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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

जस्टिस दवे का स्वप्न: धर्मनिरपेक्ष भारत का दुःस्वप्न

गुजरात विश्वविद्यालय के कंवेंशन हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गत 2 अगस्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिल आर.दवे ने कहा कि 'अगर मैं भारत का तानाशाह होता तो पहली कक्षा से गीता और महाभारत की पढ़ाई शुरू करवा देता। यही एक तरीका है, जिससे आप यह सीख सकेंगे कि हमें कैसा जीवन जीना चाहिए। अगर कोई कहे कि मैं धर्मनिरपेक्ष हूं या मैं धर्मनिरपेक्ष नहीं हूं तो इसके लिए मैं क्षमा चाहूंगा परंतु हमें हर जगह से अच्छी चीजें लेनी होंगी।'
उनके इस कथन की देश के उदारवादी, प्रगतिशील तबकों में कड़ी प्रतिक्रिया हुई। धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों ने भी न्यायमूर्ति दवे के विचारों का विरोध किया और उनपर अपनी चिंता जताई। परंतु उनके विरोध और चिंता के आधार अलग थे। कुछ लोगों ने इस संभावना पर चिंता व्यक्त की कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में धार्मिक पुस्तकों का समावेश किया जा सकता है ;यद्यपि यह पहली बार नहीं है कि इस तरह की चिंता व्यक्त की गई हो। कुछ अन्य का तर्क था कि 'गीता पढ़ाना भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध नहीं है परंतु केवल गीता पढ़ाना धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाना है।' इस मतविभिन्नता का कारण है धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना व उसकी परिभाषा के संबंध में एकमत का अभाव। क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अधार्मिकता है अथवा धर्म.विरोध ? क्या इसका अर्थ यह है कि हम सभी धर्मों और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करें या सभी धर्मों का विरोध करें?उदाहरणार्थ, क्रिस्टोफर जेफरलॉट का तर्क है कि 'यह सिद्धांत ;धर्मनिरपेक्षता न तो धार्मिकता का समर्थन करता हैए ,न अधार्मिकता का और ना ही यह धार्मिकता का विरोधी है। बल्कि यह धार्मिकता से पूरी तरह सुसंगत है। राज्य,समाज में धर्म के महत्व को स्वीकार करता है और आवश्यकतानुसार सभी धर्मावलंबियों के समर्थन में हस्तक्षेप करता है। वह हर किस्म की धार्मिक गतिविधियों के लिए माली इमदाद उपलब्ध करवाता हैए चाहे वह सिक्खों की पाकिस्तान में स्थित उनके तीर्थस्थलों की यात्रा हो या हिन्दुओं की अमरनाथ यात्रा';जेफरलॉट 2014। कुछ अन्यों का तर्क है कि धर्म का मूलचरित्र ही दमनकारी है और अगर हमें समाज में समानता लानी है तो हमें हर किस्म के धार्मिक ढांचे को तोड़ना होगा। अंबेडकर का एक प्रसिद्ध कथन है,'असमानता, हिन्दू धर्म की आत्मा है'। इस तरहए अंबेडकर के लिए प्रजातांत्रिक,समतावादी भारत के निर्माण के उनके स्वप्न को पूरा करने के लिए हिन्दू धर्म को त्यागना आवश्यक था।
किसी व्यक्ति के लिए धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा चाहे जो हो परंतु भगवद्गीता जैसी पुस्तक को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का सुझाव खतरनाक और चिंतित करने वाला है। इसका कारण मात्र यह नहीं है कि धार्मिक पुस्तकें किसी धर्मविशेष से जुड़ी होती हैं वरन् यह भी है कि आलोचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव,हमारी शिक्षा व्यवस्था का केन्द्रीय तत्व है। और गीता जैसी पवित्र पुस्तक के मामले में तो आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना लगभग असंभव हो जायेगा। इसके