गुरुवार, 18 जून 2026

करोड़ों का सोना कुछ बारिश में गला, कुछ ले गए बंदर... पुलिस की कोर्ट में दलील

करोड़ों का सोना कुछ बारिश में गला, कुछ ले गए बंदर... पुलिस की कोर्ट में दलील लो भई, मालखाने से गायब हुआ करोड़ों का सोना, पुलिस बोली- कुछ बारिश में गला, कुछ बंदर उठा ले गए लखीमपुर खीरी: आजकल दहेज प्रताड़ना और उसके बाद हत्या के मामले काफी सामने आते हैं. मगर, हर बार लड़का गलत नहीं होता ये एक मामले में सिद्ध हुआ. मगर पीड़ित आज एक साल बाद भी दुखी है. दरअसल, करीब 17 साल पहले एक महिला ने आत्महत्या कर ली थी. इस पर मायके वालों ने ससुरालियों पर दहेज हत्या का केस दर्ज करा दिया. उस समय पुलिस महिला के शव से करीब 1 करोड़ के सोने के गहने उतारकर ले गई थी. अब जब कोर्ट ने कहा कि जब्त जेवरों को ससुराल वालों को सौंप दो तो पुलिस ने एक अलग ही कहानी सुना दी. कहा कि जेवर बारिश में खराब हो गए. बाकी बचे जेवरों को बंदर उठा ले गए. ये सुनकर कोर्ट भी सन्न रह गया. आइए जानते हैं पूरा मामला… साल 2007 में शहर के मोहल्ला कपूरथला निवासी मुदित अग्रवाल की पत्नी रानी अग्रवाल उर्फ जूली ने दीपावली की रात फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. पोस्टमार्टम के दौरान उसके शरीर से नाक की सोने की कील, गले की चेन व लॉकेट, सोने की अंगूठी और 10 सोने की चूड़ियां उतारकर पुलिस को सौंप दिया गया. उस समय कहा गया कि इन गहनों को सदर कोतवाली के मालखाने में जमा करा दिया गया है. यूपी कल का मौसम 18 जून : पहले भयानक गर्मी, फिर होगी बल्ले-बल्ले, 48 घंटे में 29 जिलों में आएगा भारी तूफान महिला की मौत पर हंगामा हुआ और मायके वालों ने ससुरालियों पर दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज करवा दिया. मुदित अग्रवाल समेत अन्य आरोपियों को जेल भेजा गया. 28 फरवरी 2024 को साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपी बरी कर दिए गए. मुकदमे के निस्तारण के बाद मुदित अग्रवाल ने अदालत में प्रार्थना पत्र देकर जेवर अपने पक्ष में रिलीज करने की मांग की. इस पर पुलिस की ओर से दाखिल रिपोर्ट ने सभी को चौंका दिया. पुलिस ने कोर्ट से कहा कि 7 सितंबर 2013 तक की मालखाने की सोने के जेवर से भरी पोटलियों भीग गई थीं. उन्हें छत पर सुखाने रखा था. बारिश होने से ज्यादातर जेवर खराब हो गए. बाकी बचे जेवरों को बंदर उठा ले गए. तत्कालीन सत्र न्यायाधीश लक्ष्मीकांत शुक्ल इस स्पष्टीकरण को सुनकर हैरान रह गए. उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया और गंभीर लापरवाही माना. अदालत ने टिप्पणी की कि सोने के जेवर बारिश में नष्ट नहीं हो सकते. साथ ही यह भी कहा कि मालखाने जैसी संवेदनशील जगह के कीमती सामान को खुले में बिना निगरानी के रखने का दावा स्वीकार्य नहीं है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने सीलबंद पोटली में रखे बहुमूल्य जेवरों का अपने हित में उपयोग किया. बाद में अभिलेखों में फर्जी प्रविष्टियां कर दीं. कोर्ट ने मामले की जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने और पीड़ित को क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने के निर्देश दिए. पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता शैलेंद्र सिंह गौड़ के अनुसार, महिला के शरीर से मिले जेवरों को अदालत में पेश नहीं किया गया. इसके चलते करीब 7 सालों तक गवाही शुरू नहीं हो सकी. तत्कालीन जिला जज लक्ष्मीकांत शुक्ल ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई थी. अदालत ने जेवरों के अभाव में गवाही शुरू कराने के साथ दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए थे. साथ ही पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने के भी आदेश दिए थे. इसके बावजूद अभी तक पीड़ित को राहत नहीं मिल सकी है.

लोगों को Apophenia और Pareidolia जैसी बीमारी से बचायें-डाँ महफूज अली .

