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लोकसंघर्ष पत्रिका
सोमवार, 13 अप्रैल 2026
बंगाल को स्वर्ग बनाने दावा करने वाले महात्मा उ प्र में मजदूरों पर गोली चलवा रहे हैं
बंगाल को स्वर्ग बनाने दावा करने वाले महात्मा
उ प्र में मजदूरों पर गोली चलवा रहे हैं
असली चेहरा देखे
नोएडा में गोलीकांड के बाद भड़की… बुलंदशहर तक आंच;
दिल्ली से सटे नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों का गुस्सा अब एक शहर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे दिल्ली-एनसीआर में फैला हुआ एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है. वेतन वृद्धि, महंगाई और श्रम सुविधाओं को लेकर शुरू हुआ यह विरोध अब कई जिलों में असर दिखा रहा है. नोएडा में चल रहे इस आंदोलन की शुरुआत 7 अप्रैल को गुरुग्राम के मानेसर इलाके से हुई थी, जहां मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन शुरू किया था.
इसके बाद यह विरोध धीरे-धीरे नोएडा और फिर ग्रेटर नोएडा पहुंचा. अब इस आंदोलन का असर गाजियाबाद, बुलंदशहर और हापुड़ तक में भी दिखाई दे रहा है. आज बड़ी संख्या में बुलंदशहर और गाजियाबाद में श्रमिकों ने प्रदर्शन किया और सड़कों को जाम कर दिया. गाजियाबाद में स्थिति इतनी खराब हो गई कि नोएडा-गाजियाबाद बॉर्डर पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया.
नोएडा में कब और कहां शुरू हुआ विरोध?
नोएडा में यह आंदोलन 9 अप्रैल को फेस-टू थाना क्षेत्र में मौजूद होजरी कंपलेक्स से शुरू हुआ. जहां गारमेंट और होजरी यूनिट्स में काम करने वाले मजदूर फैक्ट्रियों के बाहर इकट्ठा हुए. वो वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए. शुरुआत में यह प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था. मजदूरों ने नारेबाजी और बातचीत के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की.
9 अप्रैल से लेकर 11 अप्रैल तक आंदोलन बिना किसी हिंसा के चलता रहा. हालांकि, मजदूरों का कहना था कि उनकी मांगों पर कंपनियों और प्रशासन की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा रहा, जिससे उनके बीच असंतोष लगातार बढ़ता गया.
कब उग्र हुआ आंदोलन?
मजदूरों के आंदोलन की स्थिति ने 12 अप्रैल को बड़ा मोड़ लिया. ग्रेटर नोएडा के इकोटेक थर्ड इलाके में प्रदर्शन के दौरान मिंडा कंपनी के पास हालात अचानक बिगड़ गए. इस दौरान पुलिस कार्रवाई में गोली चलने की घटना सामने आई, जिसमें एक महिला मजदूर को गोली लग गई.
यह घटना पूरे आंदोलन के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. जैसे ही गोलीकांड की खबर फैली, मजदूरों में भारी आक्रोश फैल गया और आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया.
सड़क पर उतरे मजदूर
अगले ही दिन 13 अप्रैल यानी सोमवार की सुबह नोएडा के फेस-2, सेक्टर-62 और एनएच-9 जैसे प्रमुख इलाकों में हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए. इससे यातायात पूरी तरह ठप हो गया. प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कर दी. डिवाइडर पर चढ़कर नारेबाजी की. कई जगह वाहनों को रोक दिया. इस दौरान हालात तेजी से बिगड़े और कई जगह तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं.
नोएडा के फेस-2 इलाके में कई वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया. इससे पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया. पुलिस और मजदूर आमने-सामने आ गए. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े. भारी पुलिस बल की तैनाती के बाद किसी तरह हालात को काबू में लाया गया, लेकिन तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
कई किलोमीटर लंबा जाम?
इस आंदोलन का सीधा असर नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक ढांचे पर पड़ा. फेस-2 के होजरी कंपलेक्स में करीब 500 कंपनियां संचालित होती हैं. वहीं, इकोटेक थर्ड के औद्योगिक क्षेत्र में भी करीब 400 से अधिक फैक्ट्रियां और निजी कंपनियां हैं. इनमें सैकड़ों की संख्या में मजदूर काम करते हैं. दोनों प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हुआ और कई कंपनियों को अस्थायी रूप से काम बंद करना पड़ा.
बुलंदशहर और हापुड़ में भी सड़क पर मजदूर
यह आंदोलन किसी एक कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि कई कंपनियों के मजदूरों का सामूहिक विरोध है. अब इसका असर पूरे एनसीआर में दिखने लगा है. गाजियाबाद, बुलंदशहर और हापुड़ जैसे जिलों में भी मजदूर सक्रिय हो गए हैं, जिससे आने वाले दिनों में आंदोलन और व्यापक होने की आशंका है.
क्या है मजदूरों की मांग?
मजदूरों की प्रमुख मांगों में न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 26,000 रुपये प्रति माह करना, ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से करना, साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित करना, समय पर वेतन भुगतान, सैलरी स्लिप देना और बोनस को सीधे बैंक खाते में समय पर भेजना शामिल है. उनका कहना है कि महंगाई के इस दौर में मौजूदा वेतन से गुजारा संभव नहीं है.
प्रदर्शन के दौरान नोएडा-गाजियाबाद बॉर्डर पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया, जिससे ट्रैफिक पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा. यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा और कई जगह एंबुलेंस फंसने की घटनाएं भी सामने आईं.
रूट डायवर्जन लागू
मजदूरों के उग्र प्रदर्शन का असर शहर की यातायात व्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है. दिल्ली-नोएडा बॉर्डर, सेक्टर-62, फेस-2, एनएच-24, डीएनडी फ्लाईवे और चिल्ला बॉर्डर जैसे प्रमुख मार्गों पर लंबा जाम लग गया है. कई जगह वाहनों की कतारें कई किलोमीटर तक पहुंच गईं, जिससे ऑफिस जाने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.
स्थिति को संभालने के लिए ट्रैफिक पुलिस ने कई जगह बैरिकेडिंग कर रूट डायवर्जन लागू कर दिया है. चिल्ला बॉर्डर से महामाया फ्लाईओवर होते हुए डीएनडी की ओर जाने वाले यातायात को डायवर्ट किया जा रहा है. सेक्टर-62 और एनएच-24 की ओर जाने वाले वाहनों को वैकल्पिक मार्गों से भेजा जा रहा है, जबकि नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर भी ट्रैफिक को नियंत्रित तरीके से चलाया जा रहा है.
दिल्ली से नोएडा आने-जाने वाले लोगों को डीएनडी फ्लाईवे और कालिंदी कुंज मार्ग का उपयोग करने की सलाह दी गई है. वहीं गाजियाबाद और इंदिरापुरम की ओर से आने वाले वाहनों को सेक्टर 71-75 के अंदरूनी रास्तों से डायवर्ट किया जा रहा है. नोएडा से ग्रेटर नोएडा जाने वालों को एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करने और दादरी रोड से बचने की सलाह दी गई है.
गौतमबुद्ध नगर के श्रमिकों के लिए DM नोएडा मेधा रूपम ने जारी किए निर्देश
10 तारीख तक वेतन मिले
ओवरटाइम पर दोगुना भुगतान अनिवार्य किया जाए
प्रत्येक श्रमिक को साप्ताहिक अवकाश प्रदान किया जाए
अगर इस दिन काम किया जाता है तो दोगुना वेतन दें
सभी मजदूरों को नियमानुसार बोनस दिया जाएगा, जो कि अधिकतम 30 नवंबर से पहले उनके खातों में जमा किया जाए
यौन उत्पीड़न रोकथाम कमेटी सभी स्थलों पर गठित की जाए, इसकी अध्यक्षता महिलाओं द्वारा की जाए
हर जगह शिकायत पेटी की स्थापना की जाए
सभी के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए, ये सुनिश्चित की जाए
सभी मजदूरों को वेतन पर्ची दी जाए
जिलास्तर पर एक कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है, श्रमिक अपनी किसी भी समस्या को बता सकते हैं, जिस पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी.
डीएम ने जारी किए नंबर
श्रमिकों के व्यापक प्रदर्शन को देखते हुए डीएम मेधा रूपम ने पहले ही शिकायतों को दर्ज कराने के लिए नंबर जारी किए. उन्होंने कहा कि श्रमिकों की सुविधा के लिए कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है. श्रमिक वेतन संबंधी अन्य समस्याओं की शिकायत 120-2978231, 120-2978232, 120-2978862, 120-2978702 पर कर सकते हैं. डीएम ने भरोसा दिलाया है कि शिकायतों का त्वरित समाधान किया जाएगा.
