सोमवार, 28 सितंबर 2026

पुलिस के लाठीचार्ज में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड डॉक्टर गिरीश शर्मा घायल।

पुलिस के लाठीचार्ज में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड डॉक्टर गिरीश शर्मा घायल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कॉमरेड डॉ. गिरीश शर्मा को लोक भवन (राज भवन) मार्च के दौरान पटना के डाक बंगला चौराहे से गिरफ्तार कर ले जाती बिहार पुलिस।

देश तोड़ने वाले खुंखार अमरीकी आतंकवादी मैन्यू वैनडाइक को मोदी सरकार ने रिहा कर दिया

देश तोड़ने वाले खुंखार अमरीकी आतंकवादी मैन्यू वैनडाइक को मोदी सरकार ने रिहा कर दिया अमरीकी एजेंट मैथ्यू वैनडाइक को भारत की सरकार ने जेल से निकल जाने दिया। वह भारत के नॉर्थ-ईस्ट हिस्से को तोड़ना चाहता था। म्यांमार और मिजोरम के रिबेल ग्रुप्स के सपोर्ट से उत्तर पूर्व में अस्थिरता को बढ़ाने के लिए 6 अन्य विदेशी मर्सनरीज के साथ घुसा था। NIA ने इसे गिरफ्तार किया था, लेकिन चार्जशीट में UAPA हटवा दिया गया और अब कोर्ट ने उसे और उसके साथ के 6 अन्य यूक्रेनियों को अपने देश वापस लौटने का परमिशन दे दिया है। भाजपा की मौजूदा सरकार ट्रंप के पांव तले काम कर रही है, अमरीकी सरकार ने दिल्ली में बैठे छब्बीस इंची सीना वाले रंगे सियार का टेंटुआ दबाया हुआ है। नहीं तो देश तोड़ने में लगे एक आतंकी को इस तरह जाने देना देशद्रोह नहीं तो और क्या है ? सोचिए की यदि यही किसी दूसरे सरकार में हुआ रहता तो भाजपा अबतक नंगा नाच रही होती। मैथ्यू वैनडाइक कोई साधारण अपराधी नहीं था। अमरीकी नागरिक है, CIA एजेंट कहा जाता है। लीबिया के गृहयुद्ध में मुहम्मद गद्दाफ़ी के सरकार गिराने में लड़ चुका है। मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में हुए विद्रोहों में भूमिका निभा चुका है। रसिया- यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन के तरफ़ से लड़ने गया था। म्यांमार के रिबेल ग्रुप्स को ड्रोन और हथियारों की ट्रेनिंग दे चुका है। एक तरह से यह CIA का रेजीम-चेंज करने, देश तोड़ने का औजार है। और ऐसे आदमी को भारत की सरकार ने सीधा छोड़ दिया जबकि वह भारत में अस्थिरता उत्पन्न करने में ही लगा था। मोदी सरकार बताए की ऐसा कौन सा फाइल, ऐसा कौन सा वीडियो ट्रंप के हाथ में है की ट्रंप ने गुलामी को मजबूर कर दिया है। यदि भारत ने इसको छोड़ा है तो गुरपतवंत सिंह पन्नू के मर्डर साजिश के नाम पर गिरफ्तार किए गए कथित एजेंट निखिल गुप्ता को आजतक भारत की सरकार क्यों नहीं छुडा. दिया।

रविवार, 27 सितंबर 2026

वोटचोर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे - राजेन्द्र यादव लखनऊ में पुतला फूंका गया

वोटचोर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे - राजेन्द्र यादव लखनऊ में पुतला फूंका गया उप्र की राजधानी लखनऊ में ज्ञानेश कुमार का पुतला फूंका! उत्तर प्रदेश किसान सभा द्वारा पूर्व विधायक राजेंद्र यादव के नेतृत्व में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर कैसरबाग चौराहे पर पुतला फूंका गया।इसमें उप्र किसान सभा नेतागण और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव अरविन्द राज स्वरुप, ओम प्रकाश आनंद, शशिकांत कुशवाहा, ओम प्रकाश तिवारी, कॉम राम चंद सरस, कॉम शारदा पाण्डेय,राम कुमार भारती,इम्तियाज़ बेग कॉम छितर सिँह, कॉम तहसीलदार यादव,फूल चंद यादव जनार्दन राम देवेंद्र मिश्रा आदि शामिल थे।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बुधवार, 23 सितंबर 2026

वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देना चाहिए -डी राजा

वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देना चाहिए -डी राजा 'इंडियन एक्सप्रेस' की जांच से चुनाव आयोग के अंदर एक गंभीर संकट का पता चला है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई। इनमें SIR (सिस्टमैटिक वोटर लिस्ट अपडेशन), फॉर्म 6 में "गैर-कानूनी" और "बिना अधिकार के" किए गए बदलाव और वोटर लिस्ट सॉफ्टवेयर के सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) जैसे मामले शामिल थे। उन्होंने कंट्रोल एक ही जगह केंद्रित होने के मुद्दे पर कैबिनेट सेक्रेटरी से भी बात की थी। फिर भी, इन आपत्तियों को नज़रअंदाज़ किया गया और SIR को आगे बढ़ाया गया, जिसके कारण अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से ज़्यादा वोटरों के नाम हटा दिए गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लगातार चेतावनी दी है कि लोकतंत्र में सरकारों को अपनी पसंद के वोटर चुनने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया का चेहरा बन गए हैं, जिससे इस संवैधानिक संस्था पर जनता का भरोसा कम हुआ है। उन्हें पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है और इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया में भरोसा और विश्वसनीयता बहाल करने के लिए उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया के फैसलों और उन्हें लेने के तरीके की जांच करनी चाहिए। यह संकट भाजपा सरकार द्वारा 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्शन कमीशन की नियुक्ति प्रक्रिया में किए गए बदलावों से जुड़ा है, जिसने संस्था की आज़ादी को कमज़ोर कर दिया। इलेक्शन कमीशन आफ इंडिया का काम साफ़ है: हर योग्य नागरिक को वोट देने का मौका मिलना चाहिए और हर हाल में इस ज़िम्मेदारी को पूरा किया जाना चाहिए। #ECI #GyaneshKumar #SukhbirSandhu #VivekJoshi

शनिवार, 19 सितंबर 2026

सेवा माह का क्या मतलब है पढ़ाई के अलावा सब कुछ है

सेवा माह का क्या मतलब है पढ़ाई के अलावा सब कुछ है यह कार्यक्रम पूरे प्रदेश में के महाविद्यालयो में अनिवार्य रूप से होना है।किस महापुरुष को लेकर दीप जलाना है उल्लेख नहीं है।किसके किस्से और कहानियां बताई जानी है परिपत्र में नहीं है। बाराबंकी में एक महाविद्यालय के प्राचार्य पच्चीस दिया जलाने के लिए जला हुआ मोबीआयल तलाश कर रहे थे तो एक स्कूल वालें ने मोमबत्ती जलाकर श्रद्धा सुमन अर्पित कर दिया है। इसका कोई भी बजट जारी नहीं है। कैसे कार्यक्रम हो विश्व विद्यालय और शिक्षा विभाग नहीं बता रहा हैडां राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में छात्रों की पढ़ाई लगभग बंद सी हो गई है। परीक्षा और प्रवेश वर्ष भर चला करता है। लेकिन स्कालरशिप के मामले में प्रत्येक छात्र 75 प्रतिशत उपस्थिति प्रामाणित कर सरकारी खजाने को चोट पहुंचाई जा रही है। छात्रों की संख्या पढाई न होने के कारण प्रति कम हो जाती है।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

गुजरात की छह राजनीतिक पार्टियों को मिले ₹1,700 करोड़ के चंदे की जांच की मांग की-डां गिरीश

