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सोमवार, 9 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -5


1936 महत्वपूर्ण जन-संगठनों का निर्माण

जैसा कि सभी को ज्ञात है, 1936 में तीन अखिल भारतीय पैमाने के जन-संगठनों का जन्म यू0पी0 के ही लखनऊ में हुआ था। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यू0पी0 में विभिन्न जन-संगठन पहले से ही काम कर रहे थे। छात्रों और नौजवानों के बीच छात्र संगठन, स्टूडेंट फेडरेशन, यूथ लीग आदि नामों से संगठन पहले से ही सक्रिय थे, जिनमें पी0सी0 जोशी, रुस्तम सटिन, रमेश सिन्हा, पंडित नेहरू और अन्य सक्रिय थे। 1929 मंे ही इलाहाबाद में एक यूथ लीग सक्रिय था, जिसमें पण्डित नेहरू, पीसी जोशी तथा अन्य सक्रिय थे। यूथ लीग ने यू0पी0 यंग कामरेड लीग बनाने मंे मदद की।
पीसी जोशी 1929 में मेरठ मुकदमे में गिरफ्तार हो गए। जोशी 1928 में यू0पी0 यंग कामरेड्स लीग के सचिव थे और साथ ही यू0पी0 में उभरते कम्युनिस्ट संगठन के भी सचिव थे। हालाँकि अभी यू0पी0 में औपचारिक तरीके से पार्टी नहीं बन पाई थी। पी0सी0 जोशी उस समय इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र थे, उनकी गिरफ्तारी के विरोध में यूनिवर्सिटी के छात्रों ने हड़ताल कर दी। छात्रों के कमरों की तलाशी ली गई, ताकि कम्युनिस्ट साहित्य मिल सके। इस दौरान गिरफ्तारी के खिलाफ छात्रों ने जुलूस भी निकाला। बाद में 500 से भी अधिक छात्रों ने यूथ लीग की सदस्यता ग्रहण कर ली।
नेहरू ने, पूछे जाने पर कम्युनिज्म के सिद्धांतों का समर्थन करते हुए कहा कि इसे समझने की जरूरत है और इसकी अच्छाइयों को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है।
जोशी की गिरफ्तारी के बाद नेहरू वाई0एल0 का दिशा निर्देशन करते रहे। 13 अप्रैल 1929 को इलाहाबाद में वाई0एल0 की एक मीटिंग हुई। 24 फरवरी को नेहरू ने लखनऊ में तिरंगा झण्डा इसी मीटिंग में फहराया। 13 अप्रैल 1929 को नेहरू ने वाई0एल0 की एक दिलचस्प मीटिंग इलाहाबाद में आयोजित की, इसमें छुट्टियों के दिनों में छात्रों के कार्यक्रम तय किए गए, इनमें सबसे महत्वपूर्ण था पी0सी0 जोशी का मेरठ षड्यंत्र मुकदमा लड़ने के लिए पैसे इकट्ठा करना।
इससे पता चलता है कि मेरठ मुकदमे के खिलाफ गोरखपुर तथा कुछ अन्य जगहों में भी वाई0एल0 काम कर रहे थे। 18-19 अगस्त 1929 को एक प्रांत-व्यापी छात्र नौजवान सम्मेलन वाई0एल0 के नेतृत्व में करने का निश्चय किया गया।
1936 में लखनऊ में ए0आई0एस0एफ0, अखिल भारतीय किसान सभा और और प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। स्थापना संबंधी इनमें से प्रत्येक का इतिहास अत्यंत ही रोचक और शिक्षा-प्रद है, लेकिन स्थान की कमी के कारण हम विस्तार में न जाकर केवल कुछ ही घटनाओं का जिक्र करेंगे।
ए0आई0एस0एफ0 बनाने से पहले अंग्रेज शासक भाँप गये थे कि एक मजबूत छात्र संगठन बनने वाला है, इसलिए उन्होंने स्वयं ही एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने की पहल की। उस समय यू0पी0 (यूनाइटेड प्राविन्सेज आॅफ आगरा एण्ड अवध) के गवर्नर सर मैल्कम हैली थे। उन्होंने यू0पी0 के वाइस चांसलरों और दूसरे अधिकारियों को सम्मेलन बुलाने का आदेश दिया, उनकी योजना थी कि आगे चलकर इस संगठन
की ओर से एक अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया जा सके। इस संगठन का नाम था यू0पी0 यूनिवर्सिटी स्टुडेंट फेडरेशन। यह अंग्रेज समर्थित आधिकारिक छात्र संगठन था। इसकी एक बैठक 1936 के आरम्भ में बुलाई गई। राष्ट्रवादी, कम्युनिस्ट,
