मंगलवार, 27 सितंबर 2022

मुल्क में रूसी तर्ज का इंक़लाब चाहते थे -सआदत हसन मंटो

-शकील सिद्दीकी यह तथ्य बहुत से पाठकों को अविश्वसनीय लग सकता है परन्तु है एक दम खांटी यथार्थ कि कुछ ख़ास तरह की कहानियों के लिए चर्चित उर्दू कथाकार सआदत हसन मंटो अपने बहुत प्यारे मुल्क यानी हिन्दुस्तान में रूसी तर्ज़ के इंक़लाब का स्वप्न देख रहे थे। निश्चित ही तब तक एक कथाकार की उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं हुई थी, हाँ कथाकार के अंक के नया कानून में मंगू कोचवान एक गोरे द्वारा उसे अपमानित किये जाने पर सघन बेचैनी व संक्रमण का दौर था। बामपंथी सोच तथा उससे उपजी राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियां अपनी उपस्थिति का लगातार सुबूत दे रही थीं। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू की शहादत से पैदा हुए व्यापक आक्रोश की चिंगारी का ताप अभी शेष था मुल्क के लाखों नौजवानों के समान मंटों ने भी इस शहादत और उनके क्रांतिकारी विचारों का बहुत असर लिया। उन्होंने अपने कमरे में भगत सिंह, का चित्र भी लगाया। महबूब के समान बम और पिस्तौल उन्हें अच्छे लगते थे। उनके एक जीवनीकार के शब्द हैं- ‘‘मंटों अपने इब्तिदाई दौर में बाग़ी थी, इंक़लाबी थे वह हाल (वर्तमान) से ग़ैर मुतमइन थे, एक दरख्शां (चमकीले)मुस्तक़बिल की आग उनके सीने में भड़क रही थी। वर्तमान से मुतमइन होने को वह जुमूद (ठहराव) और बेहिसी की निशानी समझते थे।’’ उनका क़ौल था कि वर्तमान से बग़़ावत करने से ही हम हालात का तख़्ता पलट कर एक पुरउम्मीद और बेहतर मुस्तकबिल की तवक्क़ो कर सकते हैं। अपनी एक कहानी ‘दीवाना शायर’ में वह एक इंक़लाबी की व्याख्या यों करते हैं- ‘‘इंक़लाबी वह है जो हर नाइंसाफी और हर ग़लती पर चिल्ला उठे। इंक़लाबी वह है जो ज़मीनों सब आसमानों सब ज़बानों सब वक़्तों का एक मुजस्सम गीत हो, इंक़लाबी समाज के क़साब खाने का एक मजदूर है, तुनूमन्द जो आहनी हथौड़े की चोट से ही अरज़ीजन्नत के दरवाज़े खोल सकता है’’ इंक़लाबी की व्याख्या भले एकदम खरी न हो फिर भी इससे उनके इंक़लाब के बारे में सोचने की दिशा और हालात से उनके उद्वेलनकारी आक्रोश का संकेत तो मिलता ही है। कहानी इंक़लाब पसंद जिसके वह स्वयं नायक हैं अपने को पागल समझे जाने की स्थिति का बिम्बयों उभारते हैं। ‘‘इसलिए कि मैं उन्हें ग़रीबों के नंगें बच्चे दिखला कर यह पूछता हूॅ कि इस बढ़ती हुई ग़ुरबत का क्या इलाज हो सकता है- वह मुझे कोई जवाब नहीं दे सकते इसलिए मुझे पागल तसव्वुर करते हैं.... वह मुझे पागल कहते हैं- वह जिनकी नब्ज़े हयात दूसरों के ख़ून की मर्हूने मिन्नत (निर्भर) है वह जिनका फ़िरदौस (स्वर्ग) ग़रीबों के जहन्नम की मांगी हुई ईंटों से इस्तवार किया गया है। वह जिनके साज़े इशरत के हर तार के साथ बेवाओं की आहें, यतीमों की उरियानी (नर्वस्त्रता) लावारिस बच्चों की सदा-ए-गिरिया (विलाप के स्वर) लिपटी हुई है- ....मैं पागल नहीं हूॅ- मुझे एक वकील समझो, बग़ैर किसी उम्मीद के जो उस चीज़ की वकालत कर रहा है, जो बिल्कुल गुम हो चुकी है....... इंसिानियत एक मुॅह है और मैं एक चीख’’ (कुल्लियाते मन्टो पृ0 47) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर अलीसरदार जाफ़री से मुलाक़ात होने पर उन्होंने उनसे अपना परिचय देते हुए कहा था ‘‘मैं भी एक इंक़लाबी हूॅ।’’ अली सरदार जाफ़री ने अपने संस्मरण में ख़ास ज़ोर इस बात पर दिया है कि मंटो ने न सिर्फ़ उन्हें आस्कर वाइल्ड और विक्टर ह्यूगो से परिचित कराया बल्कि भगत सिंह का एक आर्टिकिल भी पढ़ने को दिया। उस यूनीवर्सिटी में उन दिनों बामपंथियों का ख़ासा ज़ोर था वहॉ के बामपंथियों ने उनकी सोच पर अपने नक़्श भी छोड़े, क्षयरोग हो जाने के कारण ग्रेजुएशन की पढ़ाई वह पूरी नहीं कर पाये और कश्मीर होते हुए अमृतसर लौट आये। उनके सामाजिक उरियानी (नर्वस्त्रता) लावारिस बच्चों की सदा-ए-गिरिया (विलाप के स्वर) लिपटी हुई है- ....मैं पागल नहीं हूॅ- मुझे एक वकील समझो, बग़ैर किसी उम्मीद के जो उस चीज़ की वकालत कर रहा है, जो बिल्कुल गुम हो चुकी है....... इंसिानियत एक मुॅह है और मैं एक चीख’’ (कुल्लियाते मन्टो पृ0 47) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर अलीसरदार जाफ़री से मुलाक़ात होने पर उन्होंने उनसे अपना परिचय देते हुए कहा था ‘‘मैं भी एक इंक़लाबी हूॅ।’’ अली सरदार जाफ़री ने अपने संस्मरण में ख़ास ज़ोर इस बात पर दिया है कि मंटो ने न सिर्फ़ उन्हें आस्कर वाइल्ड और विक्टर ह्यूगो से परिचित कराया बल्कि भगत सिंह का एक आर्टिकिल भी पढ़ने को दिया। उस यूनीवर्सिटी में उन दिनों वामपंथियों का ख़ासा ज़ोर था वहॉ के वामपंथियों ने उनकी सोच पर अपने नक़्श भी छोड़े, क्षयरोग हो जाने के कारण ग्रेजुएशन की पढ़ाई वह पूरी नहीं कर पाये और कश्मीर होते हुए अमृतसर लौट आये। उनके सामाजिक दृष्टिकोण तथा अध्ययनशीलता को वहॉ एक उत्तेजक मोड़ अवश्य मिला, इस मोड़ को क्रांतिकारी आयाम दिया अलीगढ़ के ही एक पूर्व छात्र बारी अलीग ने जिनसे उनकी मुलाक़ात मशहूर शायर अख़्तर शीरानी के साथ अमृतसर में ही जीजे के चाय खाने में हुई थी। बारी अलीग पक्के कम्युनिस्ट तो थे ही समर्थ पत्रकार भी थे। विश्व साहित्य विशेष रूप से क्रांतिकारी साहित्य की उन्हें विशद जानकारी थी उन्हें। इससे पहले फैज़ उन्हें(मंटो को) दिशा तथा उनकी सोच व मानसिक उठान को देखते हुए उन्हें क्लास में न आने की छूट दे ही चुके थे। बारी अलीग ने मंटों में न केवल अनुवादक पत्रकार फिल्म समीक्षा इससे सम्बन्धित अन्य लेखन तथा बहुत हद तक कथाकार की दक्षता को भी विकसित किया।