शनिवार, 11 अप्रैल 2026
संघी मुखविरी कर रहे थे और रंडियां अंग्रेज़ों से लड रही थी - जगदीश्वर चतुर्वेदी
संघी मुखविरी कर रहे थे और रंडियां अंग्रेज़ों से लड रही थी - जगदीश्वर चतुर्वेदी
अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह और तवाइफें-लता सिंह
इतिहास, मुकाबले का एक खास मैदान बनकर सामने आता है। यह उन तबकों के लिए खास तौर पर सच है जो समाज के हाशिए पर रहे हैं। इस तरह, इसकी कोशिशें की जाती रही हैं कि लंबे अर्से से अदृश्य बनाकर रख दिए गए आम लोगों की आवाज को, इतिहास में उभारकर सामने लाया जाए। शायद, महिलाओं की आवाजें सुनने के लिए तो अतीत का बाकायदा उत्खनन ही करना पड़ेगा। इस तरह का श्रम तब तो खास तौर पर जरूरी हो जाता है, जब उन नाचने-गाने वाली तवाइफों की भूमिका का सवाल आता है, जो 1857 के विद्रोह के साथ जुड़ी रही थीं।
समाज और इतिहास से निर्वासित
याद रहे कि किस्सा उन महिलाओं का है जिन्हें 'भोंडा', 'अश्लील', 'जरूरत से ज्यादा मुखर', 'नैतिक रूप से पतित', 'कामुक' आदि-आदि बताया जाता था। ये ऐसी महिलाएं थीं, जिन्हें सार्वजनिक दायरे तक कहीं ज्यादा पहुंच हासिल थी और जो अपेक्षाकृत स्वतंत्र थीं। इस तरह वे अचल सामाजिक संरचनाओं के बाहर थीं और जाति, वर्ग और लिंग की सुस्थापित संबंध व्यवस्थाओं या एक तयशुदा दायरे के साथ बंधी हुई नहीं थीं।
इसी का नतीजा था कि उन्हें 'भीतरघाती' माना जाता था और समझा जाता था कि उनसे स्थापित व्यवस्था के लिए खतरा है। सच तो यह है कि इतिहास के विषय में रूप में इन महिलाओं को देखने भर से, मध्यवर्ग की 'सम्मानित' व्यवस्था 'अस्थिर' हो जाती है। शायद इसीलिए 1857 के विद्रोह के विवरणों में तवाइफें प्राय: अदृश्य ही हो गई हैं। राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में एक सम्मानित 'राष्ट्र' के अपने ढांचे से उन्हें पूरी तरह से बाहर ही रखकर, उनकी इस रचनात्मक भूमिका को या तो नकार ही दिया है या फिर मिटा दिया है।
आखिरकार, महिलाओं का सार्वजनिक मनोरंजनकर्ताओं और पुरुषों की लालसा के केंद्र के रूप में सामने आना, अंगरेजी में शिक्षित अभिजात वर्ग के हित में नहीं पड़ता था। उन्हें तो इन तवाइफों के प्रति-आदर्श के तौर पर, सुगृहिणी की छवि ही ज्यादा प्रिय थी। इसीलिए, तवाइफों को 'वेश्या' के रूप में कलंकित स्टीरियोटाइप किया जाता था।
इस टिप्पणी में हम कला का प्रदर्शन करने वाली महिलाओं के समुदायों में से एक, तवाइफों की भूमिका का जिक्र करेंगे। यह ऐसा समुदाय है जो नाचने-गाने के पेशे में लगा हुआ था। तवाइफ शब्द ने बेशक वक्त गुजरने के साथ जन-मानस में एक नैतिकवादी अर्थध्वनि प्राप्त कर ली है। सच तो यह है कि 'वेश्या' के साथ खड़े किए जाने की वजह से इन महिला कलाकारों को खामोश हो जाने पर मजबूर कर दिया गया। जब भी उन्होंने अपनी आवाज उठाई, उन्हें उदार मिथकों के सहारे अपना पुराविष्कार करना पड़ा, ताकि अपने स्वाभिमान को पुख्ता कर सकें, जिसे उनके 'पतित' और 'खतरनाक' औरत होने का बार-बार जिक्र किए जाने ने कमजोर किया था। दुर्भाग्य से इन महिलाओं के लेखन में से शायद ही कुछ बच पाया होगा, जबकि उन्हें अपने समय की सबसे शिक्षित महिलाएं माना जाता था। जाहिर है कि इनके मामले में विद्वानों और इतिहासकारों की चुप्पी ने, इन महिलाओं की चुप्पी को और गहरा किया है। इस तरह, एक पूरे के पूरे पेशे को ही ऐतिहासिक स्मृति से मिटा दिया गया है, जिसके साथ अनेक सार्वजनिक दायरे में सक्रिय महिलाएं जुड़ी हुई थीं। विडंबना यह है कि नारीवादी विद्वानों तक के लेखन में भी ये महिलाएं अदृश्य ही बनी रही हैं।
उपनिवेशविरोधी संघर्ष में भूमिका
1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की पड़ताल करते हुए इस टिप्पणी में औपनिवेशिक इतिहास के इन 'निर्बंध' तत्वों की जगह फिर से खोजने और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में उनकी जगह और भूमिका को फिर से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें शक नहीं कि इससे विद्रोह के इतिहास लेखन में एक महत्वपूर्ण पहलू जुड़ेगा। यह इतिहास लेखन इन महिलाओं को अदृश्य बनाए जाने की कोशिशों का शिकार है। इस विद्रोह के 'साधारण विद्रोहियों' का अध्ययन, विद्रोह में पुरुषों की हिस्सेदारी पर ही केंद्रित बना रहा है। रानी लक्ष्मीबाई जैसे अपवादों को छोड़कर विद्रोह के संबंध में पूरी की पूरी चर्चा में, उसमें साधारण महिलाओं की भागीदारी पर शायद ही कोई रोशनी पड़ती होगी। इसके चलते, तवाइफों की भूमिका का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा इसलिए और भी ज्यादा है कि ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं जो दिखाते हैं इन तवाइफों में से कुछ ने राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, हालांकि इतिहास लेखन की मुख्यधारा में इनकी राजनीतिक आवाज को अदृश्य ही कर दिया गया है।
इस टिप्पणी में हम 1857 के दौरान, कानपुर में ऐसी ही एक तवाइफ, अजीजुन की भूमिका की चर्चा करेंगे। कानपुर इस विद्रोही धावे के मुख्य केंद्रों में से एक था। विद्रोहियों ने कानपुर की छावनी पर धावा बोला था और आगे चलकर उस पर कब्जा कर लिया था। 27 जून 1857 को विद्रोहियों ने सतीचौरा घाट पर सार्वजनिक रूप से 300 से ऊपर अंगरेज औरतों, मर्द और बच्चों को मौत के घाट उतारा था। इसके बाद 15 जुलाई को बीबीघर में सुरक्षित औरतों और बच्चों के एक ग्रुप को मौत के घाट उतारा गया था।
कानपुर में विद्रोह की कथा की पुनर्रचना करने में एक बड़ी कठिनाई सामग्री के स्रोतों की कमी रही है। वास्तव में यहां विद्रोह के संबंध में प्राथमिक स्रोत के रूप में मुख्यत: औपनिवेशिक विवरण ही बचे हैं। इन प्राथमिक स्रोतों में विद्रोह के बीच से बच रहे अंगरेजों द्वारा लिखे गए समकालीन विवरण, अंगरेजों के वफादारों की डायरियां और सरकारी रिपोर्टों के तौर पर ब्रिटिश अधिकारियों के वक्तव्य आदि मुख्य हैं। सामान्य अपेक्षा के विपरीत, इन औपनिवेशिक विवरणों को ही हमें पढ़ना होगा।
अजीजुन की कहानी
बहरहाल, इस प्राथमिक स्रोत सामग्री से गुजरते हुए एक बात जो खास तौर पर हैरानी की लगती है, वह यह है कि मुख्यधारा के इतिहास लेखन में इस तरह की औरतों को अदृश्य करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, विद्रोह के अधिकांश औपनिवेशिक विवरणों में अजीजुन का नाम देखने को मिलता है। यहां तक कि उसका जिक्र वीडी सावरकर के तथाकथित राष्ट्रवादी लेखन में और एस.बी. चौधुरी जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों की कृतियों तक में देखने को मिलता है। इस तमाम लेखन में उसकी भूमिका के लिए और खास तौर पर 'राष्ट्र की स्वतंत्रता' के लिए उसके संघर्ष के लिए, अजीजुन को सराहा गया है।
विद्रोह के अधिकांश विवरणों में विद्रोहियों के साथ अजीजुन के लड़ने का जिक्र आता है। उसके संबंध में बताया जाता है कि वह पुरुष वेश में घोड़े पर सवार होकर और तमगों से सजकर और पिस्तौलों से लैस होकर निकलती थी। ऐसा लगता है कि कानपुर में जिस रोज नाना साहेब की शुरुआती जीत की खुशी में झंडा फहराया गया था, वह उसी दिन जुलूस में शामिल हुई थी। कानपुर में अजीजुन का नाम लोगों की स्मृति में आज भी जिंदा है। अभी पिछले ही दिनों एक अखबार की रिपोर्ट में बताया गया था कि किस प्रकार कानपुर के लोगों ने एक सड़क का नाम अजीजुन के नाम पर रखने की मांग की है।
अजीजुन कानपुर में लुरकी माहिल में, ओमारू बेगम की कोठी में रहती थी। उसकी मां एक तवाइफ थी, जो लखनऊ में रहती थी। ऐसा माना जाता है कि 1832 में जन्मी अजीजुन के सिर से मां का साया काफी कम उम्र में ही उठ गया था और लखनऊ के शतरंजी महल में एक तवाइफ के घर पर ही उसका पालन-पोषण हुआ था। ऐसा माना जाता है कि अजीजुन, उस जमाने में संस्कृति के प्रमुख केंद्र माने जाने वाले लखनऊ शहर को छोड़कर, जहां तवाइफों की कद्र करने वाले बहुत थे, कानपुर में आ बसी थी। यह स्पष्ट नहीं है कि वह लखनऊ को छोड़कर कानपुर क्यों गई थी, जो बुनियादी तौर पर बाजारों का और फौजी छावनी का शहर था।
प्राथमिक स्रोत सामग्री के अभाव में हम अन्य साहित्यिक कृतियों के सहारे कुछ अनुमान ही लगा सकते हैं। ऐसी ही एक रचना, रुसवा की कृति उमराव जान है। उमराव जान भी एक तवाइफ है, जो लखनऊ से कानपुर आने के बाद, अपने अनुभव सुनाती है। उमराव इसका जिक्र करती है कि किस तरह कानपुर में वह नाच-गाने के अपने प्रदर्शन में व्यस्त थी और अच्छा पैसा कमा रही थी। बेशक, वह इसका भी जिक्र करती है कि किस तरह उसे कानपुर के लोगों का बोलचाल का तरीका पसंद नहीं था और लखनऊ की यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती थीं। फिर भी वह इससे खुश थी कि कानपुर में आकर वह खुद मुख्तार हो गई थी, जबकि लखनऊ में ऐसा संभव नहीं था और उसे किसी खानम के नीचे पेशा करना पड़ता, जो तवाइफों के श्रेणी विभाजन में उससे ऊपर होती। इससे ऐसा लगता है कि अजीजुन के कानपुर आने का एक संभावित कारण यह रहा हो सकता है कि उसके मन में स्वतंत्रता की जबरदस्त इच्छा थी। ऐसा लगता है कि वह किसी के संरक्षण में नहीं रहना चाहती थी, जिसका पता उसके व्यक्तित्व से चलता था, जिसकी अभिव्यक्ति 1857 के विद्रोह में उसकी भूमिका में हुई थी।
लड़ाइयों में सिपाहियों के साथ
अजीजुन का सैकेंड कैवेलरी के सिपाहियों से बहुत नजदीकी रिश्ता था, जो अकसर उसके घर आया-जाया करते थे। सैकेंड कैवेलरी के सिपाही शम्सुद्दीन खान के साथ खास तौर पर उसके घनिष्ठ संबंध थे, जिसने विद्रोह में एक सक्रिय भूमिका अदा की थी। विद्रोहियों की बैठकें उसके घर पर हुआ करती थीं। शम्सुद्दीन अकसर अजीजुन के घर आया-जाया करता था। कानपुर में विद्रोह से संबंधित ज्यादातर विवरणों में इसका जिक्र आता है कि वहां विद्रोह शुरू होने से दो दिन पहले, शम्सुद्दीन खुद अजीजुन के घर गया था और उसने अजीजुन को बताया था कि एक-दो दिन में नाना साहब शासन संभाल लेंगे और उसके बाद उसका घर सोने की मोहरों से भर जाएगा। अजीजुन का घर सिपाहियों का मिलन स्थान भी था। अजीजुन ने औरतों का एक दल भी बनाया था जो हिम्मत के साथ हथियारबंद सिपाहियों को बढ़ावा देता हुआ घूमता था, उनके घावों की मरहम-पट्टी करता था और उनके बीच हथियार और गोला-बारूद बांटता था। अजीजुन ने एक तोपखाने को अपने दल का मुख्यालय बनाया था। यह तोपखाना, व्हीलर जिस जगह जमा हुआ था उसके उत्तर की ओर, रैकट कोर्ट और चैपल ऑफ ईंज के बीच में स्थित था। घेरे के पहले दिन से ही इस तोपखाने की तरफ से व्हीलर के फौजी जमावड़े पर गोलियां और गोले दागे जाते रहे थे। व्हीलर की फौजों के घेरे के करीब-करीब पूरे दौर में अजीजुन सिपाहियों के बीच ही बनी रही थी। एक प्रत्यक्षदर्शी द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार वह भारी गोलाबारी के बावजूद, पिस्तौलों से लैस बराबर अपने संगियों के साथ बनी रही थी। सैकेंड रेजीमेंट के कैवेलरी के सिपाही ही उसके संगी थी।
