शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कम्युनिस्ट आंदोलन के हीरो अतुल कुमार अंजान

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की गोद में खेलने और पलने वाले। भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में हिंदी क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली चेहरों में से एक कॉमरेड अतुल कुमार अंजान का जन्म बिहार के बांका ज़िले में हुआ, हालांकि उनकी कर्मभूमि उत्तर प्रदेश रही। उनके पिता ए.पी. सिंह लखनऊ के चर्चित डॉक्टर थे और उनका जुड़ाव शहीद-ए-आजम Bhagat Singh के क्रांतिकारी संगठन Hindustan Socialist Republican Association से था। उनके श्वसुर Indradeep Sinha 1967 में बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मंत्री रहे और उनका गहरा संबंध किसान आंदोलन के महानायक Swami Sahajanand Saraswati से था। स्पष्ट है कि अतुल अंजान को क्रांतिकारी और किसान आंदोलन की विरासत घर से ही मिली थी। 1978 में वे Lucknow University छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए और चार बार इस पद पर जीत हासिल की। उस समय परिसर में नारा गूंजता था— “मेरी जान, तेरी जान — अतुल अंजान!” 1979 में वे All India Students’ Federation के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हिंदी पट्टी के किसी बड़े विश्वविद्यालय में एक कम्युनिस्ट का इस तरह लोकप्रिय होना असाधारण घटना थी। वे Communist Party of India (सीपीआई) के राष्ट्रीय सचिव तथा All India Kisan Sabha के महासचिव रहे। 1997 से किसान सभा से उनका गहरा जुड़ाव था। किसानों के मुद्दों पर गठित स्वामीनाथन आयोग में वे किसानों के एकमात्र प्रतिनिधि थे। घोसी लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने चार बार चुनाव लड़ा। भले ही वे संसद नहीं पहुंच सके, लेकिन बिना किसी सदन के सदस्य बने भी वे राष्ट्रीय स्तर के चर्चित नेता रहे—यह उनकी जनस्वीकृति और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है। कम्युनिस्ट आंदोलन में अक्सर दक्षिण भारतीय नेताओं का प्रभाव रहा है, लेकिन हिंदी क्षेत्र में P. C. Joshi के बाद यदि कोई सर्वाधिक चर्चित और प्रभावशाली चेहरा उभरा, तो वह अतुल अंजान थे। प्रवाहमान, मुहावरेदार और प्रभावशाली हिंदी में बोलना उनकी विशेषता थी। उनके भाषणों में लोककथाएँ, मुहावरे और तर्क का अद्भुत संगम होता था। टीवी बहसों में वे वामपंथ की मुखर आवाज़ के रूप में जाने जाते थे और एंकरों को तथ्यात्मक चुनौती देने का साहस रखते थे। अपने भाषणों में वे दो प्रमुख चुनौतियों— नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ एवं सांप्रदायिकता को लगातार चिन्हित करते थे। वे युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और मार्क्सवादी दर्शन से जुड़ने का आह्वान करते थे। उन्होंने पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस के माध्यम से कई क्लासिक पुस्तकों के पुनर्प्रकाशन में भूमिका निभाई। अपने अंतिम दिनों में मृत्युशय्या से उन्होंने वाम आंदोलन का प्रिय गीत गाया— “तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी के गीत में यक़ीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।” ‘स्वर्ग’ को ज़मीन पर उतारने का सपना देखने और उसके लिए आजीवन संघर्ष करने वाले नेता अतुल अंजान का 3 मई की सुबह लखनऊ में निधन हो गया। वे 70 वर्ष के थे और लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे। हिंदी पट्टी के इस करिश्माई कम्युनिस्ट नेता को लाल सलाम। -भवेश भारद्वाज

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