शनिवार, 10 जुलाई 2021

मीनाक्षीताई साने सरदेसाई

 

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाई का जन्म, 18 मई 1909 को सोलापुर महाराष्ट्रद्ध में हुआ था। भाकपा के

सुप्रसि( नेता कामरेड एस.जी. सरदेसाई

उनके बड़े भाई थे। जाहिर है मीनाक्षी

ने सरदेसाई से बहुत-कुछ सीखा और

उन्हीं के प्रभाव से आगे चलकर भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुईं।

मीनाक्षी जब काफी छोटी ही थी

जब उसकी माता की लंबी बीमारी से

मृत्यु हो गई। उन्हीं टी.बी. थी जिसके

उपचार के लिए कभी सोलापुर तो कभी

हैदराबाद इ. हवा बदलने के लिए जाना

पड़ता। आखिरकार 1911 में ही

बिलिमोरा में उनकी मृत्यु हो गई। पहले

तो मीनाक्षी बंबई संबंधियों के यहां ले

जाई गई। उसे बचपन से ही लगातार

दमे की शिकायत रहा करती। उसकी

माता किर्लोस्कर परिवार से थीं और

उनका नाम था इंदिराबाई सरदेसाईऋ

पिता का नाम था जी. एस. सरदेसाई।

फिर डॉ. किर्लोस्कर मीनाक्षी को

सोलापुर ले आए। बीमारी के कारण

मीनाक्षी की पढ़ाई अक्सर घर में ही

हुआ करती। सोलापुर और बड़ौदा दोनों

ही जगहों में उसे पढ़ने का बड़ा मौका

मिला। उसके एक संबंधी बड़ौदा में

गायकवाड़ राजपरिवार की सेवा में थे।

7वीं क्लास की परीक्षा की तैयारी

मीनाक्षी ने घर में ही की और परीक्षा में

बैठी। जून 1925 में हिंगण में महिला

विद्यालय में आठवीं में भर्ती हुई।

राजनीति में

1925 में मीना के बड़े भाई

श्रीनिवास सरदेसाई ने बंबई के

सिडेनहैभ कॉलेज में दाखिला लिया।

उन्होंने कहा कि 1925 से 1930

का दौर राष्ट्रीय आंदोलन में उत्साह

और स्फूर्ति का दौर था। नौजवान नए

रास्ते की खोज में थे। वे मीनाक्षी को

विभिन्न विचारकों के बारे में बताय

करते। वे उससे कहते कि हमें

धंधा-व्यवसाय वगैरह नहीं करना है,

नौकरी नहीं करनी है। जो कुछ करना

है वह देश के लिए करना है। हमारे

जीवन का कोई न कोई उद्देश्य होना

चाहिए।

इन बातों का मीनाक्षी पर असर तो

पड़ना ही था। उसे भी लगने लगा कि

अन्याय के विरू( लड़ना चाहिए। वह

कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-52

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाईद्धः

आरंभिक महिला कम्युनिस्टों में

अपने मन में जगी शंकाओं का समाधान

अपने पिता श्री गणपतराव सरदेसाई

;आबाद्ध से पत्र व्यवहार के जरिये

खोजती। बाद में वे बर्लिन चले गए

थेऋ वहां से भी मीना के साथ उनका

पत्र व्यवहार जारी था।

मैट्रिक पास कर लेने के बाद

कॉलेज में भर्ती होने पर मीना ने लिखित

रूप में ‘‘मेरा ध्येय’’ नामक दस्तावेज

तैयार किया। यह उसने 29 नवंबर

1928 को तैयार किया। उसने लिखा

कि वह दो आंदोलनों में विशेषतौर पर

हिस्सा लेगीः एक कृषि तथा दूसरा

पतितो(ार। गरीब और निम्न वर्गों के

लिए कम से कम चार क्लास की पढ़ाई

कराने वाला स्कूल मुझे तैयार करना

ही है। उसने लिखा कि ‘‘अपनी इच्छा

इतनी तीव्र रखूंगी कि ऐसा स्कूल

स्थापित किए बगैर में मरने वाली नहीं।

यह शपथ मैं कभी न भूलूं, इसके लिए

वह कागज हमेशा मैं अपनी आंखों के

सामने रखूंगी’’-मीनाक्षी सरदेसाई!

