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गुरुवार, 19 नवंबर 2015

समय है अब भी सुधार कर लो !

राहुल गांधी ने आरएसएस की तुलना बैन किए जा चुके मुस्लिम संगठन सिमी से की। देश के प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी के ओर से दस वर्ष तक डॉ मनमोहन सिंह रहे हैं.तब यह बात क्यों नहीं समझ में आई.
यह बात अब राहुल गाँधी की समझ में आई है कि आरएसएस की गतिविधियाँ सिमी के बराबर हैं. जो पूरी तरह से सत्य नहीं है वास्तव में गाँधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाना और माफीनामे के बाद सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करने की आजादी देना कांग्रेस की बड़ी भूल थी. सांस्कृतिक सगठन के रूप में उसने बहुसंख्यक समाज में अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ एक विषाक्त वातावरण तैयार किया जिसका असर मध्यम वर्गीय कुछ युवाओं पर ज्यादा पड़ा. क्या कांग्रेस को आर एस एस के सांस्कृतिक मुखौटे अतिरिक्त राजनीतिक मुखौटा जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी नहीं दिखाई दी. कांग्रेस नेताओं की समझ हिन्दू व हिंदुवत्व के अंतर को समझने में असमर्थ रही है. हिन्दू एक धर्म है और हिंदुवत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, जो हिटलर, मुसोलिनी के आदर्शों पर चल कर इर्ष्या के आधार पर सृजित संगठन है. अल्पसंख्यक विरोध इसकी जीवन धारा है. मुसलमान ही नहीं, ईसाईयों के भी खिलाफ है, जब दोनों नहीं मिलते हैं तो बौद्धों के खिलाफ है. जब बौद्ध नहीं मिलते हैं, तो सिखों के खिलाफ है. इस तरह से यह संगठन इर्ष्या के आधार पर कार्य करता है. दुष्प्रचार व गलत तथ्यों का सहारा लेकर यह लोगों को भड़काने का काम करता है. कांग्रेस में जब तक धर्म निरपेक्ष ताकतों का बोलबाला रहा तब तक यह संगठन अपनी ताकत बटोरने के लिए तथा बढाने के लिए इतिहास को तोडना-मरोड़ना जारी रखा. आज भी यह काम तेजी के साथ जारी है. कांग्रेस संगठन पर इन्ही हिंदुवत्ववादियों का प्रभाव बाधा व इसके तमाम नेता नागपुरी भाषा बोलने लगे उस भाषा का परिणाम यह हुआ कि अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़ी जातियों के लोग इससे दूर हटने लगे. समाजवाद का नारा, सामंतवाद के नारे के रूप में बदलना शुरू हो गया और आर्थिक सुधारों के नाम पर मल्टी नेशनल कंपनियों का मुनाफा लाखों लाख करोड़ बढ़ता गया.  जल, जंगल, जमीन पूरे देश के नागरिकों के न होकर कुछ उद्योगपतियों की व्यक्तिगत संपत्ति हो गए.
राहुल गाँधी अगर आप में राजनीतिक समझ है तो अविलम्ब कांग्रेस संगठन को हिंदुवत्व वादी तबके से मुक्त कराओ और आरएसएस जैसे फ़ासिस्ट संगठनो के ऊपर प्रतिबन्ध लगाने की बात करो, सरकार आने पर इस कार्य को इमानदारी से पूरा करो तभी कांग्रेस को पुनर्जीवन मिल सकता है. समाजवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इस बात को अच्छी तरीके से समझने की जरूरत है. साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई को तेज करने की जरूरत है अन्यथा साम्राज्यवादी ताकतें भारत समेत पूरे एशिया को युद्ध का मैदान बना देंगी. कभी जाती के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर.

सुमन 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मोदी सरकार का विघटनकारी एजेण्डा


इस साल मई में मोदी सरकार अपना एक साल पूरा कर लेगी। गुजरा सालए मुख्यतः, समाज में अलगाव और विघटन पैदा करने वाली राजनीति के नाम रहा। जहां मोदी का चुनाव अभियान विकास पर केंद्रित था वहीं उन्होंने सांप्रदायिक मुद्दे उठाने में भी कोई कोर.कसर बाकी नहीं रखी। बांग्लाभाषी मुसलमानों को बंगलादेशी बताया गया और 'पिंक रेवोल्यूशन'की चर्चा हुई। उद्देश्य था, अपरोक्ष रूप से मुसलमानों का दानवीकरण।
मोदी सरकार की नीतियों में हिंदू राष्ट्रवाद के भाजपाई एजेण्डे का खुलकर प्रकटीकरण हुआ। गणतंत्र दिवस 2015 के अवसर पर सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका से 'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवादी' शब्द गायब थे। केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने हिंदू धर्मग्रंथ 'भगवत गीता'  को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा देने की मांग की। एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने सभी मुसलमानों को हरामजादा बताया तो अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हैपतुल्लाह ने फरमाया कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं क्योंकि देश में उनकी खासी आबादी है। पौराणिक कथाओं को ऐतिहासिक बताया जा रहा है और मुंबई में एक आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 'प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और यहां तक कि मानव शरीर पर जानवरों के सिर के प्रत्यारोपण की तकनीक भी उपलब्ध थी'। इस साल आयोजित इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में ऐसे कई 'शोध प्रबंध' प्रस्तुत किए गए जिनमें इतिहास को फंतासी बना दिया गया।
पिछली एनडीए सरकार के शासनकाल में स्कूली पाठ्यपुस्तकों को सांप्रदायिक रंग दिया गया। ऐसी पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं जिनमें ऐतिहासिक घटनाओं का प्रस्तुतिकरण केवल और केवल धार्मिक व सांप्रदायिक दृष्टिकोण से किया गया था। अब एक बार फिर, शिक्षा के भगवाकरण की बात कही जा रही है। देश की शीर्ष अनुसंधान संस्थाओं में आरएसएस.हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर सुदर्शन राव की नियुक्ति इसी का उदाहरण है। प्रोफेसर राव की अकादमिक क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं है। उनका लेखन केवल कुछ ब्लागों तक सीमित है और वे जातिप्रथा को न्यायपूर्ण व उचित ठहराते हैं। उनका कहना है कि जातिप्रथा से किसी को कभी कोई शिकायत नहीं रही। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। जाहिर है कि यह वैज्ञानिक सोच और तार्किकता पर प्रहार होगा। हमारे संविधान में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है परंतु अनुसंधान व शिक्षण के क्षेत्रों में वैज्ञानिक सोच का मखौल बनाया जा रहा है और अंधविश्वासों व अंधश्रद्धा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
विचारधारा के स्तर पर भाजपा नेता और सांसद इस तरह की बातें कह रहे हैं जो भारतीय राष्ट्रवाद के सिद्धांतों और मूल्यों के खिलाफ हैं। भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया और केरल के एक भाजपा नेता ने कहा कि गोडसे ने जो कुछ किया वह ठीक था परंतु उसे गांधीजी की बजाए नेहरू की हत्या करनी थी। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनए गोडसे की मूर्तियां स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। सोनिया गांधी के संबंध में गिरिराज सिंह की नस्लीय टिप्पणी निहायत कुत्सित व घिनौनी थी। इसके पहले किसी मंत्री ने यह कहा था कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने वाली बातें लगातार कही जा रही हैं। पुणे में बाल ठाकरे के कुछ कार्टूननुमा चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने के बाद, हिंदू जागरण सेना के कार्यकर्ताओं ने मोहसिन शेख नाम के एक युवक, जो किसी आईटी कंपनी में काम करता था,को सड़क पर पीट.पीटकर मार डाला। साध्वी प्राची और साक्षी महाराज हिंदू महिलाओं को यह सलाह दे रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के पवित्र स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। जब सानिया मिर्जा को आंध्रप्रदेश का ब्रांड एंबेसेडर नियुक्त किया गया तब कई भाजपा नेताओं ने इसका यह कहकर विरोध किया कि वे पाकिस्तान की बहू हैं। भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि चर्चों और मस्जिदों को ढहाया जा सकता है। भाजपा से जुड़ी शिवसेना के संजय राऊत ने मांग की कि मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना चाहिए।
हम सब को याद है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने से पहले भी भाजपा और उससे जुड़े संगठन लवजिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को लेकर समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोल रहे थे। ये मुद्दे गुजरे वर्ष भी छाये रहे। दिल्ली,मुंबई के पास पनवेल व हरियाणा सहित देशभर के कई स्थानों पर चर्चों पर हमले हुए और इन हमलों के दोषियों को पकड़ने के लिए सरकार व पुलिस ने समुचित कार्यवाही नहीं की।
पिछले वर्ष देशभर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई। हां, एक फर्क जरूर था और वह यह कि हिंसा अब छोटे पैमाने पर की जाती है। कहीं एक दुकान जला दी जाती है तो कहीं किसी आराधना स्थल पर पत्थरबाजी होती है। इसके बाद हिंसा भड़कती है जिसके नतीजे में विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच अलगाव बढ़ता है। धार्मिक आधार पर समाज का विभाजन, असहनीय स्तर तक बढ़ चुका है। धार्मिक स्थलों पर हमले और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसाए हमारे संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की नींव को कमजोर कर रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अपने क्षोभ व दुःख को स्वर देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसा लगने लगा है मानो वे इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।
जब भी कोई गैर.जिम्मेदाराना व घृणा फैलाने वाली बात किसी व्यक्ति द्वारा कही जाती है तो भाजपा प्रवक्ता यह कहकर उससे पल्ला झाड़ लेते हैं कि जो कुछ भी कहा गया हैए वे संबंधित व्यक्ति के व्यक्तिगत विचार हैं। इसके अतिरिक्त, भाजपा यह दावा भी करती है कि विहिप,वनवासी कल्याण आश्रमए बजरंगदल आदि स्वतंत्र संगठन हैं जिनपर उसका कोई नियंत्रण नहीं है और ना ही उनके नेताओं द्वारा कही जाने वाली बातों के लिए वह जिम्मेदार है। जबकि सच यह है कि भाजपा और इन सभी संगठनों पर आरएसएस का पूर्ण नियंत्रण है और ये संघ परिवार के सदस्य हैं। ये सभी संगठन भाजपा के साथ मिलकर,हिंदू राष्ट्र के एजेण्डे को साकार करने के लिए सुनियोजित व समन्वित प्रयास कर रहे हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि ये सभी संगठन, जो तथाकथित रूप से 'स्वतंत्र'  हैं एक.सी बातें और एक.सी हरकतें कर रहे हैं। कई लोगों का यह कहना है कि ये संगठन कुछ अतिवादियों के समूह भर हैं। परंतु तथ्य यह है कि संघ परिवार ने सबको अलग.अलग जिम्मेदारी सौंपी हुई है और वे संघ के निर्देशन में ही काम कर रहे हैं। यह इस बात से भी जाहिर है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ये संगठन अत्यंत आक्रामक हो उठे हैं।
भाजपा, भारतीय राष्ट्रवादी विभूतियों, जिन्होंने साम्राज्यवाद.विरोधी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय राष्ट्र के विकास के लिए कार्य किया, को अपना बताने की कोशिश में जुटी हुई है। आरएसएस का कहना है कि महात्मा गांधी संघ से बहुत प्रभावित थे। संघ का यह दावा भी है कि अंबेडकर और आरएसएस के विचार एक से थे। ये झूठ सुनियोजित ढंग से व जानते.बूझते हुए मीडिया में 'प्लांट' किए जा रहे हैं क्योंकि आरएसएस के किसी नेता ने स्वाधीनता संग्राम में कभी कोई हिस्सेदारी नहीं की। यह प्रचार भारतीय राष्ट्र की मूल अवधारणा को कमजोर करने का प्रयास है। महात्मा गांधी को केवल स्वच्छता अभियान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और हिंदू.मुस्लिम एकता के लिए उनके संघर्ष को नजरअंदाज किया जा रहा है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि मोदी सरकार, हिंदू राष्ट्र के अपने एजेण्डे को त्याग कर,भारतीय संविधान में निहित मूल्यों को मजबूती देने का प्रयास करेगी। सत्ता पर काबिज लोगों को यह याद रखना चाहिए कि देश को बांटने के भयावह परिणाम हो सकते हैं।
-राम पुनियानी

