गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

झूठ के सौ वर्ष

2 अक्टूबर, 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना की 100वीं सालगिरह समारोह में अमेरिकी मीडिया के कम से कम पांच मीडियाकर्मी को अपने मंच पर जगह देकर लामबंदी करने की अपनी क्षमता दिखा दी. इनमें से एक अमेरिकी पत्रकार, वॉशिंगटन पोस्ट के राजनीतिक संवाददाता और स्तंभकार, जिम गेराघ्टी ने 12 दिन बाद एक लेख लिख कर मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या के मामले में आरएसएस के झूठों को हवा दी और उसके कलंकित अतीत को साफ़-सुथरा दिखाने की कोशिश की. गेराघ्टी सहित कुल पांच प्रमुख अमेरिकी मीडियाकर्मी, मेगन मैकार्डल (स्तंभकार, वॉशिंगटन पोस्ट), जेसन विलिक (स्तंभकार, वॉशिंगटन पोस्ट), निकोलस क्लेयरमांट (लाइफ़ एंड आर्ट्स सेक्शन के संपादक, वॉशिंगटन एग्ज़ामिनर मैगज़ीन) और लीना बेल (ओपिनियन सेक्शन की मैनेजिंग एडिटर, वॉल स्ट्रीट जर्नल) को नागपुर में आयोजित शताब्दी समारोह में आरएसएस ने अपने मंच पर बैठाया था. शताब्दी समारोह को कवर कर रहे एक विदेशी संवाददाता ने मुझे बताया, 'मंच पर बैठे सभी लोग बेहद खुश नज़र आ रहे थे. जब उनका नाम पुकारा गया, तो उन्होंने उत्साह के साथ खड़े हो कर अपना परिचय दिया.' 14 अक्टूबर को वॉशिंगटन पोस्ट ने नागपुर में मंच साझा करने वाले जिम गेराघ्टी का आरएसएस पर लेख प्रकाशित किया. लेख में आरएसएस को ठीक वैसा ही दिखाया गया जैसा आरएसएस ख़ुद के बारे में प्रचार करता है. गेराघ्टी ने आरएसएस को अर्द्धसैनिक संगठन कहे जाने को ग़लत बताते हुए कहा, 'मुझे यह थोड़ा अजीब लगता है कि जिस संगठन के सदस्य बंदूकों की बजाए लंबी लाठियों के साथ परेड करते हैं, उसे बार-बार अर्द्धसैनिक संगठन कहा जाता है.' नागपुर के शताब्दी समारोह में आरएसएस के सारे अर्द्धसैनिक लक्षण सामने आए और मंच पर बैठे गेराघ्टी ने उन्हें देखा होगा. फिर भी उन्हें आरएसएस को अर्द्धसैनिक संगठन कहना थोड़ा अजीब लगा, सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने स्वयंसेवकों को बंदूकें लिए नहीं देखा. अपने लेख में गेराघ्टी ने आरएसएस के अस्तित्व का मूल कारण ही छिपाने की कोशिश की. उन्होंने लिखा, 'इस आंदोलन में भर्ती होने वालों के लिए संगठन का आकर्षण समझना आसान है, यह भारत के पुरुषों में गर्व और कर्तव्यबोध जगाता है.' उनके इस दावे को लेकर मेरा पहला सवाल है कि क्या आरएसएस भारत के पुरुषों के लिए काम करता है या सिर्फ़ हिंदू पुरुषों के लिए? आरएसएस ख़ुद कभी नहीं कहता कि वह भारत के सभी मर्दों का संगठन है क्योंकि वह हिंदू मिलिशिया है. भारत के पुरुष जैसी एक तटस्थ लाइन चुन कर गेराघ्टी ने स्पष्ट रूप से आरएसएस की सांप्रदायिक प्रकृति को छिपाने की कोशिश की ताकि पश्चिम के पाठकों के लिए वह स्वीकार्य लगे. मेरा दूसरा सवाल यह है कि आरएसएस आख़िर सिखाता क्या है? गेराघ्टी का यह कहना कि आरएसएस अपने सदस्यों में गर्व और कर्तव्यबोध जगाता है, यह बात संघ के सार्वजनिक प्रचार से सीधे उठाई गई है कि स्वयंसेवक चरित्र-निर्माण, शारीरिक फिटनेस और हिंदू मूल्यों को बढ़ावा देते हैं. हकीक़त यह है कि शाखाओं और शिविरों में मुसलमान विरोधी स्वर पूरी तरह हावी रहता है. वहां स्वयंसेवक अपने हिंदू होने पर गर्व करते हैं और ख़ुद को हिंदू प्रतिरोध का हिस्सा मानते हैं. गेराघ्टी संघ के सबसे बड़े झूठ को भी आगे फैलाने से नहीं चूके कि नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या से बहुत पहले आरएसएस छोड़ दिया था. उन्होंने लिखा, '1948 में मोहनदास गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की, जो कभी आरएसएस का सदस्य रहा था, लेकिन हत्या के पहले ही छोड़ चुका था.' गांधी की 30 जनवरी, 1948 को हत्या के बाद आरएसएस अपने और हत्यारे के बीच संबंध को धुंधला करने की कोशिश करता रहा है. आरएसएस समर्थक लेखक पत्रकार इस झूठ को बार-बार दोहराते रहे हैं, जिसे साबित करने के लिए उनके पास संघ के अपने शब्दों के अलावा कोई प्रमाण नहीं है. अभिलेखीय दस्तावेज़, लेकिन, साबित करते हैं कि गोडसे ने कभी आरएसएस नहीं छोड़ा. यह सच बार-बार दोहराने की ज़रूरत है क्योंकि आज जो दल सत्ता में है, वह अपने ख़ून से रंगे अतीत को बेदाग बनाने के लिए कानूनी, शैक्षणिक, पत्रकारिता, आदि हर हथकंडा अपना रहा है. #RSS100Years #RSSorg #rss कारवां से

कोई टिप्पणी नहीं:

Share |