मीना की कॉलेज की सखी बिंदू

सप्रे ;बाद में प्रमिला पानवलकरद्ध अपने

संस्मरणों में कहती हैं कि मीना बहुत

लोकप्रिय थी और हमेशा दूसरों की

मदद करने को तैयार रहा करती। उसे

जोर का दमा था फिर भी बड़ी सक्रियता

से मदद करती।

सरदेसाई और किर्लोस्कर परिवार

समाज सुधारक थे। श्रीनिवास सरदेसाई

की बहन होने का उसपर काफी प्रभाव

जो पढ़ने-लिखने, अध्ययनशीलता एवं

प्रगतिशील विचारों में दृष्टिगोचर होता

था।

उस जमाने में पूना ;पुणेद्ध में

देशभक्तों के भाषण हुआ करते। इन

मौकों पर मीनाक्षी सबको इसकी खबर

दिया करती और सखियों को इन सभाओं

में ले जाया करती।

20 मार्च 1929 का गांधीजी ने

नमक कानून तोड़ने का आंदोलन

आरंभ कर दिया। सत्याग्रह शुरू हो

गया। श्रीनिवास सरदेसाई ने गांधीजी

से भेंट करके जंगल सत्याग्रह की

अनुमति ले ली। कांग्रेस के नेता

शंकरराव देव ने जंगल सत्याग्रह की

जिम्मेदारी सरदेसाई को सौंपी। 1930

में नगर जिले के संगमनेर में सत्याग्रह

करने का फैसला किया गया।

मीनाक्षी तुरंत सक्रिय हो गईं और

अपनी दो सखियों को लेकर वह

संगमनेर जा पहुंची। सत्याग्रहियों के

पहुंचने से पहले ही लड़कियां गिरफ्तार

कर ली गईं। खबर अखबारों में छप

गई। सत्याग्रहियों ने पुलिस को समझाया

कि ये लड़कियां केवल सत्याग्रह देखने

आई थीं, पकड़ना है तो सत्याग्रहियों

को पकड़ो।

लड़कियां छोड़ दी गई। कॉलेज

लौटने पर प्रिंसिपल ने उनसे माफी मांगने

को कहा। मीनाक्षी ने साफ इंकार कर

दिया। अन्य लड़कियों ने कहा कि हम

किसी दबाव में नहीं, अपनी इच्छा से

गई थी। मीनाक्षी लोकप्रिय हो गई।

मीना विवाह करने के भी बहुत पक्ष

में नहीं थीं और उसे सामाजिक कार्य में

बाधा समझती थी।

1931 में सरदेसाई जेल से

छुटकर बाहर आए। उन्होंने मीनाक्षी

को 8-10 दिनों के लिए बंबई बुलाया।

उसे मार्क्सवाद संबंधी कईं बातें बताईं

और पढ़ने के लिए मार्क्सवाद की कई

पुस्तकें दीं।

मीनाक्षी ने बंबई में रहते हुए

‘प्रगति’ नामक पत्रिका में काम करना

आरंभ किया। उसने जी.ए. की परीक्षा

अच्छे दर्जे में पास की। इस बीच सतारा

के एस.एन.डी.टी. कॉलेज और कन्या

विद्यालय से उन्हें अस्थायी तौर पर

‘‘लेडी सुपरिंटेंडैंट’ का काम 1931

में मिल गया। वहां उसने एक साल

काम किया जबकि वह केवल2-3

महीनों के लिए गई थी।

उस वक्त सतारा के गणेशोत्सव में

मीनाताई ने दो भाषण दिए। निजी

संपत्ति के बारे में बोलते हुए उसने

लाफार्ग, बुखारिन, रसेल, इ. के विचार

प्रस्तुत किए। भाषण बड़े ही प्रभावशाली

रहे। श्रीनिवास सरदेसाई ने पत्र के

जरिये उनका अभिनंदन किया।

पार्टी में पूरावक्ती कार्यकर्ता

1932 में मीना को आगे पढ़ने

के लिए विदेश, खासकर अमरीका,

भेजने की तैयारियां चल रही थीं। लेकिन

मीना ने आगे पढ़ने या विदेश जाने का

विचार अंतिम रूप से त्याग दिया और

पूरी तरह पार्टी के काम में समय देने

का निर्णय किया। उसने पिताजी को

इसकी खबर भी दे दी। पिताजी ने

दबाव डाले बिना पत्र में उसके निर्णय

के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलू

मात्र उसके आगे रख दिए। मीना ने

कॉलेज/स्कूल को एक महीने की नोटिस

देते हुए डॉ. कमलाबाई देशपांडे को

पत्र लिख दिया। इसमें उसने कहा कि

पहले तो उसका इरादा आगे नौकरी

करने का था लेकिन बंबई में कामरेडों

से बातचीत करने तथा परिस्थिति देखते

के बाद उसने तय किया कि बिना कोई

समय गंवाए अब वह पूरी तरह भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी के काम में शामिल हो

