उदारीकरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उदारीकरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 10 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-4


दूसरा फ्रंट है भारत-अमरीका संयुक्त व्यापार संगठन, इस संगठन के द्वारा लिए गए तमाम फैसलों को हरित क्रांति के बहाने थोपा जा रहा है। इस कौंसिल के अनेक नीतिगत फैसलों ने कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय निगमों का दबाब बढ़ा दिया है। तीसरा बड़ा नीतिगत फैसला बीज के क्षेत्र में 1987 में लिया गया। इसके तहत बीज के क्षेत्र में सरकारी आधिपत्य की समाप्ति कर दी गई और बीज के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया गया। अभी जिस बीज बिल को संसद के सामने पेश किया गया है वह सीधे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों की हिमायत करता है। तमाम संशोधनों के बाद भी इस बिल का रुझान निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर बना हुआ है। यह बिल किसानों को बीज के संरक्षण, उत्पादन, विनिमय, साझेदारी आदि का हक नहीं देता। इसमें राज्य सरकारों की भूमिका को हाशिये पर डाल दिया गया है। साथ ही बीज के क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की मजबूत भूमिका को सुनिश्चित नहीं करता। यह बिल मूलतः बीज के अ-राष्ट्रीयकरण की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। उदारीकरण की नीतियों को लागू किए जाने के कारण खाद के उत्पादन के मामले में तेजी से गिरावट आई है। खाद के मामले में सरकारी क्षेत्र के तंत्र को तोड़ने के सुनियोजित प्रयास किए गए हैं। खाद उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के काम को विदाई दे दी गई है। सात क्षेत्रों में खाद का उत्पादन बंद कर दिया गया है। सरकार ने खाद सब्सीडी को किसानों को न देकर सीधे खाद कारखानों को देने का फैसला किया है इससे मझोले और छोटे किसानों को सीधे नुकसान होगा।
इन दिनों मीडिया में केन्द्र सरकार की एक नीति और कार्यक्रम के बारे में सबसे ज्यादा प्रचार हो रहा है, वह है “मनरेगा” यानी महात्मा गांधी अनिवार्य ग्रामीण रोजगार योजना,। इस कार्यक्रम को जिस फैशन और मीडिया हाइप के साथ पेश किया जा रहा है और कांग्रेस के नेता इस पर जिस तरह जोर दे रहे हैं उतना वे उसके दुष्परिणामों के बारे में नहीं बता रहे। इस योजना को लागू करने का कृषिक्षेत्र पर सीधा असर यह होगा कि छोटी जोत के किसानों और मझोले किसानों को खेतों में फसल के समय काम करने वाले मजदूर ही नहीं मिलेंगे। इससे धीरे-धीरे मझोले और छोटी जोत के किसानों का खेती से पलायन और विस्थापन आरंभ हो जाएगा। इसके अलावा जो इलाके या राज्य तथाकथित हरित क्रांति के गढ़ माने जाते हैं वहाँ पर भी खेती के समय माइग्रेटेड मजदूर नहीं आ पाएँगे, इन माइग्रेटेड मजदूरों के जरिए ही बड़े पैमाने पर हरित क्रांति संभव हुई है। सरकार ने मनरेगा के तहत जो योजना बनाई है उसमें मजदूरों को कृषि के बजाय सड़क निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर के कामों में लगाने को प्राथमिकता दी है। फलतः कृषि के लिए फसल के समय मजदूरों की कमी होती चली जाएगी, और धीरे धीरे कृषि उत्पादन में गिरावट आएगी, जमीनें बिकेंगी, खेत मजदूरों की संख्या बढ़ेगी और भूमि के स्वामित्व का केन्द्रीकरण बढ़ेगा। मूल बात यह है कि इससे गाँवों में पामाली बढ़ेगी। कायदे से केन्द्र सरकार को इस योजना के तहत कृषि उत्पादन के काम को शामिल करना चाहिए। मसलन् फसल बोने और कटाई के समय मजदूरों की उपलब्धता बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। साथ ही माइग्रेषन को एकदम रोकने का अर्थ भयानक हो सकता है। बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों का सरकार पर दबाब है कि मनरेगा को सख्ती से लागू किया जाए जिससे उन्हें व्यापारिक लाभ हो सके। आँकड़े बताते हैं कि मनरेगा में काम करने वाले मझोले और छोटी जोत के किसान हैं और उनमें 