरग्राउंड दिनों मे भालचंद्र

‘डेविड’ के नाम से घूमा करते। बाद में

भी क्रिश्चियन इलाकों में ‘डेविड भाई’

ही कहलाया करते! उन्हें रविवार को

चर्च कभी जाना पड़ता था। वे और

चंद्रकांत मजदूर बस्तियों में रहा करते।

वे भेष बदलकर रहा करते।

उन्हें वसंत जोगलेकर नामक साथी

को गुप्त रूप से भगाना था। उसके

लिए मनुभाई दवे नाम के रेलवे गार्ड

की सहायता ली गई। भालचंद्र और

जोगलेकर गार्ड कि डिब्बे में बैठ गए।

उन्होंने अपना भेष इतना बदल लिया

था कि बिल्कुल ही पहचान में नहीं आ

रहे थे।

भालचंद्र त्रिवेदी ने अलेम्बिक वर्कर्स

यूनियन के अलावा इंडियन ह्यूम पाइप

यूनियन की स्थापना की। अलेम्बिक

की हड़ताल बहुत बिलिमारा और

नवासारी मिलों में लंबी हड़तालें चलीं।

महागुजरात आंदोलन में सक्रिय

वे सत्याग्रहियों के दूसरे ग्रुप के नेता

थे। वे जेल से भाग निकले। इंदुलाल

याज्ञनिक इस आंदोलन के नेता थे। वे

समूचे गुजरात में प्रसि( हो गए।

पार्टी में स्थान

भालचंद्र त्रिवेदी भा.क.पा. के राज्य

नेतृत्व में इसी दौर में चुने गए। इसके

बाद वे लगातार चुने जाते रहे। उन्होंने

पार्टी के मदुरै महाधिवेशन

;1953-54द्ध में गुजरात के

प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया।

उन्होंने बाद के भी अधिवेशनों में भाग

लिया। वे पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में

भी चुने गए।

वे गुजरात पार्टी की राज्य

कार्यकारिणी में लगातार चुने जाते रहे।

भलचंद्र त्रिवेदी ने 1964 में भा.

क.पा. में फूट पड़ने के बद भा.क.पा. में

ही रहने का फैसला किया और भा.क.

पा. ;माद्ध ;सी.पी.एम.द्ध में नहीं गए।

उन्होंने पार्टी के कोचीन ;1971द्ध,

विजयवाड़ा ;1974द्ध, भठिंडा

;1978द्ध और वाराणसी ;1981द्ध

अधिवेशनों में हिस्सा लिया। भठिंडा

कांग्रेस में वे पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में

चुने गए। वे गुजरात राज्य परिषद,

भाकपा, के सचिव चुने गए। उनके

नेतृत्व में पार्टी ने सफल बंद आंदोलनों

मे हिस्सा लिया।

उन्हांेने सोवियत संघ, पूर्वी जर्मनी,

नेपाल, क्यूबा, हंगरी, स्विट्जरलैंड, इ.

देशों की यात्रा की। गुजरात क्षेत्रीय

एटक परिषद का तीसरा सम्मेलन मई

1945 में अहमदाबाद में संपन्न

हुआ। इसमें 19 यूनियनों से 80

प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। प्रस्तावों

के जरिये गुजरात के टेक्सटाइल उद्योग

में ठेका मजदूरी समाप्त करने, बड़ौदा

और काठियावाड़ के रजवाड़ों में ब्रिटिश

भारत की तर्ज पर श्रम कानून लागू

करवाने, मूल वेतन में 33ø वृ(ि

करने और जीने लायक न्यूनतम वेतन

लागू करने की मांग की गई।

इन घटनाओं में भालचंद्र त्रिवेदी

की सक्रिय भूमिक रही।

हड़तालों का नेतृत्व

भालचंद्र त्रिवेदी ने गुजरात टैªक्टर्सलाॅक-आउट के खिलाफ हड़ताल का नेतृत्व किया। उन्होंने नोवीनो बैटरीज में