अलावा,जस्टिस दवे ने जिन'अच्छी चीजों'के  लेने की बात कही है उसकी भी गहरी पड़ताल जरूरी है। जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच, दमनकारी व भेदभावपूर्ण व्यवस्था का आधार हैं। और भारतीय परंपरा में इस जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच का न केवल महिमामंडन किया गया है वरन् उसे 'भारतीय संस्कृति' का अविभाज्य हिस्सा मान लिया गया है। अगर भगवद्गीता को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जायेगा तो क्या उस पर बहस करने और उसका आलोचनात्मक अध्ययन करने का अधिकार विद्यार्थियों और शिक्षकों को दिया जायेगा ? जिस देश में धार्मिक मुद्दों को आस्था से जोड़कर,बहस और आलोचना से ऊपर रखा जाना सामान्य और औचित्यपूर्ण माना जाता हो वहां क्या इस बात की जरा सी भी संभावना है कि किसी धार्मिक पुस्तक की आलोचनात्मक व्याख्या को सहन किया जायेगा? इसलिएए, गीता चाहे कितनी भी शिक्षाप्रद और विद्वतापूर्ण पुस्तक क्यों न हो, उसे स्कूलों में पढ़ाया जाना एक गलत और खतरनाक कदम होगा। यहां यह समझना उपयोगी होगा कि गीता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से पहले उसके आलोचनात्मक अध्ययन को स्वीकार्य बनाना क्यों आवश्यक है। यह भी समझना आवश्यक है कि ;जस्टिस दवे की मान्यता के विरूद्ध गीता,ज्ञान और प्रेरणा का अनन्य स्त्रोत नहीं है।
यह सही है कि गीता को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और उसकी शिक्षाओं ने कई धर्मों के लोगों को प्रेरणा दी है। इनमें शामिल हैं महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक और अरविंदो। परंतु यह भी उतना ही सही है कि अंबेडकर ने गीता की कटु आलोचना की है। गीता पर अंबेडकर के विचार, उनकी अप्रकाशित पुस्तक 'वोल्युशन एण्ड काउंटर रेवोल्यूशन इन एन्शिएन्ट इंडिया';प्राचीन भारत में क्रांति व प्रतिक्रांति में उपलब्ध हैं।
अंबेडकर की दृष्टि में, ,'भगवद्गीता न तो धार्मिक पुस्तक है और ना ही दार्शनिक ग्रंथ। गीता केवल कुछ धार्मिक रूढि़यों को दार्शनिक आधारों पर उचित ठहराती है। यह प्रतिक्रांति का दर्शनशास्त्रीय बचाव है';पंडित,1992। अंबेडकर के अनुसार, बौद्ध धर्म द्वारा भारत में लाई गई नैतिक, सामाजिक और राजनैतिक क्रांति की प्रतिक्रिया में, ब्राह्मणों ने ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना के लिए जो अभियान चलाया, वह प्रतिक्रांति थी। वे लिखते हैं, 'प्रतिक्रांति को दार्शनिक आधार पर उचित ठहराने का प्रयास अध्याय 2 के श्लोक 2 से 28 तक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गीता दो तरह के तर्कों का सहारा लेती है। पहला तर्क यह है कि दुनिया नाशवान और मनुष्य नश्वर है। हर मनुष्य को एक न एक दिन मरना है। इसलिए ज्ञानियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कोई मनुष्य स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त होता है या वह हिंसा में अपनी जान गंवाता है। जीवन मिथ्या है इसलिए उसके न रहने पर आंसू बहाना व्यर्थ है। मृत्यु अवश्यम्भावी है इसलिए इस बात की क्यों फिक्र करना की वह कैसे और कहां होती है...एक अन्य रूढि़, जिसके समर्थन में गीता दर्शनशास्त्रीय तर्क देती है वह है चातुर्वर्ण....वह चातुर्वर्ण को इस आधार पर उचित ठहराती है कि उसका संबंध मनुष्य के जन्मजात और प्रकृतिदत्त गुणों से हैं..............एक तीसरी रूढि़, जिसका गीता बचाव करती है वह है कर्म मार्ग। गीता के अनुसार, 'कर्म मार्ग का अर्थ है मुक्ति पाने के लिए यज्ञों आदि जैसे कर्मकाण्ड करना।'