शनिवार, 24 जनवरी 2015

गाँधी की नजरों में आरएसएस

मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही, गांधीजी को इस रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास हो रहे हैं, जिससे आरएसएस को लाभ हो। पहले, गांधी जयंती ;2 अक्टूबर से 'स्वच्छता अभियान' की शुरूआत की गई। फिर,यह दावा किया गया कि गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का आरएसएस से कोई लेनादेना नहीं था। अब गांधी से इस आशय का प्रमाणपत्र हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं कि 'आरएसएस बहुत अच्छा संगठन है'।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल ;जनवरी 2015 में गुजरात के गांधीनगर में गांधीजी पर केंद्रित संग्रहालय 'डांडी कुटीर' में आने वाले दर्शकों को एक मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन दिखाया जा रहा है,जिसमें यह बताया गया है कि सन् 1930 में गांधीजी, घनश्यामदास बिरला के साथ, वर्धा में आरएसएस के एक शिविर में पहुंचे थे। गांधीजी, आरएसएस की कार्यप्रणाली से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने संघ के संस्थापक हेडगेवार से मिलने की इच्छा प्रगट की। यह भी दावा किया गया है कि गांधीजी,अगले दिन, हेडगेवार से मिले भी।
जो कुछ हमें निश्चित तौर पर ज्ञात हैए उससे ये दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यह सर्वज्ञात है कि संघ, गांधीजी की राजनीति का घोर विरोधी था। वह असहयोग आंदोलन से आम लोगों को जोड़कर, राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने के गांधीजी के प्रयास का भी आलोचक था। इस आंदोलन से देश में व्यापक जाग्रति आई और आमजन ब्रिटिश.विरोधी आंदोलन से जुड़े। यह भारत के 'निर्माणाधीन राष्ट्र' बनने की राह में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। संघ,इस भारतीय राष्ट्रवाद का कटु आलोचक था। आरएसएस के संस्थापक, गांधीजी के हिंदू.मुस्लिम एकता स्थापित करने के प्रयास से भी इत्तेफाक नहीं रखते थे। वे असहयोग आंदोलन के भी खिलाफ थे। हेडगेवार ने आगे चलकर लिखाए'महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के नतीजे में देश का उत्साह ठंडा पड़ गया और जिन सामाजिक बुराईयों को इस आंदोलन ने जन्म दियाए वे अपना डरावना सिर उठाने लगीं'। उनके अनुसारए 'इस आंदोलन के कारण ब्राह्मण, गैर.ब्राह्मण टकराव स्पष्ट सामने आ गया';केशव संघ निर्माता, 1979य सीपी भिसीकर, पुणे,पृष्ठ 7। जिसे हेडगेवार,ब्राह्मण, गैर.ब्राह्मण टकराव बता रहे थे,दरअसल,वह दलितों का भू.अधिकार व सामाजिक गरिमा हासिल करने और जातिगत पदानुक्रम के विरूद्ध संघर्ष था। अस्त होती प्राक्.औद्योगिक सामाजिक व्यवस्था के मूल्यों के प्रति अपनी वफादारी के चलते,हेडगेवार इस आंदोलन के विरोधी थे। गैर.ब्राह्मण आंदोलन तो असल में समाज में जातिगत रिश्तों के यथास्थितिवाद को चुनौती दे रहा था।
हेडगेवार के उत्तराधिकारी गोलवलकर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की आलोचना इसलिए की क्योंकि वह 'केवल ब्रिटिश.विरोधी' था। वे लिखते हैं, 'क्षेत्रीय राष्ट्रवाद व समान शत्रु के सिद्धांत.जो राष्ट्र की हमारी अवधारणा का आधार हैं, ने हमें हमारे असली हिंदू राष्ट्रवाद की सकारात्मक व प्रेरणास्पद अंतर्वस्तु से वंचित कर दिया    ब्रिटिश.विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का पर्याय माना जाने लगाए इस प्रतिक्रियावादी सोच ने स्वाधीनता आंदोलन, उसके नेताओं और उसके समर्थकों पर विनाशकारी प्रभाव डाला' ;बंच ऑफ थॉट्स,बैंगलोर, 1996, पृष्ठ 138। गांधीजी और भारतीय राष्ट्रवाद की गांधी की अवधारणा व भारत को राष्ट्र.राज्य के रूप में एक करने के उनके संघर्ष के बारे में संघ के ये विचार थे।  
और गांधी संघ को किस नजर से देखते थे ?  चूंकि काफी लंबे समय तक आरएसएस 'चुपचाप' काम करता रहा इसलिये स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आरएसएस की भूमिका की विशेष चर्चा तत्कालीन साहित्य में नहीं है। चूंकि संघ, राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं था इसलिये इस आंदोलन में उसकी भूमिका के बारे में भी हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। परंतु उपलब्ध स्त्रोतों से जो भी जानकारी हमें मिलती है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि गांधीजी, आरएसएस के प्रशंसक तो कतई नहीं थे। 'हरिजन' के 9 अगस्त 1942. के अंक में गांधी लिखते हैंए 'मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में सुना है। मैं यह भी जानता हूं कि यह एक सांप्रदायिक संगठन है।' उन्होंने यह टिप्पणी'दूसरे' समुदाय के खिलाफ नारेबाजी और भाषणबाजी के संबंध में एक शिकायत के प्रति उत्तर में कही। इसमें गांधी, आरएसएस कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण की चर्चा कर रहे हैं जिसके दौरान कार्यकर्ता ये नारे लगाते थे कि यह राष्ट्र केवल हिंदुओं का है और अंग्रेजों के देश से जाने के बाद हम गैर.हिंदुओं को अपने अधीन कर लेंगे। सांप्रदायिक संगठनों द्वारा की जा रही गुंडागर्दी के संबंध में वे लिखते हैंए 'मैंने आरएसएस के बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। मैंने यह भी सुना है कि जो शैतानी हो रही हैए उसकी जड़ में संघ है,' ;कलेक्टिव वर्क्स ऑफ गांधी, खंड 98, पृष्ठ 320.322।
                    आरएसएस के संबंध में गांधीजी के विचारों का सबसे विश्वसनीय स्त्रोत उनके सचिव प्यारेलाल द्वारा वर्णित एक घटना है। सन् 1946 के दंगों के दौरान, प्यारेलाल लिखते हैं, 'गांधीजी के साथ चल रहे लोगों में से किसी ने पंजाब के शरणार्थियों के एक महत्वपूर्ण शिविर वाघा में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की कार्यकुशलता,अनुशासन, साहस और कड़ी मेहनत करने की क्षमता की तारीफ की। गांधीजी ने तुरंत पलटकर कहा, 'पर यह न भूलो कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थे'. गांधी आरएसएस को तानाशाहीपूर्ण सोच वाला एक सांप्रदायिक संगठन मानते थे।' ;प्यारेलाल, महात्मा गांधी द लास्ट फेज, अहमदाबाद, पृष्ठ 440।
         स्वतंत्रता के बाद, दिल्ली में हुई हिंसा के संदर्भ में ;राजमोहन गांधी, मोहनदास, पृष्ठ 642, 'गांधी जी ने आरएसएस के मुखिया गोलवलकर से हिंसा में आरएसएस का हाथ होने संबंधी रपटों के बारे में पूछा। आरोपों को नकारते हुए गोलवलकर ने कहा कि आरएसएस, मुसलमानों को मारने के पक्ष में नहीं है। गांधी ने कहा कि वे इस बात को सार्वजनिक रूप से कहें। इस पर गोलवलकर का उत्तर था कि गांधी उन्हें उद्धत कर सकते हैं और गांधीजी ने उसी शाम की अपनी प्रार्थना सभा में गोलवलकर द्वारा कही गई बात का हवाला दिया। परंतु उन्होंने गोलवलकर से कहा कि उन्हें इस आशय का वक्तव्य स्वयं जारी करना चाहिए। बाद में गांधी ने नेहरू से कहा कि उन्हें गोलवलकर की बातें बहुत विश्वसनीय नहीं लगीं।'
आज,सत्ता में आने के बाद, आरएसएस, स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से स्वयं को किसी भी प्रकार से जोड़ने के लिए बेचैन है। यह तबए जब वह इस आंदोलन से दूर रहा था और उसने इस आंदोलन की इसलिये आलोचना की थी क्योंकि उसमें सभी समुदायों की हिस्सेदारी थी। आरएसएस का लक्ष्य हिंदू राष्ट्र है, ठीक उसी तरह मुस्लिम लीग का लक्ष्य मुस्लिम राष्ट्र था। आज आरएसएस गांधी से प्रमाणपत्र चाहता है। इसलिये उनके कहे वाक्य को अधूरा प्रस्तुत किया जा रहा है। आरएसएस कार्यकर्ताओं के 'अनुशासन और कड़ी मेहनत' के बारे में गांधी के कथन को तो उद्धत किया जा रहा है परंतु उसके बाद जो उन्होंने कहा था अर्थात 'हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थे', उसकी चर्चा नहीं की जा रही है। दोनों प्रकार के राष्ट्रवादों में जो मूल विरोधाभास हैं उनके चलते आरएसएस के प्रति गांधीजी के दृष्टिकोण के संबंध में किसी प्रकार के संदेह के लिए कोई जगह नहीं है। संघ परिवार चाहे कुछ भी दावा करे, यह मानना असंभव है कि गांधीजी कभी भी आरएसएस जैसे संगठन के प्रशंसक हो सकते हैं।
-राम पुनियानी

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-17

दलित बहुजन राजनीति की ओर
      दलित सेना से निकाले जाने के बाद मेरे लिए अगला स्वाभाविक ठिकाना बहुजन समाज पार्टी और उस जैसी सोच रखने वाले संस्था, संगठन थे, मैं अपने आपको अब वैचारिक रूप से इन्हीं के करीब पाता था, मैंने सोच रखा था कि किसी दिन अगर मैं सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनूँगा तो उसकी शुरुआत बसपा से ही होगी, बसपा उन दिनों मेरे लिए एक सामाजिक आन्दोलन थी, मेरे एक मित्र आर0पी0 जलथुरिया के घर बहुजन संगठक नामक अखबार आता था, मैं उसे नियमित रूप से पढ़ता था, बसपा सुप्रीमों मान्यवर कांशीराम के प्रति मन में बहुत अधिक सम्मान भी था, उनके द्वारा सोई हुई दलित कौमों को जगाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का मैं प्रशंसक और समर्थक था, तिलक तराजू और तलवार को जूते मारने की बात मुझे अपील करती थी। उस वक्त का मीडिया आज जितना ही दलित विरोधी था, मान्यवर मीडिया के इस चरित्र का बहुत ही सटीक और सरल विश्लेषण करते हुए कहते थे कि मीडिया कभी भी बहुजन समर्थक नहीं हो सकता है, उसमें बनिए का पैसा और ब्राह्मण का दिमाग लगा हुआ है, अगर हम देखें तो हालात अब भी जस के तस ही है, अभी भी अधिकांश मीडिया हाउस के मालिक वैश्य हैं और संपादक ब्राह्मण।
    कांशीराम को तत्कालीन मीडिया अक्सर एक अवसरवादी और जातिवादी नेता के रूप में पेश करता था, अवसरवाद पर बोलते हुए उन्होंने एक बार कहा था-हाँ मैं अवसरवादी हूँ और अवसर ना मिले तो मैं अवसर बना लेता हूँ समाज के हित में और वाकई उन्होंने बहुजनों के लिए खूब सारे मौके बनाए, उनके द्वारा दिए गए नारों ने उन दिनों काफी हलचल मचा रखी थी, मनुवाद को उन्होंने जमकर कोसा, जयपुर में हाईकोर्ट में खड़े मनु की मूर्ति को हटाने के लिए भी उन्होंने अम्बेडकर सर्कल पर बड़ी मीटिंग की, हम भीलवाड़ा से पूरी बस भर कर लोगों को लाए, मान्यवर की पुस्तक चमचा युग भी पढ़ी, उसमें चमचों के विभिन्न प्रकार पढ़कर आनंद आया, चमचों का ऐसा वर्गीकरण शायद ही किसी और ने किया होगा, वाकई कांशीराम का कोई मुकाबला नहीं था। बाबा साहब अम्बेडकर के बाद उन्होंने जितना किया, उसका आधा भी बहन कुमारी कर पातीं तो तस्वीर आज जितनी निराशाजनक है शायद नहीं होती, पर दलित की बेटी दौलत की बेटी बनने के चक्कर में मिशन को ही भुला बैठी।
    मुझे मान्यवर से 5 बार मिलने का अवसर मिला, उनकी सादगी और समझाने के तरीके ने मुझे प्रभावित किया, वे जैसे थे, बस वैसे ही थे, उनका कोई और चेहरा नहीं था, तड़क भड़क से दूर, मीडिया की छपास लिप्सुता से अलग, लोगों के बीच जाकर अपनी बात को समझाने का उनका श्रम
साध्य कार्य मेरी नजर में वन्दनीय था, मैं उनकी बातों और नारों का तो दीवाना ही था, ठाकुर ब्राह्मण बनिया को छोड़कर सबको कमेरा बताना और इन्हें लुटेरा बताने का साहस वो ही कर सकते थे, ये मान्यवर कांशीराम ही थे जिन्होंने कांग्रेस को साँपनाथ, भाजपा को नागनाथ, जनता दल को सँपोला और वामपंथियों को हरी घास के हरे साँप निरूपित किया था, बसपा सपा गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण के वक्त लगा नारा-मिले मुलायम कांशीराम, भाड़ में जाए जय श्रीराम, उस वक्त जितना जरुरी था, आज भी उसकी उतनी ही या उससे भी अधिक जरूरत महसूस होती है।
   चूँकि मेरा प्रारम्भिक प्रशिक्षण संघी कट्टरपंथी विचारधारा के साथ हुआ इसलिए चरमपंथी विचारधारा मुझे तुरंत लुभा लेती थी, उदारवादी और गांधीवादी टाइप के अम्बेडकरवादियों से मुझे कभी प्रेम नहीं रहा, समरसता, समन्वयन और भाईचारे की फर्जी बातों पर मेरा ज्यादा यकीन वैसे भी नहीं था, इसलिए मान्यवर जैसे खरी खरी कहने वाले व्यक्ति को पसंद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी, एक और बात जो उनकी मुझे पसंद आती थी वह यह थी कि वे कभी किसी की चमचागीरी नहीं करते दिखाई पड़े, याचक सा भाव नहीं, बहुजनों को हुक्मरान बनाने की ललक और उसके लिए जीवन भर का समर्पण, इसलिए मैं सदैव ही कांशीराम को पसंद करता रहा और आज भी अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ उन्हें आदर देता हूँ। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात चित्तौड़गढ़ के डाक बंगले में हुई, वे गाडि़या लोहारों के सम्मेलन को संबोधित करने आए थे, उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूँ की राजस्थान में कोई मेघवाल मुख्यमंत्री बने, मैं उन्हें राजा बनाने आया हूँ, लेकिन मान्यवर की इस इच्छा को परवान चढ़ाने के लिए बसपा कभी उत्सुक नहीं नजर आई, जो लीडरशिप इस समुदाय से उभरी शिवदान मेघ, भोजराज सोलंकी अथवा धरमपाल कटारिया के रूप में, उसे भी किसी न किसी बहाने बेहद निर्ममता से खत्म कर दिया गया, मैंने देखा कि ज्यादातर प्रदेश प्रभारी बहन जी उतर प्रदेश से ही भेजती हैं जिनका कुल जमा काम राजस्थान से पार्टी फण्ड, चुनाव सहयोग और बहन जी के बर्थ डे के नाम पर चंदा इकट्ठा करना रहता है,
जब तक मान्यवर कांशीराम जिंदा और सक्रिय रहे, तब तक बसपा एक सामाजिक चेतना का आन्दोलन थी ,उसके बाद वह जेबकतरों की पार्टी में तब्दील होने लगी, जिधर नजर दौड़ाओ उधर ही लुटेरे लोग आ बैठे, बातें विचारधारा तथा मिशन की और काम शुद्ध रूप से लूट-पाट। सेक्टर प्रभारी से लेकर बहनजी तक जेब गरम ही बसपा का खास  धरम हो गया, धन की इस वेगवान धारा में विचारधारा कब बह कर कहाँ जा गिरी, किसी को मालूम तक नहीं पड़ा, आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि बसपा नामक विचारधारा का आखिर हुआ क्या?
            तिलक तराजू और तलवार को चार-चार जूते मारने वाले उन्हीं  तिलक धारियों के जूते और तलुवे चाटने लग गए, बसपा का हाथी अब मिश्रा जी का गणेश था, मनुवाद को कोसने वाले अब ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलनों में शंखनाद कर रहे थे और पूरा बहुजन समाज बहनजी की इस कारस्तानी को सामाजिक अभियांत्रिकी समझ कर ढपोरशंख बना मूक दर्शक बना हुआ था, किसी की मजाल जो दलित समाज की नई नवेली इस तानाशाह के खिलाफ सवाल उठाने की हिम्मत करता? बसपा अब द्विजों को जनेऊ बाँटने का गोरखधंधा भी करने लगी थी, दलितों को बिकाऊ नहीं टिकाऊ होने की नसीहत देने वाली पार्टी के चुनावी टिकट सब्जी मंडी के बैगनों की भाँति खुले आम बिकने लगे, पैसा इकट्ठा करना ही महानतम लक्ष्य बन चुका था, बर्थ डे केक, माथे पर सोने का ताज और लाखों रूपए की माला पहन कर बहनजी मायावती से मालावती बन बैठीं, बहुजन समाज स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगा, सामाजिक परिवर्तन के एक जन आन्दोलन का ऐसा वैचारिक पतन इतिहास में दुर्लभ ही है, मैं जिस उम्मीद के साथ बसपा में सक्रिय हुआ, वैसा कोई काम वहाँ था ही नहीं, वहाँ कोई किसी की नहीं सुनता है, बहन जी तो कथित भगवानों की ही भाँति अत्यंत दुर्लभ हस्ती हैं , कभी कभार पार्टी मीटिंगों में दर्शन देतीं, जहाँ सिर्फ वे कुर्सी पर विराजमान होतीं और तमाम बहुजन कार्यकर्ता उनके चरणों में बैठ कर धन्य महसूस करते, बसपा जैसी पार्टी में चरण स्पर्श जैसी ब्राह्मणवादी क्रिया नीचे से ऊपर तक बेहद पसंद की जाती है, जो जो चरनागत हुए वे आज तक बहन जी के शरनागत है, शेष का क्या हाल हुआ, उससे हर कोई अवगत है, जो भी बहन जी को चमकता सितारा लगा, उसकी शामत आ गयी, बोरिया बिस्तर बँध गए, सोचने समझने की जुर्रत करने वाले लोग गद्दार कहे जा कर मिशनद्रोही घोषित किए गए और उन्हें निकाल बाहर किया गया, हालत इतने बदतर हुए कि हजारों जातियों को एकजुट करके बनी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ ब्राह्मण चमार पार्टी बन कर रह गई, मान्यवर कांशीराम रहस्यमय मौत मर गए और धीरे-धीरे बसपा भी अपनी मौत मरने लगी, उसका मरना जारी है। सामाजिक चेतना के एक आन्दोलन का इस तरह मरना निःसंदेह दुख का विषय है पर किया ही क्या जा सकता है, जहाँ आलोचना को दुश्मनी माना जाता हो और कार्यकर्ता को पैसा उगाहने की मशीन, वहाँ विचार की बात करना ही बेमानी है, मैं बसपा का सदस्य तो रहा और मान्यवर ने मुझे राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए भी नामित किया, लेकिन मैं कभी भी आचरण से बसपाई नहीं हो पाया, मुझमें वह क्षमता ही नहीं थी, यहाँ भी लीडर नहीं डीलर ही चाहिए थे, जिन कारणों ने पासवान जी से पिंड छुड़वाया वे ही कारण बहनजी से दूर जाने का कारण बने, दरअसल जिस दिन कांशीराम मरे, उस दिन ही समाज परिवर्तन का बसपा नामक आन्दोलन भी मर गया, मेरे जैसे सैंकड़ों साथियों के सपने भी मर गए, उस दिन के बाद ना मुझे बसपा से प्यार रहा और ना ही नफरत।
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
  मोबाइल: 09571047777