सोसलिस्ट और अन्य छात्रों ने इसमें भाग लेने का फैसला किया। अधिकारियों की ओर से राजा जार्ज पंचम की मृत्यु पर एक शोक प्रस्ताव लाया गया। राष्ट्रवादी छात्रों ने ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता शापुरजी सकलतवाला की मृत्यु पर भी एक शोक प्रस्ताव पेश किया। बस फिर क्या था, हंगामा मच गया, अंग्रेजों के पिट्ठू यह प्रस्ताव पास नहीं होने देना चाहते थे।
राष्ट्रवादी छात्रों ने मंच पर कब्जा कर लिया। शापुरजी की मृत्यु पर प्रस्ताव लाने वालों में शफीक नकवी जो बाद में यू0पी0 पार्टी के नेता बने और ए0आई0एस0एफ0 के संगठनकर्ता थे, अंसार हरवानी, अहमद जमाल किदवई, जगदीश रस्तोगी इत्यादि थे। कई छात्रों को रेस्टीकेट कर दिया गया। वाइस चांसलर तथा अन्य अधिकारियों
ने धमकियाँ दीं, लेकिन वे सफल नहीं हुए।
कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी छात्रों ने जवाब में एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं। इस प्रकार ए0आई0एस0एफ0 के प्रसिद्ध लखनऊ सम्मेलन की नींव डाली गई। आगे चलकर सी0पी0आई0, सी0एस0पी0, कांग्रेस और अन्य संगठनों तथा व्यक्तियों की पहल कर ए0आई0एस0एफ0 के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।
यू0पी0 यू0एस0एफ0 ने लखनऊ में 23 जनवरी 1936 को एक मीटिंग में तय किया कि एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन लखनऊ में ही आयोजित किया जाए। सम्मेलन की तैयारियों के लिए यू0पी0 प्रांत के विभिन्न शहरों में समितियों का गठन किया गया। लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, आगरा, अलीगढ़ और दूसरी जगहों में समितियाँ बनाई गईं। लखनऊ स्थित स्वदेशी लीग ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा की (कम्युनिस्टों का इस प्रक्रिया में काफी योगदान रहा), रमेश सिन्हा ने इलाहाबाद से ए0आई0एस0एफ0 के लखनऊ सम्मेलन में डेलीगेट की हैसियत से भाग लिया।
सम्मेलन को सुचारु रूप से चलाने के लिए स्वागत समिति बनाई गई, जिसमें यू0पी0 की महत्वपूर्ण हस्तियाँ शामिल की गईं। मई 1936 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के दौरान हरीश तिवारी और अन्य छात्र नेताओं ने पण्डित नेहरू से मुलाकात करके विस्तार से बातें कीं। साथ ही स्वयं नेहरू से सम्मेलन का उद्घाटन करने का अनुरोध किया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।
लखनऊ में ए0आई0एस0एफ0 के स्थापना सम्मेलन की तैयारियों और कार्यवाहियों का अपने आप में एक रोचक इतिहास है। यू0पी0 के डेलीगेट्स को बलरामपुर हाउस (कैसरबाग) में ही ठहराया गया था। इसके अलावा छेदीलाल धर्मशाला मंे भी उनके रहने का इन्तजाम किया गया। बलरामपुर हाउस में विषय समिति की बैठक हुई। कुछ स्थानीय ‘‘राजाओं’’ ने रहने के इन्तजाम में सहायता की: जैसे बलरामपुर, महमूदाबाद, सलेमपुर, मनकापुर इत्यादि के राजा। यू0पी0 की विभिन्न स्वयं सेवक संस्थाओं ने ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन में सक्रिय भूमिका अदा की। मसलन - यू0पी0 एहरार लाल कुर्ता स्वयं सेवकों तथा अन्य ने अलग-अलग इन्तजाम के काम सँभाले।
ए0आई0एस0एफ0 के स्थापना सम्मेलन में यू0पी0 का अत्यंत ही सक्रिय और कई मौकों पर निर्णायक योगदान रहा। ए0आई0एस0एफ0 का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ से ही काम करने लगा और ए0आई0एस0एफ0 का सूचना केन्द्र भी यू0पी0 के अलीगढ़ में स्थापित किया गया। सम्मेलन मंे ए0आई0एस0एफ0 के कनविनर कैलाश नाथ वर्मा बनाए गए और एल0सी0 खन्ना तथा रमेश सिन्हा इसके सदस्य बनाए गए।