ं यही वजह है कि उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ अनुवाद से हुआ। स्वयं फैज़ ने उनसे चेख़व व गोर्की की कुछ कहानियों के अनुवाद करवाये थे। बारी अलीग की प्रेरणा से उन्होंने न केवल कई रूसी व फ्रांसीसी कृतियों के, बल्कि विक्टर ह्यूगो की प्रसिद्ध ‘‘लास्ट डेस ऑफ कन्डेम्ड’’ पुस्तक आस्कर वाइल्ड के नाटक ‘वीरा’ का भी अनुवाद किया। हसन अब्बास सहयोगी के रूप में उनके साथ थे। पुस्तक छपने पर अमृतसर की सड़कों-गलियों में बड़े-बड़े पोस्टर लगवाये गये। बड़े अक्षरों में उन पर लिखा हुआ था- मुस्तबिद (एकाधिकार वादी) और जाबिर हुक्मरानों का इबरतनाक अंजाम रूस के गली कूचों में सदा-ए-इंतिक़ाम ज़ारियत के ताबूत में अखि़री कील आज वह सब भले बहुत अर्थपूर्ण न लगता हो लेकिन एक ख़ास दौर तक रूसी इंक़लाब का प्रभाव बहुत व्यापक था, प्रगतिशील-बामपंथी विचारकों-लेखकों-कवियों ने इस प्रभाव को अप्रतिम विस्तार दिया था। मंटो की निम्न पंक्तियां उस प्रभाव का ही नतीजा हैं- ‘‘हमने अमृतसर को मास्को तसव्वुर कर लिया था और उसी के गली कूचों में मुस्तबिद और जाबिर हुक्मरानों का अंजाम देखना चाहते थे। कटरा जैमल सिंह, कर्मों ड्योढ़ी या चौक फरीद में ज़ारियत का ताबूत घसीट कर उसमें आखि़री कील ठोकना चाहते थे...... बारी साहब, इशतेराकी (साम्यवादी) अदीब बारी हमारे गुरू थे’’ (मंटो-गंजे फरिश्ते पृ0 86) ‘‘आज मैं जो कुछ भी हूॅ, उसको बनाने में सबसे पहला हाथ बारी साहब का है.......’’ (मंटोनामा-पृ0 43) संम्भव है बारी साहब से उन्होंने द्वन्दात्मक भौतिक वाद व वर्ग विभाजित समाज की विसंगतियों की भी सुन-गुन ली हो। जलियांवाला बाग़ के एक दरख़्त के नीचे बैठकर बम बनाने पिस्तौल जुटाने की जुगाड़ पर चर्चा करते हुए रूसी इंक़लाब को हिन्दुस्तान में घटित करने, समानता पर आधारित समाज के निर्माण का स्वप्न देखने, कामरेड, मुफक्किर व बाग़ी के छद्म नाम से लेखन करने तथा कार्लमार्क्स लेनिन मैक्सिम गोर्की रूसी क्रांति इत्यादि पर लेख लिखने के बावजूद किसी सामूहिक कार्यवाही की पहल में उनकी सक्रियता का उल्लेख मिलना अमृतसर के तत्कालीन हालात का संकेत तो है ही साथ ही इसमें व्यक्तिवाद के कुछ तत्व अवश्य थे। इससे यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि व्यक्तिवादी क्रांतिकारी या विद्रोही नहीं हो सकता या वह क्रांति के सपने नहीं देख सकता। ‘‘सोवियत रूस अब ख़्वाब नहीं ख़्यालेख़ाम नहीं, दीवानापन नहीं एक ठोस हक़ीक़त है। वह हक़ीक़त जो हिटलर के फौलादी इरादों से कई हज़ार मील लम्बे जंगी मैदानों में टकराई और जिसने फ़ॉसिस्ट आहन पोष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। वह इशतेराकियत (साम्यवाद) जो कभी सिर फिरे लौंडो का खेल समझ जाता था वही इशतेराकियत जो नंगे-दीन और नंगे-इंसानियत यकीन की जाती थी आज रूस के वसीओ अरीज़ (विराट) मैदानों में बीमारे इंसानियत के लिए उम्मीद की एक किरन बनकर चमक रही है-’’(मंटो-कार्लमार्क्स लेख में) बारी अलीग ने अमृतसर से साप्ताहिक पत्र जारी किया तो उसके सम्पादकीय विभाग मंे मंटो भी थे। उसके प्रवेशांक के मुख पृष्ठ पर बारी साहब का लम्बा लेख ‘‘हीगेल से मार्क्स तक’’ प्रकाशित हुआ था इसी अंक में उनकी पहली कहानी तमाशा भी प्रकाशित हुई। बारी अलीग का लेख मंटो के लिए बहुत काम की चीज़ साबित हुआ। यह हीगेल व मार्क्स के दर्शन की अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करने की ओर अग्रसर हुए। उस्ताद के तौर पर बारी साहब तो थे ही। हिन्दी और उर्दू प्रगतिशीलों की बड़ी जमात के बीच वह उन थोड़े प्रगतिशीलों में थे जिन्होंने प्रगतिशीलता के साथ मार्क्सवाद को जानने की कोशिश बराबर जारी रखी। पूंजीवाद की चोटों से वह स्वयं आहत थे। मार्क्सवाद को वह पूंजीवाद के ऐसे ठोस विकल्प के रूप में देख रहे थे, जिससे दुखी इंसानों की मुक्ति संभव है। किशोरावस्था से ही वह तीव्र ज़ेहनी कशमकश का शिकार रहे उम्र बढ़ने के साथ स्वीकार व निषेध की यह प्रक्रिया तेज तर होती गयी। उनका आत्म संघर्ष शदीद होता गया। तब भी शराब ख़ोरी और अभावों की तीव्रता के दौर को छोड़कर अन्तरविरोधों के पार जाने की कोशिशें कभी धूमिल नहीं हुईं। धन्ना सेठों भूपतियों तथा शोषक तबकेके खिलाफ उनका आक्रेश कभी शिथिल नहीं पड़ा ठीक उसी तरह जैसे वंचित वर्गों के प्रति उनकी सहानुभूति व स्त्री पक्ष धरता। उम्र के एक पड़ाव के बाद भले उन्होंने प्रगतिशलों कम्यूनिस्टों पर उपहासात्मक व्यंग्य किये हों उन्हें सुखऱ्ा या दो प्याज़ा कहा हो लेकिन उनके जीवन में ऐसा कोई क्षण नहीं आया जब पूंजीवाद से उनकी नफ़रत धूमिल होती महसूस हुई हो। जिसका सबसे बड़ा प्रमाण चचा साम के नाम लिखे गये उनके पत्र हैं जो प्रायः पाकिस्तान में लिखे गये और जो उनके जीवन के रीतते हुए वर्ष थे। इसी तरह एक बेहतर न्यायपूर्ण समाज का स्वप्न भी उनकी ऑखों में कभी नहीं धुंधलाया वह रूसी तर्ज़ की क्रांति इसी उद्देश्य को पाने के लिए संभव करना चाहते थे। पाकिस्तानी सरकार ने आखि़र उन पर कम्युनिस्ट होने के आरोप में ही प्रतिबन्ध लगाया था इसलिए उनका इंक़लाब पसंद या कम्युनिस्ट होना युवाकाल का वक़्ती जोश भर नहीं था। -मो0 9839123525