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-16

रामविलास या भोगविलास
    दलित साहित्य का पठन पाठन निरन्तर जारी था, अब मैंने दलित समुदाय के सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं से भी मिलना जुलना प्रारम्भ कर दिया था, उन्हीं दिनों मुझे न्यायचक्र नामक पत्रिका पढ़ने को मिली, जिसे दलित नेता रामविलास पासवान सम्पादित करते थे, उस अंक के कवर पर लिखा उद्धरण मुझे बहुत अच्छा लगा, जिसमें पासवान कहते हैं कि ‘मैं उन घरों में दिया जलाने चला हूँ, जिनमें सदियों से अँधेरा है, मैंने सोचा, मुझे भी तो ऐसी ही आँखों से आँसू पोछने हैं जिनमें बरसों से आँसुओं के अलावा कुछ भी नहीं है, इस तरह तो पासवान जी और मेरी राह एक ही है, मैंने राम विलास पासवान से मिलने की ठान ली, और एक दिन मैं उनके 12 जनपथ, नई दिल्ली स्थित निवास पर जा पहुँचा, काफी प्रयास के बाद उनसे मुलाकात हो पाई। मैं दिखने में तो आज की तरह ही दुबला-पतला बिल्कुल बच्चे जैसा था, मेरी बातों पर वे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं आर0एस0एस0 जैसे विशाल अर्द्धसैनिक संगठन से अकेले लोहा ले रहा हूँ, जब मैंने उन्हें अपने द्वारा सम्पादित ‘ दहकते अंगारे ‘की खबरें और अपने नाम से विभिन्न अखबारों में छपे आलेख दिखाए तब उन्हें यकीन होने लगा, उनकी आँखों में विश्वास और प्रशंसा के भाव एक साथ ही दिखाई पड़े, इस मुलाकात का फायदा यह हुआ कि मैं मात्र 20 वर्ष की आयु में ही दलित सेना का भीलवाड़ा जिले का अध्यक्ष बना दिया गया, मैंने दलित सेना में रहते हुए जमकर काम किया, कई दलित चेतना शिविर आयोजित किए, रैलियों में जयपुर से लेकर प्रगति मैदान तक भीड़ लेकर गया, मेम्बरशिप में भी हमारा जिला काफी आगे रहा, नतीजतन पासवानजी मेरे काम से काफी खुश हुए और 1996 में जब वे रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे पश्चिमी रेलवे का सलाहकार बना दिया। मंत्री रहते हुए पासवान और उनके नजदीकी दलित नेताओं की कार्यशैली और व्यवहार काफी बदल गए, जिस क्रांतिकारी दलित नेता रामविलास पासवान से मैं मिला और जिसके विचारों से मैं प्रभावित हुआ था, अब सत्ता की चकाचैंध और उनके आसपास उग आए दलालों ने उन्हें बिल्कुल ही बदल डाला था, पूरा राजनैतिक सामाजिक परिदृश्य ही बदल गया था, हर कोई भारतीय रेलवे को लूट खाने में लग गया, राम नाम की लूट मची हुई थी, दलित सेना के कई नेता जो रेलवे भर्ती बोर्ड के सदस्य बने हुए थे, भर्तियों के नाम पर खुल्लमखुल्ला पैसा बटोर रहे थे, छोटे-मोटे सब नेता अपनी अपनी क्षमता जितना लूटने में लगे थे, जिसे कुछ नहीं मिल सकता था, वे रेलवे में छोटे-मोटे ठेके ही लेने की कोशिश में लगे थे, रेलवे भवन से लेकर प्रत्येक रेलवे स्टेशन तक हर तरफ सिर्फ धन का साम्राज्य फैला हुआ था, अब दलित सेना में जय भीम सिर्फ एक नारा था, जो पैसा बटोर कर ला सके और दलाली कर सके वही कार्यकर्ता सबसे प्यारा था, मैं आया तो यहाँ मिशन के लिए था, पर हमारे मसीहाओं को तो कमीशन खाने से ही फुरसत न थी, मेरा यहाँ भी दम घुटने लगा, मुझे अपने आप पर ही शक होने लगा कि हर जगह मैं इतना जल्दी क्यों ऊबने लगता हूँ, कहीं पर भी फिट क्यों नहीं हो पाता हूँ, अब यहाँ तो सब लोग अपने ही हैं फिर भी सवाल उठने लगे कि मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं यहाँ लीडरशिप करने आया था पर यहाँ तो डीलरशिप करने की जरूरत पड़ रही है, क्या मैं लोगों से पैसा बटोर-बटोर कर दिल्ली ले जाने का काम कर पाऊँगा ,मैं उन लोगों से नजरें कैसे मिलाऊँगा, जिनकों मैं बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें समझाता रहा हूँ, यह कैसा दीपक है जिसे मैं जलाने चला हूँ, इससे मैं किसी का घर रोशन कर पाऊँगा या उनका घर ही जला बैठूँगा, सैंकड़ों सवाल मेरे मन मस्तिष्क में उमड़ने लगे, एक बार फिर मैं बैचेनी और अवसाद का शिकार होने लगा था, मुझसे रहा नहीं गया, मैंने दलित मसीहा रामविलास पासवान की राजसी जीवनशैली और उनके इर्द गिर्द के चमचानुमा नेताओं द्वारा इकट्टा की जा रही अकूत धन सम्पदा पर एक सम्पादकीय दहकते अंगारे में लिख डाला, जिसका शीर्षक था ‘रामविलास या भोगविलास‘ ?
      बस फिर क्या था, मुझे इस अपराध की तुरंत सजा दी गई, दलित सेना के राजस्थान प्रदेश के तत्कालीन अध्यक्ष ने मुझे अनुशासनहीनता के आरोप में जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया और प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल बाहर किया, मैंने भी दलितों की इस दलाल सेना से बाहर हो जाने में ही अपनी भलाई समझी, कभी वापसी के बारे में नहीं सोचा, दलित सेना से निकाले जाने के लगभग 15 साल बाद अन्ना हजारे के आन्दोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर मेरे द्वारा उठाए गए सवालों को पढ़कर लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव खालिक साहब ने मुझे वर्ष 2012 में अपनी पार्टी के कैडर को
संबोधित करने के लिए सोमनाथ आमंत्रित किया, तब मंच पर पासवान और उनकी मंडली से पुनः मुलाकात हुई, बीच के दिनों में वे एन0डी0ए0 सरकार में मंत्री रह लिए थे, फिर गुजरात में किए गए अल्पसंख्यकों के एकतरफा नरसंहार को मुद्दा बनाकर वे राजग का डूबता जहाज छोड़ भागे छूटे, बाद में बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा बनाए डोलते फिरे, असफल रहे। अंततः हाल ही में राजनाथ सिंह के पाँव पड़कर वापस राजग का हिस्सा बन बैठे, कभी मोदी को गुजरात नरसंहार के लिए दोषी बताने वाले रामविलास पासवान अब उन्हें पाप मुक्ति का प्रमाण पत्र बाँट रहे थे, अंततः अपना और अपने खानदान और अपनी जेबी पार्टी एल0जे0पी0 का भविष्य सँवारने के लिए तमाम पिछली बातों को भुला कर अपना ही थूँका हुआ चाटकर वे मोदी के शरणागत हो गए, गठबंधन में जीत कर आ गए और अब खाद्य एवं आपूर्ति मामलों के मिनिस्टर बन कर सत्ता का उपभोग करने को तत्पर हैं।
    सत्ता की मछली थे, कुर्सी लिप्सुओं से मिलकर अब बेहद खुश हैं , अम्बेडकर के नाम और मिशन को बेच खाने में इनका कोई सानी नहीं है। जय भीम कहते-कहते जय सियाराम का जाप करने लगे हैं, समानता के प्रतीक नीले दुपट्टे की जगह गले में विषमता पैदा करने वाला भगवा पट्टा डाल कर ये फर्जी दलित मसीहा फिर हमारे आपके बीच आने वाले हंै, इन्हें जवाब देना कबीर, फुले अम्बेडकर के अनुयायियों का काम है, समाज को छोड़कर जो राज की ओर चले जाते हंै और सत्य के स्थान पर सत्ता को प्रमुखता दे देते हैं , वे बड़े से बड़े तिकड़मबाज तो हो सकते हंै, मगर हमारे मसीहा नहीं हो सकते है। हमें भेड़ की खाल ओढ़े भेडियों को पहचानना हंै, अब वक्त है कि हम अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त कर लें ।
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित


शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-15

 संघ का गोपनीय पत्र
 
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-14

अम्बेडकरवाद  की ओर..
    मैं वापस गाँव आ गया पुनः भीलवाड़ा में सक्रिय होने के लिए। अब राजनैतिक रूप से जवाब देने की इच्छा थी, धार्मिक प्रयोग सफल नहीं रहा था, दलित मुस्लिम गठजोड़ परवान ही नहीं चढ़ा और ईसाइयत के आडम्बर भी हिन्दू धर्म जैसे ही लगे, सब प्रकार के धर्म कट्टरता से भरे पड़े हैं, सिर्फ बाहर दिखाने के लिए सर्वधर्म समभाव की बातें करते हैं, वरना तो हरेक का छिपा एजेंडा अपनी संख्या या अपने अनुयायी बढ़ाकर पूरी दुनिया मुट्ठी में कर लेने का ही हैै। कोई पूरी दुनिया को दार उल इस्लाम बनाने की कोशिश में है तो कोई पूरे विश्व को सुसमाचार सुनाने को बेताब है, हिन्दू भी कम नहीं है वे भी कर्ण्वन्तोविश्वमआर्यम‘ का उद्घोष करके पूरी पृथ्वी को आर्य बनाने पर तुले हुए है सब विस्तारवादी, सब स्वर्ग नरक का डर दिखा रहे हैं, मुझे भय भाग्य और भगवान की इन कपोल कल्पनाओं से दूर जाना था, इसलिए वैकल्पिक साहित्य टटोलना शुरू किया, सबसे पहले अम्बेडकर साहित्य से शुरुआत हुई, अब तक अम्बेडकर से मेरा दो तरह से परिचय हुआ था, पहला आरएसएस में रहते हुए, जहाँ प्रातः स्त्रोत में अम्बेडकर को याद करते थे और दत्तोपंत ठेंगी रचित बाबा साहब की जीवनी पढ़ी थी, दूसरा परिचय ओशो के साहित्य के जरिये हुआ जहाँ पर वे गाँधी की आलोचना करते हुए बाबा साहब अम्बेडकर को वैज्ञानिक और तर्कशील व्यक्ति बताते हैं।
अब तक मैंने बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के बारे में संघ के प्रकाशनों पांचजन्य, पाथेयकण, राष्ट्रधर्म, जाह्नवी इत्यादि में यत्र तत्र कुछ कुछ पढ़ा था, जिससे पता चला था कि बाबा साहब भी अन्य महापुरुषों की ही तरह महान राष्ट्रभक्त व्यक्ति थे, उनका भी संविधान को लिखने में योगदान रहा था, वे संस्कृत को राष्ट्रभाषा और भगवा झंडे को राष्ट्रध्वज बनवाना चाहते थे, उन्होंने तमाम प्रलोभनों के बावजूद मुस्लिम या ईसाई बनने के बजाए हिन्दू धर्म की ही एक शाखा बौद्ध धर्म को अपनाया, वे कश्मीर में धारा 370 लगाने के भी कड़े
विरोधी थे उन्होंने अपने साहित्य में कई जगह पर साफ साफ लिखा कि मुस्लिम अलग राष्ट्रीयता की बात हर जगह पर करते हैं इसी तरह की बातें मुझे संघ में रहते हुए मालूम पड़ी थीं लेकिन अब अम्बेडकर को स्वयं को पढ़ते हुए तो मेरा मस्तिष्क चकराने लग गया, पहली ही किताब ‘रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म‘ ने तो दिमाग खराब कर दिया, फिर तो बाबा साहब का जो भी साहित्य जहाँ भी मिला, उसे पढ़ डाला, बाबा साहब के जीवन के कटु प्रसंगों से दो चार होने का मौका मिला, जातिभेद का उच्छेद पुस्तक ने मुझे भारत में जाति जैसी घृणित व्यवस्था के जनक ब्राह्मणवाद को समझने का अवसर दिया, अब मुझे आरएसएस का पूरा खेल समझ में आने लगा, उनके ‘समरसता‘ के नारे में छिपे सामाजिक समानता और न्याय तथा सामाजिक परिवर्तन की धार को कुंद करने का षड्यंत्र समझ में आने लगा, दलितों को ‘वंचित‘ और आदिवासियों को ‘वनवासी‘ नाम देने की राजनीति भी समझ में आने लगी, संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत ‘मनुष्य तू बड़ा महान है, तू मनु की संतान है’ के खिलाफ भी अन्तःकरण की अतल गहराइयों से अस्वीकार का भाव उठा कि जिस मनु ने जाति आधारित पूरी व्यवस्था को संहिताबद्ध किया तथा शूद्रों और औरतों तथा अवर्ण अछूतों को जानवर से भी कम आँका, उस हरामी को महर्षि मनु कहकर इंसानों का पूर्वज बताना कितना बड़ा कुकर्म था? मेरे दिमाग के बंद द्वार अब खुलने लगे थे, मैंने मनुस्मृति को पढ़ा तो बाबा साहब सही लगे, उसका दहन जरुरी लगा, ज्यों ज्यों मैं बाबा साहब को पढ़ते जाता, वैसे वैसे मेरे विद्रोही विचार और अधिक मजबूत होते जाते थे, अम्बेडकर साहित्य ने मुझमें प्रगतिशीलता के बीज बोए, दलित दृष्टिकोण ने मेरी आरएसएस के खिलाफ अब तक लड़ी गई व्यक्तिगत लड़ाई को एक सामाजिक गरिमा, अस्मिता और पहचान की सामूहिक लड़ाई बनाने में मदद की, फिर तो कबीर, फुले, पेरियार को भी पढ़ा, अब मैं सिर्फ बागी नहीं था, अब प्रतिशोध की आग परिवर्तन की चाह में ढलने लगी, मनोरंजन के लिए या खुद की खुशी के लिए लिखी गई कविताओं की जगह जलते हुए प्रश्न खड़े करने वाली कविताओं ने ले ली, मैंने ‘श्यामल सुरभित सी अलकें मदिरा घट सी पलकें’ वाली श्रृंगार रस की कविताएँ जला डाली, अब मेरे काव्य का मुख्य स्वर बगावत हो गया था, उन दिनों तब मैंने लिखा-
‘केवल मनुस्मृति को ही जला कर,
रुक क्यों गए बाबा साहब?
क्यों नहीं जला डाले
वे सब मनु, जो बसे हैं
कथित उच्चों के मनों में ’
(एकलव्य की गुरु भक्ति पर)
‘एकलव्य क्यों दिया तूने
दक्षिणा में अपना अँगूठा,
क्यों नहीं काटा
द्रोणाचार्य का सिर
ताकि और किसी एकलव्य का
अँगूठा माँगने आता ही नहीं,
फिर कोई द्रोण
और पैदा ही नहीं होते
फिर कोई भी द्रोणवादी लोग‘
(राम शबरी प्रसंग पर )
‘राजा रामचंद्र तुमने
उस आदिवासिन शबरी के पास
जूठे बेर भी नहीं छोड़े
इस तरह निभा ही लिया
तुमने भी हमसे सच्चा बैर‘