42 फीसदी अब खेती नहीं करना चाहते। इसका अर्थ यह भी है कि भारत को अपनी जरूरत का गेहूँ आदि खाद्य विदेशों से मँगाना पड़ेगा। मनरेगा यदि ईमानदारी से लागू हो गया तो हरित क्रांति के विगत 40-45 सालों में जितने भी लाभ देश ने उठाए हैं वे सारे खत्म हो जाएँगे। हमें ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे कृषि बचे और मनरेगा भी बचे। मनरेगा को महज दैनिक मजदूरी का विकल्प बनाने के बजाय कृषि उत्पादन बढ़ाने का विकल्प बनाना चाहिए। कृषि में आर्थिक अवस्था बेहद खराब है हमें उसको दुरुस्त करने के उपाय करने चाहिए। मसलन् पंजाब के किसानों में 89 प्रतिशत खेती करने वाले किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। पंजाब में कृषि करने वाले परिवारों की आय में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है इसके कारण युवाओं में खेती का आकर्षण घट रहा है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2003-04 के अनुसार लंबे समय से कृषक परिवार की मासिक आय 3,400 रूपये पर अटकी हुई है। यह आय बढ़े इस ओर कोई नीतिगत पहलकदमी सामने नहीं आई है। किसान को आमदनी बढ़ाने के लिए नगदी फसल पैदा करने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन इसके चलते खाद्यसंकट पैदा हो सकता है। नगदी फसलें पैदा करने से देश और किसान का समग्रता में कोई फायदा नहीं होता। इसके अलावा प्राइवेट कंपनियों के लिए ठेके पर मजदूरी करने का भी पंजाब के किसानों का बड़ा बुरा अनुभव रहा है। कंपनियों के खेतों में ठेके पर काम करने वालों में कम जोत वाले किसानों की संख्या ही सबसे ज्यादा रही है और वे इस ठेकाप्रथा से तंग आ चुके हैं। ठेके पर काम करने गए 65 फीसदी किसान मानते हैं कि वे दोबारा इस तरह की मजदूरी के काम पर जाना नहीं चाहते। नगदी फसलों के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए कृषि के नए मॉडल पेश किए जा रहे हैं, किसानों से कहा जा रहा है गेहूँ नहीं गुलाब पैदा करो। चावल नहीं गन्ना पैदा करो। कृषि उत्पादन को वर्णसंकर बीजों की मदद से वैविध्यमय बनाओ। इस तरह के सुझावों के परिणामों पर पंजाब के अनुभवों के आधार पर विचार करें तो आँखें खुल जाएँगी। मसलन्, गन्ने के उत्पादन में गेहूँ और चावल से ज्यादा पानी लगता है। मोटे तौर पर ढाईगुना ज्यादा पानी खर्च होता है। गुलाब के उत्पादन में भी पानी सामान्य फसल से ज्यादा मात्रा में खर्च होता है। सामान्य तौर पर गेहूँ और चावल के उत्पादन की तुलना में नगदी फसल के उत्पादन में पाँच से दस गुना ज्यादा पानी और तिगुना रासायनिक खाद खर्च होता है। कायदे से हमें उद्योगकेन्द्रित कृषि उत्पादन से बचना चाहिए। नगदी फसलों का उससे गहरा संबंध है।
हमें स्वाभाविक कृषि उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों के विकास पर जोर देना चाहिए। अमरीका से हमारे देश में बहुत कुछ सीखने पर जोर है, ऐसे में यदि एक बात अमरीका से सीख लें तो हमें सुख मिलेगा। अमरीका में कृषियोग्य जमीन को गैर-कृषि कार्यों में इस्तेमाल या स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता। अतःभारत में भी कृषियोग्य जमीन को कृषि तक सीमित रखा जाए। इस जमीन को सुरक्षित-संरक्षित करने के उपाय किए जाएँ। कृषियोग्य जमीन को समृद्ध करने के लिए विशेष आर्थिक उपाय किए जाएँ। अमरीका में इसके लिए विशेष पैकेज दिया जाता है। इस तरह की सहायता का मकसद है कृषियोग्य जमीन को और ज्यादा उपजाऊ और उपयोगी बनाना।
हमें खेतों की जरूरत है, वे हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी हैं। खेतों का लोप हमारी सभ्यता का लोप है। खेत बचें इसके लिए जरूरी है कि रासायनिक खाद का उपयोग बंद किया जाए, किसानों को बैंकों से सस्तीदर पर कर्ज दिया जाए, सस्ती बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, मनोरंजन की व्यवस्था की जाए। फसल की बिक्री, खरीद आदि की समुचित व्यवस्था की जाए।
-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी

मो. 09331762368

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-3


हमने किसानों के विकास के लिए तेज औद्योगिकीकरण का रास्ता नहीं अपनाया। मैन्यूफैक्चरिंग से सेवाक्षेत्र की ओर समूचे विकास की दिशा को मोड़ दिया है। इससे किसान की पामाली और बढ़ी है। उसके सामाजिक रुपान्तरण की प्रक्रिया में विचलन आ गया है। वह लगातार लंपट सर्वहारा बनता चला जा रहा है। भारत की विलक्षण स्थिति है कि यहाँ पर किसान का तेजी से विस्थापन हो रहा है, वह नगर महानगर की ओर पलायन कर रहा है।
इस क्रम में एक बड़ी आबादी क्रमषः निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग में रूपान्तरित हो रही है। शहरों की झुग्गी-झोंपडि़यों के इलाकों में समानान्तर बस्तियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। एक अवधि के बाद इन बस्तिया
को वैध बनाने की माँग उठती है और देखते-ही देखते इन कच्ची बस्तियों की जगह पक्की रिहायशी कॉलोनी जन्म ले लेती है। कुछ महानगरों में झुग्गी बस्तियों में रहने वालों को ठेलकर उपनगरों और पुनः गाँवों की ओर बसाया जा रहा है। दिल्ली-मुंबई आदि में यह फिनोमिना साफ तौर पर देखा जा सकता है। मूल बात यह है कि किसान का विस्थापन सिर्फ किसान को ही अस्त-व्यस्त नहीं करता अपितु अन्य शहरी बाषिंदों को भी सीधे प्रभावित करता है। मुश्किल यह है कि किसानों के विस्थापन के बारे में हमारे पास सही समझ नहीं है, दीर्घकालिक प्रतिवाद का कार्यक्रम नहीं है, यदा-कदा वामदलों और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने किसानों की बेदखली का विरोध किया है, अनेक स्थानों पर आंदोलन किए हैं। इस प्रसंग में उनकी नजर में तात्कालिक राजनैतिक कार्यभार प्रमुख रहे हैं। वे समूची प्रक्रिया और उससे जुड़े राजनैतिक एजेण्डे को आम जनता में लोकप्रिय बनाने में असमर्थ रहे हैं।
किसानों के जीवन में मच रही तबाही के स्वर जितने तीव्र होने चाहिए वे कहीं नजर नहीं आते, इसका प्रधान कारण है किसानों में निरंतर संगठन और आंदोलन का अभाव। दूसरा कारण है, किसान की गैर-क्रांतिकारी वर्गीय प्रकृति। मसलन् किसानों की माँगों पर ज्यों ही किसी इलाके में आंदोलन आरंभ होता है कुछ अर्से के बाद किसान नेताओं और आम किसानों को तरह-तरह के प्रलोभन मिलने आरंभ हो जाते हैं। यह प्रलोभन निजी लाभ से लेकर राजनैतिक कैरियर तक फैले होते हैं। दूसरा कारण है कि किसानों को सामाजिक परिवर्तन के बृहत्तर परिप्रेक्ष्य के इर्दगिर्द लामबंद नहीं कर पाए हैं।
वामदलों के द्वारा संचालित किसानों के अधिकाँश आंदोलन तात्कालिक अर्थवाद से आरंभ होते हैं और उसके इर्दगिर्द ही समाप्त हो जाते हैं। इसके कारण किसानों को सामाजिक परिवर्तन की बृहत्तर प्रक्रिया में खींचने में अभी तक सफलता नहीं मिली है। वामदलों के नेतृत्व में चलने वाले किसान संगठनों में साझा माँगें हैं, साझा लक्ष्य हैं, लेकिन इस आंदोलन और किसान संगठनों का देश में असमान विकास हुआ है।
किसान सभाओं की अब तक की माँगों पर गौर करें तो अधिकाँश समय कृषि उपज का उचित मूल्य, मुफ्त में बिजली, अवैध भूमि अधिग्रहण के प्रतिवाद के मसले आंदोलन में प्रमुखता से उठे हैं। किसानों के सांस्कृतिक हितों और जरूरतों के सवालों पर कभी कोई संघर्ष नहीं हुआ है। आर्थिक मसलों को उठाने के कारण जहाँ एक ओर नीतिगत संघर्ष सामने आए वहीं दूसरी ओर किसान जीवन का अर्थवाद सामने आया और अंततः किसान आंदोलन अर्थवाद में ही फँसकर रह गया। किसान सभाएँ और आंदोलनकारी संगठन इन मसलों पर चले संघर्षों को बड़े राष्ट्रीय या क्षेत्रीय प्रतिवाद बनाने में सफल नहीं हो पाए। इसका परिणाम यह निकला कि केन्द्र सरकार के द्वारा किसानों की सब्सीडी कटौती को नहीं रोका गया। स्थानीय मसलों पर सरकार से यत्किंचित रिहायत हासिल करके शांत हो गए।