शनिवार, 24 सितंबर 2022

भाजपा सरकार - मंहगाई की सरकार - अतुल अंजान

खागा में कम्युनिस्ट पार्टी ने महंगाई पर सरकार को घेरा:24वां राज्य सम्मेलन पर खागा में निकाली रैली; 25 सितंबर तक चलेगा कार्यक्रम खागा तहसील के वृंदावन गेस्ट हाउस में शुक्रवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का 24वां राज्य सम्मेलन कार्यक्रम हुआ। सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने महंगाई के खिलाफ विशाल रैली निकाली। रैली ने कस्बे में भ्रमण किया। राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल कुमार अनजान' डा गिरीश अरविन्द राजस्वरुप व मोती लाल रैली की अगुवाई की। रैली किशनपुर रोड होते हुए वृंदावन गेस्ट हाउस पर समाप्त हुई।
इस दौरान कार्यकर्ताओं में भारी जोश देखने को मिला। यह सम्मेलन 23 सितंबर से शुरू होकर 25 सितंबर तक चलेगा। जिसमें खागा सहित प्रदेश के सभी जिलों से कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी भाग ले रहे हैं। सम्मेलन के प्रथम दिन जागरूकता नाटकों का भी आयोजन हुआ। जिसमें पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही ग्रामीणों की समस्याओं व सरकार विरोधी नाटकों का आयोजन किया। महंगाई को लेकर सरकार को घेरा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने भाजपा सरकार को महंगाई की सरकार कहा। उन्होंने कहा कि देश और प्रदेश में भाजपा सरकार है। किसान भी परेशान है। मजदूर भी परेशान है, व्यापारी भी परेशान है। नौजवान भी परेशान है। कानून व्यवस्था पूरी तरीके से ध्वस्त और चौपट है। इससे आम जनमानस दुखी है। देश की संपत्ति को लूट रही है भाजपा सरकार कामरेड अनजान ने कहा कि यह सम्मेलन ऐसे वक्त हो रहा है, जब देश और प्रदेश की सत्ता में एक ही सरकार है। ये सरकार महंगाई, बेरोजगारी और अशिक्षा से जनता का ध्यान भटकाने के लिए हिंदू मुसलमान का भेदभाव खड़ा करके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से नफरत की राजनीति कर रही है। देश की संपत्ति को औने पौने दामों में बेचा जा रहा है। श्रम कानूनों में बदलाव करके श्रमिकों से कम पैसे में 12 से 14 घंटे काम लेने का कानून बनाकर उनके अधिकारों को समाप्त कर दिया गया है। महिलाओं दलितों पर पार्टी ने की बात कहा कि महिलाओं, कमजोर वर्ग, दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की घटनाएं हो रही हैं। कोरोना काल से 84% लोगों की आय घटी है। जबकि पूंजीपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई है। ऐसे में उनकी पार्टी लगातार संघर्ष कर रही है। आम जनमानस के हितों की रक्षा को लेकर रोड से लेकर संसद तक गरीबों की आवाज उठा रही है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के 24वां राज्य सम्मेलन में खागा तहसील क्षेत्र के सैकड़ों पदाधिकारी पहुंचे। जिनमें पदाधिकारियों ने अपने अपने क्षेत्र से ट्रैक्टरों में बैठकर सम्मेलन तक पहुंचे। अपनी एकजुटता दिखाकर पार्टी की ताकत दिखाई है।

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

जाना होगा सर्वे के उस पार

- शकील सिद्दीकी उत्तर प्रदेश में ग़ैर मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे का अभियान ऐसे समय चलाया गया है जब अधिकांश मदरसों में तब्दीली की बयार बह रही है। गंभीर आर्थिक संकट, साधनों की कमी तथा कई प्रकार के आरोपों से घिरे होने के बावजूद वह थोड़ा संकोच से ही सही अपेक्षित बदलावों के लिए खिड़कियां और दरवाज़े खोल रहे हैं। पाठ्यक्रम में सामयिक विषयों को शामिल करने की कोशिशें जारी है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों की संख्या में मदरसों से शिक्षित बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छे परिणामों के कारण डाक्टर और इन्जीनियर बन पाये हैं। वह प्रशासनिक सेवाओं में भी गए हैं आई0टी0 सेक्टर में भी उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है। इनमें छात्राएं भी हैं फिर भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। साधनों का अभाव और शंकाओं का घेरा शैक्षणिक माहौल को प्रभावित कर रहा है। सकारात्मक सोच व रचनात्मक दृष्टिकोण पर आधारित सर्वे निश्चय ही हालात को बदल सकता है। आवश्यकता है सर्वे से प्राप्त निष्कर्षों पर ठोस त्वरित कार्यवाई करने की। सर्वे को पूर्व मदरसों के विरुद्ध वातावरण बनाने की कार्यवाइयों के कारण इस शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों का सशंकित होना स्वाभाविक है। धार्मिक (इस्लामी) शिक्षा का प्रसार मदरसों की स्थापना का प्रमुख कारण रहा है। विपरीतताओं के बावजूद मदरसों ने यह काम किया भी किया है। अनेक मदरसों की शैक्षणिक गुणवत्ता ने उनकी प्रतिष्ठा व ख्याति को दूर देशों तक पहुॅचाया। ऐसे मदरसों में अनेक विदेशी छात्र अध्ययन करते दिख जाएंगे। जैसे कि लखनऊ के नदवतुल उलेमा में। न तो मदरसे नए हैं, न उनमें प्रचलित पाठ्यक्रम में तब्दीली की चर्चा। बेगम रज़िया सुल्तान ने अपने शासनकाल में एक ऐसे मदरसे की स्थापना महरौली (दिल्ली) में की जिसमें लडकियां भी शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं। लम्बे कालांतर के उपरांत देश में ऐसे अनेक मदरसे कायम हुए जहॉ लड़कों के साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया गया, केवल लड़कियों की शिक्षा तक सीमित रहने वाले मदरसे भी कायम हुए। इनके अलग-अलग स्तर हैं। स्त्री छात्रावास की सुविधा वाले मदरसे भी स्थापित हुए। प्रचलित पाठ्यक्रम में तब्दीली, उन्हें समकालीअपेक्षाओंके अनुरूप अधिक व्यवहारिक व उपयोगी बनाने की चर्चा भी कई सौ वर्ष पुरानी है। बादशाह औरंगज़ेब ने बहुत तेरी बदनामी के बावजूद नाराज़गी का खतरा मोल लेते हुए फ़िरंगी महल, लखनऊ के मौलाना निज़ामुद्दीन को मदरसों के लिए एक सुसंगत, बच्चों को अधिक जिज्ञासु व सामर्थ्यवान बना सकने वाला पाठ्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी, मौलाना निज़ामुद्दीन के वालिद साहब औरंगज़ेब के उस्ताद रह चुके थे। बाराबंकी के कस्बा सुहाली में एक विवाद में उनकी हत्या हो गई थी। इस कारणवश बादशाह बहुत आहत हुए और उन्होंने उनके परिवार की न केवल आर्थिक मदद की बल्कि लखनऊ में सुरक्षित रहने के लिए उनके पुत्र को फिरंगी महल परिसर भी एलाट कर दिया जो पहले फ्रांसीसी अश्व व्यापारियों के क़ब्जे में था। मुल्ला निज़ामुद्दीन ने 1727 के आस-पास परिश्रमपूर्वक पाठ्यक्रम तैयार किया जो दर्से निज़ामी के नाम से जाना गया और व्यापकता में प्रशंसित हुआ तथा मुसलमानों के सभी सम्प्रदायों, विश्वासों को शिक्षविदों ने इसे स्वीकार किया। यहॉ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि मुल्ला निज़ामुद्दीन अरबी सुन्नी थे फिर भी शिया मदरसों ने भी उसे मान्यता दी। सन् 2000 में जब मैं विद्वान मुहम्मद मसूद को साथ लखनऊ के एक अति प्रसिद्ध शिया मदरसे में गया तो बताया गया कि पाठ्यक्रम के रूप में उनके यहॉ दर्से निज़ामी ही स्वीकृत है। दर्से निज़ामी की उल्लेखनीय विशेषता उसमें इस्लामी शिक्षा के साथ ‘‘उलूमे अक़लिया’’ (बौद्धिक ज्ञान) के लिए अधिक होशियार होना था। इस्लामी इतिहास कुरआन, हदीस, फ़िक के साथ ही अरबी-फ़ारसी भाषा, तर्क शास्त्र , दर्शन, चिकित्साशास्त्र, ज्योमिति, खगोलशास्त्र, हिसाब व ज़मीन की पैमाइश और इल्मेकलाम यानी बातचीत का तरीक़ा भी सिखाया-पढ़ाया जाता था। औरंगज़ेब क्योंकि स्वयं को दी गई और मुग़ल शहज़ादों को दी जाने वाली शिक्षा से संतुष्ट नहीं था, कारणवश बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए उसकी चिन्ता स्वाभाविक थी। मौलाना निज़ामुद्दीन ने लखनऊ में दर्से निजामी के आधार पर एक मदरसा, मदरसा ए निज़ामिया भी आरंभ किया। ख़ालिद रशीद के मुताबिक यह देश का पहला मदरसा था। ‘‘दर्से निज़ामी’’ 18वीं सदी के पूर्वाद्ध में निर्मित हुआ जब बौद्धिक बेचैनियों की 19वीं सदी की दस्तक का आभास होने लगा था। इस सदी का उत्तरार्द्ध आते-आते मुल्ला निज़ामुद्दीन के बनाये निसाब (पाठ्यक्रम) को लेकर सवाल उठने लगे। यह 1857 के बाद का समय था। 1890 के आस-पास दर्से निज़ामी के निसाब में वक़्त की ज़रूरतों के हिसाब से मुनासिब तरमीम के साथ एक नये दारुलउलूम (नदवतुल उलेमा) के कयाम की चर्चा जोर पकड़ने लगी। यही वह दौर था जब मुस्लिम बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने तथा मकतब-मदरसों में हिन्दी की तालीम के समर्थक मुखर हो रहे थे। सर सैयद अंग्रेज़ी के हिमायती थे तो शिबली नोमानी हिन्दी तालीम के पक्षधर मौलाना अबुल कलाम आजाद भी तब्दीली की में प्रस्तुत थे। 1857 के महाविद्रोह के दौरान और बाद में मुसलमानों के खिलाफ़ चले भयानक दमनचक्र के कारण पैदा हुई गहरी हताशा और अन्तर्रोन्म खता के दिनों में इस्लाम के ही मजबूत कवच होने की धारणा व्यापक होती गई। 1866 ई0 ख़ास दीनीउलूम की तालीम की ग़रज़ से कायम दारुलउलूम देवबन्द (संस्थापक मौलाना मुहम्मद क़ासिम) का प्रभाव इतना गहरा था कि उससे एकदम अलग राह इख़्तियार करना आसान नहीँ रह गया। औपनिवेशिक ग़ुलामी से मुक्ति के लिए अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ छिड़े जुझारू संघर्ष में वहॉ तथा अन्य संस्थानों के आलिमों -छात्रों, नौजवानों ने अप्रतिम के कुर्बानियां दी थीं। प्रतिवाद का विकल्प अंग्रेजों तथा उनसे जुड़ी तमाम चीजों से शदीद नफरत बहिष्कार तथा इस्लाम के प्रति उससे ज़्यादा शदीद अक़ीदत में देखा गया। बच्चों के लिए विशुद्ध इस्लामी शिक्षा इसी प्रतिवाद का एक रूप है। मस्जिदों में मकतब कायम हुए और मदरसे खोले गये। लखनऊ के ‘दारुलउलूम नदवतुलउलेमा’ (1894 ई0) ने इस्लाम के प्रति समर्पित रहते हुए इस शिद्दत को थोड़ा हल्का किया। फ़तेहपुर के मौलाना मर्गूब अली इसके प्रमुख संस्थापकों में थे। शैक्षणिक कट्टरवाद से परहेज़ करते हुए इसने इस्लामी शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक कारनामा अन्जाम दिया। कम्प्यूटर शिक्षण को भी बहुआयामी बनाया। यूनिवर्सिटी जैसा मदरसा नदवतुलउलेमा भी मान्यता प्राप्त नहीं है। उसने अपने संसाधनों का विकास अपने तरीके से किया। उसे अति समृद्ध ओर विशाल पुस्तकालय होने का गौरव भी प्राप्त है। ग़ैर मान्यताप्राप्त मदरसों में आमतौर पर कोई फीस नहीं ली जाती अथवा बहुत कम ली जाती है। निजी मदद समय से न मिल पाने तथा बन्दरबांट के कारण भी वह गंभीर आर्थिक संकट से घिरे रहते हैं। शिक्षक-शिक्षिकाओं को अपेक्षा से कम वह भी समय से वेतन न मिल पाना भी गंभीर समस्या के रूप में उपस्थित रहती हैं। यहॉ शिक्षिकाओं के साथ सर्वाधिक अन्याय होता है। मजबूरी में वह बहुत कम वेतन में पढ़ाने को तैयार हो जाती है उन्हें दूसरे काम भी करने पड़ते हैं। कम वेतन तथा अन्य सुविधाओं के अभाव में प्रशिक्षित टीचर्स इस प्रकार के मदरसों से दूर रहते हैं। सच्ची नीयत अथवा रचनात्मक सोच पर आधारित सर्वे मदरसे को इन समस्याओं से मुक्ति दिलाकर बेहतर शैक्षिक परिवेश के निर्माण में सहायक हो सकता है। आय के अपवित्र या अनुचित स्रोतों तक पहुॅच पाना भी संभव हो सकेगा। यदि वह है तो फीस न होने या कम होने, ड्रेस कोड की पाबन्दी से मुक्त होने के कारण भी ग्रामीण अंचलों व छोटे शहरों में मदरसे ग़रीब बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र बने । इसमें सन्देह नहीं होना चाहिए कि मदरसों ने देश की एक बड़ी ग़रीब आबादी के बच्चों को शिक्षित होने का मूल्यवान अवसर प्रदान किया है। इसे देश सेवा नहीं तो क्या मानेंगे। मदरसा शिक्षा की सर्वाधिक गंभीर व जटिल समस्या ‘‘पाठ्यक्रम में केन्द्रीयता’’ के न होने की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इलेक्ट्रानिक समाचार चैनल्स वालों का भी नहीं। पाठ्यक्रम तथा पाठ्य सामग्री के चयन में मनमानी के दर्शन किये जा सकते हैं । मुस्लिम बच्चों की कुल आबादी का तीन प्रतिशत मात्र मदरसों में शिक्षा प्राप्त कर रहा है। फिर भी उन्हें गंभीर ख़तरे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। मदरसों की सामाजिक भूमिका कम अवश्य हुई है परन्तु समाप्त नहीं हुई। -शकील सिद्दीक़ी मो0 9839123525

