पीसी जोशी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पीसी जोशी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

क्या वर्तमान समाज व्यवस्था में देश को एक देश कहा जा सकता है ?

देश का बटवारा निरंतर बढ़ता जा रहा है। यहाँ हम देश के इलाकाई या क्षेत्रीय बटवारे की या कश्मीर पूर्वोत्तर राज्यों के अलगाव की मांग के रूप में खड़े होते रहे बटवारे की बात नही कर रहे है |इन विवादों , बटवारों के समर्थन विरोध की चर्चाये तो आये दिन होती ही रहती है | निश्चित रूप से ये विवाद और झगड़े देश के लिए गंभीर खतरा हैं। लेकिन हम यहा देश में बढ़ते जा रहे उस आर्थिक सामाजिक बटवारे पर चर्चा कर रहे है , जो देश के एक या कुछ क्षेत्रो में ही सीमित नही हैं |बल्कि यह बटवारा देश-व्यापी हैं | देश के हर क्षेत्र हर समुदाय में फैलता बढ़ता जा रहा है।
यह बटवारा है , थोड़े से अमीर और व्यापक रूप से गरीब भारत का | यह बटवारा है ,छोटे से स्वच्छ व चमकदार और बड़े से लेकिन अँधेरे में रह रहे भारत का |छोटे से स्वस्थ तथा व्यापक रूप से बीमार भारत का | यह बटवारा है अरबपति , खरबपति बन रहे थोड़े से लोगो और समाज के व्यापक गरीब व निम्न माध्यम वर्गीय हिस्सों का | यह बटवारा है कुल आबादी के ७५ - ८० प्रतिशत जनसाधारण लोगो तथा २० - २५ प्रतिशत धनाढ्य एवं उच्च माध्यम वर्गियो का | इस बटवारे में एक तरफ साधारण मजदूरों , किसानो दस्तकारो , बुनकरों , छोटे -मोटे कारोबारियों , छोटे दुकानदारों तथा औसत रूप से पढ़ाई - लिखाई कर काम - धंधे में लगे लोगो की विशाल आबादी है तो दूसरी तरफ देश की धनाढ्य कम्पनियों , पद -प्रतिष्ठा प्राप्त राजनेताओं , अफसरशाहो , उच्च स्तरीय प्रचार माध्यमि सज्जनों , नामी गिरामी सांस्कृतिक कर्मियों , फिल्म स्टारों , माडलों , फैशनबाजो, तथा आम समाज में भी विभिन्न पेशो के जरिये अधिकाधिक कमाई कर रहे यह माध्यम वर्गियो आदि की छोटी आबादी हैं | यह देश और समाज का भारत , पाक , बांग्ला देश जैसा भौगोलिक व राजनैतिक बटवारा नही हैं | अपितु यह बटवारा है की देश के आर्थिक - सामाजिक हिस्सों का | बिडम्बना यह है की , देश के भौगोलिक इ राजनैतिक बटवारे की या कश्मीर व पुव्रोत्तर राज्यों के अलगाव इ बटवारे की आशकाओ व संभावनाओं पर तो बड़ी चर्चाये होती हैं , लेकिन राष्ट्र के निरंतर बढ़ते जा रहे आर्थिक व सामाजिक विभाजन पर कोई चर्चा