मसलन, अनेक इलाकों में किसानों ने सेज और दूसरे प्रकल्पों के लिए भूमि अधिग्रहण को वापस करा दिया या रुकवा दिया। इससे स्थानीय स्तर पर लाभ हो गया, लेकिन किसानों के ऊपर आर्थिक उदारीकरण के कारण पड़ रहे नीतिगत सवालों पर कोई राष्ट्रीय बहस और आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए। इसी तरह उदारीकरण के विभिन्न चरणों में कृषि क्षेत्र में आए परिवर्तनों को लेकर कोई सुसंगत मूल्यांकन प्रतिवादी संगठन पेश नहीं कर पाए। यहाँ तक कि संसद में भी कोई मुकम्मल बहस नहीं हुई।
एक तरफ सरकार ने सब्सीडी कम कर दी दूसरी ओर किसानों की खेती में लागत बढ़ती गई इससे किसानों की पामाली में इजाफा हुआ। विष्व व्यापार संगठन और अन्य विष्व संस्थाओं के दबाब में केन्द्र सरकार ने विदेशों से कृषि और उससे जुड़े मालों के अबाध प्रवेश का मार्ग खोल दिया। उन पर लगने वाले टैक्सों में इच्छित रियायतें दीं। इससे विदेशी माल धड़ल्ले से बाजार में आ गए। फलतः विदेशी माल की तुलना में देशी किसान के माल की कीमत ज्यादा हो गई और वह बाजार में टिकने की अवस्था में नहीं रहा। पामाली की अवस्था में किसानों को बैंकों से कर्ज मँहगा और जटिल हो गया, इससे किसानों को मजबूरी में सूदखोरों की शरण में जाना पड़ा। फलतः आत्महत्याओं में तेजी आई। केन्द्र सरकार ने यदि आर्थिक उदारीकरण के आरंभ में ही किसानों के कर्ज माफ कर दिए होते और बैंकों से आसान ब्याज दरों पर कर्ज मुहैय्या करा दिया होता तो बड़े पैमाने पर किसानों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता था। मसलन् 1995-96 में ही कर्जमाफी और कर्ज की ब्याज दरों में कमी का फैसला ले लिया जाता तो कम से कम 2 लाख किसानों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता था।
इसी तरह ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों जैसे सड़क, बिजली, पानी, परिवहन के लिए आवंटित धन, सुविधा और राजनैतिक सक्रियता में इस दौर में गिरावट आई है। कृषि के अनुसंधान पर होने वाले कामों में धनाभाव के कारण कमी आई है।
केन्द्र सरकार के नीतिगत कदमों के किस तरह के दूरगामी असर हो सकते हैं इनके बारे में मीडिया से लेकर राजनैतिक दलों तक व्यापक अचेतनता को सहज ही देखा जा सकता है। मसलन् केन्द्र सरकार ने अमरीका के बुश प्रशासन के साथ 2006 में उनकी भारतयात्रा के दौरान एक समझौता किया था इसे “भारत-अमरीका कृषि ज्ञान पहलकदमी” के नाम से जाना जाता है। इसे सरकार ने दूसरी हरित क्रांति के नाम से आम लोगों में प्रचारित-प्रसारित किया है।
अमरीका के साथ किए गए इस समझौते ने ज्ञान से लेकर सामाजिक-आर्थिक धरातल तक समस्त संरचनाओं को प्रभावित किया है। इस समझौते के कारण नीतिगत और आर्थिक विकास की दिषा को अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में मोड़ दिया गया है। यही वह मुख्य समझौता है जिसके आधार पर हमारे देश में बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियाँ अपने बीज लेकर आ रही हैं। यही वह समझौता है जिसके आधार पर हमारे देष में कृषि अनुसंधानों पर होने वाले खर्चों में कटौती की गई है। इसके आधार पर ही बीज नीति, खाद नीति आदि बनाई गई हैं। यही वह समझौता है जिसके आधार पर वॉलमार्ट के भारत में प्रवेश का आधार बना है। इस समझौते के आधार पर अमरीका को सीधे हमारी कृषि नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों पर हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया है और वे लोग आए दिन तरह-तरह के सुझाव देते रहे हैं और भारत सरकार उन सुझावों को आँख बंद करके मानती रही है।
-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी
क्रमश:

गुरुवार, 8 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-2



59वें राष्ट्रीय नमूना सर्वे के अनुसार 40 फीसदी किसान तुरंत किसानी छोड़ने को तैयार बैठे हैं यदि उनको जीने का अन्य कोई विकल्प मिल जाए। इस दौरान एक नया फिनोमिना सामने आया है कि खेतिहर किसानों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। सन् 1992 में 22 फीसदी खेतिहर किसान थे, सन् 2002-03 में इनकी संख्या बढ़कर 32 फीसदी हो गई है। दूसरी ओर कृषि उत्पादन में तेजी से गिरावट आई है। खासकर प्रतिव्यक्ति उत्पादन दर में आई गिरावट को अर्थषास्त्री बड़ा खतरा मान रहे हैं। कृषि क्षेत्र में काम के अवसर कम होते जा रहे हैं। एक तरफ उद्योग के क्षेत्र म नौकरियों की कमी है वहीं दूसरी ओर कृषि में भी नौकरियाँ नहीं हैं। ऐसी अवस्था में सामाजिक आर्थिकदशा के और भी बदतर होते चले जाने की संभावनाएँ हैं।
कृषि क्षेत्र में सन् 1990-91 में 3.27 फीसदी विकास दर थी जो सन् 2004-05 में घटकर 1.74 फीसदी रह गई है। जबकि इसी अवधि में गैर-कृषि क्षेत्र में विकास दर 7 और सवा सात फीसदी के आसपास घूमती रही है। कृषि क्षेत्र में काम करने वाली श्रमशक्ति को देखें तो पाएँगे कि सन् 2004 के 61वें राष्ट्रीय नमूना सर्वे के अनुसार 58.5 फीसदी श्रमशक्ति इस क्षेत्र में लगी हुई है। जबकि 1993-94 में इसकी तादाद 62 फीसदी थी। यानी इस दौर में कृषि क्षेत्र में काम धंधा करने वालों की संख्या में कमी आई है। औसत 2 फीसदी की दर से रोजगार दर में गिरावट आई है। पगारजीवी कृषि मजदूरों की संख्या में गिरावट आई है वहीं दूसरी ओर स्व-रोजगार करने वालों की संख्या में 3 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है। कृषि मजदूरों, खासकर पुरुषों का बड़ी मात्रा में भवन निर्माण, सड़क निर्माण, होटल, रेस्टोरेंट के कामों की ओर स्थानान्तरण हुआ है। यह भी फिनोमिना सामने आया है कि 1990-91 से 2004-05 के बीच में दैनिक पगार पर काम करने वाले पुरुष मजदूरों की मजदूरी में कोई इजाफा नहीं हुआ, इसके विपरीत औरतों की पगार में कमी आई। 19-24 साल की उम्र के ग्रामीण युवाओं में बेकारी दर चरम पर है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वे के 59वें चक्र के सर्वे के अनुसार 48.6 फीसदी किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। इसी तरह का सर्वे 1991 में किया गया था उस समय 26 फीसदी किसान कर्ज में डूबे थे। यानी इस बीच में कर्जगीर किसानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। यानी कर्जगीर किसानों की संख्या दोगुना हो गई है। आंध्र में किए गए सर्वे के अनुसार वहाँ पर 5 में से 4 किसान परिवार कर्जगीर थे। तमिलनाडु में तीन-चैथाई किसान परिवार, केरल, पंजाब और कर्नाटक में दो-तिहाई किसान परिवार कर्जगीर हैं, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात,
मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 50 फीसदी किसान परिवार कर्जगीर हैं। सर्वे से यह भी पता चला है कि स्थानीय सूदखोर सबसे बड़ा ताकतवर वर्ग बनकर सामने आया है। क्योंकि ज्यादातर किसानों पर उसका ही कर्ज है। तकरीबन 29 फीसदी किसान उससे ही कर्ज लेते हैं। जबकि 12 फीसदी किसानों ने विभिन्न वस्तुओं के लेन-देन के रूप में दुकानदारों से कर्ज लिया है। मात्र 56 फीसदी किसानों ने वित्तीय संस्थानों जैसे बैंक आदि से कर्ज लिया है। कर्ज से मरने वाले किसानों की संख्या 1995 के बाद गैर सरकारी तौर पर दो लाख से ज्यादा आँकी गई है।
अधिकांष किसानों की आत्महत्या का प्रधान कारण था सूदखोरों का कर्ज न चुका पाना और उपज के उचित मूल्य का न मिलना। यह भी देखा गया कि कई दशक से किसान जो खेती कर रहा है वह घाटे में कर रहा है। उसका लागत मूल्य उसे नहीं मिल रहा है। इसकी ओर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत मीडिया, कारपोरेट स्वार्थ और सरकार ने मिलकर किसान की आत्महत्या के मसले को लोकल मसला बना दिया। कानून-व्यवस्था और कर्ज का मसला बना दिया। किसान की आत्महत्या का प्रधान कारण है उसके लागत मूल्य का न मिलना। वह कर्ज से परेशान है इसलिए क्योंकि लागत मूल्य नहीं मिलता। वह लगातार साल दर साल घाटा उठाकर खेती करता रहता है और जब घाटे का बोझ उठाने में अपने को असमर्थ पाता है तो आत्महत्या कर लेता है। यह भी पाया गया कि महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले 80 फीसदी किसानों को कोई आर्थिक मदद राज्य सरकार से नहीं मिली।
भारत के किसानों की दुर्दशा के साथ चीन या किसी भी विकसित देश के किसानों की तुलना नहीं की जा सकती है। केन्द्र सरकार की नीतियों और विभिन्न राज्य सरकारों की नीतियों के केन्द्र में किसान कभी नहीं रहा, किसान की तकलीफों को कभी केन्द्रीय महत्व का दर्जा नहीं दिया गया। किसान को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने के बजाए स्थानीय परिप्रेक्ष्य में देखा गया। उसकी समस्याओं को स्थानीय समस्याओं के रूप में पेश किया गया।
किसान को उसके संकट से निकालने का मार्ग किसानी में से नहीं निकलता। किसान को किसानी से हम जितना बेहतर ढंग से सुरक्षा देते हुए मुक्त करते जाएँगे, उतना ही कृषि संकट कम होगा। कृषि उत्पादन बढ़ाकर इस संकट से नहीं निकल सकते। इस संकट से निकलने के लिए वैकल्पिक नजरिए की आवष्यकता है। किसान की समस्या को जब तक सरकार किसान वर्ग की समस्या के रूप में नहीं देखती तब तक संकट पीछा नहीं छोड़ेगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्व व्यापार संगठन की विश्वनीतियों का बुरा असर सीधे किसानों पर पड़ रहा है। उन नीतियों से बचाने के लिए नीतिगत संरक्षणात्मक उपाय भी सरकार को करने चाहिए। अभी हालात यह हैं कि हमारे देश में विश्व व्यापार संगठन की नीतियों से बचाने के कोई भी उपाय करने की स्थिति में सरकार नहीं दिखती। उस पर बहुराष्ट्रीय कृषि कारपोरेट घरानों का दबाब है जिसके कारण किसानों को अरक्षित छोड़ दिया गया है।
किसानों की तबाही का एक स्तर आर्थिक है और दूसरा सांस्कृतिक है। आर्थिक तबाही की ओर कभी-कभार ध्यान भी चला जाता है लेकिन सांस्कृतिक तबाही की ओर हमारा ध्यान एकदम नहीं जाता। हम किसान की आत्महत्या पर खबरें देख भी लेते हैं लेकिन किसान की सांस्कृतिक हत्या के सवाल हमारे विवादों का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। हम जानते तक नहीं हैं कि आखिरकार किसानों को किस तरह की सांस्कृतिक बर्बादी का सामना करना पड़ रहा है।
केन्द्र सरकार की ओर से 11वीं पंचवर्षीय योजना में 25 हजार करोड़ की आर्थिक मदद की घोषणा की गई थी, जबकि उसी योजना में उद्योगपतियों को एक लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के करों में छूट देने की घोषणा की गई। शहरों में सिनेमा हैं, स्कूल हैं, कॉलेज हैं, विश्वविद्यालय हैं, लेकिन गाँवों में इनका पूरी तरह अभाव है। मनोरंजन के नाम पर कहीं-कहीं टी0वी0 चैनल हैं खाली। गाँवों में अखबार नहीं पहुँचते। स्थानीय भाषा में शिक्षा, लोक कला, लोक संगीत आदि की शिक्षा, प्रशिक्षण, मंचन, संचार आदि का कोई ढांचा उपलब्ध नहीं है।
-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी
क्रमश:

बुधवार, 7 मार्च 2012

मानव सभ्यता की धुरी हैं हमारे खेत-1


किसान हमारे समाज की आर्थिक और सामाजिक धुरी हैं नव्य आर्थिक उदारीकरण के दौर में उस पर सबसे ज्यादा हमले और अत्याचार हुए हैं जो मीडिया में अमूमन नहीं आते। किसान की खबर तब ही आती है जब वहाँ हिंसा हो। यदि आंदोलन चल रहा है और कोई हिंसा नहीं घटती तो वह खबर नहीं बनती। किसान के सामान्य जीवन में जब कुछ अघटित घटता है तो मीडिया और राजनैतिकदलों को उसकी सुध आती है। जब कहीं से किसानों की आत्महत्या की खबरें आने लगती हैं तो प्रषासन हरकत में आता है और फिर सहायता कार्य की मीडिया बाइट्स आनी आरंभ हो जाती हैं। इससे एक तदर्थ कम्युनिकेशन बनता है। गहराई में जाकर देखें तो मीडिया उसके साथ समाज और राजनीति का कम्युनिकेशन नहीं बनाना चाहता।
किसान को कभी मीडिया से लेकर राजनैतिक दलों तक ने स्थाई एजेण्डा नहीं बनाया। एक जमाने में कुछ राज्यों में खासकर केरल और पष्चिम बंगाल में भूमि सुधार कार्यक्रम लागू करते समय यह देखा गया कि राजनीति से लेकर समाज के स्तर तक किसान प्रधान एजेण्डा था, लेकिन नव्य आर्थिक उदारीकरण के आने के बाद किसानों की आत्महत्या की खबरों के उद्घाटन के बाद सारा मामला नए सिरे से चर्चा के केन्द्र में आता है। केन्द्र सरकार ने 5 दषक बाद पहली बार किसानों की कर्जमाफी का राष्ट्रीय एलान किया। इससे करोड़ों किसानों के 80 हजार करोड़ के बैंक कर्ज माफ कर दिए गए। किसान समस्या के कई स्तर हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। पहला है नीति के स्तर पर, केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियाँ। दूसरा है किसान और कारपोरेट पूँजीवाद का अन्तरसंबंध। तीसरा है मीडिया, किसान और आम जनता का रुख।