ऐसी ही दर्जनों कविताएँ इस दौर में लिखी र्गइं, मेरे गद्य लेखन का भी सुर बदला, वह भी बगावती हुआ, कपोल कल्पित कहानियों की जगह दलित जीवन से जुड़ी खुरदरी और तीखी कहानियों ने ले ली। मेरा पठन-पाठन भी निरंतर जारी था, पेरियार की सच्ची रामायण और फुले की गुलामगिरी तथा एल0आर0 बाली की ‘हिन्दुइज्म धर्म या कलंक‘ पढ़ी, सरिता मुक्ता रीप्रिंट भी पढ़े, बाबा साहब को तो पढ़ा ही, बाबा साहब पर आ रही अन्य पुस्तके भी पढ़ीं, ओशो को भी पढ़ा, कृष्णमूर्ति, लोहिया, जयप्रकाश नारायण, मधु लिमिये और किशन पटनायक, मार्क्स, एंजेल्स, फ्रायड और नीत्शे को भी पढ़ने लगा। हिंदी साहित्य के समकालीन कई रचनाकारों को भी पढ़ने का अवसर मिला, इन सबने मुझे वैचारिक रूप से मजबूती दी। आर0एस0एस0 की आलोचना में लिखा गया बहुत सारा साहित्य भी पढ़ने को मिला, अगर मैं कहूँ कि अम्बेडकरवादी और मानवतावादी साहित्य ने मुझे मानसिक गुलामी से निजात दिलाई तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी समतावादी शब्दों और रचनाओं ने मेरी जिन्दगी की दिशा बदल दी।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

रविवार, 21 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-13

धर्मान्तरण की कोशिशे
    मैंने गंभीरता से धर्मान्तरण के बारे में सोचना शुरू किया, संघ में रहते हुए यह समझ थी कि सिख, जैन और बौद्ध तो हिन्दू ही है और मुसलमानों को लेकर अभी भी दिल दिमाग में कई शंकाए आशंकाए थीं, इसलिए इस बारे में सोचना भी जरूरी नहीं लगा, तब एक मात्र विकल्प के रूप में ईसाई ही बचे थे, मैंने सोचा क्यों नहीं ईसाई लोगों से बात की जाये, ये लोग पढ़े लिखे भी होते हैं और कम कट्टर भी, रही बात संघ की तो वे ईसाइयों से भी उतने ही चिढ़ते है जितने कि मुस्लिमों से। लेकिन सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि ये ईसाई लोग पाए कहाँ जाते हैं मैं आज तक किसी भी ईसाई से नहीं मिला और ना ही कोई परिचित था हालाँकि आरएसएस में रहते उनके खिलाफ बहुत पढ़ा था, यह भी सुन रखा था कि जो भी उनके धरम में जाता है, उन्हें लड़की और नौकरी दी जाती है, पर मुझे तो दोनों की ही जरुरत नहीं थी, मुझे तो सिर्फ बदला लेना था, मुझे तो सिर्फ उनको चिढ़ाना था, जिन्होंने मेरी बेइज्जती की थी और मुझे ठुकरा दिया था। मैंने ईसाई खोजो अभियान शुरू कर दिया, जल्दी ही मैं भीलवाड़ा शहर के आजाद नगर क्षेत्र के एक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक से मिलने में सफल रहा जिनका नाम बथुअल गायकवाड़ बताया गया था, दरअसल मेरे जीजाजी जो कि प्रेस पर कम्पोजीटर थे, वे कुछ ही दिन पहले इस प्रेस पर काम पर लगे थे और मैं उनको ढूँढते हुए वहाँ पहँुचा तो मेरी दोनों खोजें पूरी हो गई, ये महाशय एक स्कूल और चर्च के भी मालिक थे, मैंने उनसे बात की और अपना छिपा हुआ एजेंडा बताया और उनसे पूछा कि-क्या मैं ईसाई बन सकता हूँ? उन्होंने पूछा कि क्यों बनना चाहते हो? तब मैंने उन्हें आरएसएस के साथ चल रहे अपने पंगे के बारे में बताया और कहा कि मैं उनको सबक सिखाना चाहता हूँ। इस पर गायकवाड़ जी बोले-मसीहियत बदला लेने में नहीं बल्कि माफ करने में विश्वास करती है। इसलिए तुम भी उन्हें माफ कर दो और रेगुलर चर्च आना शुरू करो, जीजस में यकीन करो, वही हमारा मुक्तिदाता और सारे सवालों का जवाब है। मैंने उनसे साफ कहा कि मैं मुक्ति नहीं खोज रहा और न ही धर्म और भगवान, ना ही मेरा कोई सवाल है, मुझे कोई जवाब नहीं चाहिए मैं तो सिर्फ और सिर्फ संघ की पाखंडी और दोगली नीति को बेनकाब करना चाहता हूँ उन्होंने मेरी बात को पूरी ओढ़ी हुई धार्मिक गंभीरता से सुना और अगले रविवार को प्रार्थना में आने का न्योता दिया, मैं रविवार को उनकी प्रार्थना सभा का हिस्सा बनता इससे पहले ही पादरी साहब ने मेरे जीजाजी के मार्फत मेरे परिवार तक यह समाचार भिजवा दिए कि मुझे समझाया जाए क्योंकि मैं ईसाई बनने की कोशिश कर रहा हूँ।
बाद में उन्हें छोड़ कर मैं मेथोडिस्ट, बैप्टिस्ट, सीएनआई, सीरियन, कैथोलिक और भी न जाने कैसे कैसे अजीबो गरीब नाम वाले चर्च समूहों के पास पहुँचा, उन्हें अपनी बात बताई और कहा कि मुझे ईसाई बना दो, लेकिन सब लोग आरएसएस का नाम लेते ही घबरा जाते थे, उन्हें लगता था कि मैं आरएसएस का ही आदमी था जो किसी साजिश के तहत उन्हें जाल में फँसाने की कोशिश कर रहा था, इसलिए वे जल्दी ही किसी न किसी बहाने अपना पिंड छुड़ा लेते मुझे कहीं भी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
मसीह मंजूर, मसीहियत नामंजूर
    पर हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं था, मैं एक स्कूल टीचर से मिला जो मूलतः ब्राह्मण थे मगर वे धर्मान्तरण कर हरिनारायण से अच न्यूमेन हो गए थे। उन्होंने मुझे कुछ धार्मिक शिक्षा दी, मुझे धरम करम में कोई रुचि नहीं थी, सही बात तो यह थी कि मुझे बाइबिल, चर्च, जीसस और मुक्ति जैसी किसी भी बात में रुचि नहीं थी, मेरा मकसद तो कुछ और ही था, मैं न्यूमेन से संतुष्ट नहीं था, उन्होंने मुझे एक सेवंथ डे एडवेंटिस्ट पास्टर परवेज लाल का पता देकर कहा कि इनको चिट्ठी लिखना शायद ये तुम्हारी कुछ मदद कर पाएँगे, मैंने चिट्ठी लिख दी और गाँव आ गया। कुछ ही दिनों में दो अपरिचित सज्जन मेरे घर की दहलीज पर खड़े हो कर मुझी से मेरा पता पूछ रहे थे, मैंने कहा कि मैं ही हूँ वह जिसे आप खोज रहे है। उन्होंने बताया कि वे जोधपुर से आए हैं पादरी पीम लाल, मैंने उनका स्वागत किया, चाय पिलाई, उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और मुस्करा कर बोले कल मेरे साथ चलो।
    मैं उनके साथ जोधपुर आ गया करीब तीन महीने उनके पास रहा, उन्होंने पूरी बाइबिल शब्दशः पढ़ा दी, क्षमा, करुणा और प्रायश्चित का महत्व समझाया, इतना कुछ समझाया जितना कि एक ‘’बेचलर ऑफ थियोलोजी‘ के लिए जरुरी होता है, मगर मैं अब भी एक बागी हिन्दू ही था, इसी कारण ज्यादा भरोसेमंद नहीं था उनके लिए, एक रोज उनके चर्च के तमाम विश्वासियों और खुद पास्टर साहब ने तय किया कि मेरा बप्तिस्मा किया जाए, पर इसके लिए जरुरी था कि मैं जोधपुर के जिला कलेक्टर के सामने यह शपथपत्र प्रस्तुत करूँ कि मैं ईसाई बनना चाहता हूँ मैंने यह करने से साफ इंकार कर दिया, मैं तो सिर्फ आरएसएस को चिढ़ाना चाहता था मुझे सिर्फ इतना ही करना था, न इससे कुछ कम और न ही इससे ज्यादा  उन्होंने आपस में कुछ तय किया तथा कानूनन धर्म परिवर्तन करने की योजना को त्याग दिया। अंततः उन्होंने बपतिस्मे की केवल धार्मिक रीति गुपचुप तरीके से करने का निश्चय किया।
    फिर एक रविवार को उन्होंने कुछ गीत गाए, बाइबिल से कुछ आयतें पढ़ीं और मुझे पानी के एक टैंक में डुबोकर बाहर निकला, बाहर निकालते वक्त उन्होंने मुझे सफेद कपड़े में ढँका और मेरे कान में कहा कि ‘आज से तुम्हारा पुनर्जन्म हो गया है‘, इस प्रक्रिया को वो ‘बोर्न अगेन‘ कहते है, अब मैं उनकी नजर में एक भरोसेमंद व्यक्ति था लेकिन मुझे धर्म का खोखलापन साफ नजर आ रहा था, यह क्या धर्म है, जो हर सवाल के लिए जीसस को ही उत्तरदायी मानता हो, मेरे अन्दर विद्रोह की लहर सी उठी, मैं यह क्या होने दे रहा हूँ अपने साथ मुझे लगा कि मैं एक खाई से निकल कर कुँए में गिर गया हूँ, एक गुलामी से निकल कर दूसरी दासता में जा रहा था। वास्तव में मैं उस दिन खुद को एक ऐसे कैदी के रूप में पा रहा था जो सिर्फ जेल बदल रहा था।
    मैं अपने भीतर के विद्रोही इन्सान को दबा नहीं पा रहा था, मैंने स्पष्ट कर दिया कि मुझे मसीह तो फिर भी मंजूर हो सकते हैं पर आपकी यह मसीहियत मुझे कतई मंजूर नहीं है मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा भले ही आप लोग टाई, कोट और जूते पहन कर अंग्रेजी में प्रार्थना करते हैं लेकिन मूर्खताओं में आपका भी मुकाबला नहीं है। मुझे धर्म के किसी भी संगठित स्वरूप पर घिन आने लगी, मैं ईसाइयत के अन्धे कुँए से बाहर आने को छटपटाने लगा, जल्दी ही मैंने उनको उनकी तमाम मूर्खताओं के साथ अलविदा कह दिया। मुझे सुकून तब मिला जब मैं उनसे मुक्त हुआ मैं आराम की नींद सोया, मुझे लगा कि मुक्ति जीसस, बाइबिल या मसीहियत अथवा किसी भी धर्म में नहीं है बल्कि मुक्ति तो इनसे मुक्त हो जाने में है और मैं इनसे मुक्त हो रहा था मैं खुश था मुझे खुशी हो रही थी कि मैं अब धार्मिक नहीं था मैं विश्वासी नहीं था मैं स्वर्ग में स्थान नहीं पाने जा रहा था मैं अब नरक जाने वाली गाड़ी में सवार था और मैं वाकई इससे बेहद खुश था।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-12

