शनिवार, 10 अप्रैल 2021

इला मित्राः तेभागा संघर्ष तथा पाक तानाशाही के खिलाफ लड़ाई की नायिका

 इला मित्रा का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को कलकत्ता में एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। उनका परिवार एक पढ़ा-लिखा धनी परिवार था। इला के पूर्वज वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही जिले के जेनाइदा सब-डिविजन स्थित बागुतिया ग्राम से थे। उसके पिता नागेंद्रनाथ सेन कलकत्ता में ए.जी.बी. कार्यालय में एकाउंटेंट थे। आरंभिक पढ़ाई के बाद उनकी आगे की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय के बेथ्यून स्कूल एंड कॉलेज में हुई। उसने 1944 में बांगला साहित्य में बी.ए. ;ऑनर्स पास किया। आखिरकार वह बंगला साहित्य और संस्कृति में एम.ए. 1958 में ही कर पाईं। इन 13 वर्षोंं में वह अत्यंत कष्टमय जीवन से गुजरी जिसका उल्लेख हम आगे करेंगे।Comrade Ila Mitra: Light of Inspiration
चैम्पियन खिलाड़ी
अपने स्कूल एवं कॉलेज के दिनों में इला बहुत ही मेधावी खिलाड़ी थी। उसे ढेर सारी ट्रॉफियां मिली थीं। वह 1935 से 38 तक बंगाल प्रेसीडेन्सी की चैम्पियन एथलीट थी। वह बहुत अच्छी बास्केटबॉल खिलाड़ी भी थी।
वह खेलों की दुनिया में स्टार के रूप में प्रसिद्ध हो गई। उसे जापान में आयोजित ऑलिम्पिक खेलों के लिए
भारत से खेलने के लिए चुन भी लिया गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से खेल नहीं हो पाए।
राजनीति में
अपनी पढ़ाई के दौरान इला ए. आई.एस.एफ. के संपर्क में आई। बाद में वह विश्वयुद्ध  के दौरान ‘महिला
आत्मरक्षा समिति’ में शामिल हो गई। वह जल्द ही कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आ गई और 1943 में 18 वर्ष
की आयु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बन गई।
इला का विवाह 1944 में रामेन्द्र नाथ मित्रा से हुआ। रामेन्द्र भी धनी जमींदारी परिवार के थे। लेकिन जल्द
वे भी किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और होलटाइमर बन गए। इला भी रामचंद्रपुर चली गई और उन्हें 1948 में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
इसी दौर में कलकत्ता में दंगे शुरू हो गए। पार्टी ने इला के दंगा-पीड़ितों के राहत-कार्य के लिए नोआखाली जाने
का आदेश दिया। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं के साथ व्यापक दौरा किया। उन्होंने
बड़े पैमाने पर राहत कार्य किया। वह पहला मौका था जब इला का इतने बड़े पैमाने पर आम जनता से संपर्क स्थापित हुआ ।
देश के विभाजन के बाद मित्रा परिवार की जमींदारी पूर्वी पाकिस्तान में रह गई। इसलिए इला समेत उनका
परिवार वहीं रह गया। एक स्थानीय किसान नेता अल्ताफ हुसैन की पहल पर कृष्णा-गोविंदपुर में एक स्कूल खोला गया जो इला के घर के नजदीक था। लोगों ने मांग की कि ‘‘बधुमाता’ अर्थात इला उनके बच्चों को बढ़ाए। इला तेयार हो गईं पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। स्कूल ने एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया।