नही होती | दूसरी बिडम्बना यह भी है कि भारत , पाक , बांग्लादेश में तो एकजुटता संभव है और वह किसी हद तक टूटती और फिर बनती बढती भी रही हैं | लेकिन राष्ट्र व समाज के निरंतर बढ़ते आर्थिक व सामाजिक विभाजन में एकता बनने व बढने कि कोई गुंजाइश नजर नही आती | कयोंकि समाज का धनाढ्य इ उच्च हिस्सा निचले समाज के शारीरिक व मानसिक श्रम को कम से कम मूल्य देकर हडपते रहने , छोटी - छोटी सम्मतियो का हिस्सा बनाते रहने और दुसरो को गरीबी बेकारी कि तरफ धकेलते रहने कि व्यवस्थागत प्रक्रिया को नही छोड़ सकता | कयोंकि देश - दुनिया व समाज में धनी - धनाढ्य बनने का कोई रास्ता न तो है और न हि हो सकता है |इस कडवी और तथ्यगत सच्चाई के वावजूद सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इस परस्पर विरोधी प्रक्रिया से समाज में बढ़ते जा रहे आर्थिक , सामाजिक बटवारे के वावजूद उसमे एक्जुता बनी हुयी है | खासकर वर्तमान दौर में घराती जन समस्याओं के वावजूद अवाछित शान्ति बनी हुई है |इसे लेकर जन - विरोध , जन विद्रोह कि लहर उठती दिखाई नही पद रही हैं | इसी का परिणाम है कि आर्थिक , सामाजिक रूप से बढ़ते जा रहे बटवारे के वावजूद इस देश का धनाढ्य व उच्च हिस्सों के देश तथा गरीब व निम्न वर्गियो के देश के रूप में बटवारे को अनदेखा किया जाता रहा है | साफ़ बात है कि देश - दुनिया का धनाढ्य व उच्च हिस्सा राष्ट्र (व विश्व के ) इस आर्थिक सामाजिक बटवारे को , उसमे कभी भी एकजुटता न खड़ी हो सकने कि वास्तविकताओ को कभी नही क्बुलेगा | कयोंकि अभी तक बनी रही इसी एकजुटता से व धनी से धनाढ्य और अब धनाढ्यतम बनता रहा है | कयोंकि सत्ता सरकार में फिर समाज के विभिन्न क्षेत्रो में चद - बढ़ रहा उच्च वर्गीय हिस्सा इस धनाढ्य वर्ग का सेवक समर्थक बना हुआ हैं | लेकिन क्या यही काम समाज के जनसाधारण को भी करते रहना चाहिए ?क्या उन्हें परस्पर विरोधी दो राष्ट्रों कि मौजूदगी को समझना व स्वीकारना नही चाहिए ?अब यह जन - साधारण का हि दायित्व हैं कि वह धनाढ्य हिस्सों से राष्ट्र का संचालन , नियंत्रण अपने हाथ में लेकर राष्ट्र के इस बढ़ते बटवारे को रोके और घटाए ?राष्ट्र को कमोवेश एक जैसा अखण्ड राष्ट्र बनाये | क्या राष्ट्र की वास्तविक एकता का रास्ता इसी प्रयास और उसके लिए अपरिहार्य जन -संघर्ष से नही गुजरेगा ? इसे भी सोचे इस पे मंथन करे .............