बुधवार, 7 सितंबर 2022

आओ सूरज का मातम करें

मशहूर हिंदी साहित्यकार राही की नजर से देखें नेहरू इसमें राही ने लिखा, ‘इन दिनों नेहरू को भला-बुरा कहने का चलन निकल पड़ा है। गृह मंत्री कहते हैं कि नेहरू ऐसे थे कि उनके हिंदुस्तानी होने पर शरमाना चाहिए। मेरी खाल जरा मोटी है। जब मैं इन गृह मंत्री के होने पर नहीं शरमाता, तो नेहरू के होने पर क्यों शर्माऊंगा? नेहरू का किस्सा यह है कि हम लोग या तो बुत बनाते हैं या फिर बुत तोड़ते हैं। मशहूर हिंदी साहित्यकार राही मासूम रजा का जन्म आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के गंगौली गांव में हुआ था। एक रोज सुबह-सुबह रजा अखबार पढ़ रहे थे। उसमें तत्कालीन जनता सरकार के गृहमंत्री का बयान छपा था। उसमें लिखा था, ‘नेहरू ऐसे थे कि उनके हिंदुस्तानी होने पर शरमाना चाहिए।’ यह पढ़कर राही गुस्से से उबल पड़े और फौरन ही अखबारों में एक वक्तव्य दे दिया। बाद में यह ‘नेहरू : एक प्रतिमा’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें राही ने लिखा, ‘इन दिनों नेहरू को भला-बुरा कहने का चलन निकल पड़ा है। गृह मंत्री कहते हैं कि नेहरू ऐसे थे कि उनके हिंदुस्तानी होने पर शरमाना चाहिए। मेरी खाल जरा मोटी है। जब मैं इन गृह मंत्री के होने पर नहीं शरमाता, तो नेहरू के होने पर क्यों शर्माऊंगा? नेहरू का किस्सा यह है कि हम लोग या तो बुत बनाते हैं या फिर बुत तोड़ते हैं। मैं नेहरू के बुत की पूजा नहीं करता, मगर मैं महमूद गजनवी भी नहीं हूं, इसलिए मैं उनका बुत तोड़ना भी नहीं चाहता। हमारे रास्ते को सजाने के लिए यह बुत बड़ा ही खूबसूरत है। यात्री सफर में इस बुत को देखने के लिए जरूर रुकेंगे।’ रजा साहब आगे कहते हैं, ‘होश संभालने से पहले मुझे पता ही नहीं था कि जवाहरलाल नेहरू क्या शख्सियत और क्या चीज थे। मगर जब होश संभाला तो खुद को उनके विरोधी खेमे में पाया और जैसे-जैसे होश संभलता गया, विरोध और बढ़ता गया। लेकिन पंडित नेहरू की मौत पर मैं बहुत रोया था, और इस मौत पर एक कविता भी लिखी थी जिसका शीर्षक था- ‘आओ सूरज का मातम करें
।’ उस आदमी में कोई तो खास बात रही होगी। मैंने देखा- नेहरू रोमांटिक थे और अपने सपने बुनते थे। पंडित नेहरू को उनकी कुछ कमजोरियों के साथ भी स्वीकार करता हूं और मानता हूं।’ संकलन : हफीज किदवई