दोस्त हो तो दौलतराज जैसा
    मैं कृषि मंडी से बाहर हो गया, घर लौटने का मन नहीं था, संघ के लोगों द्वारा खाना फेंकने के बाद से मैं घर जाने से कतराता था, भीलवाड़ा में ही इधर-उधर भटकना, कहीं खाना, कहीं सोना, कुछ भी ठिकाना न था, अनिश्चय, अनिर्णय और अन्यमनस्क स्थिति के चलते मेरा अध्ययन प्रभावित हो गया, मैंने माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय में प्रथम वर्ष कला संकाय में प्रवेश तो लिया और साल भर छात्र लीडरशिप भी की, लेकिन एग्जाम नहीं दे पाया ,घर पर पिताजी को जब इसकी खबर मिली तो उनकी डाँट पड़ी ,कुछ गालियाँ भी, बस गनीमत यह थी कि पिटाई नहीं हुई, लेकिन इससे पढ़ाई बाधित हो गई, बाद का सारा अध्ययन स्वयंपाठी के रूप में ही संपन्न हुआ। उन विकट दिनों में मुझे अपने छोटे से कमरे में शरण दी, करेड़ा क्षेत्र की नारेली ग्राम पंचायत के रामपुरिया गाँव के निवासी दौलत राज नागोड़ा ने, वे भी आरएसएस के स्वयंसेवक थे, ऑफिसर्स ट्रेनिंग प्राप्त, संघ कार्यालय पर भी रह चुके थे, बदनोर में रहते हुए उन्होंने संघ के आदर्श विद्या मंदिर में आचार्य के नाते भी अपनी सेवाएँ दी थीं, वे बहुत ही सक्रिय स्वयंसेवक माने जाते थे, उनका बौद्धिक भी बेहद सधा हुआ होता था, एक शिक्षक की तरह वे बोलते जो समझने में आसान होता, संघ के गीत भी उन्हें खूब कंठस्थ थे, जिन्हें वे विभिन्न मौकों पर गाते थे ,उनमे लोगो को मोबलाइज करने की अदभुत क्षमता है। उन्हें भी संघ कार्य के दौरान कई प्रकार के कटु अनुभव हुए, भेदभाव और अस्पृश्यता की कड़वी अनुभूतियाँ। एक बार उन्होंने महाराजा अजमीड आदर्श विद्या मंदिर में आयोजित आरएसएस के ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप (ओटीसी) के बौद्धिक सत्र में जाति उन्मूलन में संघ की भूमिका से सम्बंधित सवाल उठा दिया, जिसका कोई जवाब संघ के पदाधिकारियों से देते नहीं बना ,तत्कालीन प्रचारक महोदय ने दौलत जी को कुछ उल्टा सीधा जवाब दे दिया, मामला इतना तूल पकड़ गया कि मारपीट की नौबत आ गई, जिला प्रचारक और दौलत राज नागोड़ा गुत्थमगुत्था हो गए, दौलत जी भी ठहरे ठेठ देहाती संघर्षशील व्यक्ति। हार मानने का तो सवाल ही नहीं उठता था, उन्होंने संघ के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में प्रचारक जी के बाल नोच लिए और उस दिन से आरएसएस से किनारा भी कर लिया, बाद में उन्होंने एक अम्बेडकर बचत समूह बनाकर दलितों को संगठित करना शुरू किया, यह काम उन्होंने निरंतर जारी रखा, दलित आदिवासी युवाओं को कानूनी प्रशिक्षण देने और उन्हें फूले, कबीर, अम्बेडकर के मिशन से जोड़ने में लगे रहे और आज भी लगे हुए हंै। संघ से लड़ाई होने के बाद दौलत राज जी गाडरीखेड़ा में एक कमरा किराये पर ले कर इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में आईटीआई करने लगे इस सरकारी संस्थान में भी संघियों की भरमार थी, उनको वहाँ भी उनसे संघर्ष करना पड़ा, बहुत ही कठिन परिस्थितियों में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की, पान की केबिन लगाकर उन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की। फिर प्रैक्टिस शुरू की, वहाँ भी गरीबों के मुद्दे उठाये, उनकी पैरवी की, आज भी पीडि़तों के लिए उनकी प्रतिबद्धता जग जाहिर है तो ऐसे समर्पित साथी के साथ उस छोटे से कमरे में मैं कई दिनों तक टिका, वहीं से एक अखबार निकालने की धुन मुझ पर सवार हुई, मैं अभिव्यक्ति का एक जरिया चाहता था, जिससे संघ और उसकी विचार धारा के दोगलेपन को उजागर कर सकूँ, अंततः वह जरिया पा लिया ‘दहकते अंगारे’ नामक पाक्षिक समाचार पत्र प्रारंभ करके, दौलत राज नागोड़ा तब से आज तक साथ बने हुए हैं, कई बार उन्मादी हुड़दंगी लोगों ने हमारे खिलाफ फतवे जारी किए, हमारी निंदा की गयी ,हमें अलग थलग करने के प्रयास किये गए, मगर संघी हमें दलित, पीडि़त, वंचित जनता से अलग कर पाने में सफल नहीं हुए। दलितों पीडि़तो और हाशिये के तबकों के लिए हमारी आवाज बंद होने के बजाए बुलंद ही हुई। आज दौलत राज नागोड़ा एक स्थापित वकील है, तीन बार वे आसींद बार एसोसिएशन के निर्विरोध अध्यक्ष रह चुके हैं और राजस्थान के दलित मूवमेंट का जाना पहचाना नाम है। इन दिनों वे दलित आदिवासी एवं घुमंतू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के प्रदेश संयोजक भी हंै और वंचितों के लिए पूरी तरह से समर्पित रहते हैं।
    जिन्दगी में दोस्त तो बहुत मिले और मिलते रहते हैं, आगे भी मिलेंगे, पर विगत 25 वर्षों से दौलत जी के साथ जो वैचारिक और मिशनरी दोस्ती बनी रही, उसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ और अक्सर कहता हूँ कि जीवन में दोस्त हो तो दौलत राज जैसा।
बदलाव नहीं बदला लेने की इच्छा
    मैं किसी भी तरीके से प्रतिशोध लेना चाहता था, इसके लिए किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार था, जैसा कि नीति कहती है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसलिए मैं उन तमाम लोगांे से मिलने लगा जिनको आरएसएस के लोग बुरे लोग बताते थे, अब मेरे परिचय क्षेत्र में सेकुलर विधर्मी सब आने लगे, मैं आगे होकर उनसे परिचय बढ़ा रहा था, संघ में रहते हुए मेरे गिनती के मुसलमान ही परिचित थे, चूँकि मैं उन दिनों हास्य व्यंग्य के नाम पर घटिया किस्म की फूहड़ राजस्थानी कविताएँ लिखता था और उन्हें सुनाने के लिए कवि सम्मेलनों में जाता था, इसलिए जमालुद्दीन जौहर, अजीज जख्मी और एक मौलाना नौशाद आलम नामक मुसलमान मेरे जान पहचान के थे, एक और भी व्यक्ति थे वे ट्रेड यूनियन लीडर थे अलाउद्दीन बेदिल, वो भी कभी कभार शेरो शायरी करते थे, इसलिए मुलाकातें हो जाया करती थीं, इनमें से नौशाद आलम मेरी उम्र के ही थे और कविता कहानी के अलावा भी उनसे बातें होती थीं, इसलिए मैंने उनसे दोस्ती बनाने का निश्चय किया और उनसे मिलने निकल पड़ा। नौशाद आलम मूलतः बिहारी थे और मेरे निकटवर्ती गाँव भगवानपुरा में एक मस्जिद में इमामत भी करते थे और मदरसे में पढ़ाते भी थें, ग़ज़लें लिखना तो उनका शौक मात्र था, बाद के दिनों में वे गुलनगरी भीलवाड़ा की मस्जिद के इमाम बन गए, यह उन दिनों की बात है जब कि दूसरी कारसेवा भी हो चुकी थी और बाबरी मस्जिद तोड़ी जा चुकी थी, मुस्लिम मानस गुस्सा था, विशेषकर संघ परिवार के प्रति मुस्लिम युवाओं में भयंकर गुस्सा दिखलाई पड़ता था, तो उस तरह के गरमागरम माहौल में मैं एक दिन मौलाना नौशाद आलम से मिलने पहुँचा, थोड़ी झिझक तो थी, आज मैं एक मस्जिद से लगे मदरसे में बैठा था, इन मस्जिदों के तहखानों में असलहे छिपाकर रखे जाने की बातें संघ में रहते बहुत सुनी थी, इसलिए थोड़ा सा भय भी था पर जब आ ही गया तो बात करके ही वापसी होनी थी, इसलिए रुका रहा, मदरसे से फ्री होकर मौलाना साहब नमाज पढ़ने चले गए, लौटे तो बातचीत का सिलसिला चला, घंटों तक हुई गुफ्तगू का कुल जमा सार सिर्फ यह था कि हमारा दुश्मन एक ही है इसलिए मिलकर उसकी खिलाफत की जाए, सहमति बनी एक संगठन दलित युवाओं का और एक मुस्लिम यूथ का बनाने की। मैंने दलित एक्शन फोर्स बनाई जिससे दलित नौजवान जुड़ने थे और मौलाना नौशाद आलम ने मुसलमान युवाओं के लिए हैदर -ए-कर्रार इस्लामिक सेवक संघ बनाया, मकसद था आरएसएस की कारगुजारियों का पर्दाफाश करना और जरूरत पड़ने पर सीधी कार्यवाही करके जवाब देना, इन संगठनों के बारे में जगह जगह चर्चा शुरू की गई, लोग जुड़ने भी लगे लेकिन हम कुछ भी कर पाते इससे पहले ही खुफिया एजेंसियांे को इन दोनों संगठनों की भनक लग गई और सीआईडी तथा आईबी के अधिकारी और स्थानीय पुलिस हमारे पीछे पड़ गई, हमारे द्वारा नव स्थापित दोनों ही संगठन अपने जन्म के साथ ही मर गए, हम कुछ भी नहीं कर पाए लेकिन इस असफलता ने मुझे निराश और हताश नहीं किया, मेरा गुस्सा जरूर और बढ़ गया, मैंने हार मानने की जगह आरएसएस को चिढ़ाने के लिए धर्म परिवर्तन कर लेने की तरकीब सोची।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित 


रविवार, 14 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-11

देशी तालिबानियों से संघर्ष की शुरुआत
    अब मैं वे सब काम करने को तत्पर था, जो तालिबान के इस भारतीय संस्करण को चोट पहुँचा सके, इसकी शुरुआत मैंने छात्र राजनीति में विद्रोही कदम उठाने के जरिये की, भीलवाड़ा कॉलेज में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से बगावत करके एक नया छात्र संगठन बनाया गया, जिसे विद्यार्थी अधिकार रक्षक संघ (वार्स) नाम दिया गया, संघ के ही एक अन्य बगावती स्वयंसेवक बृजराज कृष्ण उपाध्याय इसका नेतृत्व कर रहे थे, मैं इसके प्रारंभिक काल का संगठन मंत्री बना, हमने संघी छात्र संगठन के पाँव उखाड़ना चालू कर दिया, जगह-जगह पर वार्स की इकाइयाँ स्थापित होने लगीं, लोग संघ की मानसिक गुलामी से निजात पाने के लिए वार्स को विकल्प के रूप में देखने लगे, हमारे नेता बृजराज में गजब की हिम्मत और लगन रही, अद्भुत जीवट वाला व्यक्ति, उस बन्दे पर आरएसएस के लोगों ने बहुत जुल्म ढाए अलग छात्र संगठन बनाना संघ को बर्दाश्त नहीं था, इसलिए आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर कई बार जानलेवा हमले किए गए, एक बार तो मांडलगढ़़ इलाके में त्रिवेणी चैराहे के पास उनके साथ भयंकर मारपीट की गयी, सिर में पेचकश घुसेड़ दिया गया और फिर मरा समझ कर छोड़कर भाग गए, यह हमला इसलिए किया गया क्योंकि वार्स के साथी संघ से जुड़े लोगों के आपराधिक कृत्यों को उजागर कर रहे थे
 दरअसल उन दिनों संघ के अल्पकालिक प्रचारक और विस्तारक किस्म के जो लोग थे, वे इस खनन क्षेत्र में अवैध एक्सप्लोजिव तथा हथकड़ी शराब बेचने वालों को संरक्षण दे रहे थे, ऐसा हमें मालूम हुआ था, यह भी पता चला कि कुछ माननीय भाई साहब ऐसे लोगों से वसूली भी करते रहे थे, बस इन्हीं बातों के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलना हमें भारी पड़ गया, निशाने पर पूरा संगठन ही था, मगर हत्थे सिर्फ बृजराज कृष्ण उपाध्याय ही चढ़े, सो उन्हें इतना मारा गया कि वे राष्ट्रभक्तों के हाथों शहीद होते-होते बचे वैसे भी मांडलगढ़    सेंड स्टोन माइनिंग का इलाका है जहाँ पर किसी की भी जान लेना खनन माफिया के दाहिने हाथ का खेल रहा है, ऐसे इलाके में उपाध्याय को मारने की साजिश की गई थी, लेकिंन किसी प्रकार से उनकी जान बचा ली गयी, आसपास के लोगों ने गंभीर रूप से घायल उपाध्याय को समय रहते उपचार के लिए महात्मा गांधी चिकित्सालय भीलवाड़ा पहुँचा दिया, जहाँ वे लम्बे उपचार के पश्चात ठीक हो पाए। बात सिर्फ संघ के कथित अनुशासित स्वयंसेवकों के धतकरमों को उजागर करने मात्र की ही नहीं थी बल्कि चरित्र, शील और संस्कार का दंभ भरने वाले उस छात्र संगठन की कारगुजारियों के पर्दाफाश की भी थी, जिन्होंने अपनी ही छात्रा इकाई की पदाधिकारियों के शील को भंग करने जैसे पाप कर्म करने से भी गुरेज नहीं किया था, हालत इतने संगीन थे कि उनमें से एक का गर्भपात करवा कर भ्रूण हत्या जैसी अधम कार्यवाही तक को अंजाम दिया गया था। इस फर्जी शील, चरित्र और संस्कार पर हम नहीं बोलते, ऐसा तो हो नहीं सकता था, हमने जब उनकी पोल खोलनी शुरू की तो वे अपने चिर परिचित हथियार डंडे के साथ हम लोगों से विचार विमर्श करने आ पहुँचे, संघ के लोग ज्यादातर मौकों पर तर्क के स्थान पर लट्ठ का उपयोग करते हैं, उन्हें यही सिखाया गया है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं खैर, संघी आकाओं के इशारे पर शिक्षा के मंदिरों को गुंडागर्दी के अड्डे बनाने की हर कोशिश को विफल करने के लिए वार्स बेहद मजबूती से कई साल तक भीलवाड़ा में सक्रिय रहा,कई कॉलेजों में कई बार छात्र संघ चुनाव में हमारे अभ्यर्थी जीते, हमने न केवल भाजपाई संघी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को, बल्कि कांग्रेसी छात्र संगठन एनएसयूआई को भी कॉलेज परिसर से खदेड़    दिया। वार्स एक वैकल्पिक छात्र संगठन के रूप में उभरा जिसने लम्बे समय तक केवल छात्र समस्याओं को ही नहीं उठाया बल्कि शहर और जिले की विभिन्न जन समस्याओं को भी प्रभावी तरीके से उठाया तथा युवाओं को जातिवादी और सांप्रदायिक छात्र संगठनों से भी दूर रखा।
ये कौन से ब्राह्मण हुए ?
    संघ की वजह से अम्बेडकर छात्रावास छूट गया था और अब संघ कार्यालय भी, शहर में रहने का नया ठिकाना ढूँढना पड़ा, मेरे एक परिचित संत चैतन्य शरण शास्त्री, जो स्वयं को अटल बिहारी वाजपेयी का निजी सहायक बताते थे, वे उन दिनों कृषि उपज मंडी भीलवाडा में स्थित शिव हनुमान मंदिर पर काबिज थे, मैंने उनके साथ रहना शुरू किया, हालाँकि थे तो वे भी घनघोर हिन्दुत्ववादी लेकिन संघ से थोड़े    रूठे हुए भी थे, शायद उन्हें किसी यात्रा के दौरान पूरी तवज्जोह नहीं दी गयी थी, किसी जूनियर संत को ज्यादा भाव मिल गया, इसलिए वे खफा हो गए, हम दोनों ही खफा-खफा हिंदूवादी एक हो गए और एक साथ रहने लगे। मैं दिन में छात्र राजनीति करता और रात्रि विश्राम के लिए शास्त्री जी के पास मंदिर में रुक जाता, बेहद कठिन दिन थे, कई बार जेब में कुछ भी नहीं होता था, भूखे रहना पड़ता, ऐसे भी मौके आए जब किसी पार्क में ही रात गुजारनी पड़ी भूखे प्यासे ऊपर से एंग्री यंगमैन की भूमिका जहाँ भी जब भी मौका मिलता, आरएसएस के खिलाफ बोलता और लिखता रहता। उन दिनों कोई मुझे ज्यादा भाव तो नहीं देता था पर मेरा अभियान जारी रहता, लोग मुझे आदिविद्रोही समझने लगे। संघ की ओर से उपेक्षा का रवैय्या था ना तो वे मेरी बातों पर कुछ बोलते और ना ही प्रतिवाद करते, एकठंडी सी खामोशी थी उनकी ओर से, इससे मैं और भी चिढ गया। संत शास्त्री भी कभी कभार मुझे टोकाटाकी करते थे कि इतना उन लोगों के खिलाफ मत बोलो, तुम उन लोगों को जानते नहीं हो अभी तक, संघ के लोग बोरे में भर कर पीटेंगे और रोने भी नहीं देंगे। पर मैंने कभी उनकी बातों की परवाह नहीं की
वैसे तो चैतन्य शरण शास्त्री जी अच्छे इन्सान थे मगर थे पूरे जातिवादी। एक बार मेरा उनसे जबरदस्त विवाद हो गया, हुआ यह कि शास्त्री और मैं गांधी नगर में गणेश मंदिर के पास किसी बिहारी उद्योगपति के घर पर शाम का भोजन करने गए, संभवतः उन्होंने किन्हीं धार्मिक कारणों से ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रित किया था, शास्त्री जी मुझे भी साथ ले गए, मुझे कुछ अधिक मालूम न था, सिर्फ इतनी सी जानकारी थी कि आज शाम का भोजन किसी करोड़पति बिहारी बनिए के घर पर है। इस प्रकार घर-घर जाकर भोजन करने की आदत संघ में सक्रियता के दौरान पड़ ही चुकी थी, इसलिए कुछ भी अजीब नहीं लगा, संघ कार्यालय प्रमुख रहते हुए मैं अक्सर प्रचारकों के साथ संघ के विभिन्न स्वयंसेवकांे के यहाँ खाने के लिए जाता था और वह भी कथित उच्च जाति के लोगों के यहाँ, सो बिना किसी संकोच के मैं शास्त्री जी के साथ चल पड़ा। भोजन के दौरान यजमान (दरअसल मेजबान) परिवार ने मेरा नाम पूछा, मैंने जवाब दिया-भंवर मेघवंशी, वे लोग बिहार से थे, राजस्थान की जातियों के बारे में ज्यादा परिचित नहीं थे, इसलिए और पूँछ बैठे कि-ये कौन से ब्राह्मण हुए? मैंने मुँह खोला-मैं अनुसूचित, मेरा जवाब पूरा होता उससे पहले ही शास्त्री जी बोल पड़े-ये क्षत्रिय मेघवंशी ब्राह्मण हैं। बात वहीं खत्म हो गई, लेकिन जात छिपाने की पीड़ा ने मेरे भोजन का स्वाद कसैला कर दिया और शास्त्री भी खफा हो गए कि मैंने उन्हें क्यों बताने की कोशिश की कि मैं अनुसूचित जाति से हूँ। हमारी जमकर बहस हो गई मैंने उन पर झूठ बोलकर धार्मिक लोगों की आस्था को ठेस पहँुचाने का आरोप लगा दिया तो उन्होंने भी आखिर कह ही दिया कि ओछी जाति के लोग ओछी बुद्धि के ही होते हैं। मैं तो तुम्हे ब्राह्मण बनाने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम उसी गन्दी नाली के कीड़े बने रहना चाहते हो, मैं गुस्से के मारे काँपने लगा, जी हुआ कि इस ढोंगी की जमकर धुनाई कर दूँ पर कर नहीं पाया, मगर उस पर चिल्लाया, मैं भी कम नहीं मैंने भी कह दिया तुम भी जन्मजात भिखमंगे ही तो हो, तुमने कौन सी कमाई की आज तक मेहनत करके, तो शास्त्री ने मुझे नीच जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया और मैंने उन्हें भिखारी घोषित कर दिया अब साथ रह पाने का सवाल ही नहीं था। मैं मंदिर से निकल गया, मेरे साथ रहने से उनके ब्राह्मणत्व पर दुष्प्रभाव पड़ सकता था और कर्मकांड से होने वाली उनकी आय प्रभावित हो सकती थी, वहीं मैं भी अगर ब्राहमणत्व की ओर अग्रसर रहता तो मेरी भी संघ से लड़ाई प्रभावित हो सकती थी, इसलिए हमारी राहें जुदा हो गईं, न मैं ब्राह्मण बन सका और न ही वे इन्सान बनने को राजी हुए, बाद में हम कभी नहीं मिले।