उस वक्त पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी को भारी दमन का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए उन्हें अंडरग्राउंड
जाने के लिए कहा गया। उस वक्त इला गर्भवती थी। वे कलकत्ता चली गईं। वहां उन्होंने अपने पुत्र मोहन को जन्म दिया। मोहन की देखरेख इला की सास ने रामचंद्रपुर में किया।
पाकिस्तान में पार्टी कार्य तथा किसान संघर्ष इला अपने पति के साथ वापस पूर्व पाकिस्तान लौट गईं। वे नवाबगंज के नाचोल में रहने लगीं। नाचोल राजशाही से 35 कि.मी. दूर है जहां जाने का रास्ता अत्यंत दुर्गम है। स्थानीय नेतृत्व ने किसानों को संगठित किया जिनका संघर्ष आगे चलकर सुप्रसिद्ध ‘तेभागा’ आंदोलन का हिस्सा बना। पूर्वी पाकिस्तान की मुस्लिम लीग सरकार आंदोलन को अमानवीय तरीके से कुचलने की पूरी-पूरी कोशिश कर रही थी।आजाद भारत के असली सितारे-14 - सबलोग
नाचोल क्षेत्र में जोतदारों को फसल उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा देना पड़ता था जबकि किसानों के पास मात्र
एक-तिहाई ही बचता था। उत्तरी बंगाल के अन्य जिलों में फसल का आधा-आधा बंटवारा किया जाता था।
धान की सफाई की मजदूरी 20 में से 3 ही हिस्सा ;‘अरास’द्ध थी जबकि वे 7 हिस्से की मांग कर रहे थे।
इला ने चांदीपुर को अपने काम का केंद्र बनाया। चांदीपुर में एक जाने-माने संथाल कम्युनिस्ट नेता
मातला माझी थे जिनका घर आंदोलन का केंद्र बना। इला मित्रा ने उस क्षेत्र में घूम-घमकर काफी काम किया और
खेतिहर मजदूरों तथा किसानों को संगठित किया। वे ‘‘रानी मां’ के नाम से जनता के बीच लोकप्रिय हो गईं
उनके कार्यों की प्रशंसा में गीत रचे जाने लगे।
यह संघर्ष सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण करने लगा। किसान आंदोलन के नेत्ृत्व ने बहुत सरल और प्रभावशाली
तरीका अपनाया। फसल कट जाने पर मालिकों को विशेष दिन बुलाया जाताऋ उस दिन सामान्य ग्रामीण और किसान भी उपस्थित होते। फसल तीन हिस्सों में बांट दी जातीः किसान को दो हिस्से मिलते। जोतदार को एक।
1950 आते-आते भूस्वामियों ने ‘तेभागा’ और ‘सात आरी’ मान ली
लेकिन प्रशासन और बड़े भूस्वामी अंदर-अंदर नाराज हो रहे थे तथा चुप नहीं बैठे थे। उन्होंने सशस्त्र बलों तथा पुलिस को गोलबंद करना आरंभ कर दिया। वे किसानों एवं ग्रामीणें को डराने-धमकाने और लूटने लगे। उनकी
फसलें लूटी जाने लगीं। बड़ी संख्या में किसानों तथा मजदूरों को गिरफ्तार कर उन्हें यातनाएं दी जाने लगीं।
7 जनवरी 1950 को नाचोल में दो हजार सेना पहुंच गई और उन्होंने दर्जनों गांवों को आग लगा दी। फौज के साथ पुलिस और अन्सार भी लगे हुए थे। वे गांवों और घरों में घुसकर लूटपाट करने लगे। सैंकड़ों संथाल मारे गए।
साथियों ने इला मित्रा से अनुरोध किया कि सीमा-पार भारत भाग जाएं।
इसके लिए उन्होंने धान से लदे बैलगाड़ियों में उन्हें छिपाकर ले जाने का इंतजाम का वादा भी किया। लेकिन
इला किसी तरह मानने को तेयार नहीं हुई जब तक कि उनके साथी रिहा नहीं कर दिए जाते। रामेन्द्र मित्रा का
ग्रुप भारत जाने में सफल हो गए लेकिन कई अन्य सफल नहीं हो पाए। इला संथाल वेशभूषा पहने हुए उनकी भाषा