अभी कुछ दिन पहले एक अजीब इंसिडेंट हुआ मेरे साथ... हुआ क्या कि मैं एक आदमी से मिलने उसके फैक्ट्री में गया था... उसका पीए मुझे पार्किंग में रिसीव करने आया था. मैं पीए के साथ उसके ऑफिस में पहुंचा तो देखा बाहर जूते चप्पल उतरे हुए थे... तो मैंने भी उतार दिए पीए के कहने से पहले ही... ऑफिस में जैसे ही घुसा तो देखा कि जिससे मैं मिलने गया था उसके ऑफिस में कोई टेबल चेयर नहीं थी.. और जो भी आता वहीँ ज़मीन पर लगे गद्दों में मसनद के सहारे बैठता... मैंने देखा कि जिससे मिलने गया था वो भी सामने ज़मीन पर बैठा था और वहीँ ज़मीन में लगी एक टाइल को कुछ कपड़ों और खूबसूरत नक्काशीदार लकड़ी से घेर कर रखा हुआ था... अगरबत्तियां जल रहीं थीं.. और मैं यह सब देख कर परेशान हुआ... कि यह सब क्या "चोंचले" है? मैं जो इम्प्रैशन ले कर गया था वो सब धूमिल हो रहा था. उम्र में वो काफी बड़ा था तकरीबन पचहत्तर साल का मगर यह सब देख कर नमस्ते सलाम करने का मन नहीं हुआ. मैंने उससे पूछा कि यह सब क्या है? उसने बताया कि उसका कोई गुरु था, वो मर गया तो उस गुरु की आत्मा ने उस टाइल्स में वास कर लिया है... इसलिए वो भी अब ज़मीन पर ही बैठते है जबसे गुरु मरने के बाद टाइल्स में आया. मैं मन ही मन परेशान हो गया... और सोचने लगा कि कभी भी किसी इंसान रुतबे, पैसे और पद से जज नहीं करना चाहिये... चूतिया कोई भी हो सकता है. उसने मुझे पहले उस गुरु की फोटो दिखाई जो मर गया था... फिर कहता है कि अब टाइल्स में देखिये आपको गुरु जी की शक्ल नज़र आएगी... मैंने टाइल्स में देखा तो सिर्फ डिज़ाइन नज़र आया मगर उसे यही बोला कि हाँ! गुरु जी मुझे भी देख कर मुस्कुरा रहे हैं. वो इस बात पर खुश हुआ. अब मेरे से वहां बैठा नहीं जा रहा था कि जो आदमी उरु-गुरु के चक्कर में पडा हो इसका मतलब है कि वो साइकोलॉजीक्ली और मेंटली बीमार आदमी है और उसकी इस बीमारी को आसपास के लोगों ने आस्था का नाम दे रखा है. आत्मा-वात्मा-रूह-सोल जैसी कोई चीज़ है ही नहीं... इंसान मर गया सो मर गया... आत्मा के बारे में दुनिया की कोई भी यूनिवर्सिटी और मेडिकल इंस्टिट्यूट नहीं पढ़ाते और ना ही आत्मा का कहीं कोई डिपार्टमेंट है. कमज़ोर इंसान गुरु पालता है. इस दुनिया में किसी भी इंसान के पास कोई भी दैवीय शक्ति नहीं है.. है तो वो चूतिया काट रहा है लोगों का. अगर किसी भी इंसान को किसी पत्थर, दीवार, पहाड़, ज़मीन आसमान, बादल, जानवर, या किसी भी ऑब्जेक्ट में अपने अपने धर्मों के अनुसार कोई भगवान्, पैगम्बर, ख़ुदा या गुरु नज़र आता है तो यह एक दिमागी बीमारी है जिसे Pareidolia कहते हैं. यह एक खतरनाक दिमागी बीमारी है जिसमें इंसान किसी भी अनदेखे ऑब्जेक्ट को ईश्वर मान लेता है... और उसे पूजने लगता है... दुनिया में धर्म को भी ऐसे ही बनाया गया है... धर्म एक सिस्टेमेटिक, डिसिप्लिनड, और पैटर्नड बीमारी है जो कि Pareidolia से ही रिलेटेड है. स्पिरिचुअलटी नाम की भी कोई चीज़ एक्सिस्ट नहीं करती है... यह हर धर्म के एकॉर्डिंग उसे मानने वाले अपने अपने स्पिरिचुअल सिस्टम को डेवेलोप कर लेते हैं... नहीं तो ऐसा भी होता कि हिन्दू मुसलमानों के स्पिरिचुअल सिस्टम को मानते और मुसलमान हिन्दुओं के स्पिरिचुअल सिस्टम को मानते.. क्यूंकि स्पिरिचुअलिटी का तो कोई धर्म ही नहीं है... मानों तो सबका मानों... जबकि ऐसा है ही नहीं... हर धर्मों के जितने भी कर्म काण्ड है वो सब एक दिमागी बीमारी Pareidolia और Apophenia से रिलेटेड हैं.. यह टोने-टोटके.. लकी चार्म, काला जादू, बंगाली बाबा, लॉकेट, भस्म, तावीज़,और हर धर्मों के तमाम टाइप के ईश्वरों की उलटी-सीधी कहानियाँ और उनसे रिलेटेड कांस्पीरेसी थ्योरी यह सब एक बीमारी Apophenia कहलाती हैं. एक्चुअल में जो चीज़ एक्सिस्ट ही नहीं करती उसे मानना और अपनाना एक बहुत ही बड़ी दिमागी बीमारी है और इसे Apophenia कहते हैं... और इस बीमारी को अब यूरोप समझ चुका है इसलिए वहां चर्च बंद हो रहे हैं या फिर रेस्टोरेंट्स में बदल रहे हैं. बहुत से देश इस बीमारी से पीड़ित और ग्रसित हैं... और लोग भी इस बीमारी को आस्था और धर्म से जोड़ कर बाबाओं, मुल्लाओं, पादरियों, नकली साधुओं, और नशेडी टाइप के लोगों के चक्कर में फँस जा रहे हैं... एक बहुत बड़ी जनसंख्या आस्था के नाम पर बिमारियों में फँसी पड़ी है और कोई सुध लेने वाला नहीं है... शातिर लोग इस बीमारी का फायदा उठा कर अपने सुख सुविधा बढ़ा रहे हैं. चलते-चलते बताता चलूँ कि धार्मिक इंसान एक सामाजिक आतंकवादी होता है... इनसे दूर रहें... यह समाज और देश में गंदगी फैलाते हैं.. और साइंटिफिक टेम्परामेंट से लोगों को दूर कर अपने जैसा बनाते हैं... और इन्हें किसी साइकेट्रिस्ट या साइकोलोजिस्ट को ज़रूर दिखाएँ.. यह बीमार लोग हैं... इन्हें इलाज की ज़रूरत है. लोगों को Apophenia और Pareidolia जैसी बीमारी से बचायें.

