गुरुवार, 8 जनवरी 2026
संघ भाजपा ने राजपूत समाज को धर्म अफीम की घुट्टी पिला कर बर्बाद कर दिया है
मैंने नोटिस किया है कि सामान्य राजपूत बच्चे जिनमें से ज्यादातर बहुत गरीब होते हैं वे एक अलग तरह की फेंटेसी में जीते हैं। भले ही उसका आर्थिक हालात बहुत खराब हो लेकिन वे अपने को राजा-महाराजा के बच्चे से कम नहीं समझते हैं। कुछ चिरकुट टाइप के टूटपुंजिये राजपूत नेताओं की बहकी हुई बातों में आकर वे पढ़ाई-लिखाई और मेहनत करने से भागते हैं।
ऐसे राजपूत बच्चों से मैं कहना चाहता हूं कि होगा कभी संपूर्ण भारत पर राजपूत राजाओं का राज। तुम्हें आज के यथार्थ को स्वीकार करना होगा। जब भारत में राजपूत राज था तब भी राजाओं की संख्या बहुत चंद थी। सामान्य राजपूतों की स्थिति उस जमाने में भी बहुत अच्छी नहीं थी। आप के पूर्वज उन चंद राजाओं के या तो सैनिक होते थे या फिर रैयत। दुनिया में बड़े पैमाने पर मानवता का उत्थान करने वाली कोई व्यवस्था है तो उसका नाम "लोकतंत्र" है। इन पंक्तियों का लेखक (राजीव सिंह जादौन) आज जो कुछ भी है वह इस देश में लागू हुए लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के कारण है। वरना मैं अपने गांव के ही किसी जमींदार की जी हजूरी कर रहा होता।
इसलिए राजपूत समाज और खास करके उसकी नई पीढ़ी इस बात को जितना जल्दी समझ ले उतना उसके लिए फायदेमंद होगा। आप जितना जल्दी लोकतांत्रिक व्यवस्था को आत्मसात कर लेंगे, जितना ज्यादा शिक्षा और खास करके उच्च शिक्षा हासिल करेंगे उतना जल्दी आपका विकास होगा। सामान्य राजपूत बच्चे जो राजपाठ के फितूर में जीते हैं उन्हें समझना चाहिए कि जो वास्तव में राजा थे जैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह उन्होंने बहुत पहले राजपाट के फितूर को अपने दिमाग से निकाल कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को ओढ़ते और बिछाते थे/हैं।
वीपी सिंह जी और अर्जुन सिंह जी को तो मैं नजदीक से नहीं देख पाया क्योंकि वो जब इस दुनिया को अलविदा कहे तब मेरी उम्र बहुत कम थी। दिग्विजय सिंह जी से दो-तीन बार वन टू वन मुलाकात का अवसर मिला। हर मुलाकात में मैंने पाया कि दिग्विजय सिंह जी सिर से लेकर नख तक लोकतंत्र को जीने वाले राजनेता हैं। राज परिवार से होने का वो एक मिनट भी सामने वाले को एहसास नहीं होने देते हैं।
पिछले साल के एक सितंबर को पटना में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह सर के साथ दिग्विजय सिंह जी से मिलने के बाद का अनुभव आप सबसे साझा करना चाहूंगा। शीतल सर को इंटरव्यू देने के बाद हमलोग करीब आधा घंटा साथ में बैठे थे। इस दरम्यान उन्होंने हम सब से चाय और कॉफी के बारे में पूछा। फिर वे खुद से फोन करके चाय और कॉफी मंगवाए। टेबल पर रखे ड्राई फ्रूट के पैकेट को फाड़ कर जब दिग्विजय सिंह जी प्लेट में डाल रहे थे तब उसमें से चार-पांच टुकड़ा नीचे फर्श पर गिर गया था जिसे वे उठाकर स्वयं खाए। इसी तरह अगर दिग्विजय सिंह जी अपने घर से निकलते हैं तो यदि उनकी नजर गेट से इंट्री करते हुए किसी नए आदमी पर पड़ती है तो वो गाड़ी रुकवा कर उसका हाल-चाल लेते हैं और बैठने के लिए बोलते हैं। हिंदी के बड़े आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा है कि "मनुष्य अपनी छोटी-छोटी बातों से बड़ा बनता है।" दिग्विजय सिंह जी से मिलकर विश्वनाथ त्रिपाठी की यह बात बरबस याद आती है।
लोकतंत्र में आप किसी को भयाक्रांत करके अपने से नहीं जोड़ सकते हैं। उनके लिए आपको अपने मन, वचन और कर्म को एकाकार करना पड़ता है। आज का राजपूत युवा इस बात को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी समझ ले। कुछ गलत नेतृत्व के बहकावे के कारण हमारी पिछली ने अपनी जवानी निराशा में काट ली। नए राजपूत युवा भी उसी दिशा में चलेंगे तो उनके लिए आत्मघाती होगा।
आप हर तरफ से तोप के मुहाने पर हैं। ऐसे में एक ही उपाय है। खूब शिक्षा हासिल कीजिए। हर तरह की शिक्षा हासिल करके अपने को लोकतंत्र में मिलने वाले अवसरों के काबिल बनाईए। योग्यता हासिल करके मीडिया, ज्यूडिशियरी, एकेडमिया तथा पॉलिटिकल और इकोनॉमिक स्ट्रक्चर में अपनी हिस्सेदारी हासिल कीजिए। मोदी सरकार में जो सरकारी शिक्षण संस्थानों को बर्बाद किया जा उसका भुक्तभोगी राजपूत समाज भी हो रहा है। आरएसएस और भाजपा ने युवाओं को जो धर्म की अफीम चटाई है उसका बड़ा शिकार राजपूत समाज का युवा भी हुआ है। मोदी/भाजपा सरकार का अंधभक्त बनके समर्थन करने के बजाय राजपूत समाज के युवाओं को देश की बर्बाद होती शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए सरकार से सवाल करना भी जरूरी है। क्योंकि देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के बर्बाद होने से सबसे ज्यादा राजपूत समाज के लोगों का नुकसान होगा।
:~ राजीव सिंह जादौन
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