रविवार, 28 मार्च 2021

‘ई.एम.एस.नम्बूदिरीपाद प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री

 देश में संपन्न प्रथम आम चुनावों ;1951-52 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर
उभरी। दूसरे आम चुनावों ;1957 में भी यही हुआ लेकिन एक और ऐतिहासिक घटना घटी। विश्व में दूसरी बार और भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनावों के जरिए सरकार बना ली। केरल में भा.क.पा. को बहुमत मिला और उसकी सरकार बनी। लोग चकित रह गए। स्वयं कम्युनिस्टों को अपने दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमन्त्री : ईएमएस नंबूदिरीपादविचार बदलने पड़े। पुरानी जड़वादी समझ के अनुसार ‘पूंजीवादी’ चुनावों के जरिये कम्युनिस्ट सरकार नहीं बना पाते। लेकिन ‘‘ई.एम.एस.’ को भारत का प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नियुक्त कर इतिहास रच दिया गया।
आरंभिक जीवन
एलमकुलम मनक्कल शंकरन   का जन्म 13 जून 1909 को मलप्पुरम जिले के पेरिथलमन्ना तालुक के कुन्थी नदी किनारे स्थित इलमकुलम में हुआ था। उनके पिता का नाम परमेश्वर नम्बूदिरीपाद और माता का विष्णुदाता अंथारजनम था। उनका खाता-पीता परिवार था। आगे चलकर वे ‘ई.एम. एस. के नाम से विख्यात हो गए।
नम्बूदिरी समुदाय पुरातनपंथ से ग्रसित था लेकिन अब विरोध और विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे थे। फलस्वरूप कई प्रकार के सुधारकउभर रहे थे जैसे, ‘‘योगक्षेम सभा’’ तथा अन्य। इनमें नौजवानों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। ई.एम.एस. भी इससे जुड़ गए। उन्होंने सभा की पत्रिका के लिए एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक थाः ‘‘फ्रांसीसी क्रांति और नम्बूदिरी समुदाय’’।
ई.एम.एस. 1925 में स्कूल में तीसरी क्लास में भर्ती हुए। इससे पहले उनकी पढ़ाई घर में ही ट्यूटर के जरिये हुई थी। उन्होंने 1929 में एस.एससी. पास किया। वे इंगलिश और संस्कृत में काफी अच्छे थे।
राष्ट्रीय आंदोलन में
1927 में ई.एम.एस. को मद्रास में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन को देखने का मौका मिला। वे उस वक्त पांचवीं
क्लास के विद्यार्थी थे। यह पहला मौका था जब वे इतने बड़े राष्ट्रीय आयोजन को देख रहे थे। वे पूरे ध्यानपूर्वक समूचे कांग्रेस नगर में घूमे। वे स्वतंत्रता सेनानी एम.पी. नारायण मेनन से गहरे रूप से प्रभावित हुए। जुझारू नेता वी.जे. मथाई को भी वे बहुत पसंद किया करतेउन्हें सुनने के लिए वे 8 कि.मी.दूर तक भी चले जाते। ई.एम.एस. जहां रहा करते उस लॉज में प्रादेशिक कांग्रेस कमेटी के दो सदस्य पहुंचे। उन्होने ई.एम.एस. से ‘बायकॉट प्रस्ताव’ का अंग्रेजी से मलयालम में अनुवाद करने के लिए कहा।
1928-29 में स्कूल में आगे पढ़ने के लिए वे पालघाट गए। फिर जून 1929 में वे सेंट थॉमस कॉलेज, त्रिचूर में भर्ती हो गए। राजगोपालाचारी और जमनालाल बजाज हिन्दी का प्रचार करने के ख्याल से पालघाट आए।
स्कूल के प्रिंसिपल ने इसका विरोध किया लेकिन प्रिंसिपल के इस रूख का विरोध करते हुए ई.एम.एस. और उनके मित्रों ने आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होने उन दोनों नेताओं से मुलाकात की वे कृष्णास्वामी अय्यर से मिलने शबरी आश्रम भी गए। ई.एम.एस. फिर रामास्वामी नाइकर के साथ हो लिए और उनकी पत्रिका ‘‘मुक्तिवादी’ में काम
करने लगे।
सी.एस.पी. और कांग्रेस कमेटी  में