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

लेवाना होटल सरकार की नाक के नीचे ऐशगाह था

होटल लेवाना सुइट्स की घटना से प्रदेश सरकार का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है भाकपा ने की विश्वासयोग्य जांच की मांग लखनऊ- 6 सितंबर 2022, लगभग हर साल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के होटलों में आगजनी और अन्य दुर्घटनाओं के क्रम में एक कड़ी और जुड़ गयी और राजधानी के पॉश इलाके में अवैध रूप से निर्मित होटल ‘लेवाना सुइट्स’ में लगी आग से चार लोगों की जान चली गयी। यह दुर्घटना कई सवाल खड़े कर रही है, और इसकी विश्वसनीय जांच आवश्यक है। लोगों की मौत पर गहरा दुख जताते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने अपने बयान में कहा कि होटल का निर्माण प्रदेश में रामराज्य प्रतिष्ठापित (2017) होने के बाद हुआ है। तबसे अब तक सरकार की नाक के नीचे राजधानी में बेधड़क चल रहा यह होटल मौजूदा सरकार के जन सरोकारों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, और व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खोल देता है। यह भी आश्चर्यजनक है कि होटल में ठहरे म्रतक लोग यात्री या टूरिस्ट न हो कर लखनऊ के वाशिन्दे थे। स्पष्ट है कि यह होटल धनवानों की ऐशगाह बना हुआ था और नियमों का उल्लंघन कर धनोपार्जन में जुटा था। भारतीय संस्क्रति की रक्षा का दावा करने वाली मौजूदा सरकार की कथनी करनी के बीच अंतर को ये घटना उजागर कर देती है। जघन्य घटना से उत्तर प्रदेश में टूरिस्ट्स के आगमन पर भी प्रभाव पड़ेगा। उत्तर प्रदेश सरकार का ये स्थायी चरित्र बन चुका है कि वह गैर कानूनी, अवांच्छित और अनैतिक कार्यों पर तब ध्यान देती है जब किसी घटना/ दुर्घटना से मामले का पर्दाफाश हो जाता है और सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। उससे पहले वह ध्रतराष्ट्र बनी रहती है। अब जांच बैठाने और होटल पर बुलडोजर चलाने की कार्यवाहियाँ जनहित में न हो कर सरकार की छवि बचाने के उद्देश्य से की जा रही हैं। भाकपा ने कहा कि निर्मित भवनों को राजनैतिक उद्देश्यों से ढहाने के बजाय सरकार द्वारा उनका अधिग्रहण किया जाना चाहिये और उनके अलग अलग भागों को आश्रयहीन गरीबों को आबंटित किया जाना चाहिये। भाकपा ने इस जघन्य घटना की विश्वासयोग्य जांच कराने की मांग की है। सभी घायलों के इलाज कराये जाने तथा होटल के समस्त कागजात जब्त कर उसके क्रियाकलापों का खुलासा करने की भी मांग की।

उ प्र में जेलों में एड्स - राजनीतिक असर

उत्तर प्रदेश की जेलों में एचआईवी वायरस फैलने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बाराबंकी जेल में पिछले एक महीने में 26 कैदी एचआईवी पॉजिटिव पाए गए हैं। राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने जेल प्रशासन को पत्र लिखकर इन संक्रमित कैदियों को लखनऊ के एआरटी सेंटर से इलाज कराने को कहा है। जल्द ही विभाग जेल में एक और कैंप लगाने जा रहा है, जिसमें महिला बंदियों की जांच की जाएगी। जिला क्षय रोग अधिकारी विनोद कुमार दोहरे ने कहा कि जेल में तीन शिविरों के दौरान कैदियों के बीच टीबी और एचआईवी परीक्षण के परिणाम सामने आए। जून में, गोंडा जिला जेल के छह कैदियों ने एचआईवी के लिए सकारात्मक परीक्षण किया था। जेल में एक विचाराधीन कैदी का परीक्षण सकारात्मक होने के बाद कैदियों की टेस्टिंग की गई थी। जेल में एक हजार से अधिक कैदी हैं। जेल अधीक्षक, दीपांकर कुमार ने इस बात की पुष्टि की और कहा कि परिसर के अंदर एक चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। अधिकारी ने कहा, "हमने पहले सभी प्रभावित रोगियों को वायरस से अलग करने और उनके अन्य परीक्षण कराने के लिए जिला अस्पताल भेजने का फैसला किया है।" मानक संचालन प्रक्रिया के तहत उनके बैरक को शिफ्ट किया जाएगा। इन-हाउस डॉक्टर को अवगत कराया गया है और उनके स्वास्थ्य की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। सहारनपुर जेल में जुलाई में 23 कैदियों के एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला था। मामला तब सामने आया जब सहारनपुर जेल में स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्वास्थ्य जांच शिविर लगाया गया। टीबी से संक्रमित पाए गए कैदियों के रक्त के नमूने भी एचआईवी के परीक्षण के लिए एकत्र किए गए थे और उनमें से 23 को एचआईवी पॉजिटिव पाया गया था। इनमें एक महिला कैदी भी है। नाम न छापने की शर्त पर आईएएनएस से बात करने वाले एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि जेलों में भीड़भाड़ चिंता का विषय है। उन्होंने बताया, "इस स्थिति में, असुरक्षित यौन संबंध से इनकार नहीं किया जा सकता और यह स्पष्ट रूप से एचआईवी फैलाने का कारण बना है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

आसाराम के आश्रम एक लड़की की लाश मिली है

गोंडा स्थित आसाराम के आश्रम में मिली लड़की की लाश, मां ने बताया हत्या का कारण आसाराम बापू के नाम से जाने जाने वाले आसुमल थाउमल हरपलानी आज भी नाबालिग लड़की के साथ रेप के मामले में दोषी पाए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा काट उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित आसाराम के आश्रम से एक लड़की की लाश मिली है। जिससे एक बार फिर हड़कंप मच गया है। आसाराम के आश्रम एक लड़की की लाश मिली है। ऐसा बताया जा रहा है कि, 13 से 14 साल के
बीच की उम्र की एक लड़की बीते कई दिनों से गायब थी और उसकी माता उनकी खोज में लगी हुई थी, लेकिन जब आज उस लड़की की लाश गोंडा के विमौर इलाके में स्थित आसाराम के आश्रम से मिली तो सब के होश उड़ गए। पुलिस ने आश्रम को फ़िलहाल सील कर दिया है और आगे की जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने बताया है कि, लड़की की माता का कहना है कि, वह 5 अप्रैल से लापता थी और लड़की का शव आश्रम में खड़ी एक कार से मिला है। कार से बदबू आने के चलते पुलिस को इस मामले की सूचना मिली और पुलिस ने वहां पहुंचकर लड़की का शव बरामद किया। पुलिस ने कहा है कि, फिलहाल लड़की के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है रिपोर्ट आने का इंतज़ार है। जिस लड़की का शव मिला है उस लड़की की मां ने आरोप लगाते हुए कहा है कि, 'उनकी बेटी की हत्या मकान पर कब्जे को लेकर चल रहे विवाद के कारण की गई है। बेटी 5 अप्रैल को गायब हुई थी तब ही उन्होंने 3 लोगों के खिलाफ पुलिस में नाम दर्ज करते हुए मामला दर्ज कराया था। उनके पति भी दो साल से गायब हैं। उनके घर और आश्रम के बीच केवल 70 मीटर की दूरी है। लड़की रोजाना दीपक जलाने आश्रम में जाती थी और उन्होंने लड़की को आश्रम में ढूंढा भी था, लेकिन वो उन्हें वहां नहीं मिली थी। हालांकि, बाद में लड़की का शव आश्रम से ही बरामद हुई है। लाश मिलने के बाद लड़की की माँ का कहना है कि, मेरी बेटी की हत्या की गई है और उसका चेहरा काला पड़ा था मुझे शक है कि, उसपर तेजाब या वैसा कोई केमिकल डाला गया है।" इस मामले की जाँच कर रहे अपर पुलिस अधीक्षक ने बताया कि, 'पोस्टमार्टम की कार्रवाई के बाद आगे की जांच शुरू हो गई है। फॉरेंसिक टीम आश्रम और गाड़ी की जांच कर रही है और जरूरी सैंपल कलेक्ट कर रही है। हालांकि, आसाराम के आश्रम से शव मिलने का ये पहला मामला नहीं है।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