हड़ताल का मार्गदर्शन किया। मकरपुरा दो बार बंद हुआ। हिन्दुस्तान ब्राउन

बाॅवेरी में संगठन, आंदोलन और हड़ताल का नेतृत्व किया। ई.ई.सी में इंटक का

नेतृत्व असफल होने के बाद भालचंद्र के नेतृत्व में एटक ने आंदोलन संभाला।

1981 में साराभाई मशीनरी के मजदूरों ने सात दिवसीय हड़ताल की, फिर

त्रिवेदी ने 15 दिनों की भूख-हड़ताल आरंभ की। उनके समर्थन में बड़ौदा बंद

आयोजित किया गया। स्टार स्टील में लाॅक-आउट के खिलाफ संघर्ष का उन्होंने

नेतृत्व किया।

औपचारिक कमिटियों में हिस्सेदारी

भालचंद्र गुजरात राज्य श्रम सलाहकार बोर्ड के सदस्य थेऋ फैक्टरी सलाहकार

बोर्ड के सदस्य थेऋ इंजीनियरिंग उद्योग में न्यूनतम वेतन तय करने संबंधी

त्रिपक्षीय सलाहकार समिति में वे मजदूर प्रतिनिध थे। वे गुजरात प्रोविडेंट फंड के

सदस्य थे। साथ ही कई अन्य कमिटियों में भी थे।

भालचंद्र वल्र्ड माक्सिस्ट रिव्यू’ ;विश्व सै(ांतिक पत्रिकाद्ध के गुजराती संस्करण

के संपादक भी थे। उन्होंने ‘नवी दुनिया’ और ‘श्रमयुग’ पत्रिकाओं में सहायता

की।

वे ‘इस्कस’; भारत -सोवियत सांस्कृतिक मैत्री संघद्ध के उपाध्यक्ष थे उन्होंने

आॅल इंडिया रेडियो और मास्को रेडियो तथा टी.वी. में भाषण दिया।

वे वल्र्ड फेडरेशन आॅफ टेªड यूनियन्स के साथ जुड़े रहे।

उनकी मृत्यु 23 सितंबर 1992 को हे गई।

अनिल राजिमवाले

शनिवार, 26 जून 2021

चुनाव में भाजपा सरकार की अर्थी निकल जाएगी - अतुल अंजान

बाराबंकी विभिन्न राज्यों के विधान सभा  चुनाव में भाजपा हार गई है और उ प्र में भाजपा सरकार की अर्थी निकल जाएगी। यह उदगार व्यक्त करते हुए आल इंडिया किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अंजान ने कहा कि सरकार किसानों की मांगों को अनदेखा कर रही है किसान मोदीं सरकार की विदाई कर देगा।

आज लखनऊ में किसान संयुक्त मोर्चा के तत्वावधान में बाराबंकी से किसान प्रदर्शन करने गए थे।

प्रदर्शनकारियों को किसान सभा के प्रदेश महासचिव पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव ने सम्बोधित करते हुए कहा कि डीजल के दाम मोदी सरकार रोज रोज बढा कर खेती के खर्चे को दोगुना दिया है। आगामी विधानसभा के चुनाव में योगी सरकार बुरी तरह पराजित होगी। प्रदर्शन में रणधीर सिंह सुमन बृजमोहन वर्मा शिवदशन वर्मा किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह नैमिष कुमार सिंह रामनरेश महेंद्र यादव गिरीश चंद्र रामकुमार भारती निर्भय सिंह हेमन्त नंदन ओझा आदि प्रमुख लोग शामिल थे। फिर राष्ट्रपति के नाम सम्बोधित ज्ञापन भी दिया गया।


 

शुक्रवार, 25 जून 2021

गरीब नवाज मस्जिद तहसील रामसनेहीघाट बाराबंकी के प्रकरण में समाचार बेबसाइट वायर के खिलाफ मुकदमा दर्ज


   प्रदेश सरकार अपनी असफलताओं को छिपाने के प्रेस दमन पर उतारु है कल देश की प्रतिष्ठित समाचार बेबसाइट वायर पर रामसनेहीघाट बाराबंकी में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई है। इस संबंध में प्रस
  कौंसिल आफ इंडिया को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। गम्भीर खतरा पैदा हो रहा है। प्रेस की आजादी भी खतरे में है। 