अंबेडकर की गीता की इस आलोचना का मैंने विस्तार से वर्णन इसलिए किया है क्योंकि अगर गीता को पाठशालाओं में पढ़ाया जायेगा तो इस तरह के आलोचनात्मक स्वरों को कुचल दिया जायेगा। आलोचनात्मक विश्लेषण को 'ज्ञान' के हाशिए पर पटक दिया जायेगा। इस तरह की आलोचनाओं को हम सही मानें या गलत परंतु यह निश्चित है कि उन पर कक्षाओं में चर्चा नहीं की जायेगी.और यह भी हो सकता है कि ऐसे विचार रखने वालों को खलनायक बताया जाने लगे.और इससे भारत का प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष तानाबाना खतरे में पड़ जायेगा। यह सही है कि ज्ञान और इतिहास का प्रभुत्वशाली वर्ग का संस्करण पहले से ही समाज पर छाया हुआ है और केवल गीता को पढ़ाए जाने से वह अस्तित्व में आयेगाए ऐसा नहीं है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने से विद्यार्थियों की उनके और 'दूसरों'के धर्मों की समझ पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। संभावना यही है कि पाठ्यक्रमों में गांधीजी द्वारा की गई गीता की प्रशंशा तो शामिल की जायेगी परंतु अंबेडकर द्वारा उसकी निंदा को कोई स्थान नहीं मिलेगा। इसके दो संभावित कारण हैं। पहला यह कि हमारे पाठ्यक्रमों में पहले से ही अंबेडकर की तुलना में गांधी को बहुत अधिक महत्व दिया जाता रहा है और दूसरे, अंबेडकर की आलोचना को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से इस मान्यता को धक्का पहुंचेगा कि गीता अथाह ज्ञान की सर्वकालिकए त्रुटिरहित व अंतिम स्त्रोत है।
यही बात गीता की स्त्रीवादी टीकाओं के बारे में भी सही है। गीता के एक प्रसिद्ध प्रसंग में अर्जुन युद्ध लड़ने से इस आधार पर इंकार करते हैं क्योंकि उसके कारण बड़े पैमाने पर मानव वध होगा। वे चिंतित हैं कि युद्ध के बाद अराजकता फैल जायेगी और महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयेगी। युद्ध के परिणामस्वरूप 'कुलक्षय' होगा। कुल के क्षय से अपना आशय स्पष्ट करते हुए अर्जुन कहते हैं कि महिलाओं की स्थिति में गिरावट का अर्थ है अंतर्जातीय विवाह और वर्गीय व जातिगत ढांचे का बिखरना। स्पष्टतः इसका मतलब यह है कि अंतर्जातीय विवाह उन सबसे घातक कृत्यों में से एक है जो कोई मनुष्य कर सकता है और यह महिलाओं की स्थिति में गिरावट के कारण किया जाता है। इसके अतिरिक्त, गीता यह भी कहती है कि महिलाओं का स्वयं का कोई वजूद नहीं है और वे अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपने पिता,पति व पुत्रों पर निर्भर हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के विचारों का इस्तेमालए दकियानूसी ताकतों द्वारा 'पारंपरिक' या 'सभ्य' भारतीय नारी को परिभाषित करने के लिए किया जाने लगेगा और इन स्थापित नियमों का जरा सा भी उल्लंघन करने वाली महिलाओं का दानवीकरण होने लगेगा।
इस प्रकार, गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने से जो सबसे बड़ा खतरा है वह समानता, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता को है.चाहे धर्मनिरपेक्षता की हमारी परिभाषा व समझ कुछ भी क्यों न हो। इसका मूल कारण यह है कि अत्यंत श्रद्धा से देखे जाने वाले किसी भी धार्मिक ग्रंथ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के बाद उसके किसी भी प्रकार के आलोचनात्मक अध्ययन व विश्लेषण की सभी संभावनाएं समाप्त हो जायेंगी और असहमति के सभी स्वरए जो पहले से ही हाशिए पर हैं,पूरी तरह कुचल दिए जाएंगे।
-रिदिमा शर्मा

सोमवार, 16 सितंबर 2013

अब गप्प मारने के दिन खत्म हो गये है बम मारने के दिन आ गये है |