अखिल भारतीय किसान सभा और प्रलेस की स्थापना

अखिल भारतीय किसान सभा का स्थापना सम्मेलन 11 से 13 अप्रेल 1936 को लखनऊ में सम्पन्न हुआ। ध्यान रहे कि अखिल भारतीय किसान सभा की संगठन समिति का निर्माण भी मेरठ में ही 1935 में एक अखिल भारतीय बैठक में किया गया। यह भी उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) का कम्युनिस्ट और मूलगामी जन आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान था। इससे पहले यू0पी0 के कई जिलों और क्षेत्रों में किसान सभा की इकाइयाँ बन चुकी थीं। यू0पी0 मंे किसान आन्दोलन तेजी से उभर रहा था। ए0आई0के0एस0 का सम्मेलन कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही हुआ। किसान सभा
का कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और सी0एस0पी0 के साथ बड़ा गहरा संबंध रहा। इस सम्मेलन की अध्यक्षता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने की। सम्मेलन मंे एक हजार से भी अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। तब तक यू0पी0 किसान संघ बन चुका था। सम्मेलन की तैयारियों और कामों में यू0पी0 से कई नेता सक्रिय रहे जैसे के0एम0 अशरफ, मोहनलाल गौतम तथा अन्य। ए0आई0के0एस0 सम्मेलन में कई निर्णय लिए गए जिनमें एक था जमींदारी प्रथा के खिलाफ संघर्ष। यू0पी0 के इलाकों में सामन्ती जमींदारी व्यवस्था की जड़ें काफी मजबूत थीं। इसके विरोध में यू0पी0 में कई जुझारू संघर्ष संगठित किए गए जिनमें कम्युनिस्टों की सक्रिय भूमिका रही। तालुक़ेदारी यू0पी0 के कई इलाकों मंे जमींदारी प्रथा का विशेष रूप था। 1937 में प्रदेश में एक किसान संगठन समिति बनाई गई जिसके डाॅ0 के0एम0 अशरफ संयोजक थे। प्रादेशिक किसान सम्मेलन पीलीभीत में 6-7 दिसम्बर 1937 को आयोजित किया गया।
जेड0ए0 अहमद ने ए0आई0के0एस0 के लखनऊ सम्मेलन में एक दर्शक प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया। उन्होंने प्रो0 रंगा और इंदुलाल याज्ञनिक के कहने पर और उनके प्रभाव में अपना मुख्य समय किसान आन्दोलन को देने का फैसला किया। वे यू0पी0 और बिहार में किसान सभा का सक्रिय कार्य करने लगे। किसानों की जमींदारी विरोधी लहर का नेतृत्व अभी तक तो कांग्रेस करती आ रही थी। वह अभी भी सक्रिय थी। जब मैदान में अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक विचारों वाले कम्युनिस्ट तथा अन्य लोगों के आने से किसान आन्दोलन को अधिक साफ दिशा मिली तो यू0पी0 में किसान आन्दोलन बढ़ने लगा। अवध में किसान सभा ने लगान बंदी का आन्दोलन छेड़ दिया।
1938 में जेड0ए0 अहमद ए0आई0के0एस0 की सर्वोच्च निकाय के सदस्य बनाए गए। इस हैसियत से वे बिहार और दूसरे प्रांतों का दौरा भी करते रहे।
1938 मंे कांग्रेस के प्रदेश सचिव की हैसियत से अहमद, संयुक्त सचिव जगन प्रसाद रावत के साथ चैरी चैरा गए। वहाँ कांग्रेस दो हिस्सों में बटी थी। किसानों के समर्थन और जमींदारों के समर्थन वाले गुट थे। शिब्बन लाल सक्सेना वहाँ 1932 से ही किसानों का जुझारू संघर्ष चला रहे थे। चैरी चैरा का अनुभव अहमद के लिए काफी महत्व का था। उन्होंने फिर मुंशी कालिका प्रसाद के साथ कई दिनों का दौरा किया और गाँव-गाँव रहे तथा किसान जीवन एवं संघर्ष को नजदीक से देखा। किसान संघर्षांे के दौरान उनका परिचय किसान और कांग्रेस नेता पुरुषोत्तम दास टण्डन से भी हुआ।
1939 में सुप्रसिद्ध किसान नेता, कम्युनिस्ट और लेखक राहुल सांकृत्यायन, अहमद से मिलने इलाहाबाद आए और 20-25 दिनांे तक उनके साथ रहे। वे उनके घर के सामने एक बड़े मैदान में हरिजन आश्रम के निकट एक झोपड़ी मंे रुके, जिसे अहमद ने बनवा दी थी। शायद यहीं रहते हुए राहुल ने अपनी पुस्तक, वोल्गा से गंगा, के कुछ पृष्ठ भी लिखे थे। 1940 में जेड0ए0 अहमद को गिरफ्तार कर देवली सेंट्रल जेल भेज दिया गया। लेकिन इस से पहले ही उनका कई नेताओं के साथ गहरा सम्पर्क कायम हो चुका था। तब तक आजमगढ़ के जय बहादुर सिंह और गाजीपुर के सरयू पाण्डेय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता के अलावा पूर्वी उत्तर (तब संयुक्त प्रांत) प्रदेश के किसान आन्दोलन के नेताओं के रूप में जाने जाने लगे थे। इन तीनों नेताओं को ‘त्रिगुट’ के नाम से जाना जाता था, उन्होंने पूर्वी यू0पी0 में काफी मजबूत किसान आन्दोलन खड़ा कर दिया।
जय बहादुर सिंह ने तो आमजगढ़ में काफी किसान आन्दोलन चला रखे थे, उनकी विशेष प्रसिद्धि पिरीडीह ट्रेन डकैती काण्ड में सजा काटकर बाहर आने के बाद हुई। जय बहादुर सिंह ने बेदखली और अन्य समस्याओं पर तथा जमींदारों के बार-बार जुल्मों के विरोध में शक्तिशाली संघर्ष चलाए। यहाँ तक कि उनके ही परिवार के जमींदारों ने किसानों की जमीनें छीन ली थीं और दियारे की सैकड़ों बीघा जमीन से उन्हें बेदखल कर दिया था। जय बहादुर ने किसानों के संघर्षों का नेतृत्व कर उनकी जमीनें उन्हें वापस दिलवा दीं। किसानों से उन्होंने कहा कि रोने धोने से काम नहीं चलेगा, एक होकर लड़ो। जमींदारों ने अपना माथा पीट लिया कि देखो हमारे ही घर मं कलंक पैदा हो गया है। गाजीपुर के सरयू पाण्डे 1942 के आन्दोलन में जेल की सजा पा चुके थे, जेल में उनका सम्पर्क कम्युनिस्टों से हुआ और वे जेल से बाहर आने पर पार्टी में शामिल हो गए। आगे चलकर वे सी0पी0आई0 के न सिर्फ प्रांत और राज्य स्तरीय बल्कि अखिल भारतीय नेता भी बने। जेल के बाद उन्होंने पूरे जिले में किसान संघर्ष तेज कर दिया और उनके नेतृत्व में बड़े-बड़े किसान आन्दोलन चले। उन्हें घर-घर के लोग पहचानते थे। एक बार बलिया के एक गाँव में एक हरिजन महिला के घर मंे पुलिस आ धमकी, पुलिस सरयू पाण्डेय की खोज मंे थी। उस महिला को मालूम था कि वे कहाँ छिपे हैं, लेकिन पुलिस द्वारा पूछने पर भी उसने नहीं बताया। तब पुलिस ने उसकी तीन दिनों की बच्ची को जूतों की ठोकरों से मार डाला, फिर भी उसने सरयू पाण्डेय का पता नहीं बताया।

अनिल राजिमवाले
क्रमश:

रविवार, 8 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -4

जेड0 0 अहमद, नेहरू और 0आई0सी0सी0 जैसा कि हमने देखा 1936 का वर्ष काफी महत्व का साबित हुआ। उसी वर्ष कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में बड़े पैमाने पर हुआ। सज्जाद जहीर ने जेड0 0 अहमद को लखनऊ जल्द से जल्द पहुँचने का आदेश देते हुए पत्र लिखा। अहमद तुरन्त चल पड़े लखनऊ पहुँचकर वे कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू की तकरीर कुछ सुन पाए। नेहरू वैज्ञानिक समाजवाद की बात कर रहे थे।
सज्जाद जहीर के आदेश पर वे लखनऊ में एक पूर्व नियोजित जगह पर पहुँचे। वहाँ लंदन कम्युनिस्ट ग्रुप के 10-12 साथी बैठे हुए थे। सज्जाद जहीर की देख रेख में चल रही इस बैठक में लोगों ने अपने भविष्य और काम तय किए। उनमें से ज्यादातर कोई न कोई काम कर रहे थे लेकिन पार्टी को आंशिक या पूरा वक्त देने को
तैयार थे। अहमद ने मीटिंग के बाद सिंध जाकर अपनी कालेज की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और वापस इलाहाबाद लौट आए। सज्जाद जहीर ने उन्हें पं0 नेहरू से मिलने की सलाह दी। फिर वे लखनऊ जाकर जोशी से मिले। जोशी ने उन्हें पार्टी का सदस्य बनने के लिए कहा।
डाॅ0 अशरफ पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। उन्होंने अहमद को नेहरू से मिलवा दिया। नेहरू ने काफी बातचीत की और उनका काम कांग्रेस दफ्तर में तय कर दिया और साथ ही उनका माहवार भी। माक्र्सवाद, पार्टियों और विचार धाराओं के बारे में खुलकर बातें र्हुइं। अहमद को इलाहाबाद का ए0आई0सी0सी0 का दफ्तर सँभालना
था।
कुछ ही दिनों बाद पंडित नेहरू ने ए0आई0सी0सी0 दफ़्तर में एक मीटिंग बुलाई, उस मीटिंग में डाॅ0 लोहिया, डाॅ0 अशरफ, आचार्य कृपलानी और नेहरू के अलावा कुछ अन्य मौजूद थे। यह बैठक केन्द्र को मजबूत करने सम्बंधी सुझाव माँगने के लिए बुलाई गई थी। साथ ही कामों का बँटवारा भी किया गया। इसमें आखिरकार तय किया गया कि दैनिक राजनैतिक मार्ग दर्शन का काम डाॅ0 अशरफ के जिम्मे, डाॅ0 लोहिया को अन्तर्राष्ट्रीय विभाग मिला। उन्होंने ही विश्व साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष और उसके महत्व का उल्लेख किया था। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद को आर्थिक विभाग दिया गया। जेड0ए0 अहमद ने कहा था कि वे एक अर्थशास्त्री हैं, और इसलिए जनता के बीच साम्राज्यवाद द्वारा आर्थिक शोषण का पर्दाफाश करने का महत्व वे समझते हैं। यह सब कुछ निश्चित हो जाने के बाद ए0आई0सी0सी0 दफ्तर का काम सुचारु और नियमित रूप से चालू हो गया। नेहरू ठीक नौ बजे सुबह हाजिर हो जाते थे और विभिन्न विभागों का काम देखते, आगे के कार्यक्रम तय होते। इस प्रकार ए0आई0सी0सी0 के केन्द्रीय काम में कम्युनिस्टों की बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका रही और जाहिर है इसमें यू0पी0 के कम्युनिस्ट आगे रहे।
डाॅ0 अशरफ ने मुस्लिम जनता को अपने साथ लाना शुरू किया। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद ने कुछ ही समय में अर्थात 3-4 महीनों में ही आर्थिक परिस्थितियों पर कई पुस्तकें लिख डालीं। भारत की कृषि समस्याओं पर इनमें इस तरह लिखा गया था कि आसानी से समझ में आ सके। ये पुस्तकें हज़ारों की संख्या में बिकीं। इनमें एक किताब थी जो विशेष तौर पर प्रसिद्ध हुई, वह पुस्तक थी ‘‘अग्रेरियन प्राॅब्लम इन इन्डिया’’ अर्थात भारत में कृषि समस्या, यह पुस्तक भी खूब बिकी। नेहरू ने इतना पसन्द किया कि वे कांग्रेस की एक सभा में अहमद का हाथ पकड़ कर गांधी के पास ले गए, उनका परिचय कराते हुए कहा कि यह वही नौजवान है जिसने अंग्रेरियन प्राॅब्लम लिखी है। गांधी तुरन्त उठे और अहमद को गले लगा लिया। फिर कहा कि मुझे खुशी है कि तुम्हारे नौजवान को पंडित ने कांग्रेस आफिस में काम की जिम्मेदारी दी है। आचार्य कृपलानी को यह सब पसन्द नहीं आ रहा था, वे दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखते थे, उन्होंने नेहरू, गांधी जी, पटेल इत्यादि से शिकायतें कीं। फलस्वरूप, एआईआईसी केन्द्र में काम में कुछ उलटफेर करना पड़ा। इसके अलावा, कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और दूसरों गुटों के बीच तनाव भी चल रहा था। इन सभी ने अपने-अपने त्याग पत्र दे दिए और फिर नेहरू से भविष्य के बारे में सलाह की। जेड.ए. अहमद को नेहरू ने लखनऊ जाकर कांग्रेस राज्य कमेटी के पुनर्गठन का काम दिया। लेकिन अहमद इलाहाबाद में ही रहे, क्योंकि वे तुरन्त नहीं जा सकते थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रेस मजदूर यूनियनों के निर्माण में मददकी। इन सारी गतिविधियों से इलाहाबाद में आगे चलकर पार्टी बनाने में सहायता मिली। इस प्रकार यदि देखा जाय तो जहाँ 1936 में यू0पी0 (उस वक्त संयुक्त प्रांत या यूनाइटेड प्राविन्सेज) में कुछ थोड़े से लोग पार्टी के साथ थे। वहाँ 1940 आते-आते पार्टी जनाधार काफी बढ़ा और विस्तृत हो गया था। उस समय तक आर0डी0 भारद्वाज, जेड0ए0 अहमद, रमेश सिन्हा, पी0सी0 जोशी, एस0एस0 यूसुफ, अजय घोष और अन्य कई कम्युनिस्ट नेता, यू0पी0 में उभर चुके थे। जिनका न सिर्फ पार्टी के दायरे मंे बल्कि उस के बाहर काफी व्यापक क्षेत्र में प्रभाव था। साथ ही साथ वे राष्ट्रीय आजादी के आन्दोलन के भी महत्वपूर्ण नेताओं में गिने जाने लगे थे, उनमें से कई कांग्रेस मंे भी काम कर रहे थे जिससे कांग्रेस के अंदर वामपंथी शक्तियाँ मजबूत हो रही थीं।
रमेश सिन्हा एक शिक्षित परिवार मंे जन्मे थे। रमेश सिन्हा और हर्षदेव मालवीय एक ही क्लास में पढ़ते थे। उन दोनों ने आगे चलकर कम्युनिस्ट वामपंथी और राष्ट्रीय आन्दोलन के निर्माण में बड़ा योगदान दिया। इन साथियों ने इलाहाबाद में छात्रों के बीच कम्युनिस्ट गु्रप बनाने का काम किया।
फिरोजाबाद में चूड़ी मजदूरों, आगरा मंे जूते बनाने वाले मजदूरों, अशफाक तथा अन्य कामरेडों की देखरेख में हरिजन और मुस्लिम लोगों में, हाफिज अहमद के नेतृत्व में रेलवे वर्कर के बीच, कानपुर मंे व्यापक तौर पर मजदूरों के बीच, खासकर पूर्वी यू0पी0 में और अन्य हिस्सों में किसानों में पार्टी और विभिन्न जन संगठनों का काम सक्रियता से छा पड़ा। आगे चलकर पार्टी के झारखंडे राय, सरजू पाण्डेय, जय बहादुर सिंह और अन्य कई नेता उभरे, जिनकी लिस्ट काफी लम्बी है। यू0पी0 भूमि कम्युनिस्टों के लिए काफी उर्वरा साबित हुई।

अनिल राजिमवाले
क्रमश:

शनिवार, 7 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -3


उत्तर प्रदेश में भारद्वाज का योगदान

हम भारद्वाज का कुछ उल्लेख कर आए हैं। वे एक असाधारण कम्युनिस्ट थे, दुर्भाग्य से वे मात्र 40 वर्ष की उम्र में मृत्यु को प्राप्त हुए। उनका जन्म दिसम्बर 1908 में और मृत्यु 8 अप्रैल 1948 को हुई। लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश और भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन पर अपनी अमिट छाप अंकित कर दी। उनके राजनैतिक जीवन का प्रारम्भ पं0 जवाहर लाल नेहरू और पी0सी0 जोशी की देखरेख में हुआ। 1919 में जब महात्मा गांधी पालवाल (आजकल हरियाणा में) में गिरफ्तार कर लिए गए तो रुद्र दत्त भारद्वाज ने बड़ौत (मेरठ) में अपने स्कूल में हड़ताल करवा दी। इसके अगले ही साल तिलक की मृत्यु पर स्कूल में उन्होंने फिर हड़ताल करवाई। गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने फिर हड़ताल करवाई। गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने स्कूल का बहिष्कार कर दिया। पैदल चलकर दिल्ली गए और गांधी जी के आम आह्वान पर उन्होंने दो महीनों तक चरखा चलाया। फिर उनके बड़े भाई देव दत्त भारद्वाज उन्हें वापस ले गए। 1925 के कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में वे सक्रिय कार्यकर्ता बने। बाद में इलाहाबाद और बनारस में पॄे। पी0सी0 जोशी से उनका परिचय 1928 में हुआ। वे जोशी के भाषण से प्रभावितहो गए और उनसे बातें करने गए। फिर उनकी दोस्ती आगे ब़ती गई और वैचारिक विचार विमर्श होता गया। तब भारद्वाज को समझ में आया कि रूसी और फ्रांसीसी क्रांतियों में क्या अन्तर है।
1929 में मेरठ षडयंत्र केस में पी0सी0 जो0शी की गिरफ्तारी के बाद कम्युनिस्ट पर चार और पार्टी बनाने की जिम्मेदारी भारद्वाज पर आ गई। इसी समय उन्हें पं0 नेहरू के साथ यूथ लीग में काम करने का मौका मिला।
आर0डी0 भारद्वाज ने 1931 में एम0ए0 पास किया। साथ ही उन्होंने मेरठ मुकदमे के कैदियों के लिए सक्रिय काम भी किया। पॄाई पूरी करके रुद्रदत्त भारद्वाज बम्बई चले गए जहाँ वे गिरनी कामगार यूनियन तथा नौजवान मजदूर सभा के काम में लग गए। ऐसा उन्होंने मेरठ में गिरफ्तार बम्बई के साथियों के आग्रह पर किया क्योंकि वहाँ काम करने वाले साथियों की जरूरत थी। वे वहाँ बी0बी0 एण्ड सी0आई0 रेलवे की यूनियन के महामंत्री चुने गए। उन्हें कामरेड सर देसाई के साथ काम करने का मौका मिला। भारद्वाज ने बम्बई तथा अन्य जगहों के कपड़ा मिल मजदूरों में बड़ा ही सक्रिय काम किया। फलस्वरूप उन्हें 3 महीनों की जेल की सजा दी गई। फिर रेलवे के मजदूरों में काम के लिए भी ड़े महीने की सजा भुगतनी पड़ी। यह तीस के दशक के आरम्भ की बात है। वे 1934 के बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय कपड़ा मिल मजदूर सम्मेलन में सक्रिय थे। उन्हें फिर अहमदाबाद से दो साल का वारण्ट जारी करके गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें सिन्धु प्रदेश के हैदराबाद में गिरफ्तार रखा गया। 1936 में जेल से छूटने पर पुलिस उन्हें इलाहाबाद ले आई और उनके बड़े भाई देवदत्त भारद्वाज के हवाले कर दिया। देवदत्त लीडर नामक अखबार के सम्पादक थे।
अब आर0डी0 भारद्वाज के राजनैतिक जीवन की अगली मंजिल आरम्भ हुई और वे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में काम करने लगे। उन्हें नागपुर में उसी समय हुई केन्द्रीय समिति की बैठक में समिति का सदस्य बना दिया गया। गुप्त पार्टी कार्यालय बनाकर लखनऊ में वे रहने लगे। फिर पार्टी के दो हिन्दी अखबार उन्होंने प्रकाशित करने शुरू किए। इनके नाम थे साप्ताहिक नया हिन्दुस्तान और मासिक प्रभा। बहुत जल्द ही कानपुर में पार्टी का एक मजबूत केन्द्र स्थापित हो गया। इसमें संत सिंह, यूसुफ, अशोक बोस, सोने लाल, संतोष कपूर, अर्जुन अरोड़ा इत्यादि के साथ भारद्वाज हमेशा तत्परता के साथ शामिल रहते थे।

कांग्रेस कमेटियों में कम्युनिस्ट सदस्य तथा संयुक्त मोर्चा

उन दिनों पी0सी0 जोशी के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वतंत्र रूप से काम करने के अलावा कांग्रेस में रहकर काम की नीति अपना रखी थी। इससे पार्टी एवं जन आन्दोलन को बहुत फायदा पहुँचा। कई कम्युनिस्ट विभिन्न प्रादेशिक कांग्रेस कमेटियों तथा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। डॉ0 जेड0 ए0 अहमद तो उत्तर प्रदेश की कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे। ए0आई0सी0सी0 में आगे चलकर आर0डी0 भारद्वाज भी चुने गए। उन्होंने ए0आई0सी0सी0 में जोरदार भाषण भी दिए। भारद्वाज ने कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन में हिस्सा लिया और कम्युनिस्टों के विचार प्रस्तुत किए। वे 1940 के कांग्रेस के रामग़ अधिवेशन में भी गए। कानपुर मजदूर सभा की स्थापना में कम्युनिस्ट और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे प्रगतिशील कांग्रेसियों का परस्पर सहयोग रहा। यहाँ भारद्वाज की बड़ी सक्रिय भूमिका रही। इन लोगों और बाद में पं0 बाल कृष्ण शर्मा ॔नवीन’ के कारण कानपुर में कांग्रेस कम्युनिस्ट एकता आगे ब़ी।
आगे चलकर रुद्रदत्त भारद्वाज को कठिन जेल जीवन और कष्टमय परिस्थितियों के कारण टी0बी0 हो गया। उनका देहान्त इसी बीमारी के कारण 1948 में हो गया। वे उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि समूचे भारत के एक असाधारण कम्युनिस्ट तथा स्वतंत्रता सेनानी थे। वे सच्चे मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण थे, भले उनका अपना जीवन सुखों से वंचित और विभिन्न प्रकार के दुखों से भरा हुआ था। यह बड़े ही खेद का विषय है कि उनकी जीवनी और योगदान की उपेक्षा कर दी गई है। अब समय आ गया है कि उनके यादों के बारे में विस्तार से जनता को ही नहीं बल्कि स्वयं कम्युनिस्टों को भी अवगत कराया जाए।