ई.एम.एस. राष्ट्रीय आंदोलन में अधिक सक्रिय होते गए। एक समय ऐसा आया कि वे महसूस करने लगे कि कॉलेज की पढ़ाई उनकी राजनैतिक गतिविधियों मे बाधक बनती जा रही है। फलस्वरूप उन्होंने 4 जनवरी
1932 को कॉलेज छोड़ दिया और पढ़ाई को अलविदा कह दिया। वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल
हो गए। राष्ट्रीय तथा सुधार आंदोलनों के दौरान वे कम्युनिस्ट विचारधारा के नजदीक आने लगे। इस संदर्भ में उन
पर जी.डी.एच. कोल तथा कई अन्य नेताओं का गहरा प्रभाव पड़ा। साथ ही वे कैथोलिक आंदोलन के विचारों से
भी प्रभावित हुए। उनके शिक्षकों में एक थे जोसेफ मुंडासरी जो इस आंदोलन से जुड़े हुए थे। मुंडासरी बाद में 1957
के कम्युनिस्ट मंत्रिमंल में मंत्री भी बने थे। ई.एम.एस. को असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार कर लिया गया। उनके
शिक्षक एम.पी. पॉेल ने उनकी प्रशंसा की लेकिन इसके लिए उन्हें अपनीनौकरी से हाथ धोना पड़ा।
‘‘नम्बूदिरी युवजन संघम’ ने गरीब लोगों के आंदोलन संगठित किए। दांडी मार्च की तर्ज पर उन्होंने प्रदेश-स्तर
पर पैदल-यात्राएं संगठित कीं। ई.एम. एस. ने इस दौरान जवाहरलाल लेहरू की एक संक्षिप्त जीवनी भी लिखी। खादी पहनने और बेचने का काम जोरों-शोरों से चल पड़ा। गांधी-इरविन पैक्ट के बद ई.एम.एस. ने पय्यान्नूर तथा बाडागारा में राजनैतिक सम्मेलनों में भाग लिया।
इनमें जे.एम. सेनगुप्ता, के.एफ. नरिमन तथा अन्य ने भी हिस्सा लिया। सम्मेलन में भाग लेने वालों में कई आगे चलकर उनके मित्र भी बने।
‘गुरुवय्यूर मंदिर प्रवेश आंदोलन’
का आरंभ 1 नवंबर 1931 के हुआ जिसमें ई.एम.एस. ने भी भाग लिया। उन्होंने साप्ताहिक ‘उन्नी नम्बूथिरी’ के
पाठकों के नाम अपनी पढ़ाई छोड़ने संबंधी एक संदेश लिखा। फिर वे त्रिचूर से कालीकट कांग्रेस के सविनय अवज्ञा
सत्याग्रह में भाग लेने चले गए। उन्हे गिरफ्तार कर विभिन्न जेलों में रखा गया जैसे कालीकट, कन्नानोर, वेल्लोर, इ.। वहां उनकी कृष्ण पिल्लै और बाद में ए.के. गोपालन से मुलाकात हुई। उनकी मुलाकात के.एन. तिवारी, किरण दास, आर.एम. सेनगुप्ता, आरसी. आचार्य, एन.जी. रंगा तथा अन्य से भी हुई। कन्नानोर जेल में
1933-34 में वामपंथी कांग्रेसियों का एक ग्रुप तैयार हआ। ई.एम.एस. जल्द ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी  में शामिल
हो गए। 1934 में कालीकट में वामपंथी कांग्रेसियों ने सी.एस.पी. की केरल इकाई की स्थापना की गई।
इसकी अध्यक्षता केलप्पन ने की। ई. एम.एस. ने पटना में मई 1934 में आयोजित सी.एस.पी के अखिल भारतीय
कन्वेंशन में भाग लिया। वे आगे इसकी कार्यकारिणी में शामिल कर लिए गए।
जयप्रकाश नारायण की रचना
‘समाजवाद क्यों?’ ;अंग्रेजी मेंद्ध ने ई. एम.एस. को बड़ा प्रभावित किया। कम्युनिस्टों ने इस पुस्तक की आलोचना
की। इसका असर ई.एम.एस. पर पड़ा और वे कम्युनिस्ट पार्टी के नजदीक आए। 1935 में उनकी मुलाकात कृष्ष्ण पिल्लै, एस.वी. घाटे और सुंदरैय्या से मद्रास में हुई। जनवरी 1936 में उन्हें भा.क.पा. के सदस्य बनाया गया।
इस प्रकार इस वक्त वे सक्रिय कांग्रेस, सी.एस.पी. के नेता और एक कम्युनिस्ट, तीनों ही थे।
जुलाई 1937 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया। कृष्ष्ण पिल्लै इसके सचिव बनाए गए तथा नेतृत्व के अन्य साथी थे केदामोदरन, एन.सी. शेखर तथा ई.एम. एस. नम्बूदिरीपाद। इसके तुरंत ही