स्वतंत्रता के अजेय  '' सेनापति '' पांडुरंग महादेव बापट



बहुमुखी आन्दोलन के सेनापति , पांडुरंग महादेव बापट शिक्षक थे , सामाजिक कार्यकर्ता थे और सबसे बढ़कर वे ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवाद -- स्वतंत्रता के सेनापति थे | वे राष्ट्र स्वतंत्रता हेतु सशस्त्र संघर्ष से लेकर अहिंसक आन्दोलन में लगातार सेनानी और सेनापति थे | साथ ही सामाजिक सुधार से लेकर समाज के विभिन्न हिस्सों के न्यायोचित मांगो के साथ खड़े होकर उनका नेतृत्व करने वालो नेता व कार्यकर्ता भी थे | वस्तुत: उनके इन्ही गुणों के कारण उन्हें समाज से सेनापति की उपाधि मिली थी | वैसे उन्हें यह उपाधि 1922 में जनहित में मोलसी में निर्माणाधीन बाँध परियोजना के विरोध और उसके नेतृत्व के लिए मिला था | बहुमुखी प्रतिभा बहुमुखी नेतृत्व क्षमता और असीमित ऊर्जा से भरपूर पांडुरंग बापट 1947 की स्वतंत्रता के बाद भी जीवित रहे | लेकिन वे स्वतंत्रता आन्दोलन के अन्य तमाम लीडरो की तरह 1947 के बाद भी पद -- प्रतिष्ठा के पीछे एकदम नही गये | उनकी जगह राष्ट्र सेवा जन सेवा तथा राष्ट्र की सामाजिक एकता के लक्ष्य को लेकर आजीवन संघर्ष करते रहे | सेनापति पांडुरंग महादेव बापट ने राष्ट्र व समाज को दिया बहुत कुछ और लिया कुछ भी नही | अपना समस्त जीवन राष्ट्र के लिए होम कर दिया | इसीलिए वे हमारे लिए आदरणीय व स्मरणीय है |   सेनापति पांडुरंग के बारे में प्रचलित है कि एक तरफ वे अगर वे शिवाजी , रामदास और तुकाराम के प्रतिनिधि थे तो दूसरी तरफ वे लोकमान्य तिलक सावरकर गांधी और सुभाष के भी प्रतिनिधि थे | बहुमुखी प्रतिभा के धनी सेनापति पांडुरंग का जन्म महाराष्ट्र में नगर जिले के पारनेर ताल्लुके में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 12 नवम्बर 1880 को हुआ था | पिता का नाम महादेव और माँ का नाम गंगा बाई था | पारनेर में प्राथमिक शिक्षा के बाद 12 वर्ष के उम्र में वे पूना के न्यू इंग्लिश हहाई स्कुल में दाखिल हुए | वह योग्य शिक्षको के सानिध्य में इनकी बौद्धिक प्रतिभा का निखार हुआ | पढाई के दौरान ही पूना में प्लेग का प्रकोप फ़ैल गया | पांडुरंग को स्कुल छोड़कर पारनेर वापस आना पडा | बाद में अहमदाबाद रहकर हाईस्कूल की परीक्षा दी | परीक्षा में उच्च अंको से पास होने के कारण उन्हें छात्रवृति भी मिली | 1900 में उन्हें पुणे डेक्कन कालेज में दाखिला मिल गया | शिक्षा के साथ वे नौकायन टेनिस कविता नाटक के क्षेत्र में भी बढचढ कर हिस्सा लेते | बी ए करके वे बम्बई आ गये | एक स्कुल में अंशकालिक नौकरी करते हुए आगे की पढाई में जुट गये | इसी वक्त उन्हें विदेश जाने के लिए मंगलदास नाथुभाई की छात्रवृति मिल गयी | वे स्काटलैंड पहुचकर एडिनबरा शहर में मेकेनिकल इंजीनियरिग पढने लगे | साथ ही क्वीन्स रायफल क्लब में निशाने बाजी भी सिखने लगे | यही उन्हें '' ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन भारत की परिस्थिति पर बोलने का एक अवसर मिला | प्रवासी क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा की सहायता से उन्होंने इसके लिए पूरी तैयारी की | उन्होंने शेफर्ड सभागार में '' ब्रिटिश रुल इन इंडिया '' विषय पर लिखे अपने निबन्ध को गंम्भीर एवं ओजस्वी ढंग से प्रस्तुत किया | बाद में वह निबन्ध के रूप में प्रकाशित भी किया गया | लेकिन उसके प्रकाशन के तुरंत बाद निबन्ध में पांडुरंग द्वारा ब्रिटिश सत्ता के कड़ी आलोचना व विरोध को लेकर उनकी छात्रवृति समाप्त कर दी गयी | फलस्वरूप उन्हें लन्दन के ' इंडिया हाउस ' में आना