इस तरह के कार्य से लोकतंत्र को गम्भीर खतरा है।

रण धीर सिंह सुमन एडवोकेट

मोबाइल नंबर 9450195427 

रविवार, 30 मई 2021

वाई.डी. शर्मा-दिल्ली कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में मुख्य

 

यज्ञदत्त शर्मा का जन्म 1 मार्च 1918 को जिला सोनीपत के
जखोली नामक गांव में हुआ था ;इस वक्त पंजाब, वर्तमान में हरियाणा। वे एक पढ़े-लिखे मध्यमवर्गीय परिवार के
थेः माता और पिता दोनों ही अध्यापक थे। माता का नाम पार्वती था और पिता का मंसाराम।
1930 में वे दिल्ली आ गए। वे अपने बड़े भाई जनार्दन शर्मा के साथ रहने लगे। उनके भाई राजनीति में सक्रिय थे। वे अपने गांव के पहले वकील थे और कांग्रेस के ब्लॉक सचिव थे। वे आगे चलकर दिल्ली की  कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन के नेता बने।
यज्ञत्त पहले दरियांगज के रामजस स्कूल में भर्ती हुए। उसके बाद उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला
लिया। 1940 में उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए. फर्स्ट क्लास में पास किया। गांव के प्रथम
एमए थे। इस कारण उन्हें रामजस कॉलेज में अर्थशास्त्र में लैक्चरर का काम मिल गया। सेंट स्टीफेंस में ही
एआईएसएफ तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भावी नेता मुकीम फारूकी भी पढ़ रहे थे। दोनों के बीच आगे चलकर लम्बे समय के लिए दोस्ती हो गई।
1936 में दिल्ली में ‘स्वदेशी लीग’ की स्थापना की गई जिसमें वाई.डी. शर्मा, शंकरा, कंवरलाल शर्मा, आदि  शामिल थे।
1936 में अगस्त में लखनऊ में एआईएसएफ ;ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना की गई। इसका
प्रभाव दिल्ली समेत समूचे देश पर पड़ा। वाई.डी. शर्मा ने नवम्बर 1936 में एआईएसएफ के लाहौर सम्मेलन में भाग लिया। नवम्बर 1936 में ही उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में स्टूडेंट्स यूनियन बनाई जिसके वे
अध्यक्ष चुने गए। साथ ही दिल्ली प्रांतीय प्रोविंशियल स्तर पर दिल्ली प्रोविंशियल स्टूडेंट्स फेडरेशन ;डीपीएसएफ या यूनियन की स्थापना की गई। दिल्ली स्टूडेंट्स यूनियन का नाम बदलकर डीपीएसएफ कर दिया गया। इसमें मीर मुश्ताक, ईश चंद्र, के पी शंकरा, कंवरलाल शर्मा, हुकम सिंह राणा, ईत्यादि विद्यार्थी थे। यज्ञदत्त शर्मा इसके
उपाध्यक्ष चुने गए। अली सरदार जाफरी भी उन दिनों दिल्ली में ही थे और एंग्लो-अरेबिक कॉलेज में थे। नवम्बर
1937 में वाई.डी. दिल्ली प्रादेशिक एसएफ के महासचिव चुने गए।
1937-41 के दौरान यज्ञदत्त दिल्ली प्रोदशिक स्टूडेंट्स फेडरेशन के महासचिव चुने गए। एसएफ का ऑफिस
उन दिनों भागीरथ पैलेस में हुआ करता। 1-3 जनवरी 1938 को मद्रास में एआईएसएफ का तीसरा सम्मेलन हुआ।
उसमें वाई.डी. शर्मा ने दिल्ली एसएफ के महासचिव के रूप में भाग लिया। उसमें वाईडी संयुक्त सचिव चुने गए।
इसके अलावा उन्होंने मध्य प्रदेश में स्टूडेंट्स फेडरेशन बनाने में सक्रिय सहयोग किया।