सुनील दत्ता
पत्रकार

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -8


आजादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

इन थोड़े पृष्ठों में 1947 से आज तक यू0पी0 में पार्टी के इतिहास और सी0पी0आई0 में उसकी भूमिका पर विचार संभव नहीं है हम केवल कुछ बिन्दुओं का उल्लेख भर कर देंगे। आजादी प्राप्त करने के बाद उत्तर प्रदेश और देश भर में सी0पी0आई0 ठीक ढर्रे पर चल रही थी कि अति वामपंथी संकीर्णतावाद और दुस्साहसिकता ने पार्टी को जकड़कर बरबाद कर दिया। पी0सी0 जोशी के नेतृत्व में सी0पी0आई0 ने आजादी का पुरजोर स्वागत किया था और अपनी उचित तथा सकारात्मक भूमिका अदा करना शुरू किया था। एक स्वतंत्र लेकिन पिछड़े तथा विकास मान रूप में पार्टी राष्ट्रीय और वर्गीय दोनों का ही सुन्दर संतुलित और द्वन्द्वात्मक रुख अपना रही थी। इसके अत्यन्त ही सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे थे और पार्टी देश की राजनैतिक मुख्य में एक मजबूत शक्ति बनने लगी थी। लेकिन ठीक इसी वक्त चरम क्रांतिकारिता की बीमारी ने पार्टी को जकड़ लिया और उसे ध्वस्त कर दिया। जोशी को हटा दिया गया और इसके साथ ही पार्टी का स्वर्णिम युग भी समाप्त हो गया। इस दयनीय स्थिति को ठीक करने में फिर वर्षों और कई दशक लग गए। आज तक सी0पी0आई0 वह स्थिति पुनः वापस प्राप्त नहीं कर पाई है। उत्तर प्रदेश में भी बी0टी0आर0 लाइन के घातक परिणाम निकले। 1950 आते-आते पार्टी बिखर गई। 1951 में अजय घोष को एक गुप्त अखिल भारतीय सम्मेलन में पार्टी का महासचिव बनाया गया। डंागे, घाटे और सी0 राजेश्वर राव के साथ मिलकर वे धीरे-धीरे पार्टी को पटरी पर वापस लाए।
उत्तर प्रदेश में रमेश सिन्हा, सी0पी0 जोशी, सरजू पाण्डे, जेड0ए0 अहमद तथा अनेक अन्य ने पार्टी को रास्ते पर लाने और उसका पुनः निर्माण करने में बड़ी भूमिका अदा की। 1952 आते-आते पार्टी फिर से अपने पैरों पर खड़ी होने लगी। पार्टी ने चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला लिया। इस चुनाव में सी0पी0आई0 को बड़ी सफलता मिली
और वह दूसरे नम्बर की पार्टी बन गई। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी को सफलता मिली, उसकी एक सीट पर जीत हुई।
उत्तर प्रदेश में आगे चलकर झारखण्डे राय, सरजू पाण्डे, जय बहादुर सिंह जैसे दिग्गज पार्टी की ओर से जीत कर संसद तथा विधान सभा में पहुँचे। 1967 के चुनाव में रुस्तम सैटिन संविद सरकार में मंत्री भी बने। उत्तर प्रदेश में जहाँ 1952 में एक ही सीट मिली थी, वहीं 1957 के चुनाव में पार्टी को विधान सभा में 9 सीटें मिलीं। उत्तर प्रदेश में लोक सभा और विधान सभा पार्टी के मजबूत क्षेत्र रहे, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश, साथ ही अन्य इलाकों में भी। डाॅ0 जेड0ए0 अहमद ने विधान सभा और परिषद में लम्बी पारी खेली। इसके अलावा पार्टी का जनाधार भी काफी मजबूत रहा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बाँदा, झाँसी, हमीरपुर, बस्ती, मुजफ्फरनगर और अन्य कई ऐसे इलाके विकसित हुए जहाँ पार्टी और उसके जनसंगठन बड़े ही शक्तिशाली बने। उत्तर प्रदेश ने पार्टी में जमीनदारी प्रथा के खिलाफ 1950 और 1960 के दशकों में अविस्मरणीय संघर्ष चलाए। 