गुजरात की छह राजनीतिक पार्टियों को मिले ₹1,700 करोड़ के चंदे की जांच की मांग की-डां गिरीश नई दिल्ली।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करती है कि गुजरात में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त छह राजनीतिक पार्टियों को 2023-24 में ₹1,700 करोड़ का भारी-भरकम चंदा मिला, जबकि उनकी कोई खास राजनीतिक गतिविधि नहीं देखी गई। आम जनमत पार्टी को ₹620 करोड़, सत्यवादी रक्षक पार्टी को ₹330.55 करोड़, स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी को ₹219.69 करोड़, न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को ₹200.69 करोड़, भारतीय नेशनल जनता दल को ₹191.61 करोड़ और गरीब कल्याण पार्टी को ₹138 करोड़ मिले। इतनी बड़ी रकम पाने वाली इन पार्टियों ने न तो ठीक से चुनाव लड़ा और न ही कई मामलों में चुनाव आयोग को सही ऑडिट और वित्तीय रिपोर्ट सौंपी; यह बात इन फंड के स्रोत और मकसद पर बेहद गंभीर सवाल खड़े करती है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मांग करती है कि सीबीआई इन फंड के पूरे लेन-देन की गहन और समयबद्ध जांच करे और सीएजी इनका व्यापक ऑडिट करे। आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय को भी चंदे के स्रोत, चंदा देने वालों की पहचान, पैसे के ट्रांसफर के तरीकों और इसके अंतिम लाभार्थियों की जांच करनी चाहिए। चुनाव आयोग को उन पार्टियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए जिन्होंने कानूनी नियमों का उल्लंघन किया है, यह जांचना चाहिए कि क्या उनका पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए, और नतीजों को जनता के सामने रखना चाहिए। वित्तीय या चुनावी गड़बड़ी के दोषी पाए जाने वालों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डां गिरीश शर्मा ने कहा कि इन चंदे का बहुत बड़ा पैमाना और असामान्य तरीका इस गंभीर आशंका को जन्म देता है कि इनमें से कुछ पार्टियां शायद सिर्फ़ राजनीतिक फंड को इधर-उधर करने के लिए बनाई गई थीं या इस्तेमाल की गई थीं, और अंत में यह पैसा भाजपा तक पहुंच गया। यह भारत के चुनावी लोकतंत्र की ईमानदारी से जुड़ा एक गंभीर मामला है और इसे केवल कुछ छोटे-मोटे राजनीतिक संगठनों का मामला बताकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगर सत्ताधारी पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने वाले फ़ंड के स्रोत या मंज़िल को छिपाने के लिए प्रॉक्सी पार्टियों का इस्तेमाल किया गया है, तो भारत की जनता को फ़ंड के पूरे लेन-देन का ब्यौरा जानने का अधिकार है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस मामले की हर कड़ी की पारदर्शी जाँच और जाँच के नतीजों को पूरी तरह से सार्वजनिक करने की माँग करती है, साथ ही इसमें शामिल पाए जाने वाले हर व्यक्ति और संगठन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की भी माँग करती है, चाहे उनका राजनीतिक ओहदा कुछ भी हो।

रविवार, 6 सितंबर 2026

उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से कानून-व्यवस्था का समाप्त -डी राजा

उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से कानून-व्यवस्था का समाप्त -डी राजा उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था का पूरी तरह से खत्म हो जाना बहुत चिंताजनक है। सहारनपुर में, 1911 में बनी एक मस्जिद को - जिसके दस्तावेज़ सौ साल से भी पुराने थे - सिर्फ़ सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश पर रातों-रात गिरा दिया गया। यह तोड़-फोड़ सप्ताहांत में की गई, ताकि इसकी देखभाल करने वालों को किसी ऊंची अदालत में जाने का मौका न मिल सके। यह उचित कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है। यह दमन राजनीतिक विरोधियों तक भी फैला हुआ है। विपक्ष के ज़िला नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया है। 'बदलाव ज़रूरी है' रैली से पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहारनपुर सचिव को उनका कारोबार बंद करने की धमकी दी गई। सुल्तानपुर में एक साथी का घर गिरा दिया गया, जबकि रामपुर में पहले से बने यूनिवर्सिटी कैंपस को नष्ट करने की योजना है। भाजपा और योगी आदित्यनाथ जनता के मूड और अपनी ही पार्टी के अंदर की फूट से साफ़ तौर पर घबराए हुए हैं। लोगों की चिंताओं को दूर करने के बजाय, वे चुनावों से पहले डराने-धमकाने, तोड़-फोड़ और बांटने वाली राजनीति का सहारा ले रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस शर्मनाक अराजकता की कड़ी निंदा करती है। जनता डर और बंटवारे की इस राजनीति को हरा देगी। सभी विपक्षी और लोकतांत्रिक ताकतों को इन हमलों की निंदा करने और उनका मुकाबला करने, तथा संविधान और कानून-व्यवस्था की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।