जाएगी।

उस जमाने के लिए मीनाक्षी का

यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण और

साहसिक था। नौकरी छोड़ एक अच्छे

खाते-पीते घर की लड़की कठिन

परिस्थिति में बंबई में कम्युनिस्ट पार्टी

का पूरावक्ती काम करे, यह अत्यंत

कठिन निर्णय था। तीस के दशक में

शायद ही किसी अन्य महिला ने ऐसा

कदम उठाया हो। उसके इस निर्णय से

लोग चकित हो गए।

पार्टी मीना का खर्च उठने की स्थिति

में नहीं थी। इसलिए अण्णासाहेब बरवले

नामक वकील और उनकी पत्नी

माईसाहेब ने यह जिम्मेदारी बखूबी

निभाई। अण्णासाहेब मीना को पत्रों में

‘‘उल कंनहीजमत’’ ;मेरी पुत्रीद्ध संबोधित

किया करते।

मीना बंबई पहुंचकर घर जाने के

बजाय सीधे कम्यून चली गई। अब

वह क्रांति की सेवा में पूरी तरह समर्पित

हो गई। बंबई के कम्युनिस्टों का संभवतः

प्रथम ‘‘कम्यून’’ जनवरी 1933 में

स्थापित किया गया था। वह मांटुगा में

था। वहां रामकृष्ण जाम्भेकर, बसंत

खले, डॉ. अधिकारी, कराडकर,

कोल्हटकर, सरदेसाई इ. मंडली रहा

करतीऋ और इन सबके साथ अब मीना

भी रहने लगी। यह वह दौर था जब

पार्टी संकट से गुजर रही थी। मेरठ

षडयंत्र केस में उसके शीर्षस्थ नेता

गिरफ्तार हो चुके थे। पार्टी में गहन

आर्थिक एवं सांगठनिक संकट था।

मीना मजदूर बस्तियों में जाकर

मजदूरों, खासकर स्त्रियों से मिलने

लगीं। यहां तक कि वे मदनपुरा जैसी

बदनाम बस्ती में भी काम करने लगी।

‘‘लाल बावटा’ गिरणी कामगार यूनियन

12 मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक 11 - 17 जुलाई, 2021

के तहत बड़ी-बड़ी सभाएं संगठित की

जाने लगीं। उनमें मीना, जाम्भेकर,

कराडकर, इ. साथी काम करने लगे।

दो आने में सस्ती ‘राइस प्लेट’

तथा चाय-पाव वगैरह में ही काम चल

रहा था। अक्सर उनके पास खर्च के

लिए पैसे नहीं हुआ करते।

कभी-कभी मीनाक्षी इस बात से

नाराज होती और विरोध करती कि

मीटिंगों में उसे चाय बनाने के लिए

कहा जाता। वह साफ कहती कि आप

में से कोई भी चाय बनाने के सक्षम हैंऋ

फिर भी मुझे ही कहते है क्योंकि मैं

स्त्री हूं। वे सभी निरूत्तर हो गए।

सोलापुर में कार्य

कम्यून में मीनाक्षी की मित्रता

रघुनाथ कराडकर से बढ़ने लगी। वे

एक गरीब परिवार से थे और कम्युनिस्ट

विचारधारा से भलीभांति अवगत थे।

जल्द ही, दिसंबर 1932 में, उन

दोनों का विवाह हो गया। विवाह के

एक सप्ताह के अंदर ही दोनों को 3

दिसंबर को मजदूर आंदोलन के

सिलसिले में सोलापुर जाना पड़ा।

1920 में मजदूर 12 घंटे से

भी अधिक काम किया करते। उन्हें बहुत

थोड़ा वेतन, सड़ा हुआ अन्न और

साल-भर में पुरूष को एक जोड़ी धोती

और स्त्री को एक साड़ी मिल जाय तो

बहुत था!