1960 और 70-80 के दशकों में हदबंदी कानून बनवाने और उन्हें लागू करवाने, फालतू जमीन भूमिहीनों के बीच बाँटने, खेतिहर मजदूरों तथागरीब किसानों का वेतन बढ़ाने और उनकी स्थिति सुधारने इत्यादि सवालों को लेकर पार्टी ने विशाल ऐतिहासिक आंदोलन खडे़ किए। 1960 के दशक में पार्टी और उसके जन संगठनों की ओर से छात्र और नौजवान आंदोलन संगठित किए गए। इनमें बंद आंदोलन प्रमुख थे जिन्होंने 1967 में कांगे्रस की सरकार गिराने में अपनी भूमिका अदा की। उत्तर प्रदेश में आर0एस0एस0-जनसंघ और आर0एस0एस0-बी0जे0पी0 जैसी साम्प्रदायिक शक्तियाँ काफी मजबूत रहीं। उत्तर प्रदेश बाबरी मस्जिद गिराने के लिए सारे देश में बदनाम हो गया। यह संघ परिवार की करतूतों के कारण मुख्य रूप से हुआ। पार्टी को ऐसी ताकतों से कड़ा मुकाबला करना पड़ा। साथ ही जातीय शक्तियाँ भी गंभीर खतरा थीं और हैं। 1960 के दशक में जब विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर माओवाद का हमला हुआ तो कम्युनिस्ट आंदोलन में फूट डाली जाने लगी। कम्युनिस्ट आंदोलन में माओवाद का जन्म हुआ। 1962 के चीनी आक्रमण ने माओवादियों को काफी बढ़ाया। पाला-पोसा और अन्त में कम्युनिस्ट पार्टी पर ही उन्होंने हमला कर दिया। इन फूट वादियों के कारण 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन कर दिया गया और आगे चलकर सी0पी0एम0 बनी।
इस प्रकार 1950 के बाद बड़ी कठिनाई से सी0पी0आई0 को रास्ते पर लाकर फैलाने का काम चल रहा था, पार्टी अब धीरे धीरे उठ खड़ी होकर जनता के लिए संघर्ष कर रही थी, ठीक ऐसे ही समय में यह एक बहुत बड़ा धक्का पहुँचा। फिर से एक बार पार्टी पीछे ढकेल दी गई। लेकिन पिछले 40 से अधिक वर्षों से सी0पी0आई0 फिर एक बार देश में और उत्तर प्रदेश में उभर कर आ रही है। चंडीगढ़ पार्टी कांग्रेस ने स्पष्ट कहा है कि पिछले चार दशकों की घटनाएँ आम तौर पर सी0पी0आई0 की राजनैतिक समझ को सही साबित करती हैं। कम्युनिस्ट और वाम एकता की लगातार कोशिशों के बाद कुछ थोड़ी सफलताओं के बावजूद अन्य वाम और कम्युनिस्ट पार्टियाँ इसके लिए तैयार नहीं हो रही हैं और उचित प्रतिक्रिया इस दिशा में नहीं रही है। इसलिए हम उसका इंतिजार करके पार्टी निर्माण और फैलाव का काम बन्द नहीं कर सकते।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाते हुए, जनता के प्रश्नों पर वाम जनवादी एकता की कोशिशें करते हुए एक मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का काम तेज करेगी। इससे जनता की ताकत बढ़ेगी, पार्टी व्यापक नवजवान पार्टी अर्थात जनता में फैली हुई पार्टी बनेगी और आम लोगों के हाथों में सी0पी0आई0 के रूप में एक संघर्ष का हथियार होगा। अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद आज सी0पी0आई0 ही है जो उत्तर प्रदेश और समूचे भारत में सबसे आगे बढ़कर सबसे ज्यादा जन संघर्ष कर रही है। अतीत और वर्तमान के इस इतिहास में उत्तर प्रदेश की पार्टी का विशेष योगदान हैं।