भाजपा सरकार में पत्रकारों की ताजा स्थिति

यह नया भारत है। यह लोग जो थाने में अर्धनग्न अवस्था में खड़े हैं यह सब पत्रकार हैं। इनमे सबसे बॉएँ खड़े दाढ़ी वाले भाई कनिष्क तिवारी के यूट्यूब चैनल के सवा लाख सब्सक्राइबर हैं। अब इन्होंने गलती यह कर दी कि पहले मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में भाजपा के ही विधायक केदारनाथ शुक्ला के खिलाफ खबर लिख दी थी और अब शुक्ला के कहने पर सीधी पुलिस ने कनिष्क और उनके साथियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी है। जब कनिष्क और उनके साथियों ने पुलिस से पूछा कि हमारा कुसूर क्या है तो उनसे कहा गया कि आप फर्जी आईडी से आप लोग भाजपा सरकार और विद्यायकों के खिलाफ लिखते हैं। -आवेश तिवारी

"हाँ, श्रीमान मोदी, हम आरएसएस की सांप्रदायिक विचारधारा के लिए खतरनाक हैं," डी राजा

आरएसएस-भाजपा शासन के खिलाफ एक मजबूत विकल्प उभरना चाहिए: डी राजा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव डी राजा ने कहा है कि आरएसएस-भाजपा सरकार के खिलाफ एक मजबूत विकल्प तैयार किया जाना चाहिए, जो जाति और सांप्रदायिक विभाजन के माध्यम से देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। वह कन्नूर में 23वीं सीपीआई (एम) पार्टी कांग्रेस को संबोधित कर रहे थे। बीजेपी-आरएसएस के राज में धार्मिक और जातिगत बंटवारा तेज हो रहा है. RSS देश के लिए ही खतरा बन गया है। केवल वामपंथी ही वैचारिक रूप से आरएसएस को चुनौती दे सकते हैं और उसे हरा सकते हैं। आरएसएस के शासन को धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दलों के गठबंधन से समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए वामपंथियों को देश में धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक दलों और क्षेत्रीय दलों के सहयोग से संघर्ष को तेज करना होगा। यह वामपंथ की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। वामपंथियों को इस बात पर आत्ममंथन करना चाहिए कि आरएसएस को राजनीतिक और वैचारिक रूप से हराने के लिए आवश्यक एकता कैसे
ल की जाए। असंख्य संघर्षों और संघर्षों के परिणामस्वरूप केरल में वामपंथियों ने ऊपरी हाथ हासिल किया। वामपंथियों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान दिया है। वामपंथ का विकास मॉडल जनकेंद्रित है। माकपा पार्टी कांग्रेस ऐसे महत्वपूर्ण समय में हो रही है जब देश बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। हम दक्षिणपंथी ताकतों के भारी हमले का सामना कर रहे हैं। देश की धर्मनिरपेक्षता और संघीय व्यवस्था को चुनौती दी जा रही है। मजदूर, किसान, महिलाएं, युवा और छात्र समेत जनता का हर तबका मोदी सरकार से नाखुश है. केंद्र सरकार की रणनीति है कि मजदूर वर्ग और आबादी के अन्य वर्गों को बांटकर शासन करते रहें। वे सभी अनगिनत संघर्षों के माध्यम से जीते गए अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। देश गहरी मंदी के दौर से गुजर रहा है। केंद्र सरकार की नवउदारवादी नीतियां केवल कॉरपोरेट शक्तियों की मदद करती हैं। कॉरपोरेट-समर्थक सरकार यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि प्रगतिशील आंदोलनों को कैसे दबाया जाए। दुनिया भर में फासीवादी ताकतें अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं। फासीवादी ताकतों ने जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में अपने ठिकानों का विस्तार किया। पूंजीवादी देशों सहित बेरोजगारी और मुद्रास्फीति संकट पैदा कर रही है। आजादी के सात दशक बाद भी हमारा देश गरीबी और असमानता से मुक्त है। देश भर में लाखों लोग नौकरियों और मजदूरी के बिना पीड़ित हैं क्योंकि कॉर्पोरेट पूंजी की संपत्ति, एक छोटी सी अल्पसंख्यक जमा होती है। भाजपा सरकार हमारी सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर रही है। धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, संघवाद और विदेश नीति की स्वतंत्र प्रकृति सभी को विकृत किया जा रहा है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संसद जैसी संवैधानिक संस्थाएं सभी लोगों के हाथ में हैं। केंद्र सरकार इस बात की जांच कर रही है कि कैसे हमारी जांच प्रणाली, जैसे कि सीबीआई और ईडी, का राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 370 और नई श्रम संहिता का एकतरफा निरसन श्रमिकों और मेहनतकशों के लिए एक झटका है। यूएपीए जैसे कानून लागू करता है। यह रेलवे, एलआईसी और बैंकों जैसे मजबूत सार्वजनिक उपक्रमों को बेचता है। केंद्र सरकार उन अपराधियों की मदद कर रही है, जिन्होंने जनता के अरबों करोड़ रुपये लूटे हैं, ताकि वे विदेशों में भाग सकें। देश में बेरोजगारी एक दशक में अपने उच्चतम स्तर पर है। फिर भी, अदानी और अंबानी सहित इजारेदार कंपनियां दिन-ब-दिन अपनी संपत्ति बढ़ा रही हैं। आरएसएस और उसके सहयोगी समाज का नस्लीय ध्रुवीकरण करते हैं। देश भय, घृणा और विभाजन का वातावरण है। यह कदम न केवल देश के इतिहास को फिर से लिखने का कदम है, बल्कि भारतीय संविधान को उखाड़ फेंकने का भी है। प्रयास हिंदू राष्ट्र पर आधारित संविधान बनाने का है। इसकी आड़ में देशभर में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा की जा रही है. आरएसएस के शासन में पितृसत्ता भी मजबूत हो रही है। संघ परिवार शासन का चेहरा मनुवादी एजेंडा है जो महिलाओं को हीन मानता है और उनका तिरस्कार करता है। सभी प्रकार के शोषण और गुलामी के खिलाफ वर्ग संघर्ष को तेज करना होगा। हाल ही में मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा कि साम्यवाद एक खतरनाक विचारधारा है। "हाँ, श्रीमान मोदी, हम आरएसएस की सांप्रदायिक विचारधारा के लिए खतरनाक हैं," डी राजा ने कहा। समाज को आरएसएस के शत्रुतापूर्ण वैचारिक प्रभाव से मुक्त करना होगा।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

इसीलिए हम कम्युनिस्ट है

इसलिए हम कम्युनिस्ट है केरल ही नही यूपी के मुजफ्फर नगर के दंगों के पीड़ितों की एक कालोनी एकता कालोनी विकसित किया गया #जनता_से_लगाव_का_है_कोई_ऐसा_और_उदाहरण 🔴 केरल की सीपीएम - सरकार नहीं कम्युनिस्ट पार्टी - गरीबों को मकान बनवा कर दे रही है। 🔴 पिछले साल पार्टी की अलग अलग कमेटियों ने 1200 मकान बनवाये और गरीबों को दिए। इस वर्ष 1000 मकान बनवाये जाएंगे। 🔵 केरल की कुल आबादी में सिर्फ 1% लोग ऐसे हैं जो अति गरीब - Extremely Poor - की श्रेणी में आते हैं। सीपीआई(एम) ने सरकार में रहते हुए इन सहित पूरे केरल के लिए अनेक कदम उठाये हैं और नतीजे में केरल मानव विकास सूचकांक (Human Development Index ) में सिर्फ भारत में ही अव्वल नहीं है ; यूरोप के कई विकसित देशों से बराबरी की टक्कर लेता है। 🔴 कल से कन्नूर में पार्टी का राष्ट्रीय महाधिवेशन -23वी पार्टी कांग्रेस - के अभियान के दौरान बनाये गए ऐसे 23 मकानों की चाबी सौंपते हुए #सीपीएम की केरल इकाई के राज्य सचिव कोडियारी बालाकृष्णन ने कहा कि ; जहां चाह हो वहां राह निकाली जा सकती है और यह भी ; #कम्युनिस्टों _के_लिए_कुछ_भी_असंभव_नहीं_है।