इसके खिलाफ मजदूरों ने कई

हड़तालें कीं। 16 जनवरी 1920

को सोलापुर में मजदूरों की प्रथम बड़ी

हड़ताल हुई। इन हड़तालों को मजदूर

‘‘अड्डा करना’ कहते। अभी वे

‘हड़ताल’ से ठीक से अवगत नहीं थे।

तिलक ने उनका समर्थन किया।

1928 में सोलापुर में टेक्सटाइल

यूनियन ;लाल बावटा गिरणी कामगार

यूनियनद्ध की स्थापना की गई। सरदेसाई,

कराडकर, साने इ. नेता सोलापुर जाने

लगे।

अखबारों मे मीनाक्षी और कराडकर

के सोलापुर आगमन और स्टेशन पर

पहुंचते ही कराडकर की गिरफ्तारी की

खबरें छपीं। मीना के बारे में भी

सरदेसाई की बहन होने, इत्यादि संबध्ां

खबरें छपीं।

सोलापुर समाचार ;6

दिसंबर1933द्ध के अनुसार मीनाक्षी

ने मजदूरों की आम सभा में ‘इंकलाब

जिंदाबाद’ इ. नारे लगाए। बाद में अपने

भाषण में उन्होंने सारे देश में चल रहे

मजदूर आंदोलनों का ब्यौरा दिया।

ट्रेड यूनियन और मजदूर

आंदोलन में

कराडकर, साने तथा अन्य नेताओं

की गिरफ्तारी के कारण उनकी

गैर-हाजिरी में भी मजदूर आंदोलन

मीनाक्षीताई साने ;सरदेसाईद्धः आरंभिक महिला कम्युनिस्टों में

जारी था जिसमें मीनाक्षी बड़ी ही सक्रिय

थीं। वे हजारों मजदूरों को संबोधित

किया करतीं। लोग उन्हें देख आश्चर्य

चकित रह जाते- ‘ये कौन है?’ पूछते।

लोग कहा करतेः ‘‘डॉक्टर साब

;डॉ. बी.के. किर्लोस्करद्ध की नातिन है’!