पडा | यहाँ उनकी भेट विनायक दामोदर सावरकर से हुई | आपसी सलाह से वे बम बनाने का हुनर सिखने के लिए पेरिस चले गये | इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी | 1906 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में होने वाले काग्रेस अधिवेशन के लिए उन्होंने ' कांग्रेस को क्या करना चाहिए " शीर्षक से एक गंम्भीर और सुझावपूर्ण लेख अधिवेशन के अध्यक्ष के पास प्रेषित किया था | इसमें उन्होंने मुख्यत: कांग्रेस को राष्ट्र -- स्वतंत्रता को उद्देश्य बनाकर रणनीतिया  तय करने का सुझाव रखा था |   
1908 में वे श्यामजी कृष्ण वर्मा और सावरकर की सलाह पर हिन्दुस्तान  लौट आये | पहले वे कलकत्ता गये | कलकता से उनके लिए बुलावा भी आया था | खासकर बम बनाने के लिए सलाह व मशविरे देने के लिए उन्हें वहा  बुलाया गया था | यह काम वहा  के क्रान्तिकारियो की फौजी शाखा कर रही थी | क्रान्तिकारियो की दूसरी शाखा प्रचार कार्य में जुटी हुई थी | उसका काम समाचार पत्र निकालना और क्रान्तिकारियो के कतार में नई भर्तिया करना था | पांडुरंग अपना कार्य करके शीघ्र ही पारनेर वापस लौट आये | लेकिन दो महीने के अन्दर ही कलकता के क्रांतिकारी दल का सदस्य नरेंद्र गोस्वामी पकड़ा गया और वह पुलिस का मुखबिर बन गया | उसने सभी का नाम बता दिया | उसमे बापट का नाम भी था | सुचना मिलते ही बापट भूमिगत हो गये | और लगभग साढ़े चार वर्ष तक अज्ञात वास  में रहे | इस बीच वे पुणे मगर भुसावल औरंगाबाद , बडवानी धार देवास इंदौर उज्जैन मथुरा वृन्दावन काशी घूमते हुए पुलिस को चकमा देते रहे | लेकिन काशी से पुन: इंदौर आते ही वे पुलिस के गिरफ्त में आ गये | लेकिन तब तक उनके व अन्य क्रान्तिकारियो के विरुद्ध मुखबिर बने नरेंद्र गोस्वामी को क्रान्तिकारियो ने मार दिया था | अत: साक्ष्य के आभाव में बापट को भी मुक्त कर दिया गया | इस बीच बीमार पड़ जाने के कारण वे अपने गृह क्षेत्र पारनेर वापस लौट आये |  
पारनेर में उन्होंने समाज सुधार का काम शुरू किया | वह नालिया साफ़ करने महारो ( दलित जाति ) के बच्चो को पढाने तथा लोगो में गीता व ज्ञानेश्वरी पर प्रवचन देने का काम करने लगे | 1914 में पुत्र की प्राप्ति पर उन्होंने लोगो को भोज दिया | भोज में दलितों की पंगत पहले बैठाई और ब्राह्मणों की पंगत बाद में | समाज सुधार के इन कामो का विरोध भी उन्हें लगभग हमेशा ही झेलना पडा | अप्रैल 1915 में वे पूना आगये | पहले उम्होने ' चित्रमय जगत ' नाम से समाचार पत्र में काम किया | 5 - 6 माह बाद तिलक के पत्र ' मराठा ' में काम करने लगे | पुणे में भी नालियों की सफाई और सामाजिक सुधार का काम जारी रखे | 1916 में बीजापुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में बापट प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा नागरिक अधिकारों की कटौतियो के विरोध में काउन्सिल व् नगर पालिका के सदस्यों को अपने पदों से इस्तीफा दे देने का प्रस्ताव किया | साथ ही सरकार को युद्ध का खर्चा न देने तथा सैनिको की भर्ती में ब्रिटिश हुकूमत की सहायता न करने का भी प्रस्ताव किया | उनके इस प्रस्ताव का वह की आम जनता में भारी समर्थन मिला | हालाकि उनका प्रस्ताव संचालक कमेटी द्वारा नामंजूर कर दिया गया | बाद में बापट ने ' मराठा ' पत्र छोड़कर ' लोक संग्रह ' नाम के दैनिक समाचार पत्र में विदेशी राजनीति पर लेख लिखने का कार्य आरम्भ किया | साथ ही वे ज्ञान कोष कार्यालय में काम करते रहे तथा महाविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए ट्यूशन कक्षाए  भी चलाने