बुधवार, 2 सितंबर 2026

मोदी सरकार को उखाड़ करके ही दम लेंगे ये संकल्प हमारा है- डा गिरीश शर्मा

मोदी सरकार को उखाड़ करके ही दम लेंगे ये संकल्प हमारा है- डा गिरीश शर्मा रामलीला मैदान दिल्ली में रैली को संबोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डॉ गिरीश शर्मा ने सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बदलाव के इस रथ को कोई बाधा रोक नहीं सकती, रोक नहीं सकती। ये रथ चल पड़ा है शंखनाद हो चुका है पहले बदलाव दो हजार सत्ताईस में यूपी, उत्तराखंड, पंजाब में करेंगे और दो हजार उनतीस में दिल्ली की गद्दी से मोदी को उखाड़ करके ही दम लेंगे ये संकल्प हमारा है।

संघी पूरी सोच से भी मुक्ति चाहिए, केवल कुर्सी से मुक्ति नहीं, उस पूरी सोच से मुक्ति चाहिए जो इनकी है-अमरजीत कौर

सबको मेरा लाल सलाम, उनको भी जो नहीं पहुंच पाए हैं। आना चाहते थे लेकिन गाड़ियों में जगह नहीं मिली। हमारे हिसाब से साथी इन तीनों हॉल में भरे हुए हैं। पिछले हॉल के अंदर भी जो अर्ली मॉर्निंग आए हैं, लेट नाईट आए हैं, उधर बैठे हैं। इस साइड के अंदर भी जो कैंप लगा है, अभी उसमें भी साथी इस माइक के जरिए से सुन रहे हैं। अभी जत्थे के जत्थे आ रहे हैं, वालंटियर्स की सूचना है कि कुछ ट्रेन्स जो लेट हैं उनमें भी साथी हैं। तो एक सैलाब यहाँ पर पहुंचा है रामलीला ग्राउंड में इस बदलाव रैली के लिए, सब साथियों को मेरा सलाम। आंदोलन करना तो हमारा काम रहा है। नीचे के स्तर से ले के अपने राजधानियों में और फिर हिंदुस्तान की राजधानी में, से ही तो हमने अपने देश की आजादी जीती थी। लेकिन मौजूदा सरकार जो बैठी है, उसने आंदोलन करने वालों को आंदोलनजीवी बोल दिया। कुछ और आंदोलन चले तो परजीवी बोल दिया। और आगे बढ़े तो फिर टेररिस्ट बोल दिया। और आंदोलन आगे बढ़े तो देशद्रोही बोल दिया। और आगे बढ़े तो कह दिया अर्बन नक्सल है। फिर भी नहीं हटे तो अभी लाल किले के ऊपर से प्रधानमंत्री ने बोल दिया दिमागी नक्सल है। तो आंदोलन तो हम करते आए हैं। और बदलाव रैली जो हमने की है, केवल इसलिए तो नहीं की है कि एक रैली करना है रामलीला ग्राउंड में। हम बहुत सीरियस हैं, बहुत संजीदा हैं। क्योंकि हम बहुत दुखी हैं, हम बहुत परेशान हैं, हम बहुत उलझन में भी हैं। लेकिन हम जोश-खरोश में भी हैं, हम होश में भी हैं, क्योंकि हम ये समझ रहे हैं ये जो सत्ता आज कुर्सी पे बैठी है, वो बहुत खतरनाक है। किनके लिए? पूरे आवाम के लिए, पूरे देश के लिए, हमारी सांझी विरासत के लिए, हमारी सोच के लिए, हमारे वैज्ञानिक रास्ते के लिए, हमारे समाज के हर हिस्से के लिए। इसलिए हम बहुत संजीदा हैं। ये केवल बदलाव रैली यहाँ रामलीला ग्राउंड पे नहीं है। मैं मीडिया के साथियों को भी कहना चाहती हूँ, ये यूँ ही नहीं आए हैं। गांव-गांव में पदयात्रा की है, साइकिल जत्था निकाले हैं, लोगों के बीच घूमे हैं। वहां पर्चे बांटे हैं, लोगों का दुख सुना है, उनके साथ दुख बांटा है। और उनको ये कहते हुए कि हम दिल्ली जा रहे हैं, ये कहने के लिए मांग के लिए नहीं। इस सरकार से किसी मांग के पूरा होने की उम्मीद नहीं है। और इसलिए हम केवल बिगुल बजाने जा रहे हैं। और बिगुल वही है कि देश बदलाव चाह रहा है, लेकिन वो क्यों जरूरी है? बदलाव चाहिए, देश मांग रहा है, जनता मांग