किर्लोस्कर सुविख्यात समाज-सुधारक

थे। उन्होंने श्रीनिवास और मीनाक्षी के

रास्ते को समझने के लिए अपने 70वें

वर्ष की आयु के बाद मार्क्सवाद का

अध्ययन आरंभ किया! वे स्वयं एक

मार्क्सवादी बन गए और इस दृष्टिकोण

से कई लेख मराठी में लिखे। उन्होंने

कम्युनिस्टों की बड़ी मदद की।

मीनाक्षी को अक्सर ही गुप्त रूप

से मजदूर बस्तियों में रहना पड़ता था।

वे गुप्त बैठकों को संबोधित किया करतीं।

1934 की हड़ताल में मीनाक्षी तथा

कराडकर, बाटलीवाला, नांदेड, विभूते

इ. को 6 महीनों की सजा देकर बीजापुर

जेल में कैद रखा गया। यह हड़ताल

3 महीने चली।

यह पहला मौका था जब मीनाक्षी

जेल गई। उस समय वे गर्भवती थीं।

उन्हें कठोर कारावास की सजा दी गई।

लेकिन वे फिर भी डगमगाई नहीं जबकि

मैजिस्ट्रेट ने बी क्लास देने की

सिफारिश की थी। इसकी लोगों में तथा

अखबारों में तीखी आलोचना की गई।

छह महीनों बाद मीनाक्षी और

कराडकर अक्टूबर 1934 में जेल

से छूटे। जनवरी 1935 में उन्हें

पुत्र-प्राप्ति हुई। उसका नाम जतींद्र रखा

गया जो क्रांतिकारी जतीन सेन के नाम

पर था।

जेल से छूटने पर उन्हें रहने की

कई जगहें बदलनी पड़ी। इनमें से एक

स्थान पर मीनाक्षी ने ‘‘ए.बी.सी. ऑफ

कम्युनिज्म’ विषय पर कार्यकर्ताओं की

क्लास को संबोधित किया। सोलापुर

में संभवतः यह अपने ढंग का पहला

क्लास था। वे अपने बच्चे को कंधे पर

लादे मजदूरों के बीच इधर-उधर जाती

औेर बैठकें, आम सभाएं तथा दूसरी

गतिविधियां जारी रखती।

इस बीच उन्होंने बीड़ी महिला

मजदूरों को संगठित करना आरंभ किया।

मजदूरों के काम करने और रहने की

स्थितियां अत्यंत ही दयनीय थी।

10-10 घंटे गर्दन मोड़कर वे

महिलाएं बीड़ी बनाया करती। हजार

बीड़ियां पर उन्हें मात्र 5 आने मिला

करते। इसमें से भी मालिक किसी न

किसी बहाने पैसे काट लेते।

29 अक्टूबर 1934 को

शिवकरण मांगीलाल के बीड़ी कारखाने

में लगभग 125 महिला मजदूरों ने

हड़ताल कर दी। उनकी मांग थी कि

5 आने प्रति हजार के बजाय 8 आने

प्रति हजार बीड़ी मजदूरी दी जाए।

संभवतः सारे भारत के असंगठित क्षेत्र

के मजदूरों की यह प्रथम हड़ताल थी।

इसकी नेता मीनाक्षी थी। इन महिला

कामगारों को पुरूष कामगारों का पूर्ण

समर्थन हासिल था। पहली बार महिला

कामगार बाहर खुले में घूमने लगीं और

यूनियन की गतिविधियां करने लगीं जो

बहुतां को पसंद नहीं आया।

अंग्रेजों के प्रभुत्व वाले उस जमाने

में यूनियन और पार्टी का काम करने

वालों को आसानी से न रहने की जगह

मिला करती और न ही ऑफिस बनाने

और न आम सभा करने की। अक्सर

ही मालिक और प्रशासन के दबाव से

मालिक-मकान कमरे किराये पर देने

से इंकार कर दिया करते।

मीनाक्षी के नेतृत्व में हड़ताल कैसी

दीखती है, इसे ‘‘किर्लोस्कर मासिक’’

में लिखने के लिए सुप्रसि( मराठी

साहित्यकार ना. सी. फड़के को लेकर

शंकरराव किर्लोस्कर सोलापुर पहुंचे।

उनके घर पहुंचने के कुछ देर बाद

बाहर से नारों की आवाजें आने लगी।

महिला बीड़ी मजदूरों का जुलूस निकल

रहा थाऋ सभी छत पर पहुंच गएऋ देख

मीनाक्षी जुलूस के आगे-आगे लाल

झंडा लिए नारे लगाते चल रही थी।

सारा दृश्य उनके लिए विस्मयकारक

था। सारी महिलाएं रणचंडी बनी हुई

थीं!

जुलूस खत्म होने पर सरदेसाई और

मीनाक्षी दोपहर घर लौटे। वे सभी

हड़ताल और जुलूस के बारे में बातें

करते रहे। फिर रात नौ बजे यूनियन

ऑफिस में बातचीत और मीटिंगों का

सिलसिला आरंभ हो गया। मजदूरों की

एकता की ताकत का प्रभाव स्पष्ट था।

1937 के आम चुनाव

1935 के नए संविधान के

अनुसार 1937 के फरवरी में सारे

देश में सीमित आम चुनाव संपन्न हुए।

सोलापुर के कपड़ा मिल मजदूर संगठनों

और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ना

तय किया। मजदूर सीट से का.

खेडगीकर को खड़ा किया गया और वे

प्रचंड बहुमत से विजयी हुए। ‘‘इंजन’