अनिल राजिमवाले
समाप्त

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उत्तर प्रदेश का योगदान -6

कामरेड पी0सी0 जोशी और उत्तर प्रदेश

कामरेड पी0सी0 जोशी की 100वीं वर्षगाँठ हम 2007 में सारे देश भर में मना चुके हैं। यह असाधारण व्यक्ति और असाधारण प्रतिभा वाला कम्युनिस्ट भी यू0पी0 ही की देन था। पी0सी0 जोशी के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है और लिखा जाना चाहिए। दुर्भाग्य से उनके बारे में बहुत कम लिखा गया है, और उनकी रचनाओं की जानकारी तो लोगों को नहीं के बराबर है। यहाँ हम उनके बारे में यू0पी0 के सन्दर्भ में ही कुछ कहेंगे। पूरन चन्द जोशी का जन्म 14 अप्रैल 1907 को (राहुल 14 फरवरी लिखते हैं) अलमोड़ा जिले में हुआ था। आज कल अलमोड़ा, उत्तराखण्ड में है, जोशी की पढ़ाई लिखाई अलमोड़ा और इलाहाबाद मंे हुई, और उन्होंने 1926 में एम0ए0 पास किया। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की और नैनी तथा मेरठ जेलों से परीक्षाएँ दीं। उनका परिवार उन्हें आई0सी0एस0 के लिए तैयार कर रहा था। लेकिन 1928 में कलकत्ता से एक टेªड यूनियन नेता आफताब अली अलमोड़ा आए, उनके पास रजनी पामदत्त
(आर0पी0डी0) की इण्डिया टुडे या आज का भारत नामक सुप्रसिद्ध किताब थी। उसे पढ़ने के बाद तो जोशी आई0सी0एस0 वगैरह भूल गए। उनकी जिन्दगी की दिशा बदल गई। इस बीच यू0पी0 और शेष भारत में यूथ लीग के नाम से नौजवानों और छात्रों के संगठन व्यापक रूप से उभर रहे थे, जैसा कि हम देख चुके हैं, इनके नेताओं में सर्वप्रथम पंडित नेहरू थे। यूथ लीग के संगठन इलाहाबाद में बड़े ही मजबूत थे। पी0सी0 जोशी भी इसके प्रभाव में आए। जल्द ही वे यू0पी0 यंग कामरेड्स लीग के सचिव बन गए, जो यूथ लीग का ही एक हिस्सा था। जोशी के सहयोगियों में सी0पी0आई0 के वरिष्ठ नेता एस0जी0 सरदेसाई थे, जो उस समय सर तेज बहादुर सप्रू के सचिव का काम कर रहे थे।
1928 में मेरठ में एक मजदूर किसान सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें पी0सी0 जोशी ने भी भाग लिया। यह इस संगठन के अखिल भारतीय सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में था। एम0ए0 पास करने के बाद जोशी ने इलाहाबाद में ही टूरों का काम ले लिया, लेकन वे ज्यादा समय मजदूरों, किसानों और छात्रों के बीच काम में देते थे। उन्होंने कानपुर के मजदूरों के बीच भी काम करना शुरू किया। वे जल्द ही मजदूर किसान पार्टी की यू0पी0 इकाई के सचिव बनाए गए और फिर इसकी अखिल भारतीय कार्यकारिणी में भी ले लिए गए। साथ ही वे कम्युनिस्ट पार्टी का काम भी गुप्त रूप से कर रहे थे। खासकर यू0पी0 में, यह बात जल्द ही उजागर होकर सामने आ गई। पी0सी0 जोशी इलाहाबाद के हालैंड हाल में रहा करते थे। मार्च 1929 में एक दिन पुलिस ने समूचे हाल को घेर लिया, यह खबर आग की तरह चारों ओर फैल गई। अन्य हाॅस्टलों और कमरों की तलाशी भी ली गई, पी0सी0 जोशी को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे सम्बंधित घटनाओं का उल्लेख हम पहले कर आए हैं।
पी0सी0 जोशी को मेरठ षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किया गया था, इससे पता चलता है कि उस समय तक वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उच्च नेताओं की श्रेणी में आ चुके थे, वे उन 32 में थे जिन्हें मेरठ केस में पकड़ा गया था।