-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --10

खुद को खत्म कर देने का ख़याल
मैंने सर संघचालक को जो चिटठी लिखी, उसका कोई जवाब नहीं आया, मैं हर स्तर पर जवाब माँगता रहा, लड़ता रहा लेकिन हर स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी थी, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, कोई भी इस घटना की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं था, सबको लगता था कि यह एक बहुत ही सामान्य घटना है, ऐसा तो होता ही रहता है, इसमें क्या बड़ी बात है, जिससे मुझे इतना नाराज और तनावग्रस्त होना चाहिए। मैंने इतनी पीड़ा कभी नहीं महसूस की थी पहले, जितनी उन दिनों कर रहा था, वे दिन वाकई बेहद दुखद थे, मैं अक्सर खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाता था, कुछ भी करने और सोचने की शक्ति नहीं बची थी, मैं अवसाद की स्थिति में जा रहा था, मुझे कहीं भी सुना नहीं जा रहा था, जो बात मेरे अन्दर इतनी उथल पुथल मचाए हुए थी, उससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा, दुनिया तो वैसे ही चल रही थी, जैसी पहले चलती थी। मैं इतना निराश था कि मेरे दिमाग में खुद को खत्म कर देने के खयाल आने लगे, मैंने खुदकशी के बारे में सोचा, मैंने मरने की कईं तरकीबें सोची, कुएँ में कूद जाना, फाँसी लगाना या जहर खा कर मुक्त हो जाना, कुछ तो करना ही था, इसलिए विषपान का विकल्प ही मुझे सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ा, घर में चूहे मारने की दवा मौजूद थी, एक रात खाने के साथ ही मैंने उसे खा लिया और सो गया, मुझे नींद का आभास हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अब मेरी जिन्दगी की फिर कोई सुबह नहीं होगी। मैं सोया हुआ था, शायद नींद में था या जग रहा था मैं जी रहा था या मैं मर रहा पेट में दर्द की एक भयंकर लहर सी उठी। उल्टी करने की अदम्य इच्छा और जरूरत ने मुझे झकझोर दिया, मैं दर्द के मारे दोहरा हो रहा था, मैं उठ बैठा और उल्टियाँ करने को बाहर भागा उल्टियों के चलते बुरा हाल था, कलेजा मुँह को आने लगा, अंतडि़याँ खिंची चली आती थी, सिर चकराता था और बेहोशी जारी थी, अचानक बिगड़ी तबियत से परिजन चिंतित हो उठे, बड़े भाईसाहब को तुरंत बुलाया गया, वे आए तब तक मेरी आँखें बंद होने लगी, भाईसाहब ने पूछा कि अचानक क्या हुआ, मैं बामुश्किल सिर्फ इतना बता पाया कि मैंने चूहे की दवा खायी। बाद में मुझे बताया गया कि भाईसाहब गाँव से डॉक्टर को लेने को भागे, डॉ0 सुरेश शर्मा तुरंत भागते हुए आ पहुँचे, उन्होंने ग्लूकोज में कई सारे इंजेक्शन डाले और इलाज प्रारंभ किया, चूँकि पुलिस और अन्य लोगों तक बात नहीं पहँुचे इसलिए अगले कई घंटों तक घर में ही गुपचुप इलाज    चलाया गया, मेरे बड़े भाई बद्री जी भाईसाहब का इतना बड़प्पन रहा कि उन्होंने कभी भी किसी को इस घटना का जिक्र नहीं किया, मैं उनकी सक्रियता और डॉ0 शर्मा के त्वरित इलाज की वजह से बच गया पर ऐसी बातें अंततः बाहर आ ही जाती है, डॉ0 साहब ने गोपनीयता भंग कर दी, बात आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई, मैं स्वस्थ तो हो गया पर लज्जा और ग्लानि से भर गया, मैं उन दिनों हर जगह असफलता का सामना कर रहा था, आत्महत्या के प्रयास में भी सफल नहीं हो पाया, हर जगह की तरह यहाँ भी मैं हार गया था, मौत हार गई, जिन्दगी जीत गई थी, मुझे लगता था कि हर गाँव वासी को मेरी इस नादानी के बारे में जानकारी है इसलिए मैं मारे शर्म के कई महीनों तक लोगों का सामना नहीं कर पाता था, मैं वापस भीलवाड़ा चला गया। शहर आकर मैंने सोचना शुरू किया, खुद से ही पूछने लगा कि मैं क्यों मर रहा था और किनके लिए मर रहा था, किस बात के लिए? मेरे मर जाने से किसको फर्क पड़ने वाला था? ठन्डे दिमाग से सोचा तो अपनी तमाम बेवकूफियों पर सिर पीट लेने को मन करने लगा, मरने को तो मैं पहले भी उनके प्यार में राजी था अयोध्या जाकर और मरने को तो मैं बाद में भी तैयार हो गया था उनके नफरत भरे व्यवहार के कारण पर दोनों ही स्थिति मंे मरना तो मुझे ही था, कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-रोते क्या वे मेरी जिन्दगी के मालिक हैं? क्या मेरे जीने के लिए आरएसएस का प्यार या नफरत जरुरी है? मुझे क्यों मरना चाहिए, मुझे उनसे क्यों सर्टिफिकेट चाहिए, वे कौन होते हैं मेरे जीवन और सोच को नियंत्रित करने वाले? मैं अब तक भी उनके साथ क्यों बना हुआ हूँ? मैं ऐसे घटिया और नीच सोच विचार और पाखंडी व्यवहार वाले लोगों के साथ क्यों काम करना चाहता हूँ,जो मेरे घर पर बना खाना तक नहीं खा सकते हैं! मैं ऐसे लोगों का हिन्दू राष्ट्र क्यों बनाना चाहता हूँ? मैं एक ऐसा धार्मिक राष्ट्र बनाने का आकांक्षी क्यों था जिसमें मेरे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होने वाला है आखिर क्यों?
    ऐसे ही जलते हुए सैंकड़ों सवालों ने मुझे जकड़ लिया था  खूब अन्तद्र्वन्द्व मनन चिंतन और थक जाने की स्थिति तक मंथन के पश्चात मैंने तय किया कि मैं आरएसएस को न केवल पूरी तरह नकार दूँगा बल्कि उनके द्वारा मेरे साथ किए गए जातिगत भेदभाव को भी सबके समक्ष उजागर करूँगा, इस दोगले हिन्दुत्व और हिन्दुराष्ट्र की असलियत से सबको वाकिफ करवाना मेरा आगे का काम होगा। मैंने संकल्प कर लिया कि संघ परिवार के चेहरे से समरसता के नकाब को नोंचकर इनका असली चेहरा मैं लोगों के सामने लाऊँगा। मैंने अपनी तमाम सीमाओं को जानते हुए भी निश्चय कर लिया था कि मैं संघ परिवार के पाखंडी हिन्दुत्व को बेनकाब करूँगा और मैं अपनी पूरी ताकत के साथ अकेले ही आरएसएस जैसे विशालकाय अर्धसैनिक सवर्ण जातिवादी संगठन से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा। मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाए सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक भीम प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके विघटनकारी विचारों की मुखालिफत बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये करूँगा, यह जंग जारी रहेगी।
   
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
 (लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा: हिन्दू तालिबान’ का पहला भाग)      
    मोबाइल: 09571047777

बुधवार, 30 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --9

बन्धु, खाना पैक कर दो
    मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो  उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
    आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
    शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
       बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --8