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए बलिया प्रशासन ने पत्रकारों को बनाया ‘बलि का बकरा

उत्तर प्रदेश: अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए बलिया प्रशासन ने पत्रकारों को बनाया ‘बलि का बकरा
- अश्वनी कुमार सिंह उत्तर प्रदेश सरकार नकल रोकने को लेकर तमाम दावे करती रही लेकिन उनकी पोल तब खुल गई जब बलिया जिले में 12वीं कक्षा का पेपर लीक हो गया. एक दिन के अंतराल पर यहां दो विषयों का पेपर लीक हुआ. इसके बाद जब प्रशासन पर सवाल खड़े हुए तो जिन पत्रकारों ने यह खबर प्रकाशित की थी पुलिस ने उन्हें ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. अमर उजाला के बलिया एडिशन में 30 मार्च को परीक्षा लीक की खबर प्रकाशित हुई थी. खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन हरकत में आया और धरपकड़ शुरू कर दी. हैरानी की बात है कि जिस पत्रकार ने जिला अधिकारी इंद्र विक्रम सिंह और जिला विद्यालय निरीक्षक को पेपर लीक होने की सूचना दी, उसे ही पूछताछ के बहाने थाने बुलाकर बैठाए रखा और फिर शाम को जेल भेज दिया. क्या है पूरी घटना उत्तर प्रदेश में बोर्ड की परीक्षा चल रही हैं. प्रदेश सरकार का दावा है कि उसने नकल रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन इस बीच बलिया में पेपर लीक होने की खबर आई. बलिया से अमर उजाला के पत्रकार अजीत ओझा और दिग्विजय सिंह की इस खबर को अखबार ने प्रकाशित किया था. हालांकि यह कोई बाइलाइन खबर नहीं थी. यह खबर ‘संवाद न्यूज़ एजेंसी’ बाइलाइन से प्रकाशित हुई थी. खबर में बताया गया कि हाईस्कूल का संस्कृत का पेपर 29 मार्च, मंलगवार को था. लेकिन पेपर और उत्तर पुस्तिका दोनों सोमवार रात को ही सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं. साल्व पेपर मंगलवार को हुए पेपर से मैच भी कर रहा था लेकिन इसके बावजूद प्रशासन ने पेपर आउट मानने से इंकार कर दिया. वहीं 12वीं कक्षा का पेपर 30 मार्च को था, जो 29 मार्च की शाम से ही वायरल होने लगा. यह खबर अखबार में 30 मार्च को छपी. जिसके बाद आनन-फानन में प्रदेश सरकार ने पेपर लीक होने की बात को माना और बलिया समेत 24 जिलों में परीक्षा को रद्द कर दिया. इस लापरवाही की जांच के लिए एसआईटी का गठन करने की बात कही गई. माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने बताया कि जिन सेट्स के लीक होने की आशंका थी, उन्हें आगरा, मैनपुरी, मथुरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, बागपत, बदायूं, शाहजहांपुर, उन्नाव, सीतापुर, ललितपुर, महोबा, जालौन, चित्रकूट, अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़, गोंडा, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, वाराणसी, कानपुर देहात, एटा और शामली में भेजा गया था इसीलिए यहां भी पेपर रद्द कर दिए गए हैं. बोर्ड ने अब इन जिलों में परीक्षा की नई तारीखों का ऐलान कर दिया है. यहां अब परीक्षा 13 अप्रैल को होंगी. प्रशासन की नाकामी बलिया पेपर लीक मामले में अभी तक 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इन गिरफ्तार लोगों में पत्रकार दिग्विजय सिंह, अजीत ओझा और एक अन्य पत्रकार मनोज गुप्ता शामिल हैं. बलिया में अमर उजाला के लिए काम करने वाले पत्रकार श्याम शर्मा न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “पेपर लीक की खबर 30 मार्च को छपने के बाद, अजीत ओझा ऑफिस में थे. उन्हें डीएम ने फोन कर अंग्रेजी का लीक पेपर व्हाट्सएप पर मांगा, जिसे उन्होंने भेज दिया. इसके कुछ देर बाद उन्हें ऑफिस से पुलिस थाने ले गई.” अमर उजाला के बलिया संस्करण में करीब 10-12 लोगों की टीम है. जिसमें संपादकीय टीम के अलावा मार्केटिंग टीम भी शामिल है. अखबार के बलिया ब्यूरो चीफ संदीप सिंह न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, “जिस वक्त पुलिस अमर उजाला के ऑफिस पहुंची थी उस वक्त ऑफिस में अजीत ओझा और चपरासी मौजूद थे.” पुलिस अजीत ओझा को थाना कोतवाली ले गई. जिसके बाद स्थानीय पत्रकार भी पुलिस स्टेशन पहुंच गए और ओझा को हिरासत में लिए जाने के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे. संदीप सिंह कहते हैं, “पहले पुलिस ने कहा कि पेपर लीक को लेकर पूछताछ करनी है, फिर कहा कि एसआईटी आ रही है वह पूछताछ करेगी, ऐसे करते-करते शाम हो गई.” वह आगे कहते हैं, “थाने में जो विरोध प्रदर्शन हुआ वह शाम करीब 7:30 बजे तक चला, इस दौरान थाने में मौजूद अजित ओझा भी इस प्रदर्शन में शामिल हो गए, लेकिन पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी 6 बजे की दिखाई. यह कैसे मुमकिन है?” जिस वक्त अजीत थाने में मौजूद थे उस समय उन्होंने पत्रकारों से बताया कि कोतवाल ने अपराधी की तरह व्यवहार करते हुए अमर उजाला के दफ्तर में तोड़फोड़ की और मुझे जबरन गाड़ी में बैठाकर कोतवाली ले गए. हम नहीं आ रहे थे तो हमारे सहयोगियों के साथ धक्का-मुक्की की गई. अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर अखबार के एक कर्मचारी कहते हैं कि बलिया में अमर उजाला के क्षेत्रीय संवाददाता को कहीं से प्रश्न पत्र की फोटो मिली थी. इसके बाद संवाददाता ने ब्यूरो चीफ को बताया, तो उन्होंने इस पर खबर लिखने के लिए कहा. जब सुबह डीएम को पेपर लीक की खबर पता चली तो वह नाराज हो गए और करीब 10 बजे उन्होंने वायरल पेपर का अंग्रेजी के पेपर से मिलान किया. जिसका कोड वायरल पेपर से मैच कर रहा था. इसके बाद जहां-जहां यह पेपर गया था उन 24 जिलों में पेपर को रद्द कर दिया गया. कर्मचारी कहते हैं, “अब नाराज डीएम का कहना है कि इस मामले में अमर उजाला के संवाददाता को किसी संबंधित अधिकारी का वर्जन लेना चाहिए था. तब अखबार में खबर प्रकाशित करनी थी. वर्जन क्यों नहीं लिया गया और ऐसे कैसे आपने पेपर की फोटो अखबार में छाप दी. अब पुलिस का कहना है कि आप उस आदमी का नाम बताइए जिसने आपको अंग्रेजी के पेपर की फोटो दी है. इसके बाद पुलिस ने पत्रकारों और शिक्षकों की गिरफ्तारियां शुरू कर दीं.” बड़े स्तर पर हुईं गिरफ्तारियां बलिया जिला प्रशासन ने पहले तो संस्कृत पेपर लीक मामले में कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन अग्रेजी का पेपर लीक होने की खबर के बाद प्रशासन हरकत में आया. संवाददाता श्याम शर्मा कहते हैं, “अंग्रेजी पेपर लीक की खबर अमर उजाला ने बलिया पेज पर प्रमुखता से छापी, इस