ऐसा लगता है नाना साहब और अजीमुल्ला खान, दोनों ही अजीजुन को पहचानते थे। ऐन मुमकिन है कि उसे विद्रोह की योजना की जानकारी रही हो और वह कानपुर में विद्रोह के प्रमुख षडयंत्रकारियों में से रही हो। इस तरह की भी अटकलें लगाई जाती रही हैं कि बीबीघर में ब्रिटिश औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के 'षडयंत्र' में भी उसकी भूमिका रही थी। लेकिन, विद्रोह के अधिकांश विवरणों में बीबीघर की घटना के सिलसिले में हुसैनी नाम की एक और तवाइफ का नाम ज्यादा प्रमुखता से आता है। हुसैनी पर ही इसका संदेह किया जाता रहा है कि उसी ने बीबीघर में औरतों और बच्चों की हत्या किए जाने के आदेश दिए थे।
विद्रोह में अजीजुन जैसी औरतों की भूमिका की सैकड़ों कहानियां मिलेंगी। लेकिन, इनमें से ज्यादातर कहानियां दर्ज हुए बिना ही रह गई हैं। मिसाल के तौर पर लखनऊ में विद्रोह के 'गुप्त' और 'उदार आर्थिक मददगारों' के रूप में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों को मालूम था कि उसके कोठे विद्रोहियों के मिलन-स्थल बने हुए थे, जहां विद्रोह के मंसूबे बनाए जाते थे। इसी का नतीजा था कि कोठों को राजनीतिक षडयंत्र के ठिकानों के तौर पर संदेह की नजरों से देखा जाने लगा था। वास्तव में 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका का अंदाजा, इनमें से कुछ महिलाओं के खिलाफ ब्रिटिश अधिकारियों की दंडात्मक कार्रवाई की भीषणता से लगाया जा सकता है। इन कार्रवाइयों में बड़े पैमाने पर उनकी संपत्तियों की जब्ती भी शामिल थी। लखनऊ में, जो कि तवाइफों का एक प्रमुख केंद्र था, 1857 के विद्रोह में प्रमाणित हिस्सेदारी के लिए, जिन लोगों की संपत्तियां जब्त की जा रही थीं, उनकी सूचियों में अनेक तवाइफों के नाम भी शामिल थे। रुस्वा की कथा उमराव जान में भी इसका जिक्र है कि किस तरह विद्रोह के बाद उमराव को लखनऊ छोड़कर जाना पड़ा था और किस तरह उसकी कोठी को लुटवाया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका को हम किस तरह समझ सकते हैं? इसमें एक महत्वपूर्ण कारक नवाबों के साथ उनका घनिष्ठ रूप से जुड़ा होना हो सकता है। नवाब ही तवाइफों के सबसे बड़े संरक्षक हुआ करते थे। नवाब अकसर अंगरेजों के
खिलाफ थे, क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने उनकी सत्ता को कमजोर कर दिया था। फिर भी, विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी को सिर्फ नवाबों के साथ उनके घनिष्ठ रिश्तों के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह का तर्क इन औरतों की किसी भी प्रकार की स्वतंत्र भूमिका या राजनीतिक आवाज को ही वंचित करने वाला तर्क है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि चाहे नवाबों के संरक्षण में ही क्यों न रही हों, तवाइफों के लिए विद्रोह में हिस्सा लेने की कोई मजबूरी नहीं थी। मिसाल के तौर पर अजीजुन चाहती तो विद्रोह से दूर ही बनी रह सकती थी, क्योंकि विद्रोह में हिस्सेदारी वैसे भी काफी जोखिम भरी कार्रवाई थी। इतना ही नहीं, विद्रोह में हिस्सेदारी के लिए उसे किसी तरह से मजबूर किए जाने या उस पर किसी तरह का दबाव होने के, कोई लक्षण तो नहीं नजर आते हैं। वास्तव में अजीजुन तो उस दौर में किसी के भी संरक्षण में थी ही नहीं। वह तो कानपुर में रहती थी और स्वतंत्र रूप से अपना कोठा चलाती थी। इसलिए, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी के कारण समझने के लिए, हमें उसके ऐतिहासिक संदर्भ की पड़ताल करनी होगी।
अंगरेजों ने जब भारतीय उप-महाद्वीप में स्थानीय शासकों को हटाकर उनकी जगह लेनी शुरू की, उससे पहले तक यहां मौजूद हिंदू और मुसलिम, दोनों ही तरह के शासकों के दरबारों में तवाइफों की प्रभावशाली (महिला) अभिजन के रूप में पहुंच थी। उन्हें 'उन्नत' दरबारी संस्कृति के संरक्षकों और उसकी अदायगी करने वालों के रूप में देखा जाता था, जिनकी हिंदुस्तानी संगीत और कत्थक नृत्य शैली के विकास में सक्रिय भूमिका थी। उन्हें कवियों, विद्वानों, धर्मज्ञों और सबसे बढ़कर प्रतिभाशाली संगीतकारों और नर्तकियों के संरक्षकों के रूप में देखा जाता था। उन्हें दरबार में और समाज में भी, भारी सम्मान हासिल था और उनके साथ जुड़ाव से उन लोगों की प्रतिष्ठा ही बढ़ती थी, जिन्हें उनके सांस्कृतिक प्रदर्शनों में आमंत्रित किया जाता था।
बहरहाल, ब्रिटिश सत्ता के आने के साथ, तवाइफों की सांस्कृतिक सत्ता घट गई थी। अंगरेजी राज का नतीजा यह हुआ था कि उन्हें शाही दरबारों से हासिल संरक्षण में भारी कमी आ गई थी, जबकि यही उनकी सत्ता का मुख्य आधार था। ब्रिटिश शासन उनके कलात्मक और रचनात्मक पहलू की अनदेखी करता था और उसने तवाइफों के कोठों और चकलाघरों को एक करके देखना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, औपनिवेशिक दौर में तवाइफों की सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल असर पड़ रहा था। यूरोपीय सैनिक जिन यौन रोगों से पीड़ित थे, उनके फैलाव पर नियंत्रण हासिल करने के लिए ब्रिटेन ने 1864 में संचारी रोग कानून जैसे जो चिकित्सकीय कानून बनाए थे, उनमें तवाइफों को वेश्याओं के खाने में ही डाल दिया गया था। इसका अर्थ यह था कि वेश्याओं के लिए जो नियमन, नियंत्रण और जांच की व्यवस्थाएं कायम की गई थीं, तवाइफों को भी उनके दायरे में घसीट लिया गया।
असंतोष और राजनीतिक भूमिका
दरबारी संरक्षण छिन जाने, इस तरह के नियमनों और आगे चलकर 1857 के विद्रोह में भूमिका के लिए उनसे वसूल किए गए जुर्मानों आदि से, तवाइफों की हैसियत को भारी धक्का लगा था। यह एक भव्य सांस्कृतिक संस्था के धीरे-धीरे पतित होने का संकेतक बन गया और यह संस्था एक साधारण वेश्यावृत्ति में घटकर रह गई। औपनिवेशिक सरकार ने तवाइफों को नवाबों द्वारा दी गई ज्यादातर जागीरों को अपने हाथों में ले लिया। इतना ही नहीं, उसने तवाइफों से जोड़कर, परंपरागत रईसों को 'दुराचारी' और 'अनैतिक' के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि जब इन्हीं औरतों को यूरोपीय छावनियों में वेश्याओं के रूप में इस्तेमाल करने का सवाल आया या उनसे आयकर बटोरने का सवाल आया, तो पूरी तरह से व्यवहारवादी बनकर अंगरेजों ने सारे नैतिक आवरण उतारकर रख दिए और इन स्वार्थों को पूरा करने के लिए जरूरी कानून बनाने में कोई कोताही नहीं की। वास्तव में यह तो एक तरह से सरकारी नीति का हिस्सा ही बन गया था कि कोठे की औरतों में से जो 'स्वस्थ' और 'सुंदर' हों, उन्हें छांटकर अलग किया जाए और मनमर्जी से, यूरोपीय सैनिकों की सहूलियत के हिसाब से, छावनियों में उन्हें लाया जाए। इसने उनके पेशे को अमानुषिक बनाया और उनकी सांस्कृतिक भूमिका उनसे छीन ली। इससे भी बढ़कर उन्हें पुरुषों को सहज उपलब्ध बना दिया और इन औरतों के लिए सिपाहियों से संचारी यौन रोग लगने का खतरा और बढ़ गया। सारे विशेषाधिकारों से वंचित कर दी गई तवाइफें अपने शरीर पर, अपनी संपत्ति पर और अपनी 'नैतिकता' पर हमले के खिलाफ लड़ रही थीं। दूसरे शब्दों में, तब से लेकर आज तक अपनी वैधता के लिए और एक पेशेवर समूह के रूप में कुछ ठोस लाभ हासिल करने के लिए, उनकी लड़ाई चल ही रही है।
फिर भी, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की व्याख्या करते हुए, ब्रिटिश शासन के प्रति उनके आक्रोश को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उनकी राजनीतिक भूमिका को ही अनदेखा करना होगा। इसकी जगह पर, रेखांकित करने वाली बात यह है कि अंगरेजी हुकूमत के प्रति तवाइफों के वही मनोभाव थे, जो मनोभाव 1857 के विद्रोह में शामिल हुए दूसरे बहुत से लोगों के थे। वास्तव में, उस समय के समाज में प्रतिभाशाली और शिक्षित महिलाओं की अपनी-अपनी हैसियत के चलते तवाइफें समसामयिक राजनीति, कानून आदि से भली भांति परिचित थीं और स्थानीय सत्ताधारी अभिजन के साथ उनके संपर्क थे। इसके अलावा, वे जहां रहती थीं उन शहरी ठिकानों के इतिहास का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसने तवाइफों को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया था। मिसाला के तौर पर तवाइफें अच्छी तरह यह समझती थीं कि ब्रिटिश हुकूमत ने जानबूझ कर उनके कोठों की सचाइयों को तोड़ा-मरोड़ा था ताकि
नवाबी संस्कृति को बदनाम किया जा सके, और इसके पीछे मंशा यह थी कि 1856 में अवध के हड़पे जाने को सही ठहराया जाए।
इस टिप्पणी में हमने तवाइफ की सार्वजनिकराजनीतिक भूमिका की पड़ताल करने की कोशिश की है। इसके लिए हमने तवाइफ के व्यक्तित्व को, केंद्रीय रूप से राजनीतिक मंच पर रखकर देखने का प्रयास किया है, जिससे उसे अब तक वंचित करके रखा जाता रहा है। 'सम्माननीय' की अपनी तलाश में राष्ट्रवादी लेखन उसे आंखों से ओझल करके चलता आया है। वास्तव में अजीजुन जैसी औरतों की जिंदगी, जो राष्ट्रवादी इतिहासकारों के लिए सारभूत प्रेरणादायी दो नारी छवियों'सम्मानित मां' और 'सम्मानित पत्नी'में किसी भी खाने में फिट नहीं बैठती है, 1857 के विद्रोह पर प्रभुत्वशाली पूंजीवादी राष्ट्रवादी रुख को ही संकट में डालने पर आमादा नजर आती है। अजीजुन का यह बागी किस्सा 'भारत माता' के उस रूपक को छिन्न-भिन्न कर देता है, जो उपनिवेशविरोधी (मध्यवर्गीय) राष्ट्रवादी सोच पर हावी रहा है।
भाजपा और संघी दृष्टिकोण मानव को गुलाम बनाए रखने की विचारधारा है - डी राजा
भाजपा और संघी दृष्टिकोण मानव को गुलाम बनाए रखने की विचारधारा है - डी राजा
फुले की नज़र से: असमानता के बिंदुओं को जोड़ना
ज्योतिराव फुले की स्थायी प्रासंगिकता केवल रस्मी तौर पर उन्हें याद करने में नहीं है, बल्कि उस स्पष्टता में है जिसके साथ उन्होंने भारतीय समाज को समझा था। उन्होंने दूसरों से बहुत पहले ही यह देख लिया था कि यहाँ असमानता, वर्ग-शोषण, जाति-पदानुक्रम और पितृसत्ता की मिली-जुली ताकतों के ज़रिए रची-बसी है। ये अलग-अलग समस्याएँ नहीं हैं। ये आपस में गुंथी हुई ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जो एक-दूसरे को बनाए रखती हैं।
फुले ने जाति की वैचारिक जड़ों पर प्रहार करके अपने काम की शुरुआत की। उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि जाति-पदानुक्रम ईश्वर द्वारा बनाया गया है। इसके बजाय, उन्होंने इसे इतिहास, विजय और एक अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा बहुसंख्यक वर्ग के व्यवस्थित दमन में पाया—एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग जिसने ज्ञान और सत्ता पर अपना एकाधिकार जमा रखा था।
अपनी किताब 'गुलामगिरी' में उन्होंने बड़ी ज़ोरदार ढंग से लिखा: "शूद्रों और अति-शूद्रों की हालत अमेरिका के गुलामों से बहुत अलग नहीं है।" यह अंतर्दृष्टि आज भी परेशान करने वाली हद तक प्रासंगिक बनी हुई है। आज भी, जाति ही ज़मीन, शिक्षा, रोज़गार और गरिमा तक पहुँच तय करती है। दलितों के खिलाफ अत्याचार लगातार और चिंताजनक नियमितता के साथ जारी हैं। पूरे-के-पूरे समुदाय अपमानजनक पेशों में फँसे हुए हैं। फिर भी, सांस्कृतिक एकता की भाषा के ज़रिए इन वास्तविकताओं को धुंधला करने की कोशिशें लगातार बढ़ रही हैं। एक जैसी हिंदू पहचान पर ज़ोर देने की प्रवृत्ति अक्सर जातिगत उत्पीड़न के वास्तविक अनुभवों को हाशिए पर धकेल देती है। असमानता की आलोचना को अक्सर परंपरा पर हमले के तौर पर पेश किया जाता है।