बोलते हुए उनके बीच छिपी हुई थीं लेकिन खुफिया विभाग के एजेंटों ने उन्हें पहचान लिया। वे अपने सैंकड़ों साथियों के साथ गिरफ्तार कर ली गईं। फिर नाचोल पुलिस थाने में अमानवीय शारीरिक यातनाओं का दौर
शुरू हो गया। सैंकड़ों लोगों को बुरी तरह पीटा गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं। पुलिस चाहती थी कि लोग
इला को अपना नेता बताकर गलत काम करवाने की जिम्मेदारी उनपरडालें। लेकिन किसी ने भी अपना मुंह
तक नहीं खोला। इला पर पुलिसवालों की हत्याएं करवाने का आरोप भी लगायागया। सिर्फ यातनाओं के कारण 100 से भी अधिक लोग मारे गए।
पाकिस्तान में इला मित्रा पर आमनवीय अत्याचार उसके बाद इला मित्रा पर अमानवीय और अवर्णनीय अत्याचारों का दौर आरंभ हुआ। उस वक्त पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही का दौर आरंभ हो रहा था। चरमपंथी मुस्लिम सांप्रदायिक लोग हावी थे। इला कम्युनिस्ट थीं,महिला थीं और हिन्दू भी थीं। इन तीनों
का पूरा इस्तेमाल उनके खिलाफ किया गया। पाक सरकार ने उनसे बातें मनवाने के लिए राज्य एवं पुलिस तथा
फौजी मशीनरी का भरपूर प्रयोग किया लेकिन वह बुरी तरह असफल रही। इला की सहयोगी तथा सामाजिककार्यकर्ता मनोरमा मसीमा और भानु देवी तथा अन्य ने इस बात पर दृढ़ता से जोर दिया कि इला मित्रा अपने ऊपर किए गए अत्याचारां का बिना छिपाए पूरा-पूरा विवरण लोगों तक  पहुंचाएं। इला उनके विस्तार में जाने से हिचक रही थीं।
इला को न खाना दिया गया और न ही पानी, उन्हें लगातार राइफलों के‘बट’ से पीटा गया, पेट तथा अन्य
हिस्सों पर बूटों से मारा गया, दाहिने पैर में कील ठोकी गई, और बारम्बार बलात्कार तथा नारी पर जो भी
अत्याचार किए जा सकते थे, किए गए।
इला पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार 3-4 दिनों तक चलता रहा।वह पूरी तरह खून में नहा गई। यह
सबकुछ वर्णनातीत है। उन्हें फिर नवाबगंज जेल ले जाया गया जेल के गेट पर ही उनकी फिर
पिटाई की गई। बाद में जेल के सेल में कुछ पुलिस अफसरों ने उनकी सहायताकी और आगे अत्याचारों से बचाया।
उनमें से एक कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनके साथ पढ़ा करता था। बाद में इला ने उन सबों को धन्यवाद भी दिया।
वह रात में चुपके से भोजन और दवाएं दे आता। जेलों में इला को दी गई यातनाओंका वर्णन उनके वक्तव्य के रूप में ‘‘लियाकत-नूरूल आमीन सत्ता’ केखिलाफ हैंडबिल की शक्ल में सारेदेश में बांटा गया। लोग यह सब पढ़कर
दंग रह गए और गुस्से में आ गए।मुकदमे में इला पर आंदोलन कानेतृत्व कर किसानों को भड़काने, फसलें
लुटवाने और पुलिस अफसरों की हत्याएंकरवाने का आरोप लगाया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति चकनाचूर हो चुकी थी। वे लिखती हैः
‘‘कभी-कभी अपने बच्चे को जन्म देने के खुशी के क्षण सामने से गुजर जाते...........लेकिन जल्द ही लुप्त हो जाते...........मेरे पास कोई भी अच्छी यादें नहींबची थीं.......... सबकुछ जैसे अंधकार में डूब गया था....जज की आवाज उभर आती......लेकिन सबकुछ शून्य में खो जाता।’’