लगे | इसी के साथ वे 1920 में बाम्बे में चल रही मेहतरो की हडताल में सक्रिय रूप से भागीदारी भी निभाते रहे | उनका मार्ग दर्शन करते रहे | समाचार पत्रों ने इस हडताल को कोई महत्व नही दिया | बापट ने ' सन्देश ' समाचार पत्र द्वारा इसे प्रमुखता देकर झाड़ू -- कामगार मित्र मंडल  की स्थापना की | हडताल के लिए धन इकठ्ठा किया | हडतालियों और उनके परिवार वालो के लिए घर -- घर जाकर रोटिया एकत्रित करने का काम भी करते रहे | अंतत: यह हड़ताल सफल हुई | श्रमिको के सफल नेतृत्व का यह उनके जीवन का प्रथम अनुभव था |   
तत्पश्चात बापट ने गोखले की अध्यक्षता में पुणे राजबंदी मुक्ता मंडल स्थापित किया और उसके कार्यवाहक बने | इस मंडल का मुख कार्य अंडमान में काले पानी की नारकीय सजा भोग रहे कैदियों को छुडवाने का प्रयास करना था | विनायक दामोदर सावरकर इस प्रयास में पहले से ही लगे थे | राज बन्दियो को छुडवाने के लिए बापट ने अथक प्रयास किये | घर - घर घूमकर गले में पट्टी लगाकर और समाचार पत्रों के जरिये आह्वान कर लोगो को जागृत करने का काम शुरू किया | समर्थन में लोगो का हस्ताक्षर लेने की मुहीम शुरू की | इसी के साथ वे मुलसी के सत्याग्रह आन्दोलन से भी जुड़ गये और उनके अगुवा लीडर बन गये | महाराष्ट्र के सहयात्री पर्वत की विभिन्न चोटियों पर टाटा कम्पनी ने 20  से 22 की संख्या में बाँध बनाने की योजना तैयार की थी | इसमें से एक बाँध मुलसी के निकट मुला व नीला नदियों के संगम पर बाधा जाना था | मुलसी बाँध के काम में 54  गाँव को वह से उजड़ जाना था | बाँध परियोजना का यह काम ब्रिटिश सरकार के सहमती व समर्थन से देश की टाटा कम्पनी द्वारा किया जा रहा था | उसके विरुद्ध आन्दोलन पहले से ही चल रहा था लेकिन उसके सारे नेताओं को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था | अब बापट के नेतृत्व में 1 मई 1922 को सत्याग्रह आन्दोलन पुन: शुरू किया गया | कुछ ही दिनों बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और 6 माह के लिए यरवदा जेल भेज दिया गया |जब वे छूटे तो आन्दोलन ठंठा पड़ चुका था | इन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने आन्दोलन को पुन: शुरू किया | इसके लिए उन्होंने पूरे क्षेत्र में दौरा किया | वे जगह -- जगह लोगो को जागृत करने मुलसी बाँध के विरोध में अत्यंत प्रभावपूर्ण ढंग से बताते हुए अपनी कविताओं का पाठ भी करते | अपने भाषणों में वे यह बात भी जरुर कहते कि अब गप्प मारने के दिन खत्म हो गये है बम मारने के दिन आ गये है | पुलिस फिर उनके पीछे लगी और उन्हें एक वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया | जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपने व्यक्तिगत  प्रयास से आन्दोलन तेज करने का निर्णय लिया |  
उन्हें इसके लिए सहयोगी भी मिल गये | बाँध के विरोध में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ रेल रोकने के लिए लाइन पर पत्थर डालकर और स्वंय हथियार से लैस होकर रेलवे लाइन पर एक अडिग सेनापति के रूप में खड़े हो गये | संभवत: तभी से उन्हें आम जनता सेनापति कहने लगी | लेकिन इस विरोध के बाद उन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया गया , और इस बार 7  वर्ष के लिए सिंध प्रांत के हैदराबाद जेल में डाल दिया गया | जेल से रिहा होने के बाद 28 जून 1931 को वे महाराष्ट्र प्रांतीय काग्रेस समिति के अध्यक्ष चुने गये | विदेशी बहिष्कार आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भागीदारी निभाया | ब्रिटिश राज्य के विरोध में