बुधवार, 17 जून 2026

राम मंदिर के सभी ट्रस्टी हटाकर जांच कराई जाए - डी राजा

राम मंदिर के सभी ट्रस्टी हटाकर जांच कराई जाए - डी राजा आरएसएस-भाजपा के लिए राम मंदिर हमेशा से एक राजनीतिक परियोजना थी जिसका उपयोग समाज का ध्रुवीकरण और विशाल वित्तीय संसाधनों को जुटाने के लिए किया जाता था। करोड़ों रुपये के आर्थिक गबन के ताजा आरोपों ने एक बार फिर मंदिर के मामलों को संघ -भाजपा के लोगों द्वारा प्रबंधित करने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राम मंदिर के उद्घाटन के बाद से जुड़ा यह पहला विवाद नहीं है। इससे पहले मंदिर के चारों ओर बड़े पैमाने पर भूमि सौदों और मुनाफाखोरी के आरोप भी सामने आए थे, जिसमें आरएसएस-भाजपा से जुड़े व्यक्ति और नौकरशाह मंदिर के चारों ओर बड़ी जमीन खरीद रहे थे। इससे पता चलता है कि भगवान राम और भक्तों की आस्था भी लालच और भ्रष्टाचार से बचती नहीं है। सच्चाई को उजागर करने और जनता के विश्वास को बहाल करने के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक जांच आवश्यक है। निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच के हित में चंपत राय और अन्य सभी आरोपों का सामना कर रहे हैं जांच पूरी होने तक उनके पदों से हटाया जाना चाहिए। दिए गए हर रुपये का पारदर्शी हिसाब होना चाहिए और किसी भी गलत काम के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