पी0सी0 जोशी को पहले तो नैनी सेन्ट्रल जेल में रखा गया, वहाँ से उन्होंने कानून की परीक्षाओं की तैयारियाँ कीं। जेल में ही उनके लिए पढ़ने की सामग्री लाई गई थी, फिर उन्हें मेरठ जेल ले जाया गया, जहाँ वे पाँच वर्षों तक रहे। वहाँ हर कैदी अपना अपना बयान देता था, जोशी ने भी अपना बयान दिया। जोशी उस वक्त मात्र 22 साल के नौजवान थे। लेकिन अधिकतर कागजी कार्यवाही तथा लिखने का काफी काम उनके जिम्मे था। वे बड़े अच्छे तर्क दे सकते थे। उन्होंने डिगबी, हण्टर, कुक जैसे स्रोतों के प्रमाण पेश करते हुए बताया कि कैसे भारत गरीबी और भुखमरी में डूबा हुआ था। जोशी ने जेल से ही साम्राज्यवाद विरोधी संयुक्त मोर्चा और क्रांति के सिद्धांत पेश किए। मेरठ केस ने अभियुक्तों को अपने विचारों का प्रचार प्रसार करने में काफी मदद की। प्रेस, अखबारों, बातचीत इत्यादि के जरिए कम्युनिस्ट विचार लोगों तक पहुँचे।
अंग्रेजों की चाल काफी हद तक नाकाम रही। कम्युनिस्टों को अपने विचार विकसित करने और अध्ययन का भी काफी मौका मिला। पी0सी0 जोशी ने अपना समय माक्र्सवाद के गहन अध्ययन और पठन में लगाया, साथ ही उन्होंने मेरठ अभियुक्तों का कानूनी काम काफी हद तक स्वयं ही पूरा किया। पी0सी0 जोशी को 1933 में मेरठ से रिहा कर दिया गया, अन्य अभियुक्त भी रिहा कर दिए गए। अब जोशी ने कानपुर के मजदूरों में काम करना शुरू किया, लेकिन उन्हें फिर से फरवरी 1935 में गिरफ्तार करके कानपुर और गोरखपुर जेलों में रखा गया, लेकिन जेल में उनका रिकार्ड इतना अच्छा था और उन्होंने इतनी अच्छी बागवानी की, कि जल्द ही उन्हें रिहा कर दिया गया। जैसा कि हम ने पहले देखा उन्हें बहुत कम उम्र से पार्टी में महामंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई।
पी0सी0 जोशी के नेतृत्व में यू0पी0 और सारे भारत में पार्टी को पुनर्गठित किया जाने लगा। पार्टी के कुछ संकीर्ण विचारों के नेताओं ने, जो बाहर थे पार्टी और आन्दोलन में तोड़ फोड़ कर रखी थी, और न सिर्फ गुट बल्कि अलग पार्टियाँ भी बना रखी थीं। उ सबको एक करने का काम जोशी ने किया। धीरे-धीरे यू0पी0 और सारे देश में पार्टी फिर से अपने पैरों पर खड़ी होकर आगे बढ़ने लगी।
पी0सी0 जोशी की एक विशेषता यह थी कि उन्होंने पार्टी को केवल मजदूरों और किसानों तक सीमित नहीं रखा बल्कि व्यापक, मध्यम तबकों, पढ़े लिखे लोगों, कला और साहित्य के क्षेत्रों में भी पार्टी को फैलाया। जोशी के काल में पार्टी सांस्कृतिक पुनर्जीवन का साधन भी बनी। इसमें यू0पी0 का विशेष योगदान रहा। निराला, पंत, प्रेमचन्द और अनेक दूसरे साहित्यकार, यू0पी0 और समूचे देश से पार्टी और उसके जन संगठनों की ओर आकर्षित हुए। राहुल जैसे लेखकों और इतिहासकारों ने महान भूमिका अदा की। आम लोग माक्र्सवादी, क्रांतिकारी और समाजवादी साहित्य पढ़कर पार्टी की ओर आए, कई पीढि़याँ इससे प्रभावित र्हुइं, और आज भी हो रही हैं। आज भी राहुल की पुस्तकें पढ़कर नौजवान समाजवाद और कम्युनिज्म की ओर आकर्षित होते हैं। जोशी ने कला, साहित्य और फिल्म के क्षेत्रों में कम्युनिस्ट पार्टी और आई0पी0टी0ए0 को सामाजिक तथा सांस्कृतिक नवीनीकरण का माध्यम। (हथियार) बनाया, यह इस देश को उनका असाधारण योगदान रहा। इसमें यू0पी0 का खास योगदान था, लेकिन हम इसके विस्ता में यहाँ नहीं जा पाएँगे। यह एक अलग विषय है। कैफी आजमी और अनेकानेक अन्य जन कलाकारों ने आम जनता के बीच और फिल्मों में प्रगतिशील, क्रांतिकारी और समाजवादी विषयों को केन्द्र बनाया। यह काम बाद में आगे नहीं बढ़ पाया, जिसकी मुख्य जिम्मेदारी 1948-50 की संकीर्णतावादी दुस्साहसिक समझदारी पर जाती है। उसके बाद कम्युनिस्ट आंदोलन जोशी के जाने के बाद भी उन ऊँचाइयों को छू नहीं पाया। पी0सी0 जोशी ने प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) और आई0पी0टी0ए0 को देश के प्रमुख संगठनों का रूप दे दिया। अन्य पहलुओं के अलावा जोशी ने यू0पी0 में पार्टी के विकास पर विशेष ध्यान दिया।