जनता को आंदोलित करने में लगे रहे | उनके भाषणों को राज्य विरोधी तथा भडकाऊ मानकर उन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया गया | इस बार उन्हें 10 वर्ष की सजा सुने गयी 7 वर्ष काले पानी और 3 वर्ष तक दूसरे जेल में कैद रहने की सजा दी गयी | पहले उन्हें रत्नागिरी के केन्द्रीय जेल भेजा गया | जेल में बी वे साफ़ सफाई के काम में लग गये | साथ ही संस्कृत हिंदी मराठी में कविताओं की रचना में लगे रहते | गांधी जी के अनशन के समर्थन में उन्होंने जेल में अनशन शुरू कर दिया | तबियत बहुत खराब हो जाने के बाद उन्हें 23 जुलाई 1937 को रिहाकर दिया गया |   
ठीक होने के बाद वे गांधी जी से मिलने सेवाग्राम गये वहा से लौटकर उन्होंने भारतीय प्राणयज्ञ दल बनाने में जुट गये | इस दल ने यह तय किया हुआ था कि स्वतंत्रत भारत का सविधान बनाकर उसे ब्रिटिश शासको को भेजने के साथ एक साथ लोग सार्वजनिक स्थल पर मृत्यु का आलिगन करे | ताकि ब्रिटिश हुकूमत पर उस सविधान को स्वीकारते हुए देश को स्वतंत्रत करने का दबाव पड़े | इसके लिए उन्होंने प्रतिज्ञा पत्र तैयार किया | उस प्रतिज्ञा पत्र पर 21  आदमियों ने हस्ताक्षर भी किया | प्राणयज्ञ के लिए निश्चित समय से पूर्व ही पुलिस को इसकी खबर लग गयी और उसने बापट को गिरफ्तार कर लिया | हालाकि इस बार उन्हें जल्दी ही छोड़ दिया गया | इसी बीच गांधी जी के असहयोग के चलते काग्रेस के चुने हुए अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पडा | बापट ने सुभाष बोस को सही माना और उनकी पार्टी फारवर्ड ब्लाक के साथ हो गये | उन्हें फारवर्ड ब्लाक की महाराष्ट्र शाखा का अध्यक्ष बनाया | अध्यक्ष पद से उन्होंने जगह -- जगह द्दितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल किये जाने का विरोध किया | फारवर्ड ब्लाक के मंच से उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरोध में अपने बयानों भाषणों का क्रम जारी रखा | कोल्हापुर रियासत में उन्हें धारा 144 के विरुद्ध बंदी बना लिया गया | लेकिन उन्हें ब्राड लाकर छोड़ भी दिया गया | इसी तरह उन्हें कई जगहों से बंदी बनाकर दूसरी जगहों पर छोड़ा जाता रहा | सबसे बाद में बाम्बे चौपाटी में भाषण देते हुए उन्हें गिरफ्तार करके नासिक जेल में राजद्रोह के आरोप में बंद कर दिया गया | जेल से छूटने के बाद नागपुर में सेनापति बापट की अध्यक्षता में ब्रिटिश राज विरोधी विद्यार्थी परिषद की सभा हुई | वहा  उन्होंने पुन: इस युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य और भारत में उसके राज्य का विरोध किया | अमरावती की ऐसी एक सभा में भाषण से पहले ही पुन: गिरफ्तार कर लिया गया | एक वर्ष की सजा सुने गयी | 1946 में जेल से छूटने के बाद अपने जन्म स्थान पारनेर पहुचे | उस समय वहा दुर्भिक्ष की घनघोर छाया पसरी हुई थी बापट लोगो की सहायता में जुट गये स्वंय मजदूरी करने के साथ -- साथ अशक्त लोगो के लिए रोटिया जमा करने तथा सहायक निधि एकत्रित करने में कम में जुट गये | 15 अगस्त 1947 के दिन पुणे शहर में तिरंगा फहराने का गौरव सेनापति बापट को मिला | लेकिन उसके  बाद बापट कोई पद -- प्रतिष्ठा को लेने की जगह राष्ट्र सेवा -- जनसेवा के कार्य में पुन: लग गये | बाद के दौर में उन्होंने गोवा मुक्ति आन्दोलन में हिस्सा लिया | अतत: शरीर कमजोर होते गये अथक सेनानी व सेनापति बापट का 28 नवम्बर 1967के दिन देहांत हो गया |

-सुनील दत्ता 
 स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक
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