अनिल राजिमवाले
क्रमश:

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -2


मेरठ षड्यंत्र मुकदमा 1929-33

कानपुर में 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद ब्रिटिश सरकार ने पार्टी को कुचलने के ख़याल से कम्युनिस्टों पर एक मुकदमा चलाया और बड़ी संख्या में उन्हें गिरफ्तार किया। 1929 में सारे देश में 32 सबसे बड़े कम्युनिस्ट मजदूर नेताओं को पकड़कर मेरठ लाया गया। मेरठ में उनके लिए एक विशेष जेल बनाई गई। जिसमें उन्हें नजरबन्द किया गया। यह मुकदमामेरठ षड्यंत्र केसमुकदमे के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। यह मुकदमा उस समय तक भारत का सबसे लम्बा मुकदमा था और दुनिया के सबसे बड़े और लम्बे मुकदमों में आज भी गिना जाता है। इस पर अंग्रेज सरकार ने करोड़ों-करोड़ रुपये खर्च किए। लेकिन उसे कम्युनिस्टों को कुचलने मेंसफलता नहीं मिली। उल्टे अखबारों और दूसरे जरिये से कम्युनिस्टों के बयानों और वक्तव्यों का प्रचार ही हुआ।
इस प्रकार यह उत्तर प्रदेश को फिर से एक बार सौभाग्य और श्रेय प्राप्त हुआकि वह कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का केन्द्र बने। इससे पहले फरवरी 1924 में 8 क्रांतिकारियों और कम्युनिस्टों के खिलाफ कानपुर षड्यंत्र केस चलाया गया था। इसमें प्रमुख नेताओं में एस0ए0 डांगे, शौकत उस्मानी तथा अन्य थे। मेरठ कैदियों का मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में चलाया जा रहा था। यह मुकदमा मेरठ में ही क्यों चलाया गया, कलकत्ता बम्बई किसी अन्य स्थान पर क्यो नहीं? इसके दिलचस्प कारण थे। बम्बई या कलकत्ता जैसी जगहों पर ज्यूरी की व्यवस्था करनी पड़ती जो अंग्रेज सरकार के लिए सरदर्द साबित हो सकती थी। इसके अलावा अंग्रेज सरकार के लिए प्रशासनिक और व्यावहारिक रूप से मेरठ ज्यादा अनुकूल था। फिर एक और कारण यह था कि मेरठ में मजदूर किसान पार्टी की एक शाखा भी थी। वहाँ मुकदमे में आरोपित फिलिप स्प्राट, सोहन सिंह, जोश, मुजफ्फर अहमद, अब्दुल माजिद और सहगल जैसे साथी जा चुके थे और उन पर इस आधार पर आसानी से आरोप लगाए जा सकते थे।
मेरठ जेल में आरम्भ में कैदियों को अलग अलग कोठरियों या सेल्स में रखा गया और उन पर कड़ा पहरा लगाया गया। उनके जरूरी सामान तक उनसे ले लिए गए और पुस्तकंे नहीं दी गईं। आगे चलकर काफी संघर्ष हुआ और दबाव पड़ा। तब जाकर उन्हें काफी बाद में एक बड़े बैरक में रहने की इजाजत मिली। साथ ही कुछ अन्य सुविधाएँ भी मिलीं।
इन 32 कैदियों में उत्तर प्रदेश के मुख्य नेता पी0सी0 जोशी, शौकत उस्मानी, अयोध्या प्रसाद, गौरी शंकर, विश्वनाथ मुखर्जी, धरमवीर सिंह और एच0एल0 कदम। मुकदमे की गूँज सारे देश और दुनिया में मची। मेरठ कैदियों के बचाव के लिए कांग्रेस ने एक विशेष कानूनी समिति बनाई जिसके अन्तर्गत पं0 नेहरू,सम्पूर्णानन्द तथा अन्य लोग और वकील सहायता कर रहे थे। कम्युनिस्टों ने मेरठ के एक जूनियर वकील शिव प्रसाद को भी लगा रखा था जो बहुत कम फीस पर काम कर रहे थे और उन्हें इन कैदियों से लगाव हो गया था। ब्रिटेन और अन्य देशों में भी मेरठ मुकदमे के कैदियों के समर्थन में आन्दोलन और अभियान चल पड़ा। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में एम0पी0 तथा अन्य लोगों ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए जिनका जवाब अंग्रेज सरकार को देते नहीं बना। मेरठ मुकदमा न सिर्फ भारत बल्कि उत्तर प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।


उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थापना

1936 का साल सी0पी0आई0 के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। उसी वर्ष लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यह सर्वविदित है कि उसी वर्ष तीन अखिल भारतीय जन संगठनों की स्थापना लखनऊ में की गई। 0आई0एस0एफ0, अखिल भारतीय किसान सभा और प्रगतिशील लेखक संघ, इस प्रकार यह गौरव भी उत्तर प्रदेश को मिला। इसी समय लखनऊ में ही सी0पी0आई0 की केन्द्रीय समिति की बैठक हुई। यह बड़ी ही महत्वपूर्ण बैठक थी और इसने मेरठ षड्यंत्र केस के बाद सी0पी0आई0 को पुनः संगठित होने में बड़ी मदद की। नोट करने लायक तथ्य यह है कि इस केन्द्रीय समिति की बैठक में एक तीन सदस्यीय पोलित ब्यूरो चुनी गई और वे तीनों ही सदस्य उत्तर प्रदेश ही के थे। वे थे पी0सी0 जोशी, आर0डी0 भारद्वाज और अजय घोष। पी0सी0 जोशी पार्टी के महामंत्री चुने गए। वास्तव में एक तरह से वे पहले से ही महामंत्री का कार्य सँभाल रहे थे। इसके कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश में पार्टी निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया। पोलित ब्यूरो के निर्देश पर अजय घोष कानपुर चले गए। कानपुर उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र था। रुद्रदत्त, भारद्वाज को उत्तर प्रदेश का दौरा करके परिस्थिति का जायजा लेने की जिम्मेदारी दी गई। उन पर वारण्ट था, इसलिए उन्हें यह काम छिपकर करना पड़ता था।
भारद्वाज मार्च 1937 में गुप्त रूप से इलाहाबाद गए और वहाँ जेड00 अहमद समेत कई साथियों से मिले। उन्होंने उत्तर प्रदेश में जगह-जगह कम्युनिस्टों से सम्पर्क करके पार्टी बनाने, की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उनके विचार में कानपुर, बलिया,
इलाहाबाद, बनारस और दूसरी कई जगहों पर कम्युनिस्ट ग्रुप बनाए जा सकते थे। उन्होंने रमेश सिन्हा, जेड0 0 अहमद, हाजरा बेगम, हर्षदेव मालवीय, सज्जाद ज़हीर तथा कई अन्य साथियों से सम्पर्क किया। उनके साथ एक बड़े ही होनहार कार्यकर्ता थे जो उनके साथ बम्बई से आए थे, उनका नाम था शरीफ अतहर अली। शरीफ को सम्पर्क करने का काम सौंपकर भारद्वाज वापस बम्बई लौट गए। इलाहाबाद के अलावा आगरा में शिवदान सिंह चैहान और एम0एन0 टण्डन, लखनऊ में नारायन तिवारी और रफीक नकवी, झाँसी में अयोध्या प्रसाद, फिरोजाबाद में अशफाक, रेलवे और दूसरे कई विभागों के मजदूरों में सन्त सिंह युसूफ और कई अन्य नेता एवं कार्यकर्ता उभरने लगे। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस समय जेड00 अहमद उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे और कम्युनिस्ट में भी काम कर रहे थे। यह जानकारी बहुत कम लोगों को है। इस हैसियत से उन्होंने उत्तर प्रदेश का दौरा करके पार्टी बनाने में बड़ी मदद की। 1940 आते-आते उत्तर प्रदेश में मजदूरों, किसानों, बुद्धिजीवियों, छात्रों,नौजवानों इत्यादि के बीच कम्युनिस्ट पार्टी उभरने लगी। जनाधार बढ़ने लगा। बाँदा, बुलन्दशहर, हमीरपुर, गोरखपुर, चैरी-चैरा, अलीगढ़, आजमगढ़, फैजाबाद, गाजीपुर
वगैरह जगहों में पार्टी के दल कायम हो गए। इस प्रक्रिया की परिणति प्रान्तीय कम्युनिस्ट सम्मेलन के रूप में हुई। इलाहाबाद में पहले ही 1936 में प्रांतीय पार्टी कार्यालय गुप्त रूप से स्थापित किया जा चुका था। वह काफी कठिनाई से काम कर रहा था।
उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थापना करने के लिए एक प्रान्त स्तरीय गुप्त सम्मेलन लखनऊ में 1938 में आयोजित किए जाने की जानकारी मिली। पार्टी पर प्रतिबंध होने और सम्मेलन गुप्त रूप से होने के कारण सटीक और विस्तृत जानकारी पाना कठिन था। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। अर्जुन अरोड़ा प्रादेशिक सी0पी0आई0 के प्रथम
सचिव बनाए गए।

अनिल राजिमवाले
क्रमश:

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -1

इस सच्चाई पर बहुत कम ध्यान जाता है कि भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन के निर्माण और विकास में उत्तर प्रदेश की कम्युनिस्ट पार्टी का योगदान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। इससे बड़ा योगदान क्या हो सकता है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में सन 1925 में की गई? यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसके पीछे पार्टी के निर्माण की तैयारी का इतिहास है। कानपुर में सम्मेलन करने का अर्थ यह भी था कि यू0पी0 (उस समय संयुक्त प्रान्त) में पार्टी, ट्रेड यूनियन और समाजवाद तथा कम्युनिज्म से सम्बंधित काफी कार्य चल रहे थे। इन्हीं कार्यों के परिणाम स्वरूप कानपुर में अखिल भारतीय कम्युनिस्ट सम्मेलन आयोजित किया जा सका।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना का सवाल