बाद ई.एम.एस. को केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का संगठन मंत्री बनाया गया।
फिर 1938-39 के दौरान वे दो बार के.पी.सी.सी. के सचिव चुने गए। ई.एम.एस. लिखते हैं मद्रास और बंबई प्रदेशों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन से कम्युनिस्ट पार्टी को खुले रूप से काम करने का अधिक मौका मिला। मालाबार की सी.एस.पी. ने ‘प्रभाकर’ नामक एक साप्ताहिक आरंभ किया जिसका संपादन ई.एम.एस. किया करते थे। इस वक्त कम्युनिस्ट और सी.एसपी. वाले प्रदेश कांग्रेस के नियंत्रण में थे। भा.क.पा. का अखबार ‘‘नेशनल फ्रंट’ तथा सी.एस.पी. का ‘‘कांग्रेस सोशालिस्ट’ इस दिशा में सहायक थे।
मालाबार किसान आंदोलन
उन दिनों मलाबार मद्रास प्रेसिडेन्सी का हिस्सा था। कोचीन और त्रावणकोर सामंती रजवाड़े थे जो एकीकृत केरल
का हिस्सा बने। फरवरी 1939 में ई. एम.एस. मद्रास असेम्बली के लिए निर्विरोध चुने गए। उससे पहले 1937
और 1938 में उनका मनोनयन रद्द हो गया था। वे विधायिका द्वारा गठित ‘‘टेनेन्सी एन्क्वायरी कमेटी’ काश्तकारी जांच समितिद्ध के सदस्य चुने गए। ई.एम.एस. समेत समिति में अल्पमत रखे वालों ने मलाबार
काश्तकार अधिनियम तथा कुप्रसिद्ध सामंती ‘जेन्मी’ प्रणाली समाप्त करने पर जोर दिया। इस कार्य के दौरान ई.
एम.एस. को मलाबार, त्रावणकोर तथा कोचीन की कृषि प्रणाली का अध्ययन करने का मौका मिला। आरंभ में ई.एम. एस. ने किसान आंदोलन को ‘‘समाजवादी बारदोली’ का नाम दिया।
वामपंथी कांग्रेसियों ने मलाबार से त्रावणकोर किसान जत्था संगठित किया जिसमें ई.एम.एस. ने सक्रिय हिस्सा
लिया।
1940 में सी.एस.पी. के एक सम्मेलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विलय का निर्णय लिया गया। इसी दौर में ई.एम.एस. ने केरल के किसान आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास लिखा।
1942 में पार्टी पर से पाबंदी हटा ली गई। मार्च 1943 में कय्यूर की घटना घटी जिसमें चार किसान कार्यकर्ताओं
को फांसी की सजा दी गई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की प्रथम कांग्रेस ;बंबई, 1943 में ई.एम. एस. को केंद्रीय समिति का सदस्य चुन लिया गया। जनवरी 1947 में ई. एम.एस. उस समय गिरफ्तार कर लिए गए जब वे चेचक के कारण बिस्तर पर लेटे हुए थे वे सात महीनों तक वेल्लोर जेल में रखे गए।
‘बी.टी.आर. लाइन’ और ई.एम.एस.
1946 से 1951 के बीच पार्टी के बार-बार बदलती लाइन के बारे में ई.एम.एस. का कहना है कि 1946 से पहले वे ‘‘जोशी लाइन’ पर चला करते। 1946 में उन्होंने ‘अधिक जुझारू लाईन’ का समर्थन किया जिसके फलस्वरूप उनकी व्याख्या के अनुसार, ‘पुन्न्प्रा-वायलार’ और ‘तेलंगाना सशस्त्र-संघर्ष’ संभव हो सका। 1948 की कलकत्ता पार्टी कांग्रेस ई.एम.एस. के ही शब्दों में ‘‘मैं बाकी साथियों के साथ बदलाव के पक्ष में रहा और लाईन में परिवर्तन का समर्थन किया।’’ अर्थात वे ‘‘बी.टी.आरलाईन’ का समर्थन करने लगे। इसके बाद वे ‘‘आंध्र लाइन’ के पक्ष में हो
लिए। ई.एम.एस. के अनुसार इस कारण उन्हें न ‘रणदिवे पॉलिट ब्यूरो में शामिल किया गया और न ही राजेश्वर
राव पॉलिट ब्यूरो’ में। ई.एम.एस. ने कभी भी बी.टी.आर. लाइन के बारे में स्पष्ट स्थिति नहीं अपनाई।
ई.एम.एस. को उस वक्त पार्टी केंद्र के इन्चार्ज बनाया गया। यह उस वक्त हुआ जब भा.क. पा. का चार-सदस्यीय
प्रतिनिधिमंडल 1950 में मास्को गया था। लौटने के कुछ समय बाद अजय घोष 1951 में पार्टी महासचिव बनाए