पुलिस वाले लाठियाँ लिए टूट पडे़
    मैं इस उपद्रव बनाम आन्दोलन का हिस्सा था और कुछ हद तक अगुवाई में भी था, इसलिए थोड़ी बहुत देर तो पथराव में भागीदार रहा, फिर जब आस पास के लोग छँटने लगे तो मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अकेले ही पत्थर फेंक रहा हूँ, कहीं पुलिस की लाठी गोली का शिकार हो गया, तो भय का अहसास हुआ इधर-उधर देखा, सामने ही भीमगंज स्कूल था, दौड़कर उसमंे घुस गया और बच्चों के बीच छिप कर बैठ गया, काफी देर तक बाहर से गोलियाँ चलने की आवाजें आती रही, पता चला कि कफ्र्यू लगाने की घोषणा की जा चुकी है, अब शायद बाहर जाना संभव नहीं हो पाएगा, तब चिंता हुई, क्या करूँ, कैसे बाहर जाऊँगा, पर यह सोच कर शांत रहा कि इतने सारे बच्चों को भी तो पहँुचाया जाएगा, उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।
    उपद्रव के शांत होते ही पुलिस की सुरक्षा में बच्चों को घर पहँुचाने का इंतजाम किया गया, पुलिस और शिक्षकों ने मिल कर सब बच्चों को बाहर निकाला, मैं भी अन्य बच्चों के साथ-साथ बाहर तक आया, ज्यों ही गली में पहँुचा, पाँच छह पुलिसवाले लाठियाँ लिए मुझ पर टूट पड़े, मैं समझ ही नहीं पाया कि इतने विद्यार्थियों में उन्होंने मुझ अकेले को ही कैसे पहचान लिया? मैं भी तो शेष बच्चों की तरह ही दुबला पतला किशोर था, उन्होंने कैसे जाना कि मैं स्टूडेंट नहीं उपद्रवकारी हूँ। मैं उस वक्त अपने ललाट पर तिलक और केसरिया पट्टी जो सिर पर बाँध रखी थी, उसे तो भूल ही चुका था, पुलिसकर्मी मुझ पर धुआँ धार लाठियाँ फटकार रहे थे, मैं गिरते पड़ते आगे-आगे भाग रहा था और वे पीछे-पीछे। अनगिनत लाठियों के वार से उठे दर्द से बिलबिलाता, पुलिस से बचता बचाता मैं भाग कर किसी तरह मानिकनगर होकर महात्मा गाँधी अस्पताल पहँुच गया, जहाँ पर सैंकड़ों की तादाद में आक्रोशित हिन्दू खड़े थे, दोनों मृतकों की लाशें वहाँ पहँुच चुकी थी, कई सारे घायल लोग भी वहाँ लाए जा रहे थे, मैं भी लहूलुहान था, मेरा भी प्राथमिक उपचार किया गया, वहाँ से मुझे संघ कार्यालय पहँुचाया गया, जहाँ पर कफ्र्यू के अगले पाँच दिनों तक मेरी चोट खाई पीठ की मालिश की गई, पंचमुखी बालाजी रिको एरिया के महंत लाल बाबा प्रेमदास महाराज भी हमारे साथ थे और भी लोग थे, किसी तरह वे बुरे दिन बीते, दर्द निवारक गोलियों से दर्द गया तो घर की याद आई, गाँव लौट कर आया, इस पूरे घटनाक्रम से मन में अजीब सा महसूस होने लगा, लगने लगा कि किसी न किसी दिन या तो पुलिस के हाथों अथवा विधर्मी लोगों के हाथों मारा जाऊँगा, हालाँकि उन दिनों बहुत बेचैनी थी फिर भी संघ के प्रतिष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं आई थी, संघ कार्य को भगवान का काम मानने की प्रवृति इतनी हावी थी कि आरएसएस के खिलाफ एक भी शब्द मुझे बर्दाश्त नहीं होता था, मेरे पिताजी जो कि जन्मजात कट्टर किस्म के कांग्रेसी थे, जो मुझे खाकी नेकर और काली टोपी पहने शाखा में जाते वक्त अक्सर रोकते थे और टोकते हुए कहते थे-यह तुम्हारी बनिया बामन पार्टी कभी हम किसानों और नीची जात वालों की सगी नहीं होगी, ये मियाओं से लड़ाने के लिए हमें काम में लेते हैं, खुद तो लड़ नहीं सकते, डरपोक हैं। मुझे अपने पिताजी की बातों में कांग्रेसी शाख की बू आती थी, मुझे लगता था कि वे भी जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण की ओछी और घिनौनी राजनीति के एक मोहरे मात्र हैं, उनको राष्ट्रभक्ति का तनिक भी ज्ञान नहीं है, वरना भला भारत माता की सेवा में लगे एक पवित्र और राष्ट्रवादी संगठन के खिलाफ वे ऐसी बातें कह सकते हैं? मैंने उनकी कभी भी इस मामले में बात नहीं मानी, पहली बार आरएसएस की चड्डी पहनने से लेकर अयोध्या भाग जाने और अब जिला मुख्यालय से बुरी तरह से पिटकर आने तक के हर मौके पर वे विरोध में कर रहे थे। वैसे तो वे शुरू से ही मेरे शाखा में जाने के विरोधी ही थे, कभी कभार बहुत नाराज हो जाते तो मुझे और आरएसएस दोनों को ढेर सारी अश्लील गालियाँ देते। मुझे बुरा तो बहुत लगता, मन होता था कह दूँ कि मुझे दे दो गालियाँ पर संघ को क्यों देते हो? पर सच बताऊँ तो कभी इतनी हिम्मत नहीं हो पाई, सो मन ही मन कुढ़ता रहता था। शायद वे चाहते थे कि या तो मैं पढूँ अथवा खेतों में काम में मदद करूँ, पर मैं सोचता कि-मैं और खेतों में काम? मैं संघ जैसे महान संगठन का स्वयंसेवक, राष्ट्र निर्माण में निमग्न और वे चाहते हैं कि मैं मानव निर्माण की इस फैक्टरी को छोड़ कर उनके साथ भेड़ें चराऊँ? मैं प्रचारक बनने की क्षमता वाला इन्सान चरवाहा बन जाऊँ, नहीं बाबा नहीं, यह कभी भी नहीं होगा, मैंने ठान लिया था कि संघ कार्य जिन्दगी में कभी भी नहीं छोडूँगा, परम पूज्य डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने कहा था कि संघ का कोई भी स्वयंसेवक होता या नहीं होता, वह काम करे या नहीं करे सदैव ही स्वयंसेवक बना रहता है, इसलिए मैं तो सदा सदा स्वयंसेवक बना रहूँगा और सक्रिय ही रहूँगा। पिताजी और घर वाले कुछ भी सोचें या कहें, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वैसे भी उन जैसे कांग्रेसियों को कभी संघ का ईश्वरीय काम समझ में न तो आया है और न ही आएगा, हम पिता पुत्र के बीच का रिश्ता भी कांग्रेस-आरएसएस के बीच के रिश्ते जैसा रूप लेता जा रहा था, उनका टोकना और चेताना जारी था और मेरी नहीं मानने और अधिकाधिक संघ कार्य में जुटे रहने की जिद जारी थी।
 जब मेरे गाँव आई अस्थि कलश यात्रा
    अयोध्या में मरे कारसेवकों और भीलवाड़ा में मारे गए रतन लालों को हुतात्मा (शहीद आत्मा) घोषित किया जा चुका था, अब उनकी हड्डियों की कलश यात्रा गाँव-गाँव घुमाई जा रही थी, साधु-संत, संघ, विहिप के पदाधिकारी गण और नौजवान स्वयंसेवक इस यात्रा में साथ चल रहे थे, गाँव-गाँव घूमते हुए मेरे गाँव भी आ पहँुची रामभक्तों की अस्थि कलश यात्रा, रात के 9 बजे मेरे गाँव पहँुचने पर यात्रा का हमने भव्य स्वागत किया, हम युवाओं ने अपनी दलित बस्ती को फूल पत्तियों की बन्दनवार से सजाया, ढोल, थाली, मांदल और शंख बजाते हुए नाचते गाते हुए हमने यात्रा का ‘न भूतो ना भविष्यति’ सत्कार किया। सभा हुई, अयोध्या के राम जन्मस्थल पर मुल्ला यम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई बर्बरता पर एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया और बाद में संतों और अन्य हिन्दू नेताओं ने भीलवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार का बेहद मार्मिक वर्णन किया, मजे की बात यह थी कि उस दिन हुए उपद्रव के दौरान इनमंे से एक भी व्यक्ति को कोई चोट नहीं पहँुची थी लेकिन ऐसा आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया कि मौजूद लोगों की ऑंखें भर आईं, हालाँकि मैं खुद भीलवाड़ा में पुलिस जुल्म का शिकार हुआ था, लेकिन इतने मार्मिक अंदाज में मैं भी इस बात को नहीं रख पाता, जितने अच्छे तरीके से उन लोगों ने रखा, जो वहाँ उस रोज मौजूद ही नहीं थे, शायद यही ट्रेनिंग है जो संघ में सीखनी पड़ती है, विद्वान लोग जल्दी ही सीख जाते हंै, वैसे भी इस देश में भूख पर भाषण भूखे इन्सान से ज्यादा अच्छा वे लोग देते हैं जिनका पेट भरा होता है, यहाँ भी वही हो रहा था, हृदय को छू लेने वाले भाषण ‘हिन्दुवः सोदरा सर्वे ‘मतलब कि’ हिन्दू-हिन्दू भाई भाई के नारे लगाए गए, हिन्दू समाज में फैली असमानता की सामाजिक विकृति पर प्रहार किया गया, हिन्दू एकता और संगठित रहने पर बल देते हुए तथा सभी वंचित समुदायों के समाज जनों को गले लगाने के आह्वान के साथ सभा का समापन हुआ।
    सभा की समाप्ति पर मैंने सब लोगों से अपने घर भोजन करने का आग्रह किया, हमने अपने घर पर खीर पूरी का भोजन सबके लिए तैयार किया था, जब खाना बन रहा था, तब भी आदतन पिताजी ने टोका टोकी की थी कि-‘क्यों खाने का सामान खराब कर रहे हो, ये लोग यहाँ नहीं खाने वाले हैं, पाखंडी हैं सब, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं, इनके अन्दर हमारे लिए जहर भरा हुआ है। मैं जल भुन गया, पहली बार मैंने अपनी तमाम ताकत बटोर कर आखिर प्रतिवाद कर ही दिया-आप क्या जानते हैं संघ के बारे में? मैं पाँच साल से उनके साथ हूँ, उनके सबसे बड़े कार्यालय का प्रमुख हूँ, कितने ही स्वयंसेवकों के घर जा कर मैंने खाना खाया है, हमारे संघ में आपके गाँव की तरह छुआछूत और जाति भेदभाव नहीं चलता है, यह सब आपकी कांग्रेस की देन है, पिताजी बोले-‘बेटा कांग्रेस तो हम नीची कौम के लिए माँ का पेट है, तुम इसे कभी नहीं समझोगे। अच्छी बात है अगर तुम्हारी संस्था में सब जातियाँ बराबर हो गई है, तो बनाओ खाना मुझे भी उन्हें खिला कर खुशी होगी, हम बाप बेटे के बीच में यह एक प्रकार का युद्ध विराम था मैं भी राजी और वे भी नाराज नहीं, खाना तैयार था और अब खाने वाले भी तैयार होने वाले थे। मैं बेहद प्रसन्नता और विजयी मुद्रा में भाग-भाग कर काम कर रहा था मैं अपनी जिन्दगी में पहली और आखिरी बार शायद इस अस्थि कलश यात्रा के उसी दिन नाचा भी और गाया भी। मैंने ही आज की सभा का संचालन भी किया था ,मेरे उत्साह और हर्ष की कोई सीमा नहीं थी, मुझे लग रहा था कि मेरे घर रामभक्त नहीं बल्कि साक्षात् भगवान श्री राम पधार रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे शबरी के बेर खाने उसकी झोंपडी चले गए थे राम। मैं मन ही मन इसलिए भी खुश था कि आज अपने कांग्रेसी पिता को मैं गलत साबित करने जा रहा था, मैंने उनके प्रभुत्व वाले कांग्रेसी गाँव में हिन्दुत्व का झंडा गाड़ दिया था आज की इस श्रद्धांजलि सभा का सफल आयोजन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा में बढ़ता हुआ सफल कदम था, मैंने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर आज ही दो स्टीकर लगाए थे-गर्व से कहो हम हिन्दू हैं और बड़े भाग्य से हम हिन्दू हैं।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --7

अम्बेडकर छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाएगी
    गाँव से जो संघ के साथ सफर शुरू हुआ, वह तहसील मुख्यालय मण्डल होते हुए जिला स्तर भीलवाड़ा तक पहुँच गया, भीलवाड़ा शहर में मैं अम्बेडकर आवासीय छात्रावास का छात्र था, पर वहाँ भी आरएसएस के ही गुणगान करता था, चूँकि मैं नेकर पहन कर रोज शाम शाखा में जाता था, इसलिए कुछ सीनियर छात्र मुझे चड्डा साहब कह कर भी चिढ़ाते थे, लेकिन मुझमें श्रेष्ठता का भाव इतना प्रबल हो चुका था कि मैं अपने आगे सब को हीन मानता था, मुझे लगता था कि ये तुच्छ लोग अभी जानते नहीं हैं कि मैं कितनी महान ईश्वरीय कार्य योजना का हिस्सा हूँ, जिस दिन जान जाएँगे, ये सब लोग नतमस्तक हो जाएँगे। मैं अपनी ही धुन में सवार था, दलित और आदिवासी समुदाय के कई अन्य छात्र जो मेरे साथ हाॅस्टल में रहते थे, मैं उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के बारे में जानकारियाँ देता था, उनमें से दो चार को तो मैं शाखा में ले जाने में भी सफल रहा, लेकिन वे जल्दी ही भाग छूटे, उन्हें संघ के ड्रेस और तौर तरीके पसंद नहीं आए फिर भी मैं डटा हुआ था, इस बीच भीलवाड़ा के नगर प्रचारक जी का आगमन हमारे छात्रावास में हुआ, मैं तो बहुत खुश था कि प्रचारक महोदय हमारे द्वार आ रहे हैं, वे वाकई आए, उन्होंने अम्बेडकर छात्रावास के स्टूडेंट्स के रंग ढंग देखे और मुझसे बोले-आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए, इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचार धारा ही भ्रष्ट हो जाएगी। अब मैं विचारधारा को बचाने के लिए अम्बेडकर छात्रावास छोड़कर आरएसएस के जिला कार्यालय पहँुच गया था, जहाँ पर जल्दी ही मुझे जिला कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिल गया, मुझमें शुद्धता और श्रेष्ठता का भाव और सघन हो गया, मुझे अपने हिन्दू होने पर बड़ा गर्व पैदा हो गया था, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता था, मानू भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे मन में समाया हुआ था कि हम हिन्दुओं ने ही दुनिया को सभ्यता सिखाई, हमने अंक और दशमलव दिया, हमारे वेद ईश्वरीय हैं, जिनके मुकाबले ज्ञान में विश्व के सभी धर्म ग्रन्थ बौने दिखाई पड़ते हैं, हमारे यहाँ हर प्राणी में भगवान माने गए और नारियों को देवियाँ, ऐसी महानतम संस्कृति का हिस्सा होना सबसे अधिक पुण्य और गर्व का ही तो काम है, उन दिनों हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान-माँग रहा है सकल जहान  जैसे नारे लगा कर सीना फूल जाता था, संघ से पूरी तरह से सराबोर हो जाने के कारण किसी और विचार के लिए मेरे दिमाग में जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए मनुस्मृति पर गर्व करना तो आ गया पर भारत का संविधान किस चिडि़या का नाम है, यह पता ही नहीं था, उन दिनों मैंने महाराणा प्रताप का यशोगान तो खूब गाया, पर भीलू राना पूंजा के बारे में कुछ भी नहीं जाना। मीरा के प्रेम और भक्ति के पद पायोजी म्हे तो राम रतन धन पायो तो याद रहा पर संत रैदास से जान पहचान ही नहीं हो सकी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, की कीर्ति पताका तो फहराई, लेकिन कौन थी झलकारी बाई, कुछ पता नहीं लगा, अगर जाना भी तो वंचितों का यही इतिहास, जिसमें राम को जूठे बैर खिलाती शबरी, द्रोणाचार्य को श्रद्धावनत होकर अँगूठा काट कर देता गुरु भक्त एकलव्य, सीना चीरकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते हनुमान, कपडे़ धोते धोबी, जूते बनाता चर्मकार, सफाई करता स्वच्छकार यानी कि वही प्राचीन जाति व्यवस्था और वही पुश्तैनी कर्म!
    उन दिनों मेरे आदर्श अम्बेडकर, फुले, कबीर या बुद्ध नहीं थे, क्योंकि इन्हें तो जाना ही नहीं, जिन्हें जान पाया वे राष्ट्रनायक थे सावरकर, तिलक, गोखले और हेडगेवार तथा गुरूजी गोलवलकर ये ही आदर्श थे और ये ही मेरी प्रेरणा के स्रोत थे, नगर प्रचारक जी ने सही ही कहा था कि अगर मैं अम्बेडकर छात्रावास में टिक जाता तो शायद मेरी विचारधारा जल्दी ही भ्रष्ट हो जाती।
आचार्य रजनीश, आरएसएस और मैं
    विचारधारा की चूल हिलने की शुरुआत मेरे संघ कार्यालय में रहते हुए अनायास ही हो गई, उन्हीं नगर प्रचारक महोदय के साथ एक दिन मैं तीरथ दास जी नामक स्वयंसेवक के घर गया, जो हाल में ओशो रजनीश से प्रभावित होकर संघ कार्य में शिथिलता बरतने लगे थे, हम उन्हें समझाने और वापस सही रास्ते पर लाने गए, हमें लगा कि वे वैचारिक विचलन के शिकार हो गए हैं, उनसे नगर प्रचारक जी ने लम्बी बातचीत की, लेकिन वे टस से मस भी नहीं हुए, आते वक्त उन्होंने एक अखबार ओशो टाइम्स भेंट किया, जो प्रचारक जी ने तो हाथ में भी नहीं लिया पर मैं ले आया और जिला कार्यालय में बैठ कर पढ़ने लगा, प्रचारक जी को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने ओशो टाइम्स मेरे हाथों से छीनकर फेंकते हुए कहा-यह आदमी विचारों में भटकाव लाता है, गुमराह कर देता है, इसको जिन्दगी में कभी मत पढ़ना।
    मैं स्तब्ध रह गया, मेरे मन में यह सवाल उठा कि पढ़ने से विचारधारा में भटकन कैसे आ सकती है? इस एक घटना ने मेरी रुचि ओशो के साहित्य में जगा दी, मैंने चोरी छिपे ओशो टाइम्स पढ़ना शुरू कर दिया और इस तरह मेरे मस्तिष्क की अन्य खिड़कियाँ भी खुलने लगी और संघ की पवित्र और शुद्ध विचारधारा अंततः भ्रष्ट होने लगी।
गुलमंडी क्या पाकिस्तान में है ?
    मेरे प्रचारक बनने का सपना भले ही धराशायी हो गया था और थोड़ा बहुत ओशो को भी पढ़ने लगा था, मगर संघ, राष्ट्र निर्माण और हिन्दुत्व से मोह बरकरार था, अम्बेडकर छात्रावास छोड़ देने के बाद पूरी तरह से आरएसएस के जिला कार्यालय में रहते हुए एक निष्ठावान स्वयंसेवक के तौर पर मैं अब भी कार्यरत था। किसी विकल्प या वैकल्पिक विचारधारा के बारे में सोचने जितना खुलापन अभी नहीं आ पाया था इसलिए हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु रात दिन लगा हुआ ही था, अयोध्या की पहली कारसेवा की असफलता के बावजूद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू जन मानस में उबाल आया हुआ था, संघ परिवारीय संस्थाएँ मंदिर बनाओ या गद्दी छोड़ो आन्दोलन चला रही थीं। 12 मार्च 1992 का दिन था, हम राम मन्दिर निर्माण की माँग को लेकर एक विशाल जुलूस सांगानेरी गेट भीलवाड़ा से प्रारम्भ करके मुस्लिम बहुल इलाके गुलमंडी में होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक ले जाना चाहते थे, हजारों की तादाद में उत्साही रामभक्त सिर पर भगवा पट्टी बांधकर सौगन्ध राम की खाते हैं, के नारे लगाते हुए दूधाधारी मन्दिर के बाहर खड़ेे थे। हालाँकि प्रदेश में भाजपा का राज था, ौरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और बंशी लाल पटवा भीलवाड़ा के विधायक, मतलब यह कि प्रदेश में अपनी ही सरकार थी, लेकिन पुलिस वाले रास्ता रोके खड़े थे, जुलूस आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था।
    उस दिन शुक्रवार था, जुम्मे की नमाज और हमारे जुलूस का वक्त लगभग एक ही होने की वजह से पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती नजर आ रही थी, इसलिये प्रशासन हम आन्दोलनकारियों को समझाने की कोशिश में लगा था, पुलिसया रिपोर्टों ने दोनों समुदायों के बीच भिडंत की आशंका जताई थी, पुलिस ने राम के भक्तों से रास्ता बदल देने का आग्रह किया, पर स्टेट में संघ की ही सत्ता थी, इसलिए हम तो बेखौफ थे पुलिस जरुर दबी हुई सी थी, उनके आला अधिकारियों ने हमारे बड़े नेताओं से खूब मिन्नतें की, हम कहाँ मानने वाले थे। हमने रास्ता बदलने से यह कह कर साफ इंकार कर दिया कि हमारा जुलूस गुलमंडी में क्यों होकर न जाएँ, वह क्या पाकिस्तान में है? हमने कहा-जाएँगे तो उधर से ही, चाहे जो हो जाएँ। अभी पुलिस और रामभक्तों में तकरार चल ही रही थी कि जुलूस के पीछे से पथराव शुरू हो गया, स्थितियाँ बिगड़ती देखकर पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, घुड़सवार पुलिस ने रामभक्तों को निर्ममता से कुचला, फिर भी स्थिति बेकाबू ही बनी रही, हालात और बिगड़े तो हवाई फायर हुए और अंततः कई राउंड गोलियाँ बरसाई गई, जिसमें दो लोग शहीद हो गए। एक खामोर के रतन लाल थे तो दूसरे भीलवाड़ा के रतन लाल, एक सेन थे तो दूसरे जैन, दोनों का ही राम जन्मभूमि आन्दोलन और इस उपद्रव से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था, हकीकत तो यह थी कि भीलवाड़ा निवासी रतन लाल जैन डेयरी में रात्रिकालीन ड्यूटी करके लौटे थे और दिन के वक्त घर में आराम कर रहे थे, धाय धाय की आवाजों से जगे और बाहर यह देखने निकले कि हो क्या रहा है, इतने में पुलिस की एक गोली उनकी छाती में समा गई, दूसरे खामोर गाँव के निवासी रतन लाल सेन बाजार में खरीददारी करने आए हुए थे और पुलिस की गोली के शिकार हो गए, लेकिन संयोग से दोनों ही मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए दोनों को शहीद घोषित करके उनका अस्थि कलश निकाले जाने की घोषणा तुरत फुरत ही कर दी गयी।
    हालाँकि दोनों ही मृतकों का राम जन्मभूमि और संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने दुर्घटनावश ही अपने प्राण खोए थे मगर फिर भी उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया, अच्छा हुआ कि दोनों मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए ‘शहीद’ हो गए, मुसलमान होते तो ‘ढेर‘ हो जाते।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