सवाल यह पैदा होता है कि इस सम्मेलन के लिए कानपुर को ही क्यों चुना गया? 1920 के दशक के आरम्भ में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी बनाने के विषय में कई बार सोचा जा रहा था। बीस का दशक आते आते कानुपर समेत भारत के कई शहरों, औद्योगिक केन्द्रों तथा अन्य जगहों पर कम्युनिस्टों और उनके हमदर्दों तथा माक्र्सवाद एवं समाजवाद से प्रभावित लोगों के ग्रुप तैयार हो रहे थे। मद्रास, बम्बई, कलकत्ता, लाहौर, कराँची इत्यादि जगहों में कम्युनिस्ट और मजदूर ग्रुप और समितियाँ उभर रही थीं तथा कुछ अखबार भी प्रकाशित हो रहे थे। घटनाएँ कम्युनिस्ट सम्मेलन की ओर बढ़ रही थीं।
उन्हीं दिनों कानपुर में भी समाजवाद और कम्युनिज़्म से सम्बंधित गतिविधियाँ हो रही थीं। कानपुर एक महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं मजदूर केन्द्र के रूप में उभर रहा था। वहाँ टेड यूनियनें सक्रिय हो रही थीं।1924 में कम्युनिस्टों के खिलाफ अंग्रेजों ने कानपुर षड्यंत्र केस चला रखा था
जिसमें एस0ए0 डांगे, नलिनी गुप्ता, मुजफ्फर अहमद और शौकत उस्मानी पर मुकदमा ठोक दिया गया था और उन्हें जेल में बन्द कर दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि इस मुकदमे के सरकारी वकील रास अलस्टोन ने एक बयान दिया जिसके अनुसार अंग्रेज सरकार द्वारा कम्युनिस्टों पर उनके विचारों के लिए नहीं बल्कि अंग्रेज सरकार गिराने का षड्यंत्र रचने के लिए कम्युनिस्टों पर मुकदमा चलाया जा रहा है।
इस बयान से कम्युनिस्टों को एक मौका मिला। उन्होंने सोचा कि क्यों नहीं हम एक खुला सम्मेलन करके कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कर लें और साथ ही अंग्रेजों के इस बयान की परीक्षा भी कर लें। यह विचार कौंधने के बाद कम्युनिस्ट सक्रिय हो गए। जेल में डांगे ने यह सवाल उठाया तथा बाहर एस.वी. घाटे और उनके सहयोगियों ने तथा कानपुर में सत्यभक्त इस लाइन पर सोचने लगे। बम्बई से एक साथी वी0एच0 जोशी मुकदमे से सम्बंधित कार्यों में मदद के लिए कानपुर आया करते थे। उनके जरिए डांगे ने इस विचार की सूचना बम्बई भेजी। अन्यसाथी भी सक्रिय हो गए। वी0एच0 जोशी, गणेश शंकर विद्यार्थी और दूसरों के भी मुकदमों की कानपुर से देखभाल कर रहे थे। जोशी को बताया गया कि वे कानपुर के साथियों को इस बात के बारे में बताएँ। शौकत उस्मानी ने भी कानपुर के अपने सम्पर्क वालों को ऐसे सम्मेलन का विचार दिया और सहायता का अनुरोध किया। इस प्रकार खुले रूप से कानपुर सम्मेलन की तैयारी शुरू हो गई। दूसरी ओर सत्यभक्त ने भी अपनी तरफ से तैयारियाँ आरम्भ कर दीं। सत्यभक्त कानपुर के पुराने क्रांतिकारी थे। वास्तव में वे भरतपुर के थे जो आजकल राजस्थान में हैं। 1913 में वे बम बनाने की प्रक्रिया में घायल हो गए थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भी हिस्सा लिया था। उन पर लगातार पुलिस की नजर थी। अब वे रूस की क्रांति और कम्युनिज्म के अध्ययन की ओर झुक गए। उनका ब्रिटिश कम्युनिस्ट सिल्विया पैंकहर्स्ट के साथ पत्र व्यवहार था। उनसे ब्रिटिश साहित्य मिला करता था। वे राधा मोहन गोकुल जी के साथ भी सहयोग करने लगे। सत्यभक्त एस0ए0 डांगे के साथ भी सम्पर्क में थे।
कानपुर षड्यंत्र मुकदमे के दौरान कलकत्ता से एक अब्दुल हलीम आया करते थे जो मुजफ्फर अहमद को केस के सिलसिले में मदद किया करते थे। ये नौजवान सत्यभक्त के साथ रहा करते थे। एक दिन कोर्ट में सत्यभक्त ने जज को कहते सुना कि कम्युनिज़्म खुद कोई गैरकानूनी चीज नहीं है। बस सत्यभक्त के दिमाग में विचार कौंधा कि क्यों न कानपुर में एक पार्टी बनाई जाए? उन्होंने कानपुर में 1924 में एक कम्युनिस्ट पार्टी बना डाली (इण्डियन कम्युनिस्ट पार्टी या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी)। यह अखिल भारतीय कम्युनिस्ट सम्मेलन से पहले की बात है। इसमें उनके हिसाब से करीब150 लोग शामिल हुए थे।
इसके बाद सत्यभक्त पर कड़ी सरकारी नजर रखी जाने लगी। उनकी एक किताब की दुकान भी थी, समाजवादी पुस्तक केन्द्र के नाम से, जहाँ से क्रांतिकारी और माक्र्सवादी साहित्य बेचा जाता था। दुकान पर पुलिस का कई बार छापा पड़ा। उनकी अपनी लिखी कुछ पुस्तकें भी जब्त कर ली गइंर्। इस बात के लिए सत्यभक्त की तारीफ करनी होगी कि 1924 या 25 में वे सुदूर विदेश से भी महत्वपूर्ण पुस्तकें मँगवाकर उन्हें बेचा करते थे और इस प्रकार वे पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराते थे। सत्यभक्त ने 1925 में भारत के सभी कम्युनिस्ट ग्रुपों को कानपुर में सम्मेलन आयोजित करने का सुझाव देते हुए आमंत्रित किया। देश के विभिन्न हिस्सों में जो अलगअलग कम्युनिस्ट ग्रुप्स काम कर रहे थे, उन्होंने कानपुर सम्मेलन में भाग लेने का निर्णय लिया। इनमें शामिल थे बम्बई, मद्रास, कलकत्ता, कानपुर, लाहौर, कराँची इत्यादि जगहों के कम्युनिस्ट सिंगार वेलू, घाटे, मुजफ्फर अहमद, अयोध्या प्रसाद, अब्दुल माजिद, जोगलेकर, निम्बकर, जे0पी0 बगरहट्टा इत्यादि। उनके अलावा मौलाना हसरत मोहानी, एस0 हसन, कृष्णा स्वामी जैसे लोग भी आए। सारे भारत के कम्युनिस्टों का यह प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन 25 दिसम्बर 1925 को कांग्रेस अधिवेशन के पण्डाल के बगल में एक अलग पण्डाल में आरम्भ हुआ। इसी सम्मेलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की घोषणा 26 दिसम्बर को हुई तथा यह सम्मेलन 29 दिसम्बर को सम्पन्न हुआ। यह ध्यान रहे कि उन दिनों आजादी की लड़ाई में कम्युनिस्टों का कांग्रेस के साथ गहरा सहयोग था। इसके अलावा स्वयं कांग्रेस पार्टी के कई प्रगतिशील और वामपंथी नेता चाहते थे कि कम्युनिस्टों का संगठन बने। उनकी शुभकामनाएँ इनके साथ थीं। कांग्रेस अधिवेशन के साथ सम्मेलन करने का एक और फायदा यह भी था कि कांग्रेस के कई कम्युनिस्ट सदस्य इसमें आसानी से हिस्सा ले सकते थे। कम्युनिस्टों को खुला सम्मेलन करने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं था।
सत्यभक्त सम्मेलन में चुनी गई कार्यकारिणी में शामिल किए गए। आगे चलकर उनके इस पार्टी के साथ मतभेद ब़ते चले गए, जो कुछ पहले से ही मौजूद थे। बाद में उन्होंने अपने को अलग कर लिया लेकिन वे सी0पी0आई0 के साथ जुड़े रहे। काफी बाद में वे दिल्ली में अजय भवन भी डॉ0 अधिकारी तथा अन्य से मिलने आया करते थे।

अनिल राजिमवाले
क्रमश:
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