रही है, मजदूर मांग रहा है, किसान मांग रहा है, महिलाएं मांग रही, आदिवासी मांग रहे हैं। और जिनको जात-पात के नाम पे आप लोगों ने दबा के रखा, century old, वो सब बदला मांग रहे हैं। जब पहली बार नरेंद्र मोदी कुर्सी पर बैठे 2014 में, हमारी पार्टी की पहली प्रतिक्रिया थी, ये मात्र सत्ता परिवर्तन नहीं है, ये कुछ बुनियादी परिवर्तन हुआ है, ये खतरनाक परिवर्तन हुआ है। ये खतरे की घंटी पूरे देश के लिए है। इसलिए पार्टी ने अपनी पोंडिचेरी की कॉन्फ्रेंस में 2015 में विश्लेषण किया था। जो हमने पांडिचेरी में कहा, वो सब सच साबित होता हमें कोलम की कॉन्फ्रेंस में पहुंचते-पहुंचते दिखा। जब तक हम विजयवाड़ा पहुंचे, देश बहुत गहरे संकट में धंस चुका था। समाज के हर हिस्से के ऊपर हमले बढ़ चुके थे। हमारी शिक्षा पे, हमारे बुद्धिजीवियों पे, हमारे कलाकारों पे, हमारे सांस्कृतिक कर्मियों पे सबके ऊपर हमले थे। जो आदिवासियों में, जो दलितों में काम करने वाले लोग थे, उनको जेलों में ठूंसा गया। हमने कहा हालात और बिगड़ रहे हैं, और लड़ने की जरूरत है, और आंदोलन की जरूरत है। साथियों, हिंदुस्तान दुनिया के मुल्कों में एक बहुत बड़ी तादाद वाला मुल्क है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे देश के ऊपर जो व्यापार करने के नाम पे आए, उन्होंने हमारे देश में बांटने की राजनीति को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने को कंपनी बहादुर का दर्जा दे लिया, उसके बाद हमारे देश की रियासतों को आपस में लड़ा के हमारे मुल्क के ऊपर कब्ज़ा करना शुरू किया। हिंदुस्तान जो व्यापार में पचास फीसदी शेयर रखता था। साथियों, मैं आपको कहना चाहती हूँ, अपने देश की ताकत पहचानिए। उस हिंदुस्तान की तरफ लार लपका के अंग्रेज भी आए थे, जर्मन भी आए थे, फ्रांसीसी भी आए थे, पुर्तगाली भी आए थे। उस समय वो जो कंपनी बहादुर थी, वो आहिस्ता-आहिस्ता बाद में सीधे महारानी विक्टोरिया का राज बन गया। कंपनी बहादुर के टाइम पे हमारे किसानों पे हमले हुए, उनकी जमीनें छीनी गईं। हमारे जल, जंगल, जमीन के ऊपर आदिवासियों का अधिकार था, उनको वहाँ से हटाकर हमारी संपदा को लूटने का रास्ता बनाया। हमारे आदिवासी लड़े, बड़े-बड़े आदिवासी नेता हुए, जिसमें बिरसा मुंडा का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है। किसानों ने लड़ा, मजदूर ने लड़ा — चौदह घंटे, पंद्रह घंटे, सोलह घंटे, अठारह घंटे पीसने वाला, फिर भी घर में रोटी नहीं पकती। ये समाज के तीन हिस्से बहुत बड़े पैमाने पे अंग्रेजों को ललकारने के लिए मैदान में उतरे। यही जो लाल किला है, जहाँ पे बहादुर शाह जफर के पास सब लोग पहुंचे थे और कहा था आप देश के राजा हैं, आप हाँ भरिए, पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन चलना चाहिए। उसके बाद हमारे देश के अंदर आजादी के आंदोलनों में मजदूरों, किसानों, आदिवासियों के साथ हमारे विद्यार्थी जुड़ गए, हमारे युवा जुड़ गए। चौदह साल, तेरह साल, बारह साल की उम्र में बच्चे सड़कों पे आना शुरू हुए। ये आजादी के आंदोलन में कम्युनिस्टों का खून बहा है, हमारे मजदूर और किसानों का खून बहा है। उसमें हमारे युवाओं ने फांसियों के तख्ते चूमे हैं, उन्होंने गोलियां खाई हैं सीने में। वो भगत सिंह हो, सुखदेव हों, राजगुरु