शनिवार, 6 जून 2026

कम्युनिस्ट नेता एनी राजा पर संघी गिरोह का हमला

।। कम्युनिस्ट नेता एनी राजा पर संघी गिरोह का हमला प्रदर्शन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेता एनी राजा पर हमला किया गया है। घटना से जुड़े मुख्य विवरण इस प्रकार हैं:घटना का कारण: एनी राजा जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने गई थीं।हमले का आरोप: उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे सरकार विरोधी नारे लगा रही थीं, तब दक्षिणपंथी/आरएसएस समर्थक नारे लगाने वाले युवकों के एक समूह ने पीछे से आकर उन्हें और उनके साथियों को धक्का देकर गिराने की कोशिश की और उनके साथ बदसलूकी की।घायल: इस झड़प के दौरान नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन (NFIW) की राष्ट्रीय सचिव निशा सिद्धू को चोटें आई हैं।पुलिस कार्रवाई: घटना के तुरंत बाद एनी राजा को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। उन्होंने जंतर-मंतर के पास स्थित पुलिस बूथ में इस मामले की शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद पुलिस ने तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया है।(नोट: इससे पहले साल 2017 में भी दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी में एक प्रदर्शन के दौरान एनी राजा पर भीड़ द्वारा हमला किया गया था, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हुई थीं

शुक्रवार, 5 जून 2026

बरकतुल्लाह भोपाली का नाम मिटाने का प्रयास भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अपमान है-डी राजा

बरकतुल्लाह भोपाली का नाम मिटाने का प्रयास भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अपमान है-डी राजा भोपाल में बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने का कथित कदम आरएसएस-भाजपा की भारत के स्वतंत्रता संग्राम और हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले नायकों की अवमानना की एक और अभिव्यक्ति है। मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली केवल भोपाल के पुत्र नहीं थे, वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारियों में से एक थे, ग़दर आंदोलन के नेता, काबुल में भारत की प्रथम अनविज़नल सरकार के प्रधानमंत्री, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के एक कट्टर विरोधी और एक कट्टर समर्थक थे रूस और लेनिन में अक्टूबर समाजवादी क्रांति की। बरकतुल्लाह भोपाली ने अपने समय के अग्रणी अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारियों के साथ राजा महेंद्र प्रताप और श्यामजी कृष्ण वर्मा की तरह काम किया और उनकी विरासत किसी एक समुदाय की नहीं बल्कि पूरे देश की है। यह शायद ही आश्चर्य की बात है कि जिनके वैचारिक पूर्ववर्तियों ने स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं निभाई, वे वास्तविक औपनिवेशिक विरोधी देशभक्तों की स्मृति से खुद को असहज पाते हैं। एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी का नाम मिटाने के कदम का हम पुरजोर विरोध करते हैं। संस्थानों का नाम बदलने से शैक्षणिक अवसर पैदा नहीं होते, सीखने के परिणामों में सुधार या विश्वविद्यालयों को मजबूत नहीं होते हैं यह केवल आरएसएस के संकीर्ण राजनीतिक एजेंडा को प्रकट करता है जो इतिहास को फिर से लिखना और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीकों को बदलना चाहता है। भाजपा सरकार की प्राथमिकताओं का पर्दाफाश ऐसे समय में जब शिक्षा क्षेत्र पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं, निजीकरण, भ्रष्टाचार, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण स्कूलों के लगातार बंद और विलय की चपेट में आ रहा है, MP सरकार अपनी ऊर्जा बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने जैसे विभाजनकारी और सांप्रदायिक कार्यों में लगा रही है। मध्य प्रदेश के लोग उम्मीद करते हैं कि सरकार शैक्षिक बुनियादी ढांचे में सुधार करे, सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा मिले। एक महान स्वतंत्रता सेनानी की विरासत को लक्षित करने के बजाय, सरकार को शिक्षा में गहरे संकट को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इतिहास को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग करना बंद करना चाहिए