गए। पॉलिट ब्यूरो मे ई.एम.एस. भी शामिल किए गए। इसके बाद वे953-54 ;मदुरै और पालघाट 1956 पार्टी कांग्रेस में पॉलिट ब्यूरो में फिर शामिल किए गए। अमृतसर 1958 और विजयवाड़ा ;1961 पार्टी कांग्रेसों में सांगठनिक ढांचे के तीन-स्तरीय बनने क बाद वे केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल किए गए।
कुछ समय तक वे पार्टी मुखपत्र ‘न्यू एज’ के संपादक भी रहे।
प्रथम कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री,
1957 केरल राज्य का गठन 1957 में मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर के विलय के बाद हुआ। 1957 में केरल असेम्बली के प्रथम चुनाव हुए जो देशव्यापी चुनावों का हिस्सा थे।
नतीजों ने सारे देश में हलचल मचा दी। भा.क.पा. को बहुमत मिला। लोग चकित रह गए। स्वयं कम्युनिस्टों को
पूर्व के अपने यांत्रिक विचारों में परिवर्तन करना पड़ा। पहले की कठमुल्लावादी समझ के अनुसार कम्युनिस्ट ‘
पूंजीवादी’ चुनाव न जीत सकते हैं और न तो सरकार ही बना सकते। यह समझ गलत साबित हो गई।
भा.क.पा. ने मुख्यमंत्री पद के लिए विचार-विमर्श के बाद ई.एम.एस. को चुना। कम्युनिस्ट सरकार ने भूमि सुधार
आरंभ किए और शिक्षा बिल पेश किए। सरकार को केंद्र ने 1959 में बर्खास्त कर दिया।
ई.एम.एस. 1967 में फिर से एक बाद मुख्यमंत्री बने जब उन्हें 7-सदस्यीय संयुक्त सरकार का नेता बनाया गया। 1969 में मई सरकार बनी जिसमें फूट क बाद पहली बार भा.क.पा. के सी. अच्युत मेनन मुख्यमंत्री बने।
अमृतसर पार्टी कांग्रेस, 1958 इस कांग्रेस में भा.क.पा. ने अपने संविधान, कार्यक्रम संबंधी प्रस्थापनाओं और सांगठनिक ढांचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। पार्टी ने ‘सर्वहारा अधिनायकवाद’ का सिधान्त छोड़ दिया।
समाजवादी भारत में विरोधी पार्टियों के अस्त्ति्व की कल्पना की गई। संगठन का ढांचा 2-टीयर से 3-टीयर वाला
बनाया गया। पार्टी कांग्रेस के तुरंत बाद पार्टी मुखपत्र ‘न्यू एज’ में ई.एम.एसने अपने लेख में न सिर्फ इन निर्णयों
का स्वागत किया बल्कि यह भी कहा कि इनके जरिए भारत के कम्युनिस्ट महात्मा गांधी की विरासत आगे ले जा
रहे हैं।
‘ई.एम.एस.’ः प्रथम कम्युनिस्ट.. महासचिव के रूप में जनवरी 1962 में अजय घोषकी मृत्यु के बाद ई.एम.एस नम्बूदिरीपाद को पार्टी का महासचिव बनाया गया और एस.ए. डांगे को अध्यक्ष।
सी.पी.एम. में शामिल
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में फूट पडने के बाद ई.एम.एसनम्बूदिरीपाद सी.पी.एम. में शामिल हो गए। वे उन 32 साथियों में थे जिन्होंने अप्रैल 1964 की राष्ट्रीय परिषद की बैठक से वॉकआउट कर अलग पार्टी बनाने की घोषणा की थी। वे पीसुंदरैय्या द्वारा सी.पी.एम. के महासचिव पद से इस्तीफा दे देने के बाद उसके 1977 में महासचिव बनाए गए। वे इस पद पर 1992 तक बने रहे।
ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद की मृत्यु
19 मार्च 1998 को 89 की आयु में हुई।
रचनाएं
ई.एम.एस. ने विभिन्न विषयों पर काफी कुछ लिखा। कृषि समस्या पर उनके कई लेख एवं पुस्तिकाएं हैं।
उन्होने अपनी आत्मकथा, स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, महात्मा गांधी के विचारों के बारे में, आर्थिक प्रश्श्नों,
इत्यादि पर व्यापक तौर पर लिखा। मलयालम में उनके लेख संकलित किए गए हैं।
वे सांस्कृतिक क्षेत्र में भी सक्रिय थे।
-अनिल राजिमवाले