केन्द्र की नीतियाँ-

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यू0पी0ए0 सरकार का किसानों के प्रति विद्वेषपूर्ण रवैय्या है। सरकार की सबसे खतरनाक बात यह है कि “किसान संकट में हैं”, यह बात नीति के रूप में वह नहीं मानती। देष के विभिन्न इलाकों में दो लाख से ज्यादा किसानों ने कर्ज से परेषान होकर आत्महत्याएँ की हैं। इसके बावजूद केन्द्र सरकार “किसान संकट में है“ यह मानने को तैयार नहीं है।
किसी राज्य से यदि किसानों की आत्महत्या की खबरें आती हैं और मीडिया में हंगामा आरंभ होता है तो केन्द्र सरकार सक्रिय हो जाती है और प्रभावित क्षेत्र के लिए तत्काल आर्थिक पैकेज की घोषणा कर दी जाती है। क्षेत्र या जिला आधारित इस तरह के आर्थिक पैकेज की घोषणा का अर्थ यह है कि प्रभावित क्षेत्र के किसान जिस समस्या का सामना कर रहे हैं वह समस्या खासतौर पर उसी क्षेत्र से सम्बंधित है, इसे राष्ट्रीय समस्या या व्यापक समस्या के रूप में न देखा जाए। लोकल समस्या के रूप में देखा जाए।
किसान की समस्या को मीडिया कभी पूरी और निरंतर खबर नहीं बनाता। मीडिया मसले को कुछ इस तरह उछालता है कि श्रोताओं को वह मात्र बैंक या सूदखोर के कर्ज की समस्या लगे और उसे वह कानून व्यवस्था की समस्या बना देता है। किसी भी तरह नियमित एजेण्डा बनाकर कवरेज नहीं देता।
केन्द्र सरकार का मानना है कि किसान की समस्या तो मात्र उत्पादन की समस्या है। उसके माल के सही रख रखाब की समस्या है। केन्द्र सरकार किसान की समस्या को किस रूप में देखती है उसका आदर्ष नमूना है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 11वीं पंचवर्षीय योजना में प्रत्येक जिले को प्रति वर्ष 10 करोड़ रूपये की सहायता की घोषणा करना, और संसद से लेकर अन्य मंचों पर अतिरिक्त तौर पर 25 हजार करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता राषि की घोषणा करना। इस सहायता राषि से किसानों के आर्थिक जीवन में कोई खास सुधार आने वाला नहीं है।
केन्द्र सरकार की नीतियों का मूल लक्ष्य है कृषि क्षेत्र में 4 फीसदी विकास दर बनाए रखना। वह विकास दर के प्रति आसक्त है और विकासदर के प्रति उसकी आसक्ति ने बीमारी की शक्ल ले ली है। सारी चीजें कृषि विकास दर को सामने रखकर की जा रही हैं। केन्द सरकार मानकर चल रही है यदि कृषि में 4 फीसदी की विकास दर हासिल कर लेते हैं तो बाकी किसी समस्या से घबराने की जरूरत नहीं है। विकास दर ही परम लक्ष्य है।
किसान के लिए आज सबसे संकट यह है कि किसानी करना घाटे का सौदा हो गया है। किसानी से किसान परिवार का पेट पालना संभव नहीं रह गया। किसानी को कैसे मुनाफे और किसान की गुजर-बसर का कार्य व्यापार बनाया जाए इस ओर हमारे योजनाकारों का ध्यान नहीं गया। किसी भी राज्य सरकार ने यह दर्षाने की कोषिष नहीं की है कि किसानी को कैसे लाभ का क्षेत्र बनाया जाए।
सवाल उठता है किसानी घाटे का सौदा क्यों है ? सन् 2002-03 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आँकड़ों के हिसाब से देष में 4 हैक्टेयर से कम की जमीन के स्वामित्व वाले 96.2 फीसदी किसान हैं। किसानों में मात्र 3.8 फीसदी किसान हैं जो अपने गुजर-बसर लायक ठीक से कमा-खा लेते हैं। बाकी किसान परिवारों को घाटे में खेती करनी पड़ती है।
सच यह है खेती में किसानों की लागत ज्यादा लगती है और उससे आय कम होती है। चूँकि किसान के पास विकल्पों का अभाव होता है और उसकी प्रकृति अचल होती है अतः वह संकट की अवस्था में भी खेती और गाँव के साथ अपना मोह नहीं तोड़ पाता और किसी तरह लस्टम पस्टम गुजारा कर लेता है। सरकार के द्वारा घोषित फसल का खरीद मूल्य कभी भी उसे लाभ नहीं देता। प्रत्येक फसल के बाद उसके ऊपर कर्जा होता है। परेशानियों का भयानक दबाब होता है।

-डा जगदीश्वर चतुर्वेदी
क्रमश:

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

वर्तमान दौर के वैश्वीकरण के 20 साल

उदारीकरणवादी , निजीकरणवादी और वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों को केंद्र की अल्पमत कांग्रेस सरकार ने 1991 में लागू किया था | इसे प्रधान मंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में आज के प्रधान मंत्री और उस वक्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया था | लेकिन ये नीतिया देश में बनायी गयी नीतिया नही थी | बल्कि ये अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी विदेशी विकसित व धनाढ्य ताकतों द्वारा बनायी गयी नीतिया थी |उन्हें इस देश में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष नाम की वैश्विक संस्था द्वारा कर्ज़ देने की शर्तो, हिदायतों के साथ लागू करवाया गया था |इन नीतियों को लेकर कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों एवं प्रचार माध्यमो द्वारा जोरदार विरोध किया गया था | लेकिन वह विरोध तीन - चार सालो के भीतर ही पूरी तरह से खत्म भी हो गया | क्योंकि देश का समूचा धनाढ्य हिस्सा , धनाढ्य औद्योगिक , व्यापारिक कम्पनिया आयातक -निर्यातक कम्पनिया तथा विभिन्न क्षेत्रो से जुड़े उच्च माध्यम वर्गीय हिस्से इसके पुरजोर समर्थन में खड़े थे | क्योंकि इन नीतियों के जरिये विदेशी कम्पनियों को , विदेशी पूंजी व तकनीक को , खुलेआम छूटे व अधिकार मिलने के साथ देश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों को भी सर्वाधिक छूटे व अधिकार मिलने थे | पुरानी आर्थिक नीतियों द्वारा उन पर लगे थोड़े बहुत प्रतिबंधो को भी घटाकर उदार बनाया जाना था | इसी के अंतर्गत बड़ी कम्पनियों के पूंजियो , लाभों को सिमित एवं नियंत्रित करने वाले एम् ० आर ० टी ० पी ० जैसे कानून को हटा दिया गया | विदेशो के साथ देश की कम्पनियों के होते रहे व्यापारिक , वाणिजियक संबंधो को नियंत्रित करने वाले " फेरा कानूनों " को हटाकर " फेमा " कानून बना दिया गया | देश की धनाढ्यो कम्पनियों पर देश के भीतर लगे नियन्त्रण को " इस्पेक्टर राज " हटाने के नाम पर लगातार घटाया -हटाया जाता रहा | उनको करो , टैक्सों में छूटो के साथ अन्य छूटे , सुविधाए दी और बधाई जाती रही | इसी तरह से विदेशी कम्पनियों को देश के हर क्षेत्र में घुसने और अधिकार पूर्वक घुसने की छूट के साथ अन्य छूटे दी गयी | देश और समाज के विभिन्न क्षेत्रो के उच्च मध्यम वर्गियो तथा आम समाज के उच्च शिक्षित लोगो के आमदनियो ,वेतनों सुख - सुविधाओं को भी अधिकाधिक बढाया जाता रहा | इसलिए इन्हें उदारवादी नीतियों का नाम भी दिया गया | जबकि ये नीतिया जनसाधारण लोगो के लिए आम मजदूरों , किसानो , दस्तकारो तथा मध्यम वर्ग के खासे बड़े हिस्से के लिए कुल मिलाकर देश के 80 % से उपर की आबादी के लिए कही से भी उदारवादी नीतिया नही थी | उनके लिए तो ये नीतिया कड़ी और अनुदारवादी नीतिया ही थी | कयोकि इस नीतियों के लागू किए जाने के बाद से किसानो , मजदूरों एवं अन्य साधारण कारोबारियों को अब तक मिलती रही छूटो , अनुदानों और अधिकारों को निरंतर काटने - घटाने का काम किया गया | साधारण मजदूरों की छटनी करने तथा ठीके पर काम कराने आदि का तथा खाद , बीज , आदि के छूटो - अनुदानों को काटकर उसके मूल्य भाव को लगातार बढाने का सार्वजनिक सिंचाई के इंतजाम से अपने हाथ खीच लेने का फिर छोटे कारोबारियों को लागत व बाज़ार में मिलती रही छूटो तथा आरक्षित अधिकारों आदि को काटने का काम खुलेआम और वह भी लगातार होता आरहा है | इसी तरह इन नीतियों के अंतर्गत साधारण या औसत शिक्षित हिस्से को स्थाई काम धंधे मिलने के अवसरों में भी भारी कटौती होती रही | पिछले 20 सालो से उदारवादी नीतियों की उपरोक्त दोहरी व परस्पर विरोधी प्रक्रिया निरंतर बढती रही है | इसीलिए इन नीतियों को देश - दुनिया के धनाढ्य हिस्से के लिए नरम व उदारवादी नीतिया कहते हुए तथा देश के जनसाधारण हिस्से के लिए कठोर व अनुदारवादी नीतिया भी जरुर खा जाना चाहिए | इसीलिए इन नीतियों को दिए जा रहे समर्थन सहयोग को भी देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से के प्रति सहयोग व जनसाधारण के व्यापक हितो के प्रति असहयोग व विरोध भी जाना चाहिए।

क्रमश:

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
Share |