मंगलवार, 2 जून 2026

कॉमरेड मर्लिन को लाल सलाम

आज नोर्मा जीन मोर्टेंसन के जन्म की शताब्दी है, जिसे दुनिया मर्लिन मुनरो के नाम से जानती थी। जबकि बुर्जुआ प्रेस एक निर्मित आइकन के भूत पर अंतर करना जारी रखता है, ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी बौद्धिक और कॉमरेड को पुनः प्राप्त करती है। उसकी राजनीति विधानसभा लाइन से पैदा हुई थी। लॉस एंजिल्स के पालक घरों से रेडियोप्लेन म्यूनिशन कारखाने तक, मुनरो की वर्ग चेतना सर्वहारा अस्तित्व की गर्मी में जाली थी। वह एक भयंकर बुद्धि की महिला थी, जिसके पास एक बुद्धि थी जिसने उन पुरुषों को बौना कर दिया जो उसे प्रबंधित करने की मांग करते थे, फिर भी वह परजीवी स्टूडियो प्रणाली द्वारा खरीदी, बेची और व्यापार की जाने वाली वस्तु में कम हो गई थी। एफबीआई की फाइलों, जिसने उसे अंतिम सांस तक ट्रैक किया, पुष्टि की कि प्रतिष्ठान को क्या डर था - एक यौन प्रतीक जिसने मार्क्स को पढ़ा और चीनी क्रांति की प्रशंसा की। वह एक उग्रवादी-विरोधी नस्लवादी थी जिसने एला फिट्जगेराल्ड के लिए रंग बार को तोड़ने के लिए अपने मंच का इस्तेमाल किया, और जब उसने ब्लैकलिस्टेड नाटककार आर्थर मिलर से शादी की तो वह मैककार्थी विच के शिकार की कायरता के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी थी। हमें यह समझना चाहिए कि मुनरो का संघर्ष वर्ग शोषण और पितृसत्तात्मक हिंसा का चौराहा था। वह एक श्रमिक थी जिसका श्रम उसका खुद का शरीर था, एक प्रणाली द्वारा सुपर-शोषित थी जिसने उसे सुंदर और चुप करने की मांग की थी। उसका जीवन पूंजी की पुरुष दृष्टि के खिलाफ विद्रोह का एक निरंतर कार्य था। उसके 100 वें जन्मदिन पर, हम एक "बॉम्बशेल" नहीं मनाते हैं। हम एक स्पष्ट विचारधारा वाले समाजवादी का सम्मान करते हैं जो समझते हैं कि उसके वर्ग की मुक्ति उसके लिंग की मुक्ति से अविभाज्य थी। मुबारक शताब्दी, कॉमरेड मर्लिन। संघर्ष जारी है। #MarilynMonroe

शुक्रवार, 29 मई 2026

‘जज कोई पवित्र गाय नहीं है’, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

‘जज कोई पवित्र गाय नहीं है’, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी मद्रास हाई कोर्ट ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट एक फिल्म में न्यायपालिका की छवि खराब करने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रहा था। तमिल फिल्म ‘करप्पू’ पर प्रतिबंध लगाने को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। इसमें आरोप लगाए गए थे कि फिल्म में न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश हुई है। इसको लेकर कोर्ट ने कहा है कि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार है, और जज कोई पवित्र गाय नहीं है। दरअसल, बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मद्रास हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और वी लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने अधिवक्ता आर.एस. तमिलवेंडन द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि फिल्म ‘करप्पू’ में अदालतों को अपमानजनक तरीके से चित्रित किया गया है और न्यायिक प्रणाली को कलंकित किया गया है। ‘भ्रष्ट न्यायाधीश थे और हैं’ हाईकोर्ट ने कहा, “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। भ्रष्ट न्यायाधीश थे और हैं।” कोर्ट ने कहा कि अदालतें और न्यायाधीश आलोचना से परे नहीं हैं। कोर्ट ने कहा, “न्यायाधीशों को पवित्र गायों की तरह नहीं माना जाना चाहिए। न्याय कोई एकांतप्रिय गुण नहीं है; उसे आम लोगों की जांच-पड़ताल और सम्मानजनक टिप्पणियों का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए, भले ही वे टिप्पणियां मुखर हों।” पूर्व जज ने कहा था- 20 प्रतिशत न्यायाधीश भ्रष्ट हाईकोर्ट ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसपी भरूचा के केरल के कोल्लम में एक कानूनी सम्मेलन में दिए गए बयान का भी उल्लेख किया जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि देश के 20 प्रतिशत न्यायाधीश भ्रष्ट हैं। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण और उनके पुत्र अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा दिए गए चौंकाने वाले बयान पर भी पीठ ने ध्यान दिया । पीठ ने स्पष्ट किया कि वह ऐसे व्यापक बयानों का समर्थन नहीं कर रही है। अदालत ने कहा, “हम इतनी दूर तक नहीं जाएंगे। हम इस तरह के व्यापक बयानों का समर्थन करने से भी इनकार करते हैं।” हालांकि, बेंच ने यह भी कहा कि वह इस बात से इनकार नहीं करेगी कि व्यवस्था में भ्रष्ट न्यायाधीश रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “हमें न्यायिक भ्रष्टाचार के मामलों की जानकारी है और हमने ऐसे मामले देखे भी हैं। मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ नियमित रूप से ऐसे भ्रष्ट न्यायाधीशों को बाहर का रास्ता दिखाती है।” प्रतिबंध लगाने की थी मांग न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफार्मों पर ‘करप्पू’ फिल्म पर प्रतिबंध लगाने या उसे विनियमित करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। कोर्ट ने गौर किया कि फिल्म की कहानी सेवन वेल्स नामक स्थान पर स्थित एक न्यायालय में घटित होती है।
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