हों, चंद्रशेखर आजाद हों, रामप्रसाद बिस्मिल हो कि अशफाकउल्ला हो। जब कम्युनिस्ट पार्टी बनी, इस पृथ्वी पर एक देश समाजवादी देश के रूप में उतरा, सोवियत क्रांति का जिक्र किया गया। उसके बाद पूरी दुनिया में मजदूरों, किसानों और कम्युनिस्ट आंदोलनों को बहुत ताकत मिली। जब इस देश के जांबाज मजदूर और किसान लाल झंडा थाम रहे थे, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति ले के चल रहा था। मैं आज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के पोडियम से कहना चाहती हूँ, मिस्टर मोदी, मिस्टर अमित शाह और मोहन भागवत जी सुन लीजिए। ये आपका आपके पहले फाउंडर गुरु की जुबानी है कि आप हिटलर को मानते हो, आप नाजीवाद को मानते हो, आप फासीवाद को मानते हो, आप हिंदुस्तान के अंदर केवल हिंदू राज को मानते हो। अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति को आरएसएस ने चलाया। अभी जब मैं आपसे बात कर रही हूँ, मेरी आँखों को बहुत सुकून मिल रहा है, क्योंकि अभी भी जत्थे के जत्थे चले आ रहे हैं। रेलवे स्टेशनों से खबर आ रही है, ट्रेनें लेट हैं, लेकिन लोग आते चले जाएंगे और ये रामलीला ग्राउंड छोटा पड़ रहा है। हम केवल रैली करने नहीं आए, बदलाव क्यों जरूरी है, ये समझने और पूरे देश को समझाने के लिए निकल पड़ेंगे। हम सिर के ऊपर कफ़न बांध के निकलेंगे, हम अपने शहीदों की कुर्बानियों से रास्ता ले के निकलेंगे। इसीलिए मैं हैरान थोड़ी हूँ कि ये शिक्षा का सत्यानाश कर रहे हैं, कि इनको गधे चाहिए, इनको फूहड़ चाहिए। इनको चाहिए यहाँ भुस भरा हो, जो अंधभक्त बने रह सके। ये नहीं चाहते कोई किंतु करे, कोई परन्तु करे, कोई सवाल करे, कोई जिज्ञासा रखे, कोई विज्ञान की सोच रखे। क्योंकि वो हिंदुस्तान को सदियों पुरानी मनुस्मृति के दौर में फेंकना चाहते हैं। इसलिए ये आवाम में बताना जरूरी है कि ये लोग क्यों खिलाफ हैं हमारे विद्यार्थियों के और शिक्षा के, क्यों विरुद्ध हैं हमारे शिक्षकों के, क्यों विरुद्ध हैं सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के। ये हिंदुस्तान को आगे ले जाने की बजाय सदियों पीछे फेंकना चाहते हैं। और इसीलिए याद रखें, जब पूरा देश आजादी का आंदोलन तेज हुआ, चंद्र सिंह गढ़वाली ने कहा मैं हिंदुस्तानियों पे गोली नहीं चलाऊंगा, बंदूक फेंक दी। जब हमारी नेवी जंग के मैदान में उतर गई, RIN Mutiny, उसके ऊपर एक मुस्लिम लीग का झंडा था, एक तिरंगा था और एक कम्युनिस्टों का झंडा था। कहाँ थी आरएसएस तब? ये देश को दो हिस्सों में कर दो, चाहे कई हिस्सों में कर दो, लेकिन हमें अपना हिंदू राज बनाना है, ये 1925 में आरएसएस ने बनते वक्त कहा था। भाईचारा, दोस्ती, सांझी विरासत, गंगा-जमुनी तहजीब इनकी डिक्शनरी में नहीं है। हेडगेवार से पूछा गया, आप अंग्रेजों से लड़ोगे? उन्होंने कहा नहीं। तो आपकी लड़ाई किससे है? उन्होंने कहा मुसलमानों से है, ईसाइयों से है और लाल झंडे से है। मिस्टर नरेंद्र मोदी ने तीन साल पहले अपनी बीजेपी की टॉप लीडर मीटिंग में बोला था कि ये कम्युनिस्ट खतरनाक होते हैं, ये लाल झंडे वाले खतरनाक होते हैं। मिस्टर नरेंद्र मोदी, हम तो शुरू से जानते हैं कि तुम किसको निपटाना चाहते हो, आज हम कहने के लिए आए हैं, तुमको निपटा डालेंगे। लाल झंडे को चुनौती दे रहे