बुधवार, 12 मार्च 2014

महात्मा गांधी की हत्या और आरएसएस: बहस जारी

पिछले हफ्ते (मार्च 2014) राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘‘आरएसएस के लोगों ने गांधीजी को मारा और अब उनके लोग और भाजपा, गांधीजी की बात करते हैं...उन्होंने सरदार पटेल और गांधीजी का हमेशा  विरोध किया‘‘। आरएसएस ने राहुल गांधी के इस भाषण के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज की है। यह पहली बार नहीं है कि राहुल गांधी ने ऐसा वक्तव्य दिया हो। वे पहले भी यही बात कह चुके हैं।
गांधीजी की हत्या का सच क्या है? क्या, बतौर एक संगठन, आरएसएस की इसमें कोई भूमिका थी? गांधीजी की हत्या के बाद आरएसएस के समर्थकों की क्या प्रतिक्रिया थी? इस कायराना हरकत के संबंध में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल के क्या विचार थे?
इन मुद्दों पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं, कई नाटक खेले जा चुके हैं और कई फिल्में बनाई जा चुकी हैं। इन विषयों से संबंधित लेखों की तो भरमार है। जहां तक घटना, उसकी जांच के लिए नियुक्त किए गए न्यायिक आयोगों की रपटों और मुकदमे के निर्णय का सवाल है, वे सबके सामन हैं। परंतु गांधीजी की हत्या के पीछे के असली और गहरे कारणों पर पर्याप्त बहस नहीं हुई है। दो राष्ट्रवादों के टकराव का समुचित विष्लेषण नहीं हुआ है। आज यह आवष्यक है कि हम गांधीजी की हत्या की घटना के साथ-साथ, उसके पीछे के विचारधारात्मक कारणों की भी विवेचना करें-उन कारणों की जिनका आधार थीं राष्ट्रवाद की दो अलग-अलग परिकल्पनाएं। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जिसके प्रवक्ता और पुरोधा गांधी थे और दूसरा था हिन्दू राष्ट्रवाद, जो गांधीजी के हत्यारे गोडसे का प्रेरणास्त्रोत था। यह दिलचस्प है कि आरएसएस की राजनैतिक षाखा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के वर्तमान उम्मीदवार भी अपने राष्ट्रवाद को हिन्दू बताते नहीं थकते।  इसलिए आज के राजनैतिक संदर्भों मंे यह बहस और प्रासंगिक व महत्वपूर्ण बन गई है।
महात्मा की हत्या के बाद, आरएसएस ने आधिकारिक रूप से यही कहा कि उसका हत्या से कोई लेनादेना नहीं है और गोडसे, आरएसएस का सदस्य नहीं है। आरएसएस यह दावा इतनी आसानी से इसलिए कर सका क्योंकि आरएसएस में सदस्यों का औपचारिक रिकार्ड रखे जाने की परंपरा ही नहीं है। इस कारण, कानूनी तौर पर संघ गोडसे से स्वयं को अलग करने मंे सफल रहा। तथ्य यह है कि गोडसे ने सन् 1930 में आरएसएस की सदस्यता ली थी और जल्दी ही उसे बौद्धिक प्रचारक के रूप में  नियुक्त कर दिया गया था। ‘‘हिन्दुओं की उन्नति के लिए काम करने के बाद मुझे इस बात की जरूरत महसूस हुई कि मैं हिन्दुओं के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा के लिए देश की राजनैतिक गतिविधियों में भाग लूं। इसलिए मैंने संघ को छोड़ दिया और हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली‘‘, (गोडसे, व्हाय आय एसेसीनेटिड महात्मा गांधी, 1993, पृष्ठ 102)। गोडसे, महात्मा गांधी को मुसलमानों के तुष्टिकरण व इस कारण हुए पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार मानता था। उसने तत्समय की एकमात्र हिन्दुत्वववादी पार्टी हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली और उसकी पुणे शाखा का महासचिव बन गया। आगे चलकर उसने एक समाचारपत्र निकाला, जिसका शीर्षक था ‘अग्रणी या हिन्दू राष्ट्र‘। गोडसे इस अखबार का संस्थापक संपादक था।
‘द टाईम्स आॅफ इंडिया‘ (25 जनवरी 1998) को दिए गए अपने साक्षात्कार में नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे, जोकि हत्या में सह-अपराधी था, ने नाथूराम की आरएसएस की सदस्यता और गांधीजी की हत्या करने के पीछे के कारणों पर रोशनी डालते हुए कहा, ‘‘उनकी (गांधी) नीति तुष्टिकरण की थी और उन्होंने अपनी इस नीति को सभी कांग्रेस सरकारों पर थोपा। नतीजे में मुस्लिम अलगाववादी तत्वों को प्रोत्साहन मिला और अंततः पाकिस्तान बना...।‘‘ तकनीकी और सैद्धांतिक दृष्टि से वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु बाद मंे उन्होंने उसके लिए काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने अदालत में यह बयान इसलिए दिया कि उन्हांेने आरएसएस को छोड़ दिया था, ताकि उन आरएसएस कार्यकर्र्ताओं की रक्षा हो सके, जिन्हें हत्या के बाद जेल में डाल दिया जाएगा। जब उन्हें लगा कि अगर वे स्वयं को आरएसएस से अलग कर लें तो उससे उन्हें (आरएसएस स्वयंसेवकों) को लाभ होगा, तो उन्होंने खुशी -खुशी यह किया‘‘।
गांधीजी की हत्या के बाद, आरएसएस के समर्थकों  ने मिठाई बांटकर खुशियां मनाईं। सरदार पटेल ने लिखा, ‘‘उसके (आरएसएस) नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से लबरेज रहते थे। इसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि ऐसा जहरीला वातावरण बन गया, जिसमें इस तरह की वीभत्स त्रासदी (गांधीजी की हत्या) संभव हो सकी। आरएसएस के लोगों ने गांधीजी की मौत के बाद अपनी खुशी  का इजहार किया और मिठाईयां बांटी।‘‘ (सरदार पटेल के एमएस गोलवलकर और एसपी मुकर्जी को लिखे गए पत्रों के अंश , आउटलुक, 27 अप्रैल 1998)। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व, गांधीजी के विरूद्ध जिस तरह का जहर उगल रहे थे, महात्मा की हत्या उसका तर्कसंगत परिणाम थी। एक तरह से गांधीजी की हत्या, हिन्दुत्व की राजनीति का भारतीय राष्ट्रवाद पर पहला बड़ा हमला था, जिसने और बड़े खतरों को जन्म दिया। ये खतरे आज हमारे समक्ष हिन्दुत्ववादी राजनीति के रूप मंे खड़े हैं।
गोडसे के इस दावे के विपरीत कि हत्या की योजना उसने बनाई थी, विभिन्न जांच आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हिन्दू महासभा-आरएसएस विचारधारा के कई समर्थकों ने मिलकर महात्मा की हत्या की साजिश रची थी क्योंकि एक हिन्दू होने के बावजूद, वे इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की राह मंे सबसे बड़ी बाधा थे। सरदार पटेल ने लिखा है कि ‘‘हिन्दू महासभा का एक कट्टरवादी धड़ा, जो सावरकर के नेतृत्व में काम कर रहा था, ने इस साजिश को रचा और अंजाम दिया...। उनकी हत्या का आरएसएस और हिन्दू महासभा ने स्वागत किया क्योंकि वे गांधीजी के सोचने के तरीके और उनकी नीतियों के विरूद्ध थे...‘‘ (सरदार पटेल, जस्टिस कपूर रपट के अध्याय 1 पृष्ठ 43 में उद्वत)। जस्टिस जीवनलाल कपूर भी इस निश्कर्ष पर पहुंचे कि ‘‘...सभी तथ्यों को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर और उनके समूह के अतिरिक्त और किसी ने हत्या की साजिश रची हो, इसकी संभावना नहीं है‘‘।
यही हिन्दुत्व, हिन्दू महासभा और आरएसएस की राजनीति का आधार बना। गांधी जी एक सच्चे हिन्दू थे परंतु वे हिन्दू राष्ट्र के सिंद्धातः खिलाफ थे। इसी तरह, मौलाना अबुल कलाम आजाद एक सच्चे मुसलमान थे परंतु उन्होंने कभी मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) के विचार का समर्थन नहीं किया। गांधीजी ने पूरे देश को धर्मनिरपेक्ष आधारों पर एक किया। उन्होंने रहवास के क्षेत्र, धर्म और जाति से ऊपर उठकर भारतीयों में एकता कायम की। वे अत्यंत धार्मिक व्यक्ति थे परंतु वे धर्म के राजनैतिक हितसाधन के लिए प्रयोग के खिलाफ थे। ‘‘...उस भारत, जिसके निर्माण के लिए मैंने जीवन भर काम किया है, में प्रत्येक व्यक्ति का दर्जा एकसमान होगा, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो। राज्य पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होगा’’ (हरिजन, 31 अगस्त 1947) और ‘‘धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है और उसका राजनीति या राष्ट्रीय मुद्दों में घालमेल नहीं होना चाहिए।’’ हिन्दु महासभा और आरएसएस की मान्यता थी कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, जहां अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा। इन दोनों संगठनों के सदस्यों ने ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों और संघर्षों में भाग नहीं लिया। उदाहरणार्थ, सावरकर, जो अपने जीवन की शुरूआत में ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी थे, ने अंडमान जेल से अपनी रिहाई के बाद न तो राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सेदारी की और ना ही किसी ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष में। हेडगेवार को छोड़कर, जिन्होंने यदाकदा स्वाधीनता संघर्ष में हिस्सेदारी की, आरएसएस के किसी नेता या समर्थक ने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया। उनका मुख्य जोर मुस्लिम सम्प्रदायवादियों को परास्त करने पर था। वे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे।
जहां तक गांधीजी की हत्या के पीछे 55 करोड़ रूपए के मुद्दे का प्रश्न है, वह एक बहाना मात्र था। तथ्य यह है कि यह धनराषि अविभाजित भारत के खजाने में पाकिस्तान का हिस्सा थी। पाकिस्तान के हिस्से की पहली किश्त चुकाई जा चुकी और 55 करोड़ रूपए बकाया थे। इस बीच पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद, भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपए का भुगतान रोक दिया। उस समय कश्मीर एक स्वतंत्र राज्य था और राजनीति में अपने उच्च नैतिक मूल्यों से समझौता न करने वाले गांधी जी ने सरकार से कहा कि कश्मीर पर हमले को, बकाया धनराशि  के भुगतान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
यह मुद्दा एक बहाना मात्र था, यह इससे भी स्पष्ट है कि 55 करोड़ रूपए की बात करने के पहले भी गांधीजी पर चार जानलेवा हमले जो चुके थे जिनमें से कुछ में गोडसे भी शामिल था। जगदीश फडनीस ने अपनी पुस्तक ‘‘महात्मयाचि अखेर’’ (लोकवांग्यमय गृह, 1994) में ठीक ही लिखा है कि गांधी जी की हत्या उस कारण नहीं की गई, जिसका प्रचार वे लोग करते हैं (देश का विभाजन और पाकिस्तान को बकाया 55 करोड़ चुकाने पर जोर) बल्कि वह इसलिए की गई क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के समर्थकों और गांधी जी की राजनीति में मूल अंतर थे। ये दोनों कारण तो मात्र बहाने थे। हमें यह समझना होगा कि जब भाजपा और उसके साथी राष्ट्रवाद की बात करते हैं, तब उनका मतलब भारतीय राष्ट्रवाद से नहीं बल्कि हिन्दू राष्ट्रवाद से होता है, जो कि उनके राजनीतिक एजेण्डे का हिस्सा है।
इस समय हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर जो हमले हो रहे हैं, वे भी महात्मा गांधी की हत्या के प्रयास के समकक्ष हैं। इसलिए, गांधीजी की हत्या के पीछे के असली कारणों पर चर्चा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक कि देश के धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक मूल्यों पर हमला जारी रहेगा।

 -राम पुनियानी
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