अजय घोष का उत्तर प्रदेश पार्टी में योगदान

अजय घोष के एक जनरल सेक्रेटरी के रूप में यू0पी0 पार्टी का सी0पी0आई0 में योगदान रहा। अजय घोष ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और यू0पी0 पार्टी के इतिहास में अत्यंत ही महत्वपूर्ण और केन्द्रीय भूमिका अदा की। पी0सी0 जोशी ने सी0पी0आई0 और उसके जन संगठनों का निर्माण करते हुए एक कम्युनिस्ट आन्दोलन की मजबूत नींव रखी जो आज भी अपनी सारी कमियों के बावजूद कम्युनिस्ट आंदोलन के काम आ रही है।
जोशी, भारत और यू0पी0 में, पार्टी और कम्युनिस्ट एवं व्यापक जन आंदोलनों एवं जन संगठनों तथा पार्टी अखबारों और साहित्य, प्रेस इत्यादि के निर्माणकर्ता थे। बी0आर0टी0 आत्मघाती लाइन (1948-50) के जमाने में यह सब बरबाद कर दिया गया। पार्टी बिखर गई, सदस्यता में भारी गिरावट आई, जन संगठन चकनाचूर हो गए, और कुल मिलाकर एक प्रकार से कम्युनिस्ट आंदोलन मृत्युप्राय हो गया। उसके बाद यह अजय घोष थे, जिन्होंने कदम ब कदम और धीरे-धीरे पार्टी को सही पटरी पर लाकर पार्टी एवं जन संगठनों का पुनर्निर्माण किया। यह कोई आसान काम नहीं था। इसी टूटी-फूटी अवस्था में सी0पी0आई0 ने 1952 का पहला आम चुनाव लड़ा और विपक्ष की दूसरी तथा देश की पहली पार्टी के रूप में उभर कर आई। यदि 1948 का आत्मघात नहीं होता, तो पार्टी बड़ी शक्ति बन जाती। बी0आर0टी0 लाइन में तो हमने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर रखा था, क्योंकि क्रांति तुरन्त करनी थी और उसके परिणाम भी जब ही सबके सामने आ गए थे।
अजय घोष ने इन बिखरे टुकड़ों को इकट्ठा कर पार्टी को फिर से खड़ा किया, यह उनकी सबसे बड़ी देन रही। अजय घोष के पिता डाॅ0 सचिन्द्र घोष 1899 में कलकत्ता से कानपुर आए, और वहीं बस गए, वे पेशे से डाॅक्टर थे। अजय का जन्म बंगाल के मिहिजम (अब चितरंजन में) नामक गाँव में 20 फरवरी 1909 को हुआ था, फिर उन्हें कानपुर लाया गया, और उसके बाद वे वहीं पले बढ़े। राहुल द्वारा प्रस्तुत एक अन्य विवरण के अनुसार अजय का जन्म कानपुर में ही 22 फरवरी 1908 को हुआ था, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। उनकी बड़ी बहन भी कानपुर में ही रहती थीं और अजय की मृत्यु के बाद भी कुछ वर्षों तक जीवित रहीं।
अजय का पालन पोषण बड़े ही अनुकूल पढ़ाई लिखाई के वातावरण में हुआ। उनको कानपुर के आदर्श बंग विद्यालय में भर्ती कर दिया गया। वे मिडिल की परीक्षा में प्रथम आए। वे आगे चलकर विज्ञान के विद्यार्थी बने, साथ ही उन्हें बंगला समेत साहित्य में बड़ी रुचि रही। अजय बड़ी संख्या में पुस्तकें और साहित्य पढ़ते थे। स्कूल में तरुण भट्टाचार्या द्वारा स्थापित तरुण संघ या यूथ लीग में वे शामिल हो गए। वे रामकृष्ण मिशन के कामों में भी भाग लिया करते थे, दिलचस्प बात यह है कि भविष्य के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी विजय कुमार सिन्हा और बटुकेश्वर दत्त भी इसी संघ में शामिल थे। सुरेश बाबू वास्तव में यू0पी0 के क्रांतिकारियों के संगठन कर्ता थे, वे अजय के लिए एक उदाहरण थे।
1921 में अजय के स्कूल में देशबन्धु सी0आर0 दास की गिरफ्तारी के विरुद्ध छात्रों की हड़ताल हो गई, जिसमें उन्होंने सक्रियता से भाग लिया। अजय ने 1920-22 के असहयोग आंदोलन में वालंटियर बनने की कोशिश भी की, लेकिन कम उम्र के कारण उन्हें इजाजत नहीं मिली। बटुकेश्वर दत्त और विजय कुमार सिन्हा अजय के घर नियमित रूप से आया करते थे। अजय के पिता ने देखा कि यह लड़का किसी और दिशा में जा रहा है अर्थात क्रांतिकारी रास्ते पर। लेकिन उन्होंने इसमें कोई दखल नहीं दिया और अजय को पूरी आजादी दी।
1922 में अजय को राजकीय कालेज में भर्ती कर दिया गया। वे भारी संख्या में साहित्य पढ़ रहे थे। उन्होंने 1924 में लेनिन की मृत्यु पर शोक भी मनाया। अजय ने विजय के साथ मिलकर तीन वर्षों तक निर्मला नाम की एक पत्रिका भी निकाली। 1924 में अजय कानपुर के क्राइस्ट चर्च कालेज में भर्ती हुए। उन्होंने केमिस्ट्री और विज्ञान विशेष तौर पर पढ़ा ताकि बम बनाने का तरीका जान सकें। उन्होंने रेड बंगाल नामक एक पत्रिका का वितरण करना भी शुरू किया, साथ ही पिस्टल चलाने की पै्रक्टिस भी की।
1926 में अजय घोष इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भर्ती हो गए और 1929 में उन्हें बी0एस0सी0 की डिग्री मिली। वे हिन्दू हाॅस्टल में रहा करते थे। उनका कमरा क्रांतिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनता गया। उनके कमरे में अब भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, शिव वर्मा और अन्य क्रांतिकारी आने लगे और बैठके करने लगे तथा रहने भी लगे।


अनिल राजिमवाले
क्रमश:
Share |