हो, तिरंगे झंडे को पैरों के नीचे कुचलते रहे थे, उसको जलाते रहे थे। इसलिए कभी अर्बन नक्सल बोलते हो, कभी दिमागी नक्सल बोलते हो। अरे भाई दिमाग होता तो कुछ बनेंगे ना। इसीलिए साथियों, ये कामयाब नहीं हुए, देश के बंटवारे की सियासत चलाई। लेकिन जब हम इसके बावजूद भी इतना गरीब, इतनी अनपढ़ता, इतनी अज्ञानता, शिक्षा भी कम, रोज़गार भी नहीं, कारखाने भी नहीं, बुरी हालतें, infrastructure भी नहीं और ऊपर से लाखों लोग शरणार्थी यहाँ पर पहुंचे, उनको बसाना, फिर से अपने देश को आजाद हिंदुस्तान को एक दिशा देना। तब क्या कहा आरएसएस, बीजेपी ने? इन्होंने कहा पब्लिक सेक्टर नहीं चाहिए, सरकार को कोई शिक्षा में, स्वास्थ्य में, पीने का पानी देने में, सड़क देने में कुछ नहीं करना चाहिए। जो बेघर हैं उनको छत देने की जरूरत नहीं है, जो भूमिहीन हैं उनको जमीन देने की जरूरत नहीं है। इन्होंने पब्लिक सेक्टर का विरोध किया, पब्लिक सर्विसेज का विरोध किया, भूमि सुधार का विरोध किया। आज मैं कहना चाहती हूँ, जो सीनियर कॉमरेड्स आए हैं, बताइए अपनी नई पीढ़ी को, कम्युनिस्टों ने जो सरकार की फाजिल जमीनें थीं, इसी लाल झंडे को ले के जाकर उन जमीनों पर कब्जा किया और भूमिहीनों को बांटा। ये लाल झंडा संघर्षों का है। इसलिए बदलाव जरूरी है। ऐसी दकियानूस सरकार, संप्रदायवादी सरकार और फिर से वर्ण व्यवस्था को इस देश में स्थापित करने की कोशिश में लगी सरकार, हमारे सारे पब्लिक सेक्टर को नेस्तनाबूद करने की योजना से निकली सरकार, और इस के अंदर फिर से हजारों वर्षों की सोच को लाने वाली और वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का आइडिया रखने वाली सरकार, ये नहीं रहनी चाहिए। बहुत साथियों ने बोलना है, मुझे भी सीमा रखनी है, मैं बंद करना चाहूंगी, पर आपसे कहना चाहती हूँ, हम जवान हिंदुस्तान हैं, सत्तर फीसदी आबादी पैंतीस साल से नीचे है। हिंदुस्तान जवान है, ये हमारी पूंजी भी है, हमारी ताकत भी है, हमारी इकॉनमी में चार चाँद लगा सकती है। लेकिन अगर इनको पढ़ने नहीं दिया जाए, कुछ बनने नहीं दिया जाए, इनको रोजगार नहीं मिले तो ये बारूद का ढेर है। इसीलिए आज इस देश की इतनी बड़ी नौजवानों की जो ताकत है, वो सही दिशा में जा सके, बदलाव किस डायरेक्शन में है, वहां जा सके, इसलिए ये रैली है। आखिर में मैं ये कहूँगी कि ये तो समझ गए कि सब लोग बदलाव चाह रहे हैं। आप भी कहते हुए आए कि बदलाव रैली में जा रहे हैं, अब आज के बाद बैठने का नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी को फक्र है, हिंदुस्तान में सबसे पहले कम्युनिस्ट आंदोलन जब शुरू हुआ, 1925 में बनी आरएसएस, 25 में बनी हमारी, तब से टक्कर है इनके साथ। आप अपनी ताकत पहचानो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को आज मजबूत करने की जरूरत है और जन संगठनों को मजबूत करने की जरूरत है। तो उस पूरी सोच से भी मुक्ति चाहिए, केवल कुर्सी से मुक्ति नहीं, उस पूरी सोच से मुक्ति चाहिए जो इनकी है। इसलिए बदलाव रैली सोच के साथ, वैज्ञानिक रास्ते के लिए और जितनी मांगों के नारे आप दोहराते हो, वो सब पूरी हो सके, उस नई व्यवस्था में, समाजवादी व्यवस्था में, उसकी तरफ बढ़ने का रास्ता है। बदलाव जरूरी है।
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