चिन्ह से लड़ते हुए उन्हें 7719 वोट

मिले जबकि उनके प्रतियोगी श्री बखले

को मात्र 973 वोट ही मिले। बीड़ी

मजदूरों, खासकर महिला कामगारों,

के बीच असीम उत्साह का संचार हो

गया। उनमें भारी आत्मविश्वास पैदा

हुआ।

ब्रिटिश सरकार ने कुछ आदिवासी

समुदायों को ‘गुनाहगार’ का दर्जा दे

दिया था। उन पर सही-गलत मुकदमे

चला करते और समाज से बहिष्कृत

किया जाता। यूनियन ने संघर्ष करके

यह कानून वापस करवाया।

यूनियन के कार्यकर्ताओं ने

‘‘एकजुट’ ;एकजुटताद्ध नाम साप्ताहिक

पत्रिका आरंभ की। इसमें मीना सक्रिय

थीं। 14 फरवरी 1930 को

‘‘राजबंदी दिवस’ मनाया गया इसके

दौरान आम हड़ताल का आयोजन किया

गया। इसमें मीनाक्षी, कराडकर, विभूते

इ. नेता सक्रिय थे। मीनाक्षी को फिर 6

महीनों की सजा दी गईं उन्हें यरवदा

जेल मे रखा गया। वह जतींद्र को उसकी

दादी के पास रख गई।

रिहाई और नया जीवन

जेल में रहते हुए मीनाताई ने अपने

व्यक्तिगत जीवन पर पुनर्विचार किया।

वे इस नतीजे पर पहुंची कि परिवार,

विशेषकर बच्चे पर, अधिक ध्यान देना

आवश्यक है। परिवार को लेकर

कराडकर से उनकी दूरी बढ़ती गई।

जेल से छूटने के बाद मीनाताई ने

उनसे तलाक ले लिया और का. साने

के साथ विवाह कर लिया। इससे पहले

उन्होंने घर चलाने के लिए एक जगह

सेवासदन में शिक्षिका की नौकरी करने

की कोशिश भी की लेकिन कम्युनिस्ट

होने के नाते उनकी नौकरी छूट गई।

1938 में यरवदा जेल से छूटने

पर रेलवे स्टेशन पर सैंकड़ों मजदूरों ने

उनका स्वागत किया। 7 नवंबर को

औद्योगिक विवाद बिल के खिलाफ

हड़ताल आयोजित कीं गई जिसमें

मीनाक्षी अत्यंत सक्रिय रहीं। विशाल

जुलूस निकाले गए।

21 नवंबर 1938 को मीनाक्षी

मध्यप्रांत बीड़ी कामगार परिषद की

अध्यक्ष चुनी गई। 3 अक्टूबर 1939

को सोलापुर में ‘‘यु(-विरोधी दिवस’

मनाया गया इसमें सरदेसाई, साने,

मीनाक्षी इ. के भाषण हुए। 5 से 7

दिसंबर 1939 को सोलापुर में

महाराष्ट्र महिला परिषद का अधिवेशन

संपन्न हुआ। मीनाक्षी इसके

संगठनकर्ताओं में थीं।

मई 1940 में भारत संरक्षण

कानून के तहत मीनाताई को फिर

गिरफ्तार कर लिया गया और वे

1942 तक बंद रहीं। छूटने के बाद

वे तुरंत सोलापुर में मजदूर आंदेलन

में सक्रियता से कूद पउ़ी।

बी.टी.आर. लाईन और मीनाताई

का इस्तीफा

1948 में पार्टी पर ‘‘बी.टी.आर.

लाईन’ हावी होने के बाद मीनाताई

फिर गिरफ्तार हो गईं। साने तथा अन्य

सहयोगी भी गिरफ्तार कर लिए गए

और उन सबकों यरवदा जेल में रखा

गया। पार्टी के अंदर फूट और तीव्र

मतभेदों तथा बहसा-बहस से मीनाताई

परेशान हो गईं। उन्होंने पार्टी नेतृत्व से

यह सब समाप्त करने की अपील करते

हुए सात पन्नों का एक पत्र लिखा।

उनकी कोशिशों का कोई असर नहीं

हुआ और उन्हें पार्टी से इस्तीफा दे

दिया।

1950 में उन्हें रिहा कर दिया

गया। इस्तीफा देने के बावजूद वे पार्टी

के साथ ही बनी रहीं और सोलापुर मे

टी.यू. का काम करती रही। साथ ही

1950 में विधिवत रूप से उनका

विवाह का. साने से हो गया।

1953 में मीनाताई सोलापुर

नगरपालिका स्कूल बोर्ड की सदस्य

चुनी गईं। 1956 में उन्होंने ‘‘शांति

निकेतन’’ नामक नई शिक्षा संस्था की

स्थापना की।

1952-53 में सोलपुर में

असाधारण अकाल पड़ा जिसमें मीनाताई

ने सक्रियता से सहायता कार्य किया।

1960 और 1970 क ेदशकों में

मीनाताई भारतीय महिला फेडरेशन में

सक्रिय हो गईं। 14-15 नवंबर

1980 को औरंगाबाद में संपन्न

महाराष्ट्र राज्य महिला फेडरेशन के

अधिवेशन की अध्यक्षता मीनाताई ने

की।

बाद में मीनाताई बंबई से तलेगांव

;पूना के नजदीकद्ध आकर रहने लगीं।

आगे चलकर वे ‘‘महिला आंदोलन

पत्रिका’ में सहायता करने लगीं।

मीनाताई साने की मृत्यु 17 अगस्त

1989 को हो गई।

 - अनिल राजिमवाले




2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

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buzas rita ने कहा…

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