12 से 14 नवम्बर 1938 को दिल्ली प्रादेशिक एस.एफ का दूसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। 1 से 2 जनवरी 1940 को एआईएसएफ का पांचवां सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया। इसमें यज्ञदत्त शर्मा ने सक्रिय भूमिका अदा की। वे भाकपा के महासचिव पी.सी. जोशी तथा अन्य नेताओं से मिले। वे कम्युनिस्ट फ्रैक्शन
में भी सक्रिय थे।
कम्युनिस्ट राजनीति में यज्ञदत्त शर्मा का विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति से सम्बंध था, जैसा कि हम देख आए हैं। वे एआईएसएफ में अत्यंत सक्रिय थे जैसा कि ऊपर की घटनाओं से पता चलता है। उनकी स्वभाविक संज्ञान राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर थी। दिल्ली कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक बहाल सिंह मार्च 1939 में उन्हें दर्शक के रूप में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में ले गए।
वहां कम्युनिस्टों ने ‘नेशनल फ्रंट’ के नाम से अपना अलग ग्रुप बना रखा था। वहां वाई डी शर्मा की मुलाकात
पी.सी. जोशी, जेड.ए. अहमद, के.एमअशरफ जैसे कम्युनिस्टों से हुई।
2-3 जुलाई 1939 को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन हुआ। इसके आयोजनकर्ताओं में वाई.डी. शर्मा, बाबा रामचंद्र तथा अन्य के साथ शामिल थे। मीनू मसानी ने इसकी अध्यक्षता की।
1939 में ही दिल्ली में भाकपा की संगठन समिति का गठन किया गया। उस समय पार्टी गैर-कानूनी थी। बहाल
सिंह इसके सचिव बनाए गए। वे साथ ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सचिव और एआईसीसी के सदस्य भी थे।
अक्टूबर 1939 में नागपुर में अ.भा. साम्राज्यवाद-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें वाईडी.
शर्मा ने भी फारूकी, बहाल सिंह, आदि के साथ हिस्सा लिया। इस सम्मेलन के फैसलों को अमल में लाने के लिए
बहाल सिंह ने विद्यार्थी नेताओं को कांग्रेस दफ्तर में बुलाया। इसमें वाई.डी. शर्मा भी शामिल हुए।
1-2 जनवरी 1940 को दिल्ली में एआईएसएफ का पांचवां सम्मेलन हुआ।  26 जनवरी 1940 को दिल्ली में युद्ध विरोधी दिवस बड़े पैमाने पर मनाया गया। इसकी तैयारी में यज्ञदत्त बहुत सक्रिय थे। 25 जनवरी 1940 को ही डीआईआर के तहत उनपर वारंट जारी कर दिया गया। 4 फरवरी को उनके भाई जनार्दन शर्मा के घर पर छापा मार कर यज्ञदत्त शर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया। इस समय वे दिल्ली पार्टी के सचिव थे। विधिवत पार्टी बनने के बाद वे प्रथम कम्युनिस्ट थे जो पकड़े गए। तलाशी में गैरकानूनी साहित्य पकड़ा गया जिसमें केन्द्रीय पार्टी का गुप्त मासिक ‘कम्युनिस्ट’ भी था।
यज्ञदत्त को जमानत पर छुड़ाया गया। तब उन्होंने एमए की परीक्षा दी, वे प्रथम श्रेणी में पास हुए। सरकार को
अपनी ही कमियों के कारण मुकदमा वापस लेना पड़ा। कुछ ही दिनों पहले इंद्रजीत गुप्त सेंट स्टीफेंस कॉलेज से
पास होकर निकल चुके थे। दिल्ली में पार्टी के गैर-कानूनी अखबार और साहित्य के वितरण का जिम्मा वाई.डी. का था। यह साहित्य इंद्रजीत गुप्त और अरूण बोस लाया करते। साप्ताहिक ‘‘नेशनल फ्रंट’’ 50-80 तक बंटता था।
एमए पास करने के पास वाईडी रामजस कॉलेज में पढ़ाते हुए ीी पार्टी और एआईएसएफ में सक्रिय रहे।
जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में एआईएसएफ ने दिल्ली में विद्यार्थियों की हड़ताल संगठित की।
इसमें यज्ञदत्त बड़े ही सक्रिय रहे। वाईडी शर्मा ने एआईएसएफ के नागपुर सम्मेलन ;दिसम्बर 1940 में सक्रिय हिस्सा लिया। वे ‘कम्युनिस्ट फ्रैक्शन’ में सक्रिय थे। वे कहते हैं कि शाह ग्रुप को रोकने के लिए कम्युनिस्ट
ग्रुप ने एम. फारूकी को खड़ा किया। फारूकी दिल्ली वि.वि. के ‘ग्वायर मामले’ में सुप्रसिद्ध हो चुके थे। मौरिस
ग्वायर वाइस-चांसलर थे। उनका पुतला जलाने के बाद फारूकी की डिग्री छीन ली गई थी। 24 से 26 मई 1941 को दिल्ली प्रदेश एसएफ का तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन प्रो. रणधीर सिंह ने किया
और अध्यक्षता के.एम. अध्यक्ष थे। जुलाई 1939 में दिल्ली में तीन दिनों का ‘समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ आयोजित किया गया। 1941 में देहरादून में भी स्कूल हुआ। इनमें वाईडी ने भाग लिया।
31 दिसंबर 1941 को पटना में एआईएसएफ का 7वां सम्मेलन हुआ। इसमें वाईडी शर्मा भी गए। अप्रैल 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स के दिल्ली आगमन पर वाईडी फारूकी और के एम अहमद ने उनसे मुलाकात की। इस समय वाईडी ने दिल्ली पार्टी में राजनैतिक शिक्षा का काम संभाल रखा था। उन्होंने ‘अध्ययन मंडलियों’ में कई क्लास लिए।
24 जुलाई 1942 को पार्टी पर पाबंदी हटाए जाने के बाद उसने खुले तौर पर काम करना आरंभ किया। वाईडी.
फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन में भी सक्रिय हो गए।
सितंबर 1942 में बम्बई में पार्टी का एक विशेष ‘प्लेनम’ ;अधिवेशन हुआ। इसमें वाईडी ने दिल्ली पार्टी की संगठन
समिति के सचिव की हैसियत से भाग लिया। दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने दिसंबर 1943 में वाईडी को कॉलेज में नौकरी से निकलवा दिया। इससे पहले दिल्ली ने एआईएसएफ के साथ मिलकर 1942 का जुलूस चांदनी चौक में
निकाला। वाईडी पार्टी सचिव थे। इस जुलूस पर लाठी चार्ज, आंसू गैस और गोलियों का प्रयोग हुआ।
मई 1943 में वाईडी और बहाल सिंह भाकपा की प्रथम कांग्रेस ;1943 में भाग लेने बम्बई गए। इसके बाद दिल्ली पार्टी का प्रथम सम्मेलन 23 से 25 जनवरी 1944 को गांधी ग्राउंड में सम्पन्न हुआ। वाईडी शर्मा सचिव और फारूकी सह सचिव चुने गए। लेकिन सरकार ने दिसंबर 1943 में उन पर पाबंदी लगा दी थीऋ इसलिए वे किसी भी
गतिविधि में भाग नहीं ले पाते थे। 12 दिसंबर 1943 को गांधी ग्राउंड में हजारों लोगों की एक विशाल सभा हुई जिसे बहाल सिंह, मोहम्मद यामीन और वाई डी शर्मा ने सम्बोधित किया। इसमें बंगाल के महा-अकाल, जापानियों के आक्रमण और अन्य प्रश्नों पर अंग्रेज सरकार की आलोचना की गई।
जुलाई 1944 में वाईडी को प्रांतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। 1945 में उन्होंने पार्टी की ओर से दिल्ली म्युनिसिपल कमिटि के चुनाव लड़े। 1946 के जनसंघर्षों में वाईडी ने सक्रिय ीूमिका अदा की। वे