खबर को राष्ट्रीय सहारा ने भी छापा लेकिन उतनी प्रमुखता से नहीं. हालांकि इसके अलावा इस खबर को और किसी संस्थान ने प्रकाशित नहीं किया” 30 मार्च को अजीत ओझा और बृजेश मिश्रा को 156/22 धारा 420, 4/5/10 उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 1998 व धारा 66बी आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार किया. इसके बाद अगले दिन पत्रकार दिग्विजय सिंह, मनोज गुप्ता और अन्य लोगों की गिरफ्तारी की गई. इस पर बलिया के एसपी राजकरन नय्यर ने मीडिया को बताया, “तीन अलग-अलग (कोतवाली, सिकंदरपुर और नगरा) थानों में केस दर्ज हुए हैं जिसमें अभी तक 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पत्रकारों की इस मामले में भूमिका को लेकर अभी कुछ नहीं कह सकते हैं लेकिन जो लोग गिरफ्तार हुए हैं उनकी जो भी भूमिका है उसको लेकर कार्रवाई हो रही है.” पत्रकार दिग्विजय सिंह को जब पुलिस गिरफ्तार करके ले जा रही थी तब उन्होंने “बलिया डीएम चोर है, बलिया एसपी गुंडा है. बलिया डीएम नकलखोर है. बलिया पुलिस मुर्दाबाद” का नारा लगाया.” गिरफ्तारी से पहले मीडिया से बातचीत में सिंह ने कहा, “बलिया के कई क्षेत्रों में नकल की जा रही थी. मैंने अपने सूत्रों के जरिए संस्कृत हाईस्कूल का हल पेपर लिया और उसे अखबार को भेज दिया और अखबार में छपा. दूसरे दिन अंग्रेजी का पेपर भी छपा जिसके बाद प्रशासन की पोल खुल गई.” वह आगे कहते हैं, “जो डीएम कहता था हम बुलडोजर चलवाएंगे, सबकों नंगा करवाएंगे वह खुद नंगा हो गया. और गुस्साएं हुए डीएम ने मुझे और मेरे साथी पत्रकार अजीत ओझा को गिरफ्तार करवा दिया. अभी भी खुले तौर पर नकल चल रही है, खुली चुनौती नकल माफियाओं ने प्रशासन को दी है, लेकिन बलिया प्रशासन अपनी गलती नहीं मान रहा है. वह पत्रकारों का, अखबार का मुंह बंद करना चाहता है और चौथे स्तंभ पर हमला बोलना चाहता है ताकि हम चुप हो जाएं.” सिंह ने कहा, “तीन दिन से मेरा उत्पीड़न किया जा रहा है. नकल माफियाओं को गिरफ्तार करने की बजाय मुझसे पूछ रहे हैं कि कहां से पेपर मिला. जितने लोगों को अभी तक गिरफ्तार किया गया है उसमें से कोई भी नकल माफिया के लोग नहीं है. सिर्फ निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किया गया है.” वहीं बलिया पुलिस का कहना है कि अब तक की विवेचना में प्राप्त सबूतों के आधार पर ही गिरफ्तारियां हुई हैं. पुलिस के मुताबिक जिनकी गिरफ्तारी हुई है उनमें एक पत्रकार और एक विद्यालय में सहायक अध्यापक हैं जो वर्तमान माध्यमिक परीक्षा में एक परीक्षा कक्ष में निरीक्षक का कार्य कर रहे थे. हालांकि पुलिस ने पत्रकार का नाम नहीं लिया है लेकिन बताया जा रहा हैं वह अजीत ओझा हैं. अखबार का पक्ष अमर उजाला के एक पत्रकार कहते हैं, “दुख की बात है कि अमर उजाला अपने पत्रकारों के साथ नहीं खड़ा है. ऊपर से इतना प्रेशर है कि अब कोई इससे संबंधित खबर तक नहीं छप रही है. पूरे अमर उजाला में चर्चा है कि पुलिस और सरकार दोनों का संस्थान पर बहुत प्रेशर है. इसलिए इस मामले में सबने चुप्पी साध ली है. यही नहीं साधारण खबर के अलावा सरकार या पुलिस प्रशासन के रवैये और पेपर से संबंधी किसी भी संस्थान में अब खबर नहीं छप रही है. इस मामले को अब तूल न दिया जाए सभी को साफ तौर पर बोला गया है.” वह आगे कहते हैं, “नई-नई सरकार बनी है और इतना बड़ा मामला हो गया इसलिए शासन-प्रशासन दोनों परेशान हैं.” वहीं बलिया स्कूल के एक प्रबंधक नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, “हमारे स्कूल में तो परीक्षा सेंटर भी नहीं था तब भी हमारे तीन मास्टरों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. हमारे पीछे भी पुलिस पड़ी हुई है. हम भागे हुए हैं. स्कूल चलाने वालों में खौफ का माहौल है.” वह आगे कहते हैं, “अभी ये मामला शांत हो जाए फिर सरकार से लड़ा जाएगा. सरकार अच्छा नहीं कर रही है. अपनी नाकामी छिपाने के लिए निर्दोष लोगों को मोहरा बना रही है.” वहीं संस्थान के रवैए पर ब्यूरो चीफ संदीप सिंह कहते हैं, “हम और हमारा संस्थान पत्रकारों के साथ खड़ा है. मैंने थाने में कहा कि ब्यूरो चीफ के तौर पर अखबार में छपी खबर को लेकर मेरी जिम्मेदारी है इसलिए आप मुझे गिरफ्तार करें.” वह कहते हैं, “जिलाधिकारी क्यों नहीं सवालों के जवाब दे रहे हैं, वह भागे-भागे फिर रहे हैं. इतने दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक प्रशासन यह नहीं पता लगाया पाया कि पेपर लीक का मास्टरमाइंड कौन है. यहां के जिलाधिकारी की जो हिटलरशाही है, अपने आप को बचाने के लिए उन्होंने सारे विरोध को दबा दिया लेकिन अपनी लड़ाई को हम अंतिम परिणाम तक पहुंचाकर ही रहेगें.” संदीप सिंह संस्कृत का पेपर लीक होने के बावजूद रद्द नहीं किए जाने पर प्रशासन पर सवाल खड़े करते हैं. वह कहते हैं कि लीक पेपर और असली पेपर, जिसका एग्जाम हुआ, दोनों की जांच करवा लीजिए एक-एक सवाल मैच हो रहा है. इतना बड़ा मामला हो जाने के बावजूद डीएम पत्रकारों के सामने नहीं आ रहे हैं. पत्रकारों की गिरफ्तारी के विरोध में वकीलों का एक प्रतिनिधिमंडल शनिवार को बलिया डीएम कार्यालय में ज्ञापन देने पहुंचा, लेकिन जिलाधिकारी नहीं मिले. जिसके बाद उन्होंने राज्यपाल के नाम ज्ञापन प्रशासन को सौंपा. ज्ञापन में जिला प्रशासन पर उदासीनता व घोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए पूरे प्रकरण में डीएम बलिया को दोषी ठहराया है. संदीप सिंह कहते हैं, “डीएम कुछ बोल नहीं रहे हैं. सरकार को सामने आकर जवाब देना चाहिए. क्या सिर्फ विज्ञप्ति छापने के लिए पत्रकार पैदा हुए हैं. क्या सिर्फ उसी के लिए पत्रकारिता कर रहे हैं कि वह जो विज्ञप्ति देंगे वह सभी अखबारों में छप जाएगा.” पत्रकार अजित ओझा के बतौर शिक्षक काम करने के सवाल पर वह कहते हैं, “क्या एक अध्यापक पत्रकार नहीं हो सकता. क्या वह कोई गैंगस्टर या माफिया है जो अध्यापक नहीं हो सकता. अध्यापक होना कोई गुनाह है क्या?. अगर प्रशासन के पास कोई सबूत है तो पत्रकार के खिलाफ वह कार्रवाई करे. लेकिन वह बतौर अध्यापक काम कर रहे हैं यह कोई गुनाह नहीं है.” संस्थान द्वारा क्या किया जा रहा है, इसपर वह कहते हैं, “जो उचित मंच है वहां सब लोग बात कर रहे हैं. संस्थान पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है, वह सबके सामने आ आएगा.”
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