इला को ढाका सेंट्रल जेल लाया गया। फिर उन्हें ढाका मेडिकल कॉलेज 1953 में उस वक्त लाया गया जब वे मरणासन्न थीं। सैंकड़ों लोग उनसे मिलने आते। मौलाना भशानी तथा अन्य नेताओं ने पूर्वी पाकिस्तान असेम्बली
में चिंता व्यक्त करते हुए उनके रिहाई की मांग की।
उन्हें जून 1954 के मध्य में पैरोल पर छोड़ा गया और इलाज के लिए कलकत्ता लाया गया। वे धीरे-धीरे सुधरने लगीं। अब पाकिस्तान की सरकार को मालूम हुआ कि उनकी हालत सुधर रही है तो उसने भारत सरकार पर उन्हें वापस भेजने का दबाव बनना शुरू किया ताकि उन पर मुकदमे आगे बढ़ाए जाए। सबों ने उन्हें वापस भेजने से इंकार कर दिया ताकि वे पाक तानाशाही से दूर रहें।
उनकी देखभाल डॉ. शिशिर मुखर्जी तथा अन्य डॉक्टर कर रहे थे। साहित्यकार दिपेन्द्र बंदोपाध्याय ने उनकी स्थिति का विस्तार से वर्णन किया है। सुचित्र मित्र, सुभाष मुखोपाध्याय तथा अन्य कई साथियों ने उनकी
मानसिक स्थिति बेहतर बनाने में उनकी बड़ी मदद की। सुभाष ने उनपर एक कविता लिखीः 

‘‘केनो बोन पारुल डाको रे’। प. बंगाल में पार्टी का काम इला मित्रा पूर्वी पाकिस्तान वापस नहीं लौटी और प. बंगाल में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का काम करती रहीं। उन्होंने 1957 में बंगल में निजी विद्यार्थी के रूप में अपना एम.ए. पूरा किया और फिर सिटी कॉलेज ;साउथ कलकत्ता में प्रोफेसर का काम करना आरंभ किया।
इला मित्रा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  की ओर से प. बंगाल असेम्बली के चुनाव लड़ी। वे
मणिकतला चुनाव क्षेत्र से 1962-71 और 1972-77 में चार बार चुनी गयी।
हालांकि वे पूर्वी पाकिस्तान ;बांगलादेशद्ध वापस नहीं लौटीं लेकिन उसे कभी भी भुलाया नहीं। बांगलादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान उनका घर और पार्टी ऑफिस मुक्ति योधाओं की  गतिविधियों का केंद्र रहा। उन्होने कहा कि वे उस देश की रिणी हैं और यह उनका कर्तव्य है।
उन्होंने 1972 और 1974 में बांगलदेश की यात्रा की। उनकी मुलाकात बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से हुई। बंगबंधु ने कहा कि इला और रामेन्द्र मित्रा उनकी पुत्री और पुत्र के समान हैं और जल्द ही वे उन्हें बांगलादेश के नागरिक के रूप में वापस लाएंगे। लेकिन इस बीच बंगबंधु की हत्या कर दी गई।
बांगलादेश में इला का पुश्तैनी घर  खस्ता हालत में खंडहर बना पड़ा है। दिनाजपुर, बांगलदेश, में इला की याद
में ‘तेभागा छत्र’ बनाया गया है जिसपर उनकी पेंटिंग उकेरी गई है।
1965 में इला मित्रा ने प. बंगाल में मुस्लिम-विरोधी दंगे रोकने में सक्रिय भूमिका अदा की। भारत सरकार से ‘‘ताम्र-पत्र’ इला मित्रा को देश की आजादी के संघर्ष में योगदान के लिए भारत सरकार से ‘ताम्र-पत्र’ प्रदान किया गया। उन्हें साहित्यिक अनुवाद के लिए ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ से भी नवाजा गया।
वे प. बंगाल राज्य किसान सभा की अध्यक्ष चुनी गईं और राज्य इस्कफ की कार्यकारिणी अध्यक्ष भी। उनकी मृत्यु कलकत्ता में 3 अक्तूबर 2002 को हो गई .

-अनिल राजिमवाले

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