डाक-तार कर्मचारियों के संघर्ष में गिरफ्तार कर लिए गए। दिसंबर 1946 में उन्होंने गाजियाबाद में रेलवे मजदूरों की हड़ताल को संगठित किया। दरियागंज में दिल्ली पार्टी कम्यून में ही भाकपा की केन्द्रीय समिति की बैठक
इन 1947 में हुई। यह वाई डी का मकान था। इसके अलावा बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक थेन जो पत्रकार थे, नियमित वाई डी से मिला करते। इस बीच भयानक दंगे हुए। इसमें वाई डी शर्मा तथा अन्य साथियों ने दंगा पीड़ितों के राहत के लिए सक्रिय कार्य किया।
आजादी के बाद
15 अगस्त 1947 को देश को मिली आजादी का पार्टी ने स्वागत किया। बाद में 1948 में बीटी रणदिवे लाइन के पार्टी पर हावी होने के बाद वाई डी शर्मा, फारूकी, सरला शर्मा तथा शकील अहमद को नेतृत्व से हटा दिया गया।
वाई डी शर्मा को 4 मार्च 1949 को गिरफ्तार कर दिया गया। अगस्त 1949 में जब पहली पत्नी के निधन पर उन्हें पैरोल पर छोड़ा गया तो पार्टी के आदेश पर भूमिगत हो गए। वे 20 मार्च 1951 तक भूमिगत रहे, फिर आत्मसमर्पण करने पर जमानत पर छोड़ दिए गए। 1951 में उन्होंने बम्बई में अ.भा. सम्मेलन में भाग लिया। अक्टूबर 1952 में एशिया-पैसिकल शांति सम्मेलन में भाग लेने बीजिंग गए। 1951 में वाई डी शर्मा ने गुप्त अ.भा. पार्टी समायोजन ;कलकत्ता में भाग लिया। इसमें पार्टी नीति में परिवर्तन हुआ। अजय घोष के सुझाव पर वे भाकपा की केन्द्रीय समिति में चुने गए। 1957 में उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में चुना गया। वे छठी पार्टी कांग्रेस ;1961, विजयवाड़ा तक लगातार राष्ट्रीय परिषद में चुने जाते रहें
1953 में उनका विवाद दिल्ली पार्टी की जानी-मानी नेता सरला शर्मा से हुआ।
ट्रेड यूनियन आंदोलन में
1952 के बाद वाई डी शर्मा ने अपना अधिकतर समय ट्रेड यूनियन तथा मजदूर आंदोलन में लगाया। पहले भी वे टीयू का काम कर चुके थे। उन्होंने तेल और प्रोट्रोलियम उद्योगों के मजदूरों, खासकर पब्लिक सेक्टर में बड़ा काम
किया। वे इस क्षेत्र के विशेषज्ञ माने जाने लगे। खासकर एस ए डांगे के साथ मिलकर उन्होंने भारत तथा सोवियत संघ, समानिया, पोलैंड, आदि देशों में तेल की खदानों, उसकी सफाई तथा उत्पादन का गहरा अध्ययन किया। उन्होंने अन्य साथियों के साथ मिलकर भारत सरकार को इनसे संबंधित कई सुज्ञान दिए। वे पेट्रोलियम वर्कर्स यूनियन के निर्माताओं में थे। तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करवाने में उनकी अहम भूमिका रही।
इसके अलावा उन्होंने इंजीनियरिंग, चाय, टायर, बीमा, होटल,आदि क्षेत्रों के मजदूरों एवं कर्मचारियों के बीच भी काम किया। 1954 में वे एटक की राष्ट्रीय परिषद में चुने गए। 1973 से 1987 के बीच ने एटक के सचिव और बाद
में उपाध्यक्ष रहें वे 15 वर्षों तक दिल्ली टीयूसी के सचिव और अध्यक्ष रहे। उन्होंने दूकान कर्मचारियों के लिए कानून बनवाने और उन्हें संगठित करने का महत्वपूर्ण काम किया।
भारत की स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर वाई डी शर्मा का स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु 11 जनवरी 2004 को हो गई

 -अनिल राजिमवाले