फुले केवल जाति तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने अपनी आलोचना का दायरा समाज की आर्थिक संरचना तक भी बढ़ाया। अपनी किताब 'शेत कऱ्याचा आसूड' में, उन्होंने किसानों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया और उन शोषणकारी तंत्रों का पर्दाफाश किया जो कृषि-जीवन को नियंत्रित करते थे। फुले की सोच में पितृसत्ता की उनकी समझ भी उतनी ही केंद्रीय थी। सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर, उन्होंने महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाज़े उस समय खोले, जब समाज इस विचार के प्रति बेहद विरोधी रवैया रखता था।
आज भी, पितृसत्ता समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, कार्यस्थलों पर भेदभाव और उनकी स्वायत्तता पर लगी पाबंदियाँ आज भी हमारे रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित कर रही हैं। इसके साथ ही, तथाकथित पारंपरिक मूल्यों को फिर से स्थापित करने की एक ज़ोरदार कोशिश भी दिखाई देती है, जिन्हें अक्सर 'सांस्कृतिक गौरव' के रूप में पेश किया जाता है। वैचारिक-
हम उन मूल सिद्धांतों से दूर होते देख रहे हैं, जिन्हें फुले जैसे विचारकों ने आकार देने में मदद की थी।
संघ और भाजपा से जुड़ा वैचारिक ढांचा एक रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था को बढ़ावा देता है, जहाँ ऊँच-नीच को सामान्य माना जाता है और असहमति को हतोत्साहित किया जाता है। ऐसे माहौल में, महिलाओं की समानता के लिए संघर्ष को जाति और वर्ग के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता। फुले के काम का भीमराव अंबेडकर पर भी गहरा प्रभाव पड़ा, जिन्होंने खुद फुले को अपने बौद्धिक पूर्वजों में से एक माना। संविधान, जो समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखता है, पर इस बौद्धिक विरासत की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
जब संवैधानिक मूल्यों को कमजोर किया जाता है, जब असमानता को सामान्य मान लिया जाता है, और जब असहमति को अवैध ठहराया जाता है, तो हम उन मूल सिद्धांतों से दूर होते देखते हैं, जिन्हें फुले जैसे विचारकों ने आकार देने में मदद की थी। सामाजिक न्याय की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लाने का प्रयास, समानता से ऊपर पहचान को प्राथमिकता देना, और
आलोचना की आवाज़ को दबाना इस विरासत के लिए एक सीधी चुनौती है। फुले के शब्द आज भी गूंजते हैं क्योंकि वे असमानता की जड़ों पर प्रहार करते हैं। वे कोई आसान दिलासा नहीं देते। वे हमसे यह मांग करते हैं कि हम समाज को वैसा ही देखें जैसा वह वास्तव में है, न कि वैसा जैसा हम उसे अपनी कल्पना में देखना चाहते हैं। वे हमें यह मानने पर मजबूर करते हैं कि वर्ग-शोषण, जातिगत भेदभाव और पितृसत्ता केवल अतीत की बातें नहीं हैं। वे सक्रिय शक्तियाँ हैं जो हमारे वर्तमान को आकार दे रही हैं।
आज फुले के विचारों से जुड़ना एक राजनीतिक आवश्यकता है। यह विचार की उस परंपरा को फिर से अपनाने के बारे में है जो शोषितों को केंद्र में रखती है, जो ऊँच-नीच के बजाय समानता को महत्व देती है, और जो सामाजिक जीवन के आधार के रूप में न्याय पर ज़ोर देती है। फुले वर्तमान के लिए एक मार्गदर्शक हैं, और शायद इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, भविष्य के लिए भी।
लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हैं।
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026
साथी रुददत भारद्वाज के सपनों का भारत बनाएं
स्मरण कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज
भारत का राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम अपने अन्दर प्रवाहित अनेकानेक विरोधी धाराओं को समेटे और उनकी प्रहार क्षमताओं को एक साथ जोड़े एक महानद के विराट स्वरूप में तूफानी गति से आगे बढ़ा था। इस समन्वित शक्तिशाली राष्ट्रीय संघर्ष ने देश में दो सौ साल से अपनी गहरी जड़े जमाये ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ कर सात समुन्दर पार फेंक दिया था। इस राष्ट्रीय आन्दोलन के ही गर्भ में पनपी, पली और बढ़ी एक धारा थी - कम्युनिस्ट आन्दोलन की मानवतावादी धारा जिसका अपना विशिष्ट महत्व है और जिसे समझे बिना भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के सारतत्व को सही अर्थों में समझा नहीं जा सकता।
भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन ने राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए और फिर इस स्वाधीनता को गरीबों के झोंपडों तक पहुंचाने के लक्ष्य के लिये अपना सर्वस्व होम कर देने वाली ऐसी अनेक विभूतियां पैदा की हैं जिन पर संसार की कोई भी कौम गर्व कर सकती है। ऐसी ही अमर विभूतियों में थे - कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज उत्तर भारत में - खासतौर पर उत्तर प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जन्मदाताओं और संस्थापकों में से एक प्रमुख हस्ती थे। वे अल्प आयु में ही पार्टी की केन्द्रीय कमेटी और इसक पोलिट ब्यूरो के सदस्य बन कर शीर्ष नेतृत्व के बीच उभरे और गहन माक्र्सवादी अध्ययन, जनता के बीच सघन कार्य तथा जन संघर्षों की आग में तप कर कुन्दन बने। अपने क्रान्तिकारी व्यक्तित्व से उन्होंने सम-सामयिक राजनीति को न केवल गहराई से प्रभावित किया वरन उसे एक निश्चित दिशा देने में भी समर्थ हुये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास, उसकी इमारत की एक-एक ईंट कामरेड भारद्वाज के बलिदानी जीवन, उनकी विद्वता, गहन चिन्तन-मनन तथा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर चले घनघोर जन संघर्षों में उनके जनूनी जुझारूपन की गवाह है।
मेरठ षडयंत्र केस में जब भारत के मजदूर नेता चुन-चुन कर जेलों में बन्द कर दिये गये थे, तो जिन तीन-चार तरूणों ने भारत में मजदूर किसान पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) के काम को जारी रखा और उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुत काम किया, उनमें कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का नाम सबसे पहले आता है।
कामरेड भारद्वाज का जन्म मेरठ जिले की बागपत तहसील के बूड़पुर गांव में दिसम्बर 1908 में हुआ था। उनके पिता पं. रामानन्द शर्मा संस्कृत के अच्छे पण्डित थे लेकिन उन्होंने यजमानी या पंडिताई को अपने जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनाना चाहा। वैसे इस गांव के अधिकांश ब्राम्हण परिवार यजमानी के धंधे से ही अपनी जीविका चलाते थे। उन्होंने महाजनी और अनाज की खरीद-फरोख्त के कारोबार को अपना कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। आर्य समाजी आन्दोलन के प्रसार में अपने गांव से शर्मा जी पहले आर्य समाजी बने और इसके लिए बहुत काम भी किया। तत्कालीन आर्य समाज आन्दोलन और इसमें पिता द्वारा निभाई गई भूमिका का निश्चित ही कामरेड भारद्वाज के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था।
कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज की आरंभिक शिक्षा अपने गांव और पड़ोसी गांवों के स्कूलों में ही हुई थी। बाद में बड़ौत के हाई स्कूल में पढ़ते हुए वे घनघोर आर्य समाजी और फिर राष्ट्रीय आन्दोलन के जनूनी सिपाही बन गये। उस दौरान उन्होंने गांधी जी के अनशन पर तथा तिलक की गिरफ्तारी पर अपने स्कूल में हड़तालों का नेतृत्व किया। यह समय और उनका स्कूली जीवन राजनीति में प्रवेश और इसके लिए अपने को तैयार करने हेतु एक महत्वपूर्ण पाठशाला बन गया था।
असहयोग आन्दोलन के भरपूर प्रभाव के कारण पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया था। बगैर पैसे के वे चालीस मील पैदल चलकर अपने साथियों के साथ दिल्ली भाग गये और गांधी जी के आदेश के अनुसार चर्खा चलाना शुरू कर दिया। बाद में रोहतक के राष्ट्रीय स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने वहां दो साल की पढ़ाई एक साल में ही पूरी की और मैट्रिक की परीक्षा पास की। अब आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर के कौमी विद्यालय में दाखिल हो गये। वहीं पर यशपाल, मोहन लाल गौतम और हरनाम दास (भदन्त आनन्द कौसल्यायन) से सहपाठी के रूप में उनका परिचय हुआ।
1924 की जनवरी में कामरेड भारद्वाज 16 वर्ष की आयु में बनारस जाकर वहां के सेण्टल हाई स्कूल में दाखिल हुए। यहां भी दो वर्ष की पढ़ाई एक वर्ष में पूरी कर यहां की मैट्रिक परीक्षा पास की। इस दौरान स्कूली पढ़ाई के साथ वे राष्ट्रीय आन्दोलन से भी गहरा सम्बंध बनाये रखे। साथ ही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं और प्रेम चन्द्र की कहानियों की नियमित पढ़ाई से उनमें गहरी साहित्यिक अभिरूचि जाग्रत हुई। उन दिनों वे कांग्रेस के अनन्य भक्त थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश ले कर वे इतिहास, अर्थशास्त्र और तर्क शास्त्र गहरी दिलचस्पी के साथ पढ़ने लगे। उन्होंने इस दौरान अर्थशास्त्र पर तो अनेकानेक बाहरी पुस्तकें भी गहराई के साथ पढ़ डालीं। वे घोर राष्ट्रवादी युवक थे, इसलिए 1926 में कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के लिये स्वयंसेवक बन कर गये थे। उन्हीं दिनों कामरेड भारद्वाज ने रूसी क्रान्ति के बारे में चर्चा सुनी थी जिससे वे उसके प्रति आकर्षित हुए थे।
बनारस से इंटर पास करने के बाद वे प्रयाग विश्वविद्यालय में दाखिल हुये और यहां भी अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र विषय थे। यहां छात्र जीवन के दौरान कामरेड भारद्वाज स्वराजी देश भक्त से विकास कर धीरे-धीरे अपने अनुभव और सम्पर्क सूत्रों के सहारे कट्टर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन गये। यहां पर छात्र संघ की एकसभा में उन्होंने कामरेड पूरन चन्द्र जोशी का विद्वतापूर्ण और प्रेरणाप्रद भाषण सुना और उनके गहरे सम्पर्क में आकर धीरे-धीरे राजनैतिक कार्यों में उनके दाहिने हाथ बन गये। ज्ञातव्य हो कि कामरेड पूरन चन्द्र जोशी बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और भारतीय राजनीति में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कामरेड जोशी का जन्म शताब्दी वर्ष इस समय चल रहा है। इलाहाबाद में छात्र के रूप में ही कामरेड भारद्वाज ने माक्र्स की ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रान्ति’ तथा ‘साम्राज्यवाद’ आदि पुस्तकों का अध्ययन किया। वह प्रयाग तरूण संघ के सचिव भी थे जबकि पं. जवाहर लाल नेहरू उसके अध्यक्ष थे।
कामरेड भारद्वाज के गंभीर अध्ययन ने जहां राजनीति में उन्हें कम्युनिज्म पर पहुंचाया वही धर्म और ईश्वर के फन्दे से छुड़ा कर एकदम कट्टर अनीश्वरवादी बना डाला। उन्होंने अब बी.ए. पास कर लिया था। इसी साल मार्च में कामरेड पूरन चन्द्र जोशी मेरठ षडयंत्र केस में गिरफ्तार कर लिये गये।
मेरठ षडयंत्र केस में बड़े पैमाने पर मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कामरेड भारद्वाज के ऊपर राजनैतिक कार्यों का अकेले ही सारा बोझ आ पड़ा। उन्हें माक्र्सवाद पर क्लास लेने के लिए प्रयाग से बाहर भी जाना पड़ता। जब वे एम.ए. में राजनीति शास्त्र पढ़ रहे थे। साथ ही घर वालों के जोर देने के कारण कानून की पढ़ाई भी मजबूरन पढ़ रहे थे। 1930-31 का समय कामरेड भारद्वाज के लिए माक्र्सवाद का गहन अध्ययन का समय था। राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए यह उथल पुथल का समय था जब एक ओर लाहौर षडयंत्र केस तथा असेम्बली बम केस मके अभियुक्त के रूप में जेल में बन्द सरदार भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव की फांसी ने सम्पूर्ण देश के युवा रक्त में उबाल पैदा कर दिया था तो उधर दूसरी ओर गांधी जी द्वारा छेड़े गये आन्दोलन ग्रामीण अंचल की किसान मजदूर जनता को भी राजनीति में आने के लिए प्रेरणा प्रदान कर रहे थे। देश के राजनैतिक घटनाक्रम का यह तूफान भी कामरेड भारद्वाज को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहा था। 1931 में एम.ए. उत्तीर्ण कर उन्होंने विश्वविद्यालय में दूसरा नम्बर पाया था। कानून का पहला वर्ष पास करके ही उन्हें इसकी पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी। उस समय पैदा हो गये घरेलू और राजनैतिक हालात का यही तकाजा था।
जेल में बन्द साथियों से मिलकर उनके परामर्श और निर्देश के आधार पर कामरेड ेभारद्वाज परीक्षाफल आते ही 23 वर्ष की आयु में बम्बई में मजदूरों के बीच काम करने के लिए चले गये। वहां पर उन्होंने कामरेड गंगाधर अधिकारी, का. सरदेसाई तथा का. बी.टी.रणदिवे के साथ काम करना शुरू किया।
बम्बई में कामरेड भारद्वाज ने रेलवे मजदूरों की यूनियन कपड़ा मिल मजदूरों की गिरनी कामगार यूनियन और तरूण कामगार लीग को अपना कार्य क्षेत्र बना कर सघन कार्य किया। वे विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों में व्याख्यान देते और उनका क्लास लेते तथा कामरेड सरदेसाई के साथ मिल कर रेलवे मजदूरों के लिए हिन्दी व अंग्रेजी में दो अखबार निकालते। इसी साल गिरनी कामगारों के एक जुलूस का नेतृत्व करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर तीन माह की सजा दी यी। वे रेलवे मजदूरों में अपने सघन कार्य की वजह से बीबीसीआई (बम्बई से अजमेर) के मजदूरों की यूनियन के महामंत्री चुन लिये गये। 1934 में बम्बई में हुई कपड़ा मिल मजदूर कांफ्रेंस के अन्दर मालिकों के जुल्म के खिलाफ मजदूर हड़ताल का निर्णय लिया गया। कामरेड भारद्वाज की हड़ताल की तैयार के लिये बम्बई और अहमदाबाद में भी भारी परिश्रम करना पड़ा। इसी तैयारी के लिये अजमेर जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वहां के रेलवे वर्कशाॅप में उसी समय हड़ताल हो गयी थी। कामरेड भारद्वाज को छः सप्ताह की सजा देकर जेल में डाल दिया गया। इसी बीच अहमदाबाद के वारंट पर उन्हें दो साल की सजा हुई और वह पूरा जेल जीवन साबरमती और हैदराबाद (सिंध) की जेलों में सी क्लास के अन्दर बिताना पड़ा।
सन 1936 के अप्रैल महीने में वे जेल से छूटे तो उततर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में लेकर प्रयाग में जाकर छोड़ा। इससे पहले ही भारद्वाज के जेल में रहते ही नागपुर में सम्पन्न पार्टी की केन्द्रीय समिति की बैठक में उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति और पोलिट ब्यूरो का सदस्य चुन लिया गया था।
प्रयाग आने पर कामरेड भारद्वाज की कामरेड पूरन चन्द्र जोशी से भेट हुई थी। उन दिनों पार्टी का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ पहुंच गया था। कामरेड भारद्वाज को अब लखनऊ को केन्द्र बना कर काम करना था। पार्टी के गैर कानूनी होने के कारण साथियों को अधिकतर फरारी की हालत में ही काम करना पड़ता था। पार्टी के निर्णय से कामरेड भारद्वाज कानपुर के मजदूरों में काम करने के लिये गये और वहां सालों रह कर भरपूर शक्ति से काम किया।
फरारी की हालत में ही वे पार्टी के काम से लाहौर गये। वहां के लाजपतराय भवन में जब वे मीटिंग कर रहे थे, तभी अचानक पुलिस ने हाल को चारों तरफ से घेर लिया। आस-पास के सभी घर पुलिस के घेरे में थे फिर भी कामरेड भारद्वाज पकड़ में नहीं आये, खिड़की से कूद कर एक के बाद दूसरे घरों में छलांग लगाते हुये पुलिस की आंखों में धूल झोक कर गायब हो गये। दूसरे दिन फिर से उसी हाल में उन्होंने सफलतापूर्वक मीटिंग की जिसकी पुलिस को भनक भी न लग सकी।
फैजपुर कांग्रेस में भी वे फरारी की हालत में ही गये थे। 1942 में रामगढ़ कांग्रेस में भी वे पहुंचे थे। कामरेड भारद्वाज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में कम्युनिस्ट साथियों के पथ प्रदर्शन का दायित्व निभा रहे थे। रामगढ़ कांग्रेस की विषय निर्वाचनी समिति में उन्होंने प्रस्तावित दस्तावेज पर अपना संशोधन भेजा था। निश्चित समय पर गुप्त रूप से चादर ओढ़े वे मंच पर गये थे और संशोधन पेश कर उस पर जम कर बोले थे। पुलिस की भरपूर चैकसी और नाकेबंदी को धता बता कर कामरेड भारद्वाज भाषण के बाद नौ दो ग्यारह हो गये थे। पुलिस उन्हें खोजती ही रह गई थी किन्तु उसके हाथ कुछ भी न लगा था।
सन 1931 की बात है। पूना की एक सभा में कामरेड भारद्वाज बोलना चाहते थे परन्तु सभापति उन्हें इजाजत देने को तैयार न थे क्योंकि वे अपने सीने पर हंसिया और हथोड़ा का बैज लगाये हुये थे। जनता उन्हें सुनने को तत्पर थी। यह भांप कर वे अचानक जबरन मंच पर चढ़कर अध्यक्षत की इजाजत के बगैर धुआंधार भाषण करने लगे थे। तालियों की गड़गड़ाहट में भयभीत होकर सभापति मंच छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था। ऐसे थे क्रान्तिकारी और जुझारू तरूण कामरेड भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज एक सुन्दर वक्ता थे। 1930 में प्रयाग विश्वविद्यालय में भाषणकला में गोल्ड मेडल उन्हें ही मिला था। छात्र जीवन के दौरान भाषण प्रतियोगिताओं में उन्हें समय-समय पर अनेक पुरस्कार मिलते रहे थे। फरारी के जीवन में भाषण कला से तो काम चलता नहीं। उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता को माक्र्सवादी तरूणों की शिक्षा में बड़ी सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। वे बहुत ही अच्छे पार्टी शिक्षक थे। उनकी इस क्षमता का उपयोग देवली जेल में नजरबंद साथियों ने भली प्रकार किया था।
उनके अन्दर मात्र सैद्धान्तिक विश्वलेषण की गहरी क्षमता ही नहीं थी वरन वे साथ ही साथ व्यवहारिक विश्लेषण में भी पारंगत थे। कानपुर का मजदूर आन्दोलन उस समय में इतना शक्तिशाली बना था उसमें यदि कामरेड मौलाना संत सिंह यूसुफ के काम और परिश्रम का बड़ा हाथ था तो कामरेड भारद्वाज की बुद्धि का भी इसमें सबसे ज्यादा योगदान था।
रामगढ़ कांग्रेस में पुलिस की चकमा देकर फरार होने के बाद पुलिस करीब सवा लाल के बाद जनवरी 1941 में ही उन्हें गिरफ्तार कर सकी। कानपुर, आगरा आदि की जेलों में कुछ समय उन्हें रखने के बाद उन्हे देवली कैम्प जेल में भेज दिया गया था। दिन रात बरसों तक पार्टी कार्यों से जूझते रहने और फरारी जीवन और जेल की कठिनाईयों के उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था फिर भी पार्टी कार्य और संगठन निर्माण को दृष्टि में रखकर जेल में साथियों का पार्टी क्लास लेना उनकी जिम्मेदारी थी। बीमारी के दौरान भी वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे।
जेल के बन्दियों के कष्टों और परेशानियों के खिलाफ देवली कैम्प जेल में जो संघर्ष भूख हड़ताल के रूप में चलाया गया था, उसके नेतृत्व का भार कामरेड भारद्वाज के ऊपर ही था। कम्युनिस्ट पार्टी के कानूनी करार दे दिये जाने के बाद जब काफी बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट जेलों से रिहा कर दिये गये तब भी कामरेड भारद्वाज को नहीं छोड़ागया। डाक्टरों की इस घोषणा के बाद भी कि उन पर टी.बी. का भारी आक्रमण है, उन्हें सुल्तानपुर जेल में ले जाकर बन्द कर दिया गया। कुछ समय बाद यह समझ कर कि वे अब मौत के मुंह में जा रहे है, केवल तभी, बेबसी में 24 जनवरी 1943 को उन्हें जेल से रिहा किया गया।
कामरेड भारद्वाज जेल से बाहर तो आ गये थे किन्तु टी.बी. की गंभीर बीमारी उन्हें मौत के मुंह में ढकेलने के लिए अमादा थी। पार्टी के लिये उनका जीवन अमूल्य था। उन्हें कुछ समय के बाद ही भुवाली सेनीटोरियम में भेज दिया गया। वहां रह कर उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार तो हुआ किन्तु मौत का खतरा निरन्तर उनका पीछा करता रहा। फिर भी वे अपनी रही सही क्षमता और शक्ति पार्टी कार्य तथा जनता के आन्दोलनों को समर्पित करते रहे। इसी स्थिति में उनके अगले पांच साल बीमारी के दौरान भी आंधी तूफानों के बीच गुजरे।
उत्तर प्रदेश में उन दिनों इसके विभिन्न स्थानों को केन्द्र बना कर अनेक कम्युनिस्ट नेताओं के अलग-अलग ग्रुप काम कर रहे थे। प्रांतीय स्तर का कोई सांगठनिक ढांचा बनना अभी शेष था। यह स्थिति 1933 से 1937 तक चलती रही। इस दौरान इन अलग-अलग ग्रुपों के कामों में समन्वय स्थापित कर पार्टी के केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में कामरेड भारद्वाज इनका नेतृत्व और पथ प्रदर्शन करते रहे थे। उन्होंने कामरेड पी.सी.जोशी ओर कामरेड अजय घोष आदि के साथ मिल कर सन 1938 में पार्टी का एक राज्य स्तरीय सम्मेलन गुप्त रूप से लखनऊ में करया और पहली बार एक प्रांतीय कमेटी का निर्माण किया जिसके प्रांतीय मंत्री कामरेड अर्जुन अरोड़ा बनाये गये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण की प्रारम्भिक प्रक्रिया और इसका इतिहास कामरेड भारद्वाज की अप्रतिम कुरबानियों की लाल स्याही से लिखा गया है। वे ही इसके संस्थापक और निर्माता थे।
देश को राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त हो जाने और केन्द्र एवं राज्यों में कांग्रेस सरकारें बन जाने के बाद भी कामरेड भारद्वाज के संघर्षमय जीवन में कोई फर्क नहीं आया। मजदूरों-किसानों के संघर्षों और सरकारी दमन चक्र ने उनका दामन नहीं छोड़ा। 4 अप्रैल 1948 को 104 डिग्री बुखार की हालत में गिरफ्तार कर उन्हें देहरादून की जेल में डाल दिया गया जहां चार दिन के बाद ही 8 अप्रैल 1948 को उनका दुःखद निधन हो गया।
इस प्रकार चालीस वर्ष से भी कम आयु में ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता की हैसियत में राष्ट्रीय स्वाधीनता एवं समाजवाद के संघर्ष में जनता का नेतृत्व करते हुए अनुकरणीय बलिदान की मिसाल बन कर हमारे बीच से चले गये। वे शहीद हो गये।
देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर आन्दोलन के निर्माण तथा विकास पर सरसरी नजर डालने पर भी - खास तौर पर उत्तर प्रदेश में कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का माक्र्सीय बौद्विकता और क्रान्तिकारी कार्यकलाप से तराश गया गंभीर तथा मुस्कराता हुआ मोहक चेहरा हमारी स्मृतियों के बीच प्रेरक झांकी के रूप में उभर आता है।
कामरेड भारद्वाज की मौत पार्टी के लिए ऐसी शहादत है जो उसकी नींव पत्थर बनी हुई है।
(कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज के जीवन और कृतित्व से संबंधित तथ्य महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित ‘नये भारत के नये नेता’ नामक पुस्तक से साभार लिये गये हैं।)
का. जगदीश नारायण त्रिपाठी
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
मंगलवार, 7 अप्रैल 2026
चुनावों के बीच संसद सत्र बुलाया जाना सरकार की मंशा संदिग्ध और लोकतांत्रिक रुप से अनुचित है - डी राजा
चुनावों के बीच संसद सत्र बुलाया जाना सरकार की मंशा संदिग्ध और लोकतांत्रिक रुप से अनुचित है - डी राजा
प्रस्तावित संसद सत्र के समय को तय करने में केंद्र सरकार की अनावश्यक जल्दबाजी राजनीतिक रूप से संदिग्ध और लोकतांत्रिक रूप से अनुचित है। संसद को 16-18 अप्रैल के बीच बुलाया जा रहा है, जबकि तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है; इसका मतलब है कि इन राज्यों के सांसद चुनाव प्रचार में पूरी तरह व्यस्त होंगे। प्रधानमंत्री मोदी को इसका जवाब देना चाहिए: इतनी जल्दबाजी क्यों? महिलाओं के लिए आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करने की मांग को पहले क्यों नज़रअंदाज़ किया गया? यदि इसका कार्यान्वयन 2029 में ही होना है, तो 4 मई के बाद—जब चुनाव परिणाम आ चुके होंगे—संसद बुलाने में क्या बाधा है? यह समय-निर्धारण कोई संयोग नहीं है; यह केवल लोकतांत्रिक मानदंडों को दरकिनार करते हुए चुनावी समीकरणों को साधने के लिए किया गया है।
साथ ही, लोकसभा सीटों में राज्य-वार एक समान 50% की वृद्धि देखने में तो निष्पक्ष लग सकती है, लेकिन इसका परिणाम संरचनात्मक रूप से असंतुलित होता है: पांच दक्षिणी राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाती हैं, जबकि सात बड़े उत्तरी राज्यों की सीटें 203 से बढ़कर 306 हो जाती हैं—जिससे 816 सदस्यों वाले सदन में वे बहुमत के तीन-चौथाई के आंकड़े के बेहद करीब पहुँच जाते हैं। यह स्थिति सत्ता तक पहुँचने के मार्ग को कुछ ही राज्यों तक सीमित कर देती है, और उन राज्यों को दंडित करती है जिन्होंने जनसंख्या स्थिरीकरण और बेहतर सामाजिक संकेतकों के क्षेत्र में सफलता हासिल की है; वहीं, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे छोटे राज्यों को यह और भी अधिक हाशिए पर धकेल देती है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दृष्टिकोण से, यह तथाकथित "एकसमान" विस्तार में निहित पक्षपात को उजागर करता है। सुधारात्मक सिद्धांतों के अभाव में, ऐसा कोई भी कदम संघीय संतुलन को कमज़ोर करता है और ऐसी सरकारों के गठन का मार्ग प्रशस्त करता है जिनका क्षेत्रीय आधार अत्यंत सीमित होता है—जिससे एक विशेष क्षेत्र-केंद्रित वर्चस्व और भी अधिक मज़बूत होता है। परिसीमन को केवल एक गणितीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसमें समता, विविधता और एक संतुलित संघ की संवैधानिक परिकल्पना की झलक अवश्य मिलनी चाहिए। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को जल्दबाजी और भाजपा के एकांगी एजेंडे के माध्यम से मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता। परिसीमन की प्रक्रिया न्यायसंगत और परामर्श-आधारित होनी चाहिए, जो संघीय संतुलन की रक्षा करे—न कि उसे कमज़ोर करे।
कामरेड चतुरानन मिश्रा को लाल सलाम
कामरेड चतुरानन मिश्रा को लाल सलाम
कामरेड चतुरानन मिश्र की जयंती पर, हम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक कद्दावर नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सांसद और मज़दूरों व किसानों के अथक पैरोकार को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
7 अप्रैल 1925 को बिहार में जन्मे, उन्होंने 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' में हिस्सा लिया और भारत की आज़ादी के लिए जेल की सज़ा व दमन का सामना किया।
कामरेड मिश्र भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विकास के प्रमुख शिल्पकारों में से एक बने; उन्होंने केंद्रीय सचिवालय के सदस्य और एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए, पूरे देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन को मज़बूत किया।
उनकी संसदीय यात्रा जनता के गहरे विश्वास को दर्शाती है। वे 1984 और 1990 में राज्यसभा के लिए चुने गए, और बाद में 1996 में मधुबनी से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, जहाँ उन्होंने लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों पर मेहनतकश लोगों की आवाज़ को बुलंद किया।
1996 से 1998 तक केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में, और साथ ही खाद्य, नागरिक आपूर्ति व संबंधित विभागों को संभालते हुए, उन्होंने किसानों के कल्याण के प्रति पूरी निष्ठा से काम किया; वे किसानों को संकट से बचाने के लिए एक व्यापक फसल बीमा योजना के विचार के पीछे की प्रमुख शक्ति थे।
कामरेड चतुरानन मिश्र का जीवन वैचारिक स्पष्टता, जन-संपर्क और शोषितों के प्रति अटूट समर्पण का एक सशक्त उदाहरण है। उनकी विरासत सामाजिक न्याय, मज़दूरों के अधिकारों और एक अधिक समतावादी भारत के संघर्ष में आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
सोमवार, 6 अप्रैल 2026
, जे एन यू पर हमला सार्वजनिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की साजिश - डी राजा
, सार्वजनिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की साजिश - डी राजा
जे एन यू पर किया गया यह हमला, सार्वजनिक संस्थाओं को कमज़ोर करने की साजिश - डी राजा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव डी. राजा ने, माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य और सांसद अमरा राम के साथ मिलकर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थिति पर हुई सार्वजनिक जाँच की 'अंतिम रिपोर्ट' जारी की। यह एक विस्तृत दस्तावेज़ है जिसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन ने शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों को शामिल करते हुए एक गहन और सहभागी जाँच के बाद तैयार किया है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सैयद अख्तर हुसैन, सचिव अविनाश कुमार, कोषाध्यक्ष काली चिट्टी बाबू और अकादमिक समुदाय के सदस्यों की उपस्थिति में, इस सत्र का संचालन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अजय गुडावर्ती ने किया। जाने-माने बुद्धिजीवी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन की सार्वजनिक जाँच सुनवाई जूरी के सदस्य एस.एन. साहू भी इस अवसर पर उपस्थित थे और उन्होंने रिपोर्ट के निष्कर्षों को पढ़कर सुनाया। यह रिपोर्ट एक गहरे और बिगड़ते संकट को उजागर करती है, जिसमें लगातार हो रही फंड कटौती, जर्जर होते बुनियादी ढाँचे और जाति तथा लिंग के आधार पर भेदभाव के व्यवस्थित रूप से बढ़ने की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
रिपोर्ट के निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि एक जानबूझकर अपनाई गई राजनीतिक दिशा है, जो सार्वजनिक शिक्षा के प्रति भाजपा की शत्रुतापूर्ण सोच से प्रेरित है। नियुक्तियों और पदोन्नतियों में देरी, मनमाने हस्तक्षेप और बहिष्कार की नीतियों के ज़रिए, आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने के लिए संस्थागत प्रक्रियाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है। जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों को उनके लोकतांत्रिक और समावेशी स्वरूप से दूर धकेला जा रहा है।
जे एन यू पर किया गया यह हमला, सार्वजनिक संस्थाओं को कमज़ोर करने और आलोचनात्मक चिंतन के लिए उपलब्ध मंचों को सीमित करने के एक व्यापक प्रयास को दर्शाता है। यह रिपोर्ट जहाँ एक ओर इस हमले को बेनकाब करती है, वहीं दूसरी ओर यह सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा करने और उसके लोकतांत्रिक आधारों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रतिरोध का आह्वान भी करती है।
रविवार, 5 अप्रैल 2026
करणी सेना फेल क्षत्रिय सेना चुप काली सेना भागी - क्षत्रिय अभिषेक सिंह का आप्रेशन लंगड़ा के तहत एंकाऊटर
करणी सेना फेल क्षत्रिय सेना चुप काली सेना भागी - क्षत्रिय अभिषेक सिंह का आप्रेशन लंगड़ा के तहत एंकाऊटर
आजमगढ़ में 28 मार्च को अभिषेक सिंह को मुठभेड़ में गोली मारने की घटना पर परिजनों ने इसे 'फर्जी एनकाउंटर' बताया है।
पुलिस पर घर से उठाकर गोली मारने और सबूत मिटाने का आरोप।
SIT जांच और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की।
जनपद के जीयनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत चकलाल चंद गांव में पुलिस की कार्रवाई को लेकर हड़कंप मचा हुआ है। बीते 28 मार्च को SOG और पुलिस टीम द्वारा अभिषेक सिंह नामक युवक को मुठभेड़ में गोली मारने की घटना ने अब तूल पकड़ लिया है। परिजनों ने इसे 'फर्जी एनकाउंटर' करार देते हुए पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
परिजनों के अनुसार, शनिवार को दिनदहाड़े SOG की टीम चकलाल चंद स्थित उनके घर में घुसी और अभिषेक सिंह को जबरन उठाकर ले गई। आरोप है कि शहर कोतवाली पुलिस ने बाद में इस घटना को पुलिस पर फायरिंग का रूप दिया और आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई दिखाते हुए अभिषेक के बाएं पैर में गोली मार दी। परिजनों ने दावा किया कि अभिषेक को घर से उठाया गया था, जबकि पुलिस इसे मुठभेड़ बता रही है।
शनिवार, 4 अप्रैल 2026
अमरीका और ईरान युद्ध का सटीक विश्लेषण
खाड़ी में चल रहे युद्ध से जुड़े ताज़ा घटनाक्रमों का सारांश दिया गया है। यह सारांश सोशल मीडिया (X) के विश्लेषण और अन्य खुले स्रोतों पर आधारित है, और 02 अप्रैल 2026 तक की जानकारी को समेटे हुए है। हालाँकि, सारी जानकारी की पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के सारांश के तौर पर यह आपके लिए दिलचस्प हो सकता है।
*राजनीतिक और कूटनीतिक घटनाक्रम*
□ राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्र के नाम अपने टेलीविज़न संबोधन में कहा कि युद्ध अभी "दो से तीन हफ़्ते" और चलेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई समझौता नहीं हुआ, तो ईरान के बिजली संयंत्रों पर हमले किए जाएँगे; साथ ही उन्होंने घोषणा की कि युद्ध के मुख्य रणनीतिक उद्देश्य "पूरे होने के करीब" हैं।
□ ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने अल जज़ीरा को पुष्टि की कि अमेरिका के साथ "सीधे तौर पर या इस क्षेत्र में मौजूद दोस्तों के माध्यम से" संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसे बातचीत नहीं माना जाना चाहिए; ईरान ने अभी तक कोई जवाबी प्रस्ताव नहीं दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की कई खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि ईरान फिलहाल किसी ठोस बातचीत में शामिल होने का इच्छुक नहीं है।
□ खबरों के मुताबिक, अमेरिका के उपराष्ट्रपति वैंस इस संघर्ष को लेकर मध्यस्थों के संपर्क में हैं। उन्होंने गुप्त माध्यमों (बैकचैनल्स) से ईरान को निजी तौर पर यह संदेश भिजवाया है कि यदि कुछ माँगें पूरी कर दी जाती हैं—जिनमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of of Hormuz) को फिर से खोलना शामिल है—तो ट्रंप युद्धविराम के लिए तैयार हैं। वैंस ने ट्रंप के सब्र खोने और ईरान के बुनियादी ढाँचे पर दबाव बढ़ाने के जोखिम के बारे में एक "कड़ा" संदेश दिया।
□ चीन और पाकिस्तान ने मिलकर पाँच सूत्री शांति पहल पेश की है: शत्रुता को तत्काल समाप्त करना, शांति वार्ता शुरू करना, गैर-सैन्य लक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखना, और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करना। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका को अपना पूर्ण समर्थन दिया।
□ ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन ने अमेरिकी जनता के नाम एक खुला पत्र जारी किया है। इस पत्र में उन्होंने अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाइयों को "आक्रामकता" करार दिया है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि युद्ध को समाप्त करने के लिए ईरान के पास "आवश्यक इच्छाशक्ति" मौजूद है, लेकिन उसे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने की गारंटी चाहिए। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि ऊर्जा और औद्योगिक बुनियादी ढाँचे पर किए जाने वाले हमले "सीधे तौर पर ईरानी जनता को निशाना बनाते हैं।"
□ ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कहा कि युद्ध के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़ी व्यवस्थाओं का निर्धारण ईरान और ओमान—जो कि इस जलडमरूमध्य के तटीय देश हैं—मिलकर करेंगे। खबरों के अनुसार, ईरान और ओमान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होने वाले "परिवहन की निगरानी" के लिए एक प्रोटोकॉल का मसौदा तैयार कर रहे हैं। □ फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को "आज़ाद कराने" के लिए कोई भी सैन्य अभियान "अवास्तविक" होगा; उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि युद्ध में जाने का फ़ैसला केवल अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर किया था, और वे होर्मुज के लिए युद्ध के बाद समुद्री सुरक्षा सहयोग की संभावनाएँ तलाशने जापान जा रहे हैं।
□ जर्मनी ने चीन से आग्रह किया कि वह ईरान को बातचीत के ज़रिए समाधान की ओर ले जाने में मदद करे। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ फ़ोन पर बातचीत के बाद, EU की विदेश नीति प्रमुख कैलास ने "समुद्र के क़ानून के अनुरूप, जलडमरूमध्य में बिना किसी शुल्क के नौवहन की स्वतंत्रता" को एक तत्काल प्राथमिकता बताया।
□ UK ने भारत और 34 अन्य देशों को होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाज़रानी की सुरक्षा पर होने वाली एक बहुपक्षीय चर्चा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया।
□ राष्ट्रपति पुतिन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 2 अप्रैल को फ़ोन पर बातचीत की; इस दौरान दोनों पक्षों ने इस क्षेत्र में स्थायी समाधान की दिशा में कूटनीतिक प्रयासों को तेज़ करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
□ अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वे युद्ध समाप्त करने को तैयार हैं, भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य काफ़ी हद तक बंद ही क्यों न रहे—यह अमेरिका की पिछली "अधिकतमवादी" (maximalist) मांगों से एक संभावित बदलाव का संकेत है। अमेरिकी रक्षा सचिव हेगसेथ ने भी अलग से यह संकेत दिया कि होर्मुज को फिर से खोलना अमेरिका का कोई प्राथमिक सैन्य उद्देश्य नहीं है।
□ CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ जनरल रैंडी जॉर्ज को पीट हेगसेथ ने तत्काल सेवानिवृत्त होने का आदेश दिया है। सेना प्रमुख के संबंध में लिया गया यह अचानक फ़ैसला, युद्ध में ज़मीनी सैनिकों की तैनाती के लिए पेंटागन द्वारा बनाई जा रही योजनाओं के संदर्भ में काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
*ईरान की आंतरिक स्थिति और रणनीतिक रुख़*
□ रिपोर्टों के अनुसार, IRGC के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने नए खुफिया मंत्री के पद के लिए राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन द्वारा प्रस्तावित सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दिया है; सूत्रों का कहना है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों को देखते हुए, IRGC ने सभी महत्वपूर्ण नेतृत्व पदों पर सीधे तौर पर अपने ही लोगों को चुनने पर ज़ोर दिया है।
□ ईरान की संसद के अध्यक्ष ग़ालिबफ़ ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि हमला करने वाली अमेरिकी ज़मीनी सेनाओं पर "घात लगाकर हमला" (ambush) किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि 70 लाख ईरानी नागरिक युद्ध लड़ने के लिए तैयार हैं और उन्होंने किसी भी तरह के आत्मसमर्पण की संभावना को सिरे से ख़ारिज कर दिया।
□ ईरान की संसद में कट्टरपंथियों का एक बढ़ता हुआ समूह कथित तौर पर परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर निकलने की मांग कर रहा है; इसी बीच, IRGC की कुद्स फ़ोर्स के प्रमुख इस्माइल क़ानी कई हफ़्तों की चुप्पी के बाद एक बार फिर सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। □ ईरान ने मेटा, Apple, Microsoft, Boeing, Google, Nvidia और अन्य जैसी जानी-मानी अमेरिकी टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल कंपनियों के कर्मचारियों को चेतावनी दी है कि वे इस क्षेत्र को छोड़ दें; यह चेतावनी अमेरिका से जुड़ी सूचना, संचार और AI कंपनियों पर संभावित हमलों से पहले दी गई है।
□ ईरान में इंटरनेट बंद हुए अब लगातार 33 दिन (790 घंटे) हो गए हैं, और ज़्यादातर यूज़र्स के लिए नेशनल कनेक्टिविटी लगभग शून्य है; केवल 'व्हाइटलिस्टेड' अकाउंट और घरेलू सेवाएं ही काम कर रही हैं।
□ राष्ट्रपति पेज़ेशकियन द्वारा एक नया इंटेलिजेंस मंत्री नियुक्त करने के प्रयास कथित तौर पर IRGC प्रमुख वाहिदी के सीधे दबाव के कारण विफल हो गए, जिससे वहां चल रहे तनाव का पता चलता है।
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□ यूक्रेन ने होर्मुज़ में ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी को तोड़ने में अपनी विशेषज्ञता देने की पेशकश की है। इसके लिए वह काला सागर में अपने अनुभव का इस्तेमाल करेगा, जिसमें नौसैनिक ड्रोन, तटीय तोपखाने और समन्वित हवाई-नौसैनिक अभियानों का उपयोग शामिल है।
□ पाकिस्तान अपने झंडे के तहत वाणिज्यिक माल को अनुमति देने पर विचार कर रहा है। यह कदम ईरान के उस समझौते के बाद उठाया जा रहा है, जिसके तहत ईरान ने इस जलडमरूमध्य से पाकिस्तान के झंडे वाले 20 जहाज़ों तक को गुज़रने की अनुमति दी है।
□ बताया जा रहा है कि फ्रांस ने बहरीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने में मदद की है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए संभावित रूप से बल प्रयोग को अधिकृत करना है।
*तेल, गैस, कमोडिटीज़ और बाज़ार*
□ UNCTAD की एक ताज़ा रिपोर्ट में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को "व्यावहारिक रूप से बंद" बताया गया है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक व्यापार में वृद्धि 2025 में लगभग 4.7% से घटकर 2026 में 1.5–2.5% तक रह जाएगी।
□ ट्रंप के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद अमेरिकी तेल की कीमतें 103 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गईं।
□ चीन की घरेलू एयरलाइनों ने ईंधन अधिभार (fuel surcharges) बढ़ा दिए हैं; मलेशिया ने ईंधन संकट के बीच सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने का निर्देश दिया है; पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने पिछले तीन हफ़्तों में दी गई 129 अरब रुपये की तेल सब्सिडी का ज़िक्र किया।
□ ईरान ने चेतावनी दी है कि वह फ़ुजैरा पर हमला कर सकता है। फ़ुजैरा UAE के ओमान की खाड़ी में स्थित तेल निर्यात टर्मिनल है, जहाँ एक समर्पित पाइपलाइन के ज़रिए प्रतिदिन 1.8 मिलियन बैरल तेल का प्रबंधन किया जाता है। ईरान ने इस हमले को विशुद्ध रूप से सैन्य नहीं, बल्कि एक आर्थिक ख़तरा बताया है।
*व्यापक क्षेत्रीय गतिविधियाँ और वैश्विक जुड़ाव*
□ हिज़्बुल्लाह ने दावा किया है कि 31 मार्च से 1 अप्रैल के बीच उसने उत्तरी इज़राइली समुदायों और IDF के ठिकानों पर 71 हमले किए। इन हमलों में रॉकेट और, अब तेज़ी से, ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।
□ IDF ने IRGC कुद्स फ़ोर्स के लेबनान कोर के इंजीनियरिंग प्रमुख को मार गिराया। यह अधिकारी लेबनान और सीरिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिगत सुविधाओं का प्रभारी था।
□ 1 अप्रैल को हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी इज़राइल को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। 28 मार्च को इस संघर्ष में शामिल होने के बाद से इज़राइल पर यह उनका चौथा हमला था।
□ 2 अप्रैल को, बताया गया कि UAE की हवाई सुरक्षा प्रणाली ने ईरान से दागी गई 19 बैलिस्टिक मिसाइलों और 26 ड्रोन को रोका। संघर्ष की शुरुआत से अब तक बहरीन ने कुल मिलाकर 188 मिसाइलों और 429 ड्रोन को इंटरसेप्ट किया है। □ आठ मुस्लिम-बहुल देशों (सऊदी अरब, तुर्की, UAE, जॉर्डन, मिस्र, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर) ने मिलकर रमज़ान के दौरान अल-अक्सा मस्जिद और पाम संडे पर चर्च ऑफ़ द होली सेपल्चर में प्रवेश पर इज़राइली प्रतिबंधों की निंदा की, और इन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन बताया।
□ एक सूत्र-आधारित रिपोर्ट के अनुसार, चीन कथित तौर पर संघर्ष शुरू होने के लगभग 10–14 दिनों बाद से ही ईरान के साथ अमेरिकी सैनिकों और उपकरणों के ठिकानों के बारे में भू-स्थानिक खुफिया जानकारी साझा कर रहा है; व्हाइट हाउस ने कहा कि इससे अभियान की सफलता पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।
□ NATO के कई यूरोपीय सदस्यों - स्पेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, पोलैंड, बेल्जियम, हंगरी, स्लोवाकिया - ने ईरान से जुड़े अभियानों के लिए अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र या सैन्य ठिकानों तक पहुँच देने से इनकार कर दिया। सेक्रेटरी रूबियो ने चेतावनी दी कि अमेरिका को NATO के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है; रक्षा सचिव हेगसेथ ने सामूहिक रक्षा के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता की पुष्टि करने से इनकार कर दिया।
□ कथित तौर पर, UK के अधिकारियों को अब अपने अमेरिकी समकक्षों पर संवेदनशील खुफिया जानकारी के मामले में भरोसा नहीं रहा है, और UK सरकार के साथ काम कर रहे अमेरिकी कर्मियों से उन बैठकों से बाहर रहने को कहा गया है जिनमें संवेदनशील सामग्री पर चर्चा होती है; इसे सहयोगियों के प्रति अमेरिका की पिछली शत्रुता के जवाब में "जैसे को तैसा" वाली कार्रवाई बताया जा रहा है।
□ इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने कहा कि इटली फ़िलिस्तीनी नागरिकों की मौतों को लेकर इज़राइल के खिलाफ यूरोपीय प्रतिबंधों का समर्थन करेगा। कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी ने सार्वजनिक रूप से दक्षिणी लेबनान पर इज़राइल के कब्ज़े को अवैध घोषित कर दिया।
*भारत-विशिष्ट घटनाक्रम*
□ भारत के जहाज़रानी मंत्रालय के अनुसार, 485 नाविकों वाले 18 भारतीय जहाज़ अभी भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के अंदर या उसके आसपास मौजूद हैं; भारत ने आर्मेनिया और अज़रबैजान के रास्ते ईरान से लगभग 1,200 नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया है।
□ भारत के विदेश सचिव श्री विक्रम मिसरी ने होर्मुज़ की सुरक्षा पर UK द्वारा आयोजित 35-राष्ट्रों की बैठक में वर्चुअल माध्यम से भाग लिया; यह इस जलडमरूमध्य से होकर नौपरिवहन की स्वतंत्रता के मुद्दे पर भारत की सक्रिय भागीदारी का प्रतीक है।
□ प्रधानमंत्री मोदी ने 28 मार्च को सऊदी क्राउन प्रिंस MBS के साथ हुई बातचीत में, इस क्षेत्र में ऊर्जा-संबंधी बुनियादी ढाँचे पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की, और समुद्री मार्गों को स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित बनाए रखने के महत्व पर ज़ोर दिया।
□ इस संघर्ष के कारण आपूर्ति में आई बाधाओं के मद्देनज़र, भारत ने कुछ प्रमुख पेट्रोकेमिकल्स पर लगने वाले सीमा शुल्क (customs duty) को माफ कर दिया।
संक्षेप में कहें तो, लगातार जारी सैन्य अभियान और गहन कूटनीतिक गतिविधियाँ एक साथ चल रही हैं, जिससे विरोधाभासों से भरा एक भ्रमपूर्ण परिदृश्य उभरकर सामने आ रहा है। ट्रंप का राष्ट्र के नाम संबोधन, जिसमें उन्होंने अगले 2-3 हफ़्तों में ईरान को "पाषाण युग में वापस भेजने" की धमकी दी है, उनकी शेखी बघारने की एक बेशर्मी भरी मिसाल है; यह तब हो रहा है जब उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस द्वारा कथित तौर पर चल रही गुप्त बातचीत और पाकिस्तान व अन्य देशों की मदद से संदेशों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया अभी भी जारी है। ईरान युद्धविराम को मानने के बजाय, सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर शत्रुता को पूरी तरह से समाप्त करने और भविष्य के हमलों के खिलाफ गारंटी की मांग पर अड़ा हुआ है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही पर एक टोल प्रणाली के ज़रिए औपचारिक नियंत्रण रखने की तेहरान की ज़िद, एक सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है—जिसका मकसद अपने भू-रणनीतिक लाभ को युद्ध के बाद एक स्थायी सौदेबाज़ी की ताकत में बदलना है। यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों तक पहुँच देने से साफ़ इनकार, दोनों पक्षों के संबंधों में एक गंभीर तनाव का संकेत है।
अटलांटिक पार के संबंधों और NATO की एकजुटता में। मेरी राय में, वैश्विक (अ)व्यवस्था के भविष्य के लिए यह युद्ध का सबसे ज़्यादा असरदार राजनीतिक नतीजा हो सकता है। UK की मेज़बानी में हुए 35 देशों के होर्मुज़ संवाद में भारत की भागीदारी एक अहम घटना है, जो शायद क्षेत्रीय सुरक्षा की दिशा में बहुपक्षीय प्रयासों को आकार देने में ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाने के इरादे का संकेत देती है। कुल मिलाकर, पृष्ठभूमि में चल रही परोक्ष लड़ाई को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है, जबकि मंच पर मौजूद मुख्य पात्र अपनी आक्रामकता कम करने को तैयार नहीं हैं।
-योगेश
कांग्रेस वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुकी है-डी राजा '
'कांग्रेस वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुकी है'
केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार कई मोर्चों पर सफल रही है और लगातार तीसरी बार सत्ता में आएगी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा का कहना है; कांग्रेस पर 'बदनाम करने वाले अभियान और आरोप' लगाने का आरोप लगाते हुए, वह कहते हैं कि कांग्रेस को मुद्दों के आधार पर सरकार की आलोचना करनी चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा ने कांग्रेस पर दूरदर्शिता की कमी का आरोप लगाया है और पार्टी से आत्मनिरीक्षण करने को कहा है। केरल विधानसभा चुनाव के लिए मुन्नार में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के लिए प्रचार करते हुए,
आप मुन्नार में तमिल आबादी से तमिल में बात कर रहे हैं...
मैंने तिरुवनंतपुरम और पुनालुर में भी तमिल में प्रचार किया, क्योंकि लोग ऐसा ही चाहते थे। लोगों में बहुत स्नेह है और वे बेबुनियाद आरोपों के बजाय अपनी आजीविका और राज्य की प्रगति से जुड़े मुद्दों के बारे में सुनना चाहते हैं।
जहां एक ओर केरल में लेफ्ट सत्ता की निरंतरता चाहता है, वहीं उस पर भाजपा और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के साथ कथित तौर पर गुपचुप समझौता करने के आरोप भी लग रहे हैं।
ये सभी बेबुनियाद आरोप हैं। इतिहास को देखें तो, केरल ने 1957 में मतदान के ज़रिए दुनिया की
पहली कम्युनिस्ट सरकार चुनी थी। यहां के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि लेफ्ट आंदोलन किस बात का पक्षधर है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसका प्रतिनिधित्व करता है। कोई भी केरल के लोगों की राजनीतिक परिपक्वता और वैचारिक समझ को कम करके नहीं आंक सकता। लेफ्ट ही एकमात्र ऐसी ताकत है जो बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक, दोनों तरफ से आने वाली सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों से बिना किसी समझौते के लड़ती है। जब (कांग्रेस नेता) राहुल गांधी कहते हैं कि "लेफ्ट ने अपना 'लेफ्ट' चरित्र खो दिया है", तो उनका क्या मतलब होता है? क्या वह इसे समझा पाएंगे?
लोग राजनीतिक पार्टियों का मूल्यांकन उनके प्रदर्शन और केरल के भविष्य के लिए उनके राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर करेंगे। लोगों के मिजाज को देखते हुए, मेरा मानना है कि लेफ्ट फ्रंट लगातार तीसरी बार सत्ता में बनी रहेगी। वयस्क मताधिकार हमारे लोकतंत्र की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है, और लोग किसे वोट देते हैं, यह पूरी तरह से उन्हीं पर निर्भर करता है। हालाँकि, हमारा किसी भी सांप्रदायिक ताकत के साथ कोई वैचारिक या राजनीतिक समझौता नहीं है।
सिर्फ़ दो महीने पहले हुए स्थानीय निकाय चुनावों में लेफ्ट फ्रंट की करारी हार को देखते हुए, क्या आपको नहीं लगता कि सत्ता-विरोधी लहर काम कर रही है?
हाँ, कुछ झटके ज़रूर लगे थे, लेकिन लोग स्थानीय निकाय चुनावों में वोट देते समय कई बातों का ध्यान रखते हैं, जैसे कि स्थानीय प्रशासनिक मुद्दे और लोगों का आपसी बर्ताव। जिन मुद्दों का लोगों के कल्याण और राज्य के विकास पर दूरगामी असर पड़ता है, उन पर लोग समझदारी भरे और सोच-समझकर फ़ैसले लेते हैं। केरल अपनी सांप्रदायिक सद्भावना के लिए जाना जाता है; लोग यहाँ मिल-जुलकर रहते हैं और अपनी समस्याओं और चुनौतियों को आपस में बाँटते हैं। यही वजह है कि केरल के लोगों के लिए 'वामपंथी' मायने रखते हैं।
क्या वामपंथियों के लिए यह चिंता का विषय है कि भाजपा केरल की राजनीति में अपनी पैठ बना रही है?
बिल्कुल। हाल के दिनों में उसका वोट शेयर कुछ हद तक बढ़ा है और उसका प्रचार-प्रसार भी काफ़ी फैल गया है। प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के बड़े नेता अक्सर केरल आते रहते हैं, क्योंकि वे
वामपंथियों द्वारा शासित केरल को अपने लिए एक चुनौती के तौर पर देखते हैं। श्री मोदी की बॉडी लैंग्वेज से उनकी यह बेचैनी साफ़ झलकती है। वे केरल आते हैं और 'विकसित केरलम' की बात करते हैं। इससे पहले वे 'विकसित भारत' की बात किया करते थे। उसका क्या हुआ? क्या केरल 'विकसित भारत' का हिस्सा नहीं है? दक्षिण भारत में भाजपा की क्या स्थिति है? भाजपा के लिए यह चिंता का विषय है कि लोग उसे लगातार नकार रहे हैं। बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी जो जोड़-तोड़ करती है, वह यहाँ काम नहीं आती। दक्षिण भारत का अपना एक अलग इतिहास है, और भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि इस क्षेत्र में उसकी राजनीति सफल नहीं हो सकती।
नरेंद्र मोदी यहाँ आए थे और उन्होंने केरल के कर्ज़ का मुद्दा उठाया था। अब लोग—और मैं भी—यह पूछ रहे हैं: आज भारत का विदेशी कर्ज़ कितना है? इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? भारतीय रुपये की कीमत का क्या हुआ? इस स्थिति को देखकर श्री मोदी को शर्म आनी चाहिए। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री
थे, तब उन्होंने कहा था कि भारतीय रुपये की कीमत देश के सम्मान को दर्शाती है। अब वह सम्मान कहाँ गया? आपने राहुल गांधी की टिप्पणियों का ज़िक्र किया। क्या 10 साल तक सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस भी उतनी ही बेताब है?
हाँ, कांग्रेस और श्री गांधी बेताब हैं। लेकिन उन्हें कुछ गंभीर आत्म-मंथन करना चाहिए। बिहार चुनाव में महागठबंधन की हार की ज़िम्मेदारी कांग्रेस को लेनी चाहिए। सीटों का सही बँटवारा नहीं हुआ और न ही कोई संयुक्त प्रचार अभियान चलाया गया। हरियाणा में भी हालात कुछ अलग नहीं थे, और इसका दोष कांग्रेस को लेना चाहिए। कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन और राजनीतिक अक्षमता सबके सामने ज़ाहिर है। फिर भी, वह इस बात पर आत्म-मंथन करने से इनकार करती है कि हमारे जैसे लोकतंत्र में प्रभावी ढंग से काम कैसे किया जाए।
यही वजह है कि कांग्रेस बेताब हो गई है और इतने निचले स्तर तक गिर गई है, वह बदनामी भरे अभियान और आरोप-प्रत्यारोप का सहारा ले रही है।
तो, क्या इंडिया गठबंधन की असफलताओं के लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार है?
ठीक